Thursday, May 30, 2019

Chronological Quran: Middle Meccan Surah-2 [मध्यवर्ती मक्का काल-2]

Middle Meccan Surah-2 / [मध्यवर्ती मक्का काल-2]



सूरह 72 : अल जिन्न [The Jinn]   

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है 
(ऐ रसूल) आप कह दें : ‘मेरी ओर “वही”[revelation] भेजी गयी है कि जिन्नों* के एक दल ने (मेरे क़ुरआन पढने को) ध्यान से सुना, तो (जाकर अपनी क़ौम से) कहने लगे: “बेशक हमने एक अजीब कुरआन सुना है”,  (1)
 [* जिन्न आग से पैदा किए गए हैं जो हमें दिखायी नहीं देते.]
जो अच्छाई की राह पर चलने का रास्ता दिखाती है, इसलिेए हम ने उस पर विश्वास कर लिया है ---- और अब हम (इबादत में) अपने रब के साथ किसी और को कभी साझेदार [partner] नहीं ठहराएँगे----  (2)
और यह कि, “हमारे रब की शान बहुत ऊँची है! उसकी न कोई पत्नी है और न ही कोई औलाद।”  (3)
हम में से कुछ मूर्ख लोग अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहा करते थे जो सच्चाई से बहुत दूर थीं,  (4)
हालाँकि हमने यह समझा था कि इंसान और जिन्न अल्लाह के बारे में कभी झूठ बोलने की हिम्मत नहीं करेंगे।  (5)
इंसानों में से कुछ लोगों ने पहले भी जिन्नों से शरण माँगी है, मगर इससे जिन्नों ने उन्हें केवल और ज़्यादा भटका ही दिया था।  (6)
वे [इंसान] समझते थे, जैसा कि तुमने (ए जिन्नों के समूह!) समझा, कि अल्लाह (मरने के बाद) कभी किसी को दोबारा नहीं उठाएगा।  (7)
हम (जिन्नों) ने आसमानों को टटोलना चाहा तो उन्हें कड़े पहरेदारों और (अंगारों की तरह) जलने और चमकने वाले सितारों [shooting stars] से भरा हुआ पाया ---- (8)
हम (आगे होनेवाली चीज़ों की सुन-गुन लेने के लिए) पहले उस [आसमान] के कुछ स्थानों पर बैठ जाया करते थे, मगर अब जो कोई (चोरी छुपे) सुनना चाहे, तो वह देखता है कि कोई आग की लौ है जो उसके घात में लगी हुई है---- (9)
(सो अब), हम नहीं जानते कि (हमारे ऊपर रोक लगा देने से) ज़मीन पर रहने वालों के साथ कोई बुरा मामला करने का इरादा किया गया है, या उनके रब ने उनके साथ भलाई का (व सीधा रास्ता दिखाने का) इरादा किया है।”  (10)
हम में से कुछ अच्छे व नेक हैं और हम (ही) में से कुछ ऐसे (नेक) नहीं हैं :  हम अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं। (11 
हम जानते हैं कि हम अल्लाह को ज़मीन में कभी भी आजिज़ [frustrate] नहीं कर सकते; हम उससे बच कर कहीं भाग भी नहीं सकते।  (12)
जब हमने रास्ता दिखाने वाली (किताब) को सुना तो उस पर विश्वास कर लिया : फिर जो कोई अपने रब पर विश्वास कर लेता है, उसे न तो किसी नुक़सान से डरने की ज़रूरत है, और न किसी अन्याय से। (13 
हम में से कुछ तो उसी (अल्लाह) के सामने अपना सिर झुकाते हैं, और कुछ दूसरे हैं जो ग़लत रास्तों पर चलते हैं : जो (अल्लाह के) सामने अपना सिर झुकाते हैं, उन्होंने तो सूझ-बूझ की राह ढूँढ ली,  (14)
मगर जिन्होंने (सच्चाई से मुँह मोड़ते हुए) ग़लत रास्ता अपना लिया,  तो वे जहन्नम का ईंधन बनने वाले हैं।” (15)
(ऐ रसूल आप मक्का के लोगों से कह दें), अगर उनलोगों ने (सच्चाई का) सही रास्ता अपनाया होता, तो हम ने उनके लिए बड़ी मात्रा में पीने का पानी उपलब्ध करा दिया होता। (16 
ताकि हम इस (नेमत के द्वारा) उनकी परीक्षा ले सकें और जो कोई आदमी अपने रब की याद से मुंह मोड़ेगा, तो वह [अल्लाह] उसे बहुत सख्त अज़ाब [यातना] में डाल देगा। (17)
और यह कि सभी मस्जिदें अल्लाह के लिए (विशेष) हैं, सो उनमें अल्लाह के साथ किसी और की इबादत [पूजा] मत किया करो। (18) 
और यह कि जब अल्लाह के बंदे (मुहम्मद सल्ल.) उसकी इबादत करने खड़े हुए तो (जिन्नों के) समूह के समूह वहाँ जमा हो गये (ताकि उनको क़ुरआन पढते हुए सुन सकें),  (19 
आप कह दें कि “ मैं तो केवल अपने रब की इबादत करता हूँ और उसके साथ किसी को साझेदार या शरीक नहीं मानता”  (20)

आप कह दें कि “न तुम्हारा कोई नुकसान (यानी तुम्हारा कुफ़्र) मेरे अधिकार में है और न भलाई (यानी तुम्हारा ईमान लाना)”, (अर्थात असली मालिक अल्लाह है, रसूल तो अल्लाह और बंदे के बीच एक माध्यम हैं)  (21)
आप कह दें कि, “न मुझे कभी कोई अल्लाह के (हुक्म के खिलाफ) अज़ाब [यातना] से बचा सकता है और न मैं उसे छोड़कर कोई पनाह की जगह पा सकता हूँ।" (22)
मगर अल्लाह की ओर से आदेश और संदेश पहुंचाना (मेरी जिम्मेदारी है), और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की बात न मानेगा,  तो निश्चित रूप से इसके लिए जहन्नम की आग है जिसमें ऐसे लोग हमेशा रहेंगे। (23)
(और वे लोग बुराई पर अड़े रहेंगे) यहां तक ​​कि जब वे (अज़ाब) देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जा रहा है,  तो (उस समय) उन्हें पता चल जाएगा कि किसके मददगार कमजोर हैं और कौन संख्या में कम है। (24)
आप कह दें : “मैं नहीं जानता कि जिस (क़यामत के दिन) से तुम्हें डराया जा रहा है,  वह करीब है या इसके लिए मेरे रब ने कोई लंबी अवधि निर्धारित कर रखी है,” (25)
(वही) सारे भेद का जानने वाला है, इसलिए वह अपने भेद के बारे में किसी (आम आदमी) को नहीं बताता,  (26)
सिवाए किसी पैग़म्बर के जिसे उसने (इस काम के लिए) पसंद कर लिया हो, ऐसी सूरत में वह उस पैगम्बर के आगे और पीछे (भेद की बातों की रक्षा के लिए) कुछ रक्षकों को लगा देता है,   (27)
ताकि अल्लाह (यह) जान ले कि बेशक उनके (रसूलों) ने अपने रब के संदेश पहुंचा दिए, और (अल्लाह के आदेश और भेद की बातों के ज्ञान में से) जो कुछ उनके पास है अल्लाह को (पहले से) इनकी सारी जानकारी है, और उसने हर हर चीज़ का हिसाब कर रखा है।  (28)  



सूरह 36: या-सीन [Ya Sin]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

या॰ सीन॰ (1)

गहरी समझ-बूझ [हिकमत] से भरे हुए क़ुरआन की क़सम,  (2)

[ऐ मुहम्मद] आप सचमुच भेजे गए पैग़म्बरों[ messengers] में से एक हैं,  (3)

बिल्कुल सीधे मार्ग पर,   (4)

यह (क़ुरआन) उस रब की तरफ़ से उतारा जा रहा है जिसके क़ब्ज़े में सारी ताक़त है, और वह बहुत दया करनेवाला है,  (5)

ताकि आप ऐसे लोगों को सावधान कर दें, जिनके बाप-दादा को सावधान नहीं किया गया था; इस कारण वे इन बातों को नहीं जानते हैं।  (6)

उनमें से अधिकतर लोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला हो चुका है, क्योंकि उन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार कर दिया है। (7

(ऐसा लगता है मानो) हमने उनकी गर्दनों में ठोड़ियों [chin] तक लोहे की ज़ंजीर बाँध दी हो, जिससे उनके सिर ऊपर की तरफ़ अकड़ गए हों,  (8)

और हमने एक रोक [barrier] लगा दी हो, उनके आगे भी और उनके पीछे भी, और उनकी नज़रों को छेंक लिया हो : सो वे कुछ देख नहीं सकते।   (9)

आप उन्हें चेतावनी दें या न दें, उनके लिए तो दोनों ही बराबर है : वे (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करेंगे।  (10)

आप तो बस ऐसे ही लोगों को सावधान कर सकते हैं जो (क़ुरआन की) नसीहत पर चलते हों, और अपने दयालु रब का डर रखते हों, हालाँकि वे उसे देख नहीं सकते : ऐसे लोगों को उनके गुनाहों की माफ़ी और एक बड़े इनाम की ख़ुशख़बरी सुना दें।  (11)

निस्संदेह हम-- मुर्दों को दोबारा ज़िंदा करेंगे, और हम लिखते रहते हैं जो कुछ (कर्म) वे अपने आगे भेजते हैं, और साथ ही जो कुछ (अपने कर्मों के प्रभाव) वे अपने पीछे छोड़ जाते हैं : हम एक स्पष्ट किताब में हर एक चीज़ का हिसाब-किताब रखते हैं।  (12)

[ऐ रसूल] आप उनके सामने उन लोगों का उदाहरण बताएं जिनकी बस्ती में (अल्लाह का संदेश लेकर) रसूल आए थे।  (13)

हमने (शुरू में) दो रसूल [messengers] भेजे, मगर उन लोगों ने दोनों को मानने से इंकार कर दिया। फिर हमने तीसरे (रसूल) के द्वारा उनकी ताक़त बढायी, तब उन (रसूलों) ने कहा, "यक़ीन करो, हम तुम्हारे पास (अल्लाह का संदेश) लेकर आए हैं।" (14)

उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम तो बस हमारे ही जैसे आदमी हो। रहम करनेवाले रब ने कोई भी चीज़ नहीं भेजी है; तुम तो केवल झूठ बोल रहे हो।" (15)

उन (रसूलों) ने कहा, "हमारा रब जानता है कि हम निश्चय ही तुम्हारी ओर भेजे गए हैं  (16)

औऱ हमारी ज़िम्मेदारी तो बस तुम तक संदेश पहुँचा देने की है।" (17)

वे जवाब में बोले, "हम तो तुम्हें अप-शगुन [evil omen] समझते हैं, यदि तुम नहीं माने तो हम तुम्हें पत्थर से मारेंगे, और तुम्हें अवश्य हमारी ओर से दर्दनाक यातना पहुँचेगी।" (18)

रसूलों ने कहा, "तुम्हारा अप-शगुन तो तुम्हारे अपने अंदर है। तुमलोग इस चीज़ को अप-शगुन क्यों मानते हो, जबकि तुम्हें (सच्चाई की याद दिला कर) चेताया जा रहा है? असल में तुम लोग (गुनाहों में) बहुत दूर जा चुके हो!" (19

फिर शहर के दूसरे छोर से एक आदमी दौड़ता हुआ आया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इन रसूलों का कहना मान लो। (20)

इनके बताए हुए रास्ते पर चलो : वे तुम से कोई मज़दूरी तो नहीं मांग रहे हैं, और वे सीधे मार्ग पर हैं,  (21)

"और मैं उसकी बंदगी क्यों न करूँ, जिसने मुझे पैदा किया? और उसी की ओर तुम्हें लौटकर जाना है।  (22)

मैं उस (अल्लाह) को छोड़ कर दूसरे देवताओं को कैसे अपना ख़ुदा मान लूँ, जबकि अगर रहम करनेवाला ख़ुदा मुझे कोई तकलीफ़ पहुँचाना चाहे, तो न उनकी सिफ़ारिश मेरे कोई काम आ सकेगी और न तो वे मुझे बचा ही सकेंगे? (23)

तब तो मैं साफ़ तौर से ग़लत रास्ते में पड़ जाऊँगा। (24)

मैं तो आपके रब में विश्वास करता हूं, अतः मेरी बात सुनो!" (25)

(अंतत: बस्तीवालों ने शायद उसे शहीद कर दिया, तब अल्लाह की तरफ से) कहा गया, “दाख़िल हो जाओ जन्नत में!" उसने कहा, "ऐ काश! मेरी क़ौम के लोग यह बात जान पाते (26)

कि किस तरह मेरे रब ने मुझे माफ़ कर दिया और मुझे प्रतिष्ठित लोगों में शामिल कर लिया!" (27)

उसके बाद उसकी क़ौम पर हमने आसमान से कोई सेना नहीं उतारी और न हमें उतारने की कोई ज़रूरत थी :  (28)

वह तो केवल एक ज़ोरदार आवाज़ थी जिससे वे बेजान होकर गिर गए!  (29)

अफ़सोस है मनुष्य जाति पर! जब कभी कोई रसूल उनके पास आया, वे उसका मज़ाक़ ही उड़ाते रहे।  (30

क्या उन्होंने नहीं देखा कि उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हमने तबाह बर्बाद कर दिया, जिनमें से कोई भी अब कभी लौट कर उनके पास आने वाला नहीं है? (31)

मगर यह सबके सब लोग हमारे सामने इकट्ठा कर के हाज़िर किए जाएँगे। (32)

और (देखो!) उनके लिए एक निशानी तो वह ज़मीन है जो मुर्दा पड़ी हुई थी : हमने उसे जीवित किया और उससे अनाज उगा दिए, जिसमें से वे खाते हैं।  (33

और हमने उसमें खजूरों और अंगूरों के बाग लगाए हैं, और उसमें से पानी के सोते (springs) प्रवाहित कर दिए हैं,    (34)

ताकि वे उसके फल खा सकें --- हालाँकि यह सब कुछ उनके हाथों का बनाया हुआ नहीं है --- तो क्या फिर भी वे शुक्र नहीं अदा करेंगे? (35)

महिमावान है वह जिसने हर चीज़ को जोड़े जोड़े में (और तरह-तरह का) पैदा किया है--- धरती जो चीजें उगाती है उनमें से भी, और स्वयं उन इंसानों में से भी, और उन चीज़ों में से भी जिनको वे अभी नहीं जानते! (36)

और एक निशानी उनके लिए रात भी है : हम उस पर से दिन की रौशनी को खींच लेते हैं, फिर क्या देखते हैं कि वे अचानक अँधेरे में रह गए।  (37)

और सूरज भी अपने नियत रास्ते पर चलता रहता है जिसे सबसे ताक़तवाले और सबसे ज्ञानी (अल्लाह) ने उसके लिए तय किया है। (38)

और चाँद की भी हमने मंज़िलें [phases] हिसाब कर के तय कर रखी हैं, यहाँ तक कि वह (अपनी मंज़िलें तय करता हुआ) फिर खजूर की पूरानी टहनी की तरह (पतला) हो जाता है।  (39)

न सूरज ही से हो सकता है कि चाँद को जा पकड़े और न रात दिन से आगे बढ़ सकती है : हर एक अपनी-अपनी कक्षा में तैर रहे हैं।  (40)

और एक निशानी उनके लिए यह भी है कि हमने आदमी की पूरी एक नस्ल को भरी हुई (नूह की) नौका [Noah’s Ark] में सवार कर (के बचा) लिया था, (41)

और हमने उनके लिए उस (नौका) की तरह (सवारी करने की) कई चीज़ें बनायीं, जिन पर वे सवारी करते हैं,  (42)

और अगर हम चाहें तो उन्हें पानी में डुबा दें, फिर कोई न होगा जो इनकी मदद कर सके : उन्हें बचाया नहीं जा सकेगा. (43)

यह तो बस हमारी दयालुता [mercy] है कि हमने उन्हें थोड़े समय के लिए ज़िंदगी के मज़े उठाने की मुहलत दे रखी है।  (44)

इसके बावजूद जब उनसे कहा जाता है कि “बच कर रहो (उस यातना से), जो तुम्हारे आगे (आनेवाली दुनिया में) भी है और जो तुम्हारे पीछे (इस दुनिया में) भी है, ताकि तुम पर रहम (दया) किया जा सके”,  (45)

मगर वे अपने रब की तरफ से आयी हुई हर एक निशानी को नज़रअंदाज़ [ignore] कर देते हैं,  (46)

और जब उनसे कहा जाता है कि "अल्लाह ने जो कुछ रोज़ी तुम्हें दी है उनमें से (दूसरों पर भी) ख़र्च करो", तो (सच्चाई से) इंकार करनेवाले [काफ़िर] ईमानवालों से कहते हैं, "हम उन लोगों को खाना क्यों खिलाएँ जिन्हें अगर अल्लाह चाहता तो स्वयं ही खिला देता? असल में तुम तो पूरी तरह मार्ग से भटक चुके हो।" (47)

और वे कहते हैं कि "अगर तुम्हारी बात सच्ची है, तो यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा?" (48)

असल में, वे तो बस एक ज़ोरदार धमाके की प्रतीक्षा में हैं जो उन्हें (अचानक) आ पकड़ेगी, जबकि वे आपस में झगड़ रहे होंगे,  (49)

फिर न तो उन्हें कोई वसीयत करने का समय मिल पाएगा और न अपने घरवालों की ओर लौट कर जा सकेंगे। (50)

(जब) नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा और --– देखोगे कि अचानक ---- वे अपनी क़ब्रों से निकलकर अपने रब की ओर तेज़ी से चल पड़ेंगे,  (51)

(क़यामत देख कर) कहेंगे, "अफ़सोस हम पर! किसने हमें आराम करने की जगहों से उठा खड़ा किया है?” (उनसे कहा जाएगा) यह वही चीज़ है जिसका वादा रहम करनेवाले रब ने किया था, और रसूलों ने सच कहा था।" (52)

बस बड़े ज़ोर का एक ही धमाका होगा और फिर ---– देखोगे कि अचानक वे सबके-सब हमारे सामने हाज़िर कर दिए गए। (53)

आज के दिन किसी जान पर रत्ती भर भी ज़ुल्म नहीं होगा, और तुम्हें बदले में कुछ और नहीं, बल्कि वही मिलेगा जो कुछ कर्म तुम किया करते थे।  (54)

सचमुच जन्नतवाले लोग आज अपने पसंदीदा कामों में मगन होंगे,  (55)

वे लोग और उनके पति-पत्नियाँ घनी छाँव में तख़्तों पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे, (56)

उनके लिए वहाँ (हर तरह का) फल होगा, और वह सब कुछ मौजूद होगा  जिसकी वे माँग करें। (57)

दया करनेवाले रब की तरफ़ से उन्हें “सलाम” कहा जाएगा।  (58)

[काफ़िरों से कहा जाएगा], "मगर ऐ अपराधियो! आज तुम (नेक लोगों से) अलग हट जाओ! (59)

क्या मैंने तुम्हें यह आदेश नहीं दिया था, ऐ आदम के बेटो!, कि शैतान की पूजा न करो क्योंकि सचमुच वह तुम्हारा खुला दुश्मन है,  (60)

बल्कि मेरी बन्दगी करो? यही सीधा मार्ग है (61)

उसने तुममें से बहुत बड़ी संख्या में लोगों को सही मार्ग से भटका दिया। तो क्या तुम ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं किया? (62)

यह वही जहन्नम है जिसकी तुम्हें धमकी दी जाती थी। (63)

आज इस (आग) में दाख़िल हो जाओ, इस कारण से कि तुम (मेरे आदेशों को) मानने से हमेशा इंकार करते रहे हो।" (64)

और उस दिन हम उनके मुँह को बंद करके सील कर देंगे, मगर उनके हाथ हमसे बातें करेंगे, और उनके पाँव उन कर्मों की गवाही देंगे, जो कुछ भी उन्होंने किया है। (65)

अगर हम ऐसा चाहते तो (इसी दुनिया में) उनकी आँखों की रौशनी छीन लेते। वे रास्ते की तलाश में मारे मारे फिरते, मगर वे कैसे देख पाते? (66)

अगर हम ऐसा चाहते तो जहाँ वे खड़े हैं, वहीं उनके शरीर को बेकार कर देते जिससे न वह आगे बढ पाते और न ही पीछे हट पाते।  (67)

अगर हम किसी को लम्बी उम्र देते हैं, तो उसके (शरीर के) विकास को (कमज़ोर कर) उलट देते हैं। फिर भी वे बुद्धि से काम नहीं लेते? (68)

हमने उन (रसूल) को शायरी (का हुनर) नहीं सिखाया और न ही कभी भी वह कवि के रूप में जाने गए हैं। यह क़ुरआन, और कुछ नहीं, बल्कि लोगों को (उनके कर्तव्यों को) याद दिलाने [remind] के लिए उतारी गई है, जो चीज़ों को स्पष्ट कर देती है; (69)

ताकि वह ऐसे आदमियों को चेतावनी दे सके जो सचमुच ज़िंदा (दिल रखते) हों, और यह कि (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों के ख़िलाफ़ अल्लाह अपना फ़ैसला सुना सके।  (70)

क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने अपने हाथों की बनाई हुई चीज़ों में से उनके लिए चौपाए [मवेशी/livestock] पैदा किए, जिनके अब वे मालिक हैं?  (71)

और उन (मवेशियों) को उनके वश में कर के सधा दिया, ताकि उनमें से कुछ तो उनके लिए सवारियों के काम में आते हैं, कुछ खाने के काम में,  (72)

कुछ मवेशियों से दूसरे कई फ़ायदे हैं, तो कुछ पीने के काम में आते हैं? तो क्या वे (हमारा) शुक्र नहीं अदा करेंगे?  (73)

मगर इसके बावजूद उन्होंने अल्लाह को छोड़ कर दूसरों को अपना भगवान बना रखा है कि शायद उनसे उन्हें कोई मदद मिल जाए,  (74)

हालाँकि वे उनकी कोई मदद नहीं कर सकते, चाहे वे अपनी पूरी फ़ौज को ही एक साथ क्यों न बुला लें! (75)

अतः [ऐ रसूल] आप उनकी बातों से दुखी न हों : हम जानते हैं जो कुछ वे छिपाते हैं और जो कुछ वे सामने कहते हैं।  (76)

क्या आदमी नहीं जानता कि हमने उसे वीर्य [sperm] की एक बूंद से पैदा किया? तब भी क्या देखते हैं कि वह खुल कर (क़ुरआन और क़यामत पर) झगड़े करता है, (77)

हमारे ख़िलाफ़ तर्क-वितर्क करता है, मगर ख़ुद अपनी पैदाइश को भुला बैठा है। कहता है, "कौन इन हड्डियों में फिर से जान डालेगा, जबकि वे सड़-गल चुकी होंगी?" (78)

कह दें, "उनमें वही फिर से जान डालेगा जिसने उनको पहली बार पैदा किया था : वह तो पैदा करने के हर एक काम की पूरी पूरी जानकारी रखता है, (79)

वही तो है जिसने तुम्हारे लिए हरे पेड़ से आग पैदा कर दी --— फिर तुम उससे अपने लिए आग सुलगा लेते हो।" (80

जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है, क्या उसे इसकी ताक़त नहीं कि उन जैसे लोगों को (दोबारा) पैदा कर सके? बिल्कुल है! वह तो ऐसी रचना करनेवाला है जो सब कुछ जानता है :  (81)

उसका मामला तो यह है कि जब वह किसी चीज़ (के पैदा करने) का इरादा करता है, तो बस इतना कहता है कि ----  "हो जा!" और वह हो जाती है। 82)

अतः महिमा है उसकी, जिसके हाथ में हर चीज़ का पूरा नियंत्रण [Control] है। और उसी के पास तुम सबको ले जाया जाएगा.”  (83)



सूरह 25: अल फ़ुरक़ान

[सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ बतानेवाली किताब/ The Differentiator]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

बड़ी ऊँची शान है उसकी, जिसने अपने बन्दे पर एक ऐसी किताब उतारी है, जो सच को झूठ से अलग करनेवाली है, ताकि सारी दुनिया के लोगों को सावधान किया जा सके। (1)

वही है जिसके पास आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण [control] है, और उसकी कोई संतान नहीं है ---- कोई नहीं है जो उसके नियंत्रण व क़ब्ज़े में उसका साझेदार [Partner] हो--- और उसी ने सारी चीज़ें पैदा की हैं और उन्हें बिल्कुल नपे-तुले अन्दाज़े के मुताबिक़ बनाया है।  (2)

इसके बावजूद, विश्वास न करनेवालों [काफ़िर] ने अल्लाह को छोड़कर ऐसे देवताओं को अपना ख़ुदा बना रखा है, जो किसी चीज़ को पैदा नहीं कर सकते, बल्कि वे तो स्वयं पैदा किए जाते हैं, न तो वे कोई नुक़सान पहुँचा सकते हैं, न ही ख़ुद अपनी मदद ही कर सकते हैं, और उनके हाथ में न किसी की मौत है, न जीवन है, और न ही मरे हुए को दोबारा ज़िंदा उठाया जाना है। (3)

विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] कहते हैं, "यह (क़ुरआन) तो बस मनघड़ंत चीज़ है जो इस (रसूल) ने दूसरों की मदद से गढ़ ली है” ---- (मगर) इनलोगों ने तो ख़ुद ही बहुत शैतानियाँ की हैं और अब झूठ बकने पर उतर आए हैं---- (4)

वे कहते हैं, "ये (क़ुरआन) तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं, जिनको इस (रसूल) ने लिख रखा है : वह (अफ़साने) उसे सुबह और शाम लिखवाए जाते हैं।" (5)

कह दें, "इस (क़ुरआन) को उस (अल्लाह) ने उतारा है जो आसमानों और ज़मीन के रहस्य जानता है। सचमुच ही वह बहुत माफ़ करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।" (6)

उनका यह भी कहना है, "यह किस तरह का रसूल है जो (आम आदमी की तरह) खाना खाता है और बाज़ारों में चलता-फिरता है! किसी फ़रिश्ते को क्यों नहीं भेजा गया जो लोगों को सावधान करने में इसकी मदद करता? (7)

क्यों नहीं इसे ऊपर से कोई ख़ज़ाना या कोई बाग़ दे दिया गया, जिसमें से यह खाता पीता?" और यह शैतानियाँ करनेवाले (मुसलमानों से) कहते हैं, "तुम लोग जिस आदमी के पीछे चल रहे हो, उस पर कुछ और नहीं, बस जादू हो गया है!" (8)

[ऐ रसूल] देखें, आपके बारे में वे कैसी कैसी बातें सोचते हैं! वे रास्ते से पूरी तरह भटक चुके हैं और अब सही रास्ते पर नहीं आ सकते.  (9)

बड़ी ऊँची शान है उस (आल्लाह) की जो अगर चाहे, तो आपको इनसे भी बढ़िया चीज़ें दे सकता है: बहुत से बाग़ और उनके नीचे से बहती हुई नहरें, और (रहने के लिए) कई महल भी. (10)

असल में, वे लोग आनेवाली (क़यामत की) घड़ी को मानने से इंकार करते हैं : और जो उस घड़ी के आने को नहीं मानता, उसके लिए हम ने दहकती हुई आग तैयार कर रखी है. (11)

जब वह (जहन्नम की आग) उनको दूर से देखेगी, तो वे लोग उसके बिफरने और ग़ुस्से में चिल्लाने की आवाज़ें सुनेंगे, (12)

और जब उनके हाथ-पाँव बाँध कर उस (आग) के एक पतले से हिस्से में उन्हें फेंक दिया जाएगा, तब वे अपनी मौत को पुकारने लगेंगे. (13)

(उनसे कहा जाएगा,) "आज के दिन तुम केवल एक मौत को नहीं, बल्कि कई मौतों को पुकारो!" (14)

आप कहें, "(बताओ) यह अच्छा रहेगा या हमेशा रहनेवाला वह बाग़? --- जो उनका इनाम होगा और उनके सफ़र का अंत भी---- जिसका वादा उन लोगों से किया गया है, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।" (15)

उनके लिए वहाँ वह सब कुछ होगा, जो वे चाहेंगे, और वहाँ वे हमेशा रहेंगे। [ऐ रसूल] यह आपके रब की तरफ़ से एकदम पक्का वादा है. (16)

उस (क़यामत के) दिन जब अल्लाह सभी को इकट्ठा करेगा---- उनको भी,  जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं, फिर वह कहेगा, "क्या तुम ही वह [झूठे ख़ुदा] थे जिसने मेरे बन्दों को रास्ते से बहका दिया था, या वे स्वयं ही मार्ग छोड़ बैठे थे?" (17)

वे कहेंगे, "महान और बहुत ऊँचा है तू! हम ख़ुद तो तुझे छोड़कर कभी किसी और को अपना मालिक बना ही नहीं सकते थे! मगर  हुआ यह कि तूने उन्हें औऱ उनके बाप-दादा को इस जीवन में मौज-मस्ती के ख़ूब सामान दे दिए, यहाँ तक कि वे तेर्री चेतावनी [Reminder] को भुला बैठे और बर्बाद होकर रहे।" (18)

[अल्लाह कहेगा], “अब जबकि तुम्हारे (ठहराए हुए) ख़ुदाओं ने भी तुम्हारी बातों को झूठी होने की घोषणा कर दी है : तो अब तुम सज़ा से बच नहीं सकते; तुम्हें कोई मदद नहीं की जाएगी.” तुममें से कोई भी अगर ऐसी शैतानी करता है, तो हम उसको ज़रूर बड़ी दर्दनाक सज़ा का मज़ा चखाएँगे. (19)

[ऐ मोहम्मद] आपसे पहले हमने कोई भी रसूल [Messenger] ऐसा नहीं भेजा, जो (आम लोगों की तरह) खाना न खाता हो या बाज़ारों में चलता-फिरता न हो। मगर हमने तुम में से कुछ को ऐसा बनाया है जिसके द्वारा दूसरे लोगों को जाँचा-परखा जा सके---- "तो क्या तुम धीरज [सब्र] से काम लोगे?" तुम्हारा रब तो सब कुछ देख रहा है. (20)

जिन्हें (अंत में) हमारे सामने हाज़िर होने की उम्मीद (या डर) नहीं है, कहते हैं, "फ़रिश्तों को क्यों नहीं उतार कर हमारे पास भेजा जाता है? या फिर ऐसा क्यों नहीं होता कि हम अपने रब को देख पाते?" वे घमंड में अपने आपको बहुत बड़ा समझने लगे हैं और दूसरों को बहुत छोटा समझते हुए हदें तोड़ने में लगे हैं. (21)

जिस (क़यामत के) दिन वे फ़रिश्तों को देखेंगे, वह अपराधियों के लिए कोई ख़ुशी का दिन न होगा. फ़रिश्ते कहेंगे, “तुम्हारे लिए उस (जन्नत के दरवाज़े) के अंदर जाने पर रोक [barrier] लगी हुई है.” (22)

और फिर हम (हिसाब-किताब के लिए) उनके किए गए कर्मों पर नज़र डालेंगे, और उसे धूलकण (जैसा बेकार) बना देंगे. (23)

मगर उस दिन जो लोग जन्नत [बाग़] में होंगे, उनके पास रहने की जगह भी बहुत बेहतर होगी, और आराम करने की जगह भी बहुत अच्छी होगी. (24)

उस दिन सारे आसमान और उसके बादल फट पड़ेंगे, और फ़रिश्तों को इस तरह उतारा जाएगा कि ताँता लग जाएगा, (25)

उस दिन, वास्तव में सारा अधिकार [Authority] तो रहम व दया करनेवाले रब का ही होगा. विश्वास न करनेवालों के लिए वह दिन बड़ा ही कठिन होगा. (26)

उस दिन शैतानी करनेवाला ख़ुद अपने हाथ चबा लेगा और कहेगा, "काश! मैं भी रसूल के बताए हुए मार्ग पर चला होता! (27)

हाय मेरा दुर्भाग्य! काश, मैंने उस उस आदमी से दोस्ती न की होती! (28)

मेरे पास जबकि (अल्लाह का) संदेश आ चुका था, तब भी उस(दोस्त) ने मुझे उससे भटका दिया। शैतान ने तो हमेशा ही आदमी को धोखा दिया है।" (29)

रसूल ने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम के लोग इस क़ुरआन के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे कि यह कोई छोड़ देनेवाली चीज़ हो, " (30)

मगर हम ने हमेशा हर नबी के साथ गुनाहगारों में से ही दुश्मनों को भी नियुक्त किया है : आपका रब मार्गदर्शन देने और मदद कॆ लिए काफ़ी है। (31)

विश्वास न करनेवाले यह भी कहते हैं, "उसपर पूरी क़ुरआन एक ही बार में क्यों नहीं उतारी  गयी?" हम ने इसे इस तरह (थोड़ा–थोड़ा कर के) इसलिए उतारा है ताकि इसके द्वारा [ऐ रसूल] आपका दिल मज़बूत कर सकें; और हमने इसे (फ़रिश्ते के द्वारा) ठहर ठहर के आपको पढ़वाया है.  (32)

और जब भी वे अपनी बात को साबित करने के लिए कोई दलील या मिसाल देते हैं, तो हम (पहले ही) उस बात की असल सच्चाई को ठीक ढ़ंग से
बता देते हैं, और चीज़ों को बेहतर ढंग से स्पष्ट कर देते हैं.  (33)

जो लोग औंधे मुँह जहन्नम की ओर हँका के ले जाए जाएँगे, वे लोग सबसे बुरी जगह में होंगे----वे ही सीधे व सही मार्ग से सबसे ज़्यादा भटके हुए हैं.  (34)

हमने मूसा को किताब [तोरैत] दी थी और उनके भाई हारून को मददगार के रूप में उनके साथ लगा दिया था.  (35)

हम ने कहा था, "तुम दोनों उन लोगों के पास जाओ जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया है।" बाद में हमने उन लोगों को पूरी तरह से बर्बाद करके रख दिया. (36)

और नूह की क़ौम के लोगों ने भी : जब रसूलों को झूटा कह कर मानने से इंकार कर दिया तो हमने उन्हें पानी में डुबा डाला, और तमाम लोगों के लिए(इस घटना को) एक मिसाल बना दिया. हम ने शैतानी करनेवालों के लिए एक दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है,  (37)

जैसा कि आद, समूद और अर-रस्सवाले लोगों और उनके बीच (के काल) की बहुत-सी नस्लों को भी हम ने बर्बाद कर दिया। (38)

उनमें से हर एक को हम ने (पहले) चेतावनियाँ दीं, और हर एक को अंत में पूरी तरह से तबाह-बर्बाद कर दिया. (39)

ये विश्वास न करनेवाले लोग तो ज़रूर उस बस्ती से हो कर गुज़रे होंगे, जिसे एक भयानक बारिश द्वारा तहस नहस कर दिया गया था---- क्या उन्होंने नहीं देखा? इसके बावजूद, वे मरने के बाद, दोबारा जीवित होकर उठाए जाने की आशा नहीं रखते हैं. (40)

[ऐ रसूल] वे जब भी आपको देखते हैं, आपका यह कह कर मज़ाक़ उड़ाते हैं : "क्या यही है जिसे अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है? (41)

इसने तो क़रीब क़रीब हमें अपने देवताओं से भटका ही दिया होता, अगर हम उनकी भक्ति में मज़बूती से जम न गए होते।" जब वे यातना को देखेंगे, तो वे जान जाएंगे कि कौन सही मार्ग से बहुत दूर भटका हुआ था.  (42)

[ऐ रसूल] आप उसके बारे में ज़रा सोचें, जिसने अपनी ख़्वाहिशों को
अपना ख़ुदा बना रखा है : तो क्या आप उसके (देखरेख की) ज़िम्मेदारी ले सकते हैं? (43)

या क्या आपको ऐसा लगता है कि इनमें से ज़्यादातर लोग सुनते या समझते हैं? वे तो एकदम चौपायों की तरह हैं--- नहीं, बल्कि वे सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़े हैं! (44)

क्या तुम नहीं देखते कि तुम्हारा रब कैसे छाया [shadow] को लम्बी कर देता है? अगर वह चाहता, तो उसे एक जगह स्थिर रख देता---  फिर हमने सूरज को (छाया के लिए) रास्ता दिखानेवाला [indicator] बनाया, (45)

मगर हम उस (छाया) को थोड़ा-थोड़ा कर के (छोटी करते हुए) अपनी ओर समेट लेते हैं.  (46)

वही है जिसने रात को तुम्हारे लिए वस्त्र [garment] बनाया, और नींद को बनाया आराम करने के लिए, और दिन को फिर से जी उठने का समय बनाया। (47)

वही है जो हवाओं को पहले भेज देता है जो (बारिश के रूप में) अल्लाह की रहमत की ख़ुशख़बरी ले कर आती हैं। और हम ही हैं जो आसमान से साफ़ पानी उतारते हैं, (48)

ताकि हम इससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को दोबारा जीवन प्रदान करें, और उससे अपने पैदा किए हुए बहुत-से जानवरों और आदमियों के लिए पीने का सामान कर दें। (49)

और हम इस (बारिश) को लोगों के बीच (अलग अलग जगहों पर) अलग अलग समय बाँटते रहते हैं, ताकि वे इससे शिक्षा ले सकें, परन्तु अधिकतर लोग शुक्रिया अदा नहीं करने के आदी बन चुके हैं। (50)

अगर हम ऐसा चाहते, तो हर बस्ती में एक सावधान करनेवाला भेज देते,  (51)

अतः विश्वास न करनेवालों का [ऐ रसूल] आप कहना मत मानें : इस (क़ुरआन) के द्वारा उनसे कड़ा संघर्ष [जिहाद] करें. (52)

वही है जिसने दो बड़े सागरों को इस तरह बहा दिया कि एक का पानी ताज़ा व मीठा है, और दूसरे का खारा और कड़ुआ, और उन दोनों के बीच उसने एक ऐसी रोक लगा रखी है कि दोनों अपनी सीमाएं नहीं लाँघते हैं. (53)

और वही है जिसने पानी से आदमी को पैदा किया, फिर उसे ख़ून और शादी के संबंधों से जोड़ कर एक रिश्ते में बाँध दिया : तुम्हारा रब बहुत ताक़तवाला है! (54)

इसके बावजूद वे अल्लाह को छोड़ कर, ऐसी चीज़ों को पूजते हैं जो उन्हें न कोई फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न ही कोई नुक़सान : विश्वास न करनेवालों ने हमेशा ही अपने रब का विरोध करने के लिए कमर कस रखी है. (55)

[ऐ रसूल] हमने तो आपको केवल ख़ुशख़बरी सुनानेवाला और चेतावनी देनेवाला ही बनाकर भेजा है। (56)

कह दें, "मैं इस काम के लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, हाँ अगर कोई (कुछ देना ही) चाहता है, तो उसे चाहिए कि वह अपने रब की ओर जानेवाले मार्ग को अपना ले।" (57)

तुम उस (अल्लाह) पर भरोसा रखो जो ज़िंदा है और जिसे कभी मौत नहीं आती, और तुम उसकी बड़ाई का गुणगान करते रहो। वह अपने बन्दों के गुनाहों की ख़बर रखने के लिए काफ़ी है : (58)

वही है जिसने आसमानों को और ज़मीन को और जो कुछ उन दोनों के बीच है, सबको छह दिनों में पैदा किया, फिर अपने सिंहासन पर विराजमान हुआ--- वह दया करनेवाला [रहमान] रब है; उसे हर चीज़ की पूरी ख़बर है. (59)

तब भी, उन लोगों से जब कहा जाता है कि "रहम करनेवाले रब [रहमान] के सामने झुक जाओ" तो वे कहते हैं, "यह रहमान क्या होता है? जिसके सामने भी तुम कहोगे, क्या हम उसके सामने अपना सर झुका देंगे?" इससे वे और भी ज़्यादा बिदक जाते हैं।  (60)

बड़ी ऊँची शान है उसकी, जिसने आसमानों में तारों के समूह [नक्षत्र] बनाए, और उसमें बनाया एक रौशनी देनेवाला चिराग़ [सूरज], और एक चमकता हुआ चाँद --- (61)

वही है जिसने रात और दिन को इस तरह बनाया कि वे बारी-बारी से एक-दूसरे के पीछे चले आते हैं--- अत: (यह बातें उसके लिए काम की हैं) जो (इन निशानियों से) सबक़ लेना चाहता हो या (अल्लाह का) शुक्र अदा करना चाहता ह। (62)

रहम करनेवाले रब [रहमान] के बन्दे वह हैं, जो धरती पर नम्रता से चलते-फिरते हैं, और जब जाहिल व बेवक़ूफ़ उनके मुँह लगते हैं, तो वे जवाब में कह देते हैं, "तुम पर सलामती हो!"; (63)

जो अपने रब की इबादत करते हुए रातें गुज़ारते हैं, कभी (सज्दे में) झुके हुए, कभी (नमाज़ में) खड़े हो कर; (64)

जो यह कहते हैं, "ऐ हमारे रब! जहन्नम की यातना को हमसे दूर रख, कि झेलने के लिए सचमुच कितनी दर्दनाक यातना होगी! (65)

सचमुच यह शैतानी घर होगा, रहने की बहुत ही बुरी जगह!”  (66)

(अच्छे लोग) वे हैं जो जब ख़र्च करते हैं, तो न फ़ज़ूल-ख़र्ची करते हैं, और न ही कंजूसी से काम लेते हैं, बल्कि वे इनके बीच एक संतुलन बनाए रखते हैं; (67)

जो लोग अल्लाह के अलावा किसी दूसरे देवी-देवता को न कभी पूजते हैं; और न किसी की जान (बे वजह) लेते हैं जिसे अल्लाह ने हराम क़रार दिया है, सिवाए इसके कि (किसी को क़त्ल करना) न्यायसंगत हो, और न ही वे अवैध  शारीरिक संबंध [Adultery] बनाते हैं. [तो जो कोई भी इन बातों को न माने और ऐसे गुनाह करता हो, तो उसे दंड मिलेगा : (68)

क़यामत के दिन उनकी यातना बढ़ाकर दोगुनी कर दी जाएगी, और वे उसी में हमेशा पड़े रहेंगे, अपमानित होकर, (69)

सिवाए उसके जो पछताया अपने गुनाहों पर, विश्वास रखा (अल्लाह पर), और अच्छे कर्म किए : तो ऐसे लोगों के बुरे कर्मों को अल्लाह अच्छे कर्मों में बदल देगा। और अल्लाह सबसे ज़्यादा क्षमा करनेवाला, बेहद दयावान है।  (70)

जो लोग (गुनाहों से) तौबा कर लेते हैं और फिर अच्छे कर्म करते हैं, तो वे (अपनी तौबा से) सचमुच अल्लाह की ओर पूरी तरह से लौट आते हैं।  (71)

[रहम करनेवाले रब के असल बंदे वे हैं] जो कोई झूठी गवाही नहीं देते, और वे, जब कहीं कोई बेकार की चीज़ें होते हुए देखते हैं, तो वहाँ से शालीनता से गुज़र जाते हैं; (72)

और जब उन्हें अल्लाह की निशानियाँ [आयतें] याद दिलायी जाती हैं, तो वे उन (आयतों) पर (काफ़िरों की तरह) अपने कानों और आँखों को बंद नहीं कर लेते; (73)

बल्कि वे दुआ करते हैं, "ऐ हमारे रब! हमें अपने पति/पत्नियों और अपने बाल-बच्चों के बीच ख़ुशी व आराम के साथ रख। और हमें ऐसा बना दे कि जो लोग तुझ से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके सामने हमारी मिसालें दी जा सकें।" (74)

यही वे बंदे होंगे जिन्हें (अपने ईमान पर) जमे रहने की वजह से बदले में जन्नत की सबसे ऊँची जगह दी जाएगी. वहाँ दुआओं और सलाम से उनका स्वागत किया जाएगा. (75)

वहीं वे हमेशा रहेंगे--- एक ख़ुशनुमा घर और आराम की बेहतरीन जगह में! (76)

[ऐ रसूल, काफिरों से कह दें], "मेरे रब के सामने तुम्हारी औक़ात ही क्या है, अगर तुम उसके सामने झुककर उससे फ़रियाद नहीं कर सकते? मगर चूँकि तुम सच्चाई को झूठ मान कर ठुकरा ही चुके हो, तो अब वह (सज़ा) तुम्हारे गले पड़ कर रहेगी।" (77)


सूरह 35: फ़ातिर [पैदा करनेवाला/ The Creator]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

सारी की सारी प्रशंसाएं अल्लाह के लिए हैं, जो आसमानों और ज़मीन का पैदा करनेवाला है, जिसने दो-दो, तीन-तीन और चार-चार परोंवाले फ़रिश्तों को संदेश ले जाने के लिए रखा है। वह जब चाहता है अपनी की हुई रचना में कुछ और चीज़ जोड़ देता है : बेशक अल्लाह हर चीज़ की ताक़त रखता है।  (1)

अल्लाह अपनी रहमत [blessing] को अगर लोगों के लिए खोल दे, तो कोई नहीं है जो उसे रोक सके, और जिसे वह रोक ले, तो कोई नहीं है जो उसके बाद उसे जारी कर सके : उसे हर चीज़ की ताक़त है, और उसे हर चीज़ की समझ-बूझ है।  (2)

ऐ लोगो! याद करो उन नेमतों को जो अल्लाह ने तुम पर की हैं, क्या अल्लाह को छोड़ कर कोई और पैदा करनेवाला है, जो तुम्हें आसमान और ज़मीन से रोज़ी देता हो? उसके सिवा कोई पूजने योग्य नहीं है। तो आख़िर, तुम किस धोखे में पड़े हुए हो? (3)

[ऐ रसूल] अगर वे आपको झूठा बता रहे हैं, तो (जान लें कि) आपसे पहले भी रसूलों को झूठा बताया जा चुका है : सारे मामले अल्लाह की तरफ़ ही लौट कर जाने वाले हैं। (4)

ऐ लोगो! यक़ीन करो कि अल्लाह का वादा सच्चा है, अतः सांसारिक जीवन तुम्हें कहीं धोखे में न डाल दे। और देखना, कहीं वह धोखेबाज़ [शैतान] तुम्हें अल्लाह के बारे में धोखे में न डाल पाए :  (5)

शैतान तुम्हारा दुश्मन है---- अतः तुम उसके साथ दुश्मनों जैसा ही बर्ताव करो---- वह तो अपने माननेवालों को केवल इसीलिए बुलाता है कि उन्हें (जहन्नम की) दहकती आग में जानेवालों का साथी बना सके।  (6)

वे लोग जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, उनको कठोर दंड दिया जाएगा; किन्तु जिन लोगों ने विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए--- उनके (गुनाहों को) माफ़ कर दिया जाएगा, और उन्हें बड़ा इनाम दिया जाएगा।  (7)

उनलोगों के बारे में क्या कहा जाए जिनके लिए उनके बुरे कर्मों को आकर्षक बना कर पेश किया गया हो, ताकि वे उन कर्मों को (बुरा समझने के बजाए) अच्छा समझें? (तो क्या वे बुराई को छोड़ेंगे)? निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है, मार्ग से भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है। अतः [ऐ रसूल] आपको इन लोगों के दुख में घुल कर अपनी जान गँवाने की कोई ज़रूरत नहीं : अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ वे करते हैं। (8)

वह अल्लाह ही है जो हवाएँ भेजता है; वह (हवाएं) बादलों को ऊपर उठाती हैं; फिर हम उसे किसी सूखी पड़ी हुई मुर्दा ज़मीन की ओर ले जाते हैं, फिर हम उस (बारिश) के द्वारा मुर्दा ज़मीन में एक नयी जान डाल देते हैं : इसी तरह (मुर्दा पड़े लोगों को) दोबारा जीवित कर उठाया जायेगा।  (9)

अगर कोई इज़्ज़त व ताक़त हासिल करना चाहता हो, तो (वह यह जान ले कि) इज़्ज़त व ताक़त तो सारी की सारी अल्लाह के क़ब्ज़े में है; साफ़ व अच्छी बातें उस [अल्लाह] तक (चढ़ कर) पहुँचती हैं, और वही अच्छे कर्मों को (दर्जे के मुताबिक़) ऊँचा उठाता है, मगर जो लोग शैतानी चालें चलते रहते हैं, उनके लिए दर्दनाक यातना होगी और उनकी तमाम चालें बेकार हो कर रह जाएंगी।  (10)

वह अल्लाह है जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर उसके बाद एक बूँद (वीर्य, semen) से; फिर तुम्हें (मर्द और औरत के) जोड़े में बनाया; उसकी जानकारी के बिना न कोई औरत गर्भवती होती है और न बच्चे को जन्म देती है; न कोई आदमी लम्बी आयु पाकर बुढापे को पहुँचता है और न किसी की आयु में कमी हो जाती है---  यह सब एक किताब में लिखे अनुसार होता है : और यह सब अल्लाह के लिए बहुत ही आसान है। (11)

पानी के दो सागर एक समान नहीं होते---- एक मीठा, प्यास बुझानेवाला और पीने में मज़ेदार और दूसरा  खारा और कडुवा है--- मगर तब भी तुम दोनों से ताज़ा (मछलियों का) माँस खाते हो और आभूषण (मोती, मूंगा) निकालते हो जिसे तुम पहनते हो, और दोनों में ही तुम नौकाओं (जहाज़ों) को देखते हो कि पानी को चीरती हुई उसमें चली जा रही हैं, ताकि तुम उस [अल्लाह] की दी हुई रोज़ी को तलाश कर सको और (उसकी दी हुई नेमतों का) आभार मानो। (12)

वह रात को दिन में मिला देता है और दिन को रात में मिला देता है; उसने सूरज और चाँद को (एक व्यवस्था के अनुसार) काम में लगा रखा है---- (इनमें) प्रत्येक एक नियत अवधि तक के लिए (अपने मार्ग पर) चल रहा है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है : सारी चीज़ पर उसी का क़ब्ज़ा है। उसको छोड़कर जिन (देवताओं) को तुम पूजते हो, वे एक खजूर की ग़ुठली के छिलके के बराबर भी कोई अधिकार नहीं रखते;  (13)

अगर तुम उन्हें पुकारो, तो वे तुम्हारी पुकार सुनेंगे ही नहीं; और अगर वे सुन पाते, तो भी कोई जवाब नहीं दे पाते; और क़यामत के दिन वे ख़ुद तुम्हारी मूर्तिपूजा को अस्वीकार करते हुए तुम से अलग हो जाएंगे। [ऐ रसूल] कोई भी आपको ऐसी ख़बर नहीं बता सकता जैसी कि वह [अल्लाह] बताता है जो हर चीज़ की पूरी ख़बर रखता है।  (14

ऐ लोगो! यह तुम ही हो जिसे (हर चीज़ के लिए) अल्लाह की ज़रूरत है--- अल्लाह को तो किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं, सारी प्रशंसा के योग्य वही है--- (15)

अगर वह चाहे तो तुम्हें मिटा दे और (उसकी जगह) एक नई सृष्टि [creation] ले आए, (16)

और यह काम अल्लाह के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं। (17)

कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाहों) का बोझ नहीं उठाएगा : यहाँ तक कि अगर कोई भारी बोझ से दबा हुआ आदमी भी मदद के लिए पुकारे, तब भी उसका बोझ कोई नहीं उठाएगा, चाहे वह उसका नज़दीकी सम्बन्धी ही क्यों न हो। मगर [ऐ रसूल] आप तो केवल उन्हें सावधान कर सकते हैं जो अपने रब से डरते हों, हालाँकि उसे देख भी नहीं सकते, और नमाज़ को पाबन्दी से पढते हों---- और जिस किसी ने (बुराइयों से) अपने आपकी शुद्धी की, तो यह काम उसने अपने ही भले के लिए किया--- और हर चीज़ को लौटकर अल्लाह ही के पास जाना है।  (18)

आँख से अंधा और आँखोंवाला बराबर नहीं होते, (19)

और न अँधेरा और उजाला, (20)

और न छाया और धूप,  (21)

और न ज़िंदा और मरा हुआ बराबर है। निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है (अपना संदेश) सुनाता है : तुम उन लोगों को नहीं सुना सकते, जो क़ब्रों में पड़े हों। (22

आप तो बस एक सावधान करनेवाले हैं----  (23)

हमने आपको सच्चाई की बात दे कर इस तरह भेजा है कि आप (नेक लोगों को) अच्छी ख़बर सुना दें, और (बुरे लोगों को) अल्लाह का डर सुना कर सावधान कर दें --- और कोई क़ौम ऐसी नहीं हुई जहाँ उन्हें सावधान करने वाला न आया हो।  (24)

यदि वे [मक्का के काफ़िर] आपको झूठा बतला रहे हैं, तो जो (काफ़िर लोग) उनसे पहले गुज़र चुके हैं, उन्होंने भी (अपने रसूलों) को झूठा बताया था। कई पैग़म्बर [messengers] उनके पास स्पष्ट निशानियाँ, आसमानी सहीफ़े [ज़बूर/ Psalms] और (ज्ञान से भरी) रौशन किताब लेकर आए थे, (25)

फिर मैंने (सच्चाई से) इंकार पर अड़े लोगों को धर दबोचा--- तो फिर देखो कि कैसी भयानक थी मेरी सज़ा! (26)

क्या [ऐ रसूल] आपने नहीं देखा कि अल्लाह ने आसमान से पानी बरसाया, फिर उसके द्वारा हमने रंग बिरंग के फल निकाले; (इसी तरह) पहाड़ों में भी सफ़ेद और लाल रंगों की रंग बिरंगी धारियाँ हैं, और कुछ बिल्कुल काली भी;  (27)

और यह कि इंसानों, जानवरों और चौपायों के रंग भी तरह तरह के हैं? और अल्लाह से सही मायने में तो उसके वही बंदे डरते हैं, जो (इन सच्चाइयों को) अच्छी तरह जानते-समझते हैं। निश्चय ही सारी ताक़त भी अल्लाह के पास है, और सबसे ज़्यादा माफ़ करनेवाला भी वही है।  (28)

जो लोग अल्लाह की किताब पढ़ते हैं, नमाज़ के पाबन्द हैं, और जो कुछ (रोज़ी) हमने उन्हें दे रखी है, उसमें से (अच्छे कामों पर) छिपा कर भी और दिखा कर भी ख़र्च करते हैं, वे एक ऐसे व्यापार की आशा रख सकते हैं जो कभी मंदा न होगा : (29

अल्लाह उन्हें इसका पूरा पूरा इनाम देगा, बल्कि अपने ख़ज़ाने से और बढा कर देगा। इस में शक नहीं कि वह बहुत माफ़ करनेवाला और अच्छाई की बहुत क़द्र करनेवाला है।  (30)

[ऐ रसूल] हमने जो किताब आपके पास उतार कर भेजी है, वह सच्ची है और अपने से पहले की (आसमानी)  किताबों की (सच्चाई की) पुष्टि [confirm] करती है। निश्चय ही अल्लाह अपने बन्दों की पूरी ख़बर रखता है और सब कुछ देखता है।  (31)

फिर हमने अपने चुने हुए बंदों को इस किताब का उत्तराधिकारी बनाया : उनमें से कुछ तो ऐसे थे जिन्होंने ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म किया, कुछ थे जो (सही और ग़लत के) बीच बीच में रहनेवाले थे, और उनमें कुछ अल्लाह की कृपा से, अच्छे कामों में आगे-आगे रहनेवाले थे। यही सबसे बड़ा फ़ज़ल [favour] है :  (32

वे हमेशा रहने वाले बाग़ों [Gardens] में प्रवेश करेंगे जहाँ उन्हें सोने के कंगनों और मोतियों से सजाया जाएगा, और वहाँ वे रेशम के कपड़े पहनेंगे।  (33)

वे कहेंगे, "सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमसे हर तरह के दुख दूर कर दिए! सचमुच हमारा रब बड़ा माफ़ करनेवाला और (भलाई की) बहुत क़द्र करनेवाला है :  (34)

जिसने अपनी असीम कृपा से, हमें सदैव रहने के ऐसे घर में ठहराया जहाँ हमें न कोई मशक़्क़त उठानी पड़ेगी और न कोई थकान ही होगी।" (35)

मगर जिन लोगों ने सच्चाई (को मानने) से इंकार किया, वे जहन्नम की आग में रहेंगे, न उनका काम तमाम किया जाएगा कि मर ही जाएँ और न उनसे जहन्नम की यातना ही कुछ हल्की की जाएगी : और हम ऐसा ही बदला शुक्र न अदा करनेवाले हर काफ़िर को देते हैं।  (36

वे जहन्नम में चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे कि "ऐ हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे, और अब हम अच्छे कर्म करेंगे, पहले की तरह (बुरे कर्म) नहीं करेंगे!"—-- (जवाब में कहा जाएगा), "क्या हमने तुम्हें इतनी ज़िंदगी नहीं दी थी कि अगर तुम समझना चाहते तो उन चेतावनियों को सुन कर होश में आ जाते? और तुम्हारे पास सावधान करनेवाला [रसूल] भी तो आया था, तो अब चखो मज़ा अपनी सज़ा का!” शैतानी करनेवालों को मदद करनेवाला कोई नहीं होगा! (37)

निस्संदेह अल्लाह आसमानों और ज़मीन की छिपी हुई तमाम चीज़ों को जानता है; वह तो दिलों के अंदर पैदा होने वाले ख़्याल तक को जानता है;  (38)

वही है जिसने तुम (लोगों) को ज़मीन में (पहले गुज़र चुके लोगों का) उत्तराधिकारी [ख़लीफ़ा] बनाया। अब जो सच्चाई को मानने से इंकार करेगा, उसे इसका नतीजा भुगतना होगा : उन लोगों का इंकार उनके रब के ग़ुस्से को और ज़्यादा भड़का देगा, और इससे उनका नुक़सान ही बढेगा।  (39)

[ऐ रसूल] आप कहें, "क्या तुमने अपने उन (अल्लाह के) ‘साझेदारों [Partners] के बारे में विचार किया, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो? मुझे ज़रा दिखाओ उन्होंने धरती का कौन-सा भाग पैदा किया है? या आसमानों के कितने भाग के वह मालिक हैं?" क्या हमने उन्हें कोई किताब दे रखी है जिसमें इन बातों का कोई स्पष्ट प्रमाण मौजूद है? बिल्कुल नहीं! असल में, मुशरिक लोग [Idolaters] आपस में एक-दूसरे से केवल धोखे का वादा करते हैं.  (40

अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को इस तरह थाम रखा है कि वे (अपनी जगह और रास्ते से) हट नहीं सकते; और अगर वे हट जाएँ, तो उसके बाद कोई नहीं जो उन्हें थाम सके। निस्संदेह, वह बहुत सहनशील, बड़ा माफ़  करनेवाला है। (41)

उन (मुशरिक लोगों/ The Idolaters] ने बड़ी-बड़ी क़समें खाई थीं कि यदि उनके पास कोई सावधान करनेवाला [रसूल] आए, तो वे अन्य दूसरी क़ौमों से बढ़कर सीधे मार्ग को अपनाएंगे, किन्तु जब उनके पास एक सावधान करनेवाला आ गया, तो वे (सच्चाई से) और ज़्यादा दूर भाग गए, (42)

इसलिए कि ज़मीन में वे (अपने को बड़ा समझते हुए) और भी घमंडी हो गए, और उनकी शैतानी चालों में और भी तेज़ी आ गयी--- मगर जो शैतानी चालें चलते हैं, वह ख़ुद ही अपनी चालों के घेरे में आ जाते हैं। जैसा उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के साथ हुआ, क्या वे उससे कुछ अलग बर्ताव की उम्मीद लगाए बैठे हैं? वैसे तुम अल्लाह की रीति में कभी कोई परिवर्तन नहीं पाओगे; और न तुम कभी उसमें कोई फेर-बदल ही पाओगे।  (43)

क्या उन लोगों ने ज़मीन में चल-फिर कर देखा नहीं कि उनसे पहले गुज़रे हुए लोगों का कैसा परिणाम हुआ? हालाँकि वे शक्ति में उनसे कही बढ़-चढ़कर थे? और आसमानों और ज़मीन में कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो अल्लाह को तंग [आजिज़/ frustrate] कर सके : निस्संदेह वह सब जानता है, और हर चीज़ की ताक़त रखता है।  (44)

अगर अल्लाह लोगों को उनके ग़लत काम करने के चलते (उसी समय) दंड देने लग जाए, तो इस ज़मीन की सतह पर एक भी जीव बाक़ी न बचेगा। किन्तु वह उन्हें एक नियत समय तक ढील देता है, और फिर जब उनका नियत समय आ जाता है, तो अल्लाह ख़ुद ही अपने बंदों को देख लेगा। (45)





सूरह 19 : मरयम [Mary] 

 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

 काफ॰ हा॰ या॰ ऐन॰ साद॰ (1)

[ऐ रसूल] यह आपके रब की उस रहमत [Mercy]  का बयान है, जो उसने अपने बंदे ज़करिया [Zachariah] पर दिखायी थी, (2)

जब उसने अपने रब को मन ही मन में (दबी आवाज़ से) पुकारा था, (3)

 "ऐ मेरे रब! मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो गई हैं, और मेरे सिर के बाल बुढापे से बिल्कुल सफ़ेद हो गए हैं, मगर ऐ रब!, कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने तुझ से कोई दुआ माँगी हो और तू ने मेरी माँग पूरी न की हो : (4)

 मुझे अपने मरने के बाद अपने भाई-बन्धुओं की ओर से डर है (कि पता नहीं वे क्या करेंगे), और मेरी पत्नी तो बाँझ है। अतः तू मुझे अपने पास से एक उत्तराधिकारी [Successor] प्रदान कर----जो तेरी ओर से एक इनाम हो----  (5)

 जो मेरा भी वारिस [heir] हो और याक़ूब [Jacob] के वशंज का भी वारिस हो। और ऐ रब! उसे ऐसा बना देना कि (तू और तेरे बंदे) सब उसे पसंद करें।" (6)

 (जवाब मिला),  "ऐ ज़करिया! हम तुझे एक लड़के (के पैदा होने) की ख़ुशख़बरी   सुनाते हैं, जिसका नाम यह्या [John] होगा---- इससे पहले हमने किसी के लिए भी यह नाम नहीं चुना।" (7)

 उसने (हैरान होकर) कहा, "मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे हो सकता है! मेरी पत्नी बाँझ है और मैं बूढ़ा और बहुत कमज़ोर हो चुका हूँ?" (8)

कहा गया, ‘ ऐसा ही होगा! तेरा रब कहता है, “यह मेरे लिए कोई मुश्किल बात नहीं, इससे पहले मैं ख़ुद तुझे पैदा कर चुका हूँ,  हालाँकि (उस समय) तेरे वजूद का कोई अता पता न था।"’ (9)

इस पर ज़करिया ने कहा, "मेरे रब! मेरे लिए इस बारे में कोई निशानी ठहरा दे।" कहा, "तेरे लिए निशानी यह है कि तू तीन (दिन और) रात तक लोगों से बात न कर पाएगा।" (10)

अतः वह इबादतगाह से बाहर निकलकर अपने लोगों के पास आया और (बिना मुँह से बोले हुए) उनसे इशारों में कहा कि सुबह शाम अल्लाह की बड़ाई का बखान करते रहो।" (11

(हम ने कहा), "ऐ यह्या! अल्लाह की किताब को मज़बूती से थाम ले।" वह अभी छोटा लड़का ही था कि हमने उसे ज्ञान व समझ-बूझ दे दी थी, (12)

और ख़ास अपने पास से दिल की नरमी और मन की शुद्धि भी दे दी थी। सचमुच वह बड़ा परहेज़गार था, (13)

अपने माँ-बाप की सेवा करनेवाला था, कड़े मिज़ाज का और आज्ञा न माननेवाला न था. (14)

"सलामती थी उस पर, जिस दिन वह पैदा हुआ और जिस दिन उसकी मृत्यु हो गयी, और सलामती होगी उस पर जिस दिन वह फिर से ज़िंदा उठाया जाएगा!" (15)

[ऐ रसूल] इस क़ुरआन में मरयम [Mary] की कहानी को बयान करें. ऐसा हुआ कि वह अपने घरवालों से अलग होकर एक ऐसी जगह चली गयीं जो पूरब की तरफ़ थी (16)

और वहाँ वह एकांत में सबसे अलग थलग हो गयीं; तब हमने उसके पास अपनी रूह [फ़रिश्ते] को भेजा जो उसके सामने एक पूरे आदमी के रूप में प्रकट हुआ.  (17)

(मरयम उसे देख कर घबरायीं और) बोलीं, "मैं रहम करनेवाले रब [रहमान] के नाम से तुझ से अपनी हिफ़ाज़त माँगती हूँ : अगर तुझे (अल्लाह का) कुछ भी डर है (तो मुझ से दूर हट जा)!" (18)

मगर फ़रिश्ते ने कहा, "मैं तो केवल तेरे रब का संदेश लेकर आया हूँ,  ताकि तुझे तोहफ़े में एक नेक बेटा दे सकूँ।" (19)

मरयम ने कहा, "मुझे बेटा कैसे हो सकता है जबकि मुझे किसी आदमी ने छुआ तक नहीं? और न ही मैं बदचलन हूँ, " (20)

फरिश्ते ने कहा, "मगर होगा ऐसा ही! तेरा रब कहता है, “यह मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं---हम उसे सारे लोगों के लिए एक निशानी बना देंगे, जो हमारी तरफ़ से एक रहमत [blessing] होगी।“ और यह ऐसी बात थी जिसका होना पहले से ही तय हो चुका था : (21)

फिर उसे उस (होनेवाले बच्चे) का गर्भ ठहर गया. वह लोगों से अलग हटकर  एक दूर के स्थान पर चली गई (22)

और, फिर प्रसव के दर्द [Labour pain] की बेचैनी उसे एक खजूर के पेड़ के नीचे ले आई. (जहाँ वह उसके तने के सहारे बैठ गयी) औरऔर वह कहने लगी, "क्या ही अच्छा होता कि मैं इससे पहले ही मर चुकी होती और लोग मुझे भूल जाते!" (23)

उस समय (पहाड़ी के) नीचे से एक पुकारनेवाले (फ़रिश्ते) की आवाज़ सुनाई दी,   "चिंता न करो : तेरे रब ने तेरे क़दमों तले पानी का एक सोता [Stream] बहा दिया है (24)

और, अगर तू खजूर के पेड़ के तने को पकड़कर अपनी ओर हिलाएगी तो तेरे ऊपर ताज़ा पकी-पकी खजूरें टपक पड़ेंगी, (25)
  
अतः खाओ, पियो और ख़ुश रहो, फिर अगर कोई आदमी नज़र आ जाए (जो कुछ पूछ बैठे) तो उसे (इशारे से) कह देना: “मैंने अपने रब [रहमान] के लिए (चुप रहने के) रोज़े [मौन व्रत] की मन्नत मान रखी है, इसलिए मैं आज किसी आदमी से बातचीत नहीं कर सकती।" (26)

फिर (ऐसा हुआ कि) वह उस बच्चे को साथ लिए हुए अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस आई। (लड़के को गोद में देखकर) वे बोल उठे, "मरयम, यह तूने क्या  कर डाला! (27)

ऐ हारून की बहन! न तो तेरा बाप ही कोई बुरा आदमी था और न तेरी माँ ही बदचलन थी!" (28)

इस पर मरयम ने लड़के की तरफ़ इशारा किया (कि यही बताएगा). वे कहने लगे, "भला हम एक बच्चे से कैसे बात कर सकते हैं?" (29)

(मगर लड़का) बोल उठा, "मैं अल्लाह का बन्दा हूँ। उसने मुझे किताब [Scripture] प्रदान की; मुझे नबी [Prophet] बनाया; (30)

मुझे बरकतवाला [blessed] बनाया चाहे मैं जहाँ भी रहूँ.  और जब तक मैं ज़िंदा रहूँ, मुझे हुक्म दिया नमाज़ पढ़ने का, (ग़रीबों को) ज़कात [alms] देने का, (31)

और अपनी माँ की (प्यार से) देखभाल करने का। उसने मुझे पत्थर-दिल या बेरहम नहीं बनाया. (32)

(अल्लाह की ओर से) सलामती थी मुझ पर, जिस दिन मैं पैदा हुआ और उस दिन भी मुझ पर सलामती होगी जिस दिन मैं मरूँगा,, और जिस दिन दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाऊँगा!" (33)

ऐसा था मरयम का बेटा, ईसा [Jesus]!
यह है असल में सच्ची बात जिसके बारे में वे सन्देह में पड़े हुए हैं : (34)
अल्लाह के लिए यह बात कभी भी उपयुक्त नहीं कि वह किसी को अपना बेटा बनाए। वह इन चीज़ों से बहुत ऊँचा है: उसकी शान तो यह है कि जब वह कोई काम करने का फ़ैसला करता है तो बस हुक्म देता है, "हो जा!" तो बस वह हो जाता है। (35)

और (ईसा यही तो कहते थे), "निस्संदेह अल्लाह मेरा भी रब है और तुम्हारा भी, अतः तुम उसी की बन्दगी करो: यही (सच्चाई का) सीधा मार्ग है।" (36)

मगर फिर उसके बाद विभिन्न गुटों [factions] का आपस में मतभेद होने लगा, तो जिन लोगों ने सच्चाई की बातों (पर संदेह किया) और उसे मानने से इंकार किया, उनकी हालत पर अफ़सोस! वे कितनी दर्दनाक मुसीबत में पड़ जाएंगे जिस दिन वह भयानक दिन आ जाएगा! (37)

जिस दिन वे हमारे सामने हाज़िर होंगे, उनके कान और उनकी आँखें सुनने और देखने में कितनी तेज़ होंगी, मगर अभी इन ज़ालिमों का हाल यह है कि यह रास्ते से पूरी तरह भटके हुए हैं ! (38)  

[ऐ रसूल] आप उन्हें ‘पछतावे के दिन’ [Day of Remorse] से सावधान कर दें, जब इन मामलों का फ़ैसला कर दिया जाएगा, मगर उनका हाल यह है कि वे इन बातों पर ध्यान ही नहीं देते और उनको भुलाए बैठे हैं, और वे ईमान भी नहीं रखते हैं. (39)
हम ही (अंतत:) ज़मीन के वारिस होंगे, और उन सभी लोगों के भी (वारिस) होंगे जो इस ज़मीन पर बसे हुए हैं, और हमारे ही पास सबको लौट कर आना है. (40)

इस क़ुरआन में इबराहीम [Abraham] की कहानी को भी बयान करें। निस्संदेह वह सच्चाई की मूर्ति था, अल्लाह का नबी था. (41)

जब उसने अपने बाप से कहा, "ऐ बाबा! आप उस चीज़ को क्यों पूजते हैं, जो न सुन सकती है,  न देख सकती है, और न आपके किसी काम आ सकती है? (42)

बाबा! मैं सच कहता हूं,  ज्ञान की एक रौशनी जो आपको नहीं मिल पायी थी, वह मुझे मिल गई है, अतः आप मेरे पीछे चलें : मैं आपको सीधा मार्ग दिखाऊँगा। (43)

बाबा! शैतान की बन्दगी न कीजिए----  शैतान तो दयालु रब [रहमान] की आज्ञा को मानने से ही इंकार कर चुका है। (44)

बाबा! मैं डरता हूँ कि कहीं ऐसा न हो कि आपको रहम करनेवाले [रहमान] की तरफ़ से कोई यातना आ पकड़े और आप (जहन्नम में) शैतान के साथी होकर रह जाएँ।" (45)

बाप ने (यह बातें सुनकर) कहा, "ऐ इबराहीम! क्या तू मेरे देवताओं को रद्द करता है? याद रख! अगर तू ऐसी बातों से बाज़ न आया तो मैं तुझे पत्थर मरवाउंगा। अगर तू अपनी जान चाहता है, तो मेरे रास्ते से अलग हट जा!" (46)

इबराहीम ने कहा, "अच्छा तो सलाम है आपको : (आप से अलग हो कर भी) मैं आपके लिए रब से माफ़ी की दुआ करूँगा----  वह तो मुझ पर बहुत मेहरबान है ---(47)

मगर अब मैं आप सब को छोड़ता हूँ, और उन (मूर्तियों) को भी,, जिन्हें अल्लाह को छोड़ कर आप लोग पुकारा करते हैं, और मैं तो अपने रब को पुकारूँगा। मुझे भरोसा है कि अपने रब को पुकारकर  मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।" (48)

फिर जब वह उन लोगों से और उन सब से जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पूजते थे, अलग हो गया, तो हमने (उसकी नस्ल में बरकत दी और) उसे इसहाक़ [Isaac] और (इसहाक़ का बेटा) याक़ूब [Jacob] प्रदान किया और उन दोनों को हमने नबी [Prophet] बनाया था : (49)

हम ने उन पर अपनी ख़ास दया-दृष्टि डाली थी, और उन सब को सच्चाई की आवाज़ें बुलंद करनेवाला बना कर बड़ी प्रतिष्ठा दी। (50)

और इस किताब [क़ुरआन] में मूसा [Moses] की कहानी भी बयान कर दें। निस्संदेह वह ख़ास चुना हुआ बंदा था, जो एक रसूल [Messenger] और नबी [Prophet] था : (51)  

हमने उसे 'तूर' पहाड़ के दाहिनी ओर से पुकारा और (‘वही’ द्वारा) रहस्य की बातें करने के लिए  उसे अपने से नज़दीक किया; (52)

और अपनी रहमत से उसके भाई हारून [Aaron] को (उसकी मदद के लिए) नबी बनाकर उसे दिया (53)

और (ऐ रसूल) इस किताब (क़ुरआन) में इसमाईल [Ishmael] की भी चर्चा करें। निस्संदेह वह अपने वायदे का पक्का था और (अल्लाह का) रसूल और नबी था। (54)

वह अपने घर के लोगों को नमाज़ पढ़ने और (ग़रीबों को) ज़कात देने का हुक्म देता था और वह (अपनी सारी बातों में) अपने रब के यहां बहुत पसंद किया जाता था ।(55)

और (ऐ रसूल) इस किताब में इदरीस की भी चर्चा करें। बेशक वह भी सच्चाई की मूर्ति था​, और एक नबी था। (56)

और हमने उसे बड़े ही ऊंचे दर्जे तक पहुंचा दिया था। (57)

ये लोग उन नबियों में से थे जिन पर अल्लाह ने ख़ास कृपा की थी---आदम की सन्तान में से, और उन लोगों के वंशज में से जिनको हमने नूह के साथ (नौका में) सवार किया था, और इबराहीम और इसराईल (याक़ूब) के वंशज में से----और उन गिरोहों में से जिनको हमने सीधा मार्ग दिखाया और (अच्छाई ​के लिए) चुन लिया। ये वे लोग हैं कि जब उन्हें दयालु रब (रहमान) की आयतें सुनाई जाती थी तो वे सुनते ही सज्दे में झुक जाते थे और उनकी आंखों से आंसू निकल पड़ते थे, (58)

मगर फिर उनके बाद ऐसे बुरे लोगों की कई पीढ़ियां गुज़रीं, जो नमाज़ की (हक़ीक़त) को भुला बैठे और मन की इच्छाओं के पीछे बढ़ चले। अतः जल्द ही ऐसा होगा कि उनकी गुमराही (के नतीजे) उनके सामने आ जाएं, (59)

मगर हां, जो कोई (गुनाहों से) तौबा कर ले,  (सच्चाई पर) विश्वास कर ले, और अच्छे कर्मों​ में लग जाए, तो बेशक ऐसे लोगों के लिए कोई डरने की बात नहीं। वे जन्नत में प्रवेश करेंगे। उनके हक़ के साथ थोड़ी सी भी नाइंसाफी नहीं होगी : (60)

वे सदाबहार रहने वाली जन्नत में दाख़िल होंगे, जिसका वादा दयालु रब [रहमान] ने अपने बन्दों से कर रखा है---- और वह वादा एक अनदेखी चीज़ का है (जिसे इस ज़िन्दगी में वे महसूस नहीं कर सकते, मगर) उसका वादा तो ऐसा है जैसे एक बात घट चुकी है। (61)

उस (जन्नत की ज़िन्दगी में) कोई व्यर्थ बात उनके कानों में नहीं पड़ेगी। जो कुछ सुनेंगे, वह बस सलामती की ही आवाज़ होगी; वहां सुबह-शाम उनकी रोज़ी उन्हें बराबर मिला करेंगी। (62)

यह है वह जन्नत जिसका वारिस हम अपने बन्दों में से हर उस आदमी को बनाएँगे, जो परहेज़गार (devout) हो (63)

(फ़रिश्ता जिबरईल रसूल से कहेंगे), “हम तुम्हारे रब की आज्ञा के बिना तुम्हारे पास (''वही' लेकर) नहीं आते-----  जो कुछ हमारे सामने है, और जो कुछ हमारे पीछे​ गुज़र चुका है और जो कुछ इन दोनों वक़्तों के बीच हुआ, सब उसी के हुक्म से है----और तुम्हारा रब कभी भी कोई चीज़ भूलने वाला नहीं है। (64)  

वह आसमानों और ज़मीन का रब है और उन सबका भी रब है, जो इन दोनों के बीच है, अतः (ऐ रसूल) आप उसी की बन्दगी पर जमे रहें : उसकी बंदगी की राह में जो कुछ घटे, उसे सहते रहें। क्या तुम्हारी जानकारी में उस जैसा कोई है? (65)

और (सच्चाई से बेख़बर) इंसान कहता है, "क्या! जब मैं मर गया तो फिर क्या ऐसा होने वाला है कि फिर से ज़िंदा उठाया जाऊँ?" (66)

मगर क्या इंसान को यह बात याद नहीं रही कि हम ने उसे पहली बार तब पैदा किया था, जब उसका कोई वजूद न था? (67)

अतः (ऐ रसूल) आपके रब की क़सम,  हम उन सबको और उनके साथ सारे शैतानों को ज़रूर इकट्ठा करेंगे। फिर उन सबको जहन्नम के गिर्द हाज़िर होने का आदेश देंगे, इस दशा में कि वे घुटनों के बल झुके होंगे​;  (68)

फिर हर गिरोह में से उन लोगों को (चुन चुन कर) अलग कर लेंगे जो (अपनी ज़िंदगी में) रहम करनेवाले रब (रहमान) की बनायी गयी सीमाओं को तोड़ने वाला होगा----(69)

फिर यह बात भी हम ही जानते हैं कि कौन जहन्नम में झोंके जाने के सबसे ज़्यादा योग्य है --- (70)

(याद रखो) तुममें से हर एक को इस मंज़िल से गुज़रना ही पड़ेगा, यह एक तय किया हुआ फ़ैसला है जिसे पूरा करना तेरे रब ने ज़रूरी ठहरा लिया है। (71)

फिर हम ऐसा करेंगे कि जो परहेज़गार होंगे, उन्हें तो हम बचा लेंगे और जो शैतानी करनेवाले ज़ालिम हैं, उन्हें हम जहन्नम में घुटनों के बल पड़े हुए छोड़ देंगे। (72)

और (देखो) जब हमारी आयतें लोगों को स्पष्ट करके सुनाई जाती हैं, तो जिन लोगों ने कुफ़्र अपना लिया है, वे ईमान वालों से कहते हैं, "दोनों गिरोहों में ज़्यादा अच्छी स्थिति में कौन है? और किस गिरोह के पीछे चलने वाले अधिक हैं?" (73)

उनसे पहले हम कितनी ही कौमों को बर्बाद कर चुके हैं जो तरह तरह के सामान, धन दौलत और बाहरी चकाचौंध में इनसे कहीं आगे थीं! (74)

(ऐ रसूल) कह दें, "जो कोई गुमराही में पड़ा तो दयालु रब (रहमान) का क़ानून यही है कि उसे उस वक़्त तक बराबर ढील देता जाता है जब तक कि वह अपनी आंखों से वह बात देख न ले जिसका उनसे वादा किया गया था---चाहे (इसी जीवन की) यातना हो या क़यामत की घड़ी (का फ़ैसला)--- तो वे उस समय जान लेंगे कि कौन था जिसकी स्थिति सबसे बदतर हुई और किसका गिरोह सबसे कमज़ोर निकला।" (75)

मगर जिन लोगों ने (सही) मार्ग पा लिया, तो अल्लाह उन्हें और ज़्यादा (कामयाबी की) राह दिखा देता है। और तुम्हारे रब की नज़र में तो बाक़ी रहनेवाली नेकियाँ ही बेहतर हैं-- सवाब (पुण्य) के हिसाब से भी और (अन्तिम) परिणाम के हिसाब से भी। (76)  

(ऐ रसूल) क्या आपने देखा उस आदमी का क्या हाल है जिसने हमारी आयतों को (मानने से) इंकार किया और कहा, "ख़ुदा की क़सम! मैं (परलोक में भी) ज़रूर धन दौलत पाऊंगा, मैं ज़रूर औलाद पाऊंगा"? (77)

वह जो ऐसा कहता है तो क्या उसने (छिपी हुई) अनदेखी चीज़ को झाँककर देख लिया है, या रहम करनेवाले (रहमान) से कोई वचन ले रखा है​ कि उसे ऐसा करना ही पड़ेगा? (78)

हरगिज़ नहीं (ऐसा कभी नहीं हो सकता!), हम इसे भी लिख लेंगे जो कुछ वह कहता है​ और उसकी यातना को बढ़ाते चले जाएँगे : (79)

यह जिस माल व औलाद का दावा करता है (अगर वह उसे मिल भी जाए तो अंत में) वह सब हमारे ही कब्ज़े में आएगा, औऱ उसे तो हमारे सामने एकदम अकेले ही हाज़िर होना है! (80)

उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरों को अपना प्रभु बना लिया है, ताकि वे उनके मददगार हों, (81)

लेकिन (क़यामत के दिन) उनके प्रभु उनकी पूजा किए जाने से साफ़ इंकार कर देंगे, बल्कि उल्टे वे उनके विरोधी बन जाएँगे। (82)

(ऐ रसूल) क्या आपने देखा नहीं कि हमने शैतानों को इंकार करनेवालों (काफ़िरों) पर  छोड़ रखा है, जो उन्हें बराबर (गुनाह करने पर) उकसाते रहते हैं? (83)

अतः उनके लिए आपको उतावला होने की कोई ज़रूरत नहीं : हम तो बस उनके लिए (नियत किए गए) समय गिन रहे हैं। (84)

उस दिन हम नेक व परहेज़गार इंसानों को अपने रब (रहमान) के सामने मेहमानों के रूप में  इकट्ठा करेंगे (85)

और अपराधियों को जहन्नम  की ओर प्यासे जानवरों की तरह हँका के ले जाएँगे। (86)

उस दिन सिफ़ारिश करना-कराना किसी के  अधिकार में न होगा, सिवाए उनके जिन्होंने दयालु रब (रहमान) से इसकी अनुमति पा ली हो। (87)

और उन (मक्का के काफ़िरों ने) कहा, "ख़ुदा [रहमान] की कोई औलाद है।" (88)

यह अत्यन्त भारी बात है, जो तुम कहते हो : (89)

कहीं ऐसा न हो कि आकाश फट पड़े, धरती फट के टुकड़े-टुकड़े हो जाए और पहाड़ टूट कर गिर पड़ें, (90)

इस बात पर कि लोग ख़ुदा (रहमान) के लिए औलाद रखने का दावा कर रहे हैं! (91)

यह बात ख़ुदा (रहमान) की शान के बिल्कुल ख़िलाफ़ है कि उसकी कोई औलाद हो : (92)

आसमानों और ज़मीन में जो कोई भी है वह इसीलिए है कि ख़ुदा (रहमान) के सामने बंदगी में सर झुकाए हुए हाज़िर हो---(93)

उसने अपनी (क़ुदरत से) उन्हें घेर रखा है, और (अपने ज्ञान से) हर एक को ठीक ठीक गिन रखा है--- (94)

और क़यामत के दिन हर एक, उस ख़ुदा (रहमान) के सामने बिल्कुल अकेले आ खड़ा होगा। (95)  

मगर जो लोग ईमान लाए और अच्छे कर्मो में लगे रहते हैं, तो उनके लिए यह बात पक्की है कि ख़ुदा (रहमान) उन लोगों को अपना प्यार देगा : (96)

इसीलिए (ऐ रसूल) हमने इस क़ुरआन को आपकी भाषा (अरबी) में उतार कर आसान कर दिया, ताकि अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचनेवालों [मुत्तक़ी] को (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी दे दें, और जो गिरोह सच्चाई के विरुद्ध अड़ियल रवैया अपनाने वाला है, उसे (इंकार व सीमा तोड़ने के नतीजे से) सावधान कर दें,  (97)

मगर इन सीमा तोड़ने वालों से पहले, विभिन्न क़ौमों के कितने दौर गुज़र चुके हैं जिन्हें हम ने (बुरे कर्मों के नतीजे में) बर्बाद कर दिया! क्या उनमें से किसी की हस्ती भी अब तुम महसूस करते हो, या क्या उनकी कोई भनक भी सुनाई देती है? (98)




सूरह 20 : ता हा [Ta Ha]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है 

ता॰ हा॰। (1)

[ऐ रसूल] हमने आप पर यह क़ुरआन इसलिए नहीं उतारी कि आप चिंता व तकलीफ़ में पड़ जाएं, (2)

यह तो इसलिए उतारी गयी है कि जो लोग (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे में) अल्लाह से डरनेवाले हैं, उनके लिए नसीहत हो, (3)

यह उस हस्ती की तरफ़ से उतारी जा रही है जिसने ज़मीन और ऊंचे आसमानों को पैदा किया है, (4

वह (हस्ती) रहम करनेवाला रब [रहमान] है, जो अपने तख़्त पर विराजमान है। (5

जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, और जो कुछ इन दोनों के बीच में है, और जो कुछ धरती के नीचे है--- सब कुछ उसी (अल्लाह) का है। (6)

तुम चाहे कोई बात ऊँची आवाज़ में कहो (या चुपके से), वह तुम्हारे राज़ [secret] की बातें भी जानता है, और यहाँ तक कि तुम्हारे (दिल के अंदर) छिपी हुई बातें भी जानता है। (7)

वह अल्लाह--- कि उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं--- सारी ख़ूबियोंवाले अच्छे नाम उसी के लिए हैं। (8)

[ऐ रसूल] क्या आपने मूसा [Moses] की कहानी सुनी? (9

जब उसने (दूर से) आग देखी तो अपने घरवालों से कहा, "तुम लोग यहीं ठहरो! मुझे (दूर में) आग दिखायी दी है। शायद तुम्हारे (आग तापने के) लिए उसमें से एक अंगारा ले आऊँ या उस अलाव पर सही मार्ग का पता चल जाए।" (10)

फिर जब वह आग के पास पहुँचा, तो (एक आवाज़ ने) उसे पुकारा, "ऐ मूसा! (11)

मैं तेरा रब हूँ। अपने जूते उतार दे : तू इस वक़्त ‘तुवा’ की पवित्र घाटी में खड़ा है। (12)

मैंने (अपना संदेश पहुँचाने के लिए) तुझे चुन लिया है। अतः जो बात ‘वही’[revelation] के द्वारा कही जा रही है, उसे ध्यान लगा कर सुनो। (13)

निस्संदेह मैं ही अल्लाह हूँ ; मेरे सिवा कोई भी पूजने के लायक़ नहीं। अतः तू मेरी ही बन्दगी कर और (पाबंदी से) नमाज़ अदा कर ताकि तू मुझे याद करता रहे। (14)
वह (नियत) घड़ी जल्द आनेवाली है----- हालाँकि मैं उस (समय) को अभी छिपाए रखना चाहता हूँ ---ताकि हर आदमी को उसके द्वारा की गयी कोशिशों का बदला मिल सके। (15)

देखो! ऐसा नहीं होना चाहिए कि कोई आदमी जो इस (नियत घड़ी) में विश्वास न करता हो और अपनी इच्छाओं के पीछे भागता हो, वह तुम्हें इससे बहका दे, और तुम्हारी बर्बादी का कारण बन जाए।” (16)


“ऐ मूसा! यह तेरे दाहिने हाथ में क्या है?" (17)

उसने कहा, "यह मेरी लाठी है। मैं इसपर टेक लगाता हूँ ; इससे अपनी बकरियों के लिए पेड़ों के पत्ते झाड़ता हूँ; और इससे मेरी दूसरी ज़रूरतें भी पूरी होती हैं।" (18)

अल्लाह ने कहा, "मूसा! इसे नीचे फेंक दे!" (19)

उसने (लाठी) नीचे फेंक दी, और सहसा क्या देखता है कि वह एक तेज़ दौड़ता हुआ साँप बन गयी! (20)

अल्लाह ने कहा, "इसे पकड़ लो और डरो मत : हम इसे फिर इसकी असली  हालत पर लौटा देते हैं। (21

(फिर आदेश हुआ) : अब अपने हाथ को अपनी बग़ल [armpit] के नीचे रखो और बाहर निकालो, वह बिना किसी ख़राबी के, सफ़ेद (चमकता हुआ) निकलेगा : (लाठी के अलावा) यह दूसरी निशानी होगी।  (22

(यह दोनों निशानियाँ इसलिए दीं कि) आनेवाले समय में हम तुझे अपनी निशानियों में से कुछ बड़ी निशानियाँ दिखा सकें। (23

[आदेश हुआ] : ऐ मूसा! फ़िरऔन [मिस्र का राजा, Pharaoh] के पास जाओ, कि सचमुच वह बहुत ज़ालिम हो गया है।" (24

मूसा ने कहा, "मेरे रब! मेरे दिल में उम्मीद व जोश जगा दे (ताकि बड़े से बड़ा बोझ उठा सकूँ) (25

 और मेरे काम को मेरे लिए आसान बना दे। (26)  

 मेरी ज़बान की लड़खड़ाहट ठीक कर दे (27

 ताकि मेरी बात लोगों की समझ में आ जाए, (28

 और मेरे घरवालों में से मेरे लिए एक सहायक दे दे,  (29

 हारून [Aaron] के रूप में, जो मेरा भाई है --- (30)
  
 उसके द्वारा मेरी ताक़त बढ़ा दे।  (31

 और उसे मेरे काम में हाथ बँटानेवाला बना दे, (32)

 ताकि हम अधिक से अधिक तेरी बड़ाई का बखान कर सकें (33)

 और अक्सर तेरी याद में लगे रहें :  (34

 तू तो हमेशा ही हम पर नज़र रखनेवाला है।" (35)

अल्लाह ने कहा, "मूसा, जो कुछ तूने माँगा है, मैंने मंज़ूर कर लिया। (36)

(तू जानता है) हम तुझ पर पहले भी एक बार एहसान कर चुके हैं,  (37)

 जब हमने तेरी माँ के दिल में यह बात डालते हुए कहा था, (38)

“तुम अपने बच्चे को बक्से में रख दो, फिर उसे (नील) नदी में डाल दो। नदी उस बक्से को बहाते हुए स्वंय किनारे पर लगा देगी, और फिर वह उस (बच्चे) को उठा लेगा जो मेरा दुश्मन है, और उस बच्चे का भी दुश्मन है.” मैंने तुझ पर अपना ख़ास प्यार बरसाया था (कि जो देखता तुम से प्यार कर बैठता), और ऐसी योजना बनायी थी, ताकि तेरा पालन-पोषण मेरी ख़ास निगरानी में हो सके। (39)

तेरी बहन (घर से) बाहर निकली, और (फ़िरऔन की लड़की से) कहने लगी, “क्या मैं तुम्हें उस (औरत) का पता बता दूँ जो इस (बच्चे) को दूध पिला सकती है”, इस तरह, हमने तुझे फिर तेरी माँ के पास (सुरक्षित) पहुँचा दिया, ताकि खुशी में उसकी आँख ठंडी रहें और वह दुखी न रहे। कुछ समय बाद तुम ने (मिस्र में) एक आदमी को मार डाला था, लेकिन हमने तुझे उस चिंता व परेशानी से मुक्ति दी थी, और फिर तुझे और भी कई तरीक़े से परखा। फिर तुम कई सालों तक मदयन [Midian] के लोगों के बीच रहे, और उसके बाद मेरे तय किए हुए इरादे के मुताबिक़, ऐ मूसा, तुम यहाँ आ पहुँचे। (40)

हमने तुझे अपने (संदेश पहुँचाने के) लिए चुन लिया है। (41)

अब तुम और तुम्हारा भाई, दोनों मेरी निशानियो के साथ जाओ, और देखो! इस बात का ध्यान रहे कि मुझे याद करते रहना। (42)

दोनों मिलकर फ़िरऔन के पास जाओ, कि उसने (मर्यादा की) तमाम हदें तोड़ डाली हैं। (43)

मगर देखो, उससे नर्मी से बात करना, शायद कि वह उस पर ध्यान दे या कुछ आदर दिखलाए।" (44)

दोनों ने कहा, "ऐ हमारे रब! हमें डर है कि कहीं वह हमें कोई बड़ा नुक़सान न पहुँचाए या मर्यादा की सीमाएं न तोड़ डाले।" (45)

अल्लाह ने कहा, "डरो नहीं, मै तुम दोनों के साथ हूँ। मैं सब सुनता भी हूँ और देखता भी हूँ। (46)

जाओ और जा कर उससे कहो, “हम तेरे रब के भेजे हुए रसूल [Messengers] हैं, अत: इसराईल की सन्तान को हमारे साथ भेज दे, और उनके साथ ज़ुल्म न करे। हम तेरे पास तेरे रब की निशानी लेकर आए हैं, और जो कोई भी सीधे रास्ते पर चले, उसके लिए सलामती है; (47)

हमें ‘वही’ [Revelation] द्वारा (अल्लाह की तरफ़ से) यह बात बतायी गयी है   कि जो कोई भी सच्चाई को मानने से इंकार करेगा और उससे मुँह फेरेगा, तो उसके ऊपर यातना आ पड़ेगी।" (48)

फ़िरऔन ने पूछा, "अच्छा, तुम दोनों का रब कौन है, मूसा?" (49)

मूसा ने कहा, "हमारा रब वह है जिसने हर चीज़ को उसकी सही आकृति [Form] दी, फिर उसके (विकास के) लिए ज़रूरी रास्ता भी बता दिया।" (50) 

फ़िरऔन ने कहा, "अच्छा तो उन पीढ़ियों का क्या होगा, जो पहले गुज़र चुकी हैं?" (51)

मूसा ने कहा, "इन सब का ज्ञान तो केवल मेरे रब के पास ही है, जो एक किताब में लिखा हुआ है; मेरा रब न चूकता है और न भूलता है।" (52)

"वह (अल्लाह) है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को फ़र्श की तरह बिछा दिया, और उसमें से रास्ते निकाल दिए। उसने आसमान से बारिश उतार भेजी। इसी पानी से हमने तरह तरह के पेड़-पौधे निकाले, (53)

अत: ख़ुद भी खाओ, और अपने चौपायों को भी चराओ! निस्संदेह इन सब में समझदार लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं।  (54)

इसी ज़मीन (की मिट्टी) से हमने तुम्हें पैदा किया था, इसी के अंदर हम तुम्हें वापस ले जाएंगे, और फिर इसी से दूसरी बार उठाए जाओगे।" (55)


हक़ीक़त यह है कि हमने फ़िरऔन को अपनी सब निशानियाँ दिखायीं, मगर  उसने उन्हें झुठलाया और मानने से इंकार कर दिया। (56

उसने कहा, "ऐ मूसा! क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि अपने जादू से हमको अपनी ज़मीन से निकाल बाहर कर दे? (57)

अच्छा, हम भी तेरे जादू का मुक़ाबला जादू से ही करेंगे : एक (मुनासिब) जगह ठहरा लो जिस पर दोनों पक्ष राज़ी हों, और (मुक़ाबले का) एक समय तय कर लो, जिसे हम दोनों में से कोई भी तोड़ न पाए।" (58)

मूसा ने कहा, "ठीक है, हमारे बीच वह दिन तय रहा, जिस दिन उत्सव मनाया जाता है, और यह कि लोग दिन चढ़े वहाँ इकट्ठे हो जाएँ।" (59)


फ़िरऔन (वहाँ से) चला गया, फिर उसने अपने सारे (शैतानी) हथकंडे जुटाए,  और (नियत समय पर) आ गया। (60)

मूसा ने उन लोगों से कहा, "ख़बरदार! अल्लाह के बारे में झूठी बातें न गढ़ो, वरना वह [अल्लाह] तुम्हें ऐसी सज़ा देगा कि तुम बर्बाद हो जाओगे। याद रहे, जिस किसी ने भी झूठ गढ़ा, वह असफल रहेगा।" (61)

इस पर वे आपस में अपनी योजना के बारे में विचार-विमर्श करने लगे, और चुपके-चुपके कानाफूसी करते हुए, (62)

कहने लगे, "ये दोनों जादूगर हैं, इनका मक़सद है कि अपने जादू से तुम्हें अपनी ज़मीनों से निकाल बाहर कर दें, और तुम्हारी उत्तम संस्कृति को बर्बाद कर डालें।" (63)

अतः अपने सभी हथकंडों [resources] को जुटा लो, फिर मुक़ाबले के लिए पंक्तिबद्ध हो जाओ। आज जो भी जीतेगा, असल कामयाबी उसी की होगी।" (64)

जादूगरों ने कहा, "ऐ मूसा! पहला दांव तुम चलोगे या फिर हम चलें?” (65

मूसा ने कहा, "तुम्हीं पहले चलो।" फिर (जादूगरों ने अपने दांव फेंके), अचानक जादू के असर से उनकी रस्सियाँ और लाठियाँ (साँप की तरह) दौड़ती हुई महसूस होने लगीं! (66)

मूसा अपने जी में थोड़ा डरा, (67)

मगर हमने कहा, "डरो मत! निस्संदेह तुम ही (मुक़ाबले में) भारी पड़ोगे। (68)

तुम्हारे दाहिने हाथ में जो (लाठी) है, उसे नीचे फेंक दो : जो कुछ (जादू से) उन्होंने रचा है, वह उसे निगल जाएगी। जो कुछ उन्होंने रचा है, वह तो बस जादूगर के करतब हैं, और जादूगर चाहे किसी रास्ते से आए, उसे कभी कामयाबी नहीं मिलती।" (69)


[ऐसा ही हुआ, और] सारे जादूगर घुटनों के बल (सजदे में) गिरा दिए गए. वे  बोले, "हम ने विश्वास कर लिया, हारून और मूसा के रब पर।" (70)

फ़िरऔन ने (जादूगरों से) कहा, "मेरी इजाज़त लेने से पहले ही तुम्हारी यह मजाल कि तुम ने इनके रब पर विश्वास कर लिया? यह ज़रूर तुम्हारा उस्ताद होगा, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। अब अवश्य ही मैं तुम्हारा एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ का पाँव कटवा दूँगा, और खजूर के तनों पर तुम्हें सूली चढ़ा दूँगा। तब तुम्हें अवश्य ही मालूम हो जाएगा कि हममें से किसकी यातना अधिक कठोर और लम्बे समय तक रहनेवाली है!" (71)

 जादूगरों ने कहा, "हम यह कभी नहीं कर सकते कि जो (सच्चाई की) स्पष्ट निशानियाँ (अल्लाह की तरफ़ से) हमारे सामने आ चुकी हैं, उन्हें छोड़ कर तेरा आदेश मान लें, और न ही जिस अल्लाह ने हमें पैदा किया है, उससे मुँह फेर कर तेरा हुक्म मान लें : अत: तू जो चाहे, फ़ैसला कर ले : वैसे भी तू तो बस इसी सांसारिक जीवन के मामलों का ही फ़ैसला कर सकता है----- (72)

हम ने तो अपने रब पर विश्वास कर लिया, (इस आशा में) कि शायद वह हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे औऱ इस जादूगरी को भी जिसे दिखाने के लिए तू ने हमें मजबूर किया---- अल्लाह ही सबसे अच्छा और हमेशा बाक़ी रहनेवाला है।" (73)


शैतानियाँ करनेवाले लोग जब अपने रब के पास लौट कर आएंगे, तो (अपने कर्मों के) बदले में जहन्नम पाएंगे : वहीं उन्हें (हमेशा) रहना है, जहाँ वे न मर सकेंगे, न जी सकेंगे। (74)

मगर वे लोग जिन्होंने (अल्लाह में) विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, जब अपने रब के पास लौट कर आएंगे, तो इनाम में उनके लिए ऊँचे से ऊँचा दर्जा होगा,  (75)

बहती हुई नहरों के बीच, फैले हुए सदाबहार (परम आनंदवाले) बाग़ होंगे, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। यह इनाम है उन लोगों के लिए, जिसने स्वयं को (बुराइयों से) बचाए रखा था। (76)

हमने मूसा को ‘वही’ [Revelation] भेजी, "रातों रात मेरे बन्दों [इसराईल की संतान] को लेकर (मिस्र से) निकल पड़ो, और उनके लिए दरिया में सूखा मार्ग निकाल लो। और देखो, तुम्हें न तो (फ़िरऔन द्वारा) पीछा किए जाने व पकड़े जाने का डर हो, और न कोई चिंता व दुख तुम्हें सताए।" (77)

फ़िरऔन ने अपनी सेना के साथ उनका पीछा किया और अन्ततः दरिया की लहरें उन पर इस तरह छा गयीं कि पूरी तरह से डुबा कर रख दिया।  (78)

फ़िरऔन ने सचमुच अपनी क़ौम के लोगों को पथभ्रष्ट किया; और उन्हें सही मार्ग न दिखाया।  (79)


ऐ इसराईल की सन्तान! हमने तुम्हें तुम्हारे दुश्मनों से बचा लिया। तूर पहाड़ के दाहिनी तरफ़ जब तुम से (बरकतों का) वादा किया था, और फिर (सीना के रेगिस्तान में खाने के लिए) तुम पर ‘मन्ना’ और ‘सलवा’ [quails] उतारा, (80)

(तुम्हें कहा गया), "जो कुछ रोज़ी हम ने दे रखी है, उसमें से अच्छी चीज़ें खाओ, मगर (मर्यादा की) एक हद से आगे न बढ़ो, वरना मेरा ग़ुस्सा तुम पर आ गिरेगा। और जिस किसी पर मेरा ग़ुस्सा उतरा, तो सचमुच वह बहुत नीचे गिर गया।  (81)

इसके बावजूद, मैं उन लोगों को बेहद माफ़ करनेवाला हूँ, जो (अपने किए पर) तौबा करते हैं, ईमान रखते हैं, अच्छे कर्म करते हैं, और सीधे मार्ग पर जमे रहते हैं।" (82)

[मूसा अपनी क़ौम को हारून की निगरानी में छोड़ कर तूर पहाड़ पर ध्यान लगाने आए थे, तब अल्लाह ने कहा], "ऐ मूसा! अपनी क़ौम को पीछे छोड़कर तुझे इतनी जल्दी यहाँ आने पर किस चीज़ ने उभारा?" (83)

उसने कहा, "वे मेरे मार्ग का अनुसरण करते हुए पीछे-पीछे चले आ रहे हैं, ऐ रब! मैं तेरे पास लपक कर आ गया, ताकि तू ख़ुश हो जाए।" (84

लेकिन अल्लाह ने कहा, "तेरी अनुपस्थिति में हमने तेरी क़ौम के लोगों की परीक्षा ली : सामरी ने उन्हें बहका दिया है।" (85)

तब मूसा बेहद ग़ुस्सा और दुखी मन से अपनी क़ौम के लोगों के पास वापस गया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम्हारे रब ने तुम से अच्छा वादा नहीं किया था? क्या इस बात को हुए बहुत लम्बा समय गुज़र गया था या तुम यही चाहते ही थे कि तुम पर तुम्हारे रब का प्रकोप टूट पड़े? इसीलिए तुमने मुझ से किए हुए वादे को तोड़ डाला?" (86)

उन लोगों ने कहा, "हमने आपसे किए हुए वादे को जान-बूझ कर नहीं तोड़ा, बल्कि असल में (मिस्र से निकलते समय) लोगों के पास भारी भारी ज़ेवर थे जिसके बोझ तले हम दबे हुए थे, (और फिर सफ़र की मुसीबतों से बचने व ईमान की सफ़ाई के लिए ज़ेवरों को फेंक देना तय हुआ), अत: हमने उनको फेंक दिया था, और सामरी ने (उन्हें जमा कर के आग में) डाल दिया था।" (87)

फिर सामरी ने उस (पिघले हुए ज़ेवरों) से एक बछड़े की मूर्ति बना दी, जिसमें से गाय के पुकारने जैसी आवाज़ आती थी, और लोग देखकर कहने लगे, "यही तुम्हारा ख़ुदा है और मूसा का भी ख़ुदा यही है, मगर वह [मूसा] भूल गए हैं।" (88)

क्या उन्होंने नहीं देखा था कि वह (बछड़ा आवाज़ तो निकालता है, पर) उनकी किसी बात का जवाब नहीं देता था, और यह कि उसमें न तो किसी को कोई नुक़सान पहुँचाने की ताक़त थी और न फ़ायदा? (89)

हारून ने हालाँकि उन्हें बता दिया था, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह बछड़ा तुम लोगों के लिए एक परीक्षा है, तुम्हारा असल रब तो रहम करनेवाला रब [रहमान] है, अतः तुम मेरे पीछे चलो, और मेरा आदेश मानो।" (90)

मगर उन्होंने जवाब दिया, "जब तक मूसा लौटकर हमारे पास न आ जाएं, तब तक हम इसकी भक्ति करना नहीं छोड़ेंगे।" (91)


मूसा ने कहा, "ऐ हारून! जब तुम समझ गए कि ये पथभ्रष्ट हो चुके हैं, तो किस चीज़ ने तुम्हें रोके रखा था,  (92)

मेरे पीछे पीछे चले आने से? तुम मेरे आदेश की अवहेलना कैसे कर सकते हो?" (93)

हारून ने कहा, "ऐ मेरी माँ के बेटे! मेरी दाढ़ी और मेरा सिर न नोच!---- मुझे डर था कि तू कहेगा, “तू ने इसराईल की सन्तान में फूट डाल दी और मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया।" (94)

(मूसा ने) कहा, "और ऐ सामरी! तेरा क्या मामला था?" (95

उसने जवाब दिया, "मैंने कुछ ऐसा देखा था, जो इन लोगों ने नहीं देखा; मैंने रसूल की कुछ शिक्षाएं तो ली थीं, मगर फिर उन्हें (अपने मन से) निकाल कर एक तरफ़ डाल दिया : मेरे जी ने ही मुझे ऐसा करने के लिए उकसाया था।" (96)

मूसा ने कहा, "चला जा यहाँ से! अब इस जीवन में तेरे लिए यही है कि तू कहता रहे, “मत छूओ मुझे!” मगर हाँ, तेरे लिए (अल्लाह के सामने हाज़िर होने का) एक निश्चित समय तय किया हुआ है, जिससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है। देख अपने इस प्रभु को जिसकी भक्ति में तू जमा बैठा था----  हम इसे चूर चूर करके दरिया में बिखेर देंगे।" (97

“[लोगो] तुम्हारा असल ख़ुदा तो बस एक अल्लाह है, जिसके अलावा कोई पूजने के लायक़ नहीं----- उसके ज्ञान ने हर चीज़ को घेर रखा है।" (98)


इस तरह से [ऐ रसूल], हम पुराने ज़माने की कहानियों से आपका रिश्ता जोड़ देते हैं. हमने आपको अपनी तरफ़ से एक नसीहत का सामान [क़ुरआन] दिया है। (99)

जिस किसी ने इससे मुँह मोड़ा, वह निश्चय ही क़यामत के दिन (अपने जुर्म का) बड़ा भारी बोझ उठाएगा, (100)

वे इसी बोझ तले दबे रहेंगे। कैसा भयानक बोझ है जो क़यामत के दिन यह लिए फिरेंगे! (101)

जिस दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मार कर बजा दिया जाएगा, और हम मुजरिमों को अंधों के रूप में इकट्ठा करेंगे, (102)

वे आपस में चुपके-चुपके पूछेंगे कि "हम (क़ब्रों में) दस दिन से ज़्यादा क्या रहे होंगे?"---- (103)

जो कुछ वे कह रहे होंगे, हम उसे अच्छी तरह जानते हैं---- मगर उनमें से सबसे समझदार आदमी कहेगा, "हम बहुत रहे होंगे तो बस एक दिन रहे होंगे।" (104)


[ऐ रसूल] वे आपसे पहाड़ों के बारे में पूछते हैं : कह दें, "(क़यामत के दिन) मेरा रब उन पहाड़ों को (चूर-चूर कर के) धूल की तरह उड़ा देगा (105)

और धरती को एक समतल मैदान बनाकर छोड़ेगा, (106)

जिसमें न तो कोई ऊँचाई दिखेगी और न ही पस्ती।" (107)

उस दिन सब लोग पुकारनेवाले के पीछे पीछे चल पड़ेंगे, और उससे बच निकलने का कोई रास्ता न होगा; रहम करनेवाले रब [रहमान] के सामने हर एक आवाज़ दब कर रह जाएगी; बस केवल फुसफुसाने की आवाज़ ही सुनाई देगी। (108)

उस दिन किसी की सिफ़ारिश काम न आएगी सिवाए उसके, जिसको रब [रहमान] ख़ास इजाज़त दे दे, और जिसकी बात को मंज़ूर कर ले ---- (109)

जो कुछ लोगों के सामने है और जो उनके पीछे गुज़र चुका, वह सारी बातों को जानता है, हालाँकि वे उस [अल्लाह] को पूरी तरह समझ नहीं सकते---- (110)

सभी चेहरे उस हमेशा ज़िंदा रहनेवाले, हर समय निगरानी रखनेवाले [अल्लाह]  के आगे झुकें होंगे। ऐसे लोग जिन पर बुरे कर्मों का बोझ होगा, वे निराशा में डूब जाएंगे,  (111)

पर जिस किसी ने अच्छे कर्म किए हैं, और (सच्चाई पर) ईमान रखा है, तो उसे न तो किसी नाइंसाफ़ी का डर होगा और न हक़ मारे जाने का।” (112)

हमने क़ुरआन को अरबी ज़बान में उतारा है, और हमने इसमें हर तरह से (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनियाँ दे दी हैं, ताकि वे (भटकने से) सावधान रह सकें या इस पर ध्यान दे सकें---  (113)


बड़ी ऊँची शान है अल्लाह की, जिसे हर एक चीज़ पर पूरा नियंत्रण है।
[ऐ रसूल] जब क़ुरआन (की आयतें) उतारी जा रही हों, तो उसे पूरी तरह उतरने से पहले ही पढ़ने में जल्दी न किया करें, बल्कि कहें, "मेरे रब, मेरे ज्ञान में बढ़ोत्तरी कर दे!" (114)

असल में हमने आदम को पहले से ही बताकर शपथ ले ली थी, फिर वह भूल गया और हमने उसमें इरादे की मज़बूती न पाई। (115

जब हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ", तो सब झुक गए थे, मगर इबलीस ने (झुकने से) इंकार किया, (116)

इस पर हमने कहा, "ऐ आदम! (देख लो), इबलीस तुम्हारा दुश्मन है, तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का दुश्मन : कहीं ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को जन्नत से निकलवा दे और तुम तकलीफ़ में पड़ जाओ। (117)

तुम्हारे लिए अब ऐसी ज़िंदगी है कि (जन्नत के) बाग़ में तुम न कभी भूखे रहोगे, और न ही नंगापन महसूस करोगे,  (118)

न प्यासे रहोगे और न धूप की तकलीफ़ उठाओगे।" (119)

लेकिन फिर शैतान ने आदम को बहकाया, और कहने लगा, "ऐ आदम! क्या मैं तुझे एक ऐसे पेड़ का पता दे दूँ जिससे जीवन अमर हो जाए, और ऐसी शक्ति मिल जाए जो कभी घटे नहीं?" (120)

और (फिर आदम और उसकी पत्नी) दोनों ने उस (पेड़) में से कुछ खा लिया, जिसके नतीजे में उन्हें (शर्म से) अपने जिस्म को छिपाने की ज़रूरत महसूस हुई, और वे बाग़ के पत्तों से अपने जिस्म को ढकने लगे। आदम अपने रब के कहने पर न चला और वह (जन्नत की ज़िंदगी से) भटक गया----- (121)

 लेकिन बाद में, उसका रब उसे फिर अपने नज़दीक ले आया, उसकी तौबा [repentance] क़बूल कर ली, और उसका मार्गदर्शन किया ---- (122)

अल्लाह ने कहा, "तुम दोनों इस जन्नत से चले जाओ!, (आदम और शैतान) तुम दोनों एक दूसरे के दुश्मन होगे।
(अब धरती पर) अगर मेरी ओर से तुम (लोगों) को कोई मार्गदर्शन पहुँचे, तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन को अपनाया, वह न तो गुमराह होगा और न किसी तकलीफ़ में पड़ेगा। (123)

और जिस किसी ने मेरी नसीहत से मुँह मोडा़, तो उसका जीवन सख़्त परेशानी में गुज़रेगा. क़यामत के दिन हम उसे अंधा कर के खड़ा करेंगे।" (124

वह कहेगा, "ऐ मेरे रब! तू मुझे यहाँ अंधा कर के क्यों लाया? पहले तो मैं देख सकता था!" (125)

अल्लाह कहेगा, "ऐसा ही होना था : जब हमारी निशानियाँ [आयतें] तेरे पास आती थीं, तो तू उन्हें नज़रअंदाज़ [ignore] कर देता था, अत: आज तुझे भी भुला दिया जाएगा।" (126)

जो कोई मर्यादा को तोड़ कर बहुत आगे चला जाता है, और अपने रब की आयतों पर विश्वास नहीं रखता, तो इसी तरह हम उसे बदला देते हैं। और आख़िरत [Hereafter] की सज़ा तो बेहद कठोर और बहुत देर तक रहनेवाली है। (127)
पहले की कितनी ही पीढ़ियों को हम (उनके जुर्मों के नतीजे में) बर्बाद कर चुके हैं जिनके खंडहरों से होकर तुम लोग आते जाते हो, तो क्या उनसे कोई सबक़ नहीं सीखते? समझदार आदमी के लिए सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं! (128)


[ऐ रसूल] अगर आपके रब ने (सज़ा देने के समय) की बात पहले से ही तय न कर दी होती, तो अब तक उन्हें तबाह कर दिया गया होता। उनका समय तय हो चुका है, (129)

अतः [ऐ रसूल] जो कुछ वे कहते हैं, आप उस पर धीरज [सब्र] से काम लें---- मन से अपने रब का गुणगान करें, सूरज निकलने और डूबने से पहले, और रात की घड़ियों में भी उसका गुणगान करें, और दिन के शुरू और ख़त्म होने पर [दो पहर के लगभग] भी, ताकि आपको संतोष मिल सके ---- (130)

हमने उनमें से कुछ लोगों को इस जीवन के बहार लूटने और मज़े करने का मौक़ा दिया है : हम उसके द्वारा उनकी परीक्षा लेते हैं, मगर आप इन चीज़ों को चाहत की नज़र से न देखें, आपके रब की दी हुई रोज़ी उत्तम भी है और देर तक रहनेवाली भी।  (131)

आप अपने लोगों को नमाज़ पढ़ने का आदेश दे दें, और स्वयं भी उस पर जमे रहें। हम आपसे कोई रोज़ी नहीं माँगते; रोज़ी तो हम ही देते हैं, और आख़िरत का इनाम तो उन्हीं लोगों के लिए है जो (अल्लाह की) भक्ति में डूबे होते हैं। (132

विश्वास न करनेवाले कहते हैं, "यह (रसूल) अपने रब की ओर से हमारे पास कोई निशानी क्यों नहीं लाते?" मगर क्या उन्हें स्पष्ट प्रमाण (के रूप में क़ुरआन) नहीं दिया गया, जो पहले की (आसमानी) किताबों में लिखी हुई बातों की पुष्टि करती है? (133)

अगर इस रसूल के आने से पहले, हम सज़ा के तौर पर इन्हें तबाह व बर्बाद कर देते, तो वे ये कहते "ऐ हमारे रब, काश, तूने हमारे पास कोई रसूल भेजा होता, तो हम अपमानित और बदनाम होने से पहले ही तेरी आयतों के अनुसार चलते!" (134)

[ऐ रसूल] कह दें, "हम सब (आनेवाले समय का) इंतज़ार कर रहे हैं, अतः तुम भी इंतज़ार करो : जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि कौन सीधे मार्ग पर चलनेवाला है और कौन मंज़िल तक पहुँचता है।" (135)

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