Wednesday, May 15, 2019

Chronological Quran : Early Meccan Surah..


Chronological Quran:

क़ुरआन को समझने के कई तरीक़े हो सकते हैं. एक तो जो पारंपरिक तरीक़ा है कि पहली सूरह से लेकर 114 वीं सूरह तक क्रम से पढ़ा और समझा जाए. इसमें दिक़्क़त यह होती है कि यह सूरह चूंकि अलग-अलग समय में उतरी थीं, इसलिए उसकी पृष्टभूमि समझने के लिए पाठक को बार-बार समयकाल में पीछे और आगे जाना पड़ता है, जिससे समझने में मुश्किल होती है.

दूसरा तरीक़ा यह हो सकता है कि क़ुरआन को विषय के अनुसार [Theme based] समझा जाए, जैसा कि हमें कोई भी किताब पढ़ने की आदत रही है. किसी एक विषय पर क़ुरआन में कई जगह पर विवरण मिलता है, उन सारी बातों को एक जगह लाकर उसे समझने की कोशिश की जाए. इस तरह की कोशिशें अँग्रेज़ी में हो रही हैं, मगर उर्दू या हिंदी में अभी तक कोई अच्छी किताब सामने नहीं आयी है. 

तीसरा तरीक़ा यह हो सकता है कि क़ुरआन को उस क्रम से समझने की कोशिश की जाए जिस क्रम से यह सूरतें 23 साल में थोड़ी-थोड़ी उतरी थीं. इसमें आप उन घटनाओं और बातों की पृष्टभूमि सिलसिलेवार ढंग से समझ सकते हैं. मगर इसमें सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि कोई भी विद्वान पूरे यक़ीन से नहीं बता सकता है कि क़ुरआन की  सभी 114 सूरतों के उतरने का सही क्रम क्या था. विद्वानों में इसके सही क्रम को लेकर मतभेद रहा है. 1924 ई.में मिस्र से क़ुरआन की जो प्रति  छपी थी उसे ही मुस्लिम जगत में प्रामाणिक माना जाता है, और उसमें रिवायतों व हदीसों को आधार बनाकर हर सूरह  के उतरने का एक क्रम  निर्धारित किया गया है जो कि मोटे तौर पर मौलाना सय्यूती की शोध पर आधारित है. इसे ज़्यादातर मुस्लिम विद्वान कुछ एक मतभेद के साथ ठीक मानते हैं. इस विषय में जर्मन विद्वान नोल्देकी और उनके अन्य साथियों ने भी काफ़ी काम किया है, और उनलोगों ने इन सूरतों का एक अलग ही क्रम बनाया है. उनके क्रम का आधार पूरी तरह भाषा व साहित्य है, एक समय पर जिस तरह की भाषा में और जिस अंदाज़ में बातें कही गयी हैं, उनको ध्यान में रखकर इन सूरतों का काल निर्धारित किया गया है.  चूंकि 23 साल के लम्बे अंतराल में भाषा की शैली में अंतर आया है, इसलिए इसका अध्ययन भी दिलचस्प है. 

बहरहाल, मैंने मिस्र के प्रामाणिक क्रम को यहाँ पर अपनाते हुए क़ुरआन की सूरह को  chronologically सजाने की कोशिश की है. आम तौर से इसको दो भाग में बांटते हैं :

 (1) मक्की [Meccan] : वे सूरतें जो मक्का से (हिजरत कर के) मदीना जाने से पहले के 13 साल के अंतराल में उतरीं. 

(2) मदनी [Medinan] : वे सूरतें जो हिजरत के बाद अगले 10 साल के अंतराल में उतरीं. 

(1) मक्की दौर को फिर तीन हिस्सों में बाँटा जाता है :

(क) आरंभिक दौर [Early Meccan : 610 AD to 617 AD)
(ख) मध्यवर्ती दौर [Middle Meccan : 617 AD to 620 AD]
(ग)  उत्तर दौर         [Later Meccan : 620 AD to 623 AD]


(क) Early Meccan  Surah : 

शुरू के तीन सालों में मुहम्मद (सल.) ने केवल अपने नज़दीकी लोगों को ही इस दीन के बारे में बताया और छिप-छिपकर तब्लीग़ की. चौथे साल से अल्लाह के हुक्म के अनुसार उन्होंने इस दीन का खुले-आम प्रचार शुरू कर दिया. 
यहाँ एक और बात ध्यान देने की है कि बहुत सी सूरतें ऐसी हैं जो पूरी की पूरी एक बार में नहीं उतरी हैं, बल्कि कुछ हिस्से पहले उतरे और कुछ आयतें बहुत बाद में उतरी हैं, जिन्हें मिलते जुलते विषय होने के कारण साथ में (अल्लाह के हुक्म से) रखा गया. 

नीचे शुरू के लगभग सात (7) सालों  में उतरी सूरह का अनुवाद दिया गया है. इनमें पहली छ: (6) सूरह ऐसी हैं जिनकी कुछ आयतें ही शुरू के साल में उतरी थीं.  नीचे उन सूरह के नम्बर और उन आयतों के नम्बर दिए गए हैं जो पहले-पहल उतरी थीं :

(i) Surah 96 :  Aayat No. 1-5
(ii) Surah 68 : Aayat  No. 1-6
(iii) Surah 73: Aayat  No. 1-4
(iv) Surah 74: Aayat  No. 1-9








सूरह 96 : अल अलक़
 [सटे हुए ख़ून का लोथड़ा, The Clinging Form]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


[ऐ रसूल!] पढिये! अपने रब का नाम लेकर जिसने (हर चीज़ को) पैदा किया : (1)

उसने पैदा किया इंसान को (माँ के पेट में जोंक की तरह) सटे हुए ख़ून के लोथड़े से। (2)

पढिये! कि आपका रब सबसे अधिक करम करनेवाला [Bountiful] है (3)

जिसने कलम के सहारे (लिखने पढ़ने का) ज्ञान सिखाया,  (4)

जिसने इंसान को वह (कुछ) सिखा दिया जो वह नहीं जानता था। (5)


(लेकिन) सच्चाई यह है कि इंसान (बुराइयों की) सभी हदों को तोड़ डालता है (6)

क्योंकि उसने अपने आपको (दुनिया में) आज़ाद समझ लिया है जो किसी पर निर्भर नहीं है :  (7)

[ऐ रसूल], सबको आपके रब के ही पास लौटकर जाना है। (8)

क्या आपने उस आदमी को देखा जो रोकता है, (9)

(हमारे) बंदे को जब वह नमाज़ पढ़ता है? (10)


भला देखिए अगर वह (नमाज़ पढने वाला) सीधे मार्ग पर हो, (11)

या वह (लोगों को) बुराइयों से बचने व नेक काम करने को प्रोत्साहित करता हो (तो क्या ऐसे आदमी को रोकना उचित है)? (12)

अब बताइए! अगर वह (रोकने वाला) सच्चे धर्म को मानने से इंकार करता हो, और उससे मुँह मोड़ता हो? (13)

क्या वह नहीं समझता कि अल्लाह सब कुछ देख रहा है?  (14)

ख़बरदार! अगर उसने अपने को (रसूल की बेइज़्ज़ती और सच्चे धर्म से दुश्मनी करने से) नहीं रोका, तो हम ज़रूर (उसे नरक में) माथे के बल पकड़ कर घसीटेंगे----- (15)

वह माथे जो झूठे (और) गुनाहगार हैं। (16)

अब वह अपने साथियों को (सहायता के लिए) बुला ले; (17)

हम भी नरक के रक्षकों को बुला लेंगे। (18)

हरगिज़ नहीं! आप [ऐ रसूल] उसकी बात न मानें : सजदे में सर झुकाते रहें और (हमसे ज़्यादा) क़रीब होते जाएं। (19)


 सूरह 68 : अल क़लम (क़लम / The Pen)


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है 


”नून”  


क़सम है कलम की, और उन (विषयों) की जो वे (फरिश्ते) लिखते हैं! (1)


[ऐ रसूल!] आपके रब की कृपा से आप (हरगिज़) दीवाने नहीं हैं : (2)


बेशक आप के लिए ऐसा इनाम है जो कभी समाप्त नहीं होने वाला ---- (3)


सचमुच आप बेहतरीन और मज़बूत चरित्र के मालिक हैं ---- (4)


सो बहुत जल्द आप (भी) देख लेंगे और वे (भी) देख लेंगे,  (5)


कि तुम में से कौन है जो दीवानेपन से ग्रसित है. (6)


आपका रब अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो उसकी सीधी राह से भटक गया है, और कौन है जिसने सीधा मार्ग पा लिया है। (7)


अत: आप उनलोगों के दबाव में न आएं, जो इस (सच्चाई) को झूठ मानते हुए इससे इंकार करते हैं, ---- (8)


वे तो चाहते हैं कि (धर्म के मामले में) आप थोड़ा ढीले पड़ जाएं (और उनके बुतों की बुराई न करें) तो वे भी (ईमान वालों को सताने में) नर्मी करेंगे ---- (9)


आप किसी ऐसे आदमी की बातों में बिल्कुल न आएं जो बहुत क़समें खानेवाला, अत्यंत नीच है, (10)


(जो) ताना देने, दूसरों की कमियाँ निकालने (और) लोगों में अशांति फैलाने के लिए चुग़लखोरी करता फिरता है, (11)


(जो) भलाई के काम से रोकनेवाला, ज़ुल्म की सीमा पार करनेवाला (और) सख़्त पापी है, (12)


(जो) बहुत क्रूर है, और सबसे बढ़कर मक्कार [imposter] है (या जो नाजायज़ पैदा हुआ है। (13)


कहा जाता है कि यह बातें वलीद इब्ने अल मुग़ीरा के बारे में है जो रसूल (सल.) का घोर विरोधी था.


आप केवल इसलिए (उसकी बात को महत्व न दें) कि वह बड़ा धनवान और औलाद वाला है, (14)


जब उसके सामने हमारी आयतें पढकर सुनाई जाती हैं (तो) कहता है: “यह (तो) पिछले लोगों की कहानियाँ हैं!" (15)


जल्द ही हम उसकी सूंड (जैसी नाक) पर दाग़ लगा देंगे! (16)


बेशक हमने (इन मक्का के लोगों) को (उसी तरह) आज़माइश में डाला है जिस तरह हमने (यमन के) एक बाग़ वालों को उस वक़्त परीक्षा में डाला था जब उन्होंने क़सम खाई थी कि हम सुबह सवेरे ज़रूर उस (बाग़ के) फल तोड़ लेंगे (17)


और उन्होंने (यह क़सम लेते हुए) किसी और के लिए कोई गुंजाइश नहीं रखी (न अल्लाह की मर्ज़ी की और न ग़रीबों के हिस्से की) : (18)


फिर ऐसा हुआ कि जिस वक़्त वे सो रहे थे, उस वक़्त आपके रब की ओर से एक बला [disaster] उस बाग़ पर फेरा लगा गयी। (19)


सो वह (लहलहाता फलों से लदा हुआ बाग़) सुबह कटी हुई फसल की तरह उजाड़ हो गया। (20)


फिर सुबह होते ही वे एक दूसरे को पुकारने लगे, (21)


“कि अपने खेत की तरफ सवेरे सवेरे चले चलो अगर तुम सारे फल तोड़ना चाहते हो”, (22)


सो, वे लोग चल पड़े और वे आपस में चुपके-चुपके कहते जाते थे (23)


कि "ध्यान रखो! आज उस बाग में तुम्हारे पास कोई ग़रीब माँगने वाला आने न पाए!" ----- (24)


और वे सुबह सवेरे अपनी योजना पर अड़े हुए, तेज़ क़दमों से (बाग़ की तरफ़) चल पड़े ----- (25)


फिर जब उन्होंने उस (वीरान बाग) को देखा, तो कहने लगे: “हम ज़रूर रास्ता भूल गए हैं!” (यह तो हमारा बाग नहीं है), (26)


(थोड़ी देर बाद जब ध्यान से देखा तो पुकार उठे): “नहीं! हम तो लुट गए, बर्बाद हो गए”। (27)


उनमें सबसे अक़्लमंद आदमी ने कहा: “क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था, "क्या तुम (अल्लाह की) याद और उसकी बड़ाई का गुणगान नहीं करोगे?” ---- (28)


(तब) वे कहने लगे कि “हमारा रब पाक व महान है!, सचमुच हम ही शैतानी के  काम कर रहे थे!" ------ (29)


फिर उसके बाद वे एक दूसरे के सामने खड़े होकर आपस में एक दूसरे को बुरा भला कहने लगे। (30)

(फिर सब मिलकर) कहने लगे: “अफसोस है हम सब पर! बेशक हम ने बहुत भारी ग़लती की है, (31)


मगर हो सकता है हमारा रब हमें इस (बाग़) के बदले में उससे अच्छा प्रदान कर दे : हम आशा करते हुए, अपने रब के आगे पूरी भक्ति से झुकते हैं”। (32)


(इस जीवन में तो) ऐसा दंड [punishment] है, मगर आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक / Hereafter] की यातना (इससे) कहीं बढ़कर है, काश! वे जानते होते, (33)


वे लोग जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए उनके रब के पास नेमतों से भरे हुए बाग़ हैं। (34)


भला क्या हम आज्ञा माननेवालों को गुनाहगारों [sinners] की तरह (वंचित) कर देंगे? (35)


तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसी बातें तय कर लेते हो? (36)


क्या तुम्हारे पास कोई किताब है जो तुम्हें बताती है,  (37)


कि वहाँ (परलोक में) तुम्हें वही कुछ मिलेगा जो तुम पसंद करोगे? (38)


क्या तुमने हम से क़यामत तक बाक़ी रहने वाली क़समें ले रखी हैं (जिनके द्वारा हम बाध्य हैं) कि तुम्हें वही कुछ मिलेगा जिसे तुम ख़ुद (अपने लिए) तय करोगे? (39)


[ऐ रसूल] उनसे पूछिए कि उनमें से कौन है जिसने इस बात की ज़मानत ले रखी है? (40)


या (अल्लाह के अलावा) ख़ुदायी में क्या उनके ठहराये हुए कोई साझीदार [partner] हैं (जो यह ज़मानत लेते हों)? तो फिर उन्हें चाहिए कि ले आएं अपने उन साझीदारों को, अगर वे सच्चे हैं।  (41)


जिस दिन ‘पिंडली खोल दी जायेगी’[यानी क़यामत की ज़बरदस्त मुसीबत और हलचल आ जाएगी] और वे [इंकार करनेवाले] लोग अल्लाह के सामने (सजदे में) झुकने के लिए बुलाए जाएंगे, तो वे (सजदा) नहीं कर सकेंगे। (42)


उनकी आँखें (डर और लज्जा के कारण) झुकी हुई होंगी (और) उन पर ज़िल्लत छायी हुई होगी : वे (दुनिया में) सजदे के लिए बुलाए जाते थे, जबकि वे भले चंगे थे (लेकिन फिर भी वे सजदा करने से इंकार करते थे)। (43)


अत: [ए रसूल!] जो लोग इन आयतों [Revelation] को झुठ कहकर ठुकरा रहे हैं, आप उन्हें मुझ पर छोड़ दें : हम उन्हें धीरे धीरे (विनाश की ओर) इस तरह ले जाएंगे कि उन्हें पता तक नहीं चलेगा; (44)


और मैं उन्हें (बुराइयों के लिए) ढील दे रहा हूँ, बेशक मेरी योजना बहुत मजबूत है। (45)


क्या आप उनसे (धर्म प्रचार के लिए) कोई मज़दूरी मांग रहे हैं कि वे क़र्ज़ (के बोझ) से दबे जा रहे हैं?  (46)


या उन लोगों के पास छुपी हुई चीज़ों का ज्ञान है कि वह (इस आधार पर) लिखते हैं? (47)


इसलिए आप अपने रब के आदेश के इंतजार में सब्र किये जाएं : "मछली वाले" [पैग़म्बर यूनुस / Jonah] की तरह मत हो जाएं, जब उन्होंने (अपनी क़ौम से तंग होकर और) दुख से घुट-घुट कर हमें [अल्लाह को] पुकारा था :  (48)


अगर उनके रब की अनुकंपा ने उनको [यूनुस अलै.को] संभाल न लिया होता, तो वह ज़रूर दोषी के रूप में उस उजाड़ साहिल पर फेंक दिए जाते (लेकिन अल्लाह ने उन्हें इससे बचाए रखा),   (49)


मगर उनके रब ने उनको चुन लिया और उन्हें (अपनी ख़ास नज़दीकी प्रदान कर) नेक बंदों में (शामिल) कर लिया। (50)


वे लोग जो सच्चाई से इंकार करने पर तुले हुए हैं, जब कुरआन सुनते हैं, तो ऐसा लगता है कि वे अपनी (तेज़ व जलन भरी) नज़रों से आपको डगमगा देंगे, और वे कहते हैं कि "यह आदमी तो दीवाना है!" (51)


मगर यह [कुरआन] कुछ और नहीं, बल्कि सारे संसार के लिए नसीहत [Reminder] है। (52)


सूरह 73 : अल-मुज़म्मिल [चादर से लिपटे हुए / Enfolded]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


ऐ चादर में लिपटे हुए [रसूल!] (1)


आप उठकर रात भर (नमाज़ में) खड़े रहा करें, मगर थोड़ी रात (आराम भी कर लिया करें), (2)


(नमाज़ के लिए) आधी रात या इससे थोड़ा कम कर लें, (3)


या इस (अवधि) से थोड़ा बढ़ा लें; और कुरआन खूब ठहर ठहर कर (साफ़-साफ़) पढ़ा करें। (4)


[ऐ रसूल!], हम जल्द ही आप पर एक भारी फ़रमान [क़ुरआन] उतारनेवाले हैं, (5)


रात में उठकर की गयी इबादत, दिलों पर गहरा असर छोड़ती है, और (शांत माहौल में क़ुरआन के) शब्दों को सही ढंग से पढ़ना (और समझना) आसान होता है ----- (6)


दिन में लम्बे समय तक आप बहुत सारे कामों में व्यस्त रहते हैं ---- (7)


अत: आप अपने रब के नाम को (दिल और ज़बान से) याद करते रहें, और हर एक से अलग होकर पूरी भक्ति से बस उसी के हो रहें। (8)


वह पूरब और पश्चिम का मालिक है, उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं, सो उसी को (अपना) अभिभावक व रखवाला [protector] बना लें।  (9)


जो कुछ वे [काफ़िर लोग] कहते रहते हैं, आप उन (बातों) पर धीरज रखें, और भले तरीक़े से उनका साथ छोड़कर किनारे हो जाएं,   (10)


और उनलोगों को आप मुझ पर छोड़ दें, जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं और बड़े ऐश-आराम [luxury] में रहते हैं. कुछ और समय तक (उनके साथ नर्मी बरतें) और उन्हें बर्दाश्त कर लें; (11)


हमारे पास उनके लिए भारी बेड़ियाँ हैं, और (जहन्नम की) भड़कती हुई आग है, (12)


गले में अटक जाने वाला खाना है, और उनके लिए बहुत दर्दनाक यातना [अज़ाब] है,   (13)


उस दिन जब ज़मीन और पहाड़ ज़ोर से हिलने लगेंगे। सारे पहाड़ बिखरी हुई रेत के टीले बन जाएंगे,  (14)


[ऐ मक्का वासियो!] बेशक हमने तुम (लोगों) के पास एक रसूल [मोहम्मद सल्.] भेजा है जो तुम्हारे मामले में गवाह होगा, जैसा कि हमने फ़िरऔन [Pharaoh] की तरफ एक रसूल [मूसा अलै] को भेजा था,  (15)


मगर फ़िरऔन ने हमारे रसूल [मूसा अलै.] का कहना मानने से इंकार किया, सो हमने उसको तबाह कर देने वाली चपेट में धर-दबोचा।  (16)


अगर तुम भी (हमारी बातों को मानने से) इंकार करते रहे, तो उस दिन (की यातना) से अपने आपको कैसे बचा पाओगे, जो बच्चों को बूढ़ा कर देगी, (17)


वह दिन, जब आसमान को फाड़ दिया जाएगा? अल्लाह का वादा तो ज़रूर पूरा होकर रहेगा। (18)


यह [कुरआन] एक नसीहत [Reminder] है. अब जो कोई चाहे, अपने रब तक पहुंचने का रास्ता अपनाले।  (19)


[ऐ रसूल], आपका रब अच्छी तरह जानता है कि आप कभी-कभी दो तिहाई रात के करीब (तह्ज्जुद की नमाज़ में) खड़े होते हैं ----- और (कभी) आधी रात और (कभी) एक तिहाई रात (नमाज़) पढ़ते हैं ---- आपके (पीछे चलनेवाले) साथियों में से भी कुछ लोग है जो ऐसा ही करते हैं।
अल्लाह ही रात और दिन (के घटने और बढ़ने) का सही अंदाज़ा रखता है। वह जानता है कि तुम कभी उसका ठीक ठीक हिसाब नहीं रख सकोगे, तो उसने तुम सब पर (कष्ट में कमी करके) मेहरबानी कर दी, सो जितना आसानी से हो सके कुरआन पढ़ लिया करो,
वह जानता है कि तुम में से (कुछ लोग) बीमार होंगे और (कुछ) दूसरे लोग ऐसे होंगे जो अल्लाह के फज़ल [bounty] की खोज में (काम-काज के लिए) ज़मीन पर इधर-उधर यात्रा कर रहे होंगे, और (कुछ) अन्य लोग अल्लाह की राह में युद्ध कर रहे होंगे : सो जितना आसानी से हो सके उतना (ही) पढ़ लिया करो,
पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, निर्धारित ज़क़ात [alms] देते रहो, और अल्लाह को क़र्ज़ दिया करो, अच्छा वाला क़र्ज़! [बिना दिखावा किए और केवल अल्लाह की ख़ुशी के लिए नेक काम के लिए देना], 
जो कुछ भलाई व नेकी तुम अपने लिए जमा करते हो, उसके बदले तुम्हें अल्लाह के पास कहीं बेहतर और ज़्यादा इनाम मिलेगा,
और अल्लाह से माफी मांगते रहो, (विश्वास रखो) अल्लाह बहुत माफ करनेवाला और बेहद रहम करनेवाला है।  (20)


सूरह 74 : अल मुदस्सिर
 [चादर ओढ़े हुए / Wrapped In His Cloak]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


ऐ (मेरे) चादर ओढ़े हुए (रसूल!),  (1)


उठें और (लोगों को अल्लाह की) चेतावनी सुना दें!  (2)


और अपने रब की बड़ाई (और महानता) की घोषणा कर दें;  (3)


अपने आपको (मन के भीतर की और बाहर की गंदगियों से) साफ़-सुथरा रखें;   (4) 


और हर तरह (के पापों) की गंदगी से दूर रहें;  (5)


किसी को (केवल इस नीयत से) न दें, कि उससे ज़्यादा पाने की चाहत हो;  (6)


और आप अपने रब के काम में धीरज [सब्र] से काम लिया करें.   (7)


फिर जब (क़यामत की घोषणा के लिए) नरसिंघे [trumpet] में फूंक मारी जाएगी,  (8)


सो वह [क़यामत का दिन] बहुत ही परेशानी का दिन होगा।  (9)


(सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों के लिए (वह दिन) कोई आसान न होगा।  (10)


[ऐ रसूल], आप उस आदमी का मामला मुझ पर छोड़ दें, जिसे मैंने बेसहारा पैदा किया था,  (11)
* इसका नाम अल वलीद इब्न अल मुग़ीरह बताया जाता है जो रसूल के कट्टर विरोधियों मे था


फिर उसे दूर-दूर तक फैली हुई ढेर सारी धन-संपत्ति दी थी,  (12)


उसे बेटे दिए थे जो (उसके सामने) हाजिर रहते थे,  (13)


और उसके लिए हर काम के रास्ते आसान बना दिए थे ----- (14)


इसके बावजूद, वह अब भी यह उम्मीद रखता है कि मैं उसे और अधिक दूँगा।  (15)


(अब और) नहीं!, वह हमारी (भेजी गयी) आयतों [revelation] का कट्टर विरोधी  रहा है :  (16)


बहुत जल्द मैं उसे बेहद थका देनेवाली (चढ़ाई की) यातना दूंगा,  (17)


उसने सोच-विचार किया और एक साज़िश तैयार कर ली ----  (18)


लानत हो उस पर, उसने कैसी शैतानी साज़िश रची!  (19)


इस पर लानत हो, उसने (यह) कैसी क्रूरता से भरी साज़िश की! ----- (20)


फिर उसने (आसपास) देखा,  (21)


और त्योरी चढ़ाई और मुंह बिचकाया,   (22)


फिर (सच्चाई की बातों से) पीठ फेर ली और घमंड में अकड़ गया,  (23)


और कहने लगा, “यह [कुरआन] कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने से चला आ रहा जादू  है, (24)


“बस इंसान की कही हुई बात है” (अल्लाह का कलाम नहीं है)।  (25)


में उसे (जहन्नम की) भड़कती आग [सक़र] में झोंक दूंगा।  (26)


और आपको किसने बताया है कि "सक़र" [जहन्नम की आग] क्या है?  (27)


वह (ऐसी आग है जो) न किसी को बाक़ी बचा रखती है न (तरस खाकर) छोड़ती है;  (28)


(वह) आदमी के बदन की खाल को झुलसाकर काला कर देने वाली है;  (29)


उस पर उन्नीस पहरेदार नियुक्त हैं। ----  (30)


और हमने जहन्नम की पहरेदारी के लिए किसी और को नहीं, बल्कि फरिश्तों को ही नियुक्त किया है ----- और हमने इनकी संख्या [Number] विश्वास न करनेवालों [काफिरों] को केवल परखने के लिए निर्धारित की है। अत: जिन लोगों को  (आसमानी) किताब दी गयी हैं, उन्हें इस बात पर विश्वास हो जाएगा, और जो लोग ईमान रखते हैं उनका विश्वास और बढ़ जाएगा : न तो उन्हें जिनको किताब दी गयी है और न ही ईमानवालों को इसकी (सच्चाई में) कोई संदेह होगा, मगर वे जिनके दिलों में रोग है और जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, वे लोग यह कहेंगे, "भला इस (खास संख्या के) उदाहरण से अल्लाह का क्या मतलब हो सकता है?"
इस तरह, अल्लाह (एक ही बात से) जिसे चाहता है गुमराह कर देता है, और जिसे चाहता है सीधा रास्ता दिखा देता है ----- आपके रब के लशकरों को उसके सिवा कोई नहीं जानता, और यह (वर्णन) आदमी को सावधान करने के लिए ही है।  (31)


हां ---- चाँद की क़सम!  (32) 


और रात की क़सम जब वह पीठ फेर कर विदा होने लगे!  (33)


और सुबह की क़सम जब वह रौशन हो जाए!  (34)


बेशक यह (जहन्नम) बहुत बड़ी आफ़तों से एक है,   (35)


इंसानों को सावधान करने वाली,  (36)


तुम में से हर उस आदमी के लिए जो (भलाई में) आगे बढ़ना चाहे या जो (बुराई में फंस कर) पीछे रह जाए।  (37)


हर आदमी अपने (कर्मों द्वारा) की गयी कमाई के बदले (अल्लाह के पास) गिरवी है,  (38)


दाएँ हाथ वालों [Companions of the right] को छोड़ कर,  (39)


जो बाग़ों [जन्नत] में होंगे और वे पूछते होंगे,  (40) 


अपराधियों से,  (41)


(वे पूछेंगे): ”तुम्हें क्या चीज़ जहन्नम (की भड़कती आग) में ले गई?”  (42)


वे जवाब देंगे, “हम नमाज़ पढ़ने वालों में नहीं थे”;  (43)


“और हम ग़रीबों को खाना नहीं खिलाते थे”;  (44)


“हम दूसरे लोगों के साथ (मिलकर) मौज-मस्ती करते (और ईमानवालों का मज़ाक़ उड़ाया करते थे)”;  (45)


“और हम फ़ैसले के दिन को झूठ बताया करते थे”,  (46)


“(और हम यूँ ही रहे) यहां तक ​​कि हम पर वह (मौत) आ पहुँची जिसका आना निश्चित था”,  (47)


सो (उस समय) सिफारिश करने वालों की सिफारिश, उनके कोई काम नहीं आएगी। (48)


तो उन (काफिरों) को क्या हो गया है? क्यों वे इस चेतावनी से बिदक कर मुँह मोड़ लेते हैं,   (49)


मानो वे घबराए हुए (जंगली) गधे हों,  (50)


जो शेर से (डर कर) भाग खड़े हुए हों?  (51)


उनमें से हर एक आदमी यह चाहता है कि उस पर सीधे (आसमानी) किताब उतार दी जाए जो उसकी आँख के सामने खोली जाए ---- (52)


नहीं! बल्कि (सच यह है कि) वे (आगे आने वाली) परलोक (की ज़िंदगी) से डरते ही नहीं।  (53)


मगर सचमुच यह [कुरआन] एक नसीहत [Reminder] है.  (54)


अब जिसका जी चाहे, इस (नसीहत) पर ध्यान दे और याद रखे :   (55)


वे लोग तभी इसे याद रखने पर ध्यान देंगे, अगर अल्लाह ऐसा चाहे. सचमुच वही इस योग्य है कि उसकी चेतावनी पर ध्यान दिया जाए, और वही है जो माफ़ी देनेवाला है।  (56)


सूरह 1 : अल फ़ातिहा [The Opening]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है (1)


सारी तारीफ़ें अल्लाह की हैं, जो सारे संसारों का रब है, (2)


सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है, (3)


(और) जो फ़ैसले के दिन का मालिक है. (4)


[ऐ अल्लाह!] हम तेरी ही इबादत करते हैं; और तुझ से ही (ज़रूरत पड़ने पर) मदद माँगते हैं. (5)


हमें सीधे रास्ते पर चला : (6)


उन लोगों के रास्ते पर जिन पर तू ने इनाम किया है, उनके रास्ते पर नहीं जिन पर (तेरा) ग़ुस्सा उतरा हो, और न उनके जो सीधे रास्ते से भटक गए हों. (7)

सूरह 111 : अल-लहब/ अल-मसद
[आग में जलने वाला, Flame Man / खजूर की छाल, Palm-fibre]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


अबु लहब के दोनों हाथ बर्बाद हो जाएँ! और वह ख़ुद भी बर्बाद हो जाए! (1)                                                                 
न तो (विरासत में मिली हुई) दौलत ही उसके काम आएगी और न वह धन जो उसने कमाया :  (2)
                                
वह जल्द ही (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में जा पड़ेगा----  (3)


और साथ में उसकी (बदमाश) पत्नी (भी), जो (काँटेदार) लकड़ियों का बोझा उठाए फिरती है, (और हमारे रसूल को सताने के लिए उनके रास्तों में बिछा देती है)  (4)
                                                                 
(क़यामत के दिन) उसकी गर्दन में खजूर की छाल का (वही) रस्सा होगा (जिससे वह काँटों का गट्ठर बाँधती है).  (5)


सूरह 81 : अत-तकवीर [अँधेरों में लिपटा हुआ/ Shrouded in Darkness]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


जब सूरज लपेट कर अँधेरा कर दिया जाएगा,  (1)

जब सितारे मद्धिम पड़ जाएंगे (और टूट-टूट कर गिर पड़ेंगे),  (2)

जब पहाड़ (धूल बनाकर वातावरण में) चला दिए जाएंगे, (3)

  जब (दस महीने की) गर्भवती ऊँटनियाँ बेकार मारी फिरेंगी (क़ीमती होते हुए भी कोई उनको पूछनेवाला न होगा),  (4)

जब जंगली जानवर (डर के मारे बदहवास हो जाएंगे और फिर अल्लाह के सामने) इकट्ठा कर दिए जाएंगे,  (5)

जब समंदर उबल पड़ेंगे (और अपनी हदें तोड़ देंगे),  (6)

जब आत्माओं को (बुरे और अच्छे लोगों के) दर्जों में अलग-अलग छाँट कर रखा जाएगा,  (7)

जब ज़िंदा गाड़ दी गयी लड़की से पूछा जाएगा  (8)

कि वह किस गुनाह के कारण मार दी गई थी,  (9)

जब कर्मों के बही-खाते (record of deeds) खोल दिए जाएंगे,  (10)

जब आसमान से पर्दा हटा दिया जाएगा,  (11)

और जब जहन्नम (की आग) भड़कायी जाएगी  (12)

और जब जन्नत नज़दीक कर दी जाएगी :  (13)

 (लोगो! तुम में से) हर आदमी जान लेगा जो कुछ (कर्मों का लेखा जोखा) वह लेकर आया है.  (14)

  तो मैं कसम खाता हूँ उन [ग्रहों/Planets] की, जो (अपने नियत पथ पर चलते हुए) दूर चले जाते हैं,  (15)

  जो (एक ख़ास गति से) चलते रहते हैं, और (फिर कभी इतने दूर चले जाते हैं कि नज़रों से) ओझल हो जाते हैं,  (16)

और रात की क़सम जब उसका अंधेरापन जाने लगे,  (17)

 और सुबह की क़सम जब (हल्की सी रौशनी में) वह साँस ले :  (18)

 यह [कुरआन] संदेश लानेवाले बड़े सम्मानीय फरिश्ते [जिबरईल/ Gabriel] द्वारा (पढी हुई) वाणी [speech] है,  (19)

 जो बड़ी ताक़त रखता है, और सिंहासन के मालिक [अल्लाह] के यहाँ उसका बड़ा सम्मान और रूतबा है ------ (20)

 (साथी फरिश्तों में) उसका आदेश माना जाता है, और वह (अल्लाह के नज़दीक) बहुत  भरोसे के लायक़ [trustworthy] है. (21)

 और (ऐ मक्का के लोगो!) तुम्हारे साथी [मुहम्मद सल.], दीवाने नहीं हैं :  (22)

  उन्होंने सचमुच उस (जिबरईल नामी फरिश्ते को) साफ-खुले हुए आसमान के किनारे (क्षितिज/ horizon) पर देखा था. (23)

  और (जो भी संदेश 'वही' [Revelation] के द्वारा भेजा जाता है), वह [मुहम्मद सल.] उन चीज़ों को बताने में कोई कमी नहीं करते हैं (और न किसी बात को अपने तक छुपा कर रखते हैं).  (24)

(याद रहे), यह [कुरआन] किसी धुतकारे हुए शैतान की लायी हुई बात (वाणी) नहीं है.  (25)


  फिर तुम (लोग इतनी बड़ी चीज़ को छोड़कर) कहाँ चले जा रहे हो?  (26)

  यह [कुरआन] तो सारे लोगों के लिए एक संदेश है;  (27)

  हर उस आदमी के लिए जो सीधी राह चलना चाहता हो. (28)

  मगर तुम ऐसा तभी चाहोगे, जब अल्लाह की मर्ज़ी हो, जो सारे जहाँनों का रब है.  (29)







सूरह 87 : अल-आला [सबसे ऊँचा / The Most High]
   


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


[ऐ रसूल], अपने रब के नाम की बड़ाई बयान करें जो सबसे ऊँचा है, (1)

जिसने (हर चीज़ को, ठीक जैसी ज़रूरत थी) सही अनुपात [due proportion] में पैदा किया;  (2)

और जिसने (हर एक चीज़ के लिए) कानून ठहरा दिया, और फिर (इसे अपने अपने सिस्टम के अनुसार रहने और चलने का) रास्ता भी बता दिया;  (3)

और जिसने (धरती से) हरा हरा चारा [Green pastures] उगाया  (4)
 
फिर उसे सूखा काला कूड़ा बना दिया.  (5)



[ए रसूल!], हम आपको (इस तरह से क़ुरआन) पढ़ाएँगे कि आप (कभी) नहीं भूलेंगे -----  (6)

जब तक अल्लाह न चाहे; सचमुच वह उन चीज़ों को भी जानता है जो सबके सामने हैं, और उन्हें भी जो छुपी हुई हैं -------  (7)

और हम आपको आसान तरीक़े [शरीयत] पर चलने का आसान रास्ता दिखा देंगे.  (8)

इसलिए आप नसीहत देते रहिए, अगर (सुनने वालों को) इस नसीहत [Reminding] से लाभ हो ------  (9)

लेकिन नसीहत तो वही क़बूल [स्वीकार] करेगा जिसके दिल में अल्लाह का डर होगा,  (10)

मगर जो बेहद बदमाश आदमी [wicked person] होगा, वह इस (नसीहत) पर कोई ध्यान नहीं देगा,  (11)

जो (क़यामत के दिन) सबसे बड़ी आग में प्रवेश करेगा,  (12)

जहाँ न तो वह मर सकेगा और न जी सकेगा.  (13)



बेशक वही कामयाब हुआ जिसने (अपनी इंद्रियों को क़ाबू में रखा और पाप की गंदगियों से) अपने को बचाए रखा,  (14)

और अपने रब के नाम को याद करता रहा और (पाबंदी से) नमाज़ पढ़ता रहा.  (15)

लेकिन इसके बावजूद, तुम [लोग] (अल्लाह से लगाव बढाने के बजाए) सांसारिक जीवन (के आनंद) को अपना लेते हो,  (16)

हालांकि आखिरत [hereafter] (की राहत और वहाँ का आनंद) बेहतर और हमेशा बाक़ी रहने वाला है. (17)

बेशक यह (शिक्षा) पहले की किताबों [Scriptures] में (भी लिखी हुई मौजूद) हैं,  (18)

(जो) इबराहीम [Abraham] और मूसा [Moses] की किताबें [scriptures] हैं. (19)

सूरह 92 : अल-लैल [रात, The Night]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


रात की क़सम जब वह छा जाए (और हर चीज़ को अपने अंधेरे में छुपा ले),  (1)

और दिन की क़सम जब उसका उजाला फैल जाए,  (2)

और उस हस्ती (की) क़सम जिसने (हर चीज में) नर और मादा को पैदा किया!  (3)

(ऐ लोगो, अपने मक़सद को पाने के लिए) तुम्हारे कर्म व प्रयास अलग अलग तरह के हैं.  (4)

अब जिस किसी ने (अपना माल अल्लाह के रास्ते में) दिया, और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता रहा,  (5)

और उसने अच्छाई की बात को दिल से माना----  (6)

तो हम उसे आराम की मंज़िल [जन्नत] तक पहँचने के लिए रास्ता आसान कर देंगे।  (7)

और जिस किसी ने (अपने माल को अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने में) कंजूसी की, और अपने आप में ऐसा मगन रहा (जैसे उसे किसी की ज़रूरत नहीं),   (8)


और उसने अच्छाई की बात को मानने से इंकार किया-----  (9)
 
तो हम उसे तकलीफ़ की मंज़िल [जहन्नम] तक पहुँचने के लिए रास्ता आसान कर देंगे  (10)

और जब वह तबाही (के गड्ढे) में गिरेगा तो उसका माल उसके किसी काम नहीं आएगा।  (11)

बेशक (सच्ची और सही) राह दिखाना हमारे ज़िम्मे है -----  (12)

और यह भी सच है कि हम आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] और इस दुनिया दोनों ही के मालिक हैं-------  (13)

सो मैंने तुम्हें (जहन्नम की) भड़कती हुई आग से सावधान कर दिया है, (14)

इस (आग) में कोई और नहीं, बल्कि जो अत्यंत दुष्ट व शैतान है, वही जलेगा,  (15)

जिसने (सच्चाई) को मानने से इंकार किया और (रसूल की बातों से) मुँह मोड़ लिया।  (16)

और जो बहुत नेक और बुराइयों से बचनेवाला आदमी होगा, उसे उस (आग) से दूर रखा जाएगा------  (17)

जो अपने मन की शुद्धि [self-purification] के लिए अपना माल (अल्लाह के रास्ते में) देता है,  (18)

हालाँकि उस पर किसी का कोई उपकार नहीं था जिसका वह बदला चुकाता है,  (19)

बल्कि (वह) तो केवल अपने महान रब की खुशी के लिए (माल खर्च करता है) ----- (20)

यक़ीन जानो, जल्द ही वह (अल्लाह द्वारा दी हुई चीज़ों से) बहुत ख़ुश हो जाएगा।  (21)






सूरह 89 : अल-फ़ज्र [सुबह-सवेरे, Daybreak]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है



क़सम है सुबह सवेरे के समय की,  (1)


मतलब शायद बक़रीद के महीने की दसवीं तारीख की सुबह से है
 
और क़सम है दस (मुबारक) रातों की,  (2)
 
मतलब  शायद  बक़रीद के महीने की पहली 10 रातें हैं जो बड़ी बरकत वाली मानी जाती हैं. जिनका संबंध हज से है .

और क़सम है जोड़े वाली [Even] (चीज़) की और बिना-जोड़े वाली [Odd] चीज़ों की, *  (3)

जफ़्त [सम या जोड़ा] का अर्थ शायद कुल प्राणी है जो जोड़ों के रूप में पैदा किये गये हैं, और ताक़ [विषम या अकेले] का अर्थ शायद अल्लाह की ज़ात है जिसने कायनात बनायी. इस सम और विषम का मतलब बक़रीद की 10वीं और 9 वीं तारीख भी बतायी गयी है.


और गुज़रती हुई रात की क़सम! (कि इंकार करनेवालों को ज़रूर दंड दिया जाएगा) ------  (4)


क्या एक समझदार (को विश्वास दिलाने) के लिए ये क़समें काफी नहीं हैं? (5)


क्या आपने [ऐ रसूल] नहीं देखा कि आपके रब ने “आद” (की क़ौम) के साथ क्या सलूक किया?  (6)

(जो) ऊँचे ऊँचे स्तंभों वाले शहर, “इरम” (में बसते) थे, (7)
 
उनके जैसे लोग इस धरती पर कहीं भी कभी पैदा नहीं किए गए, (8)

और "समूद" (के लोगों के साथ क्या सलूक हुआ) जिन्होंने (क़ुरा नाम की) घाटी में चट्टानों को काट (कर पत्थरों से घरों का निर्माण कर) डाला था, (9)

और फ़िरऔन [Pharaoh] (का क्या हश्र हुआ) जो बड़े ताक़तवर और मज़बूत लशकरों वाला (या लोगों को खूंटों (Stakes) से दंड देने वाला) था?  (10)

यह वे लोग थे जिन्होंने (अपने अपने) इलाक़ों में ज़्यादतियाँ [सरकशी] कर रखी थीं,  (11)

और उनमें बड़े फसाद मचा रखे थे :  (12)

तो आपके रब ने उन पर यातना का कोड़ा बरसा दिया.  (13)
 
बेशक आपका रब सब (ज़्यादती करनेवालों और आदेश न माननेवालों) पर हमेशा कड़ी नज़र रखता है।  (14)



मगर इंसान (ऐसा है) कि जब उसका रब उसे (आराम व ठाठ देकर) आज़माता है और इज़्ज़त और नेमतें [blessings] प्रदान करता है, तो वह (घमंडी हो जाता है) कहता है,  “मेरे रब ने मुझे इज़्ज़त दी है,” (15)

लेकिन जब वह उसे (तकलीफ़ और मुसीबत देकर) आज़माता है और उसकी रोज़ी को सीमित कर देता है, तो वह कहता है,  “मेरे रब ने मुझे अपमानित कर दिया।” (16)

हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! मगर (सच्चाई यह है कि सम्मान और धन दौलत मिलने पर) तुम लोग अनाथों को मान नहीं देते, (17)

और न ही तुम (लोग) गरीबों को खाना खिलाने के लिए (समाज में) एक दूसरे को उभारते हो,  (18)

और विरासत का सारा माल (inherited wealth) समेट कर (स्वयं) खा जाते हो (और इसमें से अनाथों और गरीब लोगों का हिस्सा नहीं निकालते),  (19)

और तुम धन दौलत से हद से ज़्यादा लगाव रखते हो।  (20)



हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! जब धरती कूट कूट कर चूर चूर कर दी जाएगी,  (21)

जब आपका रब और साथ में फरिश्ते क़तार दर क़तार लगाये हुए (हश्र के मैदान में) आएंगे,  (22)

और उस दिन जहन्नम (नरक) को सामने लाया जाएगा‌--- उस दिन इंसान  को समझ आएगी, मगर तब उसके चेतने से क्या (फ़ायदा) होगा?  (23)

वह कहेगा “ ऐ काश! मैंने अपने (इस आने  वाले) जीवन के लिए (कुछ नेकी) पहले भेज दी होती (जो आज मेरे काम आती!)” (24)

सो उस दिन वह [अल्लाह] ऐसा दंड देगा कि वैसा दंड दूसरा कोई नहीं दे सकता, (25)

और न उसके जकड़ने की तरह कोई दूसरा जकड़ने वाला होगा।  (26)

(मगर अल्लाह की याद में सुकून पानेवाले लोगों से कहा जाएगा कि) “ऐ संतुष्ट आत्मा :  (27)

तू अपने रब की तरफ इस हाल में लौट आ कि तू उससे खुश हो और वह तुझ से राज़ी हो;  (28)

और तू शामिल हो जा, मेरे (नेक) बन्दों में;  (29)

और दाख़िल हो जा मेरी जन्नत [Garden] में।"  (30)


सूरह 93 : अज़ ज़ुहा,
[सुबह की रौशनी, The Morning Brightness]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


          क़सम है दिन के पहले पहर की रौशनी की,  (1)


और क़सम है रात की जब (उसका सन्नाटा) छा जाए,  (2)


कि आपके रब ने आपको [ऐ रसूल], न छोड़ा है और न ही आप से नाराज़ हुआ है,  (3)


और आगे आने वाले हालात आपके लिए पहले के हालात से (बड़ाई और दर्जे में) बेहतर होंगे;  (4)


यक़ीन रखें कि आपका रब आपको (इतना कुछ) देगा कि आप पूरी तरह संतुष्ट हो जाएंगे।  (5)


क्या उस [रब] ने आपको यतीम [अनाथ] नहीं पाया था और फिर (आपको अच्छा) ठिकाना [shelter] दिया?  (6)


क्या उसने आपको (सच्चाई की खोज में) भटकते हुए नहीं देखा था और फिर सही मार्गदर्शन दे दिया?  (7)


क्या उसने आपको ज़रूरतमंद नहीं पाया था और फिर आपको आत्म-निर्भर [self-sufficient] बना दिया?  (8)


अत: आप भी किसी अनाथ पर सख़्ती न करें,  (9)


और (अपने द्वार पर आये) किसी माँगनेवाले को न झिड़कें; (10)


और अपने रब की नेमतों का (खूब) बखान करते रहें।  (11)


सूरह 94 : अल-इंशिराह


 [Expand, दिल का फैलना / Relief, राहत]
  

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल] क्या हमने आपके लिये आपका दिल (ज्ञान की रौशनी और समझ-बूझ से) फैला नहीं दिया (जिससे आपको राहत मिल गयी),   (1)

और हमने आप पर से (नबी होने की शुरूआती ज़िम्मेदारी का) बोझ उतार दिया,  (2)

जिस (बोझ) ने आपकी कमर तोड़ रखी थी,  (3)

और (लोगों के लिए) हमने आपको याद किए जाने [remembrance] को ऊँचा स्थान दे दिया?  (4)

तो सचमुच जहाँ कहीं कठिनाई होती है, उसके साथ आसानी भी (आती) है;  (5)

निश्चय ही हर कठिनाई के साथ आसानी (भी) होती है।  (6)

तो जैसे ही आप (अपने लोगों की) ज़िम्मेदारियों से फुर्सत पा लें, तो (अल्लाह की याद व इबादत में) मेहनत किया करें,  (7)

और हर चीज़ के लिए अपने रब से ही दिल लगाया करें। (8)



सूरह 103 : अल अस्र
[ढलता हुआ दिन, The Declining Day]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


ढलते हुए दिन की क़सम (या ढलती उम्र की क़सम, कि जब दिन का हिस्सा या ज़िंदगी कम ही बची रहती है)  (1)


बेशक इन्सान (बड़े) घाटे में है (कि वह अपनी क़ीमती उम्र गँवा रहा है और अच्छे कर्म करने का समय घटता जा रहा है),  (2)


सिवाए उन लोगों के जो ईमान रखते हैं, अच्छे काम करते हैं, (समाज  में) एक दूसरे को सच्चाई की नसीहत करते रहते हैं, और (बुराइयों से बचने में, अच्छे कर्म करने में और आने वाली मुसीबतों में) एक दूसरे को सब्र [धैर्य] के साथ जमे रहने पर ज़ोर देते हैं।  (3)


                      


सूरह 100 : अल आदियात
[हाँफते-दौड़ते घोड़े, The Charging Steeds]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


(युद्ध के मैदान में) सरपट दौड़ते हुए और हाँफते हुए घोड़ों की क़सम,  (1)


फिर जो पत्थरों पर ठोकर मारकर चिंगारियाँ उड़ाते हैं,  (2)


फिर जो सुबह होते ही (दुश्मन पर) अचानक छापा मारते हैं,  (3)


फिर (हमले वाली) जगह के चारों ओर धूल-गर्द उड़ाते हैं,  (4)


फिर उसी समय (दुश्मन के) लश्कर में जा घुसते हैं।  (5)


बेशक इंसान अपने रब का शुक्रा अदा नहीं करता [Ungrateful] है (जबकि एक घोड़ा भी अपनी जान की परवाह किए बिना आदमी से वफ़ादारी निभाता है) ------   (6)


और वह (इस नाशुक्री) पर ख़ुद ही गवाह है-----  (7)


और सच्चाई यह है कि वह [इंसान] धन के मोह में बहुत पक्का है।  (8)


तो क्या उसे पता नहीं, जब क़ब्रों के भीतर जो कुछ (मरे पड़े लोग] हैं, उन्हें फाड़ कर बाहर निकाल दिया जाएगा,  (9)


और जो (राज़) सीनों में छुपे होंगे, वह सामने आ जाएंगे, (10)


उनका रब उस दिन, उन सबके (कर्मों) से अच्छी तरह परिचित होगा।   (11)


सूरह 108 : अल-कौसर
[बहुत ज़्यादा भलाई, Abundance] 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


बेशक [ऐ रसूल!], हमने आपको बहुत ज़्यादा भलाई [abundance] (और नेमतें) दी हैं (यहाँ तक कि जन्नत की एक नदी “कौसर” भी आपके लिए है) -------  (1)


सो, आप केवल अपने रब के लिए नमाज़ पढ़ा करें और उसी के लिए क़ुर्बानी दिया करें------- (2)


वह जो आपसे नफ़रत करता है, असल में वही अपनी जड़ से कटा हुआ होगा (जिसका न तो कोई नाम बाक़ी रहेगा और न ही उसके ख़ानदान को कोई जानेगा)।  (3)


सूरह 102 : अत-तकासुर
[ज़्यादा पाने की लालसा, Striving For More] 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


ज़्यादा से ज़्यादा (धन-दौलत और ऐश व आराम) हासिल करने की लालसा ने तुम लोगों को (आख़िरत/Hereafter] से) भटका रखा है  (1)


यहाँ तक कि तुम लोग अपनी क़ब्रों में जा पहुंचते हो।  (2)


हरगिज़ नहीं! (धन-दौलत तुम्हारे काम नहीं आएगी), तुम्हें जल्द ही सब पता चल जाएगा।  (3)


फिर (तुम्हें चेताया जाता है), 


(ऐसा) हरगिज़ नहीं (है जैसा तुम्हारा ख़्याल है)! तुम्हें अंत में (अपना अंजाम) मालूम हो जाएगा। (4)


हरगिज़ नहीं!, अगर तुम पक्के यक़ीन के साथ जानते होते (तो दुनिया में मस्त होकर आख़िरत [परलोक] को इस तरह ना भूलते)।  (5)


तुम (अपनी लालच के नतीजे में) ज़रूर जह्न्नम की आग को देख लोगे,  (6)


फिर तुम उसे पक्के यक़ीन के साथ देख लोगे। (7)


फिर उस दिन तुमसे (अल्लाह की दी हुई) नेमतों [Pleasures] के बारे में ज़रूर पूछ्ताछ की जाएगी (कि तुमने उन्हें कहाँ कहाँ और कैसे कैसे खर्च किया था)।  (8)






सूरह 107 : अल माऊन
[मामूली चीज़ों से मदद, Common Kindnesses] 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


[ऐ रसूल], क्या आपने उस आदमी को देखा है जो (अंतिम) फ़ैसले के दिन (मिलने वाले इनाम या दंड) को मानने से इंकार करता है?  (1)


ये तो वही (कमबख़्त आदमी) है जो यतीम [अनाथ] को धक्के देता है, (और उनकी ज़रूरतों को नहीं देखता)  (2)


और मोहताजों/ ग़रीबों को खाना खिलाने के लिए (लोगों को) प्रोत्साहित नहीं करता।  (3)


तो बस अफ़सोस (और ख़राबी है) उन नमाज़ पढने वालों के लिए  (4)


जिनका दिल असल में नमाज़ों में नहीं लगता; (कि सही नीयत से नमाज़ नहीं पढते, और कुछ पढते तो हैं मगर उनके दिल इंसानियत और ग़रीबों की सेवा भाव से बिल्कुल ख़ाली हैं)  (5)


वे लोग (इबादत) में दिखलावा करते हैं,  (6)


और वे रोज़मर्रा की मामूली चीज़ें भी माँगने पर किसी को नहीं देते।  (7)

सूरह 109 : अल काफ़िरून
[काफ़िर लोग, The Disbelievers]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


[ऐ रसूल!] आप कह दें, “ऐ सच्चाई से इंकार करनेवाले (काफ़िरो) :  (1)


मैं उन (बुतों) की इबादत [worship] नहीं करता जिन्हें तुम पूजते हो,  (2)


और न तुम उस (ख़ुदा) की पूजा करने वाले हो जिसकी मैं इबादत करता हूं, (3)


और न (ही) मैं (आगे कभी) उनकी इबादत करने वाला हूं जिन (बुतों) की तुम पूजा करते हो,  (4)


और न तुम कभी उसकी पूजा करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ :  (5)


तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है, और मेरे लिए मेरा धर्म।"  (6)

सूरह 105 : अल-फ़ील
[हाथीवाले, The Elephant]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


[ऐ रसूल] क्या आपने नहीं देखा कि आपके रब ने हाथी वालों [यमन से आए अबरहा के लश्कर] के साथ क्या किया (जो काबा को तहस नहस करने के इरादे से आए थे)?  (1) 


क्या उस [अल्लाह] ने उनकी तमाम चालों को पूरी तरह से बेकार नहीं कर दिया था?  (2)


और उसने उन पर (हर तरफ़ से) चिड़ियों के झुंड के झुंड भेज दिये थे,  (3)


जो उन पर ठोस पकी मिट्टी की कंकरियाँ फेक रही थीं :  (4)


(अल्लाह ने) उन्हें ऐसा कर डाला जैसे चबाया हुआ भूसा!  (5)

सूरह 113 : अल-ख़लक़
[सुबह-सवेरे, Daybreak]
  


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


[ऐ रसूल], आप कह दें कि “मैं सुबह सवेरे के रब की पनाह [शरण] माँगता हूं  (1)


हर उस चीज़ की बुराई (और नुक़सान) से जो उसने पैदा की है,  (2)


और (ख़ास कर) अंधेरी रात की बुराई से जब उसका अंधेरा छा जाए,  (3)


और गाँठों [गिरहों, Knots] में फूँक मारनेवाली जादूगरनियों (और जादूगरों) की बुराई से,  (4)


और हर हसद-जलन [ईर्ष्या] करने वाले की बुराई से जब वह ईर्ष्या करे.”  (5)


सूरह 114 : अन-नास
[आदमी लोग, People]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
  
[ऐ रसूल] आप कह दें  कि  “मैं (सब) इंसानों के रब की पनाह [शरण] माँगता हूं,  (1)
                   
जो (सब) लोगों का मालिक [Controller] है,  (2)


सब लोगों का ख़ुदा है (जिसकी बंदगी की जाती है),  (3)  


(पनाह माँगता हूँ) चुपके-चुपके मन में बुराई की सोच डालनेवाले (शैतान) की बुराई से जो (अल्लाह को याद करने से) पीछे को छुप जाता है ------ (4)


जो लोगों के दिलों में बुराई की सोच बैठा देता है -------  (5)


चाहे वह (बुराई पर उकसाने वाला शैतान) जिन्नों में से हो (जो दिखायी न देता हो) या आदमियों में से.”  (6)


सूरह 112 : अल इख़्लास
[ईमान की शुद्धता, Purity of Faith] 


  
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


[ऐ रसूल] आप कह दें, “अल्लाह हर तरह से एक है, (1)     


अल्लाह ही ऐसा है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं [self sufficient], मगर सब अपनी ज़रूरतों के लिये उस पर निर्भर हैं (और वह हमेशा बाक़ी रहने वाला है [eternal],   (2) 


न उसका कोई बाल-बच्चा है, और न ही उसको किसी ने पैदा किया है.  (3)


और उसके जोड़ का कोई नहीं है [Unique].”  (4)


सूरह 53 : अन नज्म [चमकीला तारा, The Star (Sirius)]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

क़सम है चमकीले तारे की, जब वह डूबता है (1)

[ऐ मक्का वासियो!] तुम्हारे ही साथ रहनेवाले [मुहम्मह सल्ल॰] न रास्ता भूले हैं, न उन्हें कोई धोखा हुआ है; (2)

वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं बोलते हैं; (3) 

यह (क़ुरआन) तो बस एक "वही" [Revelation] है, जो (अल्लाह द्वारा) भेजी जाती है (4) 

उन्हें बड़ी शक्तियोंवाले (फ़रिश्ते जिब्रील) ने सिखाया था, (5)

जो ज़बरदस्त ताक़त रखता है. और (एक दिन) वह [फ़रिश्ता] सामने खड़ा था, (6)

क्षितिज [Horizon] के ऊँचे छोर पर,  (7) 

फिर वह उस (रसूल) की तरफ़ बढा ---- और नीचे उतर गया (8)

यहाँ तक कि वह (रसूल से) दो कमानों के बराबर की दूरी या उससे भी नज़दीक हो गया ----- (9)

इस तरह, अल्लाह को अपने बन्दे की ओर जो 'वही' अवतरित [Reveal] करनी थी, वह उतार दी गयी।  (10) 

जो कुछ उस (रसूल) ने देखा, उनके दिल को इसे समझने में कोई धोखा नहीं हुआ; (11)

फिर भी क्या तुम उनसे उस चीज़ पर झगड़ा करोगे, जिसे उन्होंने अपनी आँखों से देखा था?  (12)

(सच्चाई यह है कि) वह उस (फरिश्ते) को दूसरी बार भी (मेराज के सफ़र में) देख चुके हैं :  (13)

उस बेर के पेड़ [Lote tree] के किनारे जिसकी सीमा के आगे कोई नहीं जा सकता है ['सिदरतुल मुन्तहा'],  (14)

'जन्नतुल मावा' (सुकूनवाले बाग़) के नज़दीक, (15)

उस वक़्त बेर के पेड़ पर ऐसी अजीब चमक छाई हुई थी जिसकी न तो कल्पना की जा सकती है और न वर्णन! (16)

(रसूल की) निगाह न तो इधर उधर बहकी और न हद से आगे बढ़ी, (17)

और उन्होंने (वहाँ) अपने रब की कुछ बहुत बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखीं. (18)



[विश्वास न करनेवालो!], भला क्या तुमने “लात” और “उज़्ज़ा”(नामक देवियों) (19)

और तीसरी एक और (देवी) “मनात” पर विचार किया? (20)

क्या तुम्हारे लिए तो बेटे हों और अल्लाह के लिए बेटियाँ? (21)

तब तो यह बहुत अन्यायपूर्ण बँटवारा हुआ! (22)

सच तो यह है कि ये तो बस कुछ नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं, अल्लाह ने उनके लिए कोई सनद नहीं उतारी। असल में, वे [काफ़िर] लोग तो केवल अटकल के सहारे अपने मन की इच्छा के पीछे चल रहे हैं, हालाँकि उनके पास उनके रब की ओर से मार्गदर्शन आ चुका है। (23)

(क्या उनकी देवियाँ उनके लिए सिफ़ारिश कर सकती हैं?) या आदमी वह सब कुछ पा लेगा, जिसकी वह कामना करता है,  (24)

(नहीं!) क्योंकि इस दुनिया और आने वाली दुनिया का मालिक तो अल्लाह ही है?  (25)

आसमानों में कितने ही फ़रिश्ते हैं, मगर उनकी सिफ़ारिश कुछ काम नहीं आएगी; हाँ, यह तभी काम आ सकती है जब खुद अल्लाह जिसे चाहे इसके लिए अनुमति दे दे, और जिसकी बात को मान ले। (26) 

जो लोग आनेवाली दुनिया को नहीं मानते, वे फ़रिश्तों को देवियों के नाम से याद करते हैं, (27)


हालाँकि इस विषय में उन्हें कोई जानकारी नहीं जिसका कोई आधार हो : वे केवल अटकल के पीछे चलते है। हक़ीक़त यह है कि सच्चाई के मामले में केवल अंदाज़ा लगाने से कोई लाभ नहीं होता। (28)


अतः [ऐ रसूल!] आप ऐसे लोगों पर ध्यान न दें जो हमारी(उतारी हुई) नसीहतों से मुँह मोड़ता है, और जो इस सांसारिक जीवन के सिवा कुछ और चाहता ही नहीं। (29) 

ऐसे लोगों के ज्ञान की पहुँच बस यहीं तक है। तुम्हारा रब उसे बहुत अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो उसके मार्ग से भटक गया और कौन है जिसने सीधा मार्ग पा लिया।  (30)

अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है। तो जिन लोगों ने बुरे कर्म किए, वह उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा, और जिन लोगों ने नेक काम किए, उन्हें ख़ूब अच्छा बदला देगा; (31)

रहे वे लोग जो बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते हैं, हाँ अगर संयोगवश कोई छोटी-मोटी बुराई उनसे हो भी जाए, तो निश्चय ही तुम्हारा रब माफ़ करने में बहुत बड़ा है। वह तुम्हें उस समय से जानता है, जबकि उसने तुम्हें धरती से पैदा किया और जबकि तुम अपनी माओं के पेट में बच्चे के रूप में छुपे हुए थे। अतः अपने मन की पवित्रता का दावा न करो : वह अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता है।  (32)



[ऐ रसूल!], क्या आपने उस आदमी को देखा जिसने (सच्चाई से) मुँह मोड़ लिया : (33) 

उसने (भलाई के काम में) थोड़ा-सा ही ख़र्च किया और फिर हाथ रोक लिया. (34)

क्या उसके पास अनदेखी [Unseen] चीज़ों का ज्ञान है? क्या वह [आनेवाली दुनिया को] देख सकता है?  (35)

क्या उसे बताया नहीं गया है जो कुछ मूसा की (आसमानी) किताबों में लिखा हुआ था, (36) 

और इबराहीम की (किताबों में) भी, जिन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया :  (37)

कि कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ नहीं उठाएगा; (38)

और यह कि आदमी को (बदले में) बस वही कुछ मिलेगा जिसके लिए उसने कोशिश की होगी; (39)

और यह कि उसकी हर कोशिश देखी जाएगी  (40)

फिर अंत में (उसकी हर कोशिश का) उसे पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा; (41)

और यह कि अन्त में (सबको) आपके रब के पास पहुँचना है; (42)

और यह कि वही है जो हँसाता और रुलाता है; (43) 

और यह कि वही है जो मौत भी देता है और ज़िंदगी भी; (44)

और यह कि उसी ने नर और मादा के दो जोड़े पैदा किए, (45) 

(वह भी बस) एक बूँद [Sperm] से, जब वह (मादा के अंदर) टपकाई जाती है; (46)

और यह कि (मरने के बाद) दोबारा ज़िंदा उठाना भी उसी के ज़िम्मे है; (47) 

और यह कि वही है जो धनवान बनाता है और पूँजी को सुरक्षित बनाता है; (48)

और यह कि वही है जो “शेअरा” [Sirius, नाम का तारा जिसे अरब के लोग पूजते थे] का रब है (49)

और यह कि वही है जिसने पुराने ज़माने में आद की क़ौम को पूरी तरह से तबाह व बर्बाद कर दिया ; (50) 

और समूद को भी। फिर किसी को बाक़ी न छोड़ा। (51)

और उससे पहले नूह की क़ौम को भी (तबाह कर दिया), बेशक वे ज़ालिम और हद से बढे हुए थे। (52)

और (लूत के क़ौम की) जो बस्तियाँ औंधी पड़ी थीं, उनको भी उसी ने उठाकर नीचे दे पटका था,  (53) 

तो फिर (पत्थरों की बारिश ने) उन्हें ढँक लिया, और वह उन्हें ढँक कर ही रही; (54)

तो फिर [ऐ इंसान] तू अपने रब की कौन कौन सी नेमतों में संदेह करेगा? (55) 

यह (रसूल के द्वारा दी जानेवाली) एक चेतावनी है, ठीक वैसी ही चेतावनी [Reminder] जैसी पिछले ज़मानों में भी भेजी जा चुकी हैं। (56) 

(क़यामत की) वह घड़ी जो आनी ही है, निकट आ पहुँची है (57)

और अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो उस [क़यामत] को सामने ला खड़ा करे.   (58)

अब क्या तुम [लोग] इसी बात पर आश्चर्य करते हो; (59) 

और (उसका मज़ाक़ बनाकर) हँसते हो, जबकि तुम्हें रोना चाहिए!  (60)

तुम क्यों (घमंड में चूर होकर खेल-तमाशे में ऐसे मगन हो कि) इस ओर ध्यान नहीं देते?  (61)

अब (भी) झुक जाओ अल्लाह के सामने और उसकी बन्दगी करो।  (62)





सूरह 80 : अबसा [उनकी भौहें तन गयीं/ He Frowned]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


 (रसूल सल. नाराज़ हुए तो) उनकी भौहें तन गयीं, और (उन्होंने) मुँह फेर लिया  (1)

 जब उनके पास एक अंधा (आदमी) आया (जिसने दूसरों के साथ चल रही चर्चा के बीच में आपको टोक दिया) ----  (2)


 और आपको [ऐ रसूल] क्या मालूम, कि शायद (आपके ध्यान देने से) उसकी सोच में और निखार आ जाता,  (3)

या वह (आपकी) नसीहत की बातों पर विचार करता जो उसके लिए लाभकारी होती।  

वह जो अपने आपसे संतुष्ट आदमी है (जिसे लगता है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं!),  (5)

उसे (रास्ते पर लाने के लिए) तो आप उसके पीछे पड़े रहते हैं-------   (6)

हालाँकि अगर उसकी सोच में अच्छाई की भावना की कमी रहती है, तो इसके लिए [ऐ रसूल], आप दोषी नहीं होंगे ------ (7)

मगर वह जो आपके पास (स्वयं अच्छाई की तलाश में) पूरी लगन से आया,  (8)

और (अपने रब से) डरा हुआ (आया),  (9)

तो आपने उस पर ध्यान नहीं दिया।  (10)

(ऐ रसूल! ऐसे लोगों के पीछे पड़ने की ज़रूरत नहीं), हरगिज़ नहीं! बेशक यह (क़ुरआनी आयतें) तो नसीहत हैं,  (11)

जिसे उनलोगों को सीखना चाहिए, जो सचमुच यह चाहते हैं कि उन्हें सिखाया जाए,  (12)

(यह) प्रतिष्ठित और बहुत बाइज़्ज़त पन्नों में (लिखी हुई) है,  (13)

जिनका स्थान बहुत बुलंद है (और ये) बेहद पवित्र हैं,  (14)

ऐसे लिखने वालों के हाथों से (आगे पहुंची) हैं,  (15)

जो बड़े इज़्ज़तदार बुज़ुर्ग (और) नेकी करने वाले (फ़रिश्ते) हैं।  (16)


नष्ट हो जायें (वे सभी इंकार करनेवाले)! इंसान कैसा एहसान फ़रामोश है! (जो इतनी महान नेमत पाकर भी उसका मान नहीं रखता)  (17)

(वह ज़रा सोचे कि) अल्लाह उसे किस चीज़ से पैदा करता है?,  (18)

छोटी सी बूँद (वीर्य, sperm droplet) से पैदा किया, फिर साथ ही उसकी बनावट को ठीक ठीक अनुपात में (जींस, genes और लिंग के अनुसार) निर्धारित कर दिया,  (19)

फिर (ज़िंदगी जीने और अल्लाह तक पहुँचने का) रास्ता उसके लिए आसान कर दिया।  (20)

फिर उसे मौत दी, फिर उसे कब्र में (दफन) कर दिया,  (21)

फिर जब वह चाहेगा उसे (दोबारा ज़िंदा कर के) उठा खड़ा करेगा।  (22)

सचमुच इस (नाफरमान आदमी) ने अपना वह (कर्तव्य) पूरा नहीं किया जिसका उसे (अल्लाह ने) आदेश दिया था।  (23)

आदमी जो कुछ खाता है, उस पर ही विचार कर लें!  (24)

हम काफ़ी मात्रा में पानी बरसाते हैं  (25)

और फिर हम जमीन को चीर डालते है।  (26)

फिर हम इसमें अनाज उगाते हैं,  (27)

और अंगूर और तरकारी,  (28)

और जैतून और खजूर,  (29)

और घने घने बाग,  (30)

और (तरह तरह के) फल मेवे और (जानवरों का) चारा : (31)

ये सारी चीज़ें तुम और तुम्हारे पालतू जानवरों के लिए ज़िंदगी के मज़े लेने के हैं।  (32)


फिर जब कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ (क़यामत) आ जाएगी ---- (33)

उस दिन आदमी भाग खड़ा होगा अपने भाई से,  (34)

अपनी माँ और अपने बाप से,  (35)

अपनी पत्नी और अपने बच्चों से (भी) : (36)

उस दिन हर एक को अपनी-अपनी ही पड़ी होगी :   (37)

उस दिन कई चेहरे (ऐसे भी होंगे जो नूर से) चमक रहे होंगे,  (38)

(वह) मुस्कुराते हँसते (और) खुशियाँ मनाते होंगे,  (39)

मगर कई चेहरे ऐसे होंगे जिन पर उस दिन धूल पड़ी होगी,  (40)

(और) उन (चेहरों) पर कालिख छायी होगी :  (41)

यही लोग काफ़िर [सच्चाई का इंकार करनेवाले], मनमानी करनेवाले (और) दुराचारी  होंगे। (42)


सूरह 97 : अल क़द्र
[क़द्र की रात, The Night of Glory or Power]

  
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


बेशक हमने (पहली बार इस क़ुरआन) को क़द्र की रात में उतारा है।  [1]


और तुम्हें क्या मालूम (कि) क़द्र की रात क्या है?  [2]


क़द्र की रात (में की गयी इबादत) एक हज़ार महीनों से भी बेहतर है;  [3]


इस (रात) में फ़रिश्ते और रूह [जिबरील] अपने रब की आज्ञा से (अगले साल होनेवाले) हर काम के लिए (हुक्म लेकर) बार बार उतरते हैं;  [4]


सुबह पौ फटने तक वह रात पूरी तरह से शांति व सलामती [Peace] वाली है।  [5]



सूरह 91: अश शम्स
  [सूरज, The Sun]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


सुबह की रौशनी में चमकते हुए सूरज की क़सम [1]


और चाँद की क़सम जो उस (सूरज) के पीछे पीछे चले,  [2]


दिन की क़सम जब वह सूरज को तेज़ चमकता हुआ दिखाए  [3]


और रात की क़सम जब वह छा जाए और सूरज को छिपा ले, [4]


आसमान की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे (एक ब्रह्मांड के रूप में) बनाया  [5]


और ज़मीन की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे बिछा दिया,  [6]


और इंसानी जान की क़सम कि कैसे उसने उसे (ठीक-ठाक) कर के सँवार दिया  [7]


और फिर उस (अल्लाह) ने उसके दिल में वह बात भी डाल दी जो उसके लिए नैतिकता से गिरी हुई है, और वह बात भी जो बुराइयों से बचने की हैं!  [8]


जिसने अपनी आत्मा को (हर बुराई और गलत इच्छाओं से) बचाते हुए साफ़ सुथरा रखा, उसने कामयाबी पा ली  [9]


और जिसने अपनी जान को (गुनाहों के दलदल में) धँसा लिया, वह असफल हो गया।  [10]


"समूद" [Thamud] (की क़ौम) के लोगों ने अपने घमंड और क्रूरता में आकर अपने (रसूल सालेह अलै. को) झूठा कहा,  [11]


जब उनमें से सब से दुष्ट आदमी (उनके विरोध में) उठ खड़ा हुआ।  [12]


अल्लाह के रसूल ने उनलोगों से कहा: “(देखो!) अल्लाह की (इस) ऊँटनी को (हाथ न लगाना और इसको) पानी पीने के लिए खुला छोड़ दो,”  [13]


मगर उनलोगों ने उन्हें [रसूल को] झूठा कहा, और और उस (ऊँटनी) का पाँव काट (कर मार) डाला। तो उनके रब ने उनके अपराध की वजह से उनको तबाह-बर्बाद कर डाला, और सबको (जड़ से उखाड़ कर के) बराबर [levelled] कर दिया।  [14]


(याद रहे) अल्लाह को उन्हें दंड देने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई (और न तबाही के नतीजों का उसे कोई भय होता है)।  [15]


  सूरह 85 : अल बुरूज [तारों की राशियाँ /The Towering Constellations]


 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


तारों की राशियों [Constellations]] से भरे हुए आसमान की क़सम,  (1)

और उस [क़यामत के] दिन की क़सम जिसका वादा किया गया है,  (2)

क़सम है "गवाह" [अल्लाह] की और (लोगों के) उन (कर्मों) की, जिनके बारे में गवाही दी जाए,  (3)

कि बर्बाद हो गए खाई (खोदने) वाले, (4)

(जिन्होंने) ईंधन झोंक-झोंक कर आग (से भरी खाइयाँ) बनायी थीं!  (5)

जब वे उस (खाई के) किनारों पर बैठे थे, (6)

उस (ज़ुल्म को) देखने के लिए जो कुछ वे ईमानवालों के साथ कर रहे थे (यानी उन्हें आग में फेंक फेंक कर जला रहे थे)। (7)

उन्हें उन (ईमानवालों) से बस एक ही शिकायत थी, और वह था अल्लाह पर उनका विश्वास [ईमान] रखना, वह [अल्लाह], जो बहुत ही ताक़तवाला और सारी तारीफ़ों के योग्य है,  (8)

जिसके नियंत्रण [control] में आसमान और ज़मीन की (सारी) बादशाहत है : अल्लाह सारी चीज़ों पर गवाह है।  (9)

जिन लोगों ने ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को यातनाएं दीं, और बाद में (गुनाहों से) तौबा [Repent] नहीं की, तो उनके लिए जहन्नम [नरक] की यातना है, और उनको (वहाँ) आग में जलाया जाएगा।  (10)

मगर जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छा कर्म करते हैं, उनके लिए (जन्नत के) बाग़ [Gardens] हैं, जिनके नीचे से नहरें बह रही होंगी : वह बहुत बड़ी कामयाबी है। (11)

[ऐ रसूल], आपके रब की सज़ा सचमुच बड़ी कठोर होती है---- (12)

वही है जो लोगों में पहली बार जान डालता है, और वही उन्हें दोबारा ज़िंदा  करेगा ---- (13)

और वह (गुनाहों को) बड़ा माफ़ करनेवाला, (लोगों से) बहुत प्यार करनेवाला है। (14)

(समस्त दुनिया के) सिंहासन का मालिक [Lord of the Throne] है, बड़ी शान वाला है, (15)

वह जो कुछ भी करना चाहता है, उसे कर डालता है। (16)

क्या आपने उन लशकरों [Forces] की कहाँनियाँ नहीं सुनी हैं,  (17)

फ़िरऔन [Pharaoh] और समूद [Thamud] (के लशकरों) की? (18)

इसके बावजूद विश्वास न करनेवाले, (सच्चाई से) इंकार करने पर अड़े रहते  हैं। (19)

जबकि अल्लाह ने उन सबको अपने घेरे में ले रखा है। (20)

(उनके न मानने से क्या होगा) यह सचमुच बहुत गौरवशाली [Glorious] क़ुरआन है, (21)

जो (अल्लाह के पास) संजो कर रखी हुई स्लेट [Preserved Tablet] पर  (लिखी हुई) है। (22)


 सूरह 95 : अत् तीन
 [अंजीर, The Fig] 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


अंजीर [Fig] की क़सम और ज़ैतून [Olive] की क़सम, (1)

और सीना के (पहाड़, Mount Sinai) तूर की क़सम,  (2)


और इस अमन-शांति वाले शहर [मक्का] की क़सम,   (3)

बेशक हम इंसान को बेहतरीन (अनुपात और संतुलित) साँचे में ढाल कर पैदा करते हैं  (4)



फिर हम उसे नीचे वालों में सबसे गिरी हुई हालत [बुढ़ापे] में पहुँचा देते हैं,  (5)

सिवाए उनलोगों के जो ईमान लाए, और अच्छे कर्म करते रहे ---- तो उनके लिए कभी समाप्त न होने वाला इनाम है‌‌।  (6)

फिर उसके बाद, [ऐ इंसान!], किस चीज़ ने तुम्हें अंतिम फ़ैसले [इनाम और सज़ा] को मानने से इंकार करने पर मजबूर कर दिया?  (7)

क्या अल्लाह (जिसने सबको पैदा किया) सब हाकिमों से सबसे ज़बरदस्त (फ़ैसला करने वाला) हाकिम नहीं है? (बेशक है, जो बिना फ़ैसला किए नहीं छोडेगा!)  (8)


नोट :
                                                               
1: अंजीर और ज़ैतून के पेड़ ज़्यादातर फिलिस्तीन और सीरिया में पाए जाते हैं, जिनका संबंध ईसा अलै. से है.
2: सीना का पहाड़ तूर का संबंध मूसा अलै. से है.                                                                                                                                                                                                                                                                              
7: या कौन कह सकता था कि [ऐ रसूल], आप अंतिम फ़ैसले के बारे में झूठ बोल रहे हैं?


सूरह 106 : क़ुरैश


     [क़ुरैश का क़बीला, The Tribe of Quraysh] 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


(का’बा की देखरेख करने के कारण अल्लाह ने ऐसी इज़्ज़त बढायी) जिससे क़ुरैश [क़बीले के लोग] (अपने कारवाँ को लूटे जाने से) ख़ुद को सुरक्षित महसूस करने लगे, (1)


सुरक्षित कर दिया उन [क़ुरैश] के जाड़े (में यमन) और गर्मी (में सीरिया) को जाने वाले (व्यापारिक) कारवाँ को (जो उनकी ख़ुशहाली का ज़रिया थे)। (2)


अत: (इस करम के बदले) उन्हें चाहिये कि उस घर [का’बा] के रब की इबादत करें :  (3)


जिसने उनको भूख (की हालत) में खाना दिया, और (दुश्मनों के) डर से अमन-शांति दी।  (4)


नोट 1 : या, [अल्लाह ने ऐसा करम किया] ताकि वे अपनी परम्परा के अनुसार व्यापारिक कारवाँ में जाते रहें, और उसे बंद न करें.


 सूरह 101 :अल क़ारियह


[तोड़-फोड़ कर रख देनेवाली धमाकेदार टक्कर / The Crashing Blow]



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


(ज़मीन और आसमान की सारी कायनात को) "तोड़-फोड़ कर रख देनेवाली धमाकेदार टक्कर!" (1)


वह (हर चीज़ को) तोड़-फोड़ कर रख देनेवाली धमाकेदार टक्कर (की घटना) क्या है? (2)


और आपको क्या मालूम कि उस "धमाकेदार टक्कर" का मतलब क्या है?  (3)


(इसका मतलब क़यामत का) वह दिन है, जिस दिन (सारे) लोग (हश्र के मैदान में) फतिंगों [moth] की तरह इधर-उधर बिखरे हुए होंगे (4)


और पहाड़ रंग बिरंग की धुनी हुई ऊन [tufts of wool] की तरह हो जाएँगे,  (5)


तो वह आदमी जिसके (अच्छे कर्मों) के पल्ले भारी होंगे,  (6)


उसका जीवन मनपसंद खुशी में होगा,  (7)


मगर जिस आदमी के (अच्छे कर्मों) के पल्ले हल्के होंगे,  (8)


तो उसका ठिकाना “हाविया” [बिना तल का गहरा गड्ढा/ Bottomless Pit] होगा------  (9)


और आप क्या समझे कि “हाविया” क्या है?----  (10)


(जहन्नम की) एक सख़्त दहकती हुई आग (का बहुत ही गहरा गड्ढा) है!  (11)




























































































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