Middle Meccan Surah-4/ मध्यवर्ती मक्का काल-4 [617-620]
सूरह 17: अल-इसरा /बनी इसराईल [रात की यात्रा, The Night Journey]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
महानता है उस [अल्लाह] की, जिसने अपने बन्दे [मुहम्मद] को रात के समय पवित्र मस्जिद [काबा] से उस दूरवाली मस्जिद [अक़्सा] तक की यात्रा करायी, जिसके चारों तरफ़ की जगह को हमने बरकत [blessing] दी है, (और यह यात्रा इसलिए करायी) ताकि हम उन्हें अपनी कुछ निशानियाँ दिखा दें: सचमुच वही है जो सब कुछ सुनता, सब कुछ देखता है। (1)
(इससे पहले) हमने मूसा [Moses] को भी किताब [तोरात,Torah] दी थी, और उसे इसराईल की सन्तानों के लिए रास्ता दिखाने का ज़रिया बनाया था (और कहा था) कि "तुम मेरे सिवा किसी और को अपना रखवाला न बना लेना, (2)
ऐ नूह के साथ (नौका में सुरक्षित) बैठनेवालों की संतानों: सचमुच वह बड़ा ही शुक्र अदा करनेवाला बंदा था।” (3)
और (देखो!) हमने किताब [तोरात] में इसराईल की सन्तानों के सामने यह घोषणा कर दी थी कि, "दो बार तुम धरती पर ज़रूर फ़साद मचाओगे और बेहद घमंडी बन जाओगे।" (4)
फिर जब उन दोनों में से पहली चेतावनी के पूरा हो जाने का समय आ गया, तो [ऐ इसराईल की संतानों] हमने तुम्हारे ख़िलाफ़ अपने ऐसे बन्दों को भेज दिया जो लड़ाई लड़ने में बड़े सख़्त थे, और उन लोगों ने तुम्हारे घरों को तबाह कर डाला। (इस तरह) वह चेतावनी पूरी हो कर रही, (5)
मगर फिर, हमने तुम्हें मौक़ा दिया कि तुम अपने दुश्मन के मुक़ाबले में जीत सको। फिर हम ने तुम्हारे धन-दौलत और औलाद में बढोत्तरी कर दी, और तुम्हें बड़ी संख्यावाले लोगों का एक जत्था बना दिया---- (6)
"अगर तुम अच्छा काम करते हो, तो अपने ही भलाई के लिए करते हो, और अगर तुम बुरे काम करते हो, तो वह भी तुम्हारी ही (जान के) लिए बुरा होगा"---- और फिर, जब दूसरी चेतावनी के पूरा होने का समय आ गया (तो हमने तुम्हारे पास ऐसे दुश्मनों को भेज दिया ताकि) वे तुम्हारे चेहरे बिगाड़ डालें और मस्जिद (बैतुल मक़दिस) में जा घुसें जैसा कि पहली बार भी घुसे थे, और जिस चीज़ पर भी उनकी नज़र पड़ी उसे तोड़-फोड़ कर बर्बाद कर डालें। (7)
तुम्हारा रब अब भी तुम पर दया कर सकता है, लेकिन अगर तुम फिर उसी गुनाह की तरफ़ लौटे, तो हम भी (तुम्हारी सज़ा के साथ) लौट आएंगे : हमने उन लोगों के लिए जहन्नम को क़ैदख़ाना बना रखा है जो (हमारी चेतावनियों को) नहीं मानते। (8)
सचमुच यह क़ुरआन उस रास्ते की तरफ़ ले जाना चाहती है जो सबसे सीधा है। यह उन ईमान रखनेवालों को जो अच्छे कर्म करते रहते हैं, ख़ुशख़बरी सुनाती है कि उन्हें बहुत बड़ा इनाम मिलने वाला है, और (9)
चेतावनी देती है कि जो लोग आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] में विश्वास नहीं रखते, उनके लिए हमने दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है। (10)
तब भी, इंसान जिस तरह (अपने लिए) भलाई की दुआ माँगता है, (कभी-कभी अनजाने में) वह बुराई की भी दुआ माँगने लगता है : सचमुच इंसान बड़ा ही उतावला है! (11)
और (देखो!) हमने रात और दिन को दो निशानियों के रूप में बनाया, फिर रात को (आराम करने के लिए) अँधेरा कर दिया, और दिन के उजाले को देखने के लिए बनाया, ताकि तुम अपने रब की दी हुई रोज़ी ढूँढ सको, और यह भी जान सको कि कैसे वर्षों की गिनती की जाती है और उसका हिसाब रखा जाता है। हम ने हर चीज़ को विस्तार से साफ़-साफ़ बता दिया है। (12)
हमने हर आदमी की क़िस्मत उसकी गर्दन से बाँध दी है. क़यामत के दिन, उनमें हर एक लिए, हम उनके (कर्मों का) लेखा-जोखा निकाल लाएंगे, जिसको वे अपने सामने खुला हुआ देख लेंगे, (13)
(उनसे कहा जाएगा), "अपने (कर्मों का) लेखा-जोखा पढ़ ले! आज तू स्वयं ही अपना हिसाब लेने के लिए काफ़ी है।" (14)
जो कोई सीधा मार्ग अपनाता है, तो वह अपने ही भले के लिए अपनाता है; और जो कोई सीधे रास्ते से भटक गया, तो भटकने का नतीजा भी उसे ही भुगतना होगा। कोई भी आदमी किसी दूसरे (के कर्मों) का बोझ नहीं उठाएगा, और न ही हम (किसी क़ौम के) लोगों को उस वक़्त तक सज़ा देते हैं, जब तक कि उनके पास कोई रसूल नहीं भेज देते हैं। (15)
जब हम किसी बस्ती को बर्बाद करने का इरादा कर लेते हैं, तो वहाँ के बिगड़े हुए अमीर लोगों को (सुधर जाने का) आदेश देते हैं, मगर वे इसे मानने के बजाए इंकार करने में और भी जम जाते है, तब हमारा फ़ैसला पक्का हो जाता है, फिर हम उन्हें पूरी तरह से बर्बाद कर देते हैं। (16)
और (देखो!) हम नूह के बाद कितनी नस्लों को बर्बाद कर चुके हैं! तुम्हारा रब अपने बन्दों के गुनाहों को ख़ूब अच्छी तरह से जानता भी है और उन पर नज़र भी रखता है। (17)
अगर कोई (केवल) इसी दुनिया की छोटी सी ज़िंदगी (में भलाई) चाहता है, तो हम जिस किसी के लिए चाहते हैं, और जितना चाहते हैं, उसे इसी दुनिया में जल्दी से जल्दी कुछ दे देते हैं; मगर अंत में, उसके लिए हमने जहन्नम तैयार कर रखी है जिसमें जलने के लिए वह बदहाल और ठुकराया हुआ प्रवेश करेगा। (18)
लेकिन अगर कोई आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी चाहता है, और उसको पाने की कोशिश भी करता है, जैसा कि उसे करना चाहिए, तो एक सच्चे ईमानवाले के रूप में, उसकी कोशिशें क़बूल की जाएंगी। (19)
(ऊपर ज़िक्र किए गए) बादवाले [आख़िरत चाहनेवाले] और पहलेवाले [दुनिया चाहनेवाले], दोनों को ही आपके रब की तरफ़ से रोज़ी दी जाती है। [ऐ रसूल] आपके रब की तरफ़ से किसी को रोज़ी देने में कोई रोक-टोक नहीं होती है---- (20)
देखिए, कैसे (इस दुनिया में) हमने उनके कुछ लोगों को कुछ दूसरे लोगों से ज़्यादा दे रखा है---- मगर आख़िरत [Hereafter] के दर्जे सबसे बढ़कर हैं और सबसे बेहतर हैं। (21)
अल्लाह के साथ कोई दूसरा प्रभु न बनाओ, वरना बेइज़्ज़त और बेसहारा होकर रह जाओगे। (22)
आपके रब ने आदेश दिया है कि तुम उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो, और यह कि माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। अगर उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ, तो (अपना धीरज खोते हुए) उन्हें 'उफ़'! तक न कहो और न उनके साथ कठोरता से पेश आओ, बल्कि उनसे आदर के साथ बात किया करो, (23)
और नर्मी के साथ बर्ताव करते हुए उनके सामने विनम्रता से अपने आपको झुकाओ और कहो, "मेरे रब! जिस तरह उन्होंने बचपन में मुझे पाला-पोसा और बड़ा किया था, तू भी उन पर दया कर।" (24)
जो कुछ तुम्हारे दिल में है, उसे तुम्हारा रब अच्छी तरह से जानता है। अगर तुम अच्छे व नेक हुए, तो वह उन लोगों को (जिनसे अनजाने में छोटे-मोटे गुनाह हो जाते हैं) बहुत माफ़ करनेवाला है जो उसके सामने (गुनाहों से तौबा करते हुए) झुकते हैं। (25)
और (देखो!) अपने रिश्तेदारों को दो, जो उनका हक़ है, ज़रूरतमंदों और (बेसहारा) मुसाफ़िरों को भी दो--- और अपने माल को बेहूदा कामों पर न उड़ाओ: (26)
जो फ़ु़ज़ूलख़र्ची करते हैं, वह शैतान के भाई हैं, और शैतान अपने रब की नेमतों का कभी भी शुक्र अदा नहीं करता--- (27)
लेकिन अगर कभी ऐसा हो कि तुम ख़ुद अपनी रोज़ी की खोज में अपने रब से उम्मीद लगाए बैठे हो, (तुम्हारे पास कुछ नहीं है) और इस हालत में तुम्हें इन ज़रूरतमंदों से मुँह फेरना पड़े, तो उनसे कम से कम नर्मी से बात कर लिया करो। (28)
और (देखो!) अपना हाथ न तो इतना सिकोड़ लो कि गर्दन में बँध जाए (कि किसी को कुछ न दो) और न उसे बिल्कुल खुला छोड़ दो (कि सब कुछ लुटा बैठो), कि फिर तुम्हारी निंदा हो और तुम दुख में घिर जाओ। (29)
तुम्हारा रब जिसे चाहता है उसकी रोज़ी को बहुत बढ़ा देता है और जिसे चाहता है उसकी रोज़ी को घटा देता है : निस्संदेह वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता है और उन पर पूरी नज़र रखता है। (30)
और (देखो!) ग़रीबी के डर से अपने बच्चों की हत्या न करो---- हम उन्हें भी रोज़ी देंगे और तुम्हें भी---- उनकी हत्या करना बहुत ही बड़ा गुनाह है। (31)
और किसी शादीशुदा मर्द या औरत को (सेक्स के इरादे से) किसी दूसरी औरत या मर्द के नज़दीक तक भी नहीं जाना चाहिए: यह एक अश्लील कर्म और बड़ी बुराई का चलन है। (32)
किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहरा दिया है, सिवाए इसके कि जब (क़ानून ने हत्या करने का) अधिकार दिया हो : अगर किसी बेगुनाह की अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, तो उसके वारिस को हमने अधिकार दे दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), मगर उसे जान लेते समय ज़्यादती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि (अल्लाह ने) पहले ही उसकी मदद कर दी है। (33)
और (ख़र्च करने के इरादे से) अनाथों के माल के नज़दीक भी मत जाओ, सिवाए उसकी भलाई के इरादे से, जब तक कि वह अपनी जवानी को न पहुँच जाएं (और तुम उनकी अमानत उन्हें लौटा दो)। और अपनी प्रतिज्ञा [Pledge] पूरी किया करो: प्रतिज्ञा के विषय में तुम से अवश्य ही पूछा जाएगा। (34)
जब किसी पैमाने से नापकर दो, तो (कमी न करो और) पूरा नापा करो, और तौलते समय सटीक तराज़ू से सही तौलो: यह बेहतर और ईमानदार तरीक़ा है और इसका नतीजा भी अच्छा होगा। (35)
और (देखो!) जिस चीज़ के सच होने की तुम्हें जानकारी न हो, आँख बंद कर के उसकी पैरवी मत करने लगो: कान, आँख और दिल (बुद्धि), इन सब चीज़ों के बारे में तुम से पूछ्ताछ की जाएगी। (36)
और ज़मीन पर अकड़कर मत चलो : न तो तुम ज़मीन को फाड़ सकते हो और न लम्बाई में पहाड़ों की बराबरी कर सकते हो। (37)
यह सारे बुरे काम ऐसे हैं जो तुम्हारे रब को बेहद अप्रिय हैं। (38)
[ऐ रसूल] ये कुछ ज्ञान की बातें हैं जो आपके रब की तरफ़ से आप पर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजी गयी हैं : (लोगो! असल बात यह है कि) अल्लाह के साथ पूजने के लिए कोई दूसरा प्रभु न बना लो, वरना निंदा झेलते हुए और ठुकराए हुए, जहन्नम में फेंक दिए जाओगे! (39)
क्या! क्या तुम्हारे रब ने तुम लोगों को तो अपने करम से बेटे दिए हैं, और ख़ुद अपने लिए फ़रिश्तों को बेटियाँ बना लिया है? (अफ़सोस तुम्हारी सोच पर!) कितनी गम्भीर बात है जो तुम कह रहे हो! (40)
और (देखो!) हमने इस क़ुरआन में चीज़ों को तरह तरह से स्पष्ट कर के बता दिया है, ताकि लोग सचेत हों, और इस पर ध्यान दे सकें, मगर इन पर कोई असर न हुआ, उल्टा (सच्चाई से) उनकी नफ़रत में और भी बढ़ोत्तरी हो गयी। (41)
[ऐ रसूल] कह दें, "अगर अल्लाह के साथ दूसरे और भी ख़ुदा होते, जैसा कि ये कहते हैं, तब तो उन ख़ुदाओं ने (मुक़ाबले के लिए) सिंहासनवाले रब [अल्लाह] तक पहुँचने का मार्ग खोज लिया होता।" (42)
महिमावान है अल्लाह! वह कहीं बड़ा और बहुत ऊँचा है उन बातों से, जो ये कहते हैं! (43)
सातों आसमान और ज़मीन और जो कोई भी उनमें है, सब उसकी बड़ाई का बयान करते हैं। और कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो उसकी तारीफ़ों के साथ उसका गुणगान न करती हो, हालाँकि तुम उनकी तारीफ़ व गुणगान को समझ नहीं पाते : बेशक वह अत्यन्त सहनशील, और क्षमा करनेवाला है। (44)
[ऐ रसूल] जब आप क़ुरआन पढ़ कर सुनाते हैं, तो हम आपके और उन लोगों के बीच जो आख़िरत [परलोक/ Hereafter] को नहीं मानते, एक अनदेखे पर्दे की आड़ कर देते हैं। (45)
हम ने उनके दिलों पर भी पर्दे डाल दिए हैं जो उन्हें (क़ुरआन को) समझने से रोक देता है, और उनके कानों में बोझ डाल दिया है (कि वे कुछ सुन न सकें)। जब आप क़ुरआन में केवल अपने रब का ही ज़िक्र करते हैं, (और वे जब अपने बनाए हुए प्रभुओं का इसमें उल्लेख नहीं पाते), तो वे नफ़रत से अपनी पीठ फेरकर भाग खड़े होते हैं। (46)
जब वे आपकी बातें ध्यान से सुनते हैं, तो उनके सुनने का तरीक़ा क्या है, इसे हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं, और जब वे आपस में गुप्त बातें करते हैं (हम वह भी जानते है), और ये ज़ालिम (मुसलमानों से) कहते हैं, "तुम तो बस एक ऐसे आदमी के पीछे चल पड़े हो, जिस पर जादू कर दिया गया है।" (47)
[ऐ रसूल] देखिए, वे आपके बारे में कैसी कैसी बातें बनाते हैं! नतीजा यह हुआ कि वे भटक चुके हैं, और अब सीधा रास्ता नहीं पा सकते! (48)
वे यह भी कहते हैं, "क्या? जब हम (मरकर) गल-सड़ जाएंगे व हड्डियाँ और धूल होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें नए सिरे से पैदा कर के फिर से उठाया जाएगा?" (49)
कह दें, "(हाँ), यहाँ तक कि तुम (मरने के बाद) पत्थर या लोहे (जैसे ठोस) हो जाओ, (50)
या कोई और पदार्थ जिसे तुम समझते हो कि उसे जीवित करना बहुत मुश्किल होगा।" तब वे कहेंगे, "कौन हमें (ज़िंदा कर के) वापस लाएगा?" कह दें, "वही, जिसने तुम्हें पहली बार पैदा किया था।" तब वे आपके सामने अपने सिर मटकाने लगेंगे और कहेंगे, "अच्छा तो वह कब होगा?" कह दें, "हो सकता है कि बहुत जल्द ही हो: (51)
एक दिन आएगा जिस दिन अल्लाह तुम्हें बुलाएगा, और तुम उसकी तारीफ़ें करते हुए उसकी पुकार का जवाब भी दोगे, और समझोगे कि (दुनिया में) तुम बस थोड़ी ही देर ठहरे थे। (52)
[ऐ रसूल!] मेरे बन्दों से कह दें कि "(धर्म पर होनेवाली बहस में) जो बात कहो, ऐसी कहो जो बहुत अच्छी हो। शैतान उनके बीच झगड़े का बीज बोता है : सचमुच शैतान तो आदमी का खुला दुश्मन है।" (53)
तुम्हारा रब, तुम सब के बारे में सबसे अधिक जानता है : अगर वह चाहे तो तुम पर दया कर दे, और अगर वह चाहे तो तुम्हें दंड दे दे। और [ऐ रसूल] हमने आपको उनकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए नहीं भेजा है। (54)
आसमानों और ज़मीन में हर एक के बारे में तुम्हारा रब ख़ूब अच्छी तरह से जानता है। हमने कुछ पैग़म्बरों [Prophets] को दूसरे पैग़म्बरों से ज़्यादा दिया : हम ने दाऊद [David] को किताब [ज़बूर/ Psalms] दी थी। (55)
कह दें, "(संकट में) पुकार कर देखो उन सबको, जिनको तुम ने अल्लाह के सिवा अपना प्रभु बना रखा है: उनके पास कोई ताक़त नहीं है कि वे तुम्हारे कष्ट दूर कर सकें या तुम्हारी हालत बदल सकें।" (56)
वे लोग जिन [फ़रिश्तों] को पूजते हैं, वे तो ख़ुद अपने रब तक पहुँचने का रास्ता ढूँढते रहते हैं, यहाँ तक कि वे (फ़रिश्ते) भी जो अल्लाह से सबसे निकट हैं। वे उसकी दया दृष्टि की उम्मीद लगाए रखते हैं और उसकी सज़ा से डरते रहते हैं। तुम्हारे रब की सज़ा सचमुच बड़े डरने की चीज़ है: (57)
क़यामत के दिन से पहले ऐसा अवश्य होगा कि (शैतानियाँ करनेवालों की) जितनी बस्तियाँ होंगी, हम उन्हें तबाह कर देंगे या उसे कठोर दंड देंगे--- यह बात (अल्लाह की) किताब में लिखी जा चुकी है। (58)
हम अगर चाहें तो चमत्कारिक निशानियाँ (देकर) भेजने से हमें कोई नहीं रोक सकता, मगर हमें इस बात ने रोक रखा है कि पहले गुज़र चुके लोगों ने भी इन (निशानियों) को मानने से इंकार कर दिया था। हमने समूद के लोगों को स्पष्ट निशानी के रूप में एक ऊँटनी दी थी, इसके बावजूद उन लोगों ने (क़त्ल कर के) उसके साथ कितना बुरा सलूक किया। हम निशानियाँ तो केवल इसलिए भेजते हैं ताकि लोग उसके नतीजे से डरें। (59)
[ऐ रसूल!] हम आपको बता चुके हैं कि मनुष्य जाति के बारे में आपके रब को हर एक चीज़ की जानकारी है। (मेराज के मौक़े पर रात की यात्रा के दौरान) वह झलक जो हमने आपको दिखायी, वह तो लोगों के लिए केवल एक आज़माइश थी, इसी तरह (जहन्नम का) वह मन्हूस पेड़ [ज़क़ूम] था जिसका ज़िक्र क़ुरआन में किया गया है। हम उन्हें (तरह तरह से) सावधान करते रहते हैं, मगर उन पर कोई असर नहीं पड़ता, बल्कि इससे तो उनकी बदतमीज़ी और बढ़ती जाती है।"(60)
और जब ऐसा हुआ था कि हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ, तो वे सब सज्दे में झुक गए, मगर इबलीस नहीं झुका।" उसने कहा, "क्या मैं उसके सामने झुकूँ, जिसे तू ने मिट्टी से बनाया है?" (61)
और (फिर) कहने लगा, "ज़रा इस तुच्छ (इंसान) को देखो, कि तूने इस हस्ती को मुझ पर बड़ाई दी है! अगर तू मुझे क़यामत के दिन तक मुहलत दे दे, तो मैं बहुत थोड़े लोगों को छोड़कर उसकी सारी सन्तानों को बहका कर मार्ग से भटका दूँगा।" (62)
अल्लाह ने कहा, "चला जा यहाँ से! तेरा बदला [reward] तो जहन्नम होगा, और जो कोई भी तेरे पीछे चलेगा उन लोगों की सज़ा भी जहन्नम ही होगी ---- पूरी पूरी सज़ा! (63)
जिस किसी पर तेरा बस चले, जा उसे अपनी आवाज़ से बहका ले, उनपर हमला करने के लिए अपने सवार और अपने प्यादे तैयार कर ले, उनके माल और औलाद में भी उनके साथ हिस्सेदार बन जा, और उनसे (झूठे) वादे कर---मगर शैतान के वादे धोखे के सिवा कुछ नहीं होते---- (64)
मगर तुम्हारा कोई ज़ोर हमारे (असल) बंदों पर नहीं चल सकता : तेरा रब उनकी अच्छी तरह से देखभाल के लिए काफ़ी है।" (65)
(ऐ लोगो) यह तुम्हारा रब है जो तुम्हारे लिए समंदर में बड़े आराम से जहाज़ों को चलाता है, ताकि तुम उसके फ़ज़ल से रोज़ी तलाश कर सको : वह तुम्हारे हाल पर बेहद दयावान है। (66)
जब समंदर में तुम पर कोई मुसीबत आ जाती है, तो वे सब हस्तियाँ जिन्हें तुम पुकारते हो, बिना मदद के छोड़ जाती हैं, केवल एक अल्लाह की याद ही बाक़ी रह जाती है। मगर जब अल्लाह तुम्हें बचाकर सूखे में ले आता है तो फिर तुम उससे मुँह मोड़ लेते हो: सच्चाई यह है कि आदमी शुक्र अदा नहीं करता! (67)
क्या तुम इस बात से बेफ़िक्र हो कि एक बार थल पर आ जाने के बाद वह तुम्हें धरती के अंदर धँसा नहीं सकता या यह कि तुम पर पथराव करनेवाली आँधी नहीं भेज सकता है? और तब तो तुम्हें बचानेवाला कोई नहीं मिलेगा। (68)
या तुम कैसे इस बात का यक़ीन कर सकते हो कि वह [अल्लाह] तुम्हें समंदर में दोबारा नहीं ले जाएगा, और (यात्रा के दौरान अगर) फिर तुम पर समंदरी तूफ़ान भेज दे, और तुम्हारी नाशुक्री के कारण तुम्हें डूबो दे? वहाँ कोई न होगा जो हमारे ख़िलाफ़ तुम्हारी मदद कर सके। (69)
हमने आदम की सन्तान को इज़्ज़त दी है और उनके लिए थल औऱ जल में सवारी की व्यवस्था की है; हम ने उनके लिए अच्छी रोज़ी का इंतेज़ाम किया है, और अपने पैदा किए हुए बहुत-से प्राणियों के मुक़ाबले उन्हें बड़ाई दी है। (70)
उस दिन जब हम लोगों के हर एक गिरोह को उनके लीडरों के साथ बुलाएँगे, फिर जिन्हें उनके कर्मो का लेखा-जोखा उनके दाहिने हाथ में दिया जाएगा, वे इसे (ख़ुशी-ख़ुशी) पढ़ेंगे। और किसी के साथ तनिक भी अन्याय न होगा : (71)
जो लोग इस दुनिया में (बुद्धि से काम न लेते हुए) अंधे होकर रहे, वे आख़िरत [परलोक] में भी अंधे ही रहेंगे, बल्कि वे मार्ग से और भी अधिक भटके हुए होंगे। (72)
[ऐ रसूल!] विश्वास न करनेवाले इस कोशिश में लगे थे कि जो कुछ हम ने आपकी ओर 'वही' [revelation] द्वारा भेजा है, उससे आपको बहका कर दूर कर दें, ताकि आप कोई अलग ही 'वही' अपनी तरफ़ से गढ़ कर हमारे नाम के साथ जोड़ दें, और तब वे ख़ुश होकर आपको अपना दोस्त बना लें। (73)
अगर हम ने आपके क़दम मज़बूती से जमा न दिए होते, तो बहुत संभव था कि उनकी तरफ़ आपका झुकाव थोड़ा बहुत तो हो ही जाता। (74)
और अगर ऐसा हुआ होता, तो हम आपको इस दुनिया में भी दुगनी सज़ा देते, और मरने के बाद भी दुगनी सज़ा होती और तब आपको हमारे मुक़ाबले कोई भी मदद करनेवाला न मिलता। (75)
उन्होंने चाल चली कि इस भूभाग से आपके क़दम उखाड़ दें, ताकि आप यहाँ से निकल जाएं, (अगर ऐसा हो जाता तो) आपके बाद ये भी थोड़ी देर से ज़्यादा टिक नहीं पाते। (76)
हमारा तरीक़ा तो उन रसूलों के लिए भी ऐसा ही था, जिन्हें हमने आपसे पहले भेजा था, और आप हमारे तरीक़े में कभी कोई बदलाव न पाएंगे। (77)
अत: [ऐ रसूल] पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करें -- दोपहर सूरज के ढलने से लेकर रात के अंधेरे तक, और सुबह सवेरे क़ुरआन (सुबह की नमाज़) पढ़ा करें--- सुबह सवेरे क़ुरआन के पढ़ने को (फ़रिश्तों द्वारा) हमेशा ख़ास तौर से देखा जाता है--- (78)
और रात के कुछ हिस्से में (पिछ्ले पहर) नींद से उठ कर नमाज़ पढ़ा करें, यह आपके लिए अतिरिक्त इबादत होगी, ताकि आपका रब आपका दर्जा ऊँचा करते हुए आपको ‘पसंदीदा दर्जे ’[मक़ाम ए महमूद] तक पहुँचा दे। (79)
और दुआ में कहें, "मेरे रब! तू मुझे (जहाँ कहीं पहुँचा तो) सच्चाई के साथ पहुँचा, और (जहाँ कहीं से निकाल तो) सच्चाई के साथ बाहर निकाल, और अपनी ओर से मुझे ऐसी ताक़त दे जिसमें तेरी मदद हो।" (80)
कह दें, "(देखो!) सच्चाई सामने आ चुकी है और झूठ मिट गया है : और झूठ को एक दिन मिटना ही था।" (81)
हम क़ुरआन में जो (संदेश) भेजते हैं, वह ईमान रखनेवालों (की आत्मा के सभी दर्द) का मरहम (healing) और रहमत है, मगर जो लोग विश्वास नहीं करते, उनकेे लिए तो यह बस उनके घाटे को और बढ़ाने वाली चीज़ हैै। (82)
और आदमी पर जब हम अपनी ख़ास कृपा करते हैं तो वह घमंड में आ कर मुँह फेर लेता है, किन्तु जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है, तो (देखो!) एकदम निराश होे कर बैठ रहता है। (83)
कह दें, "हर एक आदमी चीज़ों को अपने ही ढंग से करता है, मगर तुम्हारा रब भली-भांति जानता है कि कौन सबसे सही बताए हुए मार्ग पर चल रहा है।" (84)
[ऐ रसूल], वे आपसे रूह के बारे में पूछते हैं। कह दें, "रूह तो मेरे रब के अधिकार-क्षेत्र का हिस्सा है।" आपको तो (सृष्टि के राज़ की) बहुत थोड़ी ही जानकारी दी गयी है। (85)
अगर हम चाहें, तो जो कुछ भी आपकी ओर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजा गया है, उसे वापस ले लें-----तो फिर आपको कोई भी न मिलेगा जो हमारे ख़िलाफ़ आपकी वकालत कर सके। (86)
लेकिन यह तो बस आपके रब की दयालुता है (कि वह ऐसा नहीं करता) : सच तो यह है कि उसका आप पर बड़ा करम है। (87)
कह दें, "अगर सारे इंसान और जिन्न साथ मिलकर भी चाहें कि इस क़ुरआन जैसी कोई चीज़ बना लाएँ, तो वे इस जैसी चीज़ नहीं बना सकते, चाहे वे एक-दूसरे की कितनी ही मदद कर लें।" (88)
हमने इस क़ुरआन में लोगों (को समझाने) के लिए हर तरह की मिसालें बार-बार बयान कर दी हैं, फिर भी अधिकतर लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े रहते हैं। (89)
वे कहते हैं, "[ऐ मुहम्मद] हम तब तक तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि तुम हमारे लिए धरती के अंदर से पानी का एक सोता [spring] न निकाल दो; (90)
या फिर तुम्हारा खजूरों और अंगूरों का एक बाग़ हो, और तुम उसके बीच से नहरें निकाल दो; (91)
या जैसा कि तुम्हारा दावा है, आसमान टुकड़े टुकड़े होकर हम पर गिर पड़े, या अल्लाह और फ़रिश्तों को हमारे आमने सामने ला खड़ा करो; (92)
या फिर तुम्हारे लिए सोने का एक महल पैदा हो जाए; या तुम आसमान में चढ़ जाओ--- तब भी, हम तुम्हारे चढ़ने पर विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि तुम एक सचमुच की (लिखी-लिखाई) किताब न उतार लाओ, जिसे हम पढ़ कर जाँच सकें।" कह दें, "महिमावान है मेरा रब! मैं एक (सच्चा) संदेश पहुंचाने वाले मामूली आदमी के सिवा और क्या हूँ?" (93)
जब लोगों के पास मार्ग दिखानेवाली चीज पहुंच गयी, तो उसपर विश्वास कर लेने से बस एक ही बात ने उन्हें रोके रखा था, कि वे कहते थे कि, "ऐसा कैसे हो सकता है कि अल्लाह ने एक आदमी को रसूल बनाकर भेज दिया?" (94)
कह दें, "अगर फ़रिश्ते ज़मीन पर (यहाँ के लोगों की तरह) बसे होते और आराम से चल फिर रहे होते, तो हम ने उनके पास आसमान से किसी फ़रिश्ते ही को रसूल बनाकर भेज दिया होता।" (95)
कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही गवाह के रूप में काफ़ी है। निश्चय ही वह अपने बन्दों को अच्छी तरह से जानता भी है, और उन पर नज़र भी रखता है।" (96)
जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए तो असल में वही सही रास्ता पानेवाला होता है, और वह जिसे भटकता छोड़ दे, तो उस (अल्लाह) के सिवा ऐसे लोगों को बचानेवाला कोई नहीं पाओगे। और क़यामत के दिन हम ऐसे लोगों को इकट्ठा करेंगे, औंधे मुँह पड़े हुए, इस हाल में कि वे अंधे, गूँगे और बहरे होंगे। जहन्नम उनके रहने का ठिकाना होगा। जब कभी (वहाँ की) आग धीमी पड़ने लगेगी, तो हम उसे और भी भड़का देंगे। (97)
यही बदला है जो उन्हें हमारी निशानियों को मानने से इंकार करने और ऐसा कहने के नतीजे में मिलेगा कि, "क्या! जब हम मर के (सड़-गल कर) हड्डी और चूरा हो जाएँगे, तो क्या हमें नए सिरे से पैदा करके उठाया जाएगा?"(98)
क्या वे नहीं समझते कि जिस अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, वह उस जैसी चीज़ दोबारा भी पैदा कर सकता है? उसने उनके लिए एक समय तय कर रखा है--- इस बात में कोई सन्देह नहीं है--- मगर इस पर भी शैतानी करनेवाले लोग हर चीज़ का इंकार करते हैं, सिवाए अविश्वास करने के। (99)
[ऐ रसूल] कह दें, "अगर कहीं मेरे रब की दयालुता के ख़ज़ाने तुम्हारे अधिकार में होते, तो ख़र्च हो जाने के भय से तुम उसे रोके ही रखते : वास्तव में इंसान है ही बड़ा तंग दिल! (100)
(बहुत पहले) हमने मूसा को नौ खुली निशानियाँ दी थीं--- इसराईल की सन्तान से पूछ लो. जब मूसा [Moses] (मिस्र के लोगों के पास) आया, तो फ़िरऔन [Pharaoh] ने उससे कहा, "ऐ मूसा! मुझे लगता है कि किसी ने तुम पर जादू कर दिया है।" (101)
मूसा ने कहा, "तुम अच्छी तरह से जानते हो कि स्पष्ट सबूत के तौर पर ऐसी निशानियाँ तो केवल आसमानों और ज़मीन का रब ही भेज सकता है। और ऐ फ़िरऔन! मुझे लगता है कि तुम्हारी बर्बादी बस आने ही वाली है।" (102)
अत: फ़िरऔन यह चाहता था कि उन (इसराईल की संतानों) को उस ज़मीन से उखाड़ फेंके, मगर हमने उसे और जो उसके साथ थे, सभी को (समंदर में) डुबा दिया, (103)
उसके मरने के बाद, हम ने इसराईल की सन्तान से कहा था, "तुम इस ज़मीन पर बस जाओ, और जब आख़िरत [परलोक/ Hereafter] का वादा पूरा हो जाने का समय आ जाएगा, तो हम तुम सबको इकट्ठा हाज़िर कर देंगे।"(104)
हम ने क़ुरआन को सच्चाई के साथ उतार भेजा, और सच्चाई के साथ ही वह आयी है--- और [ऐ रसूल] हम ने आपको केवल इसलिए भेजा ताकि आप (ईमान व अच्छे कर्मों के नतीजे की) ख़ुशखबरी सुना दें और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे दें---- (105)
यह (क़ुरआन) एक पढ़कर सुनाने की चीज़ है, जिसे हम ने अलग अलग हिस्सों में उतारा है, ताकि आप ठहर-ठहर कर इसे लोगों को पढ़कर सुना सकें; (यही वजह है कि) हम ने इसे थोड़ा-थोड़ा कर के उतारा है। (106)
[ऐ रसूल] कह दें, "तुम इस (क़ुरआन) पर विश्वास करो या न करो, मगर जिन लोगों को पिछली किताबों का ज्ञान दिया गया था, उनके सामने जब इसे पढ़कर सुनाया जाता है, तो वे मुँह के बल सज्दे में गिर पड़ते हैं, (107)
और पुकार उठते हैं, "महान है हमारा रब! हमारे रब का वादा इसीलिए था कि पूरा हो जाए।" (108)
वे रोते हुए चेहरों के बल गिर जाते हैं, और सच्चाई की बातें [क़ुरआन] उनकी विनम्रता [humility] को और बढ़ा देती है। (109)
(उनसे) कह दें, "तुम उसे 'अल्लाह' के नाम से पुकारो या 'रहम करनेवाले रब' [रहमान] के नाम से--- चाहे किसी भी नाम से उसे पुकारो, उसके सारे नाम अच्छे और ख़ूबीवाले हैं।" और [ऐ रसूल] अपनी नमाज़ न बहुत ऊँची आवाज़ में पढ़ें, और न बहुत धीमी आवाज़ में, बल्कि इन दोनों के बीच की आवाज़ को अपनाएं (110)
और कहें, "तारीफ़ें तो अल्लाह के लिए हैं, जिसकी न तो कोई औलाद है और न उसकी हुकूमत में कोई उसका सहभागी [partner] है। वह इतना कमज़ोर नहीं कि उसे अपने बचाव के लिए किसी सहारे की ज़रूरत हो। उसकी बेहिसाब महानता का बखान बुलंद आवाज़ में करें! ” (111)
सूरह 10 : यूनुस [Jonah]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰
ये आयतें उस किताब [क़ुरआन] की हैं, जो ज्ञान से भरी हुई है। (1)
क्या लोगों के लिए यह बड़े आश्चर्य की बात है कि हमने उन्हीं में से एक आदमी [मुहम्मद] पर अपनी आयतें उतारी हैं, ताकि वह लोगों को (इंकार और बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे दे, और जो लोग विश्वास रखते हैं, उन्हें ख़ुशख़बरी सुना दे कि उनके रब के यहाँ उन लोगों का ऊँचा दर्जा है? (तब भी) विश्वास न करनेवाले कहने लगे, "यह आदमी तो सचमुच एक जादूगर है।" (2)
तुम्हारा रब तो वह अल्लाह है, जिसने आसमानों और ज़मीन को छः दिनों में पैदा किया, फिर हर चीज़ की शासन-व्यवस्था चलाते हुए अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया; कोई नहीं है जो उसके सामने सिफ़ारिश कर सके, सिवाए उसके जिसको अल्लाह ने पहले से (बोलने की) इजाज़त दे रखी हो : यह है अल्लाह, तुम्हारा रब, अतः उसी की इबादत करो। तुम ऐसा कैसे कर सकते हो कि इस पर ध्यान ही न दो? (3)
उसी की पास तुम्हें (अंतत:) लौट कर जाना होगा---- यह अल्लाह की तरफ़ से पक्का वादा है। वही तो है जिसने पहली बार (तुम्हें) पैदा किया था, और वह (मरने के बाद) दोबारा भी वैसे ही (पैदा) करेगा, ताकि जिन लोगों ने विश्वास [ईमान] रखा और अच्छे कर्म किए, तो उनके किए का बदला उन्हें न्याय के साथ दे सके। विश्वास न करनेवाले लोगों के पीने के लिए खौलता हुआ पानी और दुख भरी यातना होगी, और ऐसा इसलिए होगा कि वे (सच्चाई को) मानने से इंकार करने के अपने फ़ैसले पर अड़े रहे? (4)
वही (अल्लाह) है जिसने सूरज को तेज़ चमकता हुआ बनाया और चाँद को (उससे) रौशन बनाया, औऱ (अपनी कक्षा में चलने के लिए) उसकी मंज़िलें [Phases] निश्चित कर दीं, ताकि तुम वर्षों की गिनती और समय का अंदाज़ा मालूम कर सको। अल्लाह ने यह सब चीज़ें बिना किसी सही मक़सद के यूँ ही नहीं बना दी; वह अपनी निशानियाँ उन लोगों को अच्छे ढंग से समझाता है जो बातों को समझते हैं। (5)
रात के पीछे दिन और दिन के पीछे रात के आने में, और जो कुछ अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन में पैदा किया, इन सब में उन लोगों के लिए सचमुच बड़ी निशानियाँ हैं जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं। (6)
जो लोग (मरने के बाद) हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, और इसी दुनिया की ज़िंदगी से ख़ुश और उसी पर संतुष्ट हो रहते हैं, और हमारी निशानियों की ओर कोई ध्यान नहीं देते, (7)
तो जो कुछ वे किया करते हैं, उसके नतीजे में ऐसे लोगों के रहने की जगह (जहन्नम की) आग होगी। (8)
रहे वे लोग जो ईमान [विश्वास] रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, तो उनका रब उनके ईमान की वजह से उनको सही रास्ता दिखाएगा। वे नेमतों के बाग़ [जन्नत] में होंगे और उनके क़दमों तले नहरें बह रही होंगी। (9)
उनकी दुआ वहाँ यह होगी, "महिमा है तेरी, ऐ अल्लाह (कि तू हर बुराई से पाक है!)", वे एक दूसरे से मिलने पर "सलाम" [सलामती हो] कहेंगे, और उनकी दुआओं का अन्त इस पर होगा, "सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जो सारे संसार का रब है।" (10)
और (देखो!) आदमी अपने फ़ायदे की चीज़ें हासिल करने के लिए जिस तरह जल्दी मचाता है, उसी तरह, अगर अल्लाह (उसके बुरे कर्मों के चलते) उसे नुक़सान पहुँचाने में जल्दबाज़ी करता, तो उसका समय कबका पूरा हो गया होता!, मगर जो लोग (मरने के बाद) हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, हम उन (सीमा तोड़नेवालों) को उनकी सरकशी [Excesses] में अंधों की तरह भटकता छोड़ देते हैं। (11)
आदमी पर जब कोई परेशानी आ जाती है, तो वह करवट लेटे या बैठे या खड़े (चाहे जिस हाल में हो), हमको पुकारने लग जाता है। मगर जैसे ही हम उससे उसकी तकलीफ़ दूर कर देते हैं तो वह इस तरह (मुंह मोड़े हुए) चल देता है मानो अपनी परेशानी दूर करने के लिए उसने कभी हमें पुकारा ही न था। इस तरह, ऐसे मर्यादाहीन लोगों की नज़र में उनके (बुरे) कर्म, सुहावने [Attractive] बना दिए गए हैं। (12)
तुम लोगों से पहले कितनी पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं, जब वे शैतानियाँ करने लगीं, तो (नतीजे में) हम ने उनको तबाह-बर्बाद कर दिया---- उनके रसूल उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए थे, मगर उन लोगों ने उन्हें मानने से इंकार कर दिया। तो (देखो!) अपराधियों को हम (उसके अपराध का) बदला इसी तरह दिया करते हैं। (13)
फिर उन (पीढ़ियों) के बाद, हमने ज़मीन पर तुम्हें उनका उत्तराधिकारी [successor] बनाया, ताकि हम देखें कि तुम कैसे कर्म करते हो। (14)
उन लोगों के सामने जब हमारी स्पष्ट आयतें पढ़कर सुनायी जाती हैं, तो वे लोग जो (मरने के बाद) हमसे मिलने की आशा नहीं रखते, कहते हैं, "यह नहीं, कोई दूसरी क़ुरआन ले आओ या इसमें कुछ फेर-बदल कर दो।" [ऐ रसूल!], कह दें, "मुझे यह अधिकार नहीं है कि मैं अपने मन से इसमें कोई फेर-बदल करूँ; मैं तो बस उसी के हुक्म के पीछे चलता हूँ, जो मुझ पर 'वही' [Inspiration] द्वारा उतारी जाती है, क्योंकि अगर मैं अपने रब के हुक्म को न मानूँ, तो मुझे एक बड़े ज़बरदस्त दिन की यातना का डर है।" (15)
कह दें, "अगर अल्लाह ऐसा चाहता, तो मैंने तुम्हें इस (क़ुरआन) को पढ़कर न सुनाया होता, और न ही वह तुम्हें इसकी जानकारी देता। आख़िर इस (क़ुरआन) के आने से पहले, मैं तुम्हारे बीच एक पूरी ज़िंदगी [40 साल] गुज़ार चुका हूँ। तो फिर तुम समझ-बूझ से काम क्यों नहीं लेते?" (16)
उस आदमी से ज़्यादा ज़ालिम कौन हो सकता है जो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़े या उसकी (उतारी हुई) आयतों को मानने से इंकार करे? (याद रहे) दोषी आदमी कभी फलता-फूलता नहीं है।" (17)
वे अल्लाह के साथ-साथ ऐसी चीज़ों को भी पूजते हैं, जो न उनको कोई नुक़सान पहुँचा सकती हैं और न कोई फ़ायदा, और वे कहते हैं, "ये अल्लाह के यहाँ हमारी सिफ़ारिश करनेवाले हैं।" [ऐ रसूल!] कह दें, "क्या तुम सोचते हो कि तुम अल्लाह को कोई ऐसी बात बता सकते हो, जिसके बारे में उसे पता है कि आसमानों और ज़मीन में इसका कोई अस्तित्व नहीं है? महिमावान है वह! अल्लाह के साथ वे जिन साझेदार-ख़ुदाओं को जोड़ते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊँचा है! (18)
शुरू में सभी इंसान एक ही समुदाय थे, मगर बाद में वे अलग-अलग हो गए। और अगर आपके रब की तरफ़ से पहले ही (फ़ैसला टाल देने की) बात तय न कर दी गयी होती, तो जिन बातों में उनके बीच मतभेद रहा है, उनका फ़ैसला (इसी दुनिया में) पहले ही हो चुका होता। (19)
वे कहते हैं, "उस (रसूल) पर उनके रब की तरफ़ से कोई चमत्कार वाली निशानी क्यों नहीं उतारी गयी?" तो [ऐ रसूल!] कह दें, "जिस चीज़ को हम देख नहीं सकते [ग़ैब/Unseen], उसे तो केवल अल्लाह ही जानता है, अत: इंतज़ार करो----- मैं भी (तुम्हारे साथ) इंतज़ार करता हूँ।" (20)
लोगों को किसी दु:ख-तकलीफ़ में पड़ जाने के बाद, जैसे ही हम अपनी दयालुता का मज़ा चखाते हैं, तो वे तुरंत हमारी उतारी हुई आयतों के ख़िलाफ़ चालबाज़ियाँ करने लग जाते है। [ऐ रसूल] आप कह दें, "(तुम्हारी चालों के जवाब में) अल्लाह योजना बनाने में ज़्यादा तेज़ है।" (याद रहे) हमारे फ़रिश्ते तुम्हारी सारी चालबाज़ियों को लिख लेते हैं। (21)
वही तो है जिसने तुम्हारे लिए थल और जल में यात्रा करना संभव बना दिया, फिर जब कभी ऐसा होता है कि तुम पानी के जहाज़ों में बैठ कर अनुकूल हवा के सहारे चलते हुए जहाज़ का मज़ा ले रहे होते हो, कि अचानक समंदर में तूफ़ान आ जाता है : उस पर सवार लोगों पर चारों तरफ़ से ऊँची-ऊँची लहरें आने लगती हैं और उन्हें लगने लगता है कि अब यहाँ से बच पाना मुश्किल है। तब उस समय वे केवल अल्लाह के प्रति अपनी आस्था दिखाते हुए दिल से उसे पुकारने लगते हैं, "अल्लाह! अगर तू हमें इस (मुसीबत) से बचा ले, तो हम ज़रूर तेरे आभारी [शुक्रगुज़ार] रहेंगे।" (22)
मगर जैसे ही वह उनको बचा लेता है, वैसे ही क्या देखते हैं कि ज़मीन पर (सुरक्षित) वापस आते ही, वे मर्यादा तोड़ने और हर सही चीज़ के ख़िलाफ़ फ़साद मचाने लग जाते हैं। ऐ लोगो! एक सीमा से अधिक जो तुम्हारा उपद्रवी आचरण है, वह ख़ुद तुम्हारे ही विरुद्ध पड़नेवाला है। इस दुनिया की ज़िंदगी के थोड़े मज़े ले लो; अंत में तो तुम्हें हमारे पास लौटकर आना ही होगा और तब हम तुम्हें बताएंगे जो कुछ तुम ने (दुनिया में) किया होगा। (23)
इस दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल ऐसी है : हमने आसमान से पानी बरसाया, तो उसके कारण धरती से उगनेवाली चीज़ें, जिनको आदमी और चौपाये खाते हैं, ख़ूब फली-फूलीं व घनी हो गयीं, मगर जब वह समय आया कि धरती ने (हरियाली के) सारे ज़ेवर पहन लिए, और (लहलहाते हुए खेतों व बाग़ों से) धरती सुंदर दिखायी देने लगी, और उसके मालिक समझने लगे कि अब फ़सल हमारे क़ाबू में आ गयी है, कि अचानक (उसकी बर्बादी का) हुक्म रात या दिन के समय आ पहुँचा। फिर हमने उसे एक उजड़ी-कटी हुई फ़सल में बदल कर रख दिया, मानो एक दिन पहले तक वहाँ कोई भरा-पूरा खेत ही न था। इस तरह, हम उन लोगों के लिए (सच्चाई की) निशानियाँ [आयतें] खोल खोल कर बताते हैं, जो सोच-विचार से काम लेते हैं। (24)
मगर अल्लाह (हर एक को) सलामती के घर [जन्नत] की तरफ़ बुलाता है, और जिसे चाहता है सीधे मार्ग पर लगा देता है; (25)
जिन लोगों ने अच्छा व नेक कर्म किया, उनको इसका बदला भी अच्छा ही मिलेगा, बल्कि इससे ज़्यादा ही मिलेगा। उनके मुँह न तो (बुराइयों से) काले पड़ेंगे और न ही उनपर शर्मिंदगी छाएगी: ऐसे ही लोग हैं जन्नत में रहनेवाले, और वे हमेशा वहीं रहेंगे। (26)
रहे वे लोग जिन्होंने बुरे कर्म किए, तो हर एक बुराई का बदला भी ठीक वैसा ही होगा, और बेइज़्ज़ती उन्हें चारों ओर से घेर लेगी-----अल्लाह से उन्हें बचानेवाला कोई न होगा। ऐसा लगेगा मानो उनके चहरों पर अँधेरी रात की पर्तें चढ़ा दी गयी हैं। ये वे लोग हैं जो (जहन्नम की) आग में रहनेवाले हैं, और वहीं वे हमेशा रहेंगे। (27)
उस दिन हम उन सबको एक साथ इकट्ठा करेंगे, फिर जिन लोगों ने अल्लाह के साथ (उसकी खुदायी में) साझेदार [Partner] ठहरा रखे हैं, उनसे कहेंगे, "ज़रा अपनी जगह ठहरो, तुम भी और तुम्हारे बनाए हुए (ख़ुदा के) साझेदार [Partner-gods] भी।" फिर हम उन्हें अलग-अलग (समूह में) कर देंगे, और तब उनके ठहराए हुए (ख़ुदा के) साझेदार कहेंगे, "हम वह नहीं हैं जिसको तुम पूजते थे--- (28)
"हमारे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही एक गवाह काफ़ी है------ हमें तो कुछ पता ही नहीं था कि तुम हमें पूजते हो।" (29)
हर आदमी उसी वक़्त समझ जाएगा कि जो कुछ वह पहले किया करता था, उसकी हक़ीक़त क्या थी। उन्हें अल्लाह के पास लौट कर जाना होगा, जो कि असली रब है, और उनके गढ़े हुए (ख़ुदा) उनको छोड़कर गुम हो जाएंगे। (30)
[ऐ रसूल!] उनसे पूछें, "कौन है जो तुम्हें आसमानों और ज़मीन से रोज़ी देता है?, कौन है जिसके क़ब्ज़े में तुम्हारा सुनना और देखना है? वह कौन है जो ज़िंदा को मुर्दा से निकालता है और मुर्दा को ज़िंदा से निकालता है, और हर काम की व्यवस्था कौन करता है?" इस पर वे ज़रूर कह उठेंगे कि, "अल्लाह!" तब कहें, "तो फिर तुम (सच्चाई के इंकार से) डरते क्यों नहीं?" (31)
यही अल्लाह है जो तुम्हारा रब है, और यही सच्चाई है। फिर सच्चाई के अलावा क्या बाक़ी बचता है, सिवाए रास्ता भटकने के? तो फिर तुम (सच्चाई से) मुँह फेर कर किधर चले जा रहे हो? (32)
इस तरह से, जिन लोगों ने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया, उनके बारे में आपके रब की बात सही साबित हो गयी----- वे विश्वास करनेवाले नहीं हैं। (33)
उनसे पूछिए, "क्या तुम्हारे ठहराए हुए (खुदा के) साझेदारों [Partner-gods] में कोई है जो सृष्टि की रचना कर सकता हो, और फिर अंत में, (मरने के बाद) दोबारा उन्हें ज़िंदा कर सकता हो?" बता दें, "यह तो अल्लाह है जिसने पहले पहल सृष्टि की रचना की, और वही इसको दोबारा ज़िंदा करेगा, तो देखो! तुम्हारी उल्टी चाल तुम्हें कहाँ लिए जा रही है?" (34)
उनसे पूछिए, "क्या तुम्हारे ठहराए हुए (खुदा के) साझेदारों [Partner-gods] में कोई है जो सच्चाई का रास्ता दिखा सकता हो?", आप कहें, "अल्लाह सच्चाई का रास्ता दिखाता है। तो फिर जो सच्चाई का रास्ता दिखाता हो, क्या वह इस बात का ज़्यादा हक़दार है कि उसकी बात मानी जाए, या फिर उसकी जो ख़ुद ही सही रास्ता न पा सके जब तक कि उसे कोई रास्ता न बता दे? (अफ़सोस तुम पर!) तुम्हें क्या हो गया है? तुम कैसे फ़ैसले कर रहे हो?" (35)
उनमें से अधिकतर लोग तो ऐसे हैं जो केवल (ग़लत) धारणाओं के पीछे चलते हैं, मगर सच्चाई के मुक़ाबले में (झूठी) धारणाओं का तो कोई मूल्य हो ही नहीं सकता : जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है। (36)
ऐसा नहीं हो सकता कि अल्लाह के सिवा किसी और ने इस क़ुरआन को अपने मन से गढ़ लिया हो। यह तो उन (आसमानी किताबों) की पुष्टि करती है जो इससे पहले उतारी जा चुकी हैं, और (अल्लाह की) किताब को विस्तार से साफ़-साफ़ बताती है----इस बारे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए -----यह सारे संसारों के रब की तरफ़ से है। (37)
क्या फिर भी वे कहते हैं, "इस आदमी [मोहम्मद] ने ख़ुद ही इस (किताब) को लिख लिया है?", कह दें, "अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो इस जैसी एक ही सुरह लिख लाओ, और इस काम में मदद के लिए अल्लाह को छोड़कर, जिस किसी को बुलाना चाहो, बुला लो।" (38)
लेकिन जिस बात को वे ठीक ढंग से समझ नहीं सकते, उसे मानने से इंकार कर रहे हैं----असल में, इसमें बतायी गयीं भविष्य की बातें अभी उनके सामने नहीं आयी हैं। इसी तरह, इनसे पहले गुज़र चुके लोगों ने भी विश्वास करने से इंकार किया था---- फिर देख लो, उन शैतानियाँ करनेवालों का अंत कैसा हुआ! (39)
[ऐ रसूल!] उनमें से कुछ लोग इस (क़ुरआन) पर विश्वास [ईमान] रखते हैं और कुछ लोग ऐसे हैं जो ईमान नहीं रखते : आपका रब उन लोगों को अच्छी तरह जानता है जो फ़साद मचाते हैं। (40)
अगर वे आप पर (समझाने के बावजूद) विश्वास न करें, तो [ऐ रसूल!] आप कह दें, "मेरा कर्म मेरे लिए है, और तुम्हारा कर्म तुम्हारे लिए। जो कुछ मैं करता हूँ उसके लिए तुम ज़िम्मेदार नहीं हो, और जो कुछ तुम करते हो उसकी ज़िम्मेदारी मुझ पर नहीं है।" (41)
उनमें से कुछ हैं जो आपकी सुनते तो हैं : मगर क्या आप किसी बहरे को सुना सकते हैं, अगर वह अपनी समझ-बूझ का इस्तेमाल नहीं करे? (42)
और उनमें से कुछ ऐसे हैं, जो आपकी ओर देखते हैं : मगर क्या आप अंधों को रास्ता दिखा सकते हैं, अगर वह देखें ही नहीं? (43)
सच्चाई यह है कि अल्लाह लोगों पर ज़रा भी ज़ुल्म नहीं करता (कि उन्हें ज़बरदस्ती बहरा या अंधा बना दे)---- असल में वही हैं जो अपने आप पर ज़ुल्म करते हैं। (44)
उस (क़यामत के) दिन जब वह उन सबको (हश्र के मैदान में) इकट्ठा करेगा, तो ऐसा लगेगा जैसे वे (इस दुनिया में) एक घड़ी से ज़्यादा नहीं ठहरे थे, और वे एक-दूसरे को पहचान लेंगे। वे लोग बड़े घाटे में रहेंगे, जिन्होंने (आख़िरत में) अल्लाह से होनेवाली मुलाक़ात को मानने से इंकार किया, क्योंकि वे सही मार्ग पर नहीं चलते थे। (45)
[ऐ रसूल!] जिन सज़ाओं की धमकी हम ने उन (मक्का के विश्वास न करनेवालों) को दे रखी है, उनमें से कुछ सज़ाओं को हम चाहें तो (आपके जीवन में ही) दिखा दें या हो सकता है कि (यातना आने से) पहले ही आपकी मौत आ जाए, लेकिन बहरहाल, उन्हें तो हमारी ओर लौटकर आना ही है: जो कुछ वे करते हैं, उस पर अल्लाह गवाह है। (46)
हर समुदाय [उम्मत] के लिए एक रसूल भेजा गया है, और (क़यामत के दिन) जब उनके रसूल (गवाही देने के लिए) आ जाएंगे, तो उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा; और उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा। (47)
विश्वास न करनेवाले पूछते हैं, "अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो यह बताओ कि (अल्लाह की ओर से यातना आने का) वादा कब पूरा होगा?" (48)
[ऐ रसूल!] उनसे कह दें, "मुझे जो नुक़सान या फ़ायदा पहुंचता है, उसका नियंत्रण मैं नहीं करता, बल्कि अल्लाह जो चाहता है वही होता है। हर एक समुदाय के लिए एक नियत समय निश्चित है, और जब वह समय आ जाता है, तो घड़ी भर न तो उसमें देरी हो सकती है, और न घड़ी भर यह पहले हो सकता है।" (49)
कह दें, "ज़रा सोचो : अगर उसकी भेजी हुई यातना तुम्हारे पास (अचानक) आ जाए, रात या दिन के किसी समय, तो वह आख़िर (यातना का) कौन सा भाग होगा जिसे ये अपराधी लोग चाहते हैं कि वह जल्दी आ जाए? (50)
क्या जब वह (यातना) आ ही जाएगी, तब विश्वास करोगे? (उस समय तो कहा जाएगा), क्या अब (विश्वास कर लिया?), जबकि (पहले) तो तुम इसी के लिए बहुत जल्दी मचा रहे थे!" (51)
फिर शैतानियाँ करनेवालों से कहा जाएगा, "अब हमेशा होनेवाली यातना का मज़ा चख़ो! तुम्हें किसी और चीज़ के लिए बदला क्यों दिया जाएगा, वह तो उन्हीं (बुरे) कर्मों के लिए होगा जैसा कुछ तुम करते रहे थे?" (52)
[ऐ रसूल!] वे आप से पूछते हैं, "क्या यह सच है?", कह दें, "हाँ, मेरे रब की क़सम! यह बिल्कुल सच है, और तुम उससे बच कर निकल नहीं सकते।" (53)
(आनेवाली यातना इतनी भयानक होगी कि) हर वह आदमी जिसने ज़ुल्म व शैतानियाँ की हैं, अगर उसके पास धरती की सारी दौलत आ जाए, तो वह अपनी जान के बदले उसे देने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो जाएगा। जब वे यातना को देखेंगे तो मन ही मन पछताएँगे, मगर उनके बीच न्याय के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा और उनपर कोई अत्याचार नहीं होगा। (54)
याद रखो! आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब असल में अल्लाह का ही है: अल्लाह का वादा सच्चा है, लेकिन ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जो यह बात नहीं जानते। (55)
वही है जो ज़िंदगी भी देता है और मौत भी, और उसी के पास (अंत में) तुम सब को लौट कर जाना होगा। (56)
ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से उपदेश [क़ुरआन] आ गया है, जो (तुम्हारे) दिलों के रोग की दवा है, और उन लोगों के लिए रास्ता दिखानेवाली व रहमत [Mercy] है, जो इस पर यक़ीन रखते हैं। (57)
[ऐ रसूल!] कह दें, "यह अल्लाह का फ़ज़ल [Grace] और उसकी रहमत है, और इस पर ज़रूर ख़ुशी मनाना चाहिए : यह उन चीज़ों से कहीं बेहतर है, जिसे वे (दुनिया में) जमा करते रहते हैं।" (58)
कह दें, "जो रोज़ी अल्लाह ने तुम्हारे लिए पैदा की है, उसके बारे में ज़रा सोचो, उसमें से कुछ को तुमने (अपने मन से) हराम [अवैध] और कुछ को हलाल [वैध] समझ लिया है।" कहें, "क्या अल्लाह ने तुम्हें ऐसा करने की अनुमति दी है, या तुम अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ रहे हो?" (59)
जो लोग अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ते हैं, उन्होंने क़यामत के दिन को क्या समझ रखा है (क्या वहाँ होनेवाले हिसाब-किताब की ख़बर नहीं)? सच यह है कि अल्लाह तो लोगों के लिए बड़ा फ़ज़ल करनेवाला है, मगर उनमें ज़्यादातर ऐसे हैं जो उसका शुक्र अदा नहीं करते। (60)
[ऐ रसूल!] आप चाहे किसी मामले में लगे हुए हों, और क़ुरआन की कोई सी भी आयत पढ़कर सुनाते हों, और (लोगो) चाहे तुम कोई भी काम कर रहे हो, हम तुम्हें उन कामों को करते हुए देख रहे होते हैं। यहाँ तक कि ज़मीन या आसमान में कोई चीज़ ऐसी नहीं जो आपके रब की नज़र से ओझल हो, कण भर हो या उससे कोई चीज़ छोटी हो या बड़ी : सब कुछ एक स्पष्ट किताब में लिखा हुआ है। (61)
मगर वे लोग जो अल्लाह की तरफ़ होते हैं, उन्हें न तो कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे। (62)
ये वह लोग हैं जिन्होंने विश्वास कर लिया [ईमान] और ज़िंदगी ऐसे गुज़ारी कि बुराइयों से बचते रहे, (63)
उनके लिए इस दुनिया में भी (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी है और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में भी------और अल्लाह के किए हुए वादे कभी बदलनेवाले नहीं---- यही असल में सबसे बड़ी कामयाबी है। (64)
[ऐ रसूल!] आप उन [इंकार करनेवालों] की बातों से दुखी न हो जाएं, सारी ताक़त व इज़्ज़त अल्लाह की ही है; वह सब कुछ सुनता है, सब जानता है; (65)
याद रखो! आसमानों और ज़मीन में जितने भी जीव हैं, सब अल्लाह के हुक्म के ग़ुलाम हैं। जो लोग अल्लाह को छोड़कर दूसरों को पुकारते हैं, वे सचमुच किसी ख़ुदा के साझेदार [Partner-gods] को मानते हुए उनके पीछे नहीं चलते; बल्कि वे तो बस अपनी मनगढंत मान्यताओं के पीछे चल रहे हैं और झूठ बक रहे हैं। (66)
वही है जिसने तुम्हारे लिए रात का समय बनाया ताकि तुम उसमें आराम कर सको, और दिन को उजाला बनाया ताकि तुम देख सको------ सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ है, जो (सच्चाई को) सुनते हैं। (67)
वे कहते हैं, "अल्लाह औलाद रखता है!" महान है वह! वह (अपने काम के लिए) किसी पर भी निर्भर नहीं; आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ उसी की है, उसी के लिए है। इस बात को कहने के लिए तुम्हारे पास कोई प्रमाण [Authority] नहीं। तुम्हारी यह मजाल कि तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहते हो, जिसकी तुम्हें कोई जानकारी नहीं? (68)
[ऐ रसूल!] कह दें, "जो लोग अल्लाह के बारे में अपने मन से झूठी बातें बनाते हैं, वे कभी कामयाबी नहीं पानेवाले।" (69)
उनके पास इस दुनिया का थोड़ा सुख हो सकता है, मगर फिर तो उन्हें हमारे पास लौट कर आना ही है. फिर जो (सच्चाई में) विश्वास न करने पर अड़े होंगे, उसके बदले में हम उन्हें कठोर सज़ा का मज़ा चखाएँगे। (70)
[ऐ रसूल!] आप उन्हें नूह [Noah] की कहानी सुनाएं। जब उसने अपनी क़ौम से कहा था, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम लोगों के बीच (मार्गदर्शन के लिए) मेरा मौजूद होना और अल्लाह की निशानियों को तुम्हें याद दिलाना, अगर तुम्हें भारी पड़ता है, तो फिर मेरा भरोसा केवल अल्लाह पर है। मेरे ख़िलाफ़ जो भी कार्रवाई करना चाहते हो उसे आपस में तय कर लो, तुम और तुम्हारे ठहराए हुए ख़ुदा के साझेदारों [Partner-gods] ----- और इस बात में सकुचाने या छिपाने की ज़रूरत नहीं है ---- फिर मेरे ख़िलाफ़ जो कुछ करने का फ़ैसला किया हो, कर डालो और मुझे कोई मुहलत न दो।" (71)
फिर भी तुम ने अगर मुँह मोड़े रखा, तो मैं (मार्गदर्शन देने के लिए) तुम से कोई मज़दूरी (इनाम) तो नहीं माँगता; मेरा इनाम तो बस अल्लाह के पास है, और मुझे यह आदेश मिला है कि मैं उन लोगों में शामिल रहूँ जो अल्लाह पर पूरी भक्ति से समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (72)
मगर उन लोगों ने नूह को मानने से इंकार कर दिया। हमने नूह को और उन लोगों को, जो उनके साथ नौका में सवार थे, (तूफ़ान में डूबने से) बचा लिया और उन्हें ज़मीन पर फिर से बसाया; और उन लोगों को डुबा दिया, जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया था----- तो देख लो, जिन्हें पहले ही (इंकार के नतीजे से) सावधान किया गया था, उनका क्या अंजाम हुआ! (73)
फिर उसके बाद हम ने बहुत सारे रसूलों को उनकी क़ौम के लोगों के पास भेजा जो स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए थे, मगर जिस चीज़ को वे पहले ही मानने से इंकार कर चुके थे, उस बात में (निशानियाँ देखकर भी) वे विश्वास करनेवाले न थे : हम इसी तरह, हद से ज़्यादा फ़साद करनेवालों कॆ दिलों को मुहर लगा कर बंद [seal] कर देते हैं। (74)
फिर उनके बाद हमने मूसा [Moses] और हारून [Aaron] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके दरबारियों के पास भेजा, मगर वे बड़े घमंड से पेश आए---- वे शैतान लोग थे। (75)
हमारी तरफ़ से जब सच्चाई उनके सामने आ गयी, तो वे कहने लगे, "यह तो साफ़ तौर से जादू है।" (76)
मूसा ने कहा, "क्या यही तुम्हारे विचार हैं सच्चाई के बारे में, जबकि सच्चाई अब तुम्हारे सामने आ चुकी है? क्या यह कोई जादू है? जादूगर तो कभी फलते-फूलते नहीं हैं।" (77)
उन लोगों ने कहा, "क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि हमें उस दीन [Faith] से हटा दे जिसपर हमने अपना बाप-दादा को चलते हुए पाया है, और इस सरज़मीन पर तुम दोनों भाइयों की महानता स्थापित हो जाए? हम तो कभी भी तुम में विश्वास करनेवाले नहीं हैं।" (78)
और फ़िरऔन ने कहा, "हर क़ाबिल जादूगर को मेरे पास ले आओ।" (79)
फिर जब जादूगर आ गए, (और मुक़ाबला शुरू हुआ) तो मूसा ने उनसे कहा, "(अपने दाँव में) जो कुछ तुम फेंकना चाहते हो, फेंको।" (80)
फिर जब जादूगरों ने (अपना दाँव) फेंका, तो मूसा ने कहा, "तुम जो कुछ भी ले कर आए हो, वह तो जादू है। अल्लाह अभी दिखा देगा कि यह सब बनावटी है। अल्लाह शरारत करनेवालों के काम को कभी कामयाब नहीं होने देता; (81)
"अल्लाह सच्चाई को अपने हुक्म से सच कर दिखाता है, चाहे शैतानी करनेवाले उससे कितनी ही नफ़रत करें।" (82)
मगर मूसा की बात में किसी ने भी विश्वास न किया, सिवाए उसकी क़ौम के थोड़े से लोगों के, क्योंकि उन्हें डर था कि फ़िरऔन और उनके सरदार उन पर जुल्म ढाएंगे: फ़िरऔन था भी बड़ा दबंग, उसने धरती पर बहुत सिर उठा रखा था, औऱ वह बेहद ज़्यादती करनेवाला था। (83)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अगर तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो और उसकी आज्ञा मानते हुए उसी के सामने झुकते हो, तो तुम्हें उसी पर अपना भरोसा रखना चाहिए।" (84)
इस पर वे बोले, "हमने अल्लाह पर ही भरोसा किया है। ऐ हमारे रब! तू हमें ज़ालिम लोगों के हाथों आज़माइश में न डाल (कि हम उस ज़ुल्म के मुक़ाबले में कोई कमज़ोरी दिखाएं) (85)
"हमें अपनी रहमत [दयालुता] से उन लोगों से बचा ले, जो (तेरे संदेशों को) मानने से इंकार करते हैं।" (86)
हमने मूसा और उसके भाई को 'वही' द्वारा यह बताया : "अपने लोगों को मिस्र के कुछ घरों में बसाओ, और उन घरों को इबादत करने की जगह बना लो; (उनमें) नमाज़ पाबंदी से पढ़ने की व्यवस्था करो; और ईमान रखनेवालों को (कामयाबी की) ख़ुशख़बरी दे दो!" (87)
और मूसा ने (दुआ में) कहा, "हमारे रब! तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को दुनिया की ज़िंदगी में बड़ी चमक-दमक की चीज़ें और धन-दौलत दिए हैं, तो ऐ रब! क्या यह इसीलिए है कि वे लोगों को तेरे मार्ग से भटकाएँ? ऐ हमारे रब! उनकी दौलत को मिटा दे, और उनके दिल को ऐसा कठोर कर दे कि वे उस समय तक विश्वास न करें जब तक कि दर्दनाक यातना को सामने देख न लें।" (88)
अल्लाह ने कहा, "तुम दोनों की दुआ क़बूल हो चुकी, अतः सही मार्ग पर डटे रहो, और उन लोगों के रास्ते पर न चलना, जो (सच्चाई को) नहीं जानते।" (89)
हमने इसराईल की संतानों को (सुरक्षित) समंदर पार करा दिया। फ़िरऔन और उसकी सेना ने घमंड और आक्रामकता के साथ उनका पीछा किया। मगर जब वह समंदर में डूबने लगा तो उस वक़्त पुकार उठा, "मुझे विश्वास हो गया है कि उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है जिस पर इसराईल की सन्तान ईमान रखती है। मैं भी (अब) उसकी आज्ञा मानते हुए झुकता हूँ।" (90)
(हम ने जवाब दिया), "अब ईमान लाओगे? तुम तो हमेशा से विद्रोही रहे हो, एक फ़साद मचाने वाले! (91)
"आज हम (केवल) तेरे शरीर को (डूबने से) बचा लेगें, ताकि तू बाद में आने वालों के लिए एक निशानी बन कर रह जाए। हालाँकि बहुत-से लोग ऐसे हैं जो हमारी निशानियों की तरफ़ कोई ध्यान नहीं देते।" (92)
हमने इसराईल की सन्तानों को (फिलिस्तीन जैसी) अच्छी जगह पर बसा दिया, और उन्हें जीवन चलाने के लिए अच्छी रोज़ी प्रदान की। फिर (सच्चे दीन पर) उनका आपस में मतभेद जब भी हुआ, उनके पास (कई रसूल) ज्ञान के साथ आते रहे थे। (फिर भी) उनके बीच जिन बातों को लेकर मतभेद रहा था, आपका रब क़यामत के दिन उसका फ़ैसला कर देगा। (93)
अतः [ऐ रसूल!] अगर आपको उस संदेश के बारे में कोई संदेह हो, जो हमने आप पर उतारा है, तो आप उनसे पूछ लें जो आपसे पहले से (आसमानी) किताब पढ़ते रहे हैं। आपके रब की तरफ़ से आपके पास सच्चा संदेश आ चुका है, सो किसी सन्देह में न पड़ें और हमारी निशानियों को मानने से इंकार न करें---- (94)
अन्यथा आप भी घाटे में पड़नेवालों में हो जाएंगे। (95)
जिन लोगों के ख़िलाफ़ आपके रब का फ़ैसला हो चुका है, वे कभी विश्वास नहीं करेंगे, (96)
चाहे उनके पास हर एक निशानी क्यों न आ जाए, (ये उसी वक़्त विश्वास करेंगे) जब तक वे उस दर्दनाक यातना को अपनी आँखों से देख न लें। (97)
काश कि कोई एक भी बस्ती ऐसी होती जिसने (यातना के आने से पहले ही) विश्वास किया होता, और उसका ईमान उसके लिए फ़ायदेमंद सिद्ध होता! हाँ, केवल यूनुस [Jonah] की क़ौम के लोगों ने ही (यातना से पहले) ऐसा किया, जब उन लोगों ने विश्वास कर लिया, तो हमने उस अपमानजनक यातना को उनपर से टाल दिया जो सांसारिक जीवन में आनेवाली थी, और उन्हें एक अवधि तक ज़िन्दगी के मज़े उठाने का अवसर प्रदान किया। (98)
अगर आपका रब चाहता तो ज़मीन पर जितने लोग हैं, वे सब के सब (एक अल्लाह में) विश्वास कर लेते। तो क्या आप लोगों को विश्वास करने पर मजबूर कर सकते हैं? (99)
अल्लाह की मर्ज़ी के बिना कोई जान ऐसी नहीं जो (सच्चाई में) विश्वास कर ले, और (उसका क़ानून यह है कि) वह उन लोगों की इज़्ज़त गिरा देता है, जो बुद्धि से काम नहीं लेते हैं। (100)
कह दें, "देखो ज़रा, आसमानों और ज़मीन में क्या क्या कुछ है!" लेकिन ये (प्रकृति की) निशानियाँ और चेतावनियाँ उन लोगों के किस काम की हैं, जो विश्वास करनेवाले नहीं हैं? (101)
वे किस चीज़ के इंतज़ार में लगे हैं, क्या वे उस सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं जैसी कि सज़ा उनसे पहले गुज़र चुके लोगों को मिल चुकी है? कह दें, "ठीक है, तब इंतज़ार करो, मैं भी तुम्हारे साथ इंतज़ार करता हूँ।" (102)
अंत में (जब यातना की घड़ी आ जाएगी तो) हम अपने रसूलों और विश्वास रखनेवालों को बचा लेंगे। हमारी रीति के अनुसार, ईमान रखनेवालों को बचा लेने की जिम्मेदारी ख़ुद हमारे ऊपर है। (103)
[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ लोगो! अगर तुम मेरे दीन [Faith] के बारे में किसी सन्देह में पड़े हो, तो (सुन लो), तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो, मैं उनकी इबादत [पूजा] नहीं करता, बल्कि मैं उस अल्लाह की इबादत करता हूँ जो तुम्हें (एक दिन) मौत दे देगा, और मुझे आदेश हुआ है कि मैं (एक अल्लाह में) विश्वास करनेवाला रहूँ। (104)
[ऐ रसूल], एक पक्के ईमानवाले की तरह (हर तरफ़ से हटकर) अपना मुँह अल्लाह के दीन की तरफ़ जमा लें। और उन लोगों में से मत हो जाएं जो अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) कोई साझेदार [Partner] ठहरा लेते हैं; (105)
(अल्लाह के सिवा) किसी भी और (देवता) से दुआ न माँगें, जो न आपको फ़ायदा ही पहुँचा सकता है और न कोई नुक़सान : अगर आपने ऐसा किया तो आप भी शैतानियाँ करनेवालों में गिने जाएंगे। (106)
अगर अल्लाह आपको किसी तकलीफ़ में डाल दे, तो कोई न होगा जो उसके सिवा उसे दूर सके, और अगर वह आपके लिए भलाई का इरादा कर ले, तो कोई नहीं है जो उसके फ़ज़ल [Bounty] को रोक सके; वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उस पर अपना फ़ज़ल करता है। वह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (107)
आप कह दें, "ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से सच्चाई पहुंच चुकी है। अब जो कोई सही मार्ग अपनाएगा, तो वह अपने ही भले के लिए ऐसा करेगा, और जो कोई सीधे मार्ग से भटकेगा, तो उससे नुक़सान उसी का होगा : मैं तुम्हारा कोई अभिभावक [Guardian] नहीं हूँ (कि तुम्हें मजबूर करूँ)।" (108)
(ऐ रसूल) जो कुछ आप पर 'वही’ [Inspiration] द्वारा उतारा जा रहा है, आप उस पर चलते रहें, और अपने काम में धीरज के साथ जमे रहें, यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला कर दे, और वह फ़ैसला करनेवालों में सबसे बेहतर है। (109)
सूरह 11 : हूद [Hud]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰
यह एक ऐसी किताब है जिसकी आयतें (मतलब में स्पष्ट, और दलीलों में) बिल्कुल सही बनायी गयी हैं, फिर इसे उस [अल्लाह] की तरफ़ से साफ़-साफ़, विस्तार से बता दिया गया है, जो (हर चीज़ की) गहरी समझ-बूझ रखनेवाला, और हर बात जाननेवाला है। (1)
[ऐ रसूल! कह दें], "अल्लाह को छोड़कर किसी की इबादत [पूजा] न करो। मैं उस (अल्लाह) की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजा गया हूँ ताकि मैं तुम्हें (बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दूँ, और (अच्छे व नेक कर्म करनेवालों को) ख़ुशख़बरी सुना दूँ। (2)
अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगो, फिर (उन गुनाहों को आगे न करने की) तौबा करते हुए उसकी ओर पलट आओ। वह तुम्हें एक तय की हुई अवधि तक (जीवन के) भरपूर मज़े उठाने का मौक़ा प्रदान करेगा, और (अच्छाइयाँ करने की) क़ाबिलियत [merit] रखनेवाले हर एक आदमी को (उसके कर्मों के मुताबिक़) बदले में इनाम दिया जाएगा। लेकिन अगर तुम (अल्लाह से) मुँह फेरते हो, तो फिर मुझे डर है कि कहीं तुम उस भयानक दिन की दर्दनाक यातना में न फँस जाओ: (3)
यह अल्लाह ही है, जिसके पास तुम्हें लौट कर जाना है, और हर चीज़ उसके क़ाबू में है।" (4)
देखो! इन इंकार करनेवाले (काफ़िरों) को, कि किस तरह अपने सीनों को (कपड़ों से लपेटकर) ढँक लेते हैं ताकि वे उस [अल्लाह] से अपनी भावनाएं छिपा सकें। मगर चाहे वे अपने आपको कपड़ों से कितना भी ढँक लें, वह उसे भी जानता है जो कुछ वे छिपाते हैं और उसे भी जो कुछ वे सबके सामने बताते हैं : वह तो सीने के अंदर के छिपे हुए राज़ तक को अच्छी तरह जानता है। (5)
ज़मीन पर चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिसको रोज़ी देने की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने न ले रखी हो। वह (सब) जानता है कि कहाँ वह (प्राणी) रहता है और कहाँ उसका (आख़िरी) पड़ाव होना है : सारी चीज़ों का लेखा-जोखा साफ़ साफ़ लिखा हुआ (मौजूद) है। (6)
वह अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को छः दिनों में पैदा किया ---- उसके नियम-क़ायदे पानी पर भी लागू होते हैं----- ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें से कर्म के हिसाब से कौन सबसे अच्छा है।
तब भी [ऐ रसूल] अगर आप उनसे कहें कि "मरने के बाद तुम्हें दोबारा उठाया जाएगा," तो इंकार करनेवाले ज़रूर कहने लगेंगे, "यह और कुछ नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जादू की बातें हैं।" (7)
अगर हम उनकी सज़ाओं को एक नियत अवधि तक के लिए टालते हैं, तो वे ज़रूर कहेंगे, "आख़िर किस चीज़ ने (उस सज़ा को आने से) रोक रखा है?" मगर (याद रखो!) जिस दिन वह (यातना) उनपर आ गयी तो फिर किसी के टाले नहीं टलेगी; जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते रहते हैं, वही चीज़ उन्हें चारों तरफ़ से घेर लेगी। (8)
जब हम आदमी को अपनी रहमत [दयालुता] का मज़ा लेने देते हैं और फिर उसे (देने से) रोक लेते हैं, तॊ आदमी (निराश हो कर) बेचैन हो जाता है, और (एहसानों को भूलकर) नाशुक्रा [ungrateful] बन जाता है! (9)
और जब उसे कोई तकलीफ़ पहुँची हो, और फिर उसके बाद अगर हम उसे अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह यही कहता है, "दुर्भाग्य की छाया मुझ से दूर हट गयी।" वह (ज़रा सी बात में) ख़ुशी से फूला नहीं समाता और डींगें मारने लगता है। (10)
हाँ, मगर उनकी बात अलग है, जो धीरज से काम लेते हैं और अच्छे व नेक कामों में लगे रहते हैं : उनके (गुनाह) माफ़ कर दिए जाएंगे, और उन्हें बड़ा भारी इनाम मिलेगा। (11)
तो [ऐ रसूल!], जो (संदेश) आप पर उतारा जा रहा है, क्या आप उसमें से कुछ भाग छोड़ देना चाहते हैं, और उन लोगों की बातों से आपका दिल तंग आ गया है, क्योंकि वे कहते हैं, ‘उसपर कोई ख़ज़ाना क्यों नहीं उतारा गया’? या ‘उसके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया’?" (याद रहे!) आपका काम तो केवल सावधान कर देना है; वह अल्लाह है जो हर चीज़ का अधिकार रखता है। (12)
अगर वे कहते हैं कि, "उस [रसूल] ने इस (क़ुरआन) को ख़ुद ही गढ़ लिया है", तो कह दें, "ठीक है, अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो तो इस जैसी दस सूरतें गढ़ कर ले आओ, और (इस काम में मदद के लिए) अल्लाह को छोड़कर जिस किसी को बुलाना चाहो, बुला लो।" (13)
फिर अगर वे तुम्हारी बात का जवाब न दे पाएं, तो तुम सब को यह मालूम हो जाना चाहिए कि ये ज्ञान की बातें [क़ुरआन] अल्लाह की जानकारी के साथ उतारी गयी हैं, और यह कि अल्लाह के सिवा कोई ख़ुदा नहीं जिसे पूजा जाए। तो फिर, क्या तुम अल्लाह की आज्ञा मानते हुए उसके आगे समर्पण करोगे? (14)
अगर कोई आदमी केवल इसी दुनिया की ज़िंदगी और उसकी सज-धज को ही पाना चाहता है, तो ऐसे लोगों को उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला हम इसी दुनिया में दे देते हैं---- और उनको देने में कोई कमी नहीं की जाती------ (15)
मगर ऐसे लोगों के पास आनेवाली दुनिया [आख़िरत/परलोक] में सिवाए (जहन्नम की) आग के कुछ भी न होगा : उनके यहाँ के सारे काम बेकार साबित होंगे, और उनका सब किया-धरा अकारत जाएगा। (16)
क्या ऐसे लोगों की तुलना उनसे की जा सकती है जिनके पास अपने रब की तरफ़ से साफ़ व स्पष्ट प्रमाण [क़ुरआन] हो, जिसे अल्लाह की ओर से एक गवाह [जिबरईल फ़रिश्ता] पढ़ कर सुनाता हो, और जिनके पास इससे पहले मार्गदर्शन और रहमत के रूप में मूसा की किताब [तोरात/Torah] रही है? ये वे लोग हैं जो इस (किताब) में विश्वास रखते हैं, जबकि लोगों का वह गिरोह जो इसे सच मानने से इंकार करता है, उनके लिए (जहन्नम की) आग का वादा किया जाता है। अतः [ऐ रसूल!] आपको इसके बारे में कोई सन्देह नहीं होना चाहिए : यह आपके रब की तरफ़ से एक सच्चाई है, हालाँकि ज़्यादातर लोग यह बात नहीं मानते। (17)
उस आदमी से बढ़कर ग़लत काम करनेवाला कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें बनाये? ऐसे लोगों को उनके रब के सामने लाया जाएगा, और गवाही देनेवाले कहेंगे, "यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब के बारे में झूठी बातें बनायी थीं।" अल्लाह की फिटकार [Rejection] है उन लोगों पर, जो ऐसे बुरे काम करते हैं, (18)
जो अल्लाह के मार्ग से दूसरों को रोकते हैं, उसमें टेढ़ापन पैदा करना चाहते हैं, और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] को मानने से इंकार करते हैं। (19)
वे ज़मीन पर बच कर कहीं नहीं जा सकेंगे और न अल्लाह के सिवाए कोई और मददगार होगा जो उनको बचा सके। उनकी सज़ा दुगनी कर दी जाएगी। न वे (सच्चाई की बातें) सुन सके और न (सच्चाई को) देख ही सके। (20)
ये वह लोग हैं जिन्होंने अपनी जानें घाटे में डाल दीं, और (सच के ख़िलाफ़) जो कुछ झूठी बातें वे गढ़ा करते थे, (आख़िरत में) वह सब उन्हें छोड़ जाएंगी। (21)
और इस बात में कोई शक नहीं कि यही लोग हैं जो आनेवाली (आख़िरत की) ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा नुक़सान में रहेंगे। (22)
मगर जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास रखा, अच्छे कर्म किए, और अपने रब के सामने (पूरी भक्ति से) झुक गए, तो वही लोग जन्नत में बसनेवाले हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। (23)
ये दोनों पक्ष ऐसे हैं कि जैसे कोई अन्धा और बहरा आदमी हो, और उसकी तुलना एक ऐसे आदमी से की जाए जो अच्छी तरह देखता भी हो और सुनता भी : क्या दोनों एक समान हो सकते हैं? तुम फिर भी इस बात पर ध्यान क्यों नहीं देते? (24)
हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास इस संदेश के साथ भेजा, "मैं तुम्हारे पास (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) साफ़-साफ़ चेतावनी देने आया हूँ : (25)
अल्लाह को छोड़कर किसी की इबादत [पूजा] न करो। मुझे डर है कि कहीं एक दुख भरे दिन में तुम्हारे ऊपर कोई दर्दनाक यातना न आ जाए।" (26)
मगर विश्वास न करनेवाले लोगों के सरदार ने कहा, "हम देखते हैं कि तुम कुछ और नहीं, बल्कि हमारे ही जैसे (मर-खप जानेवाले) मामूली आदमी हो, हम यह भी साफ तौर से देखते हैं कि तुम्हारे पीछे बस वही लोग चल रहे हैं जो हम लोगों में सबसे छोटे व तुच्छ लोग हैं। हमें यह नहीं समझ में आ रहा है कि आख़िर तुम किस मामले में हमलोगों से बेहतर हो? सच तो यह है कि हम तुम्हें झूठा समझते हैं।" (27)
नूह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा सोचो : अगर मेरे पास सचमुच मेरे रब की स्पष्ट निशानी है, और उसने मुझे (नबी बनाकर) अपनी ख़ास रहमत [grace] प्रदान की हो, मगर वह तुम्हें दिखायी न दे (तो मैं क्या कर सकता हूँ?), क्या हम तुम्हें तुम्हारी इच्छा के ख़िलाफ़ इसे मान लेने पर मजबूर कर सकते हैं? (28)
और मेरे लोगो! मैं इस काम के बदले तुम से कोई इनाम तो नहीं माँगता; मेरा इनाम तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है। मैं विश्वास रखनेवालों को दूर नहीं भगाउंगा : उन्हें तो अपने रब से मिलने का यक़ीन है। (तुमलोग तो समझने को ही तैयार नहीं हो) मुझे लगता है कि तुम (लोग) ही नासमझ हो। (29)
ऐ लोगो! अगर मैं विश्वास रखनेवालों को दूर भगा दूँ, तो अल्लाह के ख़िलाफ़ कौन है जो मेरी सहायता करेगा? तो क्या तुम इस पर ध्यान नहीं दोगे? (30)
और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, या मुझे ऐसी चीज़ की कोई जानकारी है जो हम से छिपी हुई है, या यह कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। और न मैं यह कहता हूँ कि जो लोग तुम्हारी नज़र में छोटे व तुच्छ हैं, अल्लाह उनके लिए कोई भलाई न देगा : जो कुछ उनके जी में है, अल्लाह उसे ख़ुद बहुत अच्छी तरह जानता है। अगर मैं ऐसा कहूँ, तब तो मैं ज़ालिमों में से हो जाउँगा।" (31)
उन लोगों ने कहा, "ऐ नूह! तुम हमसे बहुत लम्बे समय से बहस करते रहे हो। अब अगर तुम सच बोल रहे हो, तो जिस यातना की तुम हमें धमकी देते रहते हो, उसे हम पर ले ही आओ।" (32)
नूह ने कहा, "यह तो अल्लाह (के हाथ में) है, अगर वह चाहेगा, तो तुम पर यातना ले आएगा, और तब तुम (उसकी पकड़ से) भाग नहीं पाओगे। (33)
अगर अल्लाह तुम्हें तुम्हारे भ्रम के साथ भटकता छोड़ देना चाहे, तो मेरी नसीहत तुम्हारे कोई काम नहीं आएगी : वही तुम्हारा रब है और उसी के पास तुम्हें लौट कर जाना होगा।" (34)
अगर (मक्का के विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] यह कहते हैं, "उस (मुहम्मद) ने ख़ुद ही इस (क़ुरआन) को गढ़ लिया है?" तो आप कह दें, "अगर मैंने इसे ख़ुद से बना लिया है, तो मेरे इस अपराध की पूरी ज़िम्मेदारी मेरी है, मगर जो अपराध तुम कर रहे हो, मैं उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हूँ।"(35)
‘वही’ [Revelation] के द्वारा नूह को बता दिया गया कि "जो लोग पहले ईमान ला चुके हैं, उनके अलावा अब तुम्हारी क़ौम में कोई आदमी विश्वास करनेवाला नहीं है, अतः जो कुछ वे कर रहे हैं, उसपर तुम दुखी न हो। (36)
अब तुम हमारी देखरेख में और हमारी ओर से भेजी गयी ‘वही’ के अनुसार एक नाव [Ark] बनाओ। और जिन लोगों ने शैतानियाँ की हैं, उनके लिए मुझ से पैरवी मत करो---- वे अब पानी में डुबा दिए जाएंगे।" (37)
इस तरह, उसने नाव बनाना शुरू कर दिया, उसकी क़ौम के सरदार जब कभी उसके पास से गुज़रते तो (उसको नाव बनाते देख) उसकी हँसी उड़ाया करते थे। उसने कहा, "अभी तुम मेरी जितनी हँसी उड़ाना चाहो उड़ा लो, लेकिन (एक दिन) हम भी तुम्हारी (मूर्खता पर) हँसेंगे : (38)
तुम्हें जल्द ही पता चल जाएगा कि किसे ऐसी सज़ा मिलेगी जो उसे अपमानित कर देगी, और किस पर हमेशा रहनेवाली यातना का क़हर टूट पड़ेगा।” (39)
जब (यातना के लिए) हमारा आदेश आ पहुँचा, और धरती से तेज़ धार के साथ पानी फूट पड़ा, तो हम ने (नूह से) कहा, "(धरती के) हर प्रजाति में से एक-एक जोड़ा नाव पर चढ़ा लो और साथ में अपने घरवालों को भी-----सिवाए उन लोगों के, जिनके बारे में पहले ही फ़ैसला हो चुका है ------और उन्हें भी (बैठा लो) जो ईमान रखते हैं", हालाँकि उसके साथ ईमान रखनेवाले बहुत थोड़े ही थे। (40)
नूह ने (साथियों से) कहा, "इस नाव पर सवार हो जाओ। अल्लाह के नाम से यह पानी में तैरती हुई चलेगी, और (सुरक्षित) लंगर डाल कर ठहर जाएगी। निस्संदेह मेरा रब बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (41)
फिर वह (नाव) उन्हें लिए हुए पहाड़ों जैसी ऊँची लहरों के बीच चलने लगी और नूह ने अपने बेटे को पुकारा जो पीछे रह गया था, "ऐ मेरे बेटे! हमारे साथ सवार हो जा। तू इंकार करनेवालों के साथ न रह।" (42)
मगर उसने जवाब दिया, "मैं पानी से बचने के लिए किसी पहाड़ में पनाह ले लूँगा।" नूह ने कहा, "आज अल्लाह के हुक्म (फ़ैसले) से कोई बचने की जगह नहीं है, सिवाए उसके कि जिस पर वह दया कर दे।" (इतने में) दोनों के बीच एक ज़ोर की लहर आ गयी और वह भी डूबनेवालों के साथ डूब गया। (43)
फिर हुक्म हुआ, "ऐ धरती! अपना पानी पी ले और ऐ आसमान! तू थम जा," और पानी उतर गया, आदेश का पालन कर दिया गया। वह नाव जूदी पहाड़ पर ठहर गयी, औऱ कहा गया, "गए वे लोग जो शैतानी करते थे!" (44)
नूह ने अपने रब को पुकारा और कहा, "मेरे रब! मेरा बेटा मेरे घरवालों में से था, हालांकि (मेरे परिवार को बचा लेने का) तेरा वादा सच्चा है, और तू फ़ैसला करने वालों में सबसे ज़्यादा इंसाफ़ करने वाला है।"(45)
अल्लाह ने कहा, "ऐ नूह! वह तेरे घरवालों में से नहीं था। जो कुछ उसने किया, वह सही नहीं था। मुझ से उन चीज़ों के बारे में मत पूछो जिनके बारे में तुम्हें कोई जानकारी नहीं। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूं कि तुम बेवक़ूफ़ों में शामिल न हो जाओ।" (46)
उसने कहा, "मेरे रब! मैं ऐसी चीज़ों के बारे में पूछने से तेरी पनाह माँगता हूँ कि जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। अगर तू ने मुझे माफ़ न किया, और मुझ पर दया न दिखायी, तो मैं घाटा उठानेवालों में हो रहूँगा।" (47)
और उनसे कहा गया, "ऐ नूह! हमारी ओर से सकून व सलामती के साथ (नाव से) उतर जा, शुभकामनाएं व बरकतें (blessings) हों तुझ पर, और कुछ उन समुदायों पर जो उन से फले-फूलेंगी, जो तेरे साथ आए हैं। बाद में आनेवाले कुछ और लोग भी होंगे जिन्हें हम थोड़े समय के लिए जीवन का मज़ा उठाने का मौक़ा देंगे, मगर उसके बाद (उनके कर्मों के नतीजे में) हमारी ओर से एक दर्दनाक यातना उन्हे पकड़ लेगी।" (48)
(ऐ रसूल) ये घटनाएं जो आपको बतायी गयीं, ये उन बातों का हिस्सा थीं जो आपके ज्ञान से परे है। हम ने उन बातों को “वही” के द्वारा आप पर उतारा। अब से पहले न आप और न आपके लोग इनके बारे में कुछ जानते थे, अतः धैर्य [सब्र] से काम ल़ें : आनेवाला दिन तो उन लोगों का है जो अल्लाह का डर रखते हुए अपने आपको (बुराइयों से) बचाते हैं। (49)
'आद' की क़ौम के लोगों के पास हम ने उनके भाई 'हूद' को (रसूल बना कर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की इबादत [पूजा] करो। उसको छोड़कर तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है; तुम तो केवल झूठी बातें बना रहे हो। (50)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इस (नसीहत के लिए) तुमसे कोई मजदूरी नहीं माँगता। मेरा इनाम तो बस उसी के पास है जिसने मुझे पैदा किया। तो फिर तुम बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते? (51)
ऐ मेरे लोगो! अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगो, फिर (तौबा करके) उसकी ओर लौट आओ। वह तुम्हारे लिए आसमान से काफ़ी मात्रा में पानी बरसायेगा (और खेत लहलहा उठेंगे), और तुम्हें और अधिक शक्ति देगा। तुम यूँ मुँह न फेरो और अपने गुनाहों में बिल्कुल गुम न हो जाओ।" (52)
उन्होंने जवाब दिया, "ऐ हूद! तुम हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर नहीं आए हो। सिर्फ़ तुम्हारे कह देने भर से हम अपने देवी देवताओं को नहीं छोड़ सकते और न ही हम तुम पर विश्वास करनेवाले हैं। (53)
हम तो यही कह सकते हैं कि ऐसा लगता है कि हमारे ख़ुदाओं में से किसी की तुम पर मार पड़ गयी है (जो ऐसी बातें करते हो)।" हूद ने कहा, "मैं तो गवाही के लिए अल्लाह को पुकारता हूँ, और तुम भी मेरे गवाह रहो, कि जिन हस्तियों को तुम ने अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार बना रखा है, उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। (54)
अतः तुम सब मिलकर, मेरे ख़िलाफ़ जैसी चालें चल सकते हो, चल लो, और मुझे ज़रा भी मुहलत न दो। (55)
मैं अपना भरोसा अल्लाह पर रखता हूँ, जो मेरा भी रब है, और तुम्हारा भी। ज़मीन पर चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी ऐसा नहीं, जिसका नियंत्रण उसके हाथ में न हो। निस्संदेह मेरा रब (सच्चाई व इंसाफ़ के) सीधे रास्ते पर है। (56)
लेकिन फिर भी अगर तुम मुँह मोड़ते हो, तो जिस संदेश के साथ मुझे तुम्हारे पास भेजा गया था, वह तो मैं तुम तक पहुँचा ही चुका हूँ, और मेरा रब तुम्हारी ज़गह किसी दूसरी क़ौम को ले आएगा। तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते : वह मेरा रब है, जो हर चीज़ की निगरानी करता है।" (57)
और इस तरह, जब हमारे फ़ैसले की घड़ी आ गयी, तो हमने हूद और उसके साथ ईमान रखनेवालों को अपने फ़ज़ल [Grace] से बचा लिया। हम ने उन्हें ऐसी यातना से बचा लिया जो बड़ी ही कठोर यातना थी। (58)
ये आद की क़ौम के लोग थे : इन लोगों ने अपने रब की निशानियों को मानने से इंकार किया, उसके रसूलों की आज्ञा भी नहीं मानी, और हर अड़ियल ज़ालिम की आज्ञा मानते हुए उसके पीछे चलते रहे। (59)
(नतीजा यह हुआ कि) वे इस दुनिया में भी रद्द कर दिए गए, और क़यामत के दिन भी वे (बरकतों से) दूर कर दिए जाएंगे। "हाँ! आद के लोगों ने अपने रब को मानने से इंकार कर दिया----- तो ऐ हूद की क़ौम, आद! तेरे लिए बर्बादी हो गयी!" (60)
समूद के लोगों के पास उनके भाई सालेह को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अल्लाह की इबादत करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। उसी ने तुम्हें धरती से पैदा किया और उसमें तुम्हें बसा दिया, अतः उससे (अपने गुनाहों की) माफ़ी माँगो; और उसकी ओर (गुनाहों की तौबा करते हुए) पलट आओ : मेरा रब (हर एक के) नज़दीक है, और वह दुआओं को सुनने के लिए तैयार रहता है।" (61)
लोगों ने कहा, "ऐ सालेह! हम लोगों ने तो पहले तुम से बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं। तुम हमें उनकी पूजा करने से रोकते हो, जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए हैं? तुम हमें जिस चीज़ को करने के लिए कह रहे हो, उसके बारे तो हमें गहरा संदेह है, यह बात हमारे दिल में उतरती नहीं।" (62)
सालेह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा सोचो : अगर मेरे पास सचमुच मेरे रब की तरफ़ से पक्का प्रमाण है, और अगर उसने ख़ास अपनी रहमत से मुझे (रसूल) बनाया है, और अगर तब भी मैं उसकी आज्ञा न मानूँ, तो अल्लाह से मुझे कौन बचा सकता है? तुम तो (मेरी बात न मान कर) लगता है कि नुक़सान को और बढा दोगे। (63)
ऐ मेरे लोगो! यह अल्लाह की ऊँटनी है जो तुम्हारे लिए एक निशानी बन कर आयी है. इसे खुला छोड़ दो ताकि अल्लाह की धरती पर चरती फिरे, और (देखो!) इसे कोई नुक़सान पहुँचाने की कोशिश मत करना, वरना तुरंत ही यातना तुम्हें पकड़ लेगी।" (64)
मगर उन लोगों ने उस (ऊँटनी) को (उसके पाँव काट कर) मार डाला, इस पर सालेह ने कहा, "अपने घरों में (ज़िंदगी के) तीन दिन और मज़े ले लो : यह चेतावनी झूठी साबित नहीं होगी।" (65)
और जब हमारी (ठहरायी हुई) बात के पूरे हो जाने का समय आ गया, तो हमने अपनी दयालुता दिखाते हुए सालेह और उसके साथ ईमान रखनेवालों को सुरक्षित रखते हुए उस दिन के अपमान से बचा लिया। [ऐ रसूल!] तुम्हारा रब बहुत मज़बूत, ज़बरदस्त ताक़तवाला है। (66)
और शैतानियाँ करनेवालों को एक ज़बरदस्त धमाके ने आ दबोचा और (जब सुबह हुई तो) वे अपने घरों में मुर्दा पड़े थे, (67)
मानो वे वहाँ न कभी बसते थे, न फले फूले थे। "हाँ! समूद ने अपने रब को मानने से इंकार किया-----तो ऐ समूद! तेरे लिए बर्बादी हो गयी।" (68)
और जब ऐसा हुआ कि अच्छी ख़बर का संदेश ले कर हमारे फ़रिश्ते, इबराहीम [Abraham] के पास आए, और कहा, "सलाम हो!", इबराहीम ने ज़वाब में कहा, "सलाम हो”, और बिना देर किए हुए वह उनके (खाने के) लिए भुना हुआ बछड़े (का गोश्त) ले आया। (69)
जब इबराहीम ने देखा कि उनके हाथ खाने की ओर नहीं बढ़ रहे हैं, तो यह बात उसे बड़ी अजीब लगी, और वह (मन ही मन) उनसे डरने लगा। लेकिन वे बोले, "डरो नहीं, हम तो लूत [Lot] की क़ौम के ख़िलाफ़ भेजे गए हैं।" (70)
इबराहीम की बीवी पास ही खड़ी थी, वह (ख़बर सुनकर) हँस पड़ी। (असल में) हमने उसको इसहाक़ [Isaac] (के पैदा होने) की ख़ुशख़बरी सुनायी थी, और इसकी कि इसहाक़ के बाद याक़ूब [Jacob] होगा।
(71)
वह बोली, "अफ़सोस मुझ पर! मैं बच्चे को कैसे जन सकती हूँ, जबकि मैं एक बूढ़ी औरत हूँ, और यह जो मेरे पति हैं, वह भी बूढे आदमी हैं? यह तो बड़ी अज़ीब चीज़ होगी!" (72)
फ़रिश्तों ने कहा, "क्या अल्लाह के फ़ैसले पर तुम आश्चर्य करती हो? तुम पर और इस घर के लोगों पर अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें हों! कि वह सारी तारीफ़ों के लायक़ है, और उसके लिए हर तरह की बड़ाइयाँ हैं।" (73)
फिर जब इबराहीम की घबराहट दूर हो गई और उसे अच्छी ख़बर का पता चल गया, तो उसके बाद, वह (लूत के लोगों की होनेवाली तबाही से चिंतित हो गया) और लूत की क़ौम के पक्ष में हम से वकालत करने लगा, (74)
इसमें शक नहीं कि इबराहीम बड़ा ही सहनशील, नरम दिल, और हमारी भक्ति में पूरी तरह समर्पित था। (75)
(फ़रिश्तों ने कहा), "ऐ इबराहीम! (उनके लिए) वकालत करना बंद कर दो : तुम्हारे रब का फ़ैसला हो चुका है; यातना उन पर बस आ ही पहुँची है, और अब इसे टाला नहीं जा सकता है।" (76)
और फिर जब ऐसा हुआ कि हमारे फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे, तो वह (उनकी इज़्ज़त की ख़ातिर) परेशान हो उठा, उनकी (इज़्ज़त) बचाने में अपने आपको असहाय महसूस करने लगा, और कहने लगा, "सचमुच यह बड़ी मुसीबत का दिन है!" (77)
उसकी क़ौम के लोग (मेहमानों के आने की ख़बर सुनकर) दौड़ते हुए उसके पास आ पहुँचे; वहाँ (के मर्दों को सेक्स के लिए मर्द ही पसंद थे), वे पहले से ही इस बुरे कर्म में लगे हुए थे। लूत ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ मौजूद हैं। ये तुम्हारे लिए अधिक भरी पूरी व पवित्र हैं (इनके साथ प्रेम करो), और अल्लाह का कुछ तो डर रखो, और मेरे मेहमानों के साथ मुझे बेइज़्ज़त मत करो। क्या तुममें से एक आदमी भी ऐसा नहीं जो सही समझ रखता?" (78)
उन लोगों ने कहा, "तुझे तो मालूम है कि तेरी बेटियों में हमें कोई दिलचस्पी नहीं। और तू अच्छी तरह जानता है कि हमें क्या चाहिए।" (79)
लूत ने कहा, "काश कि मुझमें इतनी ताक़त होती कि मैं तुम्हें (बुरे कर्मों से) रोक पाता, या कोई मज़बूत सहारे का ही आसरा होता!" (80)
फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ लूत! हम तुम्हारे रब के संदेश के साथ आए हैं। (चिंता न करो) वे तुम तक नहीं पहुँच सकेंगे। अतः तुम सोयी रात में अपने घरवालों को लेकर निकल पड़ो, और (ख़बरदार!) तुममें से कोई पीछे मुड़कर न देखे। केवल तुम्हारी बीवी (पीछे रह जाएगी, और) उसको, दूसरे लोगों की तरह, बुरा अंजाम भुगतना होगा। उनकी (तबाही के लिए) सुबह सवेरे का समय तय हो चुका है : क्या सुबह के आने में देर लगेगी?" (81)
और इस तरह, जब हमारे तय किए हुए फ़ैसले की घड़ी आ पहुँची, तो हमने उनकी बस्ती को ऊपर से नीचे पटक कर रख दिया (ऊँचे-ऊँचे भवन ज़मीन में आ रहे), और हर तह में उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर लगातार बरसाए, (82)
जिन पर तुम्हारे रब की तरफ़ से (इसी काम के लिए) निशान लगे हुए थे। और यह (जगह मक्का के) शैतानियाँ करनेवालों से ज्यादा दूर नहीं है। (83)
और मदयन [Midian] (के क़बीले) में उनके भाई शुऐब को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की इबादत करो, उसको छोड़ कर तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं। (और देखो!) किसी को देते समय नाप और तौल में कमी न किया करो। मैं तो तुम्हें ख़ुशहाली की हालत में देख रहा हूँ, मगर मुझे डर है कि कहीं तुम पर एक ऐसे दिन की यातना न आ जाए, जो तुम सबको चारों तरफ़ से घेर ले। (84)
ऐ मेरे लोगो! देते समय, नाप और तौल में इंसाफ़ के साथ, पूरा पूरा दिया करो। और लोगों को उनकी चीज़ें (उनके हक़ से) कम मत दो, और ज़मीन पर भ्रष्ट तरीक़ों से फ़साद (corruption) मत फैलाओ। (85)
अगर तुम ईमानवाले हो, तो जो (काम-काज के बाद) अल्लाह का दिया बाक़ी बच जाए, वही तुम्हारे लिए सबसे बेहतर है : मैं तुम्हारे ऊपर कोई रखवाली करनेवाला तो हूँ नहीं।" (86)
वे बोले, "ऐ शुऐब! क्या तेरी इबादत तुझे यही सिखाती है कि हम उन्हें छोड़ दें जिन्हें हमारे बाप-दादा पूजते आए हैं, और यह कि हम अपनी ही संपत्ति को मनमाने ढंग से उपभोग [consume] भी न करें? बस तुम्हीं एक बड़े सहनशील, और नेक-चलन आदमी रह गए हो!" (87)
शुऐब ने जवाब दिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम देखते नहीं? क्या होना चाहिए अगर मैं अपने रब की तरफ़ से एक पक्के प्रमाण के हिसाब से काम कर रहा हूँ? और उसने खुद मुझे अच्छी रोज़ी दे रखी है : जिस चीज़ को करने से मैं तुम्हें रोक रहा हूँ, ख़ुद मैं वह नहीं कर सकता, बल्कि जहां तक मुझ से हो सके, मैं तो बस चीज़ों में सुधार लाना चाहता हूँ। मगर अल्लाह की मदद के बिना मैं कामयाब नहीं हो सकता : उसी पर मैं भरोसा करता हूं, और उसी के सामने (तौबा के लिए) झुकता हूँ। (88)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरे लिए तुम्हारा विरोध कहीं तुम्हें उस अंजाम तक न पहुंचा दे कि तुम पर भी वही बीते जो नूह या हूद या सालेह की क़ौम पर बीत चुका है; और लूत की क़ौम (जिस जगह रहती थी, वह मक्का से) कोई ज़्यादा दूर नहीं है। (89)
अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगो, और फिर तौबा कर के उसकी ओर झुक जाओ : मेरा रब तो बड़ा रहम करनेवाला, और (अपने बंदों से) बहुत प्यार करनेवाला है।" (90)
उन्होंने कहा, "ऐ शुऐब! तुम्हारी बहुत-सी बातें हमारी समझ में नहीं आती हैं, और हम देखते हैं कि तुम हमलोगों में बहुत कमज़ोर आदमी हो। अगर तुम्हारे साथ तुम्हारा घर-परिवार न होता, तो हम तुझे पत्थर से मार डालते, क्योंकि हमारे सामने तुम्हारी कोई औक़ात नहीं है।" (91)
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम्हारे अंदाज़े के मुताबिक़ मेरा परिवार अल्लाह से भी ज़्यादा मज़बूत है? और क्या तुमने अल्लाह को बिल्कुल ही पीछे डाल दिया है? तुम जो कुछ भी करते हो, मेरे रब ने उसे अपने (ज्ञान के) घेरे में ले रखा है। (92)
ऐ लोगो! जो तुम्हारा मन चाहे, अपनी जगह काम करते रहो, मैं भी उसी तरह अपने काम कर रहा हूँ। जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि किस पर अपमान भरी यातना आती है, और कौन है जो झूठा है! प्रतीक्षा करो, और मैं भी तुम्हारी तरह प्रतीक्षा कर रहा हूँ।" (93)
फिर जब वह (ठहरायी हुई) बात का समय आ पहुँचा, तो हमने अपनी दयालुता से शुऐब और उसके साथ के ईमान रखनेवालों को बचा लिया, मगर अत्याचार करनेवालों को एक ज़बरदस्त धमाके ने आ पकड़ा। सुबह होने तक वे अपने अपने घरों में मरे पड़े थे, (94)
मानो वे वहाँ न कभी बसे और न कभी फले-फूले थे। "सुन लो! फिटकार है मदयनवालों पर, जैसे समूद पर फिटकार हुई थी!"(95)
इसी तरह, हमने मूसा को भी अपनी निशानियाँ और स्पष्ट प्रमाण के साथ, (96)
फ़िरऔन और उसके माननेवालों के पास भेजा था, मगर वे फ़िरऔन के आदेश पर ही चले, हालाँकि फ़िरऔन के आदेश मार्ग से भटका देने वाले थे। (97)
क़यामत के दिन वह अपनी क़ौम के लोगों में आगे आगे होगा, वह उन्हें रास्ता दिखाते हुए आग में ला उतारेगा, और क्या ही बुरा घाट है वह उतरने का! (98)
यहाँ भी लानत ने उनका पीछा किया और क़ियामत के दिन भी - बहुत ही बुरा पुरस्कार है यह, जो किसी को दिया जाए! (99)
(ऐ रसूल!) हम इसी तरह आपको कुछ पुरानी बस्तियों की घटनाएं सुनाते हैं : इनमे सें कुछ तो आज भी खड़ी दिखायी देती हैं और कुछ पूरी तरह उजड़ गयीं; (100)
हमने उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया; बल्कि, उन्होंने स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया। तो (देखो) जब आपके रब की (ठहरायी हुई) बात आ पहुंची, तो उनके वे सारे देवी-देवता जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पुकारा करते थे, उनके कुछ भी काम न आ सके; वे केवल विनाश को ही बढ़ाने का कारण बने। (101)
आपके रब की सज़ा ऐसी ही होती है, जब वह किसी बस्ती को गुनाह करते हुए पकड़ता है : उसकी सज़ा बड़ी दर्दनाक, बहुत कठोर होती है। (102)
सचमुच ही इसमें हर उस आदमी के लिए एक निशानी है, जो आख़िरत (Hereafter) की यातना का डर रखता हो। (आख़िरत का दिन) ऐसा दिन होगा, जब सारे इंसानों को एक साथ इकट्ठा किया जाएगा, यह वह दिन है जो सबको देखना है। (103)
हम उस (दिन) को केवल एक नियत अवधि के लिए टाल रहे हैं; (104)
जब वह दिन आ जाएगा, तो किसी की मजाल नहीं होगी कि बिना अल्लाह की अनुमति के कोई मुंह खोल सके, फिर (इंसानों में) कुछ तो ऐसे होंगे जो बड़े दुखी व अभागे होंगे और कुछ बड़े ख़ुश व भाग्यशाली। (105)
तो जो अभागे होंगे वे (जहन्नम की) आग में होंगे, चीख़ते चिल्लाते हुए, (106)
वे उसी में रहेंगे, उस समय तक जब तक कि आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, और जब तक कि आपका रब ही कुछ दूसरी बात न चाहे : आपका रब जो चाहता है, वही करता है। (107)
रहे वे लोग जिन पर ख़ास करम हुआ है, तो वे लोग तो जन्नत में होंगे, वे उसी में रहेंगे, उस समय तक जब तक कि आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, और जब तक कि आपका रब ही कुछ दूसरी बात न चाहे------यह एक ऐसा उपहार है, जो कभी ख़त्म न होगा। (108)
(ऐ रसूल) ये लोग जिनको पूजते हैं, उनके बारे में आपको कोई संदेह न हो : ये तो बस उसी तरह पूजा करते हैं, जिस तरह इससे पहले इनके बाप-दादा करते आए थे, और हम उन्हें (इनके कर्मों के नतीजे का) हिस्सा बिना किसी कमी के पूरा-पूरा देनेवाले हैं। (109)
आपसे पहले हम ने मूसा को किताब दी थी, लेकिन इसमें भी मतभेद पैदा हो गए थे, और अगर आपके रब की ओर से एक बात पहले ही से तय न कर दी गई होती (कि उनको पूरी यातना परलोक/आख़िरत् में दी जाएगी), तो उनके बीच (इसी दुनिया में) फ़ैसला कर दिया गया होता, हालांकि वे उसके बारे में गहरे संदेह में पड़े हुए थे। (110)
जो कुछ भी कर्म उन्होंने किया होगा, तुम्हारा रब हर एक को उनके कर्मों का पूरा पूरा बदला देगा : जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर है। (111)
अतः आप और आपके साथ वे लोग जो (गुनाहों से तौबा कर के) अल्लाह की ओर झुके हैं, उन्हें चाहिए कि सही रास्ते पर जमे रहें, जैसा आपको आदेश दिया गया है, और मर्यादा की सीमा को न तोड़ें, क्योंकि जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है। (112)
जो लोग शैतानियां करते हैं, उन पर भरोसा करते हुए उनकी तरफ़ न झुक पड़ें, नहीं तो हो सकता है कि (नज़दीकी के चलते) आग आपको भी छू जाए, और तब कोई न होगा जो आपको अल्लाह से बचा सके, और न ही आप कोई मदद पाएंगे। (113)
[ऐ रसूल!] नमाज़ की पाबंदी करें, उस वक़्त जब दिन शुरू होने को हो, और उस वक़्त जब ख़त्म होने को हो [सुबह और अस्र/मग़रिब की नमाज़], और रात के कुछ हिस्सों में भी, क्योंकि (याद रहे) अच्छी चीज़ें बुरी चीज़ों को दूर कर देती हैं---- यह याद दिलानेवाली [Reminder] है उन लोगों को, जो इससे नसीहत लेना चाहते हैं। (114)
(अच्छाई के कठिन रास्ते में) धीरज से काम लें : अच्छा व नेक काम करनेवालों का बदला अल्लाह कभी बेकार नहीं जाने देता, (115)
फिर आपसे पहले जो पीढ़ियां गुज़र चुकी हैं उनमें काश कि ऐसे भले-समझदार लोग होते, जो ज़मीन पर फ़साद [corruption] पैदा करने से रोक पाते! हम ने उनमें से बहुत थोड़े लोगों को तो (यातना से) बचा लिया, जबकि अत्याचारी लोग तो भरपूर मौज मस्ती में ही लगे रहे, और अपने गुनाहों पर जमे रहे। (116)
और (याद रहे कि) अगर किसी बस्ती के लोग सही रास्ते पर चल रहे हों, तो तुम्हारा रब ऐसा नहीं है कि बिना वजह उस (बस्ती) को तबाह बर्बाद कर दे। (117)
अगर तुम्हारा रब चाहता तो उसने सारे लोगों को एक ही उम्मत [समुदाय] बना दिया होता, (लेकिन उसने ऐसा नहीं चाहा), सो आपस में उनके मतभेद चलते ही रहेंगे ----- (118)
सिवाए उनके जिनपर तेरे रब ने ख़ास रहम किया है (तो वह सच्चाई को समझते हुए आपस में नहीं लड़ेंगे)----- क्योंकि उसने उन्हें इसी तरह पैदा किया है, और फिर (इस मतभेद का नतीजा यह होगा कि) तुम्हारे रब की बात तय हो चुकी है, "मैं जहन्नम को अपराधी जिन्नों और आदमियों से भर दूंगा।" (119)
अत: [ऐ रसूल!] हम ने आपको (पिछ्ले) रसूलों की कहानियाँ इसलिए सुनायी हैं ताकि इसके द्वारा हम आपके दिल को मज़बूत कर सकें और इन घटनाओं के बयान में सच्चाई की जो दलीलें आपके सामने आ गयीं हैं, वह ईमान रखनेवालों की (नसीहत के लिए) एक सबक़ [lesson] भी हैं और याद दिलाते रहने की चीज़ [reminder] भी। (120)
जो लोग विश्वास नहीं रखते, उनसे कह दें, "तुम्हें जो भी करना है तुम किए जाओ : हमें भी जो करना है, वह हम कर रहे हैं", (121)
और "(नतीजे का) इंतज़ार करो: हम भी इंतज़ार कर रहे हैं।" (122)
आसमानों और ज़मीन में छिपी हुईं तमाम चीजें अल्लाह की ही हैं, और (हर चीज़ का अधिकार उसी के पास है) सारे मामले उसी की ओर लौटते हैं। अतः [ऐ रसूल] आप उसी की इबादत में लगे रहें और उसी पर अपना पूरा भरोसा रखें : जो कुछ तुम (लोग) करते हो, उससे आपका रब कभी भी बेख़बर नहीं है। (123)
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