Middle Meccan Surah-3/ मध्यवर्ती मक्का काल-3 [617-620]
सूरह 56 : अल वाक़िया
[आनेवाली घड़ी, That which is Coming]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब आने वाली घड़ी [क़यामत] सामने आ जाएगी, (1)
तो उस घड़ी के आ जाने का कोई भी इंकार न कर पाएगा, (2)
किसी को नीचे ले जाएगी, किसी को ऊँचा उठा देगी। (3)
जब धरती भूँचाल से बुरी तरह डोलने लगेगी (4)
और पहाड़ टूटकर चूर्-चूर हो जाएँगे, (5)
यहाँ तक कि वे बिखरे हुए धूल होकर रह जाएँगे (6)
और तब, तुम लोगों को तीन दर्जों में छाँटा जाएगा। (7)
तो जो दाहिने हाथ वाले [सौभाग्यशाली] हैं---क्या कहना उन दाहिने हाथ वालों का! (8)
और बाएँ हाथ वाले [दुर्भाग्यशाली]--- तो क्या बताना उन बाएँ हाथ वालों (के बुरे हाल) का! (9)
और (तीसरे) जो सामने होंगे, वे तो हैं ही वरीयता में आगे चलनेवाले! (10)
यही वे लोग हैं जो अल्लाह के सबसे नज़दीक रहेंगे; (11)
नेमत से भरी (परम आनंद वाली) जन्नतों में: (12)
शुरू की पीढियों में से तो बहुत-से होंगे, (13)
किन्तु बाद की पीढियों [later generations] में से कम ही (होंगे)। (14)
ऊँचे तख़्तों पर जिस पर सोने के तारों से बुने हुए कपड़े (बिछे होंगे); (15)
तकिया लगाए, आमने-सामने बैठे होंगे। (16)
सदा बहार नौजवान लड़के (उनकी सेवा में) उनके बीच घूमते रहेंगे, (17)
प्याले, जग और विशुद्ध पेय से भरा हुआ जाम लिए हुए, (18)
जिस (के पीने) से न तो उन्हें सिर दर्द होगा और न उनके होश उड़ेंगे, (19)
(और वहाँ होंगे) हर एक फल जो वे पसन्द करें; (20)
और चिड़ियों का मांस जो वे चाहें; (21)
और (साथ निभाने के लिए) बड़ी आँखोंवाली ख़ूबसूरत हूरें! (22)
ऐसी मानो छिपा कर सुरक्षित रखे हुए मोती हों, (23)
यह सब कुछ उन (अच्छे) कामों के बदले में उन्हें मिलेगा, जो कुछ वे (दुनिया में) किया करते थे। (24)
उस जन्नत में वे न कोई व्यर्थ बात सुनेंगे और न कोई गुनाह की बात; (25)
हाँ, जो बात होगी, वह बेहद अच्छी, साफ़-सुथरी और सलामती वाली होगी! (26)
और जो दाएँ हाथवाले होंगे [सौभाग्यशाली लोग], तो क्या कहना उन दाएँ हाथवालों का! (27)
(वे मज़े करेंगे) बिन काँटों के बेरियों में; (28)
और गुच्छेदार केले से लदे पेड़ों में; (29)
दूर तक फैली हुई छाँव में; (30)
लगातार बहते हुए पानी में; (31)
बहुत-सारे फलों व मेवों में, (32)
जो न कभी ख़त्म होंगे और न उन्हें खाने की कोई रोक-टोक होगी। (33)
ऐसे जीवन-साथियों के साथ, जिनकी तुलना नहीं हो सकती, (34)
जिन्हें हमने ख़ास तौर से पैदा किया है --- (35)
कुँवारियाँ, (36)
प्रेम दर्शानेवाली और उम्र में बराबर!--- (37)
उन लोगों के लिए जो दाएँ हाथवाले [सौभाग्यशाली] हैं, (38)
(जिनमें) बहुत से शुरू की पीढ़ियों से होंगे (39)
और बहुत से बाद की पीढ़ियों से। (40)
लेकिन जो लोग बायीं हाथवाले [दुर्भाग्यशाली] हैं, तो क्या बताएं कि कैसे (बुरे लोग) हैं बाएँ हाथवाले! (41)
वे होंगे तपती हुई गर्म हवा और खौलते हुए पानी में; (42)
और काले धुएँ की छाँव में, (43)
जो न ठंडी होगी और न लाभप्रद। (44)
वे इससे पहले बड़े सुख-सम्पन्न थे; (45)
और बड़े गुनाह पर अड़े रहते थे। (46)
वे कहा करते थे, "क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें वास्तव में दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा? (47)
"और क्या हम से पहले गुज़रे हुए बाप-दादाओं को भी?" (48)
[ऐ रसूल] कह दें, "निश्चय ही सब अगली और पिछली पीढ़ियों के लोग, (49)
एक पहले से नियत दिन और समय पर अवश्य ही इकट्ठे कर दिए जाएँगे, (50)
"तो तुम (लोग) जो रास्ता भटके हुए हो, और सच्चाई का इंकार करनेवाले हो, (51)
ज़क़्क़ूम के कड़वे पेड़ में से खाओगे; (52)
"और उसी से पेट भरोगे; (53)
"और उसके ऊपर से खौलता हुआ पानी पीना पड़ेगा; (54)
"और पियोगे भी इस तरह जैसे प्यास की बीमारी वाले ऊँट पीते हैं।" (55)
तो बदला दिए जाने [फ़ैसले] के दिन, इसी तरह होगा उनका स्वागत! (56)
हमने तुम्हें पैदा किया है, फिर तुम इसका यक़ीन क्यों नहीं करते? (57)
तो क्या तुमने विचार किया जो [वीर्य/Semen] तुम टपकाते हो? (58)
क्या तुम उसे पैदा करते हो, या पैदा करने वाले हम हैं? (59)
और हमने ही तुम्हारे बीच मौत को तय कर रखा है। हमें कोई नहीं रोक सकता, (60)
कि हम चाहें तो तुम्हारे जैसों को बदल दें और तुम्हें ऐसी हालत में दोबारा पैदा करें जिसे तुम जानते नहीं। (61)
तुम तो जान चुके हो कि कैसे तुम पहली बार पैदा किए गए थे : फिर तुम इससे कोई सीख क्यों नहीं लेते? (62)
अच्छा यह बताओ कि जो कुछ तुम ज़मीन में बोते हो, (63)
क्या उसे तुम उगाते हो, या उगाने वाले हम हैंं? (64)
अगर हम चाहें तो उस फ़सल को भूसा बना दें, फिर तुम हैरान परेशान होकर चिल्लाते रह जाओ (65)
कि "हम पर तो क़र्ज़ का बोझ पड़ गया, (66)
बल्कि हम वंचित होकर रह गए!" (67)
अच्छा यह बताओ कि जो पानी तुम पीते हो--- (68)
क्या उसे वर्षावाले-बादलों से तुमने उतारा है या उतारने वाले हम हैंं? (69)
अगर हम चाहें, तो उसे अत्यन्त खारा बनाकर रख दें, फिर तुम कृतज्ञता क्यों नहीं दिखाते? (70)
अच्छा बताओ कि यह आग जिसे तुम सुलगाते हो--- (71)
क्या पेड़ की लकड़ियों को तुमने बनाया है या बनानेवाले हम हैंं? (72)
हमने उस आग को नसीहत का ज़रिया बनाया (ताकि लोग जहन्नम की आग से डरें) और मरुभुमि के मुसाफ़िरों और ज़रूरतमन्दों के लिए लाभप्रद बनाया। (73)
अतः [ऐ रसूल] आप अपने महान रब के नाम का गुणगान करें। (74)
मैं क़सम खाता हूँ सितारों की स्थितियों की --- (75)
और यह बहुत बड़ी क़सम है, यदि तुम जानो --- (76)
कि सचमुच यह बड़ा ही प्रतिष्ठित क़ुरआन है (77)
एक सुरक्षित किताब में (पहले से) लिखा हुआ है (78)
उसे केवल पाक-साफ़ आदमी ही हाथ लगाते हैंं, (79)
इसे सारे संसार के रब की ओर से (थोड़ा थोड़ा कर के) उतारा जा रहा है। (80)
फिर किस तरह तुम इस (पवित्र) बयान की उपेक्षा कर सकते हो? (81)
और तुम्हें जो रोज़ी दी गयी है उसका (शुक्रिया अदा करने के) बजाए तुम कैसे इसे मानने से इंकार कर सकते हो? (82)
फिर ऐसा क्यों नहीं होता जब (किसी के) प्राण (निकलते हुए) गले तक पहुँच जाते हैं (83)
जबकि उस समय तुम (बेबसी से) देख रहे होते हो ---- (84)
हम तुम से ज़्यादा उसके निकट होते हैंं, मगर तुम हमें नहीं देखते -– (85)
अगर तुम्हारा हिसाब-किताब नहीं होना है तो फिर ऐसा क्यों नहीं होता, (86)
कि तुम उसके (प्राण को) लौटा दो, अगर तुम्हारी बातें सच्ची हैं। (87)
फिर अगर वह (मरनेवाला) उन लोगों में हुआ, जिन्हें अल्लाह के नज़दीक वाली जगह मिलेगी; (88)
तो (उसके लिए) आराम है, सुकून है, और नेमतोंवाला बाग़ है; (89)
अगर वह उन लोगों में हुआ जो दाहिने हाथवालों [भाग्यशालियों] में से हैं, (90)
तो (उससे कहा जाएगा), "तुम्हारे लिए सलामती ही सलामती है कि तुम दाहिने हाथवालों में से हो।" (91)
और यदि वह उनमें से हुआ जिसने सच्चाई को मानने से इंकार किया और गुमराह हो गया; (92)
तो उसका पहला सत्कार खौलते हुए पानी से होगा, (93)
फिर उसे (जहन्नम की) आग में जलना है। (94)
निस्संदेह यह बिल्कुल सच्ची और पक्की बात है। (95)
अतः तुम अपने महान रब का नाम लेकर उसका गुणगान करो। (96)
सूरह 26 : अश शु’अरा [कविगण/The Poets]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ सीन॰ मीम॰ (1)
ये उस किताब की आयतें हैं, जो सच्चाई को स्पष्ट कर देती हैं : (2)
[ऐ रसूल], क्या आप यह सोच-सोच कर अपनी जान ही दे देंगे कि आख़िर वे लोग (आपकी बातों में) विश्वास क्यों नहीं करते? (3)
अगर हम ऐसा चाहते, तो उनपर आसमान से एक ऐसी निशानी उतार देते, कि फिर उसके आगे उनकी गर्दनें झुकी की झुकी रह जातीं। (4)
जब कभी दयालु रब [रहमान] की तरफ़ से उनके पास नयी नसीहतें [आयतें] भेजी जाती हैं, वे उससे मुँह मोड़ लेते हैं : (5)
वे इसे (मानने से) इंकार करते हैं, मगर जल्द ही उन्हें उसकी हक़ीक़त मालूम हो जाएगी, जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते रहे हैं। (6)
क्या उन्होंने धरती को नहीं देखा कि हमने उसमें कैसी-कैसी (वनस्पतियों की) क़िसमें उगा दीं? (7)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि उनमें से अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (8)
और तुम्हारा रब ही है जो बड़ा प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (9)
(उस समय का हाल सुनो) जबकि तुम्हारे रब ने मूसा [Moses] को पुकार कर कहा था, "ग़लत काम करनेवाले [ज़ालिम] लोगों के पास जाओ, (10)
यानी फ़िरऔन [Pharaoh] की क़ौम के पास --- क्या वे (अल्लाह की बातों पर) ध्यान नहीं देंगे?" (11)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे डर है कि वे मुझे झूठा कहेंगे, (12)
और मैं दुखी हो जाऊँगा और मेरी ज़बान बंद हो जाएगी, इसलिए (मेरे भाई) हारून [Aaron] को भी मेरे साथ भेज दें; (13)
इसके अलावा, मेरे ख़िलाफ़ उन लोगों ने एक (क़त्ल का) इल्ज़ाम भी लगा रखा है। इसलिए मैं डरता हूँ कि कहीं वे मुझे मार ही न डालें।" (14)
अल्लाह ने कहा, "नहीं [वे ऐसा नहीं कर सकते]! तुम दोनों हमारी निशानियाँ लेकर जाओ--- यक़ीन रखो, हम तुम्हारे साथ रहेंगे, और सब सुनते रहेंगे। (15)
अतः तुम दोनो फ़िरऔन को पास जाओ और कहो, “हम सारे संसार के रब की तरफ़ से संदेश ले कर आए हैं : (16)
इसराईल की सन्तानों को हमारे साथ जाने दो।" (17)
फ़िरऔन ने कहा, "क्या हमने तुम्हें अपने यहाँ रख कर पाला नहीं था जब तुम बच्चे थे? क्या तुम ने हमारे साथ रहते हुए अपनी उम्र के कई साल नहीं गुज़ारे थे? (18)
और फिर तुम ने अपने हाथ से वह अपराध कर डाला था : तुम बड़े एहसान फ़रामोश [ungrateful] हो।" (19)
मूसा ने जवाब दिया, “जब मैंने वह (घूँसा मारने का) काम किया, उस वक़्त मुझे धोखा हुआ था, (20)
और मैं तुम्हारे डर से यहाँ से भाग़ खड़ा हुआ था; बाद में, मेरे रब ने मुझे सही ज्ञान दिया और मुझे अपने रसूलों में शामिल कर लिया। (21)
और क्या यही बड़ा काम किया है तुम ने --- कि इसराईल की सन्तान को ग़ुलाम बना रखा है--- जो तुम मुझ पर अपना एहसान जता रहे हो?" (22)
फिर फ़िरऔन ने पूछा, "और यह सारे संसार का रब क्या होता है?" (23)
मूसा ने जवाब दिया, "वह सारे आसमानों का, ज़मीन का, और जो कुछ इन दोनों के बीच है, उन सबका रब है, अगर तुम सचमुच विश्वास कर सको!" (24)
फ़िरऔन ने वहाँ मौजूद लोगों से कहा, "क्या तुम ने सुना, जो कुछ इस ने कहा?" (25)
मूसा ने कहा, "वह तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं का भी रब है।" (26)
फ़िरऔन ने कहा, "यह रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, सचमुच ही पागल है।" (27)
मूसा ने आगे कहा, "वह पूरब और पश्चिम का भी रब है और जो कुछ उनके बीच है उसका भी रब है, (समझ जाओगे) अगर तुम अपनी बुद्धि से काम लो!" (28)
मगर फिरऔन ने (मूसा से) कहा, "अगर तूने मेरे सिवा किसी और को पूजने के क़ाबिल माना, तो मैं तुझे ज़रूर बन्दी बना लूँगा", (29)
इस पर मूसा ने पूछा, "क्या तब भी, अगर मैं तुम्हें कोई ऐसी चीज़ दिखा दूँ जिसे (देख कर) तुम मान जाओ?" (30)
“अच्छा ठीक है, दिखाओ, अगर तुम सच बोल रहे हो", फ़िरऔन ने कहा। (31)
अत: मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, देखते ही देखते वह अजगर साँप बन गयी। (32)
फिर उसने अपना हाथ (बग़ल से) खींच कर निकाला, तो वह पल भर में देखनेवालों के सामने सफ़ेद हो कर चमकने लगा। (33)
फ़िरऔन ने अपने आसपास मौजूद सरदारों से कहा, "यह आदमी तो बड़ा ही माहिर जादूगर है! (34)
ऐसा लगता है कि यह अपने जादू से तुम्हें तुम्हारी ज़मीन से निकाल बाहर करना चाहता है! तो अब तुम्हारी क्या राय है?" (35)
उन्होंने जवाब दिया, "इसे और इसके भाई को अभी कुछ समय के लिए टाल दें, और सभी शहरों में संदेशवाहकों को भेज दें, (36)
ताकि सभी मँझे हुए जादूगरों को आपके पास लाया जा सके।" (37)
जादूगरों को एक ख़ास दिन में एक नियत समय पर जमा होना था, (38)
और लोगों से पूछा गया था, (39)
"क्या तुम सब लोग (देखने) आ रहे हो? अगर जादूगरों की जीत होती है, तो हम उनके बताए हुए रास्ते पर चल सकते हैं।" (40)
फिर जादूगरों ने वहाँ पहुँच कर फ़िरऔन से कहा, "अगर हम जीत जाएंगे, तो क्या हमें कोई इनाम दिया जाएगा?" (41)
उसने कहा, "हाँ, हाँ, तुम हमारे क़रीबी दरबारियों में शामिल कर लिए जाओगे।" (42)
मूसा ने उनसे कहा, "फेंको, जो कुछ तुम फेंकना चाहते हो।" (43)
तब जादूगरों ने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकी और बोले, "फ़िरऔन की इज़्ज़त व ताक़त की क़सम! हम ही विजयी रहेंगे।" (44)
मगर मूसा ने अपनी लाठी जैसे ही ज़मीन पर फेंकी, तो क्या देखते हैं कि वह (अजगर बन कर) उस स्वांग से रची गयी चीज़ों को निगल गया, (45)
और इस पर जादूगर घुटनों के बल (सज्दे में) गिरा दिए गए, (46)
और बोल उठे, "हम ने सारे संसार के रब पर विश्वास कर लिया, (47)
जो मूसा और हारून का रब है!" (48)
फ़िरऔन ने कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि मेरी अनुमति लिए बिना ही, तुम ने इस पर विश्वास भी कर लिया? यह ज़रूर तुम सबका उस्ताद है, जिसने तुमको जादू सिखाया है! अच्छा, तो अभी तुम्हें मालूम हुआ जाता है: मैं तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव कटवा दूँगा, और तुम सब को सूली पर चढ़ा दूँगा!" (49)
जादूगरों ने कहा, "हमारा तो इससे कोई नुक़सान नहीं होगा, क्योंकि यह बात पक्की है कि हम को अपने रब के पास लौट कर जाना है। (50)
उम्मीद है कि हमारा रब हमारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, क्योंकि सबसे पहले हमने विश्वास कर लिया था।" (51)
हमने मूसा को वही [revelation] भेज कर अपनी बात बतायी, "मेरे बन्दों को लेकर रातों-रात निकल जाओ, अवश्य ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा!" (52)
इस बीच फ़िरऔन ने शहरों में संदेशा देनेवालों को यह कहते हुए भेजा, (53)
"यह (इसराईल की संतानें) कमज़ोर और थोड़े से लोगों की एक टोली है--- (54)
उन लोगों ने हमें ताव दिलाया है--- (55)
और हम एक बड़ी सेना हैं, हमेशा तैयार रहने वाली।" (56)
अंत में, ऐसा हुआ कि उन (फिरऔन के लोगों) को --- अपने बाग़ों और पानी के सोतों को, (57)
अपने ख़जानों, और रहने के बेहतरीन मकानों को--- छोड़कर निकलना पड़ा।(58)
हम ने ऐसी चीज़ें (बाद में) इसराईल की सन्तानों को दे दी। (59)
सुबह-तड़के ही फ़िरऔन और उसके लोगों ने उनका पीछा किया, (60)
फिर जैसे ही दोनों तरफ़ के लोग (नज़दीक पहुंचे) और एक-दूसरे को दिखाई देने लगे, तो मूसा के माननेवालों ने कहा, "अब हम ज़रूर पकड़े जाएंगे!" (61)
मूसा ने कहा, "नहीं, मेरा रब मेरे साथ है: वह अवश्य रास्ता दिखाएगा", (62)
और हमने मूसा को 'वही' भेजी, "अपनी लाठी समंदर पर मारो।" समंदर दो हिस्सों में फट गया ----- हर एक हिस्सा ऊँचे पहाड़ की तरह खड़ा हो गया (और रास्ता बन गया) ---- (63)
और हम दूसरों [फ़िरऔन व उसके साथियों] को भी उसी जगह ले आए : (64)
और हमने मूसा को और उनके सभी साथियों को बचा लिया, (65)
और बाक़ी बचे (फ़िरऔन के) लोगों को डुबा दिया। (66)
सचमुच इसमें एक बड़ी निशानी है, मगर अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (67)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे ताक़तवाला, सब पर दयावान है। (68
और [ऐ रसूल] उन्हें इबराहीम [Abraham] की कहानी सुनाएं, (69)
जबकि उसने अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किसे पूजते हो?" (70)
उन्होंने कहा, "हम मूर्तियों की पूजा करते हैं, और हम तो उन्हीं की सेवा में लगे रहते हैं।" (71)
उसने पूछा, "क्या ये तुम्हारी बात सुनते हैं, जब तुम पुकारते हो, (72)
क्या ये तुम्हारी कुछ मदद या हानि पहुँचाते हैं?" (73)
उन्होंने कहा, "नहीं, बल्कि हमने तो अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते हुए देखा है।" (74)
इबराहीम ने कहा, "कभी तुम ने यह सोचा कि तुम किसकी पूजा करते रहे हो, (75)
तुम और तुम्हारे बाप-दादा, (76)
वे सब तो मेरे लिए दुश्मन हैं; मगर सारे संसार के रब की बात अलग है, (77)
जिसने मुझे पैदा किया। फिर वही है जो मुझे सीधा रास्ता दिखाता है; (78)
और वही है जो मुझे खिलाता और पिलाता है; (79)
जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही मुझे ठीक कर देता है; (80)
और वही है जो मुझे मौत देगा, और फिर मुझे दोबारा ज़िंदगी देगा; (81)
और वही है जिससे मुझे उम्मीद है कि फ़ैसले के दिन वह मेरी ग़लतियाँ माफ़ कर देगा। (82)
ऐ मेरे रब! मुझे ज्ञान व समझ-बूझ दे; और मुझे नेक लोगों के साथ शामिल कर ले; (83)
और मुझे बाद में आनेवाली नस्लों में भी अच्छे नामों से याद किया जाता रहे; (84)
और मुझे उनमें से बना जिन्हें नेमतों वाली जन्नत [Garden of bliss] दी जाएगी--- (85)
और मेरे बाबा को माफ़ कर दे, कि वह उन लोगों में से हैं जो सही रास्ते से भटक चुके हैं——(86)
और मुझे उस दिन की बेइज़्ज़ती से बचा, जब सब लोग जीवित करके दोबारा उठाए जाएँगे : (87)
उस दिन न माल काम आएगा और न बाल-बच्चे ही कोई मदद कर सकेंगे, (88)
और उस दिन केवल वही सुरक्षित बच पाएगा, जो अल्लाह के सामने ऐसा दिल लेकर आया हो, जो पूरी भक्ति से उसके ही सामने झुकनेवाला हो।" (89)
जब (जन्नत के) बाग़ को सही रास्ते पर चलनेवाले नेक लोगों के नज़दीक लाया जाएगा, (90)
और (जहन्नम की) आग भटके हुए लोगों के ठीक सामने खड़ी कर दी जाएगी, (91)
और तब उनसे पूछा जाएगा, "कहाँ हैं वे जिन्हें तुम पूजते थे, (92)
अल्लाह को छोड़ कर? क्या वे अब तुम्हारी सहायता कर सकते हैं या अपना बचाव ही कर सकते हैं?" (93)
और उसके बाद, उन सब को जहन्नम में फेंक दिया जाएगा, साथ में उन लोगों को भी जो उन्हें सीधे रास्ते से भटका देते थे, (94)
और इबलीस [शैतान] के सारे समर्थक भी (आग में डाले जाएंगे)। (95)
वहाँ वे आपस में तू तू मैं मैं करते हुए, अपने (गढ़े हुए) ख़ुदाओं से कहेंगे, (96)
"अल्लाह की क़सम! हम उस समय सचमुच बड़ी गुमराही में थे, (97)
जब हम ने तुम्हें सारे संसार के रब के बराबर ठहराया था। (98)
वे शैतानियाँ करनेवाले लोग ही थे जिन्होंने हमें सही रास्ते से भटका दिया था, (99)
और अब हमारे लिए न तो कोई सिफ़ारिश करनेवाला है, (100)
और न कोई सच्चा दोस्त है। (101)
काश! अगर हम अपनी ज़िंदगी दोबारा जी पाते, तो हम पक्के ईमानवाले [मोमिन] हो जाते!" (102)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (103)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (104)
नूह [Noah] की क़ौम ने भी रसूलों को झुठा बताया। (105)
उनके भाई नूह ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (106)
निस्संदेह मैं एक भरोसेमंद रसूल हूँ, जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ : (107)
अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो। (108)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है: (109)
अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो।" (110)
उन्होंने जवाब दिया, "हम तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास कर लें, जबकि तुम्हारे पीछे चलनेवाले तो बिल्कुल ही नीच क़िस्म के लोग हैं?" (111)
नूह ने कहा, "मुझे क्या मालूम कि वे क्या करते थे? (112)
उनका हिसाब लेने का काम तो बस मेरे रब के हाथ में है---काश तुम समझ पाते--- (113)
और जिन लोगों ने (मेरी बात पर) विश्वास कर लिया, मैं उन्हें दुतकारनेवाला तो हूँ नहीं। (114)
मैं तो बस यहाँ इसीलिए हूँ कि लोगों को साफ़ साफ़ चेतावनी दे दूँ।" (115)
इस पर उन लोगों ने कहा, "ऐ नूह! अगर तुम ने अपनी हरकतें बंद नहीं की, तो तुम्हें ज़रूर पत्थरों से मार डाला जाएगा।" (116)
नूह ने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम के लोगों ने मेरी बात मानने से इंकार कर दिया है, (117)
इसलिए अब मेरे और उनके बीच दो टूक फ़ैसला कर दे, और मुझे और मेरे ईमानवाले साथियों को बचा ले!" (118)
इस तरह, हमने उसे और उसके माननेवाले जो भरी हुई नौका में थे, बचा लिया, (119)
और बाक़ी बचे लोगों को डुबा दिया। (120)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (121)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (122)
आद के लोगों ने भी रसूलों को झूठा बताया। (123)
उनके भाई हूद ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (124)
निस्संदेह मैं एक भरोसेमंद रसूल हूँ, जो तुम्हारे पास भेजा गया हूँ : (125)
अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो। (126)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (127)
क्या तुम दिखावे के लिए हर ऊँची जगह पर बेकार के स्मारक ही बनाते फिरोगे? (128)
क्या तुम इस आशा में क़िले बनवाते रहते हो कि जैसे तुम्हें यहाँ हमेशा ज़िंदा रहना है? (129)
और जब किसी पर हमला करते हो, तो बिल्कुल निर्दयी ज़ालिम क्यों बन जाते हो? (130)
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो; (131)
उस (अल्लाह) का डर रखो, जिसने तुम तक वह सारी चीज़े पहुँचाई हैं जिन्हें तुम अच्छी तरह जानते हो--- (132)
उसने तुम्हें चौपाए और बाल-बच्चे दिए हैं, (133)
और बाग़ व पानी के सोते [Springs] भी--- (134)
इस कारण मुझे सचमुच डर है कि एक बड़े दर्दनाक दिन की यातना तुम्हें घेर लेगी।" (135)
जवाब में वे बोले, "चाहे तुम हमें सावधान करो या न करो, हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है, (136)
क्योंकि हम तो केवल वही करेंगे, जैसा कि हमारे बाप-दादा किया करते थे: (137)
हमें कोई सज़ा नहीं दी जाएगी।" (138)
उन लोगों ने हूद को खुले आम झूठा घोषित कर दिया, जिसके नतीजे में हम ने उन्हें बर्बाद कर दिया। सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (139)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (140)
समूद के लोगों ने भी रसूलों को झुठा कहा। (141)
उनके भाई सालेह ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (142)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ : (143)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (144)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (145)
(क्या तुम सोचते हो कि) यहाँ जो कुछ है उनके बीच, तुम हमेशा के लिए सुरक्षित छोड़ दिए जाओगे--- (146)
इन बाग़ों और पानी के सोतों, (147)
खेतों और फलों से लदे हुए खजूर के पेड़ों के बीच--- (148)
और पहाड़ों को काट-काटकर नफ़ासत से बनाए हुए घरों के बीच (क्या सदा के लिए रहोगे)? (149)
अतः अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो : (150)
और उन मर्यादा को तोड़नेवालों का कहना बिल्कुल न मानो, (151)
जो धरती में गड़बड़ी फैलाते रहते हैं, बजाए इसके कि चीज़ों को सुधारते व सही काम करते।" (152)
उन्होंने कहा, "तुम पर तो जादू कर दिया गया है! (153)
तुम और कुछ नहीं, बस हमारे ही जैसे एक आदमी हो। अगर तुम सच बोल रहे हो तो कोई निशानी दिखाओ।" (154)
सालेह ने कहा, "(ठीक है, लो) यह ऊँटनी है, पानी पीने की बारी इसकी अलग होगी, और तुम्हारी बारी अलग होगी, और हर एक के लिए पीने का एक नियत दिन होगा। (155)
सो देखना, उस (ऊँटनी) को कोई नुक़सान नहीं होना चाहिए, अन्यथा एक बड़े भयानक दिन की यातना तुम्हें आ पकड़ेगी।" (156)
मगर उन लोगों ने उसके पाँव की कूचें [hamstring] काट डालीं। सुबह में वे (अपनी ग़लती पर) पछताते रह गए : (157)
यातना ने उन्हें आ दबोचा था। सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (158)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (159)
लूत [Lot] की क़ौम के लोगों ने भी रसूलों को झुठा बताया। (160)
उनके भाई लूत ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (161)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ : (162)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (163)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (164)
क्या दूसरे लोगों से तुम अलग-थलग हो कि (सेक्स के लिए) मर्दों के पास जाते हो, (165)
और अपनी पत्नियों को तुमने छोड़ रखा है, जिन्हें अल्लाह ने तुम्हारे लिए पैदा किया है? तुम तो सारी सीमाएं तोड़ रहे हो।" (166)
मगर उन लोगों ने जवाब दिया, "ऐ लतू! अगर तुम ने सचमुच अपनी बातें बंद नहीं कीं, तो तुम्हें अवश्य ही निकाल बाहर किया जाएगा।" (167)
सो लूत ने कहा, "जो हरकत तुम करते हो, उससे मुझे नफ़रत है : (168)
ऐ मेरे रब! जो कुछ ये करते हैं, उससे मुझे और मेरे परिवार के लोगों को बचा ले।" (169)
फिर हमने उसे और उसके परिवार के सारे लोगों को बचा लिया; (170)
सिवाए एक बुढ़िया के, जो पीछे रह जानेवालों में थी, (171)
फिर दूसरे सभी लोगों को हमने बर्बाद कर दिया, (172)
और हमने उनपर एक तबाहीवाली बारिश बरसाई--- और कितनी भयानक बारिश थी वह, उन लोगों के लिए जिन्हें पहले सावधान किया जा चुका था! (173)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (174)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (175)
अल-ऐका [जंगल में रहनेवालों] ने भी रसूलों को झुठा कहा। (176)
शुऐब ने उनसे कहा, "क्या तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से नहीं बचोगे? (177)
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक भरोसेमंद रसूल हूँ : (178)
अल्लाह से डरो, और मेरा कहा मानो। (179)
मैं इसके लिए तुमसे कोई इनाम तो नहीं माँगता, क्योंकि मेरा इनाम तो बस उसके पास है जो सारे संसार का पालनहार है। (180)
नाप-तौल के मुताबिक़ पूरा दिया करो : दूसरों को बेचते समय (नाप से) कम न दो। (181)
सही व ठीक तराज़ू से तौलो: (182)
लोगों को उनकी चीज़ों में कमी कर के न दो। धरती पर गड़बड़ी व लूटमार [corruption] न मचाओ। (183)
अल्लाह से डरो, जिसने तुम्हें और पिछली नस्लों को पैदा किया", (184)
मगर उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम पर तो जादू कर दिया गया है! (185)
तुम और कुछ नहीं, बस हमारे ही जैसे एक आदमी हो। असल में तो हम तुम्हें झूठा समझते हैं। (186)
अगर तुम सच बोल रहे हो, तो हम पर आसमान का कोई टुकड़ा ही गिरा के दिखा दो।" (187)
शुऐब ने कहा, "मेरा रब अच्छी तरह से जानता है जो कुछ तुम करते हो।" (188)
उन लोगों ने उसे झुठा कहा, और इस तरह छायावाले दिन की यातना ने उन्हें आ दबोचा--- वह एक बड़े भयानक दिन की यातना थी! (189)
सचमुच ही इसमें एक बड़ी निशानी है, हालाँकि अधिकतर लोग विश्वास नहीं करते : (190)
तुम्हारा रब ही है जो सबसे प्रभुत्वशाली, सब पर दयावान है। (191)
सचमुच इस क़ुरआन को सारे संसार के रब ने उतार भेजा है : (192)
एक भरोसेमंद रूह [जिबरईल] इसे लेकर आए, (193)
और इसको [ऐ रसूल], आपके दिल पर उतारा गया, ताकि आप चेतावनी दे सकें, (194)
साफ़ अरबी ज़बान में। (195)
यह पिछले धर्मों की आसमानी किताबों में पहले ही बता दिया गया था। (196)
क्या उनके लिए यह सबूत काफ़ी नहीं कि इसराईल की संतानों में पढ़े-लिखे लोगों ने इसे पहचान लिया है? (197)
अगर हम इसे किसी ऐसे आदमी पर उतारते, जो अरब का न होता, (198)
और वह इसे पढ़कर उन्हें सुनाता, तब भी उन लोगों ने इस पर विश्वास नहीं किया होता। (199)
इस तरह, हम ने अपराधियों के दिलों में ये बातें डाल दीं, जो उनके दिल से होती हुई सीधे गुज़र जाती हैं, (200)
वे उस वक़्त तक इस में विश्वास नहीं करेंगे, जब तक कि दर्दनाक यातना ख़ुद न देख लें, (201)
फिर वह (यातना) अचानक उन पर आ जाएगी, और उन्हें इसके आने की ख़बर तक न होगी, (202)
और तब वे कहेंगे, "क्या हमें कुछ मुहलत मिल सकती है?" (203)
तो फिर कैसे यह लोग माँग करते हैं कि हमारी यातना उन तक जल्दी से जल्दी ले आयी जाए? (204)
ज़रा सोचो, अगर हम उन्हें इस जीवन में कुछ सालों तक मज़ा उठाने दें; (205)
फिर उन पर वह यातना आ जाए, जिससे उन्हें डराया जाता है; (206)
तो जो सुख (पहले) उन्हें मिला होगा, उसका उन्हें क्या फ़ायदा होगा? (207)
हमने कभी भी किसी बस्ती को उस वक़्त तक तबाह-बर्बाद नहीं किया, जब तक कि पहले रसूलों को उनके पास सावधान करने के लिए नहीं भेज दिया, (208)
जो हमारी तरफ़ से उन्हें याद दिला दें [reminder] : हम कभी ना-इंसाफ़ी नहीं करते हैं। (209)
वह कोई जिन्न [या शैतान] नहीं है जो इस क़ुरआन को लेकर उतरा है : (210)
न तो वे इस काम के लायक़ हैं, और न ही उन्हें ऐसा करने की शक्ति है, (211)
सच तो यह है कि वे इसके सुनने से भी दूर रखे गए हैं। (212)
अतः [ऐ रसूल] आप अल्लाह के अलावा दूसरे ख़ुदाओं को कभी न पुकारें, अन्यथा आप भी सज़ा पानेवालों में होंगे, (213)
और अपने नज़दीकी नातेदारों को सावधान कर दें, (214)
और जो भी विश्वास रखनेवाले आपके रास्ते पर चलते हैं, उनके लिए स्नेह दिखाते हुए अपने कंधे झुका दें। (215)
अगर वे आपकी आज्ञा न मानें, तो कह दें, "जो कुछ तुम करते हो, उसके लिए मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ।" (216)
उस प्रभुत्वशाली और बेहद दया करनेवाले पर भरोसा रखें, (217)
जो आपको देख रहा होता है, जब आप (नमाज़ के लिए) खड़े होते हैं (218)
और जब सज्दे में झुकनेवालों के पास आते-जाते हैं : (219)
वह सब कुछ सुनता है, सब जानता है। (220)
क्या मैं बताऊँ कि शैतान किन लोगों पर उतरते हैं? (221)
वे हर ढोंग रचनेवाले झूठे व गुनाहगार पर उतरते हैं, (222)
जो सुनी सुनायी बातों पर कान लगाते हैं, और उनमें से अधिकतर झूठे हैं: (223)
और कवियों के पीछे तो केवल वही लोग चलते हैं जिन्होंने अपने आपको ग़लतियों में गुम कर लिया हो। (224)
क्या तुमने देखा नहीं कि वे हर घाटी में बेमक़सद भटकते फिरते हैं; (225)
और यह कि, वह जो बात कहते हैं, करते नहीं? (226)
हाँ, उन (कवियों) की बात अलग है जो (रसूल की बातों में) विश्वास करते हैं, अच्छे कर्म करते हैं, और अल्लाह को अक्सर याद करते हैं, और जब भी बदमाशों ने उन पर निशाना साधा, तो (कविता के द्वारा) वे अपना बचाव करते हैं। शैतानियाँ करनेवालों को जल्द ही पता चल जाएगा कि वे किस अंजाम की तरफ़ लौट कर जानेवाले हैं। (227)
सूरह 27 : अन-नम्ल [चीटियाँ/ The Ants]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ सीन॰।
ये आयतें हैं क़ुरआन की ---- एक ऐसी किताब की, जो चीज़ों को स्पष्ट कर देती है; (1)
ईमान रखनेवालों को सही रास्ता दिखानेवाली और खुशख़बरी सुनानेवाली, (2)
(ईमानवाले वे हैं) जो नमाज़ को पाबंदी से अदा करते हैं, और (ज़रूरतमंदों को) ज़कात [alms] देते हैं, और आनेवाले जीवन [आख़िरत/ परलोक] में पक्का विश्वास रखते हैं। (3)
रहे वे लोग जो आनेवाले जीवन [Hereafter] में विश्वास नहीं रखते, उनकी नज़रों में हमने उनके कर्मों को बड़ा लुभावना बना दिया है, अतः वे (अंधों की तरह) भटकते फिरते हैं : (4)
यही वे लोग हैं, जिनके लिए बहुत बुरी यातना होगी, और वे आनेवाले जीवन में सबसे ज़्यादा नुक़सान उठानेवालों में रहेंगे। (5)
[ऐ रसूल] आप इस क़ुरआन को उस (अल्लाह) की तरफ़ से पा रहे हैं, जो (अपने हर काम में) बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (6)
याद करो जब मूसा [Moses] ने अपने घरवालों से कहा, "मैंने एक आग-सी देखी है। मैं वहाँ से (रास्ते की) कोई ख़बर लेकर आता हूँ, या तुम्हारे लिए कोई जलती हुई लकड़ी लेकर आता हूँ, ताकि तुम अपने आपको गरमा सको।" (7)
फिर जब वह आग के नज़दीक पहुँचे, तो एक आवाज़ ने उन्हें पुकारा, "बरकतवाला [Blessed] है वह, जो इस आग के नज़दीक है, और वह भी [फ़रिश्ते] जो इसको घेरे हुए हैं; महान है अल्लाह, सारे संसार का रब! (8)
ऐ मूसा! मैं अल्लाह हूँ, बेहद प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझवाला! (9)
अपनी लाठी नीचे फेंक दो।" जब मूसा ने देखा कि वह (लाठी) हिल-डुल रही है जैसे कोई साँप हो, तो वह पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर न देखा। (फिर आवाज़ आयी) "ऐ मूसा, डरो नहीं! मेरी मौजूदगी में रसूलों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं, (10)
मैं सचमुच बड़ा माफ़ करनेवाला, और उन लोगों पर बहुत दया करनेवाला हूँ, जो ग़लती करते हैं, और फिर की गयी बुराई को अच्छाई में बदल देते हैं। (11)
अपना हाथ गिरेबान में डालो, और फिर (बाहर निकालो) तो वह बिना किसी ख़राबी के सफ़ेद चमकता हुआ बाहर निकलेगा। यह (दो निशानियाँ) उन नौ (9) निशानियों में से हैं जिन्हें फ़िरऔन और उसकी क़ौम के सामने जाकर तुम्हें दिखाना होगा; वे सचमुच (मर्यादा की) हद से आगे बढ़ हुए हैं।" (12)
मगर जब आँखें खोल देनेवाली हमारी निशानियाँ उनके पास आयीं, तो उन्होंने कहा, "यह तो साफ़ तौर से जादू मात्र है!" (13)
हालाँकि उन्होंने दिल में इन (निशानियों) को सच जाना था, मगर उन लोगों ने शैतानी और घमंड के कारण उसे मानने से इंकार कर दिया। अब देख लो इन गड़बड़ी [corruption] फैलानेवालों का परिणाम क्या हुआ? (14)
हमने दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को बहुत ज्ञान दिया था, (उन्होंने उसके महत्व को समझा) और उन दोनों ने कहा था, "सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने अपने बहुत-से ईमानवाले बंदों में हम पर ख़ास तौर से मेहरबानी [favour] की।" (15)
दाऊद के बाद सुलैमान उनका वारिस हुआ. उसने कहा, "ऐ लोगो! हमें चिड़ियों की बोली सिखायी गई है, और हमें हर चीज़ में हिस्सा दिया गया है : यह सचमुच (अल्लाह की) ख़ास मेहरबानी है।" (16)
(एक बार) सुलैमान के सामने जिन्नों, आदमियों और चिड़ियों से तैयार की हुई सेना एक ख़ास वरीयता के अनुसार क़तारों में खड़ी [marshalled] की गई, (17)
और सेना जब चींटियों की घाटी में पहुँची, तो एक चींटी ने कहा, "ऐ चींटियों! अपने अपने घरों में घुस जाओ। कहीं सुलैमान और उसकी सेना तुम्हें अनजाने में कुचल ही न डालें।" (18)
सुलैमान उसकी बात सुनकर ज़ोर से मुस्कराए और कहा, "मेरे रब! मुझ में ऐसा गुण दे दे कि जो नेमतें [blessings] तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को दी हैं, मैं उनका शुक्र अदा करता रहूँ, और यह कि अच्छे कर्म करूँ जिसे तू ख़ुश हो जाए; और अपने करम से मुझे अपने नेक व अच्छे बंदों के दर्जे में शामिल कर ले।" (19)
(एक बार) सुलैमान ने चिड़ियों की उपस्थिति की जाँच की और कहा, "क्या बात है कि मैं हुदहुद [Hoopoe] को नहीं देख रहा हूँ? क्या वह यहाँ हाज़िर नहीं? (20)
अगर उसने अपने यहाँ मौजूद न होने का कोई सही कारण न बताया, तो मैं उसे कठोर दंड दूँगा या उसे मार ही डालूँगा।" (21)
लेकिन हुदहुद ने बाहर में ज़्यादा देर नहीं लगायी : उसने (आकर) कहा, "मुझे कुछ ऐसी बात पता चली है जो आपको मालूम नहीं है : मैं सबा [Sheba] से आपके पास एक पक्की ख़बर लेकर आया हूँ। (22)
मैंने वहाँ एक औरत को उन लोगों पर शासन करते हुए पाया, जिसे हर चीज़ का एक हिस्सा दिया गया है---- उसका एक ज़बरदस्त सिंहासन है--- (23)
(मगर) मैंने उसे और उसकी क़ौम के लोगों को अल्लाह के बजाए सूरज की पूजा करते हुए पाया। शैतान ने उन पर कुछ ऐसा (जादू) किया है कि उन लोगों को अपने (बुरे) कर्म बहुत भले मालूम होते हैं, और उन्हें सही मार्ग से भटका रखा है : वे सही मार्ग पर नहीं चल सकते। (24)
क्या उन्हें उस अल्लाह की इबादत नहीं करनी चाहिए, जो आसमानों और ज़मीन में कहीं भी दबी-छिपी चीज़ें बाहर निकाल लाता है, और वह जानता है —-- उसे भी जो कुछ तुम छिपाते हो और उसे भी जो कुछ तुम सामने बता देते हो? (25)
वह अल्लाह है, उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं, ज़बरदस्त सिंहासन का मालिक है।" (26)
सुलैमान ने कहा, "हम देखेंगे कि तू सच कह रहा है या झूठ बोल रहा है। (27)
मेरा यह ख़त लेकर जा, और इसे उन लोगों तक पहुँचा दे, फिर उनके पास से अलग हट जाना, और देखना कि वे क्या जवाब भेजते हैं।" (28)
सबा की मल्लिका ने कहा, "ऐ सरदारो! एक बड़ा ही शानदार ख़त मेरे पास भेजा गया है। (29)
वह सुलैमान की तरफ़ से है और उसमें यूँ लिखा है, “अल्लाह के नाम से शुरू जो बड़ा मेहरबान, अत्यन्त दयावान है, (30)
अपने आपको मुझ से ऊपर न समझो, और मेरे पास चली आओ (अल्लाह के सामने) झुकते हुए।" (31)
सबा की रानी ने कहा, "ऐ सरदारो! मेरे सामने जो मामला आया है, इस पर आप मुझे सही सलाह दें : (आप तो जानते हैं कि) मैं सारे मामलों का फ़ैसला हमेशा आप लोगों की मौजूदगी में ही करती हूँ।" (32)
उन्होंने जवाब दिया, "हमारी सेना बहुत तगड़ी है और हम पूरी ताक़त से युद्ध लड़ते हैं, मगर कमान तो आपके हाथ में है, अतः आप सोच लें कि आपको क्या आदेश देना है।" (33)
सबा की रानी ने कहा, "जब भी कभी राजा किसी शहर में (सेना के साथ) घुसते हैं, तो उसे खंडहर बना देते हैं और वहाँ के सरदारों को अपमानित करते हैं ---- वे भी ऐसा ही करेंगे। (34)
मगर मैं उनके पास एक तोहफ़ा भेजने जा रही हूँ; फिर देखती हूँ कि मेरे दूत क्या जवाब लेकर लौटते हैं।" (35)
फिर जब वह दूत सुलैमान के पास पहुँचा, तो सुलैमान ने उससे कहा, "क्या! तुम क्या मुझे धन-दौलत देना चाहते हो? जो कुछ अल्लाह ने मुझे दे रखा है, वह उससे कहीं उत्तम है जो उसने तुम्हें दिया है, मगर तब भी तुम लोग अपने इस तोहफ़े से बड़े ख़ुश मालूम होते हो! (36)
अपने लोगों के पास वापस चले जाओ : अब हम उन पर ज़रूर अपनी सेना के साथ चढ़ायी करेंगे जिसे रोक पाना उनके बस का नहीं, उन्हें अपमानित करके व नीचा दिखाते हुए हम उन्हें उस ज़मीन से खदेड़ देंगे।" (37)
फिर सुलैमान ने कहा, "ऐ सरदारो! इससे पहले कि वे लोग हमारे पास झुके हुए आएँ, तुममें से कौन है जो उस (रानी) का सिंहासन लेकर मेरे पास आ सकता है?" (38)
एक ताक़तवर और चालाक जिन्न ने जवाब दिया, "इससे पहले कि आप अपनी जगह से उठें, मैं उस (सिंहासन) को आपके पास ले आऊँगा। मैं मज़बूत भी हूँ, और भरोसे के लायक़ भी।" (39)
मगर उनमें से एक आदमी जिसे आसमानी किताब का ज्ञान था, कहने लगा, "मैं पलक झपकते ही उसे आपके पास ले आऊँगा।"
फिर जब सुलैमान ने उस सिंहासन को अपने पास रखा हुआ देखा तो कहा, "यह मेरे रब का मुझ पर एहसान है, ताकि वह मेरी परीक्षा करे कि मैं उसका शुक्र अदा करता हूँ या नहीं : अगर कोई शुक्र अदा करता है तो वह अपने ही फ़ायदे के लिए करता है, और अगर कोई उसका शुक्र अदा नहीं करता, तो मेरा रब किसी पर निर्भर तो नहीं, बल्कि देने में वह बड़ा उदार [generous] है।" (40)
फिर उसने कहा, "उसके सिंहासन का रूप बदल दो, फिर देखेंगे कि वह उसे पहचान पाती है या नहीं।" (41)
जब सबा की रानी वहाँ पहुँचीं तो उनसे पूछा गया, "क्या यह सिंहासन आपका है?" उसने कहा, "हाँ, देखकर लगता तो है”, (सुलैमान ने कहा), “हमें तो इस रानी से पहले ही (सही) ज्ञान दे दिया गया था, और हम अल्लाह के सामने भक्ति-भाव से अपने आपको झुकाते थे"; (42)
मगर चूँकि अल्लाह के बजाए वह किसी और को [सूरज को] पूजती थी, इसलिए (अल्लाह में) विश्वास कर लेने [ईमान] से रानी अब तक रुकी रही थी, असल में वह एक इंकार करनेवाली [काफ़िर] क़ौम में से थी। (43)
फिर सबा की रानी से कहा गया, "महल में दाख़िल हों।" मगर जब उसने वहाँ देखा, तो उसे ऐसा लगा कि पानी का एक गहरा हौज़ है और इसीलिए वह (अपने पाँव का कपड़ा उठाते हुए) नंगे पैर हो गयी। सुलैमान ने समझाया, "यह तो बस शीशे से बना हुआ महल है।" रानी बोली, "ऐ मेरे रब! निश्चय ही मैंने (अब तक ग़लती करके) अपने आप पर ज़ुल्म किया : अब मैं, सुलैमान के साथ पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकती हूँ, जो सारे संसार का रब है।" (44)
समूद के लोगों की ओर हमने उनके भाई, सालेह, को (पैग़म्बर बनाया, और) यह कहते हुए भेजा कि "केवल अल्लाह की बन्दगी करो, "मगर वे लोग दो विरोधी गुटों में बँट गए। (45)
सालेह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, तुम अच्छाई के बदले बुराई को ले आने की जल्दी क्यों मचा रहे हो? तुम अल्लाह से (अपनी ग़लतियों की) माफ़ी क्यों नहीं मांगते, ताकि तुम पर दया की जा सके।" (46)
वे कहने लगे, "हम तुम्हें और तुम्हारे माननेवालों को ‘बुरा शगुन’ [evil omen] समझते हैं।" सालेह ने जवाब दिया, "कोई भी शगुन जो तुम देखते हो, उसका फ़ैसला तो अल्लाह ही करेगा : असल में तुम लोगों की परीक्षा ली जा रही है।" (47)
उस शहर में नौ (9) लोग ऐसे थे जो ज़मीन पर गड़बड़ी [corruption] फैलाते रहते थे, और ग़लत चीज़ों को सुधारते न थे। (48)
वे बोले, “क़सम अल्लाह की : हम सालेह और उसके घरवालों पर रात के समय हमला करेंगे, फिर उसके वारिस (परिजन) से कह देंगे कि हम उसके घरवालों के विनाश के समय वहाँ मौजूद ही नहीं थे, और यह कि हम सच बोल रहे हैं।" (49)
इस तरह उन्होंने एक शैतानी योजना बनायी थी, मगर एक योजना तो हमने भी बनायी थी जिसकी उन्हें कोई ख़बर तक न थी। (50)
अब देखो कि उनकी चालों का कैसा अंजाम हुआ : हमने उन्हें और उनके सभी लोगों को पूरी तरह से तबाह-बर्बाद करके रख दिया। (51)
यह उनके कुकर्मों का नतीजा है कि आज भी उनके घर उजाड़ खंडहर के रूप में पड़े हुए हैं--- सचमुच इसमें उन लोगों के लिए एक बड़ी निशानी है, जो जानते हैं---- (52)
मगर हमने उन लोगों को बचा लिया जो ईमान रखते थे और हर तरह की बुराइयों से बचते थे। (53)
हमने लूत [Lot] को भी उनकी क़ौम के लोगों के पास (पैग़म्बर बना कर) भेजा, उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "कैसे खुली आँखों देखते हुए भी तुम ऐसे अश्लील कर्म करते हो? (54)
कैसे तुम (सेक्स के लिए) औरतों को छोड़कर मर्दों के पीछे जाते हो? कैसे जाहिल लोग हो तुम!" (55)
उनके लोगों ने इस बात का एक ही जवाब दिया, और कहा, "अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो लूत के माननेवालों को! ये लोग (सेक्स के मामले में) बहुत पवित्र बनते हैं!" (56)
फिर हमने उन्हें और उनके परिवारवालों को तो बचा लिया---- केवल उनकी पत्नी को छोड़कर जिसे हमने तय कर रखा था कि वह पीछे रह जानेवालों में से होगी--- (57)
और हमने उनपर एक ज़बरदस्त बारिश बरसाई। और कैसी भयानक बारिश थी वह, जो उन लोगों पर बरस पड़ी जिन्हें सावधान किया जा चुका था! (58)
[ऐ रसूल] कह दें, "तारीफ़ें तो सारी अल्लाह के लिए है, और सलामती हो उसके उन बंदों पर, जिन्हें उसने (पैग़म्बर के रूप में) चुन लिया। तो बताओ कौन बेहतर है : अल्लाह बेहतर है या वे जिनको उन लोगों ने अल्लाह की ख़ुदायी में साझेदार [Partners] ठहरा रखा है? (59)
आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया? आसमान से तुम्हारे लिए पानी कौन बरसाता है--- जिसकी मदद से हम ने ख़ुशनुमा बाग़ उगा दिए : तुम्हारे बस का नहीं था कि तुम उनमें पेड़ों को उगा पाते--- क्या अल्लाह के अलावा कोई और भी ख़ुदा है? नहीं, मगर कुछ लोग हैं जो दूसरों को अल्लाह के बराबर का ठहराते हैं ! (60)
कौन है जिसने धरती को रहने की एक स्थायी जगह बनायी, और किसने उसके बीच से नदियाँ बहा दीं? किसने इस पर ऐसे पहाड़ जमा दिए जो हिल नहीं सकते और किसने दो समंदरों के बीच एक आड़ बना दी? क्या अल्लाह के अलावा कोई और भी ख़ुदा है? नहीं, मगर अधिकतर लोग जानते ही नहीं! (61)
कौन है वह जो परेशानी में घिरे हुए लोगों की पुकार सुनकर जवाब देता है? कौन उनकी तकलीफ़ों को दूर करता है? कौन तुम्हें धरती पर उत्तराधिकारी [ख़लीफ़ा/successors] बनाता है? क्या अल्लाह के अलावा कोई और ख़ुदा है? तुम कोई ध्यान ही नहीं देते! (62)
कौन है जो थल और जल के अँधेरों में भी तुम्हें रास्ता दिखाता है? कौन है जो अपनी रहमत (बारिश) भेजने से पहले हवाओं को (बारिश की) ख़ुशख़बरी ले कर भेजता है? क्या अल्लाह के अलावा कोई और ख़ुदा है? अल्लाह के अलावा वे जिनको उसका साझेदार [Partners] ठहराते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊँचा व महान है! (63)
कौन है जो (हर चीज़ को पैदा करके) जीवन देता है, और फिर उसको दोबारा पैदा करता है? कौन है जो तुम्हें आसमानों और ज़मीन से रोज़ी देता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और भी ख़ुदा है? (फिर भी अगर नहीं मानते, तो) कहें, "अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो इसका कोई प्रमाण ले आओ।" (64)
कहें, "अल्लाह को छोड़कर, आसमानों और ज़मीन में कोई नहीं जिसे (सामान्य बुद्धि से परे) अनदेखी [ग़ैब] चीज़ों की जानकारी हो.” वे नहीं जानते कि मुर्दा पड़े हुए लोग कब दोबारा उठाए जाएँगे : (65)
वे अपने ज्ञान से आख़िरत [परलोक] के बारे में नहीं समझ सकते; वे इसके बारे में संदेह में पड़े हैं, बल्कि वे (शक में) अंधे हो चुके हैं। (66)
सो जिन लोगों ने इंकार किया [काफ़िर], वे कहते हैं, "क्या! जब हम और हमारे बाप-दादा (मर के) धूल-मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या वास्तव में हमें (ज़िंदा करके) उठाया जाएगा? (67)
ऐसे वादों के बारे में हमलोगों ने पहले भी सुन रखा है, और हमारे बाप-दादाओं ने भी। ये तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं।" (68)
[ऐ रसूल] आप कहें "ज़मीन पर यहाँ वहाँ घूमो-फिरो और देखो कि शैतानियाँ करनेवालों का कैसा अंजाम हुआ।" (69)
[ऐ रसूल] आप उन लोगों के लिए दुखी न हों; और न उनकी मक्कारी की चालों से परेशान हों। (70)
वे यह भी कहते हैं, "अगर तुम्हारी बात सच है, तो यह बताओ कि यह वादा कब पूरा होगा?" (71)
कह दें, "जिस चीज़ के आने की तुम जल्दी मचा रहे हो, बहुत सम्भव है कि उसका कोई हिस्सा तुम्हारे बिल्कुल पास आ लगा हो।" (72)
निश्चय ही तुम्हारा रब तो लोगों पर बहुत उदार है, मगर सच यह है कि उनमें से अधिकतर लोग शुक्र अदा नहीं करते। (73)
वह हर उस चीज़ को जानता है जो लोगों के सीनों में छिपी होती हैं, और हर वह चीज़ भी जानता है जो वे सामने बता देते हैं : (74)
आसमानों या ज़मीन पर छिपी हुई कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जो एक स्पष्ट किताब में लिखी हुई न हो। (75)
सच्चाई यह है कि यह क़ुरआन इसराईल की सन्तानों को ऐसी अधिकतर बातें स्पष्ट कर देती है जिनके विषय में वे [यहूदी व ईसाई] मतभेद रखते हैं। (76)
और इसमें शक नहीं कि यह ईमानवालों के लिए सही रास्ता दिखानेवाली है, और रहमत है। (77)
निश्चय ही तुम्हारा रब उनके बीच अपने ज्ञान से फ़ैसला कर देगा---- वह बड़ी ताक़तवाला, सब कुछ जानने वाला है--- (78)
अतः [ऐ रसूल], आप अल्लाह पर भरोसा रखें, आप बिल्कुल सच्चे व सही रास्ते पर हैं। (79)
आप मरे हुए आदमी को अपनी बात नहीं सुना सकते, और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हैं, जबकि वे पीठ फेर कर चले जा रहे हों, (80)
और न आप अंधों को उनकी गुमराही से बचाकर राह पर ला सकते हैं : आप किसी को भी अपनी बात नहीं सुना सकते सिवाए उसके, जो हमारी आयतों [निशानियों] में विश्वास रखता हो, और हमारे सामने पूरी भक्ति से झुकता हो। (81)
जब उन लोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला हो जाएगा, तब हम धरती में से एक जानवर सामने लाएँगे जो उन्हें बता देगा कि वे लोग हमारी आयतों पर विश्वास नहीं करते थे। (82)
एक दिन आएगा जब हम प्रत्येक समुदाय में से ऐसे लोगों का एक गिरोह जमा करेंगे, जिन लोगों ने हमारी आयतों को झूठ जानकर विश्वास नहीं किया, फिर उन्हें अलग अलग समूहों में ले जाया जाएगा, (83)
यहाँ तक कि वे (अल्लाह के) सामने पहुँच जाएँगे, तो फिर अल्लाह कहेगा, "क्या तुमने मेरी आयतों [संदेशों] को बिना ठीक से समझे-बूझे ही मानने से इंकार कर दिया? या फिर तुम कर क्या रहे थे?" (84)
फिर उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला कर दिया जाएगा, क्योंकि उन लोगों ने सख़्त ग़लतियाँ की थीं: वे कुछ बोल नहीं पाएंगे। (85)
क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनके आराम करने लिए (अँधेरी) रात बनायी है, और दिन को उजालेवाला बनाया (ताकि काम-काज हो सके)? सचमुच इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो ईमान रखते हैं? (86)
और जिस दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन पर बसनेवाला हर एक बुरी तरह डर जाएगा---- सिवाए उनके जिन्हें अल्लाह चाहे --- और सब अपनी गर्दन झुकाए हुए उसके सामने हाज़िर होंगे। (87)
तुम पहाड़ों को देखोगे, तो तुम्हें लगेगा कि वे मज़बूती से जमे हुए हैं, मगर वे (उस समय) बादलों की तरह उड़ते फिरेंगे: यह सब अल्लाह की कारीगरी है, जिसने सारी चीज़ों को एकदम सही व सटीक बनाया है। तुम जो भी करते हो, वह उसकी पूरी ख़बर रखता है : (88)
जो कोई भी अच्छे कर्म लेकर आएगा, तो बदले में उसको उससे भी अच्छा इनाम मिलेगा, और वह उस दिन के ख़ौफ़ से बचा रहेगा, (89)
मगर जो कोई भी बुरे कर्मों को लेकर आया, तो ऐसे लोगों को मुँह के बल आग में डाल दिया जाएगा। (और उनसे पूछा जाएगा), "जो कुछ (दुनिया में) तुम करते रहे थे, क्या तुम उन्हीं चीज़ों का बदला पा रहे हो या किसी और चीज़ का?" (90)
[ऐ रसूल आप कह दें] मुझे जो करने का आदेश मिला है, वह यह है कि मैं इस नगर (मक्का) के रब की बन्दगी करूँ, जिसने इस (पवित्र नगर) को कभी न मिटनेवाली इज़्ज़त दी है। हर चीज़ उसी की है; और मुझे आदेश मिला है कि मैं उन लोगों में से रहूँ जो उस (अल्लाह) के सामने पूरी भक्ति से झुके रहते हैं; (91)
मुझे यह हुक्म हुआ है कि मैं क़ुरआन पढ़कर सुनाऊँ।” जो कोई भी सीधे रास्ते पर चलना पसंद करता है, तो वह ऐसा अपने ही फ़ायदे के लिए करता है। और जो कोई भी इस [सीधे रास्ते] से भटकता है, उससे कह दें, "मैं तो बस सावधान ही करनेवाला हूँ।" (92)
और कहें, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है : जल्द ही वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखा देगा और तुम उन्हें पहचान लोगे।” और जो कुछ तुम सब करते हो, तुम्हारा रब उससे कभी भी बेख़बर नहीं है।" (93)
सूरह 28 : अल क़सस [कहानी/The Story]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ सीन॰ मीम॰ (1)
यह (आसमानी) किताब की आयतें हैं जो चीज़ों को बिल्कुल स्पष्ट कर देती हैं : (2)
[ऐ रसूल] हम आपको सच्चाई से जुड़ी हुई, मूसा [Moses] और फ़िरऔन [Pharaoh] की कहानी का कुछ हिस्सा सुनाते हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान रखते हैं। (3)
सचमुच फ़िरऔन ने धरती पर अपने आपको बहुत ही ऊँचा और ताक़तवर बना लिया था और वहाँ के लोगों को अलग अलग गिरोहों में बाँट रखा था : उनमें से एक गिरोह [इसराईल की संतानों] को उसने एकदम दबा कर रखा था, उनके बेटों को मार डालता और उनकी औरतों को ज़िंदा रहने देता--- सचमुच ही वह (समाज में) फ़साद व बिगाड़ [corruption] पैदा करनेवालों में से था ----(4)
मगर हम यह चाहते थे कि उन लोगों पर उपकार करें जिन्हें ज़मीन पर इतना दबा कर रखा गया था, उन्हें नायक बनाएँ, और उन्हें (उस धरती का) वारिस बनाएं, (5)
और ज़मीन पर उनके क़दम मज़बूती से जमा दें, और उनके द्वारा फ़िरऔन और हामान और उनकी सेनाओं को वही चीज़ दिखा दें, जिसका उन्हें डर था। (6)
हमने यह कहते हुए मूसा की माँ के दिल में यह बात डाल दी कि, "उसे दूध पिलाओ, फिर जब तुम्हें उसकी सुरक्षा ख़तरे में लगे, तो उसे दरिया में डाल देना : डरो नहीं, और न ही दुखी हो, कि हम उसे ज़रूर तुम्हारे पास वापस भेज देंगे और उसे (एक दिन अपने) रसूलों में से एक बनाएँगे।" (7)
इस तरह, फ़िरऔन के लोगों ने उस बच्चे को (दरिया से) उठा लिया---- जो बाद में, इनका दुश्मन, और उनके लिए दुख व परेशानी का कारण बननेवाला था : सचमुच फ़िरऔन, हामान और उनकी सेनाओं में जो लोग थे वे ग़लती पर थे---- (8)
फ़िरऔन की पत्नी ने कहा, "इस (बच्चे को) देखकर मेरे और तुम्हारे मन में कितनी ख़ुशी हो रही है! (सचमुच यह हमारी आँखों की ठंढक है), इसकी हत्या न करो, शायद हमें इससे कुछ फ़ायदा पहुँचे, या हम इसे अपना बेटा ही बना लें।" (मगर उस समय) उन्हें मालूम न था कि वे क्या (भूल) कर बैठे थे। (9)
अगले दिन, मूसा की माँ ने अपने दिल में एक अजीब ख़ालीपन व बेक़रारी महसूस की---- अगर हम ने (उस वक़्त) उनके दिल को मज़बूत करके उन्हें हमारी बातों में विश्वास रखनेवाला न बनाया होता, तो मुमकिन था कि वह (बच्चे के बारे में) सब राज़ की बातें उगल देतीं---- (10)
मूसा की माँ ने उसकी बहन से कहा, "तू उसके पीछे-पीछे जा।" सो वह उसे दूर ही दूर से देखती रही, इस तरह कि उन्हें पता न चले, (11)
और हम यह तय कर चुके थे कि वह [मूसा] किसी भी दूध पिलानेवालियों का दूध पीने को तैयार नहीं होंगे। फिर मूसा की बहन ने उनके पास जाकर कहा कि "क्या मैं तुम्हें ऐसे घरवालों का पता बताऊँ, जो तुम्हारे लिए इस (बच्चे) की परवरिश करें और इसकी ख़ूब अच्छी तरह देखभाल करें?" (12)
इस तरह हम ने बच्चे को उसकी माँ के पास वापस पहुँचा दिया, ताकि उसका मन शांत हो सके, वह दुखी न रहे और ताकि वह जान ले कि अल्लाह का वादा सच्चा होता है, किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते। (13)
और जब मूसा अपनी जवानी को पहुँचे और पूरी तरह परिपक्व [mature] हो गए, तो हमने उन्हें (सही फ़ैसला करने की) गहरी समझ-बूझ [wisdom] प्रदान की : और हम अच्छा कर्म करनेवालों को ऐसा ही इनाम देते हैं। (14)
(एक दिन) मूसा जब शहर [मिस्र] में दाख़िल हुए, उस समय किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया, उन्होंने वहाँ दो आदमियों को लड़ते हुए पाया : एक तो उनकी बिरादरी के लोगों में से था और दूसरा उनके दुश्मन क़ौम का था। जो उनकी बिरादरी में से था, उसने अपने दुश्मन के मुक़ाबले में, उन्हें मदद के लिए पुकारा। इस पर मूसा ने उस (दुश्मन) को ऐसा घूँसा मारा कि वह मर ही गया। (मूसा अपने किए पर पछताने लगे) उन्होंने कहा, "यह ज़रूर किसी शैतान का काम है : सचमुच ही वह ऐसा दुश्मन है जो (आदमी को) बहका देता है।" (15)
उन्होंने कहा, "ऐ मेरे रब, मुझ से बहुत बड़ी ग़लती हो गयी। तू मुझे क्षमा कर दे,” सो अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया; सचमुच वह बेहद क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है। (16)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! जिस तरह तूने मुझपर अपनी ख़ास मेहरबानी [blessings] की है, अब मैं भी कभी शैतानी करनेवालों का मददगार नहीं बनूँगा।" (17)
अगले दिन, वह डरते हुए और चौकन्ना होकर शहर में चले जा रहे थे, कि अचानक क्या देखते हैं कि कल जिसकी मदद की थी, वही आदमी फिर उन्हें मदद के लिए पुकार रहा है। मूसा ने उससे कहा, "अरे तुम तो सचमुच बड़े बदमाश आदमी हो।” (18)
फिर जैसे ही मूसा ने इरादा किया कि वह उस आदमी पर हमला करे, जो उन दोनों का शत्रु था, तो वह आदमी कहने लगा, "ऐ मूसा, क्या तू चाहता है कि मुझे भी मार डाले, जिस तरह तूने कल एक आदमी को मार डाला? धरती में सचमुच तू एक निर्दय अत्याचारी बनकर रहना चाहता है; तू उन लोगों जैसा नहीं जो चीज़ों में सुधार लाते हैं।" (19)
फिर ऐसा हुआ कि शहर के दूर वाले इलाक़े से एक आदमी दौड़ता हुआ आया, और उसने कहा, "ऐ मूसा, कुछ सरदार तेरे बारे में परामर्श कर रहे हैं कि तुझे मार डालें, अतः तू यहाँ से निकल जा--- मेरी सलाह मान कि मैं तेरा भला चाहता हूँ।" (20)
सो मूसा डरते हुए और ख़तरा भाँपते हुए वहाँ से निकल खड़े हुए, और दुआ की, "ऐ मेरे रब! मुझे शैतान लोगों से बचा ले।" (21)
जब मूसा मदयन [Midian] जानेवाले रास्ते पर चल पड़े, तो उन्होंने कहा था, "आशा है, मेरा रब मार्गदर्शन करते हुए मुझे सही रास्ते पर डाल देगा।" (22)
और जब वह मदयन के कुंएँ पर पहुँचे, तो वहाँ उन्होंने लोगों के एक गिरोह को देखा कि वे अपने जानवरों को पानी पिला रहे थे, और उनके अलावा वहाँ दो औरतों को भी देखा, जो अपने जानवरों को रोके खड़ी थीं। मूसा ने उनसे कहा, "तुम दोनों का क्या मामला है?" उन्होंने कहा, "हम उस समय तक (अपने जानवरों को) पानी नहीं पिला सकते, जब तक ये चरवाहे अपने भेड़ों को लेकर चले नहीं जाते : हमारे बाप बहुत ही बूढ़े हैं।" (23)
तब मूसा ने उनकी ख़ातिर उनके जानवरों को पानी पिला दिया, और वहाँ से छायादार जगह के पास चले गए और दुआ की, "ऐ मेरे रब, जो कुछ भी अच्छी चीज़ हो सके, तू मेरी तरफ़ भेज दे, मैं उसका बहुत ज़रूरतमंद हूँ।" (24)
थोड़ी देर बाद, उन दो औरतों में से एक ज़रा शर्मायी हुई चाल से चलती हुई उनके पास आयी, और कहने लगी, "मेरे बाबा आपको बुला रहे हैं : आपने हमारे लिए जानवरों को जो पानी पिलाया है, उसके लिए वह आपको कुछ इनाम देना चाहते हैं।"
फिर जब मूसा उनके (बाबा के) पास पहुँचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनायी, तो उस बूढे आदमी ने कहा, "अब डरो नहीं, ग़लत काम करनेवालों से बचकर तुम सुरक्षित जगह आ गए हो।" (25)
उनमें से एक औरत ने कहा, "बाबा! इनको मज़दूरी पर रख लीजिए : मज़दूरी पर रखने के लिए सबसे सही आदमी वही होता है, जो मज़बूत और भरोसेमंद हो।" (26)
उसके बाप ने कहा, "मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक का विवाह तुम्हारे साथ इस शर्त पर कर दूँ कि तुम आठ वर्ष तक मेरे यहाँ नौकरी करो: और यदि तुम दस वर्ष पूरे कर दो, तो यह तुम्हारी अपनी इच्छा होगी। मैं तुम्हें कठिनाई में डालना नहीं चाहता : अगर अल्लाह ने चाहा तो तुम मुझे सही व नेक आदमी पाओगे।" (27)
मूसा ने कहा, "तो मेरे और आपके बीच यह बात तय रही --- इन दोनों अवधियों में से जो भी मैं पूरी कर दूँ, तो मेरे साथ कोई अन्याय नहीं होगा ---- और जो कुछ हम कह रहे हैं, उसपर अल्लाह गवाह है।" (28)
एक बार जब मूसा तय की हुई अवधि पूरी कर चुके थे और अपने परिवारवालों को लेकर जा रहे थे, कि अचानक उन्हें तूर नामक पहाड़ के किनारे एक आग-सी दिखायी दी। उन्होंने अपने घरवालों से कहा, "ठहरो (यहाँ), मैंने एक आग देखी है। शायद मैं वहाँ से तुम्हारे पास (रास्ते की) कोई ख़बर ले आऊँ या तुम्हारे लिए एक जलती हुई लकड़ी मिल जाए जिससे तुम अपने आपको गर्मा सको।" (29)
मगर जब वह वहाँ पहुँचे तो घाटी के दाहिनी तरफ़, एक पवित्र ज़मीन पर (लगे हुए) पेड़ से उन्हें पुकारती हुई आवाज़ आयी : मूसा! मैं अल्लाह हूँ, सारे जहाँनों का पालनेवाला [रब!]। (30)
अपनी लाठी नीचे फेंक दो।" फिर जब मूसा ने देखा कि उनकी लाठी किसी साँप की तरह हिल-डुल रही है, तो वह मारे डर के पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर भी न देखा। फिर (से उन्हें पुकारा गया), "ऐ मूसा! सामने आओ और डरो नहीं! निस्संदेह तुम उनमें से हो जो पूरी तरह सुरक्षित हैं। (31)
अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो और फिर बाहर निकालो तो वह सफ़ेद चमकता हुआ हो जाएगा, और वह भी बिना किसी ख़राबी (या नुक़सान) के--- और डर भगाना हो तो अपने बाजू को अपने बदन से सटा लेना। ये तेरे रब की ओर से दो निशानियाँ [लाठी व चमकता हाथ] होंगी फ़िरऔन और उसके दरबारियों के लिए; सचमुच वे बड़े शैतान लोग हैं।" (32)
मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मैंने उनके एक आदमी को मार डाला था, और मुझे डर है कि वे कहीं मुझे मार न डालें। (33)
मेरे भाई हारून [Aaron] मुझसे कहीं अधिक साफ़ व प्रभावशाली भाषा बोलते हैं : उन्हें भी मेरी मदद के लिए मेरे साथ भेजें ताकि वह मेरी बातों का समर्थन करें--- मुझे डर है कि वे मुझे झुठा कहेंगे।" (34)
अल्लाह ने कहा, "हम तुम्हारे भाई के द्वारा तुम्हारा हाथ मज़बूत कर देंगे; और हमारी निशानियों के साथ, तुम दोनों को इस तरह ताक़त व अधिकार देंगे कि वे तुम्हारे नज़दीक भी नहीं पहुँच सकेंगे। (अंत में) तुम और तुम्हारे माननेवालों की ही जीत होगी।" (35)
फिर जब मूसा उनके पास हमारी साफ़ व स्पष्ट निशानियाँ लेकर पहुँचे, तो उन्होंने कहा, "यह तो बस बनावटी जादू के करतब हैं; हमने तो यह बात अपने बाप-दादा से कभी नहीं सुनी।" (36)
मूसा ने कहा, "मेरा रब अच्छी तरह जानता है कि कौन उसके यहाँ से मार्गदर्शन लेकर आता है, और किसके पास (परलोक में) रहने का अंतिम ठिकाना [Final Home] होगा : ग़लत काम करनेवाले कभी कामयाब नहीं होंगे।" (37)
फ़िरऔन ने कहा, "दरबारियो, अपने अलावा तो मैं तुम्हारे किसी देवता को नहीं जानता। ऐ हामान! तू मेरे लिए मिट्टी की ईंटों को आग में पकवा कर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना कि मैं उसपर चढ़ कर मूसा के ख़ुदा तक पहुँच सकूँ : मैं यक़ीन से कह सकता हूँ कि यह झूठ बोल रहा है।" (38)
फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने बिना किसी अधिकार के धरती पर घमंड भरा व्यवहार किया---- और समझा कि उन्हें हमारे पास वापस नहीं लाया जाएगा----- (39)
अन्त में हमने उसे औऱ उसकी सेनाओं को अपनी पकड़ में ले लिया और उन्हें समंदर में फेंक दिया. अब देख लो कि ग़लत काम करनेवालों का क्या नतीजा हुआ! (40)
और हमने उन्हें (दूसरों को जहन्नम की) आग की ओर बुलानेवालों का नेता बना दिया : क़यामत के दिन उनकी कोई मदद नहीं की जाएगी। (41)
और हमने इस दुनिया में उनके पीछे लानत [श्राप] लगा दी और क़यामत के दिन वे घृणित लोगों में शामिल होंगे। (42)
पिछली नस्लों को बर्बाद कर देने के बाद हमने मूसा को एक किताब [तोरैत/ Torah] दी थी, जिसमें लोगों के लिए समझदारी की बातें, मार्गदर्शन और दयालुता [रहमत/Mercy] थी, ताकि वे उस पर ध्यान दें और इससे नसीहत ले सकें। (43)
[ऐ रसूल] आप तो (तूर) पहाड़ के पश्चिमी किनारे पर मौजूद नहीं थे, जब हमने मूसा को अपने धर्म आदेश [commandments] दिए थे: आप वहाँ इस घटना को देखनेवालों में भी नहीं थे--- 44)
बल्कि हमने बहुत-सी नस्लें पैदा कीं, जिन्होंने इस दुनिया में बहुत लम्बी ज़िंदगियाँ गुज़ारीं --- आप तो मदयन [Midian] के लोगों के बीच नहीं रहते थे, और न ही आपने हमारे संदेश [आयतें] उन लोगों को सुनाए----हम ने लोगों के पास अपने रसूलों को (अपने संदेश के साथ) हमेशा ही भेजा है---- (45)
और न ही आप सीना की पहाड़ी [Mount Sinai] के किनारे ही मौजूद थे, जब हमने मूसा को पुकारा था। मगर आपको रब की तरफ़ से रहमत [grace] के रूप में भेजा गया है, ऐसे लोगों को सावधान करने के लिए जिनके पास आपसे पहले कोई सावधान करनेवाला नहीं आया, ताकि वे ध्यान दें व नसीहत ले सकें। (46)
और उनके हाथों द्वारा किए गए करतूतों के नतीजे में अगर कोई बड़ी आफ़त उन पर आ जाए, तो वे यह न कह सकें कि, "ऐ हमारे रब, अगर तूने हमारे पास कोई रसूल भेजा होता तो शायद हम ने तेरी आयतों का अनुसरण किया होता और हम भी विश्वास करनेवालों में [मोमिन] शामिल हो जाते?" (47)
मगर अब, जबकि हमारी तरफ़ से सच्चाई उनके पास आ चुकी है, तब भी वे कहते हैं, "उनको [मोहम्मद] क्यों नहीं वैसी निशानियाँ दी गयीं, जैसी कि मूसा को मिली थीं?" मगर जो (निशानियाँ) इससे पहले मूसा को दी गयी थीं, क्या उन लोगों ने उस सच्चाई को भी मानने से इंकार नहीं कर दिया था? वे कहते हैं, "दोनों [क़ुरआन व तोरैत] दो क़िस्म के जादू हैं, जो एक-दूसरे की (सच्चाई की) पुष्टि करते हैं", और "हम तो दोनों में किसी एक को भी मानने से इंकार करते हैं।" (48)
[ऐ रसूल] आप कहें, "ठीक है, अगर तुम सच कहते हो, तो ले आओ अल्लाह के यहाँ से कोई ऐसी किताब, जो इन दोनों से ज़्यादा सही रास्ता दिखानेवाली हो, ताकि मैं भी उसका अनुसरण करूँ?" (49)
अब अगर वे आपकी बात का जवाब न दे पाएं, तो जान लें कि वे केवल अपनी इच्छाओं के पीछे चलनेवाले हैं। उस आदमी से बढ़कर भटका हुआ कौन होगा जो अल्लाह के मार्गदर्शन के बिना, केवल अपनी इच्छाओं के पीछे चलता हो? सचमुच अल्लाह ग़लत काम करनेवालों को सही मार्ग नहीं दिखाता। (50)
हम उनके पास अपनी वाणी [क़ुरआन] पहुँचाते रहते हैं, ताकि वे ध्यान से सोच-विचार करें। (51)
जिन लोगों को हमने इससे पहले (आसमानी) किताब दी थीं, वे इस [क़ुरआन] में विश्वास कर लेते हैं। (52)
और जब यह उनके सामने पढ़कर सुनायी जाती है, तो कहते हैं, "हम इस पर विश्वास [ईमान] रखते हैं, सचमुच हमारे रब की ओर से यह सत्य है। हम तो इसके आने के पहले से ही उस [अल्लाह] पर पूरी भक्ति से समर्पित [मुस्लिम] थे।" (53)
ऐसे लोगों को दुगना इनाम दिया जाएगा, क्योंकि वे सब्र [धीरज] के साथ जमे रहते हैं, भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं, और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दी है, उसमें से दूसरों को भी देते हैं, (54)
और जब कभी वे बेकार की फ़ालतू बातें सुनते हैं, तो यह कहते हुए वहाँ से किनारे हट जाते हैं कि "हमारे लिए हमारे कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। तुम पर सलामती हो! हम जाहिल लोगों के साथ (उलझना) नहीं चाहते।" (55)
[ऐ रसूल] आप जिसे चाहें, हर एक को सच्चाई की राह पर नहीं ला सकते; यह तो अल्लाह है कि जिसे चाहता है, राह दिखा देता है : वह अच्छी तरह जानता है कि वे कौन लोग हैं जो बताए गए सही रास्ते पर चलेंगे। (56)
वे कहते हैं, "अगर हम आप [मोहम्मद] के साथ आपके बताए हुए रास्ते पर चलेंगे, तो हमें अपनी ज़मीन से उखाड़ कर फेंक दिया जाएगा।" क्या हम ने उनके लिए (मक्का के रूप में) एक सुरक्षित जगह [sanctuary] की स्थापना नहीं की, जहाँ हमारी ओर से रोज़ी के रूप में हर क़िस्म की पैदावार (और फल) लाए जाते हैं? मगर ज़्यादातर लोग समझते नहीं हैं। (57)
हम कितनी ही बस्तियों को बर्बाद कर चुके हैं, जो कभी अपने बेहिसाब धन-दौलत और आराम की ज़िंदगी के लिए जानी जाती थीं : उस वक़्त से लेकर आज तक, कुछ एक को छोड़कर, वे बस्तियाँ शायद ही फिर कभी दोबारा आबाद हो पायीं--- अन्ततः हम ही इसके वारिस हुए! (58)
आपका रब कभी भी बस्तियों को उस वक़्त तक तबाह- बर्बाद नहीं करता जब तक कि पहले उनकी बस्ती में से कोई रसूल [Messenger] न ख़ड़ा कर दे, जो हमारे संदेशों [आयतों] को उनके सामने सुनाए. और न ही हम बस्तियों को उस वक़्त तक बर्बाद करते हैं, जब तक कि वहाँ के रहनेवाले शैतानी न करने लग जाएं। (59)
जो भी चीज़ें तुम्हें इस संसार में दी गई हैं, वह तो बस (कुछ ही दिनों के लिए) इसी जीवन की ख़ुशियाँ हैं और उनकी सजावट के सामान हैं : और जो कुछ अल्लाह के पास है वह कहीं बेहतर और कहीं अधिक समय तक रहनेवाला है--- तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लोगे? (60)
भला वह आदमी जो उस अच्छे वादे को पूरा होता हुआ देखेगा जो हमने उसके साथ कर रखा था, क्या उसकी तुलना एक ऐसे आदमी से हो सकती है जिसे हमने इस सांसारिक जीवन में थोड़ी सी ख़ुशियाँ दे रखी हो, और फिर वह क़यामत के दिन पकड़कर (सज़ा के लिए) पेश किया जाने वाला हो? (61)
एक दिन आएगा जिस दिन अल्लाह उन्हें पुकारेगा और कहेगा, "कहाँ हैं मेरे वे (ख़ुदायी में) साझेदार [Partners], जिनके (देवता होने का) तुम दावा करते थे?" (62)
और वे [बड़े सरदार] जिनके ख़िलाफ़ फ़ैसला सुना दिया जाएगा, वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! ये वे लोग हैं जिन्हें हमने बहका दिया था। चूँकि हम स्वयं बहके हुए थे, सो हम ने इन्हें भी बहका दिया, लेकिन अब हम तेरे सामने इनसे अपना सम्बन्ध तोड़ते हैं : सच बात तो यह है कि ये हमारी बन्दगी करते ही नहीं थे।" (63)
उसके बाद उन (काफिरों) से कहा जाएगा, "पुकारो उन सब को, जिन्हें तुम (अल्लाह के) साझेदार [Partners] के रूप में पूजते थे", तो वे उन्हें पुकारेंगे, मगर उन्हें कोई जवाब नहीं मिलेगा। वे अपनी आँखों से उस दी जा रही यातना को देखेंगे, और सोचेंगे कि काश उन्होंने सही मार्गदर्शन को मान लिया होता! (64)
और उस दिन अल्लाह उन्हें अपने सामने बुलाकर पूछेगा, "तुमने हमारे रसूलों को क्या जवाब दिया था?" (65)
उस दिन सारी दलीलें उन्हें बेमानी लगेंगी; वे एक दूसरे से सलाह-मशविरा भी नहीं कर पाएंगे। (66)
मगर हाँ, जिस किसी ने (गुनाहों से) तौबा कर ली, (अल्लाह में) विश्वास [ईमान] रखा, और अच्छे कर्म किए, तो वह सफल होनेवालों में अपने आपको शामिल करने की आशा रख सकता है। (67)
तेरा रब जो चाहता है पैदा करता है, और जिसे चाहता है चुन लेता है--- चुनने का उन्हें कोई अधिकार नहीं--- सो अल्लाह महान है, और उनके ठहराए हुए अल्लाह (के झूठे) साझेदारों [Partners] से कहीं ऊँचा व बड़ा है! (68)
तेरा रब वह भी जानता है जो कुछ उनके सीनों के अंदर छिपा होता है, और वह भी जो वे सामने बता देते हैं। (69)
वह अल्लाह है; उसको छोड़कर कोई भी बंदगी के लायक़ नहीं; सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं —--- इस जीवन में भी और आनेवाले जीवन [परलोक] में भी; अंतिम फ़ैसले का अधिकार उसी के हाथ में है और उसी के पास तुम को लौटकर जाना होगा। (70)
[ऐ रसूल] आप कहें, "ज़रा सोचो, अगर अल्लाह क़यामत के दिन तक तुम्हारे ऊपर लगातार रात कर दे, तो अल्लाह को छोड़कर कौन सा देवता है जो तुम्हारे लिए रौशनी ला सके? तो क्या तब भी, तुम सुनते नहीं?" (71)
कह दें, "ज़रा सोचो, अगर अल्लाह क़यामत तक तुम्हारे ऊपर लगातार दिन कर दे, तो अल्लाह को छोड़कर कौन सा देवता है जो तुम्हारे आराम के लिए रात ला सके? तो क्या तब भी, तुम देखते नहीं? (72)
यह तो उसकी रहमत है कि उसने तुम्हें रात और दिन दिए हैं, ताकि तुम रात में आराम पा सको, और दिन के समय रोज़ी तलाश कर सको, और ताकि तुम शुक्र अदा कर सको।" (73)
एक दिन आएगा जिस दिन वह उन्हें बुलाएगा और कहेगा, "कहाँ है मेरी (ख़ुदायी में) गढ़े हुए साझेदार [partners], जिनके (देवता होने का) तुम दावा करते थे?" (74)
और हम हर एक समुदाय में से एक गवाह को बुलाएंगे और कहेंगे, "पेश करो अपना सबूत।" और तब वे जान लेंगे कि सच्चाई तो केवल अल्लाह के पास है; और उनके द्वारा गढ़े हुए ख़ुदा उन्हें छोड़ देंगे। (75)
क़ारून [Korah] मूसा की क़ौम में से था, मगर वह उनपर बड़े ज़ुल्म करता था. हमने उसे इतने ख़ज़ाने दे रखे थे कि उनकी कुंजियों को रखना मज़बूत लोगों के दल के लिए भी बड़ा भारी काम था। (याद करो जब) उसकी क़ौम के लोगों ने उससे कहा, "इतरा मत! क्योंकि सचमुच अल्लाह इतरानेवालों को पसन्द नहीं करता। (76)
और जो कुछ अल्लाह ने तुझे दे रखा है, उसकी मदद से आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में भी अपने लिए अच्छा ठिकाना माँगो, और इस दुनिया में भी तुम्हारी क़िस्मत से जो हिस्सा मिला है, उसे भी नज़रअंदाज़ [ignore] न करो। दूसरों के साथ भलाई करो, जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ भलाई की है. और धरती पर गड़बड़ी पैदा करने की कोशिश मत करो, निश्चय ही अल्लाह गड़बड़ी [corruption] पैदा करनेवालों को पसन्द नहीं करता", (77)
लेकिन उसने जवाब दिया, "मुझे तो यह दौलत मेरे अपने ज्ञान के कारण मिली है।" क्या वह नहीं जानता था कि अल्लाह ने उससे पहले कितनी ही नस्लों को तबाह कर दिया, जो ताक़त में उससे बढ़-चढ़कर थीं और धन-दौलत भी उन्होंने ज़्यादा जमा कर रखा था? अपराधियों से तो उनके गुनाहों के विषय में पूछा भी नहीं जाएगा (बल्कि उन्हें बताया जाएगा)। (78)
फिर (एक दिन) वह अपनी क़ौम के सामने पूरी आन-बान से निकला, और जिन लोगों का मक़सद इसी सांसारिक जीवन को पाना था, उन्होंने कहा, "काश हमें भी कुछ ऐसी चीज़ें दी गयी होतीं, जैसी कि क़ारून को मिली हैं : सचमुच वह बड़ा ही भाग्यशाली आदमी है।" (79)
मगर जिनको ज्ञान दिया गया था, उन्होंने कहा, "अफ़सोस तुम पर! अल्लाह का इनाम उन लोगों के लिए कहीं अच्छा है जो विश्वास [ईमान] रखते हैं और अच्छा कर्म करते हैं : मगर यह केवल उन्हीं को हासिल होगा जो धीरज व सब्र से जमे रहते हैं।" (80)
अन्ततः हमने उसको और उसके घर को धरती में धँसा दिया : उसके पास कोई न था जो अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी सहायता करता, और न ही ख़ुद वह अपना बचाव कर सका। (81)
अगले दिन, वही लोग, जिन्होंने एक दिन पहले यह कामना की थी कि काश वे उसकी जगह होते, कहने लगे, "अफ़सोस [तुम पर, क़ारून!], यह तो अल्लाह ही है कि जो चाहता है देता है, किसी को ज़्यादा तो किसी को कम, और अपने बंदों में जिसे चाहता है, उसे देता है : अगर अल्लाह ने हम पर उपकार न किया होता तो हमें भी धरती में धँसा देता। अफ़सोस उस पर! सच्चाई को मानने से इंकार करनेवाले कभी कामयाब नहीं होंगे।” (82)
यह वो आख़िरत [परलोक, Hereafter] का घर है जिसे हम उन लोगों को देना मंज़ूर करेंगे, जो ज़मीन पर अपनी बड़ाई नहीं चाहते, और न ही गड़बड़ी [corruption] फैलाते हैं : अच्छा अंत तो उन्हें ही मिलेगा, जो अपने दिल में अल्लाह का डर रखता हो और बुराइयों से बचता हो। (83)
जो कोई भी अल्लाह के सामने अच्छे कर्म लेकर आया, तो उसे बदले में उससे कहीं अच्छा इनाम मिलेगा; और जो कोई बुरे कर्मों को लेकर आएगा, तो उस कुकर्मी को वैसी ही सज़ा दी जाएगी जैसा कि उसने कर्म किया होगा। (84)
जिसने इस क़ुरआन की ज़िम्मेदारी [ऐ रसूल] आप पर डाली है, वह आपको वापस (आपके) असली घर तक ज़रूर पहुँचा देगा। अत: कह दें, "मेरा रब उसे अच्छी तरह से जानता है कि कौन मार्गदर्शन लेकर आया, और कौन है जो खुली गुमराही में पड़ा है।" (85)
आपको ख़ुद ही यह उम्मीद नहीं थी कि आप पर किताब उतारी जाएगी; ऐसा तो केवल आपके रब की रहमत [दयालुता, mercy] के कारण हआ। अतः आप (सच्चाई से) इंकार करनेवालों के मददगार न बनें। (86)
अब जबकि आप पर (अल्लाह की) आयतें [revelations] उतारी जा चुकी हैं, तो देखना, ऐसा न हो कि वे आपको अल्लाह की आयतों से मुँह मोड़ने पर मजबूर करें। आप लोगों को अपने रब की ओर बुलाएं. और कभी भी उनमें से न हो जाएं जो हमारी ख़ुदायी में साझेदार [Partner] बना लेते हैं। (87)
अल्लाह के साथ किसी दूसरे देवता को न पुकारो, क्योंकि उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं। हर चीज़ एक दिन ख़त्म हो जाएगी सिवाए उस (अल्लाह) के स्वरूप के। आख़िरी फ़ैसला उसी के हाथ में है, और उसी के पास तुम सबको वापस ले जाया जाएगा। (88)
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