Chronological Quran: Later Meccan 3 : उत्तर मक्का काल -3
सूरह 14 : इबराहीम [Abraham]
सूरह 23 : अल मो’मिनून [ईमानवाले, The Believers]
सूरह 32 : अस-सज्दा [नमाज़ में सर झुकाना, Bowing Down in Worship]
सूरह 52 : अत-तूर [तूर पहाड़ / Mountain Tur/ Sinai]
सूरह 71 : नूह [Noah]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हमने नूह [Noah] को उनकी क़ौम के पास भेजा : "आप अपने लोगों को सावधान कर दें, इससे पहले कि उन पर कोई दर्दनाक यातना [punishment] आ पहुँचे।" (1)
(चुनांचे) उन्होंने कहा, “ए मेरी क़ौम के लोगो! [My people], मैं तुम लोगों को साफ़ साफ़ चेतावनी देने आया हूँ। (2)
तुम अल्लाह की इबादत करो, उसी से डरो और मेरा कहना मानो। (3)
अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा और तुम्हें एक निर्धारित अवधि तक (ज़िंदा) बाक़ी रखेगा --- जब अल्लाह का (निर्धारित) समय आ जाता है, तो वो टाला नहीं जा सकता। काश! तुम (यह बात) समझ पाते!” (4)
(फिर) नूह ने (अल्लाह से) कहा, “ऐ मेरे रब! मैं अपनी क़ौम को रात दिन (सच्चाई की बातों की तरफ) बुलाता रहा, (5)
लेकिन मैं जितना ही उनको (सच्चाई की तरफ़) बुलाता हूँ, उतना ही वे और ज़्यादा (सच्चाई से) दूर भागते हैं : (6)
जब (भी) मैं उन्हें (ईमान की तरफ) बुलाता हूँ, ताकि तू उन्हें माफ़ कर सके, तो वे अपनी अंगुलियाँ कानों में ठूंस लेते हैं और अपने ऊपर अपने कपड़े तान लेते हैं, अपनी (गलत) बातों पर अड़े रहते हैं, और उनका घमंड और भी ज़्यादा बढ़ जाता है। (7)
मैं उन्हें खुलकर (सच्चाई की तरफ़) बुलाने की कोशिश कर चुका हूँ। (8)
मैंने उन्हें सब के सामने भी उपदेश देने की कोशिश की है और उन्हें अकेले में भी समझाने की कोशिश की है। (9)
मैंने कहा, "तुम अपने रब से (गुनाहों की) माफ़ी माँगो : वह बड़ा माफ़ करनेवाला है। (10)
वह तुम्हारे लिए आसमान से ख़ूब पानी बरसाएगा; (11)
वह तुम्हें धन-दौलत और बेटे देगा; वह तुम्हारे लिए बाग़ उगा देगा और नहरें बहा देगा। (12)
तुम्हें क्या हो गया है? अल्लाह की महिमा से तुम डरते क्यों नहीं, (13)
जबकि उसने तुम्हें एक-के-बाद एक चरण [stage by stage] से गुज़ार कर पैदा किया है? (14)
क्या तुमने कभी इस बात पर विचार किया कि किस तरह अल्लाह ने सात (या कई) आसमानों को तल्ले ऊपर पैदा किया, (15)
उनमें चाँद को रौशनी और सूरज को दीपक [प्रकाश और ताप के स्रोत] के रूप में स्थापित किया, (16)
और किस तरह अल्लाह ने तुम्हें ज़मीन से पौधे की तरह उगाया है* (17)
* पौधों की तरह मानव जीवन का आरंभ और विकास भी रासायनिक और जैविक चरणों से गुजरते हुए धीरे धीरे हुआ है.
किस तरह वह तुम्हें उसी (भूमि) में लौटा देगा और फिर तुमको (वहीं से दोबारा) बाहर ला खड़ा करेगा, (18)
और किस तरह अल्लाह ने तुम्हारे लिए ज़मीन को फर्श की तरह बिछा दिया है, (19)
ताकि तुम उसके खुले हुए रास्तों में चलो फिरो।" (20)
नूह ने कहा, “ऐ मेरे रब! हक़ीक़त यह है कि उनलोगों ने मेरा कहना नहीं माना, और उन (सरदारों) के पीछे चल पड़े जिनके धन दौलत और संतानों ने उन्हें सिवाए नुक़सान पहुँचाने के और कुछ नहीं दिया; (21)
और (जनता को गुमराही में रखने के लिए) वे बड़ी बड़ी चालें चलते रहे, (22)
और (उनलोगों ने अपने आदमियों से) कहा, "तुमलोग अपने भगवानों [gods] को कभी मत छोड़ना! और “वद्द”, “सुवा”, “यग़ूस”, “यऊक़” या “नस्र” (नाम के देवताओं) को (भी) कभी नहीं छोड़ना!” (23)
उन्होंने बहुत लोगों को गुमराह [पथभ्रष्ट] किया है। सो (ऐ मेरे रब!), तू इन ज़ालिमों को सिवाए बर्बादी के और कुछ न ला।" (24)
(अंत में) वे अपने पापों के कारण ही (ज़बरदस्त बाढ में) डुबा दिए गए, और (जहन्नम की) आग में डाल दिए गए : अल्लाह के मुक़ाबले में उन्हें कोई मददगार नहीं मिल सका। (25)
और नूह ने यह भी कहा, “ऐ मेरे रब! (सच्चाई से) इंकार करनेवाले [काफ़िरों] में से किसी को भी इस धरती पर ज़िंदा न छोड़ ----- ---- (26)
अगर तूने उन्हें (जीवित) छोड़ा, तो वे तेरे बन्दों को गुमराह करते रहेंगे, और उनसे जो औलाद पैदा होगी, वह केवल पाप करनेवाली (और) विश्वास न करनेवाली पैदा होगी ---- (27)
“ऐ मेरे रब! मुझे भी माफ कर दे और मेरे माँ बाप को भी, और हर उस आदमी को जो ईमान की हालत में मेरे घर में दाख़िल हुआ। (सभी) ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को भी माफ़ कर दे, मगर ज़ालिमों के लिए बर्बादी के सिवाए कोई और चीज़ न ला।” (28)
सूरह 14 : इबराहीम [Abraham]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰
[ऐ रसूल!] यह [क़ुरआन] एक किताब है जिसे हमने आप पर उतारी है, ताकि आप अपने रब के हुक्म से लोगों को गहरे अँधेरों से निकालकर रौशनी की तरफ़ ला सकें, उस रास्ते की तरफ़ ला सकें जो सबसे ज़्यादा ताक़तवाला और तमाम तारीफ़ों के योग्य (रब का) का बताया हुआ रास्ता है, (1)
वह अल्लाह, कि जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, सबका मालिक है। और उन लोगों पर बहुत ही सख़्त यातना होगी जो उस (अल्लाह) को नहीं मानते, (2)
वह लोग जो आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी के मुक़ाबले इस सांसारिक जीवन को ज़्यादा पसंद करते हैं, जो दूसरों को अल्लाह के रास्ते पर चलने से रोकते हैं, और उसे टेढ़ा बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं : ऐसे ही लोग हैं जो गुमराही में बहुत दूर जा पड़े हैं। (3)
हमने कभी भी कोई रसूल ऐसा नहीं भेजा, जिसने लोगों के सामने (हमारे संदेशों को) स्पष्ट कर देने के लिए उन्हीं की भाषा का प्रयोग न किया हो, मगर इसके बावजूद (वे नहीं समझते), फिर अल्लाह जिसे चाहता है उसे भटकता छोड़ देता है, और जिसे चाहता है उसे सीधा मार्ग दिखा देता है : वह बड़ी ताक़तवाला, बेहद समझ-बूझ रखनेवाला है। (4)
और (देखो!) हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ भेजा था : "अपनी क़ौम के लोगों को गहरे अँधेरों से रौशनी की तरफ़ निकाल लाओ। और उन्हें अल्लाह के उन दिनों की याद दिलाओ (जब अल्लाह ने उन पर अपनी ख़ास कृपा की थी या जब उन्हें परेशानी में डाल कर आज़माया था) : सचमुच इन बातों में हर उस आदमी के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो (परेशानी में) धैर्य से काम लेता है और (अच्छे समय में) शुक्र अदा करता है।” (5)
फिर जब मूसा ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था, "अल्लाह ने जो तुम पर मेहरबानियाँ की थी, उन्हें याद करो कि जब उसने तुम्हें फ़िरऔन [pharaoh] के लोगों (की ग़ुलामी) से बचाया था, जो तुम्हें कैसी भयानक यातनाएं दिया करते थे, तुम्हारे बेटों को मार डालते थे और केवल तुम्हारी औरतों को (दासियों के रूप में) ज़िंदा रहने देते थे--- वह तुम्हारे रब की ओर से अत्यंत कड़ी परीक्षा थी!" (6)
याद करो जब अल्लाह ने तुम से अपना नियम बताया था, “अगर तुम शुक्र अदा करते रहे तो मैं तुम्हें और अधिक नेमतें दूँगा, लेकिन अगर तुम ने शुक्र अदा करना छोड़ दिया, तो (याद रखो) मेरी यातना बहुत कठोर होती है।” (7)
और मूसा ने कहा, "अगर तुम, और ज़मीन में रहनेवाला हर एक आदमी एक साथ नाशुक्री करे, तब भी (अल्लाह को तो किसी की ज़रूरत नहीं) वह तो आत्म-निर्भर [self sufficient] है, सारी तारीफ़ों के लायक़ है।" (8)
क्या आपने उन लोगों के बारे में नहीं सुना जो आपसे पहले गुज़र चुके हैं, नूह की क़ौम के लोग, आद, समूद और उनके बाद बसनेवाले वे लोग जिनको अल्लाह के सिवा (अब) कोई नहीं जानता? उनके पास उनके रसूल साफ़-साफ़ प्रमाण लेकर आए थे, मगर उन लोगों ने उन (रसूलों) का मुँह बंद कराने की कोशिश की और कहने लगे, "तुम जिस संदेश के साथ भेजे गए हो, हम उसमें विश्वास नहीं करते। और तुम जो भी हमें करने के लिए कह रहे हो, उसके बारे में हम गहरे संदेह में हैं।" (9)
उनके रसूलों ने जवाब दिया, "क्या अल्लाह के बारे में कोई संदेह कर सकता है जिसने आसमानों और ज़मीन की रचना की है? वह तुम्हें अपनी तरफ़ बुलाता है, ताकि तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर दे और तुम्हें एक नियत घड़ी तक ज़िंदगी का मज़ा उठाने दे।" मगर उन लोगों ने कहा, "तुम तो बस हमारे ही जैसे एक (मामूली) इंसान हो। तुम चाहते हो कि हमारे बाप-दादा जिनकी पूजा करते आए हैं, उनसे हमें रोक दो। (अच्छा, अगर तुम ला सकते हो, तो) हमारे सामने कोई स्पष्ट प्रमाण ले कर आओ।" (10)
उनके रसूलों ने जवाब दिया, "हम तो वास्तव में बस तुम्हारे ही जैसे आदमी हैं, मगर अल्लाह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उस पर अपना ख़ास एहसान [favour] कर के चुन लेता है। हम अपनी तरफ़ से कोई प्रमाण नहीं ला सकते, जब तक कि अल्लाह इसकी इजाज़त न दे दे, इसलिए विश्वास [ईमान] रखनेवालों को अल्लाह ही पर पूरा भरोसा रखना चाहिए---- (11)
और हम अल्लाह पर भरोसा क्यों न करें, जबकि उसी ने हमें वह (सीधा) रास्ता दिखाया है जिन पर हम चलते हैं? तुम हमें चाहे जो भी तकलीफ़ पहुँचा लो, निश्चय ही हम इसे पूरे सब्र और धीरज के साथ सह लेंगे। और भरोसा करनेवालों को तो बस अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।"(12)
इंकार करनेवालों [काफ़िरों] ने अपने रसूलों से कहा, "अगर तुम हमारे दीन (धर्म) में लौट कर नहीं आए, तो हम तुम्हें अपने देश से निकाल बाहर करेंगे।" मगर तब उनके रब ने उन रसूलों की तरफ़ संदेश भेजे : "अब हम शैतानियाँ करनेवालों [ज़ालिमों] को बर्बाद कर देंगे, (13)
और उनके बाद उस ज़मीन पर बसने के लिए तुम्हें छोड़ जाएंगे। यह उनलोगों के लिए इनाम होगा, जो मुझ से (हिसाब-किताब के दिन) मिलने से और मेरी चेतावनियों से डरे रहते हैं।" (14)
उन (रसूलों) ने अल्लाह से (ज़ालिमों के ख़िलाफ़) फ़ैसले की माँग की, और (नतीजा यह हुआ कि सच्चाई के मुक़ाबले में) हर ज़िद्दी-अड़ियल और ज़ालिम बुरी तरह असफल हुआ---- (15)
जहन्नम उनमें से हर एक के इंतज़ार में है; वहाँ उसे पीने के लिए गंदा, पीप मिला पानी दिया जाएगा, (16)
जिसे वह घूँट-घूँट पीने की कोशिश करेगा, मगर उसे गले के नीचे उतार न पाएगा; मौत उसे हर तरफ़ से घेर लेगी, मगर वह मरेगा भी नहीं; उसके आगे और अधिक कठोर यातना मौजूद होगी। (17)
जिन लोगों ने अपने रब को मानने से इंकार [कुफ़्र] किया, उनके कर्मों का हाल उस राख के ढेर जैसा होगा, जिसे किसी तूफ़ानी दिन में हवा का तेज़ झोंका उड़ा ले जाता है : जो कुछ भी उन्होंने (अपने कर्मों से) हासिल किया होगा, उनमें से कुछ भी उनके हाथ न आएगा। यही है गुमराही में बहुत दूर जा पड़ना। (18)
[ऐ रसूल!] क्या आपने देखा नहीं कि आसमानों और ज़मीन को अल्लाह ने एक ख़ास मक़सद के साथ पैदा किया है? अगर वह चाहे, तो तुम सबको सिरे से मिटा दे, और बदले में एक नई सृष्टि की रचना कर दे : (19)
और ऐसा करना अल्लाह के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है। (20)
जब सारे लोग (क़यामत के दिन) अल्लाह के सामने हाज़िर होंगे, तो (समाज में) अपनी ताक़त की धाक जमानेवालों से कमज़ोर लोग कहेंगे, "हम तो (दुनिया में) तुम्हारे पीछे चलते थे, तो क्या अब तुम अल्लाह की किसी भी यातना से हमें बचा सकते हो!?” वे जवाब में कहेंगे, "अगर अल्लाह ने हमें बच निकलने का कोई रास्ता दिखाया होता, तो हम भी तुम्हें वह रास्ता दिखा देते। अब चाहे हम चिल्ला-चिल्ली करें या धीरज रखते हुए बर्दाश्त कर लें, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला : बच निकलने का अब कोई उपाय नहीं है।" (21)
(क़यामत के दिन) जब हर चीज़ का फ़ैसला हो चुका होगा तब शैतान, (लोगों से) कहेगा, "अल्लाह ने जो तुमसे वादा किया था वह सच्चा था, और मैंने भी तुमसे वादा किया था, मगर वह सब झूठा था: मेरे पास तो तुम्हें क़ाबू में रखने की कोई ताक़त न थी, सिवाए इसके कि मैं तुम्हें (ग़लत काम की तरफ़) बुलाता था, और तुम मेरा कहा मान लेते थे, अत: मुझ पर इल्ज़ाम न धरो; बल्कि (अपनी हालत के लिए) अपने आप को ही मलामत करो। (आज के दिन) मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूँ और न ही तुम मेरी मदद कर सकते हो। पहले जिस तरह तुमने मुझे अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी) में साझेदर [Partner] बना रखा था, (आज) मैं उसे मानने से इंकार करता हूँ।" सचमुच ऐसे ज़ालिमों को बड़ी दर्दनाक यातना होगी, (22)
मगर जो लोग ईमान रखते थे और उन्होंने अच्छे कर्म किए थे, उन्हें ऐसे बाग़ों में लाया जाएगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, अपने रब के हुक्म से वे उनमें हमेशा के लिए रहेंगे : वहाँ (हर तरफ़ से) उनका अभिवादन 'तुम पर सलामती हो' की दुआ से होगा। (23)
[ऐ रसूल!] क्या आपने देखा नहीं कि अल्लाह कैसी मिसालें पेश करता है? एक अच्छी बात उस पाकीज़ा पेड़ की तरह है जिसकी जड़ गहरी जमी हुई हो और उसकी टहनियाँ आसमान में फैली हुई हों, (24)
और वह (पेड़) अपने रब के हुक्म से हर मौसम में फल दे रहा हो---- अल्लाह लोगों के लिए ऐसी मिसालें इसलिए पेश करता है, ताकि वे इस पर सोच-विचार कर सकें--- (25)
मगर एक बुरी (व गंदी) बात की मिसाल एक सड़े हुए पेड़ की तरह है (कि जड़ें खोखली हों और) जिसे ज़मीन की सतह से ही उखाड़ लिया जाए, जिसे स्थिरता व जमाव न मिला हो। (26)
जो लोग मज़बूत जमी हुई बात [क़ुरआन] पर विश्वास रखते हैं, अल्लाह उन्हें मज़बूती से जमा देता है, इस दुनिया में भी और आनेवाली [आख़िरत/परलोक] दुनिया में भी, मगर शैतानियाँ करनेवालों को अल्लाह भटकता छोड़ देता है : अल्लाह (अपनी समझ से) जो चाहता है, करता है। (27)
[ऐ रसूल!] क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जो, अल्लाह की मेहरबानियों (पर शुक्र करने के बजाए) उल्टा उसकी केवल नाशुक्री करते हैं और अपनी क़ौम के लोगों को बर्बादी के घर में ला उतारते हैं, (28)
यानी जहन्नम में, जिसमें वे जलाए जाएँगे? और रहने के लिए (जहन्नम) क्या ही बुरा ठिकाना है! (29)
वे (झूठे ख़ुदाओं को) अल्लाह के बराबर ठहराते हैं ताकि लोगों को उसके सही मार्ग से भटका सकें। कह दें, "अभी थोड़े दिन मज़े कर लो, मगर तुम्हारा अंतिम पड़ाव तो (जहन्नम की) आग है।" (30)
मेरे वह बन्दे जो ईमान लाए हैं उनसे कह दें कि इससे पहले कि वह [क़यामत का] दिन आ जाए जिस दिन न तो किसी सामान का लेन-देन हो सकेगा, न किसी से दोस्ती काम आएगी। (अत: इसके लिए तैयारी कर लें) वे नमाज़ को पाबन्दी से पढ़ा करें, और हमने जो कुछ उन्हें दे रखा है उसमें से छिप कर और सबके सामने भी ख़र्च किया करें। (31)
यह अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, आसमान से (ज़मीन पर) पानी बरसाया और फिर उसके द्वारा तुम्हारे खाने-पीने के लिए तरह तरह के फल (व फ़सलें) उगा दीं; उसने जहाज़ को तुम्हारे लिए उपयोगी बनाया, जो उसके हुक्म से समंदर में तैरती चलती है, और नदियों को भी (तुम्हारे फ़ायदे की चीज़ बनाया); (32)
उसने सूरज और चाँद को भी तुम्हारे लिए बहुत उपयोगी बनाया, वे अपने रास्ते पर (नियत चाल से) चलते रहते हैं; उसने रात औऱ दिन को भी तुम्हारे लिए बड़े काम का बनाया है, (33)
और (अपनी ज़रूरत के लिए) जो भी तुम ने उससे माँगा है, हर चीज़ में से कुछ हिस्सा तुम्हें ज़रूर दिया गया है। अगर तुम अल्लाह की नेमतों [favours] को गिनना चाहो तो कभी भी उन्हें गिन नहीं सकोगे : इंसान सचमुच बड़ा ही ना-इंसाफ़ [unjust] और ना-शुक्रा [ungrateful] है। (34)
याद करो जब इबराहीम ने (दुआ में) कहा था, "मेरे रब! इस शहर [मक्का] को अमन की जगह [safe] बना दे! और मुझे और मेरी सन्तान को इस बात से बचाते रहना कि मूर्तियों की पूजा करने लग जाएं, (35)
मेरे रब! इन (मूर्तियों) नॆ बहुत से लोगों को (सच्चाई के) रास्ते से भटका दिया है! तो जो कोई मेरे पीछे चला तो वह मेरे साथ है, मगर जिस किसी ने मेरे तरीक़े को मानने से इंकार किया---तो (उसका फ़ैसला तेरे हाथ है) बेशक तू बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद रहम करनेवाला है। (36)
हमारे रब! (तू देख रहा है कि) मैंने अपनी कुछ संतानों को एक ऐसी घाटी में ला कर बसाया है जहाँ खेती-बाड़ी नहीं होती, वह जगह तेरे पवित्र घर [काबा] से नज़दीक है, हमारे रब! (यह इसलिए किया) ताकि वे वहाँ नमाज़ क़ायम करें। अत: लोगों के दिलों को तू उनकी ओर झुका दे, और उनके लिए ज़मीन की पैदावार से रोज़ी प्रदान कर, ताकि वे तेरा शुक्र अदा करनेवाले बन सकें। (37)
हमारे रब! जो कुछ हम छिपाते हैं और जो कुछ हम ज़ाहिर करते हैं, उसे तू अच्छी तरह जानता है : कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है जो अल्लाह से छिपी हो, न ज़मीन में और न आसमान में। (38)
(इबराहीम ने कहा:) प्रशंसा है उस अल्लाह की, जिसने बुढ़ापे की अवस्था में भी मुझे इसमाईल [Ishmael] और इसहाक़ [Isaac] (जैसे बेटे) प्रदान किए : मेरा रब सारी दुआएं सुनता है! (39)
मेरे रब! मुझे और मेरी सन्तानों को पाबंदी से नमाज़ पढ़ने वाला बना दे। ऐ हमारे रब! मेरी दुआओं को क़बूल कर ले। (40)
ऐ हमारे रब! जिस दिन (कर्मों का) हिसाब लिया जाएगा, उस दिन मुझे, मेरे माँ-बाप को और सब ईमान रखनेवालों को माफ़ कर देना।" (41)
[ऐ रसूल!] आप यह न समझें कि जो कुछ (मक्का के) ये इंकार करनेवाले [काफ़िर] कर रहे हैं, उसकी ख़बर अल्लाह को नहीं है : वह तो इन्हें बस उस दिन तक की मुहलत दे रहा है जिस दिन मारे डर के उनकी आँखे फटी की फटी रह जाएँगी, (42)
हैरान, घबराए हुए, अपनी गर्दनें उठाए हुए वे भागे चले जा रहे होंगे, नज़रें एक जगह से हटा भी न पाएंगे, और उनके दिल (डर के चलते विचारों से) ख़ाली हो रहे होंगे। (43)
[ऐ रसूल! आप] लोगों को उस दिन से डराएं, जब यातना उनके पास आ पहुंचेगी, उस समय इंकार करने वाले कहेंगे, "हमारे रब! हमें थोड़ा-सा समय और दे दे : हम तेरे संदेश की पुकार को ज़रुर मान लेंगे, और रसूलों का अनुसरण करेंगे।" (उनसे कहा जाएगा), "क्या तुम वही नहीं हो जो अब से पहले क़समें खा खा कर कहा करते थे कि ‘हमारी ताक़त तो कभी ख़त्म होनेवाली नहीं है?" (44)
तुम भी दूसरों की तरह उन्हीं बस्तियों में रह-बस चुके थे, जिन्होंने ख़ुद अपने ऊपर अत्याचार किया था, और तुम्हें साफ़ तौर से दिखाया गया था कि उनके साथ हमने कैसा सलूक किया----फिर हमने तुम्हें समझाने के लिए तरह तरह की मिसालें बयान कर दीं (फिर भी तुम ने शैतानी नहीं छोड़ी!)।" (45)
उन लोगों ने (अपनी शैतानी चालों से हर तरह का) जाल बिछाया था, मगर उनका जाल चाहे पहाड़ को भी अपनी जगह से क्यों न हटा देता, तब भी अल्लाह के पास तो उनकी हर चाल का जवाब था। (46)
अतः (ऐ रसूल) आप यह न सोचें कि अल्लाह अपने रसूलों से किए हुए वादे को तोड़ देगा : अल्लाह बेहद ताक़तवाला और सख़्त सज़ा देने की पूरी सलाहियत रखता है। (47)
एक दिन आएगा-- जब यह ज़मीन एक दूसरी ही ज़मीन में बदल जाएगी और आसमानों को भी दूसरे आसमान में बदल दिया जाएगा, और सब के सब लोग हाज़िर हो जाएँगे उस अल्लाह के सामने--- जो अकेला है, (ताक़त में) सब पर भारी है---- (48)
उस दिन आप अपराधियों को देखेंगे कि ज़ंजीरों में जकड़े हुए होंगे, (49)
उनके कपड़े तारकोल के होंगे और आग उनके चहरों को घेरे हुए होगी, (50)
(सबका फ़ैसला कर दिया जाएगा) ताकि अल्लाह हर एक जान को (उसके कर्मों का) बदला दे सके जिसका वह हक़दार है : अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (51)
यह सभी इंसानों के लिए एक सन्देश है, और इसलिए भेजा गया है कि लोगों को इसके द्वारा सावधान कर दिया जाए, और वे जान लें कि वही अकेला अल्लाह है, और इसलिए भी कि जो समझ-बूझ रखते हैं, वे इससे नसीहत ले सकें। (52)
सूरह 21: अल अंबिया [अल्लाह के नबी/ The Prophets]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
लोगों से उनके (कर्मों का) हिसाब लेने का समय नज़दीक आ पहुँचा है, मगर वे हैं कि (सच्चाई से) मुँह फेरे हुए, बेफ़िक्री में सब कुछ भुलाए बैठे हैं। (1)
उनके रब की तरफ़ से (नसीहत के लिए) जब भी कोई नया संदेश उनके पास आता है, तो वे उसे सुनते भी हैं तो बस हँसी-खेल करते हुए, (2)
बेकार चीज़ों में मगन मन के साथ! उन शैतानियाँ करनेवालों ने चुपके-चुपके आपस में कानाफूसी की : "यह आदमी [मोहम्मद] तुम्हारे जैसा ही एक (मामूली सा) आदमी नहीं तो और क्या है? फिर क्या तुम सब जानते-बूझते भी उसके पास जादू की बातें सुनने जाओगे?" (3)
[रसूल ने] कहा, "आसमानों और ज़मीन में जो बात भी कही जाती है (चाहे चुपके चुपके हो या सबके सामने हो), मेरा रब उन सब को जानता है : वह सब कुछ सुनता है, हर चीज़ जानता है।" (4)
(इतना ही नहीं !) बल्कि उनमें से कुछ लोग यह कहते हैं, "ये तो बस भटके हुए सपनों की बातें हैं”; कुछ लोगों ने कहा, “उसने इसे स्वयं ही गढ़ लिया है”; कुछ दूसरे लोगों ने कहा, “वह तो बस एक कवि है, (अगर ऐसा नहीं है तो) उसे चाहिए कि वह हमें (अल्लाह की तरफ़ से) कोई निशानी लाकर दिखाए, जिस तरह (निशानियाँ लेकर) पहले के रसूल भेजे गए थे।" (5)
लेकिन इनसे पहले जिन जिन बस्तियों को हम ने नष्ट किया, उनमें से तो कोई भी (निशानियाँ देखकर) ईमान नहीं लाया था, फिर क्या यह लोग (रसूल की बातों पर) विश्वास कर लेंगे? (6)
और [ऐ पैग़म्बर], यहाँ तक कि आपके समय से पहले, जितने भी रसूल [Messenger] हमने भेजे, सब के सब आदमी ही थे जिन पर हमारी ‘वही’[revelations] उतरती थी--- [इंकार करनेवालो!] अगर तुम्हें यह बात मालूम न हो, तो उनसे जाकर पूछ लो जो (आसमानी) किताबों का ज्ञान रखते हैं--- - (7)
और हमने उन (रसूलों) का शरीर कभी ऐसा नहीं बनाया कि वे खाना न खाते हों और न ही वे हमेशा ज़िंदा रहनेवाले थे। (8)
(तुम्हारे ही जैसे आदमियों को रसूल बनाकर भेजा) और फिर हमने उनके साथ किए हुए वादे को अंत में पूरा कर दिखाया : हम ने उन्हें (और उनके साथ) जिस किसी को चाहा, बचा लिया, और मर्यादा तोड़ देनेवालों को बर्बाद कर दिया। (9)
(अब) हमने तुम (लोगों) के लिए एक ऐसी किताब [क़ुरआन] उतार भेजी है, जो तुम्हें (मेरी नसीहतें) याद दिलाती रहे। तो क्या तुम समझ-बूझ से काम नहीं लोगे? (10)
शैतानियाँ व ज़ुल्म करनेवालों की कितनी बस्तियों को हम ने बर्बाद कर डाला! और उनके बाद कितनी दूसरी बस्तियों को उनकी जगह उठा ख़ड़ा किया! (11)
फिर जब उन्हें ऐसा लगा कि हमारी यातना उनके सिर पर आ खड़ी हुई है, तो लगे वहाँ से भागने! (12)
उनसे कहा गया, "भागने की कोशिश मत करो! लौट जाओ अपने घरों को, और उसी भोग-विलास के जीवन में जिसमें तुम डूबे हुए थे : शायद वहाँ (सलाह-मशविरा हो और) तुम से कुछ पूछा जाए।"(13)
बस्तियों में रहनेवाले कहने लगे, "अफ़सोस हम पर! निस्संदेह हम ही ग़लती पर थे!"(14)
और फिर उनका रोना-चिल्लाना तब तक बंद नहीं हुआ जब तक कि हमने उन्हें मिटा न दिया--- कटे हुए खेत, व बुझे हुए अंगारों की तरह! (15)
हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच में है, उनको खेल तमाशे के लिए नहीं बनाया। (बल्कि एक ख़ास मक़सद के लिए बनाया है) (16)
अगर हम यूँ ही समय काटने के लिए (कोई खेल-तमाशा ही) बनाना चाहते, तो ख़ुद अपनी तरफ से ही बना लेते----अगर हम ने सचमुच ऐसा चाहा होता! (17)
नहीं, बल्कि (हक़ीक़त यह है कि) हम झूठ के ख़िलाफ़ सच्चाई से वार करते हैं, और वह झूठ का सिर कुचल डालता है ---- और देखो झूठ कैसे पूरी तरह से मिट जाता है! अफ़सोस तुम (लोगों) पर! तुम (अल्लाह के बारे में) कैसी कैसी बातें बनाते हो! (18)
आसमानों और ज़मीन में जो कोई भी है, सब उसी (अल्लाह) का है, (उसी के लिए है), और जो (फ़रिश्ते) उसके पास हैं, वे कभी भी घमंड में आकर अल्लाह की बन्दगी से मुँह नहीं मोड़ते, और न कभी (बंदगी से) थकते हैं; (19)
वे रात दिन, बिना थके हुए, उसकी बड़ाई का गीत गाते रहते हैं। (20)
क्या उन्होंने ज़मीन (के जीवों में) से ऐसे ख़ुदा बना लिए हैं जो मुर्दों को ज़िंदा कर सकते हैं? (21)
अगर आसमान या ज़मीन में अल्लाह के सिवा कोई दूसरा (पूजने के लायक़) ख़ुदा होता, तो आसमान और ज़मीन दोनों टूट-फूट जाते : अल्लाह, जो (सारे जहाँ के) सिंहासन का मालिक है, उन बातों से कहीं ऊँचा है, जो बातें वे (उसके बारे में) बनाते रहते हैं : (22)
जो कुछ वह [अल्लाह] करता है, उसके लिए उससे हिसाब लेनेवाला कोई नहीं, जबकि इन लोगों से (हर काम का) हिसाब लिया जाएगा। (23)
फिर क्या इबादत [पूजा] के लिए उस (अल्लाह) के बजाए इन्होंने दूसरे ख़ुदाओं को चुन रखा है? [ऐ रसूल] कह दें, "तो ले आओ, अपना प्रमाण! यह किताब [क़ुरआन] उनके लिए नसीहत है जो लोग मेरे साथ हैं, और उनके लिए भी है जो मुझसे पहले गुज़र चुकी किताबों के माननेवाले हैं।” मगर ज़्यादातर आदमी सच्चाई को पहचानते ही नहीं, इसलिए उस पर ध्यान ही नहीं देते। (24)
हमने [ऐ रसूल], आपसे पहले कभी भी ऐसा रसूल नहीं भेजा, जिस पर यह बात न उतारी हो : "मेरे सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं है, अतः तुम मेरी ही बन्दगी करो।" (25)
और वे कहते हैं : "दया करनेवाले रब [रहमान] ने (फ़रिश्तों को अपनी) सन्तान बना रखा है।" महान है वह!, नहीं! वे [फ़रिश्ते] तो बस हमारे इज़्ज़तदार बंदे हैं : (26)
वे उस [अल्लाह] के बोलने से पहले कभी बोलते तक नहीं, और उसके आदेश का पालन करने के लिए तैयार रहते हैं। (27)
जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है, अल्लाह उनके सब (भूत व भविष्य को) जानता है, और वे बिना इजाज़त किसी मामले में दख़ल नहीं दे सकते, सचमुच वे तो ख़ुद ही उसके भय से सहमे रहते हैं। (28)
उनमें से कोई भी अगर ऐसा दावा कर बैठे कि "अल्लाह के अलावा मैं भी एक (पूजा करने के लायक़) भगवान हूँ", तो हम उसे भी बदले में जहन्नम देंगे : शैतानियाँ करनेवालों को हम ऐसा ही बदला दिया करते हैं। (29)
क्या इंकार करनेवालों को यह बात मालूम नहीं कि (रचना के समय) सारे आसमान और ज़मीन एक साथ आपस में जुड़े हुए थे, और यह कि हम ने उन्हें खींच कर अलग अलग किया, और यह कि हमने (धरती पर) हर सजीव चीज़ को पानी से पैदा कर दिया? तो क्या वे (इस बात पर) विश्वास नहीं करेंगे? (30)
और हमने धरती पर पहाड़ों को मज़बूती से जमा दिया, ताकि धरती नीचे से हिले-डुले नहीं, और हम ने उन (पहाड़ों में) ऐसे दर्रे बना दिए जिनसे चौड़े रास्ते बन गए, ताकि लोग सही दिशा में आ जा सकें, (31)
और हमने आसमान को एक सुरक्षित छत जैसा बनाया है---- इसके बावजूद वे इन अनोखी निशानियों से मुँह मोड़ लेते हैं। (32)
वही (अल्लाह) है जिसने रात और दिन बनाए, और सूरज और चाँद को भी पैदा किया, हर एक (खगोलीय पिंड) अपनी-अपनी कक्षाओं [orbits] में तैर रहा है। (33)
[ऐ रसूल] हमने आपसे पहले भी किसी आदमी को हमेशा ज़िंदा रहनेवाला जीवन नहीं दिया--- अगर आपकी मौत होगी, तो क्या ये [विश्वास न करनेवाले] हमेशा ज़िंदा रहेंगे? (34)
हर जीव को मौत का मज़ा चखना ही है : हम तुम्हें अच्छे और बुरे हालात में डालकर तुम्हारी परीक्षा करते रहते हैं, और अन्ततः तुम्हें लौट कर हमारे ही पास आना है। (35)
जब (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवाले आपको देखते हैं, तो आपकी हँसी उड़ाते हुए कहते हैं : "क्या यही वह आदमी है, जो तुम्हारे देवताओं के बारे में बातें करता है?" वे रहम करनेवाले रब की किसी भी बात को बस रद्द कर देते हैं। (36)
आदमी जल्दबाज़ी (की आदत) के साथ पैदा किया गया है : मैं बहुत जल्द तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखानेवाला हूँ, अतः तुम उन्हें समय से पहले ही ले आने के लिए मुझसे मत कहो। (37)
वे कहते हैं, "अगर तुम जो (यातना आने की बात) कहते रहते हो वह सच है, तो यह वादा कब पूरा होगा?" (38)
(सच्चाई से) इंकार करनेवाले अगर जान पाते (तो यातना की जल्दी न मचाते), कि जब वह समय आ जाएगा तो फिर उस आग से न तो वे अपने चेहरों को और न अपनी पीठों को (झुलसने से) बचा पाएंगे, और न उन्हें किसी की सहायता ही मिलेगी! (39)
बल्कि वह (आग) अचानक उनपर आ धमकेगी और उन्हें बदहवास कर देगी; उनमें इतना दम न होगा कि वे उसे पीछे हटा सकें; उन्हें (कुछ समय की) मुहलत भी नहीं दी जाएगी। (40)
[ऐ रसूल] आपसे पहले भी आए रसूलों की हँसी उड़ाई गयी थी, मगर (हर बार) हुआ यह कि वे जिस (यातना के आने की) बात की हँसी उड़ाते थे, अंत में उसी (यातना) ने उन्हें घेर लिया। (41)
आप पूछें, "रात हो या दिन का समय, कौन है जो तुम्हें रहम करनेवाले रब (की यातना) से बचा सकता है? (कोई नहीं), मगर तब भी वे अपने रब का नाम सुनते ही मुँह मोड़ लेते हैं। (42)
क्या उनके पास ऐसे देवता हैं जो हम से उन्हें बचा सकते हैं? (वे क्या बचाएंगे!) उनके देवताओं में तो इतनी भी ताक़त नहीं कि वे अपनी ही मदद कर सकें, और न ही हमारी तरफ़ से सुरक्षा पा सकते हैं। (43)
हमने इन गुनाहगारों और उनके बाप-दादाओं को एक लम्बे समय तक जीवन की सुख-सुविधा से मज़ा लेने दिया है, तो क्या वे देखते नहीं कि हम किस तरह चारों तरफ़ से उनकी सीमाएं सिकोड़ कर छोटी करते जा रहे हैं? तो फिर क्या वे जीत जाएंगे? (44)
[ऐ रसूल] आप कहें, "मैं तो बस (अल्लाह की भेजी हुई) वही [Revelation] के द्वारा तुम्हें सावधान करता हूँ।" याद रखें, जो बहरे हैं उन्हें चाहे कितना भी सावधान किया जाए, वह कभी सुननेवाले नहीं हैं, 45)
तब भी, अगर आपके रब की यातना का कोई झोंका भी उन्हें छू जाए, तो निश्चय ही वे लगेंगे चिल्लाने, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! सचमुच हम ही ग़लती पर थे।" (46)
क़यामत के दिन हम इंसाफ़ का तराज़ू लगा देंगे ताकि किसी के साथ थोड़ा भी ज़ुल्म न हो पाए, यहाँ तक कि अगर कोई (कर्म) राई के दाने के (वज़न के) बराबर भी हो, तो हम उसे भी सामने ला खड़ा करेंगे--- और हिसाब रखने के लिए हम काफ़ी हैं। (47)
हम ने मूसा [Moses] और हारून [Aaron] को सही और ग़लत में फ़र्क़ बतानेवाली (एक किताब) दी थी, जो (मार्ग दिखाने के लिए) एक रौशनी थी, और परहेज़गार लोगों के लिए नसीहत देनेवाली [Reminder] थी, (48)
(उन परहेज़गारों के लिए) जो अपने रब से बिना उसे देखे हुए, डरते रहते हैं, और आनेवाली (क़यामत की) घड़ी के भय से सहमे रहते हैं। (49)
यह [क़ुरआन] भी एक शुभ [blessed] संदेश है, जिसको हमने उतारा है---- तो फिर क्या तुम (लोग) इसे मानने से इंकार करते हो? (50)
बहुत समय पहले हमने इबराहीम [Abraham] को सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ दी थी, और हम उसकी हालत अच्छी तरह से जानते थे। (51)
जब उन्होंने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा, "यह क्या मूर्तियाँ हैं, जिनकी तुम इतनी भक्ति करते हो?" (52)
वे बोले, "हमने अपने बाप-दादा को इन्हीं की पूजा करते हुए देखा था।" (53)
उस [इबराहीम] ने कहा, "तुम ख़ुद भी भटक चुके हो और तुम्हारे बाप-दादा भी सही मार्ग से बिल्कुल ही भटके हुए थे।" (54)
इस पर उन्होंने कहा, "क्या तुम हम से सचमुच ऐसा कह रहे हो, या यूँ ही हँसी-खेल कर रहे हो?" (55)
इबराहीम ने कहा, "नहीं! सुनो, वह आसमानों और ज़मीन का मालिक है, वही है जिसने उनको पैदा किया है, और असल में वही तुम्हारा भी रब है, मैं इसपर गवाही देता हूँ। (56)
और (इबराहीम ने कहा), “ क़सम है अल्लाह की! (एक दिन) जैसे ही तुम (लोग) पीठ फेर कर (कहीं) चले जाओगे, मैं ज़रूर तुम्हारी मूर्तियों के साथ एक चाल चलूँगा! " (57)
(और ऐसा ही किया), उसने उन सब (मूर्तियों) को तोड़ कर टुकड़े टुकड़े कर दिया, लेकिन सबसे बड़ी मूर्ति को छोड़ दिया ताकि लोग उसके सामने झुक सकें (और हाल पूछ सकें)। (58)
वे (वापस आकर) कहने लगे, "किसने हमारे देवताओं के साथ यह हरकत की है? निश्चय ही वह बड़ा ही ज़ालिम आदमी होगा!" (59)
(कुछ लोग) बोले, "हमने एक नौजवान को, जिसे इबराहीम कह कर पुकारते हैं, उसके बारे में कुछ कहते सुना था।" (60)
उन्होंने कहा, "तो उसे बुला लाओ लोगों की आँखों के सामने, ताकि वे भी (पूछ-ताछ के) गवाह रहें।" (61)
उन्होंने इबराहीम से कहा, "हमारे देवताओं के साथ यह हरकत किसने की है, ऐ इबराहीम क्या तुम ने?" (62)
इबराहीम ने कहा, "नहीं, बल्कि यह काम उनके इस सबसे बड़े (देव) ने किया होगा, उन्हीं से पूछ लो, अगर वे बोल सकते हों।" (63)
वे एक दूसरे की तरफ़ (कुछ सोचते हुए) मुड़े और आपस में कहने लगे, "असल में तो हम ही लोग शैतानियाँ करते हैं।" (64)
उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था, फिर उन्होंने बात बनायी और कहने लगे, "तुम्हें तो अच्छी तरह मालूम है कि ये (मूर्तियाँ) बोल नहीं सकतीं।" (65)
इबराहीम ने कहा, "फिर अल्लाह को छोड़ कर तुम ऐसी चीज़ों को क्यों पूजते हो, जो न तुम्हें कुछ फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न कोई नुक़सान? (66)
धिक्कार है तुमपर, और उनपर भी, जिनको तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो! क्या तुम दिमाग़ से काम नहीं लेते?" (67)
इस पर उन्होंने (आपस में) कहा, “अगर तुम सचमुच कुछ अच्छा करना चाहते हो, तो आओ इस आदमी को आग में जला दो, और अपने (टूटे हुए) देवताओं की मदद करो।" (68)
मगर हमने कहा, "ऐ आग! तू ठंड़ी हो जा और सलामती बन जा इबराहीम पर!" (69)
उन्होंने उसे नुक़सान पहुँचाने की योजना बनायी थी, मगर हमने उन्हीं को ज़बरदस्त नुक़सान में डाल दिया। (70)
हम ने उन्हें और (उनके भतीजे) लूत[Lot] को बचा लिया और उन्हें उस
ज़मीन [कुनआन] पर भेज दिया, जिसमें हमने दुनियावालों के लिए बरकतें [blessings] रखी थीं, (71)
और फिर हमने उसे (एक बेटा) इसहाक़ [Isaac] और (पोता) याक़ूब [Jacob], उसे अतिरिक्त तोहफ़े के रूप में दिया, और उनमें से हर एक को हमने नेक बनाया था। (72)
और हमने उन सबको (लोगों का) नायक बनाया जो कि वे हमारे आदेश से लोगों को मार्ग दिखाते थे, और हमने उन्हें 'वही' [revelation] द्वारा भलाई के काम करने, नमाज़ को पाबन्दी से अदा करने और (ग़रीबों को) ज़कात [alms] देने के लिए प्रेरित किया था : वे हमारे सच्चे व पक्के बंदे थे जो इबादत में लगे रहते थे। (73)
और लूत [Lot] को भी हमने सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ और ज्ञान दिया था, और हम ने उन्हें उस बस्ती (के लोगों) से बचा लिया जो (समलैंगिकता जैसे) कुकर्मों में लगे हुए थे----- सचमुच वे बड़े शैतान व बेशर्म लोग थे जिन्होंने अल्लाह के (ठहराए हुए) नियमों को तोड़ा था! (74)
हम ने लूत को अपनी रहमत [mercy] में शामिल कर लिया; निस्संदेह वह अच्छे व नेक लोगों में से थे। (75)
इससे काफ़ी समय पहले, नूह [Noah] ने (तंग आकर) हमें पुकारा था, तब हमने उसकी (फ़रियाद) सुनी : और फिर उसे और उसके परिवार के लोगों को एक बड़ी मुसीबत से बचा लिया (76)
और उसकी मदद उन लोगों के ख़िलाफ़ की, जिन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया था---- सचमुच वे बड़े ही शैतान लोग थे, अतः हमने उन सबको डुबा दिया। (77)
औऱ दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को भी याद करें जब उन्होंने एक ऐसे खेत के झगड़े का फ़ैसला किया था जिस खेत में रात को लोगों की कुछ भेड़- बकरियाँ घुस कर उसे चर गई थीं। हम इस मामले पर होनेवाले फ़ैसले को देख रहे थे, (78)
और तब हमने सुलैमान को इस मामले में फ़ैसला करने की बेहतर समझ दे दी, हालाँकि हम ने दोनों को ही सही फ़ैसला करने की गहरी समझ और ज्ञान दिया था। हमने पहाड़ों और पक्षियों को भी दाऊद के वश में लगा दिया था और वे सब (दाऊद के साथ) मिल कर हमारी बड़ाई के गीत गाते थे---- हम ने ही ये तमाम चीज़ें की थीं--- (79)
हमने ही तुम (लोगों) के फ़ायदे के लिए उन्हें [दाऊद को] धातुओं के कवच बनाने की कला सिखायी थी, ताकि युद्ध में वह तुम्हारी रक्षा कर सके, पर क्या तुम इसके लिए मेरा आभार मानते हो? (80)
हमने (समुद्र की) तूफ़ानी हवा को सुलैमान के वश में कर दिया था, जो उसके आदेश से (फ़िलिस्तीन व सीरिया जैसे) भूभाग की ओर चलती थी जिसे हमने बरकत [blessing] दी थी---- और हम तो हर चीज़ की जानकारी रखते हैं---- (81)
और हम ने कुछ जिन्नों [शैतानों] को उसके अधीन कर दिया था, जो उसके लिए (पानी में) ग़ोते लगाते थे और इसके अलावा कुछ दूसरे काम भी करते थे। और हम उन पर अपनी नज़र रखे हुए थे। (82)
याद करो अय्यूब [Job] को, जबकि उसने अपने रब को पुकारा था, "मैं दुख में पड़ गया हूँ, मगर तू दया करनेवालों में सबसे बढ़कर दयावान है।"(83)
अतः हमने उसकी फ़रियाद सुन ली, उसकी तकलीफ़ें दूर कर दीं, और उसके परिवार वालों को फिर से उसके साथ मिला दिया, और उसके साथ उनके जैसे और लोग भी दे दिए। यह हमारी तरफ़ से एक रहमत [mercy] थी, और हमारी बंदगी करनेवालों के लिए याद रखनेवाला एक सबक़। (84)
इसमाईल [Ishmael], इदरीस और ज़ुलकिफ़्ल को भी याद करें : इनमें से सभी धीरज रखनेवालों में से थे। (85)
हमने उन्हें अपनी रहमत में दाख़िल कर लिया था; वे सचमुच सच्चे व अच्छे लोग थे। (86)
और याद करें उस ‘मछलीवाले’ [यूनुस, Jonah] को, जो (अपनी क़ौम से) ग़ुस्सा हो कर चले गए थे, यह सोच कर कि हम इस बारे में उनकी पकड़ नहीं करेंगे। मगर फिर उसने (जब मछली के पेट के अंदर) गहरे अँधेरों में (हमें) पुकारा था, "(अल्लाह!) तेरे सिवा कोई इबादत [पूजने] के लायक़ नहीं, महान है तू! सचमुच मैं ही ग़लती पर था।" (87)
तब हमने उनकी फ़रियाद सुन ली और उन्हें दुख व परेशानी से छुटकारा दे दिया : हम ईमान रखनेवालों को इसी तरह (हर परेशानी से) बचा लेते हैं। (88)
और ज़करिया [Zachariah] को भी याद करें, जब उसने अपने रब को पुकारा था, "ऐ मेरे रब! मुझे अकेला (बिना संतान के) न छोड़ दे, हालाँकि सबसे अच्छा वारिस तो तू ही है।" (89)
अतः हमने उनकी दुआ क़बूल कर ली---- उन्हें यह्या [John] (जैसा बेटा) प्रदान किया, और उनकी पत्नी को (बाँझपन से) स्वस्थ कर दिया--- वे हमेशा ही नेक व अच्छे कर्मों को करने में पूरी लगन से तत्पर रहते थे। वे बड़े (मन के) लगाव के साथ और डरते हुए हमें पुकारा करते थे, और हमारे सामने (पूरी भक्ति से) झुके रहते थे। (90)
और याद करें उस नारी [मरयम/ Mary] को जिसने अपनी इज़्ज़त सँभाल कर रखी थी। हमने उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे और उसके बेटे को सारे संसार के लिए (सच्चाई की) एक निशानी बना दिया। (91)
[ऐ नबियों], ये तुम्हारे जो समुदाय [उम्मत] थे, सब असल में (शिक्षा के हिसाब से) एक ही समुदाय हैं, और मैं ही तुम्हारा रब हूँ, अतः तुम मेरी बन्दगी करो। (92)
लेकिन लोगों ने एक ही दीन [शिक्षा] के टुकड़े टुकड़े कर डाले, मगर उन सब को हमारे पास लौट कर आना होगा। (93)
कोई भी हो, अगर अच्छे कर्म करता है, और (एक अल्लाह में) विश्वास रखता है, तो उसकी कोई भी कोशिश बेकार नहीं जाएगी : हम उसके सारे कर्म लिख लेते हैं। (94)
कोई भी समुदाय [क़ौम] जिन्हें हम ने (उनके गुनाहों के कारण) बर्बाद कर डाला था, वे हमारे पास (हिसाब- किताब के लिए) लौट कर आने से बच नहीं सकते, (95)
और जब याजूज [Gog] और माजूज [Magog] के लोगों को खुला छोड़ दिया जाएगा, और वे हर ऊँची जगह से दौड़ते हुए नीचे को उतर आएंगे, (96)
जब (अल्लाह के) सच्चे वादे के पूरे होने का समय क़रीब आ जाएगा, तब ऐसा होगा कि विश्वास न करनेवालों की आँखें मारे डर के फटी की फटी रह जाएंगी, और वे कहेंगे, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! हम इस चीज़ को जानते ही न थे और पूरी तरह से भुलाए बैठे थे, बल्कि हम ही ग़लती पर थे।" (97)
[ऐ विश्वास न करनेवालो!] "तुम और वे जिनको तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, सब जहन्नम के ईंधन हैं : उसी (जहन्नम) में तुम्हें जाना होगा।" (98)
अगर ये [मूर्तियाँ] सचमुच की भगवान होतीं, तो वहाँ [जहन्नम में] न गयी होतीं------ तुम सब अब हमेशा वहीं रहोगे। (99)
विश्वास न करनेवाले वहाँ दुखों से चिल्ला रहे होंगे, मगर वे [मूर्तियाँ] कुछ भी नहीं सुनेंगी। (100)
मगर जिन लोगों के लिए हम पहले ही जन्नत का फ़ैसला कर चुके हैं, उन्हें जहन्नम से बहुत दूर रखा जाएगा---- (101)
वे उस (जहन्नम) की आहट तक वहाँ नहीं सुनेंगे---- और वे अपनी मनचाही चीज़ों के साथ वहाँ हमेशा रहने का मज़ा ले रहे होंगे। (102)
उन्हें वह दिल दहला देनेवाली भयानक चीज़ [फ़ैसले का दिन] से कोई डर नहीं होगा : फ़रिश्ते उनका स्वागत करते हुए कहेंगे, "यही तो है वह दिन, जिसका (क़ुरआन में) तुमसे वादा किया गया था!" (103)
उस दिन हम आसमानों को इस तरह लपेट [roll up] देंगे जैसे कोई लिखनेवाला (अपने) दस्तावेज़ लिख कर लपेट देता है। फिर, हम दोबारा सृष्टि की रचना करेंगे, ठीक वैसे ही जैसा पहली बार की थी : यह एक अटूट वादा है, हम यह सारी चीज़ें कर के रहेंगे। (104)
हम ने ज़बूर [Psalms] में, और ऐसा ही (पहले की आसमानी) किताबों में भी लिखा था : "मेरे नेक व अच्छे बन्दे ही (परलोक में) ज़मीन के वारिस होंगे।" (105)
इस [क़ुरआन] में अल्लाह के बंदों के लिए सचमुच एक संदेश है! (106)
[ऐ रसूल!] हमने आपको इसीलिए भेजा है ताकि सारे संसार में रहमत [mercy] उजागर हो जाए। (या हम ने आपको सारे संसार के लिए केवल रहमत बना कर भेजा है)। (107)
कह दें, "मेरे पास जो बात उतारी गयी [revealed] है, वह यही है कि तुम्हारा (पूजने योग्य) ख़ुदा बस एक अकेला अल्लाह है। तो क्या तुम बात मानते हुए उसके सामने सिर झुकाओगे?" (108)
फिर भी अगर वे (न मानें और) मुँह मोड़ लें, तो कह दें, "मैंने (अल्लाह का) संदेश खुल कर और एक समान तरीक़े से तुम सब तक पहुँचा दिया है। मैं यह नहीं जानता कि जिस फ़ैसले का तुमसे वादा किया जा रहा है वह निकट आ गया है या अभी दूर है, "(109)
मगर, अल्लाह तो उन बातों को भी जानता है जो सबके सामने कही जाती हैं, और उन्हें भी जो (दिलों में) छिपायी जाती हैं। (110)
मुझे नहीं मालूम : हो सकता है कि यह (समय) तुम्हारे लिए एक परीक्षा का हो, या यह कि थोड़े समय के लिए ज़िंदगी के मज़े उठा लो।” (111)
अंत में (रसूल) ने कहा, "ऐ मेरे रब, अब सच्चाई के साथ पक्का फ़ैसला कर दे!” और हमारा रब तो बहुत रहम [mercy] करनेवाला है। जो कुछ तुम (विश्वास न करनेवाले) कहते हो, उसके ख़िलाफ़ हम उसी (रब) से मदद माँगते हैं।" (112)
सूरह 23 : अल मो’मिनून [ईमानवाले, The Believers]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
बेशक कामयाब हैं वह, जो ईमान रखते हैं! (1)
जो पूरे दिल से अपनी नमाज़ों में (अल्लाह के सामने) झुकते हैं, (2)
जो बेकार व फ़ालतू बातों से दूर रहते हैं, (3)
जो (ज़रूरतमंदों को) ज़कात [Alms] देते रहते हैं, (4)
और जो अपने आपको (दूसरों के साथ शारीरिक संबंध बनाने से) रोके रखते हैं (5)
सिवाए अपने पति/पत्नियों [spouses] और अपने दास/दासियों [slaves] के ----- कि जिनके साथ (शारीरिक संबंध बनाने में) कोई बुराई नहीं है, (6)
मगर जो कोई इस (बतायी हुई सीमा) के अलावा (किसी और से भी संबंध बनाने) की चाहत रखता हो, तो ऐसे ही लोग सीमा को तोड़नेवाले हैं---- (7)
और जो अपने ऊपर किए गए भरोसे को और अपनी प्रतिज्ञा को ईमानदारी से निभाते हैं (8)
और अपनी नमाज़ों को पाबंदी से व सही ढंग से अदा करते हैं, (9)
तो ऐसे ही लोग हैं जिन्हें विरासत में दिया जाएगा---- (10)
जन्नत का सबसे अच्छा बाग़ [फ़िरदौस], जो उनका अपना हो जाएगा, वे उसमें हमेशा के लिए रहेंगे। (11)
हमने इंसान को (पहली बार) मिट्टी के सत [essence] से पैदा किया, (12)
फिर हमने उसे एक टपकी हुई बूँद [वीर्य] के रूप में एक सुरक्षित ठहर जानेवाली जगह में रखा, (13)
फिर हमने उस बूँद को (जोंक की तरह) चिमटे हुए जीव जैसा रूप दे दिया; फिर हमने उस (जोंक जैसे) जीव को मांस का एक लोथड़ा बनाया, फिर हमने उस लोथड़े को हड्डियों के ढाँचे में बदल दिया, फिर उन हड्डियों पर मांस की तह चढ़ा दी; फिर उसके बाद हमने उसे एक अलग ही रूप देकर (आदमी की शक्ल में) खड़ा कर दिया--- तो कितना महान है अल्लाह, रचना करनेवालों में सबसे बेहतर!--- (14)
फिर (इस पैदाइश के बाद) तुम्हारी मौत हो जाएगी, (15)
और फिर क़यामत के दिन, तुम दोबारा ज़िंदा करके उठाए जाओगे। (16)
हमने तुम्हारे ऊपर (आसमान में) सात तहों में (चक्कर लगाने के) रास्ते [Orbits] बना दिए : और हम कभी भी अपनी की हुई रचना से बेख़बर नहीं हैं। (17)
और हमने आसमान से सही मात्रा में पानी बरसाया, फिर हमने उसे धरती में (ज़रूरत के अनुसार) ठहरा दिया---- और अगर हम चाहें, तो जितनी मात्रा (में पानी) हम ने दे रखा है, उसे वहाँ से उड़ा ले जाने की ताक़त भी हमारे पास है---- (18)
फिर हमने इसी पानी की मदद से तुम्हारे लिए खजूरों और अंगूरों के बाग़ पैदा किए--- इन बाग़ों में तुम्हारे खाने के लिए बहुत-से फल पैदा होते हैं, (19)
और सीना के पहाड़ [Mount Sinai] पर उगनेवाला वह (ज़ैतून का) पेड़, जिससे तेल निकलता है, और जो खाने में मसाले के रूप में काम आता है। (20)
निश्चय ही (पालतू) जानवरों में भी तुम्हारे लिए एक सीख है : जो कुछ (गंदी चीज़ें) उनके पेट में भरी होती हैं, उसी में से तुम्हारे पीने के लिए (दूध जैसी अच्छी चीज़) हम पैदा कर देते हैं। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से दूसरे फ़ायदे भी हैं : तुम उन्हें खाते भी हो, (21)
और (धरती पर) उनकी सवारी भी करते हो, जैसे (पानी में) नौकाओं पर सवार होते हो। (22)
हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास (मार्गदर्शन के लिए) भेजा था, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो, तुम्हारे लिए पूजने के लायक़ तो बस एक ही ख़ुदा है, तो क्या तुम (बुरे कामों के नतीजे से) डरते नहीं?" (23)
मगर उनकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने (नूह की बातों को मानने से) इंकार किया था, (एक दूसरे से) कहने लगे, "यह तो तुम्हारे ही जैसा एक (मामूली) आदमी है, जो तुम पर अपनी बड़ाई की धाक जमाना चाहता है। अगर अल्लाह चाहता, तो उसने (मामूली आदमी के बदले) फ़रिश्तों को भेजा होता; और तो और, ऐसी कोई बात हमने अपने बाप-दादा से कभी सुनी ही नहीं। (24)
यह तो बस एक ऐसा आदमी है जिस पर पागलपन सवार है, अतः (इसकी बात मत सुनो और) कुछ समय तक प्रतीक्षा कर के देख लो कि इसके साथ क्या होता है।" (25)
नूह ने दुआ में कहा, "ऐ मेरे रब, मेरी मदद कर! ये लोग मुझे झूठा कहते हैं,” (26)
और तब हमने नूह के पास 'वही' [revelation] भेजी : "हमारी देखरेख में और हमारी 'वही' के मुताबिक़ एक नौका बनाओ। फिर जब हमारा आदेश मिल जाए, और ज़मीन का पानी उबल कर बाहर आने लगे, तो (हर तरह के जीव-जंतुओं की) प्रत्येक प्रजाति में से दो-दो, जोड़े में, उस (नौका) में साथ रख लो और अपने परिवार के लोगों को भी (इसमें सवार कर लो), मगर घर के ऐसे आदमी को नहीं जिनके विरुद्ध पहले ही फ़ैसला हो चुका है--- शैतानियाँ करनेवालों के पक्ष में मुझसे सिफारिश मत करना : वे तो डूबकर रहेंगे---- (27)
फिर जब तुम और तुम्हारे साथी नौका पर अच्छी तरह सवार हो जाओ, तो अपनी ज़बान से कहो, “शुक्र है अल्लाह का, जिसने हमें शैतान लोगों से छुटकारा दिया”, (28)
और यह भी कहो, ऐ मेरे रब! मुझे अपनी बरकत (Blessing) के साथ किनारे उतार दे : और तू ही नौका को सबसे बेहतर किनारे लगानेवाला है।" (29)
बेशक इन सब (घटनाओं) में (समझनेवालों के लिए) कितनी ही निशानियाँ हैं : और यहाँ ज़रूर ऐसा होता है कि हम लोगों को परीक्षा में डालें। (30)
फिर उन लोगों के बाद, हमने क़ौमों की एक दूसरी पीढ़ी को उठाया, (31)
और उनके अपने लोगों में से एक को रसूल के रूप में उनके पास भेजा (उसने भी यही कहा) : "अल्लाह की बन्दगी करो, कि तुम्हारे लिए पूजने के लायक़ तो बस एक ही ख़ुदा है, तो क्या तुम (इंकार के बुरे नतीजे से) डरते नहीं?" 32)
मगर उनकी क़ौम के वे सरदार, जिन्होंने (रसूल की बातों में) विश्वास नहीं किया था, और आख़िरत [परलोक/ Hereafter] में (अल्लाह के सामने) होनेवाली मुलाक़ात को मानने से भी इंकार किया था, और जिन्हें हमने सांसारिक जीवन में आराम व ढेर सारे सुख दे रखे थे, (लोगों से) कहने लगे, "यह तो बस तुम्हारे ही जैसा एक आदमी है--- जो कुछ तुम खाते हो, वही यह भी खाता है और जो कुछ तुम पीते हो, वही यह भी पीता है--- (33)
तो अगर तुम अपने ही जैसे एक (मर-खप जानेवाले) आदमी की आज्ञा मानने लगे, तो सचमुच ही तुम भारी घाटे में पड़ोगे। (34)
आख़िर यह आदमी तुमसे ऐसा वादा कैसे कर सकता है कि जब तुम मरकर मिट्टी और (सड़ी-गली) हड़्डियों का चूरा होकर रह जाओगे, तो तुम फिर से ज़िंदा निकाले जाओगे? (35)
जिस बात का तुमसे वादा किया जा रहा है, वह समझ से परे है, बहुत दूर की बात है! (36)
(भला दोबारा ज़िंदा होना कैसी बात है!) हमारा जीवन तो केवल इसी संसार का जीवन है : (पीढ़ी दर पीढ़ी) यहीं हम मरते हैं, यहीं जीते हैं, मगर हमें कभी भी दोबारा ज़िंदा कर के उठाया नहीं जाएगा। (37)
वह तो बस एक आदमी है जिसने अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ ली हैं। हम उसकी बातों में कभी भी विश्वास करनेवाले नहीं हैं।"(38)
इस पर उस रसूल ने दुआ में कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर, वे लोग तो मुझे झुठा कहते हैं," (39)
और तब अल्लाह ने कहा, "बहुत जल्द ही वे अपने किए पर पछताएंगे।" (40)
और फिर ऐसा हुआ कि उन्हें एक भयानक धमाके ने आ घेरा, और हमने उन्हें तिंकों व गंदी झाग की तरह बहा कर रख दिया। अतः फिटकार है, ऐसे शैतान व ज़ालिम लोगों पर! (41)
फिर हमने उनके बाद क़ौमों की दूसरी पीढ़ियों को पैदा किया---- (42)
(अल्लाह के क़ानून के मुताबिक़ हर क़ौम की अवधि तय है) कोई क़ौम [community] न तो अपने निर्धारित समय से पहले आ सकती है, और न समय पूरा हो जाने के बाद ठहर सकती है----- (43)
फिर हमने एक के बाद एक अपने रसूल [messengers] भेजे : जब भी किसी क़ौम के पास (मेरा संदेश लेकर) कोई रसूल आया, तो हमेशा ऐसा हुआ कि लोगों ने (उसकी बात नहीं मानते हुए) उसे झुठा कहा, नतीजे में हम उन क़ौमों को एक के बाद एक बर्बाद करते चले गए, और उनकी हस्तियाँ (सबक़ सीखनेवाली) कहानियाँ बन कर रह गयीं। फिटकार हो उन लोगों पर जो सच्चाई पर विश्वास नहीं करते! (44)
फिर हमने मूसा [Moses] और उसके भाई हारून [Aaron] को अपनी निशानियों और स्पष्ट प्रमाण के साथ, (45)
फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके सरदारों के पास भेजा, मगर वे बड़े अहंकार से पेश आए : वे थे भी घमंडी लोग। (46)
सो वे कहने लगे, "क्या हम अपने ही जैसे दो (मामूली) आदमियों में विश्वास कर लें? और जबकि उनकी क़ौम के लोग तो हमारे सेवक हैं?" (47)
और इस तरह, उन लोगों ने दोनों को झूठा बताया : और बर्बाद हो जानेवालों में शामिल हो गए। (48)
(इस घटना के बाद) हमने मूसा को किताब [तोरैत] प्रदान की, ताकि वे [इसराईल की संतानें] सही मार्ग पर चल सकें। (49)
(और इसी तरह) हम ने मरयम के बेटे [ईसा] और उसकी माँ को (अपनी सच्चाई की) एक निशानी बनाया; और हमने उन्हें एक ज़रा ऊँची शांत जगह पर, बहते हुए पानी के बीच, शरण दी (जहाँ उनके बेटे का जन्म हुआ)। (50)
"ऐ पैग़म्बरो! अच्छी चीज़ें खाओ और अच्छे कर्म करो : जो कुछ तुम करते हो उसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ। (51)
और यह जो तुम्हारी क़ौम है, वह असल में एक (समान विचारधारा वाली) ही क़ौम है, और मैं तुम्हारा रब हूँ। अतः मुझे अपने मन में बसाओ (व बुरे कर्मों के नतीजे से डरो)"---- (52)
(सभी पैग़म्बरों की शिक्षाएं समान थीं) मगर लोगों ने अपनी क़ौम को अलग-अलग (सोच वाले) फ़िरक़ों [sects] में तोड़ डाला है, और हर एक फ़िरक़ा अपनी सोच के साथ ख़ुश व मगन है। (53)
तो [ऐ मुहम्मद], आप कुछ समय के लिए उन्हें जिहालत [ignorance] में डूबा रहने के लिए छोड़ दें। (54)
क्या वे समझते हैं कि हमने जो दौलत और सन्तान उन्हें दे रखी है, (55)
तो क्या हम उन्हें अच्छी चीज़ों को देने में जल्दी मचा रहे हैं? (56)
असल में, उन्हें (सच्चाई का) कोई अंदाज़ा है ही नहीं! जो लोग अपने रब के डर से सहमे रहते हैं, (57)
जो लोग अपने रब की आयतों [संदेशों] में विश्वास रखते हैं, (58)
जो लोग अपने रब के साथ किसी और को (ख़ुदायी में) उसका साझेदार [Partner] नहीं ठहराते, (59)
जो (उसकी राह में) जितना कुछ देते हैं हमेशा दिल से देते हैं, और (फिर भी) उनके दिल यह सोच कर काँप जाते हैं कि उन्हें अपने रब के सामने (हिसाब-किताब के लिए) लौट कर जाना है; (60)
तो बेशक यही वे लोग हैं, जो भलाई के कामों में तेज़ी दिखाते हैं, और यही हैं जो इस राह में सबसे आगे निकल जानेवाले हैं! (61)
और हम किसी जान पर (ज़िम्मेदारी का) उतना ही बोझ लादते हैं, जितना कि वह उसे उठा सके----- हमारे पास (इन सब की हालत व क्षमता के लिए) एक किताब है, जो (सब कुछ) ठीक ठीक बता देती है---- और ऐसा कभी नहीं हो सकता कि किसी जान के साथ अन्याय हो। (62)
मगर (असल में) उन (विश्वास न करनेवालों) के दिल इन बातों को नहीं जानते, और अज्ञानता में डूबे हुए हैं; और इसके अलावा और भी कई (बुरे) कर्म हैं जो वे हमेशा करते रहते हैं। (63)
(वे करते रहेंगे) यहाँ तक कि जब हमारी यातना आ पहुँचेगी और उनके बिगड़े हुए धनी लोगों को अपने घेरे में ले लेगी, तब वे मदद के लिए रोने-चिल्लाने लगेंगे : (64)
(कहा जाएगा), "बंद करो आज रोना-चिल्लाना, तुम्हें हमारी ओर से कोई मदद मिलनेवाली नहीं है। (65)
एक समय था कि तुम्हें बार बार मेरी आयतें सुनाई जाती थीं, मगर तुम घमंड में उल्टे पाँव वहाँ से चल देते थे, (66)
और लोगों के बीच अपनी शामें उस [क़ुरआन] का मज़ाक़ उड़ाने में लगा देते थे।” (67)
क्या उन्होंने इस [अल्लाह की वाणी] पर विचार नहीं किया? क्या उनके पास ऐसी कोई अजीब चीज़ आ गई है जो उनके बाप-दादा के पास नहीं आई थी? (68)
या क्या वे अपने रसूल को पहचान न सके, इसलिए वे इसे मानने से इंकार करते हैं? (69)
या वे कहते हैं कि इस रसूल पर जुनून सवार हो गया है? नहीं, (इनमें से कोई बात नहीं हो सकती), बल्कि वह उनके पास सच्चाई लेकर आए हैं, मगर उनमें से ज़्यादातर लोग सच से नफ़रत करते हैं, (70)
लेकिन सच्चाई अगर कहीं उनकी इच्छाओं के मुताबिक़ हो जाती, तो आसमान, ज़मीन और वह सब जो इनमें है, सब बर्बाद हो जाते। हम उनके पास उनकी सीख के लिए (नसीहत का) संदेश ले कर आए हैं, और वे हैं कि इस संदेश से मुँह मोड़ लेते हैं। (71)
क्या [ऐ रसूल] (वे समझते हैं कि) आप इनसे अपने लिए कोई धन-दौलत माँगते हैं? हालाँकि आपके लिए तो आपके रब का दिया ही सबसे अच्छा है : और वही सबसे अच्छी रोज़ी देनेवाला है। (72)
सच यह है कि आप बेशक उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुला रहे हैं, (73)
मगर जो लोग आख़िरत [Hereafter] में विश्वास नहीं रखते, वे इस मार्ग से भटके हुए हैं। (74)
यहाँ तक कि अगर हम उनपर (कुछ और) दया करें और उनसे उनकी तकलीफ़ें भी दूर कर दें (तो क्या वे शुक्र अदा करेंगे?, नहीं), तब भी वे भटकते हुए मर्यादाओं को तोड़ने में और अधिक लगे रहेंगे। (75)
हम उन्हें पहले भी (कुछ) सज़ा दे चुके हैं, तब भी वे अपने रब के आगे झुके नहीं : वे विनम्र भाव से उस समय तक नहीं झुकेंगे, (76)
जब तक कि हम उनपर कठोर यातना का द्वार न खोल दें---- और तब वे अचानक पूरी तरह से निराशा में डूब कर रह जाएंगे। (77)
वह अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे (सुनने के) लिए कान, (देखने के लिए) आँखे और (सोचने के लिए) दिल बनाए-----(मगर) बहुत कम ऐसा होता है कि तुम शुक्र अदा करो! (78)
वही है जिसने तुम्हें धरती में (चारों ओर) फैला दिया, और वही है जिसके सामने तुम इकट्ठा कर के लाए जाओगे : (79)
वही है जो ज़िंदगी और मौत देता है; रात और दिन का बारी बारी से आना जाना भी उसी के हाथ में है; तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लोगे? (80)
लेकिन, अपने से पहले गुज़र चुके लोगों की तरह, (81)
वे कहते हैं , "क्या? जब हम मर जाएंगे, और मिट्टी और हड्डियों के चूरे में बदल जाएँगे, तो क्या सचमुच हमें दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा? (82)
हम ने ऐसे वादे पहले भी सुन रखे हैं, और ऐसी बातें हमारे बाप-दादा भी सुनते आए थे। यह तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं।" (83)
[ऐ रसूल] आप कहें, "यह सारी ज़मीन और इसमें बसनेवालों का मालिक कौन है, बताओ अगर तुम (बहुत) जानते हो?" (84)
और वे बोल पड़ेंगे, "अल्लाह!" कहें, "फिर तुम होश में क्यों नहीं आते?" (85)
कहें, "सात आसमानों का मालिक कौन है? आलीशान सिंहासन का मालिक कौन है?" (86)
और वे जवाब देंगे, "अल्लाह।" कहें, "फिर अल्लाह का डर क्यों नहीं रखते?" (87)
कहें, "कौन है जिसके हाथ में हर चीज़ का नियंत्रण[control] है? कौन है जो सब की रक्षा करता है, जबकि उसके विरुद्ध कोई शरण नहीं मिल सकती, बताओ अगर तुम (बहुत) जानते हो?" (88)
वे जवाब देंगे, "अल्लाह।" कहें, "फिर तुम कैसे इतने धोखे में पड़े हुए हो?" (89)
हक़ीक़त यह है कि हम ने सच्चाई उन्हें साफ़ साफ़ बता दी है, और निश्चय ही वे बिल्कुल झूठे हैं। (90)
अल्लाह ने न तो कभी किसी को अपना बेटा बनाया, और न उसके अलावा पूजने लायक़ कोई दूसरा ख़ुदा हो सकता है---- अगर कोई और (भी ख़ुदा) होता, तो हर ख़ुदा अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और एक-दूसरे पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश करता। अल्लाह उन बातों से कहीं ऊँचा है, जिसके बारे में वे बयान करते हैं! (91)
वह उसे भी जानता है जो (चीज़) दिखायी नहीं पड़ती और उसे भी जो दिखायी देती हैं; वे अल्लाह के साथ जिन्हें (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] ठहराते हैं, अल्लाह उन चीज़ों से कहीं ऊपर है! (92)
[ऐ रसूल] दुआ में कहें, "ऐ मेरे रब! जिस यातना की धमकी उन्हें दी गयी है, अगर वह यातना मेरे सामने ही घटित होनेवाली है, (93)
तो मेरे रब! मुझे उन शैतानी करनेवाले लोगों के गिरोह में शामिल न कीजिओ!" (94)
यक़ीनन हम इस पर पूरी तरह सक्षम हैं कि जिस यातना की धमकी उन्हें दी जा रही है, हम उसे आपको (इसी जीवन में) दिखा सकते हैं। (95)
(मगर जब तक वह नियत समय न आ जाए, ऐ रसूल!) बुराई को (बुराई से नहीं) अच्छाई से दूर करें----- जो कुछ बातें वे बनाते हैं, हम उसे अच्छी तरह जानते हैं--- (96)
और (दुआ में) कहें, "ऐ मेरे रब! मैं शैतानों की उकसाहटों से तेरी शरण चाहता हूँ; (97)
और ऐ रब! मैं तेरी शरण चाहता हूँ ताकि वे मेरे नज़दीक न आ सकें।"(98)
(इंकार करनेवालों का हाल यह होगा कि) जब उनमें से किसी एक की मौत सिर पर आ खड़ी होगी, तब वह पुकारेगा, "ऐ मेरे रब! मुझे (संसार में) वापस जाने दे, (99)
ताकि वहाँ जा कर अच्छे कर्म कर सकूँ जिन्हें मैंने छोड़ रखा था।" हुक्म होगा : हरगिज़ नहीं! यह तो बस एक कहने की बात है जो यह कह रहा है, अब ऐसा होनेवाला नहीं : ऐसे लोगों के पीछे एक रोक [barrier] लगी हुई है, जो उस दिन तक रहेगी जब वे दोबारा उठाए जाएँगे। (100)
फिर जब वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, जब नरसिंघे [Trumpet] में फूँक मारी जाएगी, तो उनके बीच के सब रिश्ते-नाते ख़त्म हो जाएंगे और वे एक-दूसरे को नहीं पूछेंगे : (101)
फिर जिनके पलड़े अच्छे कर्मों से भारी हुए, तॊ वही हैं जो कामयाब हो जाएंगे, (102)
मगर वे लोग जिनके पलड़े हल्के हुए, तो वही हैं जिन्होंने अपने आपको बर्बादी में डाल दिया और वे हमेशा के लिए जहन्नम में रहेंगे---- (103)
आग उनके चेहरों को झुलसा देगी और उनके होंठ दर्द से ऐंठ जाएंगे। (104)
(उनसे कहा जाएगा) "क्या तुम्हें मेरी आयतें बार बार सुनाई नहीं जाती थीं, तब भी तुम उन्हें मानने से इंकार करते रहते थे?" (105)
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमारा मनमौजी व अड़ियल रवैय्या हम पर हावी हो गया था, और हम रास्ते से भटक जानेवालों में हो गए। (106)
हमारे रब! हमें यहाँ से बाहर निकाल दे! अगर हम दोबारा वैसा ही कर्म करें, तब हम ज़रूर ही शैतानियाँ करनेवाले होंगे।" (107)
अल्लाह कहेगा, "फिटकार हो! इसी (जहन्नम में) में पड़े रहो! और मुझसे बात न करो। (108)
हमारे बन्दों में कुछ लोग ऐसे भी थे जो कहते थे, ऐ हमारे रब! हम विश्वास करते हैं। हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर : तू सबसे बढ़ कर दया करनेवाला है। (109)
मगर तुम उन लोगों की हँसी उड़ाने में लगे रहे : तुम हँसी उड़ाने में इतने मगन थे कि मेरी चेतावनियों को भी भुला बैठे। (110)
आज (देखो) मैंने उनको धैर्य व सब्र रखने के बदले में इनाम दिया है : यही वे लोग हैं जो कामयाब हो गए।" (111)
उनसे कहा जाएगाः “तुम धरती पर कितने वर्ष रहे?" (112)
वॆ जवाब में कहेंगे, "हम बस एक दिन या एक दिन का कुछ भाग रहे होंगे (हमें समय का ठीक अंदाज़ा नहीं), मगर उन लोगों से पूछें जो हिसाब रखते हैं।“ (113)
अल्लाह कहेगा, "तुम ज़मीन पर बहुत ही थोड़ा ठहरे, क्या अच्छा होता कि तुम जानते होते! (114)
क्या तुमने यह समझा था कि हमने तुम्हें यूँ ही बेकार (बेमक़सद) पैदा किया था, और यह कि तुम्हें हमारी ओर (हिसाब-किताब के लिए) लौटना नहीं है?" (115)
बहुत ऊँची शान है अल्लाह की, जो सही मायने में बादशाह है, उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं, वह महान सिंहासन का मालिक है! (116)
जो कोई अल्लाह के साथ किसी दूसरे भगवान को भी पूजता है---- ऐसे भगवान को जिसके मौजूद होने का उसके पास कोई सबूत नहीं है--- तो बस रब के सामने उसका हिसाब होना है। निश्चय ही (सच्चाई से) इंकार करनेवाले कभी सफल नहीं होंगे। (117)
[ऐ रसूल] आप कहें , "मेरे रब! मुझे माफ़ कर दे और मुझ पर दया कर : तुझ से ज़्यादा दया करनेवाला कोई नहीं।" (118)
सूरह 32 : अस-सज्दा [नमाज़ में सर झुकाना, Bowing Down in Worship]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)
यह किताब [क़ुरआन], जो हर तरह के संदेह से परे है, सारे संसार के रब की ओर से उतारी जा रही है। (2)
इसके बावजूद, वे यही कहते हैं, "मुहम्मद ने इसे स्वयं ही गढ़ लिया है!" बिल्कुल नहीं!, यह तो वह सच्चाई (की बातें) हैं जो [ऐ रसूल], आपके रब की तरफ़ से आपके लिए हैं, जिससे आप उन (मक्का के) लोगों को सावधान कर दें जिनके पास इससे पहले सावधान करनेवाला कोई नहीं आया था, ताकि उन्हें सही मार्ग दिखाया जा सके। (3)
यह तो अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को और वह सारी चीज़ें जो दोनों के बीच में हैं, छह दिनों में पैदा किया। फिर उसने अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया। तुम (लोगों) के पास उस (अल्लाह) के सिवा कोई नहीं जो तुम्हारी रक्षा कर सके, और न कोई है जो तुम्हारे लिए सिफ़ारिश कर सके। तो फिर क्यों तुम (नसीहत पर) ध्यान नहीं देते? (4)
वह आसमान से ले कर ज़मीन तक, हर एक चीज़ को सही ढंग से चलाता है, और अंत में, एक दिन हर एक चीज़ चढ़कर उसके पास पहुँच जाएगी, और वह दिन तुम्हारे हिसाब से एक हज़ार साल के बराबर का होगा। (5)
वह ऐसा है जो सब जानता है --- वह चीज़ भी जो दिखायी नहीं देती हो और वह भी जो दिखायी देती हो, वह बहुत प्रभुत्वशाली व हर एक पर दयावान है, (6)
जिसने हर एक चीज़ को बिल्कुल सही [Perfect] रूप दिया है। उसने आदमी को पहले मिट्टी से बनाया, (7)
फिर उसकी नस्लों को मामूली से तरल पदार्थ [वीर्य/ Semen] के सत [extract] से बनाया। (8)
फिर उसके (शरीर के आकार को) ठीक-ठाक किया; और फिर उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूँकी; उसने तुम्हें सुनने की, देखने की, और सोचने की क्षमता दी। मगर, तुम बदले में बहुत कम ही (मेरा) शुक्र अदा करते हो! (9)
वे कहते हैं, "क्या? जब हम (मर के) मिट्टी में मिल चुके होंगे, तो फिर क्या सचमुच हम नए सिरे से पैदा किए जाएंगे?” असल में, वे अपने रब से होनेवाली मुलाक़ात को मानने से इंकार करते हैं। (10)
कह दें, "मौत का फ़रिश्ता जो तुम पर नियुक्त है, वह तुम्हें फिर से अपने क़ब्ज़े में ले लेगा, और फिर तुमको अपने रब के पास लाया जाएगा।" (11)
[ऐ रसूल] काश, आप शैतानी करनेवालों को देख पाते जो अपने रब के सामने सिर झुकाए हुए (खड़े) होंगे (और कहेंगे) : "हमारे रब! अब हमने देख भी लिया और सुन भी लिया, हमें वापस (दुनिया में) भेज दे ताकि हम अच्छे कर्म कर सकें। अब हमें पूरा विश्वास हो गया है।" (12)
अगर हम ने ऐसा चाहा होता, तो हम ने ज़रूर हर आदमी को (पहले से ही) सच्चे व सही रास्ते पर चलाया होता, मगर मेरी कही हुई बात ही सच हुई है, (जब मैंने कहा था) कि "मैं जहन्नम को अवश्य ही जिन्नों और इंसानों—सब से भर दूँगा।" (13)
“जिस तरह तुम उस (क़यामत के) दिन हम से होनेवाली मुलाक़ात को भुलाए बैठे थे, अब हम भी तुम्हें (उसी तरह) भुला देंगे : जो कुछ भी तुम किया करते थे, उसके बदले में अब चखो मज़ा कभी न ख़त्म होनेवाली यातनाओं का!” (14)
हमारी आयतों [संदेशों] पर तो बस वही लोग सच्चा ईमान रखते हैं, जिन्हें उन (आयतों) के द्वारा जब नसीहत दी जाती है, तो वे हमारे सामने (सज्दे में) अपनी गर्दन झुका देते हैं, अपने रब की बड़ाई का गुणगान करते हैं, और घमंड में अपने आप को बड़ा नहीं समझते। (15)
(रात में सोते हुए) वे अपने बिस्तरों को छोड़कर उठ जाते हैं, डर और उम्मीद (के मिले-जुले भाव) के साथ अपने रब की इबादत करते हैं; और जो भी हमने उन्हें दिया है, उसमें से कुछ दूसरों को भी देते हैं। (16)
किसी (जान) को भी मालूम नहीं कि जो कुछ (अच्छे कर्म) वे करते हैं, उसके बदले इनाम में उन्हें कितनी ख़ुशी मिलेगी जो छुपा कर ख़ास तौर से रखी गयी है। (17)
भला जो आदमी (अल्लाह पर) ईमान रखता हो वह उस आदमी के बराबर कैसे हो सकता है जो अल्लाह को मानता ही न हो? नहीं, वे बराबर नहीं हो सकते। (18)
जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, उनके लिए बाग़ों [जन्नत] में हमेशा रहने का घर होगा, और यह इनाम होगा उन (नेक) कर्मों का जो उन्होंने किया होगा। (19)
रहे वे लोग जो अल्लाह के हुक्म को नहीं मानते, उनका घर (जहन्नम की) आग होगा। जब कभी वे वहाँ से भागने की कोशिश करेंगे, उन्हें पकड़ कर फिर उसी (आग) में डाल दिया जाएगा और उनसे कहा जाएगा, "चखो उस आग की यातना का मज़ा, जिसे तुम हमेशा झूठ समझते थे।" (20)
हम उन्हें (परलोक की) बड़ी यातना से पहले, (इसी दुनिया में) छोटी यातना का मज़ा चखाएँगे, ताकि शायद वे सही मार्ग पर (वापस) आ जाएं। (21)
उस आदमी से बढकर ग़लत काम [ज़ुल्म] करनेवाला कौन होगा जिसके सामने जब उसके रब की आयतों को पढ़कर सुनाया जाता है, तो वह उनसे मुँह मोड़ कर चला जाए? निश्चय ही हम अपराधियों को कड़ी सज़ा देंगे। (22)
हमने मूसा को (आसमानी) किताब [तोरैत/Torah] दी थी --- अतः [ऐ मुहम्मद] आपको इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि आपको भी (आसमानी) किताब दी जा रही है---- और हमने इसराईल की सन्तान के लिए उस (किताब) को सही रास्ता दिखानेवाली बनाया था। (23)
जब वे धीरज रखते हुए (सच्चाई पर) जम गए, और हमारी आयतों पर पक्का विश्वास करने लगे, तब हमने उनमें से नायकों [leaders] को उठाया, जो हमारे आदेश से (लोगों को) मार्ग दिखाते थे। (24)
[ऐ रसूल], आपका रब है जो क़यामत के दिन उनके बीच उन बातों का फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे मतभेद करते रहे हैं। (25)
क्या उनके लिए यह सी़ख लेने की चीज़ नहीं कि (वे देखते कि) उनसे पहले, कितनी ही नस्लों को हम बर्बाद कर चुके हैं, जिनके रहने-बसने की जगहें (अब खंडहर बन चुकी हैं), जिनके बीच से वे चलते-फिरते हैं? सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं---- फिर क्या वे सुनते नहीं? (26)
क्या उन्होंने देखा नहीं कि हम किस तरह बारिश को सूखी बंजर ज़मीन की ओर खींचकर ले जाते हैं। फिर उसके द्वारा खेती उगाते हैं, जिसमें से उनके चौपाए भी खाते है और वे ख़ुद भी खाते हैं? तो क्या उन्हें सूझता नहीं? (27)
वे कहते हैं कि "यह फ़ैसला कब होगा, बताओ अगर तुम सच्चे हो?" (28)
कह दें कि "(सच्चाई से) इंकार करनेवाले अगर फ़ैसले के दिन [क़यामत], विश्वास कर भी लें, तब भी उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होगा; उन्हें कोई ढील नहीं दी जाएगी।" (29)
सो [ऐ रसूल], आप उनसे मुंह मोड़ कर अलग हो जाएं, और इंतज़ार करें : वे भी इंतज़ार कर रहे हैं। (30)
सूरह 52 : अत-तूर [तूर पहाड़ / Mountain Tur/ Sinai]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है तूर पहाड़ [Mountain Sinai] की, (1)
क़सम है उस लिखी हुई किताब की (2)
(जो) खुले हुए झिल्ली के पन्नों [Unrolled parchment] में (लिखी हुई है), (3)
और उस घर [काबा] की क़सम जहाँ (बड़ी संख्या में) हाज़िर होते है; (4)
और ऊँची की हुई छत [आसमान] की; (5)
और भरे हुए समुद्र की क़सम, (6)
[ऐ रसूल!] आपके रब की यातना अवश्य आ कर रहेगी --- (7)
कोई नहीं है जो इसे टाल सके --- (8)
जिस दिन आसमान थरथराहट के साथ बुरी तरह डगमगा उठेगा (9)
और पहाड़ (अपनी जगह छोड़ कर बिखरने लगेंगे और बादलों की तरह) उड़ते फिरेंगे। (10)
तो उस दिन तबाही होगी उनकी जो सच्चाई (को मानने) से इंकार करते हैं, (11)
जो बेकार की बातों में डूबे हुए खेल तमाशे में लगे रहते हैं : (12)
उस दिन वे धक्के दे-देकर जहन्नम की आग में ढकेले जाएँगे। (13)
(कहा जाएगा), "यही है वह आग जिसे तुम झुठलाया करते थे, (14)
"अब (बताओ) यह कोई जादू है? क्या तुम्हें अब भी दिखायी नहीं देता? (15)
"जाओ, आग के अंदर (झुलसो!) --- तुम इसे सहन करने में धीरज से काम लो या न लो, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता --- तुम्हें तो उन्हीं कामों का बदला दिया जाएगा, जो तुम करते रहे थे।" (16)
अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचनेवाले बाग़ों [जन्नत] में और परम आनंद [Bliss] में होंगे, (17)
उनके रब के दिए हुए तोहफ़े का मज़ा ले रहे होंगे : उस [रब] ने उन्हें भड़कती हुई आग की यातना से बचा लिया, (18)
(उनसे कहा जाएगा), "ख़ूब मज़े से खाओ-पियो और मौज करो, ये इनाम है उन अच्छे कर्मों का जो तुम करते रहे थे।" (19)
वे एक क़तार में लगे हुए तख़्तो पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे; हम बड़ी-बड़ी आँखोंवाली ख़ूबसूरत कुँआरी औरतों [हूरों] से उनका विवाह कर देंगे; (20)
हम ईमान रखनेवाले लोगों के साथ उनकी सन्तान को भी (जन्नत में) साथ मिला देंगे, अगर संतान ने भी ईमान में अपने माँ-बाप का रास्ता अपनाया होगा (चाहे उनकी संतान के कर्म अपने माँ-बाप के कर्मों के स्तर के न भी हों) ---- हम उनके कर्मों के इनाम में से कुछ भी कमी नहीं करते : हर आदमी की जान अपने (अच्छे/ बुरे) कर्मों के बदले में गिरवी रखी हुई है ---- (21)
हम उन्हें कोई भी फल (मेवे) या गोश्त, जिसकी भी वे इच्छा करेंगे, देते रहेंगे। (22)
वे वहाँ आपस में (शराब ए तहूर के) प्याले हाथों हाथ ले रहे होंगे, जिसके पीने से न कोई बेहूदा बातें होंगी और न कोई गुनाह। (23)
उनकी सेवा में तन-मन से ऐसे नौजवान लगे हुए होंगे जो देखने में ऐसी मोतियों की तरह लगेंगे जिन्हें छुपा कर रखा गया हो, (24)
वे एक दूसरे से मिलकर हाल पूछेंगे, (25)
कहेंगे, "जब हम पहले अपने घरवालों के साथ (दुनिया में) रहते थे, तो (अल्लाह की यातना से) डरे-सहमे रहा करते थे ---(26)
अल्लाह ने हम पर बड़ा एहसान किया और हमें (जहन्नम की) झुलसा देनेवाली हवा की यातना से बचा लिया --- (27)
(इससे पहले भी) हम उससे दुआएं माँगा करते थे : वह बहुत अच्छा, बेहद दयावान है।" (28)
अतः (ऐ रसूल) आप (लोगों को) नसीहत देते रहें।
अपने रब के फ़ज़ल [Grace] से (ऐ रसूल), न आप काहिन [ढोंगी भविष्यवक्ता / Oracle] हैं और न दीवाने। (29)
अगर वे लोग कहते हैं, "वह [मुहम्मद] तो केवल एक कवि हैं : हम उनके अंत होने का इंतज़ार करेंगे," (30)
आप कह दें, "अगर तुम इंतज़ार करना चाहते हो तो करो; मैं भी इंतज़ार कर रहा हूँ"----- (31)
क्या उनकी बुद्धि [अक़्ल] उन्हें सचमुच यही सब करने को कहती है, या वे हैं ही बाग़ी [insolent] लोग? (32)
अगर वे कहते हैं, "उस [रसूल] ने इस (क़ुरआन) को स्वयं ही गढ लिया है" ---- वे सचमुच (ज़िद के कारण) विश्वास नहीं करते ----- (33)
अगर वे अपने दावे में सच्चे हैं, तो इस (क़ुरआन) जैसी आयत (गढ कर) ले आएँ। (34)
क्या वे लोग बिना किसी ज़रिए [Agent] के अपने आप पैदा हो गए? या उन्होंने ख़ुद ही अपनी सृष्टि कर ली? (35)
या क्या उन्होंने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है? नहीं! असल में वे (सच्चाई पर) ईमान [faith] नहीं रखते। (36)
क्या उनके पास तुम्हारे रब के खज़ाने है या वही (उनके दारोग़ा बनकर) उसे अपने नियंत्रण में लिए हुए हैं? (37)
या उनके पास कोई सीढ़ी है जिस पर चढ़कर वे (ऊपर की दुनिया की गुप्त बातें) सुन लेते हैं? फिर उनमें से जिसने सुन लिया हो तो, वह ले आए स्पष्ट प्रमाण! (38)
क्या अल्लाह के पास (फ़रिश्तों के रूप में) तो बेटियाँ हैं, जबकि तुम्हारे पास बेटे हैं? (39)
या क्या [ऐ रसूल!] आप उनसे कोई मज़दूरी माँगते हैं कि वे क़र्ज़ के बोझ से दबे जा रहे है? (40)
या क्या उनके पास अनदेखी चीज़ों की जानकारी है, जिसे ये लिख लेते हों? (41)
या क्या वे समझते हैं कि वे आपको अपने जाल में फँसा लेंगे? असल में तो (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवाले लोग हैं जो जाल में फँसा दिए गए हैं। (42)
क्या अल्लाह के अतिरिक्त सचमुच उनका कोई और ख़ुदा [प्रभु] है? वे जिसे भी अल्लाह के बराबरी का ठहराते हैं, अल्लाह ऐसी तमाम चीज़ों से कहीं अधिक ऊँचा व महान है। (43)
अगर वे आसमान का कोई टुकड़ा भी अपने ऊपर गिरता हुआ देख लें, तो कहेंगे, "यह तो बस परत दर परत (गहरे) बादल हैं", (44)
अतः (ऐ रसूल) आप उन्हें (उनके हाल पर) छोड़ दें, यहाँ तक कि वे उस दिन का सामना करें जिस दिन उनके होश जाते रहेंगे, (45)
जिस दिन उनकी कोई चाल उनके कुछ भी काम न आएगी, जब उन्हें कोई सहायता नहीं मिलेगी। (46)
जो लोग ज़ुल्म कर रहे हैं, उन (बदमाशों) के लिए एक और यातना इंतज़ार कर रही है, मगर उनमें से अधिकतर लोग इसे नहीं जानते। (47)
अपने रब का फ़ैसला आने तक [ऐ रसूल], आप धीरज रखते हुए इंतज़ार करें : आप हमारी निगरानी में हैं। जब आप उठें, तो अपने रब की तारीफ़ों का गुणगान करें। (48)
रात की कुछ घड़ियों में भी उसका गुणगान [glorify] करें, और सितारों के डूबने के समय (सुबह-सवेरे) भी। (49)
सूरह 67. अल-मुल्क [बादशाही, नियंत्रण /The Sovereignty, Control]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है और बहुत दयावान है.
बड़ी ऊँची शान है उसकी जिसके हाथ में (सारी दुनिया की) बादशाही है; और वह सब कुछ कर सकता है; (1)
जिसने मौत और ज़िंदगी (इसलिए) बनायी, ताकि वह तुम (लोगों) को परीक्षा में डाल कर देखे कि तुम में से कौन सबसे अच्छा कर्म करता है ---- वह ज़बरदस्त ताक़तवाला, और बड़ा माफ़ करनेवाला है; (2)
जिसने तल्ले ऊपर सात आसमानों [heavenly spheres] को पैदा किया। तुम रहम करनेवाले रब [रहमान] की रचना में कोई गड़बड़ी या कमी नहीं पाओगे। फिर से देखो! क्या तुम्हें (इसकी बनावट में) कोई गड़बड़ी दिखायी देती है? (3)
एक बार फिर से देखो! और बार-बार देखो! (हर बार) नतीजा यही होगा कि तुम्हारी निगाह थक-हार कर तुम्हारी ओर लौट आएगी। (4)
हमने सबसे नज़दीक वाले (निचले) आसमान को (ग्रहों, तारों आदि जैसे) रौशन दीपों से सजा रखा है और उन्हें (मिसाइल के रूप में) शैतानों को मार भगाने का साधन बनाया है, और हमने इन (शैतानों) के लिए (जहन्नम में) दहकती आग की यातना भी तैयार कर रखी है। (5)
जिन लोगों ने अपने रब (के हुक्म) को मानने से इंकार किया, उनके लिए जहन्नम की यातना तैयार है : वह [जहन्नम] बहुत ही बुरा ठिकाना है। (6)
जब वे उस (आग) में झोंके जाएंगे तो उसके दहाड़ने की आवाज़ सुनेंगे, वह (ऐसी) भड़क रही होगी, (7)
जैसे वह बेहद गुस्से से फट पड़ेगी। जब भी (काफिरों क) कोई समूह उसमें डाला जाएगा तो उसके दारोग़ा उनसे पूछेंगे, “क्या तुम्हारे पास कोई चेतावनी देने वाला नहीं आया था?" (8)
वे जवाब देंगे, 'हाँ! हमारे पास अल्लाह का डर सुनानेवाला तो ज़रूर आया था, मगर हमने उस पर विश्वास नहीं किया। हम ने कहा, 'अल्लाह ने तो ऊपर से कुछ भी नहीं उतारा [reveal] : तुम तो बहुत ज़्यादा भटके हुए हो।" (9)
वे कहेंगे, “काश हम ने (सच्चाई को) सुना होता, और समझ से काम लिया होता, तो हम (आज) भड़कती आग के वासियों में (शामिल) न होते,” और (10)
वे अपने गुनाहों को ख़ुद स्वीकार कर लेंगे. सो धिक्कार है (जहन्नम की) भड़कती आग में रहनेवालों पर! (11)
मगर जो लोग अपने रब से डरते हैं हालाँकि उसे देख नहीं सकते, उनके लिए तो (गुनाहों की) माफ़ी और बड़ा भारी इनाम है। (12)
चाहे तुम लोग अपनी बात छिपाकर करो या सबके सामने करो, (अल्लाह सब जानता है, क्योंकि) वह दिलों के अंदर की (छुपी) बातों की (भी) पूरी जानकारी रखता है। (13)
भला अपनी पैदा की हुई चीज़ को वही नहीं जानेगा, जबकि वह छोटी से छोटी चीज़ पर नज़र रखनेवाला, और (हर चीज़ की) ख़बर रखनेवाला है? (14)
वही तो है जिसने तुम्हारे लिए धरती को रहने लायक़ बना दिया ---- सो तुम उसके इलाक़ों में चलो फिरो; उसकी (दी गयी) रोज़ी में से खाओ ----- और (मरने के बाद) उसी के पास तुम्हें दोबारा ज़िंदा हो कर जाना है। (15)
क्या तुम्हें यक़ीन है कि वह [रब] जो आसमान में (बैठा) है, वह कभी धरती को इस तरह बहुत ज़ोर से नहीं हिलाएगा कि तुम्हें ज़मीन (अपने अंदर) निगल जाए? (16)
क्या तुम्हें यक़ीन है कि वह [रब] जो आसमान में (बैठा) है, वह कभी तुम पर पत्थर बरसाने वाला बवंडर नहीं भेजेगा?
तुम्हें पता चल जाएगा कि मेरी चेतावनी का मतलब क्या होता है। (17)
इनसे पहले भी जो लोग गुज़र चुके, उनलोगों ने भी (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया था ----- सो (देख लो कि) मेरी दी गयी यातना कितनी बुरी थी! (18)
क्या उन्होंने अपने ऊपर पक्षियों को पर फैलाए हुए और (कभी) पर समेटे हुए उड़ते नहीं देखा? उन्हें रहम करनेवाले रब [रहमान] के (बनाए कानून के) सिवा कौन (हवा में गिरने से) रोके रहता है : वह हर चीज़ पर पूरी नज़र रखता है। (19)
अगर मेहरबानी करनेवाला रब [रहमान] तुम्हारी मदद नहीं करता, तो भला कौन सी ऐसी सेना है जो (मुसीबत में) तुम्हारी मदद कर सकती है? विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] लोग सचमुच निरे धोखे में पड़े हुए हैं। (20)
अगर वह [अल्लाह] रोज़ी देने से हाथ रोक ले, तो भला कोई है जो तुम्हें रोज़ी दे सके? इसके बावजूद वे लोग अपनी बदतमीज़ी और (सच्चाई से) दूर रहने की आदत पर अड़े हुए हैं। (21)
सही रास्ते की समझ किसे ज़्यादा मिली है : उस आदमी को जो औंधे मुंह गिर पड़ा हो, या उस आदमी को जो खड़ा हुआ सीधी राह पर चला जा रहा हो? (22)
[ऐ रसूल], आप कह दें, “वही (अल्लाह) है जिसने तुम्हें पैदा किया, और तुम्हें सुनने, देखने और सोचने-समझने की ताक़त दी ---- (मगर) तुमलोग (इन नेमतों का) कम ही शुक्र अदा करते हो!” (23)
कह दें, “वही (अल्लाह) है जिसने तुम्हें जमीन पर चारों तरफ़ फैला दिया, और (क़यामत के दिन) उसी के पास तुम सबको जमा किया जाएगा।” (24)
वे कहते हैं, “जो कुछ तुम कहते हो, अगर वह सच है तो बताओ कि यह (क़यामत का) वादा कब पूरा होगा?" (25)
आप कह दें, “इसके (आने के समय की) सही जानकारी तो केवल अल्लाह को है : मेरी ज़िम्मेदारी तो बस साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से चेतावनी [warning] देना है।” (26)
फिर जब वे (क़यामत) को पास आता देख लेंगे, तो विश्वास न करनेवालों के चेहरे काले पड़ जाएंगे, और (उनसे) कहा जाएगा, “यही है वह चीज़ जिसे (जल्द लाने की) तुम माँग किया करते थे।" (27)
आप कह दें, “ज़रा सोचो, कि चाहे अल्लाह मुझे और मेरे माननेवालों को बर्बाद कर दे (जैसा कि तुम इच्छा करते हो), या हम पर दया कर दे ---- तो (दोनों हालतों में) विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को दर्दनाक यातना से कौन बचाएगा?” (28)
कह दें, "वह रहम [दया] करनेवाला रब [रहमान] है; हम उस पर ईमान [विश्वास] रखते हैं; हम उसी पर अपना भरोसा रखते हैं। तुम्हें जल्द ही पता लग जाएगा कि कौन है जो साफ़ ग़लत रास्ते पर चल रहा है।” (29)
आप कहें : “ज़रा सोचो, अगर (किसी दिन) तुम्हारे (पीने का) सारा पानी ज़मीन में बहुत नीचे को उतर कर सूख जाए, तो कौन है जो तुम्हें (ज़मीन पर) बहता हुआ (साफ़) पानी ला दे?” (30)
Thank you brother.
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