This is Quran's translation in Hindi....in a simple language, easy to understand.
Monday, June 29, 2015
सूरह 95 : अत् तीन [अंजीर, The Fig]
Sunday, June 28, 2015
सूरह 94 : अल-इंशिराह [Expand, दिल का फैलना / Relief, राहत]
सूरह 94: अल-इंशिराह
[Expand, दिल का फैलना / Relief, राहत]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल] क्या हमने आपके लिए आपका दिल (ज्ञान की रौशनी और समझ-बूझ से) फैला नहीं दिया (जिससे आपको राहत मिल गयी), (1)
और हमने आप पर से (नबी होने की शुरूआती ज़िम्मेदारी का) बोझ उतार दिया, (2)
जिस (बोझ) ने आपकी कमर तोड़ रखी थी, (3)
और हमने (आपकी इज़्ज़त इस तरह बढ़ायी कि लोगों के लिए) आपको याद किए जाने [remembrance] को ऊँचा दर्जा दे दिया? (4)
तो सचमुच जहाँ कहीं कठिनाई होती है, उसके साथ आसानी भी (आती) है; (5)
निश्चय ही हर कठिनाई के साथ आसानी (भी) होती है। (6)
तो जैसे ही आप (अपने लोगों की) ज़िम्मेदारियों से फ़ुर्सत पा लें, तो (अल्लाह की याद व इबादत में) मेहनत किया करें, (7)
और हर चीज़ के लिए अपने रब से ही दिल लगाया करें। (8)
नोट:
3: जब हज़रत मुहम्मद (सल्ल) को “नबी” होने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी, तो शुरुआत में आपने उनका
ज़बरदस्त बोझ महसूस किया, इस बोझ की वजह से आप बेचैन रहते थे। लेकिन फिर अल्लाह ने आपको
वह हौसला दिया जिसके नतीजे में आपने कठिन-से-कठिन काम बड़े आराम से कर लिए। यहाँ अल्लाह
के इसी इनाम का वर्णन है।
4: अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) के मुबारक नाम को इतना ऊँचा दर्जा दे दिया कि दुनिया
में हर जगह आपका नाम अल्लाह के नाम के साथ लिया जाता है, और आपके काम का ज़िक्र करना इबादत
का हिस्सा माना जाता है।
6: मुहम्मद साहब को यहाँ तसल्ली दी गयी है कि शुरु में अल्लाह का संदेश लोगों तक
पहुँचाने में जो मुश्किलें आ रही हैं, वह जल्द ही आसान हो जाएंगी।
इसके साथ ही आम इंसानों को भी यह सबक़ दिया गया है कि जब भी मुश्किल समय आए तो धीरज
से काम लें और समझ जाएं कि इसके बाद आसानी का समय भी आएगा।
7: मुहम्मद साहब दिन भर अल्लाह के संदेश को लोगों तक पहुँचाने के काम में व्यस्त रहते थे। हालाँकि यह काम भी इबादत में ही शामिल था, पर इसके बावजूद यह कहा गया है कि जब इन कामों से फुर्सत मिल जाए, तो असल इबादत (नमाज़ या ज़िक्र आदि) में भी मेहनत करें, इसी से अल्लाह के साथ रिश्ता मज़बूत होता है और हर काम में बरकत पैदा होती है।
Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]
सूरह 1: अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...
-
सूरह 66: अत-तहरीम [अवैध करना/ रोक लगाना/Prohibition] 01-05: रसूल और उनकी बीवियाँ 06-07: ईमानवालों को कड़ी चेतावनी 08 : गुनाहों स...
-
सूरह 12: यूसुफ़ [ Joseph] 01-02: यह स्पष्ट किताब अरबी ज़बान में है 03 : यूसुफ़ (अलै) की कहानी का परिचय 04-06: यूसुफ़ का ख़्वाब 07-2...
-
सूरह 1: अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...