सूरह 91: अश-शम्स
[सूरज, The Sun]
01-10: कामयाबी और नाकामी
11-15: समूद की कहानी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
सुबह की रौशनी में चमकते हुए सूरज की क़सम [1]
और चाँद की क़सम जो उस (सूरज) के पीछे-पीछे चले, [2]
दिन की क़सम जब वह सूरज को तेज़ चमकता हुआ दिखाए [3]
और रात की क़सम जब वह छा जाए और सूरज को छिपा ले, [4]
आसमान की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे (एक ब्रह्मांड के रूप में) बनाया [5]
और ज़मीन की क़सम कि कैसे उस (अल्लाह) ने उसे बिछा दिया, [6]
और इंसानी जान की क़सम कि कैसे उसने उसे (ठीक-ठाक) करके सँवार दिया [7]
और फिर उस (अल्लाह) ने उसके दिल में वह बात भी डाल दी जो उसके लिए नैतिकता से गिरी हुई है, और वह बात भी जो बुराइयों से बचने की हैं! [8]
जिसने अपनी आत्मा को (हर बुराई और गलत इच्छाओं से) बचाते हुए साफ़-सुथरा रखा, उसने कामयाबी पा ली [9]
और जिसने अपनी जान को (गुनाहों के दलदल में) धँसा लिया, वह असफल हो गया। [10]
"समूद" [Thamud] (की क़ौम) के लोगों ने अपने घमंड और क्रूरता में आकर अपने (रसूल सालेह को) झूठा कहा, [11]
जब उनमें से सब से दुष्ट आदमी (उनके विरोध में) उठ खड़ा हुआ। [12]
अल्लाह के रसूल ने उन लोगों से कहा: “(देखो!) अल्लाह की (इस) ऊँटनी को (हाथ न लगाना और इसको) पानी पीने के लिए खुला छोड़ दो,” [13]
मगर उन लोगों ने उन्हें [रसूल को] झूठा कहा, और उस (ऊँटनी) का पाँव काट (कर मार) डाला। तो उनके रब ने उनके अपराध की वजह से उनको तबाह-बर्बाद कर डाला, और सबको (जड़ से उखाड़ करके) बराबर [level] कर दिया। [14]
(याद रहे) अल्लाह को उन्हें दंड देने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई (और न तबाही के नतीजों का उसे कोई डर होता है)। [15]
नोट:
1: इस सूरह में असल विषय यह बयान किया गया है कि अल्लाह ने हर इंसान के दिल में
अच्छाई और बुराई दोनों चीजें पैदा की है, अब इंसान का काम है कि वह अच्छाई के काम करे और बुराई से अपने आप को रोके। इस
बात को कहने के लिए सूरज, चांद, दिन और रात की कसमें खाई गई हैं। शायद इसलिए कि जिस तरह
अल्लाह ने सूरज की और दिन की रोशनी पैदा की है, उसी के साथ रात का अंधेरा भी बनाया है। इसी तरह इंसान को
अच्छे काम करने की भी सलाहियत दी है, और बुरे काम करने की भी।
7: समूद के बारे में ज़्यादा विस्तार से देखें 7: 73-79
9: आत्मा को साफ़-सुथरा रखने का मतलब यह है कि इंसान के दिल में
जो भलाई की इच्छाएं पैदा होती हैं, वे उन्हें उभारकर उस पर अमल करे और जो बुरी इच्छाएं पैदा होती हैं, उन्हें दबाकर रखे। इसकी लगातार कोशिश करने से आत्मा [नफ़्स]
की सफ़ाई होती है।
13: ऊँटनी... और उसके पानी पीने का मामला: इसकी कहाँई के लिए देखें 26: 155-156; 54: 27-28.
14: समूद की क़ौम की मांग पर अल्लाह ने एक ऊँटनी पैदा की थी, और लोगों से कहा था कि कुएंं से पानी एक दिन यह ऊँटनी पिएगी और दूसरे दिन तुम पानी
भर लिया करना। लेकिन उस क़ौम के एक पत्थर दिल आदमी ने ऊंटनी को मार डाला, उसके बाद उस क़ौम पर बड़ी भारी यातना आई और सब कुछ
तबाह-बर्बाद हो गया। देखें सूरह आराफ़ (7: 73).
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