सूरह 93: अज़ ज़ुहा,
[सुबह की रौशनी, The Morning Brightness]
01-05: दोबारा भरोसा दिलाना
06-08: पहले भी अल्लाह का ख़ास करम रहा है
09-11: अंत में दिया गया हुक्म
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़स क़सम है दिन के पहले पहर की रौशनी की, (1)
और क़सम है रात की जब (उसका सन्नाटा) छा जाए, (2)
कि आपके रब ने आपको [ऐ रसूल], न छोड़ा है और न ही आप से नाराज़ हुआ है, (3)
और आगे आनेवाले हालात आपके लिए पहले के हालात से (बड़ाई और दर्जे में) बेहतर होंगे; (4)
यक़ीन रखें कि आपका रब आपको (इतना कुछ) देगा कि आप पूरी तरह संतुष्ट हो जाएंगे। (5)
क्या उस [रब] ने आपको यतीम [अनाथ] नहीं पाया था और फिर (आपको अच्छा) ठिकाना [shelter] दे दिया? (6)
क्या उसने आपको (सच्चाई की खोज में) भटकते हुए नहीं देखा था और फिर सही मार्गदर्शन दे दिया? (7)
क्या उसने आपको ज़रूरतमंद नहीं पाया था और फिर आपको आत्म-निर्भर [self-sufficient] बना दिया? (8)
अत: आप भी किसी अनाथ पर सख़्ती न करें, (9)
और (अपने दरवाज़े पर आये) किसी माँगने वाले को न झिड़कें; (10)
और अपने रब की नेमतों का (ख़ूब) बखान करते रहें। (11)
नोट:
3: मुहम्मद (सल्ल) के नबी होने के बाद शुरु-शुरु में कुछ अवधि
ऐसी भी गुज़री जिसमें आप पर अल्लाह की तरफ़ से “वही”[Revelation] का आना बंद हो गया था, इस पर आपके प्रमुख विरोधी अबु लहब की बीवी ने ताना मारते हुए
कहा था कि तुम्हारे रब ने नाराज़ होकर तुम्हें छोड़ दिया है। इसी के बाद यह सूरह उतरी थी।
अल्लाह कें द्वारा यहाँ चढ़ते दिन की रौशनी और अंधेरी रात की क़सम खाने से शायद मतलब
यह है कि रात को चाहे जितना भी अंधेरा हो जाए, इसका मतलब यह नहीं है कि दिन की रौशनी नहीं
आएगी। इसी तरह, अगर किसी कारण से “वही” नहीं आयी है, तो इसका मतलब यह नहीं है
कि अल्लाह आपसे नाराज़ हो गया है।
4: या बेशक आपके लिए अंत [आख़िरत] आपकी शुरुआत [दुनिया की ज़िंदगी] से बेहतर होगा
7: मुहम्मद साहब सच की तलाश में अक्सर गुफ़ा में जाकर सोच-विचार करते रहते थे, तो अल्लाह ने आपको नबी बनाकर दीन के सभी नियम-क़ायदे सिखाए।
8: हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) के साथ जब आपने उनके कारवाँ व्यापार में हिस्सा लिया, तो उससे आपको काफ़ी लाभ हुआ जिससे आपकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो
गई थी।
No comments:
Post a Comment