Wednesday, July 31, 2013

सूरह 74 : अल मुदस्सिर [चादर ओढ़े हुए / Wrapped In His Cloak]

सूरह 74: अल-मुदस्सिर
[चादर ओढ़े हुए / Wrapped In His Cloak]



01-10: उठें और सावधान कर दें 

11-26: विरोधियों से अल्लाह निबट लेगा 

27-31: जहन्नम के पहरेदार 

32-37: एक चेतावनी

38-48: गुनाहगारों का अंजाम 

49-56: नसीहत [Reminder] को ठुकरा देना 

  


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ (मेरे) चादर ओढ़े हुए (रसूल!),  (1)

उठें और (लोगों को अल्लाह की) चेतावनी सुना दें!  (2)

और अपने रब की बड़ाई (और महानता) की घोषणा कर दें;  (3)

अपने आपको (मन के भीतर की और बाहर की गंदगियों से) साफ़-सुथरा रखें;   (4) 

और हर तरह (के पापों) की गंदगी से दूर रहें;  (5)

किसी को (केवल इस नीयत से) न दें, कि उससे ज़्यादा पाने की चाहत हो;  (6)

और आप अपने रब के काम में धीरज [सब्र] से काम लिया करें।  (7)
 

फिर जब (क़यामत की घोषणा के लिए) नरसिंघे [trumpet] में फूंक मारी जाएगी,  (8)

सो वह [क़यामत का दिन] बहुत ही परेशानी का दिन होगा।  (9)

(सच्चाई पर) विश्वास न करने वालों के लिए (वह दिन) कोई आसान न होगा।  (10)

[ऐ रसूल], आप उस आदमी का मामला मुझ पर छोड़ दें, जिसे मैंने अकेला (व बेसहारा) पैदा किया था,  (11)

फिर उसे दूर-दूर तक फैली हुई ढेर सारी धन-संपत्ति दी थी,  (12)

उसे बेटे दिए थे जो (उसके सामने) हाज़िर रहते थे,  (13)

और उसके लिए हर काम के रास्ते आसान बना दिए थे ----- (14)

इसके बावजूद, वह अब भी यह उम्मीद रखता है कि मैं उसे और अधिक दूँगा।  (15)

(अब और) नहीं!, वह हमारी (भेजी गयी) आयतों [revelation] का कट्टर विरोधी रहा है:  (16)

बहुत जल्द मैं उसे बेहद थका देने वाली (चढ़ाई की) यातना दूंगा,  (17)

उसने सोच-विचार किया और एक साज़िश तैयार कर ली ----  (18)

लानत हो उस पर, उसने कैसी शैतानी साज़िश रची!  (19)

इस पर लानत हो, उसने (यह) कैसी क्रूरता से भरी साज़िश की! ----- (20)

फिर उसने (आसपास) देखा,  (21)

और त्योरी चढ़ाई और मुंह बिचकाया,   (22)

फिर (सच्चाई की बातों से) पीठ फेर ली और घमंड में अकड़ गया,  (23)

और कहने लगा, “यह [क़ुरआन] कुछ नहीं, बस पुराने ज़माने से चला आ रहा जादू है, (24)

“बस इंसान की कही हुई बात है” (अल्लाह का कलाम नहीं है)।  (25)

में उसे (जहन्नम की) भड़कती आग [सक़र] में झोंक दूंगा।  (26)

और आपको किसने बताया है कि "सक़र" [जहन्नम की आग] क्या है?  (27)

वह (ऐसी आग है जो) न किसी को बाक़ी बचा रखती है न (तरस खाकर) छोड़ती है;  (28)

(वह) आदमी के बदन की खाल को झुलसाकर काला कर देने वाली है;  (29)

उस पर उन्नीस पहरेदार नियुक्त हैं। ----  (30)

और हमने जहन्नम की पहरेदारी के लिए किसी और को नहीं, बल्कि फरिश्तों को ही नियुक्त किया है ----- और हमने इनकी संख्या [Number] विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को केवल परखने के लिए निर्धारित की है। अत: जिन लोगों को (आसमानी) किताब दी गयी हैं, उन्हें इस बात पर विश्वास हो जाएगा, और जो लोग ईमान रखते हैं उनका विश्वास और बढ़ जाएगा: न तो उन्हें जिनको किताब दी गयी है और न ही ईमानवालों को इसकी (सच्चाई में) कोई संदेह होगा, मगर वे जिनके दिलों में रोग है और जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, वे लोग यह कहेंगे, "भला इस (ख़ास संख्या के) उदाहरण से अल्लाह का क्या मतलब हो सकता है?"
इस तरह, अल्लाह (एक ही बात से) जिसे चाहता है गुमराह कर देता है, और जिसे चाहता है सीधा रास्ता दिखा देता है ----- आपके रब के लशकरों को उसके सिवा कोई नहीं जानता, और यह (वर्णन) आदमी को सावधान करने के लिए ही है।  (31)

हां ---- चाँद की क़सम!  (32) 

और रात की क़सम जब वह पीठ फेरकर विदा होने लगे!  (33)

और सुबह की क़सम जब वह रौशन हो जाए!  (34)

बेशक यह (जहन्नम) बहुत बड़ी आफ़तों में से एक है,   (35)

इंसानों को सावधान करने वाली,  (36)

तुममें से हर उस आदमी के लिए जो (भलाई में) आगे बढ़ना चाहे या जो (बुराई में फंसकर) पीछे रह जाए।  (37)
 

हर आदमी अपने (कर्मों द्वारा) की गयी कमाई के बदले (अल्लाह के पास) गिरवी है,  (38)

दाएँ हाथ वालों [Companions of the right] को छोड़कर,  (39)

जो बाग़ों [जन्नत] में होंगे और वे पूछते होंगे,  (40) 

अपराधियों से,  (41)

(वे पूछेंगे): ”तुम्हें क्या चीज़ जहन्नम (की भड़कती आग) में ले गई?”  (42)

वे जवाब देंगे, “हम नमाज़ पढ़ने वालों में नहीं थे”;  (43)

“और हम ग़रीबों को खाना नहीं खिलाते थे”;  (44)

“हम दूसरे लोगों के साथ (मिलकर) मौज-मस्ती करते (और ईमानवालों का मज़ाक़ उड़ाया करते थे)”;  (45)

“और हम फ़ैसले के दिन को झूठ बताया करते थे”,  (46)

“(और हम यूँ ही रहे) यहाँ तक ​​कि हम पर वह (मौत) आ पहुँची जिसका आना निश्चित था”,  (47)

सो (उस समय) सिफ़ारिश करने वालों की सिफ़ारिश, उनके कोई काम नहीं आएगी। (48)
 

तो उन (काफ़िरों) को क्या हो गया है? क्यों वे इस चेतावनी से बिदककर मुँह मोड़ लेते हैं,   (49)

मानो वे घबराए हुए (जंगली) गधे हों,  (50)

जो शेर से (डरकर) भाग खड़े हुए हों?  (51)

उनमें से हर एक आदमी यह चाहता है कि उस पर सीधे (आसमानी) किताब उतार दी जाए जो उसकी आँख के सामने खोली जाए ---- (52)

नहीं! बल्कि (सच यह है कि) वे (आने वाली) परलोक (की ज़िंदगी) से डरते ही नहीं।  (53)

मगर सचमुच यह [क़ुरआन] एक नसीहत [Reminder] है।  (54)

अब जिसका जी चाहे, इस (नसीहत) पर ध्यान दे और याद रखे:   (55)

वे लोग तभी इसे याद रखने पर ध्यान देंगे, अगर अल्लाह ऐसा चाहे। सचमुच वही इस योग्य है कि उसकी चेतावनी पर ध्यान दिया जाए, और वही है जो माफ़ी देने वाला है।  (56)
 
 
 
नोट: 

1: ह्दीसों से साबित है कि सबसे पहले मुहम्मद (सल्ल.) पर सूरह अलक़ (96: 1--5) की पहली 5 आयतें उतरी थीं। उसके बाद कुछ अवधि तक "वही" [Revelation] उतरने का सिलसिला बंद रहा, फिर यह सूरह उतरी। 

 

7: जब मुहम्मद (सल्ल.) को लोगों के बीच अल्लाह का संदेश पहुँचाने का आदेश हुआ, तो इस बात की आशंका थी कि विश्वास न करनेवाले आपको सताएंगे। इसलिए बिना लड़ाई-झगड़ा किए हुए धीरज से काम लेने की सलाह दी गई है। उनके अत्याचारों की असल सज़ा उन्हें क़यामत में दी जाएगी।

 

11: बताया जाता है कि यह 'वलीद बिन मुग़ीरा' के बारे में आया है जो मक्का का बड़ा धनी सरदार था जिसकी सम्पत्ति मक्का से तायफ़ शहर तक फैली हुई थी। उसने एक बार क़ुरआन सुनी और उसके कलाम से इतना प्रभावित हुआ कि बोल उठा कि यह किसी इंसान का नहीं हो सकता। मक्का के सरदार और मुहम्मद साहब के प्र्मुख विरोधी अबु जहल को यह जानकर डर हुआ कि कहीं वलीद भी मुसलमान न हो जाए। उसने वलीद को ताव दिलाया कि जब तक तुम क़ुरआन के विरोध में नहीं बोलोगे, तब तक लोग तुम्हें धन का लालची समझेंगे। वलीद कहने लगा कि मैं क़ुरआन को न तो शायरी कह सकता हूँ, न ही काहिनों का कलाम कह सकता हूँ और न ही मुहम्मद को दीवाना कह सकता हूँ, क्योंकि यह बातें चल नहीं पाएंगी। फिर कुछ सोचते हुए कहने लगा कि उस कलाम को "जादू" कह सकते हैं, क्योंकि जिस तरह जादूगर मियाँ-बीवी के बीच झगड़े लगा देता है, उसी तरह यह कलाम घरों में माँ-बाप के बीच, बाप-बेटे के बीच, भाई-भाई के बीच मतभेद पैदा कर देता है।

 

18: मतलब यह है कि क़ुरआन के बारे में सोच समझकर एक बात बनाई गई कि यह एक जादू है। 

 

31: जब यह आयत उतरी कि जहन्नम की पहरेदारी के लिए 19 फ़रिश्ते नियुक्त हैं, तो मक्का के काफ़िरों ने इसका मज़ाक़ उड़ाना शुरू किया, और एक ने यहाँ तक कहा कि "19 में से 17 के लिए तो मैं ही काफ़ी हूँ, बाक़ी 2 से तुम निपट लेना।" मगर यहाँ एक ख़ास संख्या बताने का मक़सद भी लोगों को आज़माना था कि क्या वे उसे सही समझते हुए मान लेते हैं या उसका मज़ाक़ बनाते हैं।

 

36: जहन्नम जैसी बड़ी आफ़त का ज़िक्र लोगों को होश में लाने के लिए है, जो मरने के बाद की ज़िंदगी को भुलाए बैठे थे। यह बताने के लिए पहले चाँद की क़सम खाई गई है कि जिस तरह चाँद पहले हर दिन थोड़ा-थोड़ा बढ़ता है, फिर रोज़ थोड़ा-थोड़ा घटते -घटते महीने के अंत में ग़ायब हो जाता है, इसी तरह इंसान की ताक़त पहले बढ़ती है, फिर बुढ़ापे में घटनी शुरू हो जाती है, यहाँ तक कि इंसान एक दिन मर जाता है, और दुनिया की हर चीज़ का यही हाल है। फिर अल्लाह ने उस समय की क़सम खाई है जब रात ढलने लगती है, और सुबह का उजाला हो जाता है, यह शायद इस तरफ़ इशारा है कि अभी सच्चाई से इंकार करनेवालों के सामने बेफ़िक्री का अंधेरा छाया हुआ है, फिर एक समय आएगा जब यह अंधेरा दूर होगा और सच्चाई सबके सामने ज़ाहिर होकर माहौल को रौशन कर देगी।

 

38: जिस तरह क़र्ज़ की गारंटी के तौर पर कोई चीज़ गिरवी रखी जाती है कि अगर क़र्ज़ चुकता नहीं हुआ तो उस गिरवी रखे हुए सामान को बेचकर असल क़ीमत वसूल की जा सकती है, उसी तरह सच्चाई से इंकार करनेवाला भी गिरवी रखा होता है कि या तो वह सही रास्ता अपना ले, नहीं तो उसका पूरा अस्तित्व जहन्नम [नरक] का ईंंधन बनेगा।

 

52: यहाँ उन काफ़िरों का बयान है जो यह कहते थे कि क़ुरआन मुहम्मद (सल्ल.) पर ही क्यों उतारी गई, अगर अल्लाह को मार्गदर्शन के लिए कोई किताब उतारनी थी, तो हममें से हर आदमी पर अलग किताब आनी चाहिए थी!

 

53: इसमें साफ़ बता दिया गया कि किताब तो केवल पैग़म्बर पर ही उतारी जाती है ताकि वह किताब का सही मतलब लोगों को बता सके, और उसमें बतायी गई बातों पर अमल करने का तरीक़ा भी बता सके।










 
















Tuesday, July 30, 2013

सूरह 73 : अल-मुज़म्मिल [चादर से लिपटे हुए / Enfolded]

सूरह 73: अल-मुज़म्मिल 
[चादर से लिपटे हुए / Enfolded]



01-08: रात में उठकर क़ुरआन और नमाज़ पढ़्ना 


09-14: सच्चाई पर विश्वास न करने वालों को अल्लाह पर छोड़ना 

15-19: सच्चाई पर विश्वास करने की अपील और विरोध के नतीजे की चेतावनी 

20 : रात में उठकर नमाज़ पढ़ने की अवधि में आसानी 

 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ चादर में लिपटे हुए [रसूल!] (1)

आप उठकर रात भर (नमाज़ में) खड़े रहा करें, मगर थोड़ी रात (आराम भी कर लिया करें), (2)

(नमाज़ के लिए) आधी रात या इससे थोड़ा कम कर लें, (3)

या इस (अवधि) से थोड़ा बढ़ा लें; और क़ुरआन ख़ूब ठहर-ठहरकर (साफ़-साफ़) पढ़ा करें। (4)

[ऐ रसूल!], हम जल्द ही आप पर एक भारी फ़रमान [क़ुरआन] उतारने वाले हैं, (5)

रात में उठकर की गयी इबादत, दिलों पर गहरा असर छोड़ती है, और (शांत माहौल में क़ुरआन के) शब्दों को सही ढंग से पढ़ना (और समझना) आसान होता है ----- (6)

दिन में लम्बे समय तक आप बहुत सारे कामों में व्यस्त रहते हैं ---- (7)

अत: आप अपने रब के नाम को (दिल और ज़बान से) याद करते रहें, और हर एक से अलग होकर पूरी भक्ति से बस उसी के हो रहें। (8)

वह पूरब और पश्चिम का मालिक है, उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं, सो उसी को (अपना) अभिभावक व रखवाला [protector] बना लें।  (9)

जो कुछ वे [काफ़िर लोग] कहते रहते हैं, आप उन (बातों) पर धीरज रखें, और भले तरीक़े से उनका साथ छोड़कर किनारे हो जाएं,   (10)

और उन लोगों को आप मुझ पर छोड़ दें, जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं और बड़े ऐश-आराम [luxury] में रहते हैं। कुछ और समय तक (उनके साथ नर्मी बरतें) और उन्हें बर्दाश्त कर लें; (11)

हमारे पास उनके लिए भारी बेड़ियाँ हैं, और (जहन्नम की) भड़कती हुई आग है, (12)

गले में अटक जाने वाला खाना है, और उनके लिए बहुत दर्दनाक यातना [अज़ाब] है,   (13)

उस दिन जब ज़मीन और पहाड़ ज़ोर से हिलने लगेंगे। सारे पहाड़ बिखरी हुई रेत के टीले बन जाएंगे,  (14)


[ऐ मक्का वासियो!] बेशक हमने तुम (लोगों) के पास एक रसूल [मोहम्मद] भेजा है जो तुम्हारे मामले में गवाह होगा, जैसाकि हमने फ़िरऔन [Pharaoh] की तरफ एक रसूल [मूसा] को भेजा था,  (15)

मगर फ़िरऔन ने हमारे रसूल [मूसा] का कहना मानने से इंकार किया, सो हमने उसको तबाह कर देने वाली चपेट में धर-दबोचा।  (16)

अगर तुम भी (हमारी बातों को मानने से) इंकार करते रहे, तो उस दिन (की यातना) से अपने आपको कैसे बचा पाओगे, जो बच्चों को बूढ़ा कर देगी, (17)

वह दिन, जब आसमान को फाड़ दिया जाएगा? अल्लाह का वादा तो ज़रूर पूरा होकर रहेगा। (18)

यह [क़ुरआन] एक नसीहत [Reminder] है। अब जो कोई चाहे, अपने रब तक पहुंचने का रास्ता अपना ले।  (19)


[ऐ रसूल], आपका रब अच्छी तरह जानता है कि आप कभी-कभी दो तिहाई रात के करीब (तह्ज्जुद की नमाज़ में) खड़े होते हैं ----- और (कभी) आधी रात और (कभी) एक तिहाई रात (नमाज़) पढ़ते हैं ---- आपके (पीछे चलने वाले) साथियों में से भी कुछ लोग हैं जो ऐसा ही करते हैं।
अल्लाह ही रात और दिन (के घटने और बढ़ने) का सही अंदाज़ा रखता है। वह जानता है कि तुम कभी उसका ठीक-ठीक हिसाब नहीं रख सकोगे, तो उसने तुम सब पर (कष्ट में कमी करके) मेहरबानी कर दी, सो जितना आसानी से हो सके, क़ुरआन पढ़ लिया करो,
वह जानता है कि तुममें से (कुछ लोग) बीमार होंगे और (कुछ) दूसरे लोग ऐसे होंगे जो अल्लाह के फज़ल [bounty] की खोज में (काम-काज के लिए) ज़मीन पर इधर-उधर यात्रा कर रहे होंगे, और (कुछ) अन्य लोग अल्लाह की राह में युद्ध कर रहे होंगे: सो जितना आसानी से हो सके उतना (ही) पढ़ लिया करो,
पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, ज़कात [alms] देते रहो, और अल्लाह को क़र्ज़ दिया करो, अच्छावाला क़र्ज़!, 
जो कुछ भलाई व नेकी तुम अपने लिए जमा करते हो, उसके बदले तुम्हें अल्लाह के पास कहीं बेहतर और ज़्यादा इनाम मिलेगा,
और अल्लाह से माफी मांगते रहो, (विश्वास रखो) अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला और बेहद रहम करने वाला है।  (20)
 
 
 
नोट:

1: "ऐ चादर में लिपटे हुए", यह प्यार भरा संबोधन मुहम्मद साहब (सल्ल.) के लिए है (74:1)। हिरा नामक गुफा में जब आप पर पहली बार अल्लाह का संदेश उतारा गया, तब आप बुरी तरह घबरा गए और घर पहुंचते ही अपनी बीवी खदीजा (रज़ि.) से कहने लगे कि "मुझे चादर उढ़ा दो, मुझे चादर उढ़ा दो।"

2: इस आयत में रात में उठकर पढ़ी जाने वाली नमाज़ [तहज्जुद] का आदेश दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह नमाज न केवल मुहम्मद साहब पर बल्कि उनके सभी साथियों पर फ़र्ज़ [ज़रूरी] कर दी गई थी, और इसकी अवधि कम से कम एक तिहाई रात तय की गई थी। शायद यह सिलसिला 1 साल तक चलाबाद में इसी सूरह की आयत 20 उतरी जिसमें रात में उठकर पढ़ी जाने वाली नमाज की अवधि में आसानी कर दी गई, और अब यह नमाज़ ज़रूरी [फ़र्ज़] नहीं रह गई। 

6: रात को उठकर नमाज पढ़ने से अपने मन की इच्छाओं पर क़ाबू पाना आसान हो जाता है।

8: सबसे अलग हो रहने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया के सारे रिश्ते-नाते छोड़ दो, बल्कि भक्ति केवल अल्लाह के लिए ही होनी चाहिए। 

10: मक्का की ज़िंदगी में हमेशा यही हुक्म दिया गया कि (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों की तकलीफ़ पहुंचाने वाली बातों पर धीरज से काम लें, और उनसे लड़ाई करने के बजाय ख़ूबसूरती से अलग हो जाएं। 

20: यह आयत, बाक़ी आयतों (1--19) के कम से कम एक साल बाद उतरी थी, इसके द्वारा रात में उठकर पढ़ी जाने वाली नमाज़ [तह्ज्जुद] के हुक्म में आसानी पैदा की गई। शुरू में यह नमाज़ रात के एक तिहाई अवधि तक पढ़नी पड़ती थी। उस समय घड़ी न होने के कारण मुहम्मद साहब और उनके कुछ साथी यह नमाज़ कभी आधी रात तक और कभी दो-तिहाई रात की अवधि तक पढ़ते थे। इस आयत के बाद इस नमाज़ को पढ़ना ज़रूरी नहीं रहा, मगर जितनी देर आसानी से हो सके, पढ़ना बहुत अच्छा माना जाता है। वैसे इसका सबसे बेहतर समय रात के पिछले पहर उठकर पढ़ने का है। 

"ज़कात" यानी ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को दान करना। 

"अच्छावाला क़र्ज़" का मतलब बिना दिखावा किए और केवल अल्लाह की ख़ुशी के लिए देना (2:245; 5:12; 30:39;57:11; 64:17).

 

 















Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...