सूरह 68: अल-क़लम
(क़लम / The Pen)
01-09: रसूल दीवाने नहीं हैं
10-16: एक नीच, क्रूर और मक्कार विरोधी
17-33: उजड़े हुए बाग़ की मिसाल
34-43: इनाम और सज़ा
44-47: अल्लाह विश्वास न करने वालों को सज़ा देगा
48-52: रसूल को सब्र से काम पर जमे रहना चाहिए
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
”नून”
क़सम है क़लम की, और उन (विषयों) की जो वे (फरिश्ते) लिखते हैं! (1)
[ऐ रसूल!] आपके रब की कृपा से आप (हरगिज़) दीवाने नहीं हैं: (2)
बेशक आप के लिए ऐसा इनाम है जो कभी समाप्त नहीं होने वाला ---- (3)
सचमुच आप बेहतरीन और मज़बूत चरित्र के मालिक हैं ---- (4)
सो बहुत जल्द आप (भी) देख लेंगे और वे (भी) देख लेंगे, (5)
कि तुम में से कौन है जो दीवानेपन से ग्रसित है। (6)
आपका रब अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो उसकी सीधी राह से भटक गया है, और कौन है जिसने सीधा मार्ग पा लिया है। (7)
अत: आप उन लोगों के दबाव में न आएं, जो इस (सच्चाई) को झूठ मानते हुए इससे इंकार करते हैं, ---- (8)
वे तो चाहते हैं कि (धर्म के मामले में) आप थोड़ा ढीले पड़ जाएं (और उनके बुतों की बुराई न करें) तो वे भी (ईमानवालों को सताने में) नर्मी करेंगे ---- (9)
आप किसी ऐसे आदमी की बातों में बिल्कुल न आएं जो बहुत क़समें खानेवाला, अत्यंत नीच है, (10)
(जो) ताना देने, दूसरों की कमियाँ निकालने (और) लोगों में अशांति फैलाने के लिए चुग़लख़ोरी करता फिरता है, (11)
(जो) भलाई के काम से रोकनेवाला, ज़ुल्म की सीमा पार करनेवाला (और) सख़्त पापी है, (12)
(जो) बहुत क्रूर है, और सबसे बढ़कर मक्कार [imposter] है (या जो नाजायज़ पैदा हुआ है। (13)
आप केवल इसलिए (उसकी बात को महत्व न दें) कि वह बड़ा धनवान और औलाद वाला है, (14)
जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं (तो) कहता है: “यह (तो) पिछले लोगों की कहानियाँ हैं!" (15)
जल्द ही हम उसकी सूंड (जैसी नाक) पर दाग़ लगा देंगे! (16)
बेशक हमने (इन मक्का के लोगों) को (उसी तरह) आज़माइश में डाला है जिस तरह हमने (यमन के) एक बाग़वालों को उस वक़्त परीक्षा में डाला था जब उन्होंने क़सम खाई थी कि हम सुबह-सवेरे ज़रूर उस (बाग़ के) फल तोड़ लेंगे (17)
और उन्होंने (यह क़सम लेते हुए) किसी और के लिए कोई गुंजाइश नहीं रखी (न अल्लाह की मर्ज़ी की और न ग़रीबों के हिस्से की): (18)
फिर ऐसा हुआ कि जिस वक़्त वे सो रहे थे, उस वक़्त आपके रब की ओर से एक बला [disaster] उस बाग़ पर फेरा लगा गयी। (19)
सो वह (लहलहाता फलों से लदा हुआ बाग़) सुबह कटी हुई फ़सल की तरह उजाड़ हो गया। (20)
फिर सुबह होते ही वे एक दूसरे को पुकारने लगे, (21)
“कि अपने खेत की तरफ सवेरे-सवेरे चले चलो अगर तुम सारे फल तोड़ना चाहते हो”, (22)
सो, वे लोग चल पड़े और वे आपस में चुपके-चुपके कहते जाते थे (23)
कि "ध्यान रखो! आज उस बाग़ में तुम्हारे पास कोई ग़रीब माँगनेवाला आने न पाए!" ----- (24)
और वे सुबह-सवेरे अपनी योजना पर अड़े हुए, तेज़ क़दमों से (बाग़ की तरफ़) चल पड़े ----- (25)
फिर जब उन्होंने उस (वीरान बाग़) को देखा, तो कहने लगे: “हम ज़रूर रास्ता भूल गए हैं!” (यह तो हमारा बाग़ नहीं है), (26)
(थोड़ी देर बाद जब ध्यान से देखा तो पुकार उठे): “नहीं! हम तो लुट गए, बर्बाद हो गए”। (27)
उनमें सबसे अक़्लमंद आदमी ने कहा: “क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था, "क्या तुम (अल्लाह की) याद और उसकी बड़ाई का गुणगान नहीं करोगे?” ---- (28)
(तब) वे कहने लगे कि “हमारा रब पाक व महान है!, सचमुच हम ही शैतानी के काम कर रहे थे!" ------ (29)
फिर उसके बाद वे एक दूसरे के सामने खड़े होकर आपस में एक दूसरे को बुरा-भला कहने लगे। (30)
(फिर सब मिलकर) कहने लगे: “अफ़सोस है हम सब पर! बेशक हम ने बहुत भारी ग़लती की है, (31)
मगर हो सकता है हमारा रब हमें इस (बाग़) के बदले में उससे अच्छा प्रदान कर दे: हम आशा करते हुए, अपने रब के आगे पूरी भक्ति से झुकते हैं”। (32)
(इस जीवन में तो) ऐसा दंड [punishment] है, मगर आने वाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक / Hereafter] की यातना (इससे) कहीं बढ़कर है, काश! वे जानते होते, (33)
वे लोग जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए उनके रब के पास नेमतों से भरे हुए बाग़ हैं। (34)
भला क्या हम आज्ञा मानने वालों को गुनाहगारों [sinners] की तरह (वंचित) कर देंगे? (35)
तुम्हें क्या हो गया है, तुम कैसी बातें तय कर लेते हो? (36)
क्या तुम्हारे पास कोई किताब है जो तुम्हें बताती है, (37)
कि वहाँ (परलोक में) तुम्हें वही कुछ मिलेगा जो तुम पसंद करोगे? (38)
क्या तुमने हम से क़यामत तक बाक़ी रहने वाली क़समें ले रखी हैं (जिनके द्वारा हम बाध्य हैं) कि तुम्हें वही कुछ मिलेगा जिसे तुम ख़ुद (अपने लिए) तय करोगे? (39)
[ऐ रसूल] उनसे पूछिए कि उनमें से कौन है जिसने इस बात की ज़मानत ले रखी है? (40)
या (अल्लाह के अलावा) ख़ुदायी में क्या उनके ठहराये हुए कोई साझेदार [partner] हैं (जो यह ज़मानत लेते हों)? तो फिर उन्हें चाहिए कि ले आएं अपने उन साझेदारों को, अगर वे सच्चे हैं। (41)
जिस दिन ‘पिंडली खोल दी जाएगी’ [यानी क़यामत की ज़बरदस्त मुसीबत और हलचल आ जाएगी] और वे [इंकार करनेवाले] लोग अल्लाह के सामने (सज्दे में) झुकने के लिए बुलाए जाएंगे, तो वे (सज्दा) नहीं कर सकेंगे। (42)
उनकी आँखें (डर और लज्जा के कारण) झुकी हुई होंगी (और) उन पर ज़िल्लत छायी हुई होगी: वे (दुनिया में) सज्दे (में झुकने) के लिए बुलाए जाते थे, जबकि वे भले-चंगे थे (लेकिन फिर भी वे सज्दा करने से इंकार करते थे)। (43)
अत: [ए रसूल!] जो लोग इन आयतों [Revelation] को झुठ कहकर ठुकरा रहे हैं, आप उन्हें मुझ पर छोड़ दें: हम उन्हें धीरे-धीरे (विनाश की ओर) इस तरह ले जाएंगे कि उन्हें पता तक नहीं चलेगा; (44)
और मैं उन्हें (बुराइयों के लिए) ढील दे रहा हूँ, बेशक मेरी योजना बहुत मज़बूत है। (45)
क्या आप उनसे (धर्म प्रचार के लिए) कोई मज़दूरी मांग रहे हैं कि वे क़र्ज़ (के बोझ) से दबे जा रहे हैं? (46)
या उन लोगों के पास छुपी हुई चीज़ों का ज्ञान है कि वह (इस आधार पर) लिखते हैं? (47)
इसलिए आप अपने रब के आदेश के इंतजार में सब्र किये जाएं: "मछलीवाले" [पैग़म्बर यूनुस/Jonah] की तरह मत हो जाएं, जब उन्होंने (अपनी क़ौम से तंग होकर और) दुख से घुट-घुटकर हमें [अल्लाह को] पुकारा था: (48)
अगर उनके रब की अनुकंपा ने उनको [यूनुस को] संभाल न लिया होता, तो वह ज़रूर दोषी के रूप में उस उजाड़ साहिल पर फेंक दिए जाते (लेकिन अल्लाह ने उन्हें इससे बचाए रखा), (49)
मगर उनके रब ने उनको चुन लिया और उन्हें (अपनी ख़ास नज़दीकी प्रदान करके) नेक बंदों में (शामिल) कर लिया। (50)
वे लोग जो सच्चाई से इंकार करने पर तुले हुए हैं, जब क़ुरआन सुनते हैं, तो ऐसा लगता है कि वे अपनी (तेज़ व जलन भरी) नज़रों से आपको डगमगा देंगे, और वे कहते हैं कि "यह आदमी तो दीवाना है!" (51)
मगर यह [कुरआन] कुछ और नहीं, बल्कि सारे संसार के लिए नसीहत [Reminder] है। (52)
नोट:
2: मक्का के काफ़िर लोग मोहम्मद साहब को 'दीवाना' कहा करते थे, यानी जिस पर जिन्न का असर हो गया हो। अगली आयत में इस बात को रद्द करते हुए तक़दीर के क़लम की और तक़दीर के उन फ़ैसलों की क़सम खायी गई है जो फ़रिश्ते लिखते हैं कि मोहम्मद साहब दीवाने नहीं हैं। यानी उनका पैग़म्बर होना और मक्का में पैदा होना तक़दीर में पहले से लिखा जा चुका था। एक मतलब यह भी हो सकता है कि क़लम से लिखना जानने वाले भी इस तरह के उच्च कोटि के विषयों पर नहीं लिख सकते, तो जो आदमी पढ़ा लिखा नहीं है, वह कैसे इतने उच्च कोटि का कलाम लिख सकता है।
9: मक्का के काफ़िरों की तरफ से कई बार इस तरह के सुझाव पेश किए गए थे कि अगर मोहम्मद साहब अल्लाह के संदेशों को लोगों तक पहुंचाने में थोड़ी ढिलाई बरतें और हमारे देवी-देवताओं को झूठा ना बताएं, तो हम भी उन्हें सताना छोड़ देंगे। यह उनके इसी सुझाव की तरफ इशारा है।
10: कहा जाता है कि यह बातें वलीद इब्ने अल मुग़ीरा के बारे में हैं जो रसूल (सल.) का घोर विरोधी था (देखें 74:11-26); जो लोग मुहम्मद साहब के विरोध में आगे-आगे थे और उनको अपने दीन का प्रचार-प्रसार करने से रोकना चाहते थे, उनमें से कई ऐसे थे जिनमें ऐसे बुरे आचरण पाए जाते थे जिनका वर्णन आयत 10 से 12 में किया गया है।
16: यहां सूंड से मतलब "नाक" है जिसे व्यंग्य के तौर पर सूंड से उपमा दी गई है। मतलब यह है क़यामत के दिन ऐसे आदमी की नाक को दाग़ कर इस पर एक बदनुमा धब्बा लगा दिया जाएगा जिससे उसकी और भी बेइज्जती होगी।
17: मक्का के कुछ धनवान काफ़िरोंं को इस बात का घमंड था कि अगर अल्लाह हमसे नाराज़ होता तो हमें धन-दौलत से मालामाल न करता, जैसा कि सूरह मोमिनून (23:56) में आया है। अल्लाह कभी-कभी किसी को धन-दौलत उसे आज़माने के लिए देता है और अगर वह इस पर उसका शुक्र अदा करने के बजाय नाशुक्री करे, तो उस पर दुनिया ही में यातना आ जाती है। इस सिलसिले में एक घटना बताई गई है जो अरब के लोगों में मशहूर थी। यमन के शहर सना से कुछ दूरी पर स्थित एक जगह है जिसका नाम ज़रवान है, वहाँ पर हरियाली के बीच काले पत्थरों वाला वीरान और उजड़ा हुआ इलाक़ा है जिसके बारे में कहा जाता है कि यही उस बाग़ की जगह थी।
18: इसका एक मतलब तो यह हो सकता है कि उन्होंने यह इरादा किया था कि सारे का सारा फल हम तोड़ लेंगे, और गरीबों का कोई हिस्सा नहीं छोड़ेंगे। या यह कि जब उन लोगों ने यह कहा था कि सुबह होते ही हम फल तोड़ लेंगे तो उस वक्त "इंशा अल्लाह" यानी 'अगर अल्लाह ने चाहा तो', नहीं कहा था (देखें 18: 24).
25: इसका अनुवाद यह भी हो सकता है कि, "वह यह सोचकर सवेरे रवाना हुए कि वह गरीबों को मना करने में सफल हो जाएंगे।"
28: उन भाइयों में से एक जो उनमें अच्छा था, उसने पहले भी भाइयों से कहा था कि अल्लाह का ज़िक्र करो, और ग़रीबों को आने से मना न करो, लेकिन बाद में वह भी दूसरे भाइयों के साथ शामिल हो गया था।
38: कुछ काफ़िर यह कहते थे कि अगर मान लिया जाए कि हमें मरने के बाद दोबारा जिंदा किया गया, तब भी अल्लाह हमें जन्नत की नेमतें देगा, जैसाकि सूरह हा.मीम. सज्दा (41: 50) में आया है। यहाँ इस विचार को रद्द किया गया है।
42: "पिंडली का खुल जाना" अरबी में एक मुहावरा है जो जंग छिड़ जाने या बहुत सख़्त मुसीबत आ जाने के लिए बोला जाता है।
48: "मछलीवाले" से मतलब यहाँ पर हज़रत यूनुस (अलै.) है, जिनका वर्णन सुरह यूनुस (10: 98), सूरह अंबिया (21: 87-88) और सूरह अस-साफ़्फ़ात (37: 139-148) में आया है।
49: इसका अभिप्राय वह समुद्र के किनारे की उजाड़ जगह है जहाँ हज़रत यूनुस (अलै.) को मछली उगलकर चली गई थी। मछली के पेट से निकलने के बावजूद वह इतने कमज़ोर हो चुके थे कि उनका जिंदा रहना बहुत मुश्किल था, लेकिन अल्लाह ने उन्हें संभाला और वह दोबारा स्वस्थ हो गए।
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