सूरह 72: अल-जिन्न
[जिन्न, The Jinn]
01-25: जिन्नों ने क़ुरआन पर विश्वास किया
16-19: एक चेतावनी
20-28: घोषणाओं का सिलसिला
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
(ऐ रसूल) आप कह दें: ‘मेरी ओर “वही”[revelation] भेजी गयी है कि जिन्नों के एक दल ने (मेरे क़ुरआन पढ़ने को) ध्यान से सुना, तो (जाकर अपनी क़ौम से) कहने लगे: “बेशक हमने एक अजीब क़ुरआन सुना है”, (1)
जो अच्छाई की राह पर चलने का रास्ता दिखाती है, इसलिए हमने उस पर विश्वास कर लिया है ---- और अब हम (इबादत में) अपने रब के साथ किसी और को कभी साझेदार [partner] नहीं ठहराएँगे---- (2)
और यह कि, “हमारे रब की शान बहुत ऊँची है! उसकी न कोई पत्नी है और न ही कोई औलाद।” (3)
हममें से कुछ मूर्ख लोग अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहा करते थे जो सच्चाई से बहुत दूर थीं, (4)
हालाँकि हमने यह समझा था कि इंसान और जिन्न अल्लाह के बारे में कभी झूठ बोलने की हिम्मत नहीं करेंगे। (5)
इंसानों में से कुछ लोगों ने पहले भी जिन्नों से शरण माँगी है, मगर इससे जिन्नों ने उन्हें केवल और ज़्यादा भटका ही दिया था। (6)
वे [इंसान] समझते थे, जैसा कि तुमने (ए जिन्नों के समूह!) समझा, कि अल्लाह (मरने के बाद) कभी किसी को दोबारा नहीं उठाएगा। (7)
हम (जिन्नों) ने आसमानों को टटोलना चाहा तो उन्हें कड़े पहरेदारों और (अंगारों की तरह) जलने और चमकनेवाले सितारों [shooting stars] से भरा हुआ पाया ---- (8)
हम (आगे होने वाली चीज़ों की सुन-गुन लेने के लिए) पहले उस [आसमान] के कुछ स्थानों पर बैठ जाया करते थे, मगर अब जो कोई (चोरी-छुपे) सुनना चाहे, तो वह देखता है कि कोई आग की लौ है जो उसके घात में लगी हुई है---- (9)
(सो अब), हम नहीं जानते कि (हमारे ऊपर रोक लगा देने से) ज़मीन पर रहने वालों के साथ कोई बुरा मामला करने का इरादा किया गया है, या उनके रब ने उनके साथ भलाई का (व सीधा रास्ता दिखाने का) इरादा किया है।” (10)
हममें से कुछ अच्छे व नेक हैं और हम (ही) में से कुछ ऐसे (नेक) नहीं हैं: हम अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं। (11)
हम जानते हैं कि हम अल्लाह को ज़मीन में कभी भी आजिज़ [frustrate] नहीं कर सकते; हम उससे बचकर कहीं भाग भी नहीं सकते। (12)
जब हमने रास्ता दिखानेवाली (किताब) को सुना तो उस पर विश्वास कर लिया: फिर जो कोई अपने रब पर विश्वास कर लेता है, उसे न तो किसी नुक़सान से डरने की ज़रूरत है, और न किसी अन्याय से। (13)
हममें से कुछ तो उसी (अल्लाह) के सामने अपना सिर झुकाते हैं, और कुछ दूसरे हैं जो ग़लत रास्तों पर चलते हैं: जो (अल्लाह के) सामने अपना सिर झुकाते हैं, उन्होंने तो सूझ-बूझ की राह ढूँढ ली, (14)
मगर जिन्होंने (सच्चाई से मुँह मोड़ते हुए) ग़लत रास्ता अपना लिया, तो वे जहन्नम का ईंधन बनने वाले हैं।” (15)
(ऐ रसूल आप मक्का के लोगों से कह दें), अगर उन लोगों ने (सच्चाई का) सही रास्ता अपनाया होता, तो हमने उनके लिए बड़ी मात्रा में पीने का पानी उपलब्ध करा दिया होता। (16)
ताकि हम इस (नेमत के द्वारा) उनकी परीक्षा ले सकें और जो कोई आदमी अपने रब की याद से मुंह मोड़ेगा, तो वह [अल्लाह] उसे बहुत सख़्त अज़ाब [यातना] में डाल देगा। (17)
और यह कि सभी मस्जिदें अल्लाह के लिए (विशेष) हैं, सो उनमें अल्लाह के साथ किसी और की इबादत [पूजा] मत किया करो। (18)
और यह कि जब अल्लाह के बंदे (मुहम्मद सल्ल.) उसकी इबादत करने खड़े हुए तो (जिन्नों के) समूह के समूह वहाँ जमा हो गये (ताकि उनको क़ुरआन पढ़ते हुए सुन सकें), (19)
आप कह दें कि “मैं तो केवल अपने रब की इबादत करता हूँ और उसके साथ किसी को (ख़ुदायी में उसका) साझेदार या शरीक नहीं मानता” (20)
आप कह दें कि “न तुम्हारा कोई नुक़सान [यानी तुम्हारा सच्चाई से इंकार करना] मेरे अधिकार में है और न भलाई (यानी तुम्हारा सच्चाई पर विश्वास कर लेना]”, (21)
आप कह दें कि, “न मुझे कभी कोई अल्लाह के (हुक्म के विरुद्ध) अज़ाब [यातना] से बचा सकता है और न मैं उसे छोड़कर कोई पनाह की जगह पा सकता हूँ।" (22)
मगर अल्लाह की ओर से आदेश और संदेश पहुंचाना (मेरी ज़िम्मेदारी है), और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की बात न मानेगा, तो निश्चित रूप से इसके लिए जहन्नम की आग है जिसमें ऐसे लोग हमेशा रहेंगे। (23)
(और वे लोग बुराई पर अड़े रहेंगे) यहाँ तक कि जब वे (अज़ाब) देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जा रहा है, तो (उस समय) उन्हें पता चल जाएगा कि किसके मददगार कमज़ोर हैं और कौन संख्या में कम है। (24)
आप कह दें: “मैं नहीं जानता कि जिस (क़यामत के दिन) से तुम्हें डराया जा रहा है, वह क़रीब है या इसके लिए मेरे रब ने कोई लंबी अवधि निर्धारित कर रखी है,” (25)
(वही) सारे भेद का जानने वाला है, इसलिए वह अपने भेद के बारे में किसी (आम आदमी) को नहीं बताता, (26)
सिवाय किसी पैग़म्बर के जिसे उसने (इस काम के लिए) पसंद कर लिया हो, ऐसी सूरत में वह उस पैग़म्बर के आगे और पीछे (भेद की बातों की रक्षा के लिए) कुछ रक्षकों को लगा देता है, (27)
ताकि अल्लाह (यह) जान ले कि बेशक उनके (रसूलों) ने अपने रब के संदेश पहुंचा दिए, और (अल्लाह के आदेश और भेद की बातों के ज्ञान में से) जो कुछ उनके पास है, अल्लाह को (पहले से) इनकी सारी जानकारी है, और उसने हर एक चीज़ का हिसाब-किताब कर रखा है। (28)
नोट:
1: जिन्न आग से पैदा किए गए हैं जो हमें दिखायी नहीं देते।
2: मुहम्मद (सल्ल.) जिस तरह इंसानों के लिए पैग़म्बर [Prophet] बनाये गए थे, उसी तरह आप जिन्नों के लिए भी पैग़ंबर थे। आपने जिन्नों के बीच भी अल्लाह के संदेश को फैलाया। आपके नबी होने से पहले जिन्नो को आसमान के करीब तक पहुंचने दिया जाता था, लेकिन आपके नबी होने के बाद जब कोई जिन्न या शैतान आसमान के नजदीक पहुंचना चाहता, तो उसे एक शोले के द्वारा मार भगाया जाता था, जैसा कि सूरह अल-हिज्र (15: 17) और सूरह साफ़्फ़ात (37:10) में आया है। बुख़ारी की हदीस में है कि जिन्नों ने जब इस बदली हुई हालत को देखा तो इसका पता लगाने के लिए उनका एक दल दुनिया का दौरा करने के लिए निकला। यह वह समय था जब मुहम्मद साहब तायफ़ से वापस मक्का आ रहे थे और 'नख़ला' के स्थान पर पड़ाव डाले हुए थे, वहां आपने सुबह की नमाज़ में कुरआन पढ़ना शुरू किया तो जिन्नों का यह दल उस वक्त वहाँ से गुज़र रहा था, उसने जब यह वाणी सुनी तो उसे सुनने के लिए वे रुक गए। इस वाणी का उन पर ऐसा असर हुआ कि वे मुस्लिम हो गए और उन्होंने अपनी कौम के पास इस संदेश को पहुंचाया। इन आयतों में इसी घटना का वर्णन संक्षेप में किया गया है। इस घटना की तरफ़ एक इशारा सूरह अहक़ाफ़ (46: 30) में भी मिलता है। बाद में जिन्नों के कई प्रतिनिधि-मंडल दीन के बारे में बात करने के लिए मुहम्मद (सल्ल) के पास आए।
4: मतलब यह है कि सच्चाई से इंकार करना, अल्लाह के बराबर दूसरे (देवी-देवताओं) को ठहराना और अल्लाह के बारे में गलत धारणा रखने की बातें।
6: जाहिलियत के जमाने [Period of ignorance] में जब लोग अपनी यात्रा के दौरान किसी जंगल में डेरा डालते, तो उस जंगल के जिन्नों से शरण मांगते थे कि वे उन्हें हर तरह के प्राणियों से जंगल में सुरक्षा दे। जिन्नों ने जब इंसानों को ऐसा करते देखा तो उन्हें यह लगने लगा कि वे इंसानों से बढ़कर हैं। इस तरह उनकी गुमराही में और बढ़ोतरी हो गई।
7: यहां पर जिन्नों का एक समूह अपनी कौम के दूसरे जिन्नों से कह रहा हैं कि जिस तरह तुम आख़िरत [परलोक] को नहीं मानते थे, उसी तरह काफ़ी इंसान भी मरने के बाद की ज़िंदगी पर विश्वास नहीं करते थे, लेकिन अब यह बात गलत साबित हो गई।
8: आसमानों में फरिश्तों को पहरे पर लगा दिया गया है और जो जिन्न चोरी-छिपे फरिश्तों की बातें सुनने के लिए आसमान के नज़दीक जाता है, उसको फ़रिश्ते शोले फेंककर मार भगाते हैं।
11: इंसानों की तरह सभी जिन्नों का भी मजहब एक नहीं है, बल्कि जिन्नों में भी कई विचारधाराओं को मानने वाले होते हैं। इसीलिए उन्हें भी सही रास्ता दिखानेवाले की ज़रूरत थी, जिसे अल्लाह ने मुहम्मद साहब के द्वारा पूरा कर दिया।
17: जिन्नो की घटना सुनाकर अब मक्का वालों से कहा जा रहा है कि जिस तरह जिन्नों ने सच्चाई को मानते हुए मुहम्मद साहब की बातों पर विश्वास कर लिया, उसी तरह तुम्हें भी उन पर विश्वास कर लेना चाहिए। अगर तुमने ऐसा किया तो अल्लाह तुम पर बारिशों की नेमत भेज देगा। यहां बारिश का खासकर वर्णन इसलिए आया है कि उस वक्त मक्का में अकाल पड़ा हुआ था।
21: अर्थात असली मालिक अल्लाह है, रसूल तो अल्लाह और बंदे के बीच एक माध्यम हैं।
24: सूरह मरियम (19:73) में है कि काफ़िर लोग मुसलमानों से कहते थे कि हम लोग ताक़त और गिनती में तुम से कहीं ज़्यादा हैं। इस आयत में यह कहा गया है कि जब अल्लाह की यातना सामने आ जाएगी तो उस वक्त उन्हें पता चल जाएगा कि किसके मददगार कमज़ोर या संख्या में ज़्यादा हैं।
27: रक्षक [watchers] यानी वे फ़रिश्ते जो पैग़म्बर पर नज़र रखते हैं कि वह अल्लाह के संदेश को लोगों तक सही-सही पहुँचा दें।
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