सूरह 73: अल-मुज़म्मिल
[चादर से लिपटे हुए / Enfolded]
01-08: रात में उठकर क़ुरआन और नमाज़ पढ़्ना
09-14: सच्चाई पर विश्वास न करने वालों को अल्लाह पर छोड़ना
15-19: सच्चाई पर विश्वास करने की अपील और विरोध के नतीजे की चेतावनी
20 : रात में उठकर नमाज़ पढ़ने की अवधि में आसानी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ऐ चादर में लिपटे हुए [रसूल!] (1)
आप उठकर रात भर (नमाज़ में) खड़े रहा करें, मगर थोड़ी रात (आराम भी कर लिया करें), (2)
(नमाज़ के लिए) आधी रात या इससे थोड़ा कम कर लें, (3)
या इस (अवधि) से थोड़ा बढ़ा लें; और क़ुरआन ख़ूब ठहर-ठहरकर (साफ़-साफ़) पढ़ा करें। (4)
[ऐ रसूल!], हम जल्द ही आप पर एक भारी फ़रमान [क़ुरआन] उतारने वाले हैं, (5)
रात में उठकर की गयी इबादत, दिलों पर गहरा असर छोड़ती है, और (शांत माहौल में क़ुरआन के) शब्दों को सही ढंग से पढ़ना (और समझना) आसान होता है ----- (6)
दिन में लम्बे समय तक आप बहुत सारे कामों में व्यस्त रहते हैं ---- (7)
अत: आप अपने रब के नाम को (दिल और ज़बान से) याद करते रहें, और हर एक से अलग होकर पूरी भक्ति से बस उसी के हो रहें। (8)
वह पूरब और पश्चिम का मालिक है, उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं, सो उसी को (अपना) अभिभावक व रखवाला [protector] बना लें। (9)
जो कुछ वे [काफ़िर लोग] कहते रहते हैं, आप उन (बातों) पर धीरज रखें, और भले तरीक़े से उनका साथ छोड़कर किनारे हो जाएं, (10)
और उन लोगों को आप मुझ पर छोड़ दें, जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं और बड़े ऐश-आराम [luxury] में रहते हैं। कुछ और समय तक (उनके साथ नर्मी बरतें) और उन्हें बर्दाश्त कर लें; (11)
हमारे पास उनके लिए भारी बेड़ियाँ हैं, और (जहन्नम की) भड़कती हुई आग है, (12)
गले में अटक जाने वाला खाना है, और उनके लिए बहुत दर्दनाक यातना [अज़ाब] है, (13)
उस दिन जब ज़मीन और पहाड़ ज़ोर से हिलने लगेंगे। सारे पहाड़ बिखरी हुई रेत के टीले बन जाएंगे, (14)
[ऐ मक्का वासियो!] बेशक हमने तुम (लोगों) के पास एक रसूल [मोहम्मद] भेजा है जो तुम्हारे मामले में गवाह होगा, जैसाकि हमने फ़िरऔन [Pharaoh] की तरफ एक रसूल [मूसा] को भेजा था, (15)
मगर फ़िरऔन ने हमारे रसूल [मूसा] का कहना मानने से इंकार किया, सो हमने उसको तबाह कर देने वाली चपेट में धर-दबोचा। (16)
अगर तुम भी (हमारी बातों को मानने से) इंकार करते रहे, तो उस दिन (की यातना) से अपने आपको कैसे बचा पाओगे, जो बच्चों को बूढ़ा कर देगी, (17)
वह दिन, जब आसमान को फाड़ दिया जाएगा? अल्लाह का वादा तो ज़रूर पूरा होकर रहेगा। (18)
यह [क़ुरआन] एक नसीहत [Reminder] है। अब जो कोई चाहे, अपने रब तक पहुंचने का रास्ता अपना ले। (19)
[ऐ रसूल], आपका रब अच्छी तरह जानता है कि आप कभी-कभी दो तिहाई रात के करीब (तह्ज्जुद की नमाज़ में) खड़े होते हैं ----- और (कभी) आधी रात और (कभी) एक तिहाई रात (नमाज़) पढ़ते हैं ---- आपके (पीछे चलने वाले) साथियों में से भी कुछ लोग हैं जो ऐसा ही करते हैं।
अल्लाह ही रात और दिन (के घटने और बढ़ने) का सही अंदाज़ा रखता है। वह जानता है कि तुम कभी उसका ठीक-ठीक हिसाब नहीं रख सकोगे, तो उसने तुम सब पर (कष्ट में कमी करके) मेहरबानी कर दी, सो जितना आसानी से हो सके, क़ुरआन पढ़ लिया करो,
वह जानता है कि तुममें से (कुछ लोग) बीमार होंगे और (कुछ) दूसरे लोग ऐसे होंगे जो अल्लाह के फज़ल [bounty] की खोज में (काम-काज के लिए) ज़मीन पर इधर-उधर यात्रा कर रहे होंगे, और (कुछ) अन्य लोग अल्लाह की राह में युद्ध कर रहे होंगे: सो जितना आसानी से हो सके उतना (ही) पढ़ लिया करो,
पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, ज़कात [alms] देते रहो, और अल्लाह को क़र्ज़ दिया करो, अच्छावाला क़र्ज़!,
जो कुछ भलाई व नेकी तुम अपने लिए जमा करते हो, उसके बदले तुम्हें अल्लाह के पास कहीं बेहतर और ज़्यादा इनाम मिलेगा,
और अल्लाह से माफी मांगते रहो, (विश्वास रखो) अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला और बेहद रहम करने वाला है। (20)
नोट:
1: "ऐ चादर में लिपटे हुए", यह प्यार भरा
संबोधन मुहम्मद साहब (सल्ल.) के लिए है (74:1)। हिरा नामक गुफा में जब आप पर पहली बार
अल्लाह का संदेश उतारा गया, तब आप बुरी तरह घबरा गए और घर पहुंचते ही अपनी बीवी
खदीजा (रज़ि.) से कहने लगे कि "मुझे चादर उढ़ा दो, मुझे चादर उढ़ा दो।"
2: इस आयत में रात में उठकर पढ़ी जाने वाली नमाज़ [तहज्जुद] का आदेश दिया गया
है। ऐसा माना जाता है कि यह नमाज न केवल मुहम्मद साहब पर बल्कि उनके सभी साथियों
पर फ़र्ज़ [ज़रूरी] कर दी गई थी, और इसकी अवधि कम से कम एक तिहाई रात तय की गई थी।
शायद यह सिलसिला 1 साल तक चला, बाद में इसी सूरह की आयत 20 उतरी जिसमें रात
में उठकर पढ़ी जाने वाली नमाज की अवधि में आसानी कर दी गई, और अब यह नमाज़ ज़रूरी [फ़र्ज़] नहीं रह गई।
6: रात को उठकर नमाज पढ़ने से अपने मन की इच्छाओं पर क़ाबू पाना आसान हो जाता है।
8: सबसे अलग हो रहने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया के सारे रिश्ते-नाते छोड़ दो, बल्कि भक्ति केवल अल्लाह के लिए ही होनी चाहिए।
10: मक्का की ज़िंदगी में हमेशा यही हुक्म दिया गया कि (सच्चाई पर) विश्वास न
करनेवालों की तकलीफ़ पहुंचाने वाली बातों पर धीरज से काम लें, और उनसे लड़ाई करने के बजाय ख़ूबसूरती से अलग हो जाएं।
20: यह आयत, बाक़ी आयतों (1--19) के कम से कम एक साल बाद उतरी थी, इसके द्वारा रात में उठकर पढ़ी जाने वाली नमाज़ [तह्ज्जुद] के हुक्म में आसानी
पैदा की गई। शुरू में यह नमाज़ रात के एक तिहाई अवधि तक पढ़नी पड़ती थी। उस समय घड़ी
न होने के कारण मुहम्मद साहब और उनके कुछ साथी यह नमाज़ कभी आधी रात तक और कभी
दो-तिहाई रात की अवधि तक पढ़ते थे। इस आयत के बाद इस नमाज़ को पढ़ना ज़रूरी नहीं रहा, मगर जितनी देर आसानी से हो सके, पढ़ना बहुत अच्छा माना जाता है। वैसे इसका सबसे बेहतर समय रात के पिछले पहर
उठकर पढ़ने का है।
"ज़कात" यानी ग़रीबों और ज़रूरतमंदों को दान करना।
"अच्छावाला क़र्ज़" का मतलब बिना दिखावा किए और केवल अल्लाह की ख़ुशी के लिए देना (2:245; 5:12; 30:39;57:11; 64:17).
No comments:
Post a Comment