Sunday, July 14, 2013

विषय परिचय

विषय परिचय

हज़रत मोहम्मद (सल.) का जन्म क़रीब 570 ई0 में मक्का में हुआ. 40 साल की उम्र में उन पर पहली बार क़ुरआन की आयत उतरी और उसके बाद से क़रीब 23 साल तक क़ुरआन के हिस्से ज़रूरत के मुताबिक़ थोड़ी थोड़ी मात्रा में अल्लाह की तरफ से उतरते रहे.  मोहम्मद (सल.) पढे लिखे आदमी नहीं थे और 40 साल की उम्र तक किसी ने उन्हें मक्का में किसी प्रकार का भाषण देते हुए नहीं देखा था जिसमें ज्ञान की ऐसी बड़ी बड़ी बातें कही गयीं हों जैसा कि नबी होने के बाद उनकी ज़बान से कही गयीं. हाँ, उनकी पहचान एक सच्चे आदमी की ज़रूर थी जो हमेशा सच बोलने वाले थे, जो वादा करते उसे निभाते, उस ज़माने की तमाम बुराइयों से दूर रहते, किसी की अमानत अगर उनके पास होती तो उसे ज्यों का त्यों रखते. इसी वजह से उन्हें “अल- अमीन” कहा जाता था.
अरब प्रायद्वीप की भूगौलिक हालत ऐसी है कि वह जगह मरूस्थल और पहाड़ियों से भरी है और खेती-बाड़ी के लायक़ नहीं है. ज़्यादातर वहाँ की जनजातियाँ ख़ानाबदोश थी और अपने मवेशियों के साथ यहाँ वहाँ घूमती रहती थीं. लोग छोटे छोटे क़बीलों में बँटे हुए थे और उन सबकी loyalty सबसे ज़्यादा अपने क़बीले के प्रति थी. कहीं कहीं छोटी बस्तियाँ बस गयी थीं और कुछ शहर भी आबाद हो गए थे जहाँ व्यापारियों के कई क़बीले बस गए थे जो व्यापार के लिये दूर दराज़ इलाक़ों में कारवाँ बनाके जाते थे.
मक्का शहर की खास अहमियत थी. क़ुरआन के मुताबिक़ हज़रत इब्राहीम (अलै.) और उनके बेटे इस्माइल (अलै.) ने मिलकर मक्का में “काबा” यानी अल्लाह के घर का निर्माण किया था. हज़रत इस्माइल (अलै.) की नस्लें अरब में ही बसी थीं और पुराने ज़माने से मक्का एक तीर्थ स्थान माना जाता था. इसतरह दूर दूर से लोग इस शहर में बराबर आते जाते थे. यहाँ ख़ास ख़ास मौक़े पर मेले ठेले भी लगते थे जहाँ काफी लोग जमा होते थे. इस मौक़े पर शेर ओ शायरी की महफिलें भी सजती थीं. बड़े बड़े शायर अपने कलाम सुनाते और उन्हें अपनी अरबी ज़बान की महारत पर बड़ा घमंड था.  इस शहर की एक खास बात इसका व्यापारिक मार्ग पर होना भी था. यमन इसके दक्षिण में है जहाँ से व्यापारियों के कारवाँ चलते थे जो मक्का होते हुए उत्तर में सीरिया तक जाया करते थे. मक्का चूँकि बीच रास्ते में पड़्ता था इसलिए वहाँ व्यापारियों के कई क़बीले बस गए थे.
यूँ तो अरब में ख़ास ख़ास इलाक़ों में ईसाइ और यहूदी लोग भी बसे हुए थे जैसे “नजरान”के इलाके में ईसाइयों के क़बीले थे, इसी तरह “यसरिब” (यानी मदीना) में यहूदियों की अच्छी संख्या थी. मगर कुल मिलाकर देखा जाए तो ज़्यादातर लोग मूर्ति पूजा करने वाले थे और ख़ास कर मक्का में इन लोगों की तादाद सबसे अधिक थी जहाँ सैंकड़ों मूर्तियाँ स्थापित थीं. हाँ, छोटी संख्या में कुछ लोग ऐसे भी थे जो मूर्ति पूजा नहीं करते थे और एक अल्लाह को मानते थे जिन्हें “हनीफ” कहा जाता है.
मूर्ति पूजक लोग भी हालाँकि अल्लाह के concept से परिचित थे कि अल्लाह ही ने दुनिया बनायी है और उसी के दम से दुनिया की व्यव्स्था चल रही है आदि. पर, उनका ऐसा मानना था कि देवताओं में भी शक्तियाँ होती हैं और बहुत सारे मामलों में वे भी अल्लाह के साझीदार हैं. इस विचार को वे नहीं मानते थे कि एक दिन दुनिया ख़त्म हो जाएगी और सभी मरे हुए लोगों को फिर से ज़िंदा किया जाएगा और अल्लाह के सामने उनका हिसाब- किताब होगा और आदमी के कर्मों के अनुसार जन्नत या जहन्नम में जाना होगा जो परलोक में आदमी का अंतिम ठिकाना होगा.
मक्का में शुरू शुरू ज़माने में हुज़ूर पर ज़्यादातर छोटी छोटी सूरह उतरीं जिनमें इस्लाम के बुनियादी नियमों को बताया गया था. क़ुरआन की ज़बान में एक हैरतअंगेज़ हुस्न था, एक अजीब सी लय थी, कहने के अंदाज़ में बेपनाह ज़ोर था और कुछ ऐसी कशिश थी कि अरब के वे लोग जो अपनी ज़बान पर इतना गर्व करते थे जब क़ुरआन सुनते तो उसके असर से हैरान रह जाते! कितने ही लोग ऐसे थे जिन्होंने इस कलाम को सुनते ही इस्लाम क़ुबूल कर लिया. आहिस्ता आहिस्ता इस्लाम के मानने वालों की संख्या बढ्ने लगी और काफी घरों में एक एक करके लोग मुसलमान होने लगे लेकिन इसके साथ ही साथ इनलोगों पर ज़ुल्म और ज़्यादतियाँ भी बढने लगीं, उन्हें तरह तरह से सताया जाने लगा, उनका हुक़्क़ा पानी बंद कर दिया गया और इस तरह मजबूर किया गया कि उनलोगों को मक्का छोड़ कर हब्शा (इथोपिया) में पनाह लेनी पड़ी और फिर आख़िर में मक्का से हिजरत करके मदीना जाना पड़ा.
मोहम्मद (सल.) के मदीना जाने से (हिजरत) से पहले तक मक्का में जितनी सूरह उतरीं, उन्हें “मक्की” सूरह कहते हैं. आगे आपके सामने सूरह 67 से लेकर आख़िर तक यानी सूरह 114 तक के अनुवाद इंशाअल्लाह सामने आएंगे जो ज़्यादतर मक्की ज़माने में उतरीं सूरह हैं और इनके विषय भी मिलते जुलते हैं.

मैंने अनुवाद के लिये हर तरह की सोच रखने वाले जमायतों की मुस्तनद किताबों का इस्तेमाल किया है और अपनी राय का कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया है. सभी से अनुरोध है कि अनुवाद में होने वाली त्रूटियों से ज़रूर अवगत कराएं ताकि उन्हें ठीक किया जा सके. आप अपने कमेंट्स अंग्रेज़ी में भी लिख सकते हैं. शुकिया!!

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