Saturday, January 30, 2016

सूरह 41 : फ़ुस्सिलत/अस-सज्दा [स्पष्ट आयतें, Verses made distinct]


सूरह 41: फ़ुस्सिलत/अस-सज्दा 
[स्पष्ट आयतें, Verses made distinct]


02-03: यह क़ुरआन अरबी में है

04-08: अल्लाह के रसूल और उनका संदेश 

09-12: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

13-18: 'आद' और 'समूद' की मिसालें 

19-23: कर्मों का हिसाब-किताब

24-25: विश्वास न करने वालों की हठधर्मी 

26-28: विश्वास न करने वाले क़ुरआन का मज़ाक़ उड़ाते हैं 

29-32: कर्मों का हिसाब-किताब: फ़ैसले का दृश्य 

33-36: रसूल को सलाह 

37-40: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

41-44: रसूल पर 'वही'[revelation] का आना पहले के नबियों जैसा है

   45: मूसा (अलै) की किताब पर भी मतभेद 

   46: हर एक अपने कर्म के लिए ज़िम्मेदार है

47-48: कर्मों के हिसाब-किताब का दृश्य 

49-51: लोग नाशुक्रे हैं 

   52: विश्वास न करना एक संजीदा मामला है 

53-54: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

 



अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

हा॰ मीम॰ (1)

सब पर मेहरबानी करने वाले, बेहद दयावान [रब] की ओर से यह (किताब) उतारी [reveal] जा रही है;  (2)

अरबी में क़ुरआन के रूप में एक ऐसी किताब, जिसकी आयतों को स्पष्ट और अलग पहचानवाली बनाया गया है, उन लोगों के लिए जो समझ-बूझ रखते हैं,  (3)

जो अच्छी ख़बर देने वाली और सावधान करने वाली (किताब) है। फिर भी उनमें से अधिकतर लोगों ने इससे मुँह मोड़ रखा है, सो वे सुनते ही नहीं हैं। (4)

वे [रसूल से] कहते हैं कि "जिस चीज़ (पर विश्वास कर लेने) के लिए तुम हमें बुलाते हो, उसके ख़िलाफ़ तो हमारे दिलों पर परत चढ़ी हुई है; हमारे कान बहरे हैं; हमारे और तुम्हारे बीच (रोक के लिए) एक पर्दा है। अतः तुम जो कुछ चाहते हो करो, हमें जो अच्छा लगेगा वह हम करेंगे।" (5)

[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं तो तुम्हारे जैसा ही एक इंसान हूँ, (मगर) मुझ पर यह बात उतारी गयी है कि तुम्हारा ख़ुदा असल में एक ही ख़ुदा है। अतः तुम उसी (ख़ुदा) की ओर जाने वाले सीधे रास्ते को अपनाओ और उसी से (गुनाहों की) माफ़ी माँगो। बड़ी तबाही है उन [मुशरिकों/Idolaters] की, जो एक अल्लाह के साथ (दूसरों को) उसका साझेदार [Partner] ठहराते हैं, (6)

जो ज़कात [दान] नहीं देते और आने वाली दुनिया [आख़िरत/Hereafter] को मानने से इंकार करते हैं!  (7)

वे लोग जो ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते रहते हैं, तो उनके लिए (बदले में) ऐसा इनाम है जिसका सिलसिला कभी टूटने वाला नहीं।" (8)
 

कह दें, "तुम उस (अल्लाह) का इंकार कैसे कर सकते हो, जिसने धरती को दो दिनों [कालों] में पैदा किया? तुम दूसरों को उस (अल्लाह) के बराबर का कैसे ठहरा सकते हो? वह तो सारे संसारों का पालनहार है!  (9)

उसने उस (धरती) में ठोस पहाड़ों को जमा दिया जो उभरे रहते हैं, और उसके अंदर (खनिज पदार्थ आदि से) बरकत [blessing] डाल दी, और उसमें उन सब के लिए जो उन्हें पाना चाहते हों, ठीक अंदाज़े के साथ क़िस्म-क़िस्म के खाने-पीने व जीवन जीने के सामान रख दिए --- और यह सब कुछ चार दिन [काल] में हो गया। (10)

फिर उस [अल्लाह] ने आसमान की ओर ध्यान दिया, जो कि उस समय मात्र धुआँ था-- और उसने उस [आसमान] से और ज़मीन से कहा, 'चले आओ (हमारा आदेश मानते हुए), खुशी के साथ या अनिच्छा से।' उन्होंने कहा, 'हम ख़ुशी-ख़ुशी आते हैं--- '  (11)

और उसने दो दिनों में (अपने फ़ैसले के मुताबिक़) सात आसमानों को बना डाला, और प्रत्येक आसमान में उस (की व्यवस्था) से सम्बन्धित आदेश भेज दिए। हमने इस दुनिया से सबसे नज़दीक वाले आसमान को दीपों [तारों व ग्रहों] से सजाया और उसे ख़ूब सुरक्षित कर दिया। ऐसी है व्यवस्था, अत्यंत प्रभुत्वशाली और सब कुछ जानने वाले (रब) की।" (12)


(फिर भी) अगर वे लोग ध्यान न दें और मुँह मोड़ें तो आप कह दें, "मैंने तुम्हें उस कड़कदार धमाके [thunderbolt] से सावधान कर दिया है, जैसा धमाकाआद और समूदपर आ पड़ा था": (13)

जब उन लोगों के पास रसूलों के संदेश आए, (कभी) उनके आगे से और (कभी) उनके पीछे से [हर दृष्टिकोण से उन्हें समझाया गया] कि "अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो", मगर उन्होंने कहा, "अगर हमारा रब चाहता तो उसने फ़रिश्तों को भेज दिया होता। अतः जिस संदेश के साथ तुम्हें भेजा गया है, हम उस पर विश्वास नहीं करते।" (14)

आद' की क़ौम के लोग ज़मीन पर हर जगह घमंड में चूर रहे और वह सब किया जिसका उन्हें कोई अधिकार न था, और कहते थे, "कौन है जो हमसे शक्ति में बढ़कर है?" क्या उन्हें यह नहीं सूझा कि जिस अल्लाह ने उन्हें पैदा किया, वह उनसे शक्ति में कहीं बढ़कर है? वे हमारी आयतों को मानने से इंकार ही करते रहे,  (15)

सो हमने उन लोगों पर कुछ दिनों के लिए (तबाह कर देने वाली) एक अत्यंत तेज़ आँधी छोड़ दी, ताकि उन्हें सांसारिक जीवन में अपमानित करने वाली यातना का मज़ा चखा दें; हालाँकि आने वाले जीवन [आख़िरत/परलोक] की यातना तो इससे कहीं बढ़कर अपमानित करने वाली होगी, और उनको कोई सहायता भी नहीं दी जाएगी। (16)

और रहे 'समूद' (के लोग), तो हमने उन्हें सीधा मार्ग दिखाया था, मगर सही मार्ग अपनाने के बजाए उन्होंने अन्धा रहना ही ज़्यादा पसन्द किया। नतीजा यह हुआ कि जो कुछ (बुरे कर्मों की) कमायी वे करते रहे थे, उसके बदले में एक कड़कदार धमाके ने उन्हें जकड़ लिया जो बेइज्ज़त कर देने वाला दंड था।  (17)

और हमने उन लोगों को बचा लिया जो (अल्लाह में) विश्वास [ईमान] रखते थे और बुरे कामों से बचते थे। (18)



एक दिन आएगा, जब अल्लाह के शत्रुओं को इकट्ठा करके (जहन्नम की) आग की ओर हँकाया जाएगा, फिर उन्हें श्रेणियों में बाँटकर खड़ा किया जाएगा, (19)

यहाँ तक कि जब वे उस (आग) के पास पहुँच जाएँगे, तो उनके कान, उनकी आँखें और उनकी खालें उनके विरुद्ध उन बातों की गवाही देंगी, जो कुछ (बुरे कर्म) वे करते रहे थे। (20)

वे अपनी खालों से कहेंगे, "तुमने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी?" वे कहेंगी, "हमें उसी अल्लाह ने बोलने की शक्ति दी है, जिसने हर चीज़ को बोलने की ताक़त दी है-- उसी ने तुम्हें पहली बार पैदा किया और उसी के पास तुम्हें वापस लाया गया है--  (21)

तब भी, तुमने अपने आपको अपने कानों से, अपनी आँखों से और अपनी खालों से छुपाने की कोशिश नहीं की, ताकि तुम अपने कानों, आँखों और खालों को अपने ही विरुद्ध गवाही देने से रोक पाते। तुमने तो यह समझ रखा था कि अल्लाह तुम्हारे बहुत-से कामों को जानता ही नहीं है जो कुछ तुम करते रहे थे, (22)


इस तरह, अपने रब के बारे में जो तुमने एक (ग़लत) सोच पाल रखी थी, वही तुम्हें बर्बादी की ओर ले गयी, और तुम उन लोगों में शामिल हो गए जो पूरी तरह घाटे में पड़ गए।” (23)

अब चाहे वे धीरज रखते हुए (यातना) झेलने के लिए तैयार हों, तब भी (जहन्नम की) आग ही उनका ठिकाना है, और अगर वे अपनी ग़लतियों को सुधारने के लिए मौक़ा दिए जाने का निवेदन करें, तब भी उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।  (24)


हमने (दुनिया में) उन (विश्वास न रखने वालों) के लिए कुछ साथियों [शैतानों] को नियुक्त कर दिया है जो उनके बीते हुए कल और आज के समय को इस तरह दिखाते हैं, जो उनको सही और सुहावना लगने लगता है, मगर उनके लिए सज़ाओं का फ़ैसला पहले ही तय हो चुका है, इनमें जिन्नों और इंसानों की वे पीढ़ियाँ भी शामिल हैं जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं: वे घाटा उठानेवालों में से थे।  (25)


जिन लोगों ने इंकार किया, उन्होंने (एक दूसरे से) कहा, "इस क़ुरआन को सुनो ही मत; और (अगर कोई इसे सुना रहा हो तो) इसके बीच में बेकार बातों से हल्ला-ग़ुल्ला मचा दिया करो, ताकि तुम अपनी बड़ाई बनाए रख सको।" (26)


अतः हम अवश्य ही विश्वास न रखनेवालों को कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे। हम उनके कर्मों का बदला, उनके द्वारा किए गए सबसे बुरे कर्मों के हिसाब से देंगे---  (27)


अल्लाह के दुश्मनों के लिए यही (उचित) बदला है--– (जहन्नम की) आग ही उनके लिए हमेशा रहने का ठिकाना होगा, हमारी आयतों को ठुकराने की यही मज़दूरी है। (28)


जिन लोगों ने इंकार किया [काफिर], वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमें उन जिन्नों और आदमियों को दिखा दे, जिन्होंने हमको रास्ते से भटका दिया था, ताकि हम उन्हें अपने पैरों तले ऐसा कुचल डालें कि वे सबसे नीचे वालों में जा पड़ें।”  (29)


(दूसरी तरफ़) जिन लोगों ने कहा कि "हमारा रब अल्लाह है", फिर उसकी तरफ़ जाने वाले सीधे रास्ते पर जमे रहे, तो बेशक उन पर फ़रिश्ते (यह कहते हुए) उतरेंगे कि "अब न दिल में कोई डर रखो और न किसी बात पर दुखी हो, बल्कि उस जन्नत (के पाने) की ख़ुशियाँ मनाओ, जिसका तुमसे वादा किया जाता था। (30)


हम इस संसार में भी और आने वाली दुनिया [आख़िरत] में भी, तुम्हारे दोस्त व मददगार हैं, और वहाँ [जन्नत में] तुम्हारे दिल में जिस चीज़ की भी इच्छा होगी और जिस चीज़ की भी तुम माँग करोगे, तुम्हारे लिए वह सब कुछ (हाज़िर) होगा---- (31)

एक तोहफ़े के रूप में, जो तुम्हारे स्वागत में सबसे ज़्यादा माफ़ करनेवाले और बड़ी मेहरबानी करने वाले [रब] की तरफ़ से दिया जाएगा।" (32)


बातचीत करने में उस आदमी से अच्छा कौन हो सकता है जो लोगों को अल्लाह की ओर बुलाए, और अच्छे कर्म करे और कहे, "मैं उन लोगों में से हूँ जो एक अल्लाह पर पूरी भक्ति से झुकनेवाले [मुस्लिम] हैं?" (33)

अच्छाई और बुराई के काम बराबर नहीं हो सकते। [ऐ रसूल], आप बुराई [बुरे व्यवहार] का जवाब अच्छे से अच्छे व्यवहार से दिया करें, और आप देखेंगे कि आपका दुश्मन भी आपके पुराने और घनिष्ठ दोस्त जैसा हो गया,  (34)


मगर केवल वही लोग ऐसी अच्छाई (के मुक़ाम) तक पहुँचेंगे, जो धीरज रखते हुए (भलाई के) काम में लगे रहते हैं, और जिन पर (अल्लाह ने) नेकी के रास्ते पर चलने के लिए ख़ास करम [blessing] किया है। (35)


अगर शैतान (तुम्हारे ग़ुस्से को) इस तरह से उकसा दे कि तुम भड़क उठो, तो अल्लाह की शरण [पनाह] माँग लिया करो: वह सब कुछ सुनता है और सब जानता है।  (36)



यह रात, यह दिन, यह सूरज, यह चाँद, ये तो उस (अल्लाह) की केवल चंद निशानियाँ हैं। सूरज या चाँद के आगे पूजा करने के लिए मत झुक जाया करो, बल्कि उस अल्लाह के सामने सिर झुकाओ, जिसने उन्हें पैदा किया, अगर सचमुच तुम उसी (अल्लाह) की बन्दगी करते हो।  (37)

अगर विश्वास न रखनेवाले [काफ़िर], इतने ही घमंडी हैं (कि मेरे सामने झुक नहीं सकते), [तो याद रखें, ऐ रसूल, कि], आपके रब के पास जो (फ़रिश्ते) हैं, वे रात-दिन बिना थके व उकताए हुए उसका गुणगान करते ही रहते हैं।  (38)

उसकी अन्य निशानियों में यह भी है: तुम देखते हो कि धरती (सूखे से) मुरझाई पड़ी है; फिर ज्यों ही हमने उस पर पानी बरसाया कि उसमें हलचल आ गयी और फिर फलने-फूलने लगी। हक़ीक़त यह है कि जिसने उस (मुरझाई हुई) धरती को फिर से ज़िंदा कर दिया, वही मुर्दों को भी (क़यामत में दोबारा) ज़िंदा करने वाला है। वह हर चीज़ (करने) की ताक़त रखता है।  (39)


जो लोग हमारी आयतों (के मतलब) के साथ छेड़-छाड़ करते हैं, वे हमसे छिपे हुए नहीं हैं। भला बताओ कि जो आदमी जहन्नम की आग में झोंक दिया जाए, वह अच्छा है या वह जो क़यामत के दिन बिना किसी डर-भय के आराम से आएगा? तुम्हारा जो जी चाहे वह करो, मगर तुम जो भी करते हो, याद रखो कि अल्लाह हर काम को देख रहा है। (40)


जिन लोगों ने क़ुरआन (की नसीहतों) को मानने से इंकार किया, जब वह उनके बीच (चर्चा में) आयी -- हालाँकि वह एक बड़ी इज़्ज़तवाली (व हर तरह की त्रुटियों से दूर) किताब है!, (41)


जिसे असत्य (न आगे से और न पीछे से) किसी भी तरफ़ से छू भी नहीं सकता; यह उस [रब] की ओर से उतारी गयी है जो बहुत समझ-बूझ रखनेवाला और हर प्रशंसा के योग्य है--  (42)


(आप इस बात को याद रखें, ऐ रसूल! कि) आपसे ऐसी कोई बात नहीं कही जा रही है, जो आप से पहले गुज़र चुके रसूलों को नहीं कही गयी थीं: आपका रब तो (गुनाहों की) माफ़ी देनेवाला रब है, मगर (साथ में) वह दर्दनाक दंड देनेवाला भी है। (43)


यदि हम इस (क़ुरआन) को अरबी छोड़कर किसी दूसरी भाषा में लाते, तो वे कहते कि "काश, कि उसकी आयतें (हमारी भाषा में) स्पष्ट तरीक़े से बयान की जातीं! यह क्या? कि वाणी तो किसी अलग भाषा में है और आदमी अरबी?" कह दें, "जो लोग ईमान रखते हैं, उन लोगों के लिए यह (क़ुरआन) तो सही रास्ता दिखाने वाली और दर्द पर मरहम लगाने वाली है, किन्तु जो लोग (एक अल्लाह में) विश्वास नहीं रखते, उनके कानों पर यह (क़ुरआन) बोझ है, वे इस पर थोड़ा भी ध्यान नहीं देते, ऐसा लगता है मानो उनको किसी बड़े दूर की जगह से पुकारा जा रहा हो।" (44)

हमने मूसा [Moses] को भी किताब दी थी, पर उसमें भी झगड़े निकाले गए--- अगर पहले ही उस (फ़ैसले के समय) पर तुम्हारे रब की ओर से फ़रमान जारी न हो गया होता, तो उनके बीच अब तक फ़ैसला हो चुका होता —--- और हक़ीक़त यह है कि वे अभी तक उस (क़ुरआन) के बारे में ऐसे सन्देह में पड़े हुए हैं जो उलझन में डाल देने वाला है।  (45)


जिस किसी ने अच्छा कर्म किया तो अपने ही फ़ायदे के लिए किया और जिस किसी ने बुराई की, तो अपने ही नुक़सान के लिए की: तुम्हारा रब अपने बंदों पर कभी भी नाइंसाफ़ी नहीं करता।  (46)


(क़यामत की आने वाली) घड़ी की जानकारी केवल अल्लाह को ही है, और बिना उसकी जानकारी के न तो कोई फल अपने शगूफ़े [कोष/ sheath] से निकलता है, न कोई मादा गर्भवती होती है, और न ही बच्चा जनती है। जिस दिन वह उन (काफ़िरों) से पूछेगा, "कहाँ हैं मेरी (ख़ुदायी के) साझेदार [Partner]?" वे जवाब देंगे, "हम तेरे सामने इस बात को स्वीकार करते हैं कि हममें से कोई भी उन [गढ़े हुए साझेदारों] को देख नहीं पा रहा है": (47)


जिन ख़ुदाओं को वे पहले पुकारा करते थे, वह सब वहाँ से ग़ायब हो चुके होंगे; और वे समझ लेंगे कि उनके लिए अब कोई भागने की जगह नहीं है।  (48)


आदमी का हाल यह है कि वह (अपने लिए) भलाई माँगने से नहीं थकता, किन्तु अगर उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है, तो वह निराश होकर आस छोड़ बैठता है।  (49)

उसकी तकलीफ़ व परेशानी के बाद, जब कभी हम उसे अपनी थोड़ी सी रहमत [दयालुता] का मज़ा उठाने देते हैं, तो वह यह बात ज़रूर कहता है, "यह सब तो मेरी ही कोशिशों का नतीजा है: मैं नहीं समझता कि क़यामत की घड़ी कभी आने वाली है, लेकिन अगर मुझे अपने रब की ओर वापस ले जाया भी गया, तो अवश्य ही उसके पास मेरे लिए सबसे अच्छा इनाम होगा।" मगर हम उन काफ़िरों को ज़रूर बताएंगे जो कुछ कर्म उन्होंने किए होंगे, और हम उन्हें अवश्य ही कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे।  (50)

जब कभी हम आदमी पर अपनी ख़ास कृपा करते हैं तो वह मुँह मोड़ लेता है और अकड़कर हम से दूर चला जाता है, लेकिन जैसे ही उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है, तो वह लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करने लगता है। (51)

[ऐ रसूल] कह दें, "क्या तुमने कभी विचार किया, कि अगर यह उतारी हुई (क़ुरआन की) आयतें सचमुच अल्लाह की ओर से ही हुईं, और इसके बावजूद तुमने उसको मानने से इंकार कर दिया? तो उससे बढ़कर भटका हुआ और कौन हो सकता है जो (अल्लाह से) अपने संबंध काटकर दूर जा पड़ा हो?" (52)


हम उन्हें पृथ्वी के हर एक क्षेत्र में अपनी निशानियाँ दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उन पर यह बात खुलकर सामने आ जाएगी कि यह (क़ुरआन) सत्य है। क्या यह बात काफ़ी नहीं कि तुम्हारा रब सारी चीज़ों का गवाह है?  (53)

तब भी उन्हें इस बात पर संदेह है कि सचमुच उन्हें अपने रब से मिलना होगा; सचमुच, अल्लाह (की जानकारी और ताक़त) हर चीज़ पर छायी हुई है।  (54)


नोट:

10: जैसा कि पिछली आयत में कहा गया कि दो दिन में ज़मीन पैदा की गयी और दो दिन में इस ज़मीन पर पहाड़ और दूसरी ज़रूरत की चीज़ें और खाने-पीने का सामान पैदा किया गया। इस तरह ज़मीन और उसके ऊपर की चीज़ें बनाने में कुल चार दिन लगे, और दो दिन में सातों आसमान पैदा किए गए। इस तरह, पूरी कायनात बनाने में कुल छ: दिन लगे;  देखें सूरह सज्दा (32: 4). मगर अल्लाह के दिन की गिनती हमारे हिसाब की तरह नहीं होती; देखें सूरह हज्ज (22:47). 


11: "चले आओ...  ख़ुशी से या अनिच्छा से।" यानी ज़मीन व आसमान को अल्लाह ने इंसानों की तरह आज़ादी नहीं दी है कि अगर किसी चीज़ को करने की इच्छा नहीं है, तो न करे,  बल्कि उसे वह काम करना ही होगा, चाहे मन से करे या बेमन से। 


20: शुरू में मुश्रिक लोग [Idolaters] झूठ बोल जाएंगे कि उन्होंने कभी अल्लाह के साथ किसी को साझेदार नहीं बनाया था, जैसा कि सूरह अना'म (6: 23) में है। फिर अल्लाह ख़ुद उन्हीं के जिस्म के अंगों से उनके ख़िलाफ़ गवाही दिलवाएगा। 


25: "साथियों" को नियुक्त किया है.... देखें सूरह ज़ुख़रुफ़ (43:36), और सूरह क़ाफ़ (50: 27).




Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...