सूरह 55: अर-रहमान
[रहम करनेवाला रब, The Lord of Mercy]
01-32: अल्लाह की नेमतें [Blessings]
33-45: गुनाहगारों की सज़ा: जहन्नम
46-78: नेक व अच्छे लोगों का इनाम: (जन्नत के) दो बाग़
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
वह तो रहम करनेवाला रब [रहमान] है (1)
जिसने क़ुरआन को पढ़ना (और समझना) सिखाया। (2)
उसी ने आदमी को पैदा किया (3)
और उसे अपनी बात कहना और दूसरे की बात समझना सिखाया। (4)
सूरज और चाँद एक हिसाब के मुताबिक़ अपने-अपने रास्ते [courses] पर चलते हैं; (5)
पौधे और पेड़ उस(की इच्छा) के आगे झुके रहते हैं; (6)
उसने आसमान को ऊँचा किया। उसने संतुलन [balance] स्थापित किया (7)
ताकि तुम उस संतुलन में बिगाड़ न पैदा कर सको: (8)
न्याय के साथ वज़न करो और तौलने में कमी न करो। (9)
धरती को उसने सभी जीव-जंतुओं [creatures] के लिए (रहने के अनुकूल) बनाया, (10)
उसी में तरह तरह के फल हैं, और खजूर के पेड़ हैं जिनके फलों के गुच्छे आवरणों में लिपटे होते हैं, (11)
और इसके भूंसेवाले अनाज और ख़ुशबूदार बेल-बूटे व फूल भी। (12)
तो फिर बताओ [ऐ जिन्न और इंसानो!], तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (13)
उसने आदमी को मिट्टी के बर्तन जैसी सूखी-खनखनाती हुई मिट्टी से पैदा किया; (14)
और जिन्न को बिना धुएं की आग से पैदा किया। (15)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (16)
वह [उगते हुए सूरज और चाँद के] दो पूरब का रब है और [सूरज व चाँद के डूबते] दो पश्चिम का रब भी। (17)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (18)
उसने [मीठे और नमकीन] दो दरियाओं को प्रवाहित कर दिया, जो आपस में मिलते तो हैं, (19)
फिर भी, उन दोनों के बीच एक रोक लगी हुई है, जिसके पार वे नहीं जा सकते (और पूरी तरह घुलमिल नहीं सकते)। (20)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (21)
उन (समुद्रों) से मोतियाँ निकलती हैं: बड़ी-बड़ी, और छोटी चमकती हुईं मोतियाँ [मूँगा]। (22)
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे? (23)
उसी के वश में हैं वे जहाज़ जो समुद्रों में तैरते फिरते हैं, जो देखने में पहाड़ों की तरह ऊँचे लगते हैं। (24)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (25)
इस धरती पर बसने वाले हर एक का नाश होना है; (26)
कुछ अगर बाक़ी रहने वाला है तो बस तुम्हारे रब का चेहरा जो बड़े प्रतापवाला, और उदारता से देनेवाला है। (27)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (28)
आसमानों और ज़मीन में बसने वाला हर एक, उसी से (अपनी ज़रूरतें) माँगता है; हर दिन वह अपने काम में लगा रहता है। (29)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (30)
ऐ [आदमी व जिन्न के] दो बड़ी भारी फ़ौज [armies]! जल्द ही हम तुम्हारे (हिसाब-किताब के) निपटारे पर ध्यान देने वाले हैं। (31)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (32)
ऐ जिन्नों और इंसानों के गिरोह! अगर तुम में इतना दम है कि आसमान और ज़मीन की सीमाओं को पार कर सको, तो पार कर के दिखाओ: तुम कभी भी बिना हमारी इजाज़त [authority] के पार नहीं कर सकते। (33)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (34)
तुम दोनों पर आग के शोले और धुएँवाला अंगारा छोड़ दिया जाएगा, फिर तुम्हारी मदद को कोई नहीं पहुँचेगा। (35)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (36)
फिर जब आसमान फट पड़ेगा और लाल चमड़े की तरह एकदम लाल-सुर्ख़ हो जाएगा। (37)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (38)
फिर उस दिन न किसी इंसान से उसके गुनाह के बारे में पूछा जाएगा न किसी जिन्न से। (39)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (40)
अपराधी अपने चेहरों (की निशानियों) से पहचान लिए जाएँगे, फिर उन्हें माथे और टाँगों से पकड़ लिया जाएगा। (41)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (42)
यही वह जहन्नम है जिसे अपराधी लोग झूठ ठहराते थे! (43)
वे उस (जहन्नम की) लपटों के और खौलते हुए पानी के बीच चक्कर लगा रहें होंगे। (44)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (45)
(इस दुनिया में) जो आदमी अपने रब के सामने (हिसाब-किताब के लिए) खड़े होने से डरता था, उसके लिए दो बाग़ होंगे। (46)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (47)
(दोनों बाग़) छायादार डालियोंवाले होंगे। (48)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (49)
उन (दोनो बाग़ों) में पानी के दो बहते हुए सोते [flowing spring] होंगे। (50)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (51)
और साथ में हर तरह के फल की दो-दो क़िस्में होंगी। (52)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (53)
[जन्नती लोग] गाढ़े रेशम के बिस्तर पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे, और दोनों बाग़ों के फल झुके हुए नज़दीक ही होंगे। (54)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (55)
उन्हीं (बाग़ों) में नज़रें बचाकर रखनेवाली (जवान) हसीनाएँ होंगी, जिन्हें उन (जन्नतियों) से पहले न किसी आदमी ने छुआ होगा और न किसी जिन्न ने। (56)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (57)
वे ऐसी होंगी मानो लाल [याकूत, Rubies] और चमकती मोतियाँ [मूँगा] हों! (58)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (59)
अच्छाई का बदला अच्छाई के सिवा और क्या हो सकता है? (60)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (61)
इन दोनों बाग़ों के नीचे (कुछ कम दर्जे के जन्नतियों के लिए) दो और बाग़ होंगे। (62)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (63)
दोनों बहुत ज़्यादा हरे-भरे होंगे; (64)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (65)
उन (दोनों बाग़ो) में दो उबलते हुए पानी के सोते [gushing spring] होंगे। (66)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (67)
फलों से भरे हुए -— खजूर और अनार के पेड़ होंगे। (68)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (69)
उनमें अच्छी स्वभाववाली कुँवारी हसीनाएँ होंगी। (70)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (71)
काली-आँखोंवाली जवान हसीनाएं [हूरें] जो ख़ेमों [pavilions] में सँभालकर रखी गयी हैं। (72)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (73)
जिन्हें उससे पहले न किसी आदमी ने हाथ लगाया होगा और न किसी जिन्न ने। (74)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (75)
वे सभी हरे रेशमी गद्दोंं और बेहतरीन क़िस्म की क़ालीनों पर तकिया लगाए (बैठे) होंगे; (76)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (77)
बहुत बरकतवाला [Blessed] नाम है तुम्हारे रब का, जो बड़े ही प्रतापवाला और उदारता से देनेवाला है। (78)
नोट:
1: मक्का के बहुदेववादी लोग अल्लाह के नाम "रहमान" [रहम करनेवाला] को न
तो जानते थे और न ही मानते थे, जैसा कि सूरह फ़ुरक़ान (25: 60) में आया है। ऐसा लगता है कि "रहमान" के नाम से उन्हें चिढ़ थी, इसलिए कि अगर हर तरह की रहमत केवल अल्लाह के लिए ही मान लिया जाए तो फिर उन
ख़ुदाओं का क्या होता जिसे वे पूजते थे और दया की आस लगाते थे। इस सूरह में अल्लाह
ने बताया है कि रहमान उसी अल्लाह का नाम है जिसकी रहमतों [blessings] से यह पूरी कायनात भरी हुई है। उसके सिवा कोई नहीं जो तुम्हें रोज़ी, औलाद या कोई और नेमत दे सकता है।
17: इसका एक और मतलब बताया गया है। जिस जगह से सूरज निकलता है और जिस जगह पर सूरज
डूबता है, वह जगह सर्दी और गर्मी में बदल जाती है, शायद इसलिए भी इनको दो पूरब और दो पश्चिम कहा गया है।
29: अल्लाह के रसूल से किसी ने पूछा: "अल्लाह हर दिन किस काम में लगा रहता है?" जवाब दिया, "वह हर वक़्त गुनाहों को माफ करने
या किसी की परेशानी को दूर करने में लगा रहता है।"
32: यहाँ से आयत 44 तक जहन्नम की यातनाओं का वर्णन है, मगर इसके साथ बार-बार यह भी कहा जा रहा है कि तुम कौन-कौन सी नेमतों को मानने
से इंकार करोगे? इसका एक मतलब तो यह है कि अल्लाह तुम्हें पहले से ही
इस भयानक अंत की जो ख़बर दे रहा है, वह भी अपने आप में एक नेमत है, और दूसरा यह कि अल्लाह की नेमतों को झुठलाने का यह अंजाम होने वाला है, क्या इस अंजाम को जानने के बाद भी तुम नेमतों को ऐसे ही झुठलाने पर अड़े रहोगे?
39: यानी उस समय पूछताछ का चरण ख़त्म हो चुका होगा, क्योंकि ख़ुद हर आदमी को अपना अंजाम मालूम होगा, और हर अपराधी अपने चेहरे की निशानियों से ही पहचान लिया जाएगा।
62: विद्वानों के अनुसार आयत 46 में जिन दो बाग़ों का वर्णन हुआ है, वह अल्लाह के चहीते व परहेज़गार बंदों के लिए है, जिसका ज़िक्र सूरह वाक़िया [56: 7--56] में दोबारा आया है। अब आयत 62 से जिन दो बाग़ों की चर्चा हो रही है, वह आम ईमानवालों के लिए होगा, जो उनसे थोड़ा कमतर दर्जे का होगा।
72: इन ख़ेमों [Pavilions] के बारे में हदीस
में है कि ये मोती से बने हुए बड़े लम्बे-चौड़े ख़ेमे होंगे।
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