सूरह 56: अल-वाक़िया
[आने वाली घड़ी, That which is Coming]
01-10: क़यामत की घड़ी सामने आ जाएगी
11-26: जन्नत की तरफ़ सबसे आगे चलने वाले
27-40: दाहिने हाथवाले (सौभाग्यशाली) लोग
41-56: बायीं हाथवाले (दुर्भाग्यशाली) लोग
57-74: अल्लाह की क़ुदरत व रोज़ी की निशानियाँ
75-80: यह प्रतिष्ठित क़ुरआन है
81-96: फ़ैसले की घड़ी का आना सच्ची और पक्की बात है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब आने वाली घड़ी [क़यामत] सामने आ जाएगी, (1)
तो उस घड़ी के आ जाने का कोई भी इंकार न कर पाएगा, (2)
किसी को नीचे ले जाएगी, किसी को ऊँचा उठा देगी। (3)
जब धरती भूँचाल से बुरी तरह डोलने लगेगी (4)
और पहाड़ टूटकर चूर-चूर हो जाएँगे (5)
यहाँ तक कि वे बिखरे हुए धूल होकर रह जाएँगे (6)
और तब, तुम लोगों को तीन दर्जों में छाँटा जाएगा। (7)
तो जो दाहिने हाथवाले [सौभाग्यशाली] हैं---क्या कहना उन दाहिने हाथवालों का! (8)
और बाएँ हाथवाले [दुर्भाग्यशाली]--- तो क्या बताना उन बाएँ हाथवालों (के बुरे हाल) का! (9)
और (तीसरे) जो सामने होंगे, वे तो हैं ही वरीयता में आगे चलने वाले! (10)
यही वे लोग हैं जो अल्लाह के सबसे नज़दीक रहेंगे; (11)
नेमत से भरी (परम आनंदवाली) जन्नतों में: (12)
शुरू की पीढ़ियों में से तो बहुत-से होंगे, (13)
किन्तु बाद की पीढ़ियों [later generations] में से कम ही (होंगे)। (14)
ऊँचे तख़्तों पर जिस पर सोने के तारों से बुने हुए कपड़े (बिछे होंगे); (15)
तकिया लगाए, आमने-सामने बैठे होंगे। (16)
सदा बहार नौजवान लड़के (उनकी सेवा में) उनके बीच घूमते रहेंगे, (17)
प्याले, (चमकते) जग और (पीने की) शुद्ध शराब से भरा हुआ जाम लिए हुए, (18)
जिस (के पीने) से न तो उन्हें सिर दर्द होगा और न उनके होश उड़ेंगे, (19)
(और वहाँ होंगे) हर एक फल जो वे पसन्द करें; (20)
और चिड़ियों का मांस जो वे चाहें; (21)
और (साथ निभाने के लिए) बड़ी आँखोंवाली ख़ूबसूरत (कुँवारी) हूरें! (22)
ऐसी मानो छिपाकर सुरक्षित रखे हुए मोती हों (23)
यह सब कुछ उन (अच्छे) कामों के बदले में उन्हें मिलेगा, जो कुछ वे (दुनिया में) किया करते थे। (24)
उस जन्नत में वे न कोई बेकार की बात सुनेंगे और न कोई गुनाह की बात; (25)
हाँ जो बात होगी, वह बेहद अच्छी, साफ़-सुथरी और सलामती वाली होगी! (26)
और जो दायीं हाथवाले होंगे [सौभाग्यशाली लोग], तो क्या कहना उन दायीं हाथवालों का! (27)
(वे मज़े करेंगे) बिन काँटों के बेरियों में; (28)
और गुच्छेदार केले से लदे पेड़ों में; (29)
दूर तक फैली हुई छाँव में; (30)
लगातार बहते हुए पानी में; (31)
बहुत-सारे फलों व मेवों में (32)
जो न कभी ख़त्म होंगे और न उन्हें खाने की कोई रोक-टोक होगी (33)
ऐसे जीवन-साथियों के साथ जिनकी तुलना नहीं हो सकती (34)
जिन्हें हमने ख़ास तौर से पैदा किया है --- (35)
कुँवारियाँ, (36)
प्रेम दर्शानेवाली और उम्र में बराबर!--- (37)
उन लोगों के लिए जो दायीं हाथवाले [सौभाग्यशाली] हैं, (38)
(जिनमें) बहुत से शुरू की पीढियों से होंगे (39)
और बहुत से बाद की पीढ़ियों से। (40)
लेकिन जो लोग बायीं हाथवाले [दुर्भाग्यशाली] हैं, तो क्या बताएं कि कैसे (बुरे लोग) हैं बायीं हाथवाले! (41)
वे होंगे तपती हुई गर्म हवा और खौलते हुए पानी में; (42)
और काले धुएँ की छाँव में, (43)
जो न ठंडी होगी और न लाभप्रद। (44)
वे इससे पहले बड़े सुख-सम्पन्न थे; (45)
और बड़े गुनाह पर अड़े रहते थे, (46)
वे कहा करते थे, "क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें वास्तव में दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा? (47)
"और क्या हम से पहले गुज़रे हुए बाप-दादाओं को भी?" (48)
[ऐ रसूल] कह दें, "निश्चय ही सब अगली और पिछली पीढ़ियों के लोग (49)
एक पहले से नियत दिन और समय पर अवश्य ही इकट्ठे कर दिए जाएँगे, (50)
"तो तुम (लोग) जो रास्ता भटके हुए हो, और सच्चाई का इंकार करने वाले हो (51)
ज़क्कूम के कड़ुवे पेड़ में से खाओगे; (52)
"और उसी से पेट भरोगे; (53)
"और उसके ऊपर से खौलता हुआ पानी पीना पड़ेगा; (54)
"और पियोगे भी इस तरह जैसे प्यास की बीमारीवाले ऊँट पीते हैं" (55)
तो बदला दिए जाने [फ़ैसले] के दिन, इसी तरह होगा उनका स्वागत! (56)
हमने तुम्हें पैदा किया है, फिर तुम इसका यक़ीन क्यों नहीं करते? (57)
तो क्या तुमने विचार किया जो [वीर्य/Semen] तुम टपकाते हो? (58)
क्या तुम उसे पैदा करते हो, या पैदा करने वाले हम हैं? (59)
और हमने ही तुम्हारे बीच मौत को तय कर रखा है. हमें कोई नहीं रोक सकता (60)
कि हम चाहें तो तुम्हारे जैसों को बदल दें और तुम्हें ऐसी हालत में दोबारा पैदा करें जिसे तुम जानते नहीं (61)
तुम तो जान चुके हो कैसे तुम पहली बार पैदा किए गए थे: फिर तुम इससे कोई सीख क्यों नहीं लेते? (62)
अच्छा यह बताओ कि जो कुछ तुम ज़मीन में बोते हो, (63)
क्या उसे तुम उगाते हो, या उगानेवाले हम हैंं? (64)
यदि हम चाहें तो उस फ़सल को भूसा बना दें, फिर तुम हैरान परेशान होकर चिल्लाते रह जाओ (65)
कि "हम पर तो क़र्ज़ का बोझ पड़ गया, (66)
बल्कि हम वंचित होकर रह गए!" (67)
अच्छा यह बताओ कि जो पानी तुम पीते हो--- (68)
क्या उसे वर्षावाले-बादलों से तुमने उतारा है या उतारनेवाले हम हैंं? (69)
अगर हम चाहें, तो उसे अत्यन्त खारा बनाकर रख दें, फिर तुम कृतज्ञता क्यों नहीं दिखाते? (70)
अच्छा बताओ कि यह आग जिसे तुम सुलगाते हो--- (71)
क्या पेड़ की लकड़ियों को तुमने बनाया है या बनानेवाले हम हैंं? (72)
हमने उस आग को नसीहत का ज़रिया बनाया (ताकि जहन्नम की आग से डरें) और मरुभुमि के मुसाफ़िरों (और वहाँ रहने वालों) के लिए काम की चीज़ बनाया (73)
अतः [ऐ रसूल] आप अपने महान रब के नाम का गुणगान करें। (74)
मैं क़सम खाता हूँ सितारों की स्थितियों की --- (75)
और यह बहुत बड़ी क़सम है, यदि तुम जानो-- (76)
कि सचमुच यह बड़ा ही प्रतिष्ठित क़ुरआन है (77)
एक सुरक्षित किताब में (पहले से) लिखा हुआ है (78)
उसे केवल पाक-साफ़ लोग ही हाथ लगाते हैंं (79)
इसे सारे संसार के रब की ओर से (थोड़ा थोड़ा करके) उतारा जा रहा है। (80)
फिर किस तरह तुम इस (पवित्र) बयान की उपेक्षा कर सकते हो? (81)
और तुम्हें जो रोज़ी दी गयी है उसका (शुक्रिया अदा करने के) बजाए तुम कैसे इसे मानने से इंकार कर सकते हो? (82)
फिर ऐसा क्यों नहीं होता जब (किसी के) प्राण (निकलते हुए) गले तक पहुँच जाते हैं (83)
जबकि उस समय तुम (बेबसी से) देख रहे होते हो ---- (84)
हम तुम से ज़्यादा उसके निकट होते हैंं, मगर तुम हमें नहीं देखते -– (85)
अगर तुम्हारा हिसाब-किताब नहीं होना है तो फिर ऐसा क्यों नहीं होता (86)
कि तुम उसके (प्राण को) लौटा दो, अगर तुम्हारी बातें सच्ची हैं। (87)
फिर अगर वह (मरनेवाला) उन लोगों में हुआ, जिन्हें अल्लाह के नज़दीक वाली जगह मिलेगी; (88)
तो (उसके लिए) आराम है, सुकून है, और नेमतोंवाला बाग़ है; (89)
यदि वह उन लोगों में हुआ जो दाहिने हाथवालों [भाग्यशालियों] में से हैं, (90)
तो (उससे कहा जाएगा), "तुम्हारे लिए सलामती ही सलामती है कि तुम दाहिने हाथवालों में से हो।" (91)
और यदि वह उनमें से हुआ जिसने सच्चाई को मानने से इंकार किया और गुमराह हो गया; (92)
तो उसका पहला सत्कार खौलते हुए पानी से होगा (93)
फिर उसे (जहन्नम की) आग में जलना है। (94)
निस्संदेह यह बिल्कुल सच्ची और पक्की बात है। (95)
अतः तुम अपने महान रब का नाम लेकर उसका गुणगान करो। (96)
नोट:
14: यानी ऊँचे दर्जे के लोगों में अधिकतर नबियों और बड़े परहेज़गार [Pious] लोगों का समूह होगा, और बाद के ज़माने में भी हालाँकि इस दर्जे के लोग होंगे, मगर कम।
28: जन्नत के फलों के नाम जाने-पहचाने इसलिए बताए गए हैं ताकि हमें समझने में आसानी हो, लेकिन उनकी शक्ल और उनकी लज़्ज़त यहाँ से अलग और बेहद अच्छी होगी।
34: एक दूसरा अनुवाद "ऊँचे रखे हुए फ़र्शों पर .... जन्नत में बैठने की ऊँची जगह पर शायद ऐसे फ़र्श बिछे हुए होंगे।
35: कुछ विद्वानों का मानना है ख़ास तौर से पैदा की गई हूरों के अलावा इनमें नेक लोगों की वह दुनिया वाली नेक बीवियाँ भी साथ रहेंगी, जिन्हें ख़ूब हसीन बना दिया जाएगा।
जो औरतें दुनिया में बिन-ब्याही रह गई थीं, उनको भी नया हुस्न देकर किसी से शादी कर दी जाएगी।
46: भारी गुनाह से मतलब अल्लाह की ख़ुदायी में साझेदार [Partner] ठहराना और अल्लाह के संदेश को मानने से इंकार करना।
52: जहन्नम के इस पेड़ 'ज़क़ूम' का वर्णन सूरह साफ़्फ़ात (37: 62), और सूरह दुख़ान (44: 43) में भी आया है।
72: इससे मतलब 'मुर्ख़' और 'अफ़्फ़ार' के पेड़ हैं, जो अरब में पाए जाते थे, और जिनकी डालियों को रगड़ने से आग पैदा होती थी। इसका ज़िक्र सूरह यासीन (36: 80) में भी है।
75: यहाँ तारों की स्थितियों यानी इसके डूबने या गिरने की जगह की क़सम खायी गई है। मक्का के कुछ काफ़िर लोग मुहम्मद (सल्ल) को काहिन (तांत्रिक) कहते थे, और यह कि क़ुरआन काहिनों का कलाम है। काहिनों के बारे में माना जाता था कि वे भविष्य की बातें जिन्नों और शैतानों की मदद से बताते हैं। क़ुरआन में कई जगह पर बताया गया है कि शैतानों और जिन्नों को आसमान के करीब जाकर वहां की बातें सुनने से रोक दिया गया है। अगर कोई शैतान आसमान के क़रीब जाकर सुनने की कोशिश करता, तो उसपर आग का अंगारा छोड़ दिया जाता है। देखें सूरह हिज्र (15: 18) और सूरह साफ़्फ़ात (37: 10). अत: क़ुरआन किसी काहिन का कलाम नहीं हो सकता है। चूंकि आम बोलचाल में आसमान में आग के अंगारे को "तारा टूटना" कहते हैं, इसीलिए अल्लाह ने तारे का ज़िक्र करते हुए यह भी कहा कि इनको शैतानों से हिफ़ाज़त के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। देखें सूरह मुल्क (67: 5) और सूरह साफ़्फ़ात ( 37: 7).
79: पाक-साफ़ लोग से मतलब यहाँ पर फ़रिश्तों को समझा जाता है, जो कि ऊपर की दुनिया की उस "सुरक्षित किताब" [लौह-ए महफ़ूज़] को छू सकते हैं। उसी तरह, ज़मीन पर क़ुरआन को केवल पाक-साफ़ आदमी ही वज़ू करके छू सकता है।
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