Friday, January 15, 2016

सूरह 50 : क़ाफ़ [Qaf]

सूरह 50: क़ाफ़ [Qaf]


01-11: विश्वास न करने वालों ने क़यामत के दिन दोबारा उठाए जाने को ठुकराया

12-14: पहले के विश्वास न करने वालों की मिसालें

15-19: मौत आना और मरने के बाद एक दिन दोबारा उठाया जाना निश्चित है

20-35: क़यामत और उसके बाद होने वाले फ़ैसले का मंज़र 

36-37: पुरानी पीढ़ियों को सज़ा मिली: एक चेतावनी 

38-45: रसूल मुहम्मद (सल्ल.) को आगे की कार्रवाई के लिए सलाह 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़ाफ़॰;
क़ुरआन मजीद की क़सम! (कि मुर्दा आदमियों को ज़रूर दोबारा ज़िंदा उठाया जाएगा)   (1)
मगर विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] को इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनके पास‌ सावधान करनेवाला, उन्हीं में से एक आदमी (कैसे) आ गया है, सो वे कहने लगे, "यह तो हैरानी की बात है! (2)
कि जब हम मर जाएँगे और मिट्टी में मिल जाएँगे, तो फिर हम वापस (ज़िंदा होकर) उठ खड़े होंगे? यह (ज़िंदा होकर) वापसी तो समझ से बहुत दूर की बात है!" (3)
धरती (मरे हुए शरीर का हिस्सा खाकर) उसमें जितनी भी कमी कर देती है, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं: हम एक किताब में इसका पूरा हिसाब रखते हैं।  (4)

मगर विश्वास न करनेवालों के सामने जब सच्चाई पहुँचती है, तो वे उसे मानने से इंकार कर देते हैं; असल में वे उलझन की हालत में पड़े हुए हैं।  (5)
अच्छा तो क्या उन लोगों ने अपने ऊपर आसमान को नहीं देखा ---- कि हमने उसे कैसा बनाया और किस तरह उसे सजाया है कि उसमें कोई दरार तक नहीं है; (6)

और किस तरह हमने धरती को फैलाया और उसमें मज़बूत पहाड़ों को जमा दिया, और उसमें हर प्रकार की सुन्दर वनस्पतियाँ उगा दीं,  (7)
(और यह सब) आँखें खोलने और याद दिलाते रहने के मक़सद से है --- हर उस बन्दे के लिए जो पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकनेवाला हो;  (8)
और कैसे हमने आसमान से बरकत से भरी [blessed] बारिश भेजी और उससे बाग़ और अनाज की फ़सलें उगाईं; (9)
और खजूरों के गुच्छों से लदे हुए ऊँचे-ऊँचे खजूर के पेड़ ----  (10)
हर एक आदमी की रोज़ी के रूप में; तो देखो कैसे पानी के द्वारा बेजान पड़ी हुई धरती को हम नया जीवन दे देते हैं? ठीक इसी तरह, मरे हुए लोग (अपनी क़ब्रों से) उठ खड़े होंगे।   (11)
इन (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] से बहुत पहले, नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, इसी तरह 'अर्-रस' [यमामा के अंधे कुँएवाले], समूद [सालेह की क़ौम], (12)
आद [हूद की क़ौम], फ़िरऔन [मिस्र के राजा], लूत के भाई [सदूम व अमूरह के लोग], (13)
'अल-ऐका' [जंगलों में रहनेवाली शोऐब की क़ौम] और तुब्बा [यमन के बादशाह अलहमैरी] के लोग भी थे: इन सभी लोगों ने अपने-अपने पैग़म्बरों [messengers] की बातों में विश्वास नहीं किया, अन्ततः जिस सज़ा की चेतावनी मैंने दे रखी थी वह सच होकर रही।  (14)
तो क्या हम पहली बार सारी सृष्टि को पैदा करने में असमर्थ रहे? बिल्कुल नहीं! मगर तब भी वे दोबारा पैदा किए जाने के बारे में सन्देह में पड़े हैं।  (15)
हमने आदमी को पैदा किया है--- हम उसके दिल में पैदा होनेवाली बातों को भी जानते हैं: हम उसके गर्दन की रग [Jugular vein] से भी ज़्यादा उससे नज़दीक हैं--- (16)
क्योंकि (हर अच्छे बुरे कर्म की जानकारी) प्राप्त करनेवाले दो (फ़रिशते), लिखने के लिए बैठे रहते हैं, एक उस आदमी के दायीं तरफ़, और दूसरा उसके बायीं तरफ़: (17)
आदमी हर वक़्त उन (फ़रिश्तों) की निगरानी में होता है, कोई एक शब्द मुँह से निकला नहीं कि उसे लिख लिया जाता है। (18)
और मौत की बेहोशी अपने साथ सच्चाई को साथ ले आएगी: “यही वह चीज़ है जिससे तू भागने की कोशिश करता था।”  (19)
और नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा: “यही है वह (क़यामत का) दिन, जिसकी (तुम्हें) धमकी दी गई थी।”  (20)
हर आदमी इस हाल में आएगा कि उसके साथ एक (फ़रिश्ता) हँकाकर लानेवाला होगा और दूसरा गवाही देनेवाला:  (21)
“तुम ने इस (दिन) की हक़ीक़त पर कभी ध्यान नहीं दिया; तुम पर एक पर्दा पड़ा हुआ था, और आज हमने तुमसे वह पर्दा हटा दिया, सो आज तुम्हारी निगाह बड़ी तेज़ हो गई है।”   (22)
उसके साथ रहनेवाला (फ़रिश्ता) कहेगा, "यह है (इसके कर्मों का लेखा-जोखा) जो मैंने तैयार कर रखा है---- (23)
(दोनों फ़रिश्तों को हुक्म होगा), "फेंक दो, जहन्नम में! ज़िद पर अड़े हुए हर उस विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] को, (24)
जो हर एक को भलाई से रोकता था, मर्यादा की सीमाएं तोड़ता था और (सच्चाई की बातों में) लोगों को सन्देह में डालता था,   (25)
जिसने अल्लाह के साथ दूसरे देवताओं को अपना ख़ुदा बना रखा था। फेंक दो उसे कठोर यातना में!"---  (26)
उसका (शैतान) साथी कहेगा, "ऐ हमारे रब! मैंने इसे नहीं बहकाया था, बल्कि वह ख़ुद पहले से ही बहुत ज़्यादा भटका हुआ था।" (27)
अल्लाह कहेगा, "मेरे सामने झगड़ा मत करो। मैंने तो तुम्हें (यातना की) चेतावनी भेजी थी  (28)

और मेरी कही हुई बात बदला नहीं करती: मैं अपने किसी बंदे पर कोई अन्याय नहीं करता।" (29)
उस दिन हम जहन्नम से कहेंगे, "क्या तू भर गई?" और वह कहेगी, "क्या अब और कोई (इसमें आने वाला) नहीं है?" (30)
लेकिन नेक लोगों के लिए जन्नत नज़दीक लायी जाएगी, इतनी नज़दीक कि अब कुछ भी दूरी न रहेगी: (31)
"यही है वह चीज़ जिसका तुमसे वादा किया जाता था--- यह हर उस आदमी के लिए है, जो पूरे मन से अक्सर अल्लाह की तरफ़ (तौबा के लिए) झुकता हो और उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचता हो;  (32)
"जो बेहद दयालु रब से डरता हो, हालाँकि उसे देखा नहीं जा सकता, और जब उसके सामने आता हो, तो उसका दिल पूरी भक्ति-भाव से उसके आगे झुकता हो--- (33)
"तो अब सलामती के साथ दाख़िल हो जाओ इस (जन्नत) में, वह दिन कभी ख़त्म न होने वाली ज़िंदगी का दिन होगा।” (34)
उनके लिए वहाँ (जन्नत में) वह सब कुछ होगा जिस चीज़ की भी वे इच्छा करेंगे, और हमारे पास (देने के लिए) उससे अधिक भी है।  (35)
इन (मक्का के काफ़िरों) से पहले हम काफ़िरों की इनसे भी अधिक मज़बूत नस्लों को तहस-नहस कर चुके हैं, वे धरती के बड़े हिस्से पर मारे फिरे--- मगर क्या भागने की कोई जगह थी?  (36)
सचमुच इसमें हर उस आदमी के लिए सीखने और याद रखने का सामान है जिसके पास दिल हो, और जो कोई ध्यान लगाकर सुनता हो।  (37)
हमने आसमानों, ज़मीन और जो कुछ उनके बीच में है, सब कुछ छः दिनों [कालों] में पैदा कर दिया और हमें कोई थकान नहीं हुई। (38)
अतः [ऐ रसूल] जो कुछ वे कहते हैं, उस पर आप धीरज [सब्र] से काम लें; और सूरज के निकलने से पहले भी और सूरज के निकलने के बाद भी अपने रब की प्रशंसा का गुणगाण करते रहें;  (39)
और रात की घड़ियों में भी उसकी बड़ाई का बखान करें, और हर नमाज़ [सज्दों] के बाद भी;  (40
 
और ध्यान से सुनो उस दिन की बात, जिस दिन एक पुकारनेवाला बहुत पास से पुकारेगा, (41)
वे लोग उस दिन (अपनी क़ब्रों से) बाहर निकल आएंगे, और उस दिन लोग भयानक धमाके की आवाज़ सचमुच सुनेंगे। (42)
हम ही तो हैं जो ज़िंदगी भी देते हैं और मौत भी, और अंत में सबको हमारी ही पास लौटकर आना है।  (43)
जिस दिन धरती को फाड़ दिया जाएगा, वे [मुर्दा लोग] बहुत तेज़ी से बाहर निकल पड़ेंगे--- यह इकट्ठा करना हमारे लिए बेहद आसान है।  (44)
जो कुछ भी वे [मक्का के काफ़िर] कहते हैं, हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं। [ऐ रसूल] आप उन्हें ज़बरदस्ती अपनी बात मनवाने के लिए तो हैं नहीं। अतः आप क़ुरआन के द्वारा नसीहत करें, हर उस आदमी को जो हमारी चेतावनी से डरता हो। (45)





नोट:

4: अल्लाह कहता है कि शरीर के जिन-जिन हिस्सों को मिट्टी खाती है, उसकी पूरी जानकारी उसके पास होती है, इसीलिए उनको दोबारा उसी हाल में बहाल करना कोई मुश्किल नहीं है। और सारी बात एक सुरक्षिर स्लेट[लौह-ए-महफ़ूज़/Preserved Tablet] में लिखी हुई है।

5: यानी कभी कहते हैं कि क़ुरआन जादू है, या यह काहिनों’ [तांत्रिकों] की बातें हैं,  कभी इसे शायरी बताते हैं, और कभी मुहम्मद (सल्ल) को दीवाना कहते हैं।

12: अर-रस के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि ये समूद की क़ौम का कोई शहर था। कुछ लोगों का मानना है कि इसका मतलब अंधा कुआँ है, जहाँ के रहने वालों ने अल्लाह के भेजे हुए पैग़म्बर को कुएं में धकेल दिया था। शायद इन्हीं लोगों का ज़िक्र सूरह यासीन (36: 13-27) में आया है।

17: फ़रिश्ते हर आदमी के कर्मों का हिसाब इसलिए लिखते रह्ते हैं ताकि क़यामत के दिन उसके सामने प्रमाण के रूप में पेश किया जा सके।

21: हर आदमी के साथ शायद ये वही दो फ़रिश्ते होंगे जो दुनिया में उसके कर्मों को लिखा करते थे।

24: दोनों फरिश्ते वही हो सकते हैं जो कर्मों का लेखा-जोखा तैयार करते हैं, या ये दो फ़रिश्ते जहन्नम के पहरेदार भी हो सकते हैं।

27: काफ़िर लोग यह चाहेंगे कि अपने हिस्से की सज़ा यह कहकर अपने सरदारों पर और ख़ासकर शैतान पर डालें कि इसने हमें गुमराह किया था, मगर शैतान जवाब में कहेगा कि मैंने इसे गुनाहों की तरफ़ लुभाया ज़रूर था,  मगर गुमराही में तो यह ख़ुद ही अपनी इच्छा से पड़ा था। देखें सूरह इबराहीम (14: 22).

35: जन्नत की नेमतों की कुछ झल्कियाँ तो क़ुरआन में कई आयतों में बयान हुई हैं, लेकिन जैसा कि एक हदीस में है, असल में वहाँ की नेमतें ऐसी होंगी जो किसी आँख ने देखी नहीं, किसी कान ने सुनी नहीं और किसी आदमी के दिल में इसका विचार तक नहीं आया होगा। अंत में यह इशारा किया गया है कि हमारे पास देने के लिए कुछ और ज़्यादा भी है, इन्हीं में से एक नेमत होगी अल्लाह का दीदार! देखें सूरह यूनुस (10: 26).

39: सूरज निकलने से पहले से मतलब सुबह की नमाज़ [फ़ज्र], और सूरज के निकलने के बाद का मतलब दोपहर और शाम की नमाज़ें [ज़ुहर, असर और मग़रिब] हैं।

40: रात की घड़ियों में गुणगान का मतलब रात की नमाज़ें [इशा और तहज्जुद] हैं। हर (फ़र्ज़) नमाज़ के बाद सज्दे से मतलब नफ़िल नमाज़ेंहैं।

41: पुकारनेवाले का मतलब यहाँ (फ़रिश्ता) हज़रत इसराफ़ील (अलै.) से है जो मुर्दों को क़ब्रों से बाहर निकल आने के लिए आवाज़ देंगे, और यह आवाज़ बहुत पास से आती हुई महसूस होगी।


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