01-11: विश्वास न करने वालों ने क़यामत के दिन दोबारा उठाए जाने को ठुकराया
12-14: पहले के विश्वास न करने वालों की मिसालें
15-19: मौत आना और मरने के बाद एक दिन दोबारा उठाया जाना निश्चित है
20-35: क़यामत और उसके बाद होने वाले फ़ैसले का मंज़र
36-37: पुरानी पीढ़ियों को सज़ा मिली: एक चेतावनी
38-45: रसूल मुहम्मद (सल्ल.) को आगे की कार्रवाई के लिए सलाह
4: अल्लाह कहता है कि शरीर के जिन-जिन हिस्सों
को मिट्टी खाती है, उसकी पूरी जानकारी उसके पास होती है, इसीलिए उनको दोबारा उसी हाल में बहाल करना कोई मुश्किल नहीं है। और सारी बात एक
“सुरक्षिर स्लेट”[लौह-ए-महफ़ूज़/Preserved Tablet] में लिखी हुई है।
5: यानी कभी कहते हैं कि क़ुरआन जादू है, या यह ‘काहिनों’ [तांत्रिकों] की बातें हैं, कभी इसे शायरी बताते हैं, और कभी मुहम्मद (सल्ल) को ‘दीवाना’ कहते हैं।
12: “अर-रस” के बारे में कुछ लोग कहते हैं
कि ये समूद की क़ौम का कोई शहर था। कुछ लोगों का मानना है कि इसका मतलब “अंधा कुआँ” है, जहाँ के रहने वालों ने अल्लाह के भेजे हुए पैग़म्बर को कुएं में धकेल दिया था। शायद
इन्हीं लोगों का ज़िक्र सूरह यासीन (36: 13-27) में आया है।
17: फ़रिश्ते हर आदमी के कर्मों का हिसाब
इसलिए लिखते रह्ते हैं ताकि क़यामत के दिन उसके सामने प्रमाण के रूप में पेश किया जा
सके।
21: हर आदमी के साथ शायद ये वही दो फ़रिश्ते
होंगे जो दुनिया में उसके कर्मों को लिखा करते थे।
24: दोनों फरिश्ते वही हो सकते हैं जो कर्मों
का लेखा-जोखा तैयार करते हैं, या ये दो फ़रिश्ते जहन्नम के पहरेदार भी हो सकते हैं।
27: काफ़िर लोग यह चाहेंगे कि अपने हिस्से
की सज़ा यह कहकर अपने सरदारों पर और ख़ासकर शैतान पर डालें कि इसने हमें गुमराह किया
था, मगर शैतान जवाब में कहेगा
कि मैंने इसे गुनाहों की तरफ़ लुभाया ज़रूर था, मगर गुमराही में तो यह
ख़ुद ही अपनी इच्छा से पड़ा था। देखें सूरह इबराहीम (14: 22).
35: जन्नत की नेमतों की कुछ झल्कियाँ तो
क़ुरआन में कई आयतों में बयान हुई हैं, लेकिन जैसा कि एक हदीस में है, असल में वहाँ की नेमतें ऐसी होंगी जो किसी आँख ने देखी नहीं, किसी कान ने सुनी नहीं
और किसी आदमी के दिल में इसका विचार तक नहीं आया होगा। अंत में यह इशारा किया गया है
कि हमारे पास देने के लिए कुछ और ज़्यादा भी है, इन्हीं में से एक नेमत होगी अल्लाह का दीदार! देखें सूरह यूनुस (10: 26).
39: सूरज निकलने से पहले से मतलब सुबह की
नमाज़ [फ़ज्र], और सूरज के निकलने के बाद
का मतलब दोपहर और शाम की नमाज़ें [ज़ुहर, असर और मग़रिब] हैं।
40: रात की घड़ियों में गुणगान का मतलब रात
की नमाज़ें [इशा और तहज्जुद] हैं। हर (फ़र्ज़) नमाज़ के बाद “सज्दे” से मतलब ‘नफ़िल नमाज़ें’ हैं।
41: पुकारनेवाले का मतलब यहाँ (फ़रिश्ता)
हज़रत इसराफ़ील (अलै.) से है जो मुर्दों को क़ब्रों से बाहर निकल आने के लिए आवाज़ देंगे, और यह आवाज़ बहुत पास से
आती हुई महसूस होगी।
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