सूरह 51: अज़-ज़ारियात
[उड़ाकर बिखेर देने वाली हवा, Scattering winds]
1-19: जन्नत और जहन्नम का फ़ैसला होना पक्का है, और यह होकर रहेगा।
20-23: अल्लाह की ताक़त की निशानियाँ और जीने के लिए रोज़ी
24-37: इबराहीम अलै. और उनके यहाँ आए हुए मेहमानों का क़िस्सा
38-40: मूसा (अलै.) और फ़िरऔन
41-46: 'आ'द, समूद और नूह' की क़ौम
47-51: अल्लाह की क़ुदरत निशानियाँ
52-55: पहले के रसूलों की बात को भी ठुकराया गया था
56-58: जिन्नों और इंसानों को अल्लाह की बंदगी करने के लिए पैदा किया गया है
59-60: विश्वास न करने वालों को सज़ा मिलेगी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है उन (हवाओं) की, जो दूर दूर तक फैल जाती हैं, (1)
और उनकी, जो बारिश की बूंदों से लदी होती हैं, (2)
जो आसानी से तेज़ गति के साथ चलती रहती हैं, (3)
जो उन (बारिशों) को बाँट देती हैं जैसा कि उन्हें हुक्म हुआ हो! (4)
जिस चीज़ का तुम (लोगों) से वादा किया जा रहा है, वह बिल्कुल सच्चा है: (5)
(कर्मों का) फ़ैसला ज़रूर होगा--- (6)
आसमान की क़सम जहाँ (तारों से भरे) रास्ते हैं, (7)
तुम [लोग] (मरने के बाद के जीवन पर) अलग-अलग व परस्पर विरोधी बातों में पड़े हुए हो ---- (8)
इस [परलोक की हक़ीक़त] से जो लोग मुँह मोड़ते हैं, वे सच्चाई को समझने में (पूरी तरह) धोखा खा चुके हैं। (9)
तबाह हो जाएँ वे, (जो बिना किसी आधार के) यूँ ही अटकलें लगाते और झूठी बातें बनाया करते हैं; (10)
जो ग़लतियों में ऐसे डूबे हुए हैं कि सब कुछ भुलाए बैठे हैं और उन्हें कुछ ख़बर नहीं! (11)
वे (व्यंग्य से) पूछते है, "वह फ़ैसले का दिन कब आएगा?" (12)
(कह दें), उस दिन आएगा, जब वे (जहन्नम की) आग पर तपाए जाएँगे, (13)
"चखो मज़ा अब अपनी सज़ा का! यही है वह चीज़ जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।" (14)
अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचने वाले लोग (जन्नत के) बाग़ों और (बहते हुए) पानी के सोतों (springs) में (मज़े कर रहे) होंगे। (15)
उनका रब जो कुछ नेमत उन्हें देगा, वे उसे (ख़ुशी-ख़ुशी) ले रहे होंगे, क्योंकि वे इससे पहले (दुनिया में) अच्छे कर्म करने वाले थे: (16)
रातों को कम ही सोते थे, (17)
भोर के समय इबादत करते हुए अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते थे, (18)
और अपनी दौलत में से माँगनेवाले और ठुकराए हुए लोगों को बाक़ायदा हिस्सा देते थे। (19)
पक्का विश्वास रखनेवालों के लिए इस धरती पर बहुत-सी निशानियाँ हैं--- (20)
और स्वयं तुम्हारे अंदर भी! तो क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता?--- (21)
तुम्हारी रोज़ी [sustenance] आसमान में (तय होती) है, और वह चीज़ [अंतिम फ़ैसला] भी, जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है। (22)
क़सम है आसमान और ज़मीन के रब की! सचमुच यह बात ऐसी ही पक्की [Real] है जैसे तुम (अपने मुँह से) अभी बोल रहे हो। (23)
[ऐ रसूल!] क्या आपने इबराहीम के इज़्ज़तवाले मेहमानों का क़िस्सा सुना है? (24)
जब वे [फ़रिश्ते] इबराहीम के पास आए, तो "सलाम” कहा, (जवाब में इबराहीम ने भी) “सलाम” कहा, (और मन में सोचा) "ये तो अजनबी लोग हैं।" (25)
फिर वह जल्दी से अपने घरवालों के पास गए, और एक मोटा-ताज़ा बछड़े (का भूना हुआ मांस) ले आए (26)
और उसे मेहमानों के सामने पेश किया। कहने लगे, "क्या आप लोग नहीं खाएंगे?" (27)
(इबराहीम को) उनसे डर महसूस होने लगा, मगर उन लोगों ने कहा, "डरिए नहीं", और उन्हें एक लड़के [इसहाक़] के होने की ख़ुशख़बरी दी, और कहा कि वह बड़े ज्ञानवाला होगा, (28)
इस पर उनकी बीवी [सारा] चिल्लाती हुई वहाँ आयीं, और वह (चकित व झेंपते हुए) अपने मुँह पर हाथ मारते हुए कहने लगीं, "एक बूढ़ी बाँझ औरत (बच्चा जनेगी!)!" (29)
मेहमानों ने कहा, "ऐसा ही होगा, तेरे रब ने यही कहा है, और वह गहरी समझ-बूझ रखनेवाला [Wise], सब कुछ जाननेवाला है।" (30)
इबराहीम ने कहा, "ऐ (अल्लाह के भेजे हुए) फ़रिश्तो, आप लोगों के यहाँ (धरती पर) आने का क्या मक़सद है?" (31)
उन्होंने कहा, "हमें ऐसे लोगों [लूत की क़ौम] के पास भेजा गया है जो गुनाहों में डूबे हुए हैं; (32)
"ताकि हम उनके ऊपर पकी हुई मिट्टी के पत्थर (कंकड़) बरसाएँ, (33)
जिनपर (गुनाहों की) सीमा पार कर जाने वालों के लिए आपके रब की तरफ़ से ख़ास निशान भी लगा होगा।" (34)
फिर ऐसा हुआ कि उस बस्ती में जो ईमानवाले थे, उन्हें हमने वहाँ से बाहर निकाल लिया; (35)
किन्तु हमने वहाँ केवल (लूत का) एक ही घर ऐसा पाया जिसमें रहने वाले अल्लाह पर पूरी भक्ति से झुकनेवाले थे ---- (36)
इस तरह, हमने वहाँ (हमेशा के लिए) एक निशानी छोड़ दी, उन लोगों के लिए जो दर्दनाक यातना से डरते हों। (37)
मूसा [Moses] (की घटना) में भी ऐसी ही निशानियाँ हैं: हमने उन्हें फ़िरऔन [Pharaoh] के पास स्पष्ट प्रमाण [Clear Authority] के साथ भेजा था, (38)
किन्तु उस [फ़िरऔन] ने अपने सहायकों समेत सच्चाई से मुँह फेर लिया और (अपनी ताक़त के घमंड में) कहने लगा, (यह मूसा) "जादूगर है या कोई दीवाना," (39)
अतः हमने उसे और उसकी सेना को धर-दबोचा और उन्हें समंदर में फेंक दिया: दोष भी उसी का था। (40)
और आद (की क़ौम की तबाही) में भी तुम्हारे लिए निशानी है जबकि हमने उनपर ज़िंदगी तबाह करने वाली आँधी भेजी, (41)
वह हवा जिस चीज़ के सामने से गुज़री, उसे उसने चूर-चूर करके भूंसा बना डाला। (42)
और समूद (की क़ौम की तबाही) में भी (तुम्हारे लिए ऐसी ही निशानी है): जबकि उनसे कहा गया था, "थोड़े समय तक मज़े कर लो!" [न सुधरे, तो तबाही आएगी] (43)
मगर उन्होंने अपने रब के आदेश की अवहेलना की; फिर एक धमाकेदार कड़क ने उन्हें आ दबोचा और वे देखते ही रह गए: (44)
हाल यह हुआ कि अपना बचाव करना तो दूर, वे तो खड़े तक न रह पाए। (45)
और इससे भी पहले, नूह [Noah] की क़ौम को भी हमने अपनी पकड़ में लेकर तबाह किया था। वे सचमुच बड़े गुनाहगार लोग थे! (46)
हमने अपने हाथों (की क़ुदरत) से आसमानों को बनाया है और उसे बहुत विस्तार से फैलाया है, (47)
और धरती को हमने (रहने के लिए) बिछा दिया --- तो क्या ही अच्छे ढंग से हमने इसे सँवारा और बिछाया है! (48)
और हमने हर चीज़ के जोड़े बनाए, ताकि तुम [लोग] ध्यान दो और समझो। (49)
[अतः ऐ रसूल, आप उन लोगों से कह दें कि], “अल्लाह के आगे (गुनाहों की माफ़ी के लिए) जल्दी से झुक जाओ---- (यक़ीन करो), मैं उसकी तरफ़ से तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देने के लिए भेजा गया हूँ --- (50)
और किसी भी दूसरे देवता को अल्लाह के साथ बराबरी का न ठहराओ। मैं उसकी तरफ़ से तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देने के लिए भेजा गया हूँ!” (51)
इसी तरह, उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के पास भी जब कभी कोई रसूल आया, तो उन्होंने भी (रसूलों को) "जादूगर या दीवाना कहा!" (52)
क्या उन्होंने एक-दूसरे को ऐसा कहने के लिए पहले से तय कर रखा था? नहीं! बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने सारी हदें पार कर दी हैं, (53)
अतः [ऐ रसूल] उनकी तरफ़ ध्यान न दें --- अब आपका कोई दोष नहीं, (54)
और आप (लोगों को) बराबर नसीहतें देते रहें, क्योंकि याद दिलाते रहना ईमानवालों के लिए अच्छा होता है। (55)
मैंने तो जिन्नों और इंसानों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी ही बन्दगी [worship] करें: (56)
मैं उनसे किसी तरह की रोज़ी (कमाई) तो नहीं चाहता, और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे (खाना) खिलाएँ --- (57)
अल्लाह तो ख़ुद ही है रोज़ी देनेवाला, बेहद ताक़तवाला, सबसे मज़बूत! (58)
जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है, और (उन जैसे) उनके साथी जो पहले गुज़र चुके हैं, उनके लिए तो यातनाओं का हिस्सा तय किया हुआ है ---- वे मुझसे जल्दी (यातनाओं) की माँग न करें --- (59)
सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए उस दिन के कारण बड़ी ख़राबी होगी, जिसका उनसे वादा किया जा रह है। (60)
नोट:
4: यहाँ क़समें खाकर जो बात बयान की गई है, वह यह है कि क़यामत ज़रूर आएगी और कर्मों के अनुसार इनाम और सज़ा का फ़ैसला ज़रूर होगा।हवाओं की क़सम खाकर इस ओर ध्यान खींचा गया है कि जो अल्लाह इन हवाओं और उनके नतीजे में बरसने वाले पानी को नई ज़िंदगी का ज़रिया बनाता है, वह इस बात पर ज़रूर सक्षम है कि मुर्दा पड़े इंसानों को दोबारा ज़िंदा करके उठाए।
7: यहाँ उन रास्तों के बारे में कहा गया है जो हमें दिखाई नहीं देते, लेकिन फ़रिश्तों का आना जाना इन्हें रास्तों से होता है। कुछ विद्वानों का यह भी कहना है कि कभी कभी आसमान शब्द का प्रयोग हर ऊपर वाली चीज़ के बारे में होता है, और यहाँ ऊपर की वह जगह बतायी गई है जिनमें तारों के नियत रास्ते बने हुए हैं।
8: यानी एक तरफ़ यह मानते हो कि अल्लाह ने ही सारी सृष्टि की रचना की है, और दूसरी तरफ़ उसकी यह क़ुदरत मानने से इंकार करते हो कि वह मरने के बाद इंसन को दोबारा ज़िंदा कर सकता है।
19: माँगनेवाला तो वह है जो कि अपनी ज़रूरतों के लिए किसी से मुँह खोलकर माँगता हो, और ठुकराए हुए वे हैं जो ज़रूरतमंद होने के बावजूद किसी से कुछ नहीं माँगते। आदमी इनको जो कुछ देता है, वह कोई एहसान नहीं करता, बल्कि यह असल में उनका हक़ है जो उन्हें मिलना ही चाहिए था, क्योंकि अल्लाह ने धनदौलत में ज़रूरतमंदों का हिस्सा देने का हुक्म दिया है।
28: फ़रिश्ते कुछ खातेपीते नहीं हैं, इसलिए जब इबराहीम (अलै.) ने देखा कि वे कुछ खा नहीं रहे, तो उन्हें डर महसूस हुआ कि हो सकता है कि ये कोई दुश्मन हों।
32: हज़रत लूत (अलै.) की क़ौम पर जो भारी यातना आयी, उसका विवरण सूरह हूद (11:
69-83) और सूरह हिज्र (15:
51--77) में भी आया है।
41: आद की क़ौम का विवरण सूरह अ'राफ़ (7:65) में और समूद की क़ौम का विवरण सूरह अ'राफ़ (7:
73) में विस्तार से हुआ है।
46: इस घटना का विस्तार से वर्णन सूरह हूद (11:
25--48) में आया है।
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