सूरह 40: मोमिन/ ग़ाफ़िर
[माफ़ करनेवाला / The forgiver]
02-03: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है
04-06: विश्वास न करने वालों को चेतावनी
07-09: फ़रिश्ते ईमानवालों के लिए दुआ करते हैं
10-12: फ़ैसले के दिन का दृश्य
13-14: केवल अल्लाह को ही पूरी भक्ति से पुकारो
15-20: अल्लाह फ़ैसला करेगा
21-22: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
23-50: मूसा और फ़िरऔन की कहानी
51-55: अल्लाह अपने रसूलों और उनके माननेवालों की मदद करता है
56-68: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
69-76: क़यामत में फ़ैसले का दृश्य
77-78: रसूल का उत्साह बढ़ाना
79-81: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
82-85: पिछली पीढ़ियों को दी गई सज़ाएं: एक चेतावनी
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
यह किताब अल्लाह की तरफ़ से उतारी जा रही है जो सबसे ज़्यादा ताक़तवाला, सब कुछ जाननेवाला है, (2)
जो गुनाहों को माफ़ करने वाला, तौबा [repentance] क़बूल करने वाला, दंड देने में कठोर और बेहिसाब इनाम देनेवाला है। उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं; अन्ततः उसी की पास सबको लौटकर जाना है। (3)
अल्लाह की आयतों में बस वही लोग झगड़े पैदा करते हैं जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते। [ऐ रसूल] आप ज़मीनों पर उन लोगों को जो (व्यापार से संपत्तियाँ बनाने के लिए) आते-जाते देखते हैं, तो वह (उनकी ख़ुशहाली) कहीं आपको धोखे में न डाल दे। (4)
उनसे पहले नूह [Noah] की क़ौम ने सच्चाई को ठुकरा दिया था, और उनके बाद दूसरे गिरोहों ने भी (अपने-अपने रसूलों की बातों को) मानने से इंकार किया: हर समुदाय के लोगों ने अपने रसूलों को बर्बाद करने की योजनाएं बनायीं (कि उन्हें क़त्ल कर दें या क़ैद कर लें) और उन्होंने झूठ का सहारा लेकर सच्चाई को ग़लत साबित करने की कोशिश की; मगर वह तो मैं था, जिसने (उल्टा) उन्हें बर्बाद कर दिया। तो (देखो!) कैसी भयानक रही मेरी दी हुई सज़ा! (5)
और इसी तरह, आपके रब की ओर से इंकार करने पर अड़े लोगों के ख़िलाफ़ सज़ा तय की जा चुकी है कि ऐसे लोगों का ठिकाना (जहन्नम की) आग में होगा। (6)
जो (फ़रिश्ते) सिंहासन को उठाए हुए हैं, और जो उसको घेरे रहते हैं, अपने रब की बड़ाई के बयान के साथ उसका गुणगान करते रहते हैं और उस पर विश्वास रखते हैं: वे ईमानवालों के लिए माफ़ी की प्रार्थना करते रहते हैं कि, "ऐ हमारे रब! तेरी दया और तेरी जानकारी हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुई है। अतः जिन लोगों ने (गुनाहों से) तौबा कर ली और तेरे बताए हुए रास्ते पर चल पड़े हैं, उन्हें माफ़ कर दे और उन्हें जहन्नम की (दर्दनाक) यातना से बचा ले (7)
और ऐ हमारे रब! उन्हें ऐसे बाग़ों [जन्नत] में दाख़िल कर दे जो हमेशा बाक़ी रहने वाले हैं, जिनका तूने उनसे वादा किया है, और साथ में उनके पूर्वजों, उनके पति/पत्नियों और उनकी सन्तानों में से जो नेक हों, उन्हें भी (उनके साथ दाख़िल कर दे): निस्संदेह! तू ही है जो सबसे ज़्यादा ताक़त रखने वाला, और (अपने हर काम में) गहरी समझ-बूझ रखने वाला है। (8)
उन्हें हर तरह के बुरे कर्मों से बचा: उस दिन जिन्हें तू बुरे कामों (की मिलने वाली सज़ा) से बचा लेगा, तो निश्चय ही उन्हें तेरी दया [रहमत] नसीब हो गई ----- और यही सबसे बड़ी कामयाबी है।" (9)
मगर जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, उनसे कहा जाएगा, "(जहन्नम में आज) तुम्हें जितनी नफ़रत अपने आपसे हो रही है, उससे ज़्यादा बेज़ारी [disgust] अल्लाह को तुम से उस समय होती थी जब तुम्हें ईमान की ओर बुलाया जाता था और तुम (उस पर विश्वास करने से) इंकार करते थे।" (10)
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! तूने हमें दो बार बेजान [एक पैदा होने से पहले का वजूद और एक मरने के बाद] रखा और दो बार ज़िंदा कर दिया। अब हम अपने गुनाहों को स्वीकार करते हैं, तो क्या अब (जहन्नम से) बच निकलने का भी कोई रास्ता है?" (11)
(उनसे कहा जाएगा, “तुम्हारी यह हालत इसलिए है कि जब अकेले अल्लाह का नाम लिया जाता था तो तुम उसे मानने से इंकार कर देते थे, किन्तु उस (अल्लाह) के साथ जब दूसरों को साझेदार [Partner] ठहराया जाता था, तो तुम (उनमें) विश्वास कर लेते थे।" फ़ैसला तो अल्लाह के ही हाथ में है, जो सबसे बड़ा, सबसे महान है। (12)
वही (अल्लाह) है जो तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है और तुम्हारे लिए आसमान से (वर्षा के रूप में) रोज़ी उतारता है, किन्तु इससे सीख तो बस वही लोग हासिल करते हैं जो उसकी ओर (तौबा करने के लिए) सच्चे दिल से झुकें। (13)
अतः [ऐ लोगो] तुम अल्लाह को इस तरह पुकारो कि पूरी भक्ति और समर्पण केवल उसी के लिए हो, चाहे यह बात इंकार करने वालों को कितनी ही बुरी लगे: (14)
वह [अल्लाह] बहुत ऊँचे दर्जेवाला, सिंहासन का मालिक है। वह अपने बन्दों में से जिसे चाहे, उस पर "वही" [Revelations] द्वारा अपनी शिक्षाओं को भेजता है, ताकि वह मुलाक़ात के दिन [क़यामत] से (लोगों को) सावधान कर दे, (15)
जिस दिन सब लोग (क़ब्रों से) निकलकर सामने हाज़िर होंगे, उनकी कोई चीज़ अल्लाह से छिपी न रहेगी, (पूछा जाएगा) "आज किसकी बादशाही है?" (जवाब होगा), "उसी एक अल्लाह की, जो सब पर क़ाबू रखने वाला है। (16)
आज के दिन हर आदमी को उसके (कर्मों की) कमाई का बदला दिया जाएगा; आज कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। निश्चय ही अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।" (17)
[ऐ रसूल] आप उन्हें निकट आते जा रहे (क़यामत के) दिन से सावधान कर दें, जब कलेजे मुँह को आ लगेंगे और दम घुटने लगेगा। ज़ालिमों का न कोई दोस्त होगा और न कोई सिफ़ारिशी, जिसकी बात मानी जाए। (18)
वह [अल्लाह] नज़रों के धोखे तक को जानता है, और उन (सारी चीज़ों) को भी जिसे सीने (अपने दिल के अंदर) छिपाए रखते हैं। (19)
अल्लाह (सच्चाई के साथ) ठीक-ठीक फ़ैसला कर देगा। रहे वे (देवता) जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पुकारते हैं, वे किसी चीज़ का भी फ़ैसला नहीं कर सकते। निस्संदेह अल्लाह ही है जो हर बात सुनता है, सब कुछ देखता है। (20)
क्या वे लोग धरती में घूमे-फिरे नहीं और देखा नहीं कि जो लोग उनसे पहले गुज़र चुके हैं उन लोगों का क्या अंजाम हुआ? वे [पुराने लोग] ताक़त में भी इनसे कहीं ज़्यादा थे, और ज़मीन पर अधिक प्रभावशाली निशानियाँ छोड़ गए थे, फिर भी उनके गुनाहों के कारण अल्लाह ने उन्हें तबाह कर डाला --- और उनके पास कोई न था जो उन्हें अल्लाह से बचा पाता ---- (21)
यह सब कुछ इसलिए हुआ कि उनके पास (अल्लाह के भेजे हुए) रसूल स्पष्ट प्रमाण [Clear signs] लेकर बराबर आते रहे, फिर भी उन लोगों ने उन्हें मानने से इंकार कर दिया। (अन्ततः) अल्लाह ने उन्हें तबाह कर डाला: निश्चय ही वह बड़ी शक्तिवाला, सज़ा देने में बड़ा कठोर है। (22)
और हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों और स्पष्ट प्रमाण [Clear authority] के साथ भेजा (23)
फ़िरऔन [Pharaoh], हामान [फ़िरऔन का दरबारी] और क़ारून [Korah] के पास, किन्तु उन्होंने कहा, "यह तो जादूगर है, बड़ा झूठा है!" (24)
फिर जब वह [मूसा] उनके सामने हमारी तरफ़ से सच्चाई का संदेश लेकर आए, तो उस [फ़िरऔन] ने कहा, "जो लोग उन [मूसा] के साथ (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं, उनके बेटों को मार डालो औऱ उनकी औरतों को ज़िंदा छोड़ दो"--- किन्तु सच्चाई से इंकार करने वालों की चाल तो (ग़लत ही पड़ती है और) भटकने के लिए ही होती है ----- (25)
और फ़िरऔन ने कहा, "छोड़ दो मुझे, ताकि मैं मूसा को मार डालूँ! ---- और वह भी अपने रब को (अपनी सहायता के लिए) बुला ले ---- मुझे डर है कि ऐसा न हो कि वह तुम्हारे धर्म को बदल डाले या यह कि वह [मिस्र] देश में बिगाड़ [disorder] पैदा कर दे।" (26)
मूसा ने कहा, "मैं अपने और तुम्हारे रब की शरण लेता हूँ, हर उस ज़ालिम व घमंडी आदमी से, जो हिसाब-किताब के दिन [क़यामत] पर विश्वास नहीं रखता।" (27)
फ़िरऔन के ख़ानदान में से (अल्लाह पर) विश्वास रखने वाले एक आदमी ने, जिसने अपने ईमान को अभी तक छिपा रखा था, बोल उठा, ‘क्या तुम एक आदमी को केवल इसलिए मार डालोगे कि वह कहता है कि “मेरा रब अल्लाह है?” और वह तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से खुली निशानियाँ भी लेकर आया है --- अगर वह झूठा है, तो उसके झूठ का वबाल उसी पर पड़ेगा--- लेकिन अगर वह सच्चा है, तो जिस चीज़ की वह तुम्हें धमकी दे रहा है, उसमें से कुछ न कुछ तो तुम पर पड़कर रहेगा। अल्लाह उसको मार्ग नहीं दिखाता जो मर्यादा (की सीमा) लांघनेवाला और बड़ा झूठा हो| (28)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! आज तुम्हारी हुकूमत है, (मिस्र की) धरती पर तुम्हारा राज है, किन्तु अल्लाह की यातना अगर आ जाए, तो कौन है जो उसके मुक़ाबले में हमारी सहायता कर सके?" फ़िरऔन ने कहा, "मैं जो ठीक समझता हूँ वह मैंने तुम्हें बता दिया है; और मैं तुम्हारा मार्गदर्शन सही रास्ते की तरफ़ कर रहा हूँ।" (29)
उस आदमी ने, जो ईमान रखता था, (आगे) कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे डर है कि तुम पर (विनाश का) ऐसा दिन न आ पड़े, जैसा उन सभी समुदायों पर आ पड़ा था (जिन्होंने अपने रसूलों का विरोध किया था): (30)
जैसे नूह की क़ौम और आद और समूद और उनके बाद के लोगों का हाल हुआ था---- अल्लाह तो अपने बन्दों पर कभी नाइंसाफ़ी नहीं करना चाहता। (31)
और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे तुम्हारे लिए उस दिन का डर है जिस [क़यामत के] दिन लोग एक दूसरे को चिल्ला-चिल्लाकर पुकार रहे होंगे, (32)
जिस दिन तुम पीठ फेरकर भागोगे, और तुम्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई न होगा! जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, उसे मार्ग दिखाने वाला कोई न होगा। (33)
सच्चाई यह है कि इससे पहले तुम्हारे [मिस्र के लोगों के] पास यूसुफ़ [Joseph] साफ़ निशानियाँ लेकर आए थे, तब भी जो संदेश लेकर वे आए थे, उसके बारे में तुम बराबर सन्देह में पड़े रहे, फिर जब उनकी मृत्यु हो गई, तो तुम कहने लगे, "उनके बाद अल्लाह अब कोई रसूल नहीं भेजेगा।"
इसी तरह अल्लाह संदेह में डूबे हुए बाग़ियों को भटकता छोड़ देता है--- (34)
जो लोग (बिना किसी स्पष्ट प्रमाण के) अल्लाह की आयतों में झगड़े निकाला करते हैं, जबकि उन्हें ऐसा करने का अधिकार [authority] नहीं दिया गया है, तो यह (काम) अल्लाह की नज़र में अत्यन्त अप्रिय है, और उन लोगों की नज़र में भी, जो उस पर विश्वास रखते हैं। इस तरह अल्लाह हर अहंकारी और अत्याचारी आदमी के दिल पर ठप्पा लगा (कर उसे बंद कर) देता है।" (35)
फ़िरऔन ने (व्यंग्य करते हुए अपने वज़ीर से) कहा, "ऐ हामान! मेरे लिए एक ऊँचा भवन [tower] बना दो, ताकि मैं (उस पर चढ़कर) उस रस्सी तक पहुँच सकूँ, (36)
जो आसमानों तक चली जाती है, फिर मैं (वहाँ) मूसा के ख़ुदा को झाँककर देख सकूँ। मैं तो उसे झूठा ही समझता हूँ।" इस तरह फ़िरऔन के कर्मों की बुराइयाँ उसकी नज़रों में सुहावनी बना दी गयीं और उसे सही मार्ग पर जाने से रोक दिया गया--- उसकी चालें उसे बर्बादी की ओर ही ले गयीं| (37)
उस ईमान रखने वाले आदमी ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, मेरी बात मानो! मैं तुम्हे भलाई का सही रास्ता दिखाऊँगा (38)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह सांसारिक जीवन तो बस थोड़े समय के लिए मज़ा लेने की जगह है; यक़ीन करो, कि स्थायी रूप से रहने-बसने का घर तो आख़िरत [परलोक] ही है। (39)
जिस किसी ने बुराई की होगी तो उसे उसी के बराबर बदला मिलेगा; किन्तु जिस किसी ने अच्छा कर्म किया और वह (एक अल्लाह में) विश्वास रखता हो, तो वह मर्द हो या औरत, वह जन्नत में प्रवेश करेगा और वहाँ उसे बेहिसाब रोज़ी दी जाएगी। (40)
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह मेरे साथ क्या मामला है कि मैं तो तुम्हें मुक्ति की ओर बुला रहा हूँ जबकि तुम मुझे (जहन्नम की) आग की ओर बुला रहे हो? (41)
तुम मुझसे चाहते हो कि मैं अल्लाह में विश्वास करने से इंकार कर दूँ और उसके साथ ऐसी चीज़ों को उसका साझेदार [Partner] मान लूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं; जबकि मैं तुम्हें उसकी ओर बुला रहा हूँ जो प्रभुत्वशाली, बड़ा माफ़ करने वाला है। (42)
इसमें कोई शक नहीं कि तुम मुझे जिसकी ओर बुला रहे हो, वह न तो इस दुनिया में पुकारे जाने के क़ाबिल हैं और न आने वाली दुनिया [परलोक] में: सच तो यह है कि हमें लौटना तो अल्लाह ही की ओर है, और असल में जो लोग मर्यादा (की सीमा) लाँघने वाले हैं, वही (जहन्नम की) आग में रहने वाले हैं। (43)
[एक दिन] तुम मुझे याद करोगे, जो कुछ मैं तुमसे अभी कह रहा हूँ, अत: मैं अपना मामला अल्लाह को सौंपता हूँ: अल्लाह अपने बंदों को अच्छी तरह से जानता है।" (44)
अन्ततः अल्लाह ने उस (ईमानवाले) को उन लोगों की बुरी योजनाओं से बचा लिया।
और फ़िरऔन के लोगों को भयानक यातना ने आ घेरा; (45)
उन्हें सुबह व शाम (जहन्नम की) आग के सामने लाया जाएगा; जिस दिन (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, (तो आदेश होगा), "झोंक दो फ़िरऔन के लोगों को अत्यंत बुरी यातना में!" (46)
वे आग के भीतर एक-दूसरे से झगड़ रहे होंगे: तो कमज़ोर लोग उन (घमंडी) लोगों से, जो बड़े बनते थे, कहेंगे, "हम तो तुम्हारे पीछे चलने वाले थे, तो क्या अब तुम हम पर से आग का कुछ भाग हटा सकते हो?" (47)
मगर वे लोग (जो बड़े बनते थे) कहेंगे, "हम सब ही इसी (आग) में पड़े हैं। निश्चय ही अल्लाह बंदों के बीच फ़ैसला कर चुका है।" (48)
आग में पड़े हुए लोग जहन्नम के पहरेदारों से कहेंगे कि "अपने रब से निवेदन करो कि वह हम पर से एक दिन की तकलीफ़ में कुछ कमी कर दे!" (49)
मगर वे कहेंगे, "क्या तुम्हारे पास तुम्हारे रसूल सच्चाई का खुला प्रमाण लेकर नहीं आते रहे थे?" (जहन्नमी) कहेंगे, "बेशक! (आए तो थे)!" और पहरेदार कहेंगे, "फिर तो तुम्हीं फ़रियाद करो, मगर हाँ, इंकार करने वालों [काफ़िरों] की फ़रियाद तो बस (हमेशा) अनसुनी ही रह जाती है”। (50)
हम अपने रसूलों की और उन लोगों की जो ईमान रखते हैं, अवश्य सहायता करते हैं, सांसारिक जीवन में भी और उस दिन (भी करेंगे) जबकि गवाही देने वाले खड़े होंगे। (51)
जिस दिन शैतानी करने वालों के (अपनी सफ़ाई में) किए गए बहाने, उन्हें कुछ भी लाभ न पहुँचाएंगे, बल्कि उनके लिए तो फटकार होगी और रहने के लिए सबसे बुरा घर होगा। (52)
मूसा को हमने (तोरात द्वारा) मार्ग दिखाया, और उस किताब को इसराईल की सन्तान तक पहुँचाकर उन्हें उस (किताब) का वारिस बनाया, (53)
जो बुद्धि और समझवालों के लिए रास्ता दिखाने वाली और नसीहत [Reminder] की चीज़ थी। (54)
अतः ऐ रसूल, आप धीरज से काम लें, कि अल्लाह ने जो वादा किया है, वह ज़रूर पूरा होकर रहेगा। अपनी गलतियों की माफ़ी माँगते रहें; और शाम के समय और सुबह-सवेरे की घड़ियों में अपने रब की बड़ाई करते रहें। (55)
जो लोग बिना किसी अधिकार [authority] के, अल्लाह की आयतों में झगड़े निकालते हैं, उनके सीनों में और कुछ नहीं बल्कि महान बनने की लालसा है, मगर उस (बड़ाई के मुक़ाम) तक वे कभी पहुँचने वाले नहीं। अतः आप (उनकी बुराइयों से) अल्लाह की शरण माँगते रहें। निश्चय ही वह हर बात सुनता है, हर चीज़ देखता है। (56)
आसमानों और ज़मीन को पैदा करना, मानव-जाति को पैदा करने की अपेक्षा कहीं बड़ा (कठिन) काम है, हालाँकि अधिकतर लोग यह (छोटी सी बात) नहीं जानते। (57)
आँखों से अंधा और आँखोंवाला बराबर नहीं होते, ठीक वैसे ही जो लोग (अल्लाह में) विश्वास रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, और जो लोग बुरे कर्म करने वाले हैं, वे बराबर नहीं हो सकते: (मगर अफ़सोस!) तुम इन बातों पर कितना कम ध्यान देते हो! (58)
इस बात में कोई शक नहीं कि (क़यामत की) अंतिम घड़ी ज़रूर आकर रहेगी, मगर अधिकतर लोग इस पर विश्वास नहीं करते! (59)
तुम्हारा रब कहता है, "तुम मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी पुकार का जवाब दूँगा; जो लोग इतने घमंडी हैं कि वे मेरी बंदगी नहीं कर सकते, वे बे-इज़्ज़त होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे।” (60)
अल्लाह ही तो है जिसने तुम्हारे लिए रात बनाई ताकि तुम उसमें आराम पा सको, औऱ दिन बनाया ताकि (उसके उजाले में) तुम देख सको। अल्लाह लोगों के लिए सचमुच बड़ा उदार व मेहरबान [bountiful] है, मगर ज़्यादातर लोग उसका शुक्र अदा नहीं करते। (61)
ऐसा है अल्लाह, तुम्हारा रब, हर चीज़ का पैदा करने वाला: उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं। तुम (ग़लत चीज़ों को सही समझकर) कैसे इतना बहक सकते हो? (62)
इस तरह जो अल्लाह के संदेशों को मानने से इंकार करते हैं, वे (सच्चाई से) बहके हुए हैं। (63)
अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को रहने की जगह बनाया, और आसमान को एक छत बनाया। तुम्हें शक्ल-सूरत दी, तुम्हारी सूरतों को अच्छे रूप दिए, और तुम्हें अच्छी चीज़ों में से रोज़ी दी। ऐसा है अल्लाह, जो तुम्हारा रब है। तो बड़ी बरकतवाला है अल्लाह, जो सारे संसारों का रब है। (64)
वह सदा ज़िंदा रहने वाला है, उसके सिवा कोई ख़ुदा पूजने के लायक़ नहीं। अतः धर्म (भक्ति) को उसी के लिए पूरी तरह समर्पित करके, (अपनी ज़रूरतों के लिए) उसी को पुकारो। सारी बड़ाई अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसारों का रब है। (65)
आप कह दें [ऐ रसूल], "चूँकि मेरे पास मेरे रब की ओर से खुले प्रमाण आ चुके हैं, अत: मुझे उनकी बंदगी करने से मना किया गया है जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो: मुझे तो हुक्म हुआ है कि मैं सारे संसार के रब के आगे अपना सर झुका दूँ।" (66)
वही है जिसने तुम्हें (पहली बार) मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य [Sperm] की एक बूँद से, फिर चिपके हुए ख़ून के लोथड़े से; फिर वह तुम्हें (माँ के पेट से) एक बच्चे के रूप में बाहर लाता है, फिर तुम्हें बढ़ाता है ताकि अपनी जवानी को पहुँच जाओ, फिर मुहलत देता है कि तुम्हें बुढ़ापा आ जाए ----- हालाँकि तुममें से कई इससे पहले ही मर जाते हैं ----- ताकि तुम एक नियत अवधि तक पहुँच जाओ और ऐसा इसलिए है कि तुम सोच-विचार कर सको। (67)
वही है जो ज़िंदगी और मौत देता है, और जब वह किसी काम का फ़ैसला करता है, तो उसके लिए बस इतना ही कहता है: 'हो जा' और बस वह हो जाता है। (68)
क्या आपने [ऐ रसूल] देखा, कि वे कितने बहके हुए लोग हैं जो अल्लाह के संदेश [आयतों] में झगड़े निकालते हैं ---- (69)
जिन लोगों ने हमारे रसूलों द्वारा लायी गयी किताब [Scripture] और उसके संदेशों को मानने से इंकार किया? तो उन्हें पता चल जाएगा, (70)
जब उनकी गरदनों में तौक़ [iron collars] और ज़ंजीरें होंगी, और वे घसीटे जा रहे होंगे, (71)
खौलते हुए पानी में, फिर (जहन्नम की) आग में झोंक दिए जाएँगे, (72)
फिर उनसे कहा जाएगा, "अब कहाँ हैं वे (बुत) जिन्हें तुम पूजते थे, (73)
अल्लाह को छोड़कर?” वे कहेंगे, "वे हमें छोड़कर गुम हो गए: बल्कि हम इससे पहले जिसे पूजते रहे थे, वे असल में कोई चीज़ ही न थे।" इसी तरह अल्लाह इंकार करनेवालों को भटकता छोड़ देता है, (74)
यह सब इसलिए हुआ कि तुम ज़मीन पर बेकार व झूठी चीज़ों की ख़ुशियों में मस्त रहते थे और बेलगाम इतराते फिरते थे। (75)
[उनसे कहा जाएगा], “जहन्नम के दरवाज़ों से भीतर चले जाओ, वहाँ हमेशा रहने के लिए--- अहंकारियों के रहने के लिए क्या ही बुरा ठिकाना है!” (76)
अतः [ऐ रसूल] आप धीरज से काम लें, निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है: जिस (यातना) का हम इन [विश्वास न करने वालों] से वादा कर चुके हैं, चाहे हम आपको उसका कुछ हिस्सा इसी दुनिया में दिखा दें, या हम आपकी जान को पहले ही वापस बुला लें, हर हाल में उन्हें हमारे पास ही लौटकर आना होगा। (77)
हम आपसे पहले कितने ही रसूल भेज चुके हैं--- उनमें से कुछ तो वे हैं जिनका उल्लेख हमने आपसे किया है, और कुछ वे हैं जिनका ज़िक्र हमने नहीं किया है--- और किसी रसूल के लिए भी यह (संभव) न था कि वह अल्लाह की इजाज़त के बिना कोई (चमत्कार या) निशानी ले आए। फिर जब [उस दिन] अल्लाह का आदेश आ जाएगा, तो उनके बीच सच्चाई व इंसाफ़ के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा: उस समय, झूठ के पीछे चलनेवाले भारी घाटा उठाएंगे। (78)
अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए मवेशी [livestock] बनाए, ताकि उनमें से कुछ पर तुम सवारी करो, और उनमें से वह भी हैं जिन्हें तुम खाते हो; (79)
उनमें तुम्हारे लिए और भी कई फ़ायदे हैं। अपनी ज़रूरत के लिए जहाँ भी तुम्हारा दिल चाहे, तुम उस पर (सवार होकर) अपनी मंज़िल तक पहुँच सकते हो: वे तुम्हें सवार करके ले जाते हैं जिस तरह नौकाएं तुम्हें (दरिया में) सवारी कराती हैं। (80)
वह [अल्लाह] तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है: तुम अल्लाह की किन-किन निशानियों को पहचानने से अब भी इंकार करोगे? (81)
क्या उन लोगों ने धरती पर (यहाँ-वहाँ) चल-फिरकर देखा नहीं कि उनसे पहले गुज़र चुके लोगों का कैसा अंजाम हुआ? वे उनसे गिनती में भी अधिक थे, शक्ति में भी ज़्यादा थे और ज़मीन पर अपनी छोड़ी हुई निशानियों की दृष्टि से भी बढ़-चढ़कर थे, इसके बावजूद, जो कुछ भी उन्होंने हासिल किया, वह उनके कुछ भी काम न आया। (82)
फिर जब उनके रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आए, तब भी वे अपने उस ज्ञान पर गर्व करते रहे जो उनके पास था, और जिस यातना का वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे, उसी ने उनको आ घेरा: (83)
जब उन्होंने हमारी यातना अपनी आँखों से देख ली, तो कहने लगे, "(अब) हम विश्वास करते हैं उस अल्लाह पर जो अकेला है; और हम जिसको भी अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराते थे, उन सबको मानने से इंकार करते हैं।" (84)
मगर हमारी (दी गयी) यातना को देख लेने के बाद (अल्लाह पर) विश्वास कर लेने से (अब) उन्हें कोई भी फ़ायदा नहीं होने वाला --- यही अल्लाह की रीति है, जो उसके बंदों (को जाँचने) के लिए हमेशा से रही है ---- उस समय, विश्वास न करनेवाले भारी घाटे में पड़ गए। (85)
नोट:
11: दो बार ज़िंदा करना यानी एक
बार पैदा होना और फिर मरने के बाद दोबारा हिसाब देने के लिए ज़िंदा होना ---- वे कहेंगे
कि मरने के बाद दोबारा जी उठने का विश्वास जो पहले नहीं था, अब हो गया।
25: मूसा अलै. जो संदेश लेकर आए
थे, जब उसे धीरे-धीरे कुछ लोग क़बूल करने लगे,
तो उसे रोकने के लिए यह सलाह दी गई थी कि उनके बेटों को क़त्ल कर दो और
उनकी औरतों को दासी बना लो ताकि वे डर जाएं।
28: कहा जाता है कि वह ईमानवाला
आदमी फ़िरऔन का चचेरा भाई था।
34: हज़रत यूसुफ़ अलै. ने अपने ज़माने
में मिस्र के लोगों के सामने जब अल्लाह का संदेश पेश किया, तो वे उनके नबी होने की बात से इंकार करते रहे, और जब वह चल बसे तो उनके कारनामे याद करके कहने लगे कि अब उन जैसा रसूल पैदा
नहीं हो सकता! इस तरह आगे आने वाले किसी रसूल को मानने का रास्ता भी बंद कर दिया।
37: फ़िरऔन अपने को ख़ुदा होने का
दावा करता था, उसने मूसा (अलै.) से कहा था
कि “अगर तुमने मेरे सिवा किसी और को ख़ुदा माना तो मैं तुम्हें क़ैद कर लूँगा।” देखें सूरह
शुअरा [26: 29]
46: सुबह और शाम कहने से मतलब “हर
समय” हो सकता है।
51: फ़ैसले के दिन लोगों के कर्मों
की गवाही के लिए फ़रिश्तों और नबियों आदि को गवाह के रूप में बुलाया जाएगा।
55: अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल) को
गुनाहों से बचाकर रखा था, फिर भी वह छोटी
से छोटी ग़लतियों के लिए भी हर समय माफ़ी माँगते रहते थे, उनके
मानने वालों को भी ज़्यादा से ज़्यादा माफ़ी माँगते रहना चाहिए।
सुबह और शाम बड़ाई करने का मतलब हर
समय बड़ाई करना हो सकता है।
74: जब उनसे बुतों को पूजने के बारे
में पूछा जाएगा, तो पहले तो वे झूठ बोलते हुए
इंकार करेंगे [6: 23], फिर अपनी ग़लती मान लेंगे।
78: मक्का के लोग अल्लाह के रसूल
से अक्सर कोई चमत्कार दिखाने की माँग करते
रहते थे, लेकिन एक तो यह अल्लाह की इजाज़त के बिना मुमकिन
नहीं, मगर इससे अहम बात यह है कि पहले भी रसूलों ने बहुत सारे
चमत्कार या निशानियाँ दिखाईं, मगर तब भी लोगों ने विश्वास नहीं
किया और उसे जादू समझकर टाल दिया।
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