Sunday, July 28, 2019

Chronological Quran: Medinan Period-5 [मदनी काल-5] : 629---632 AD

Chronological Quran: 
Medinan Period-5 [मदनी काल-5] : 629---632 AD
 
 
 
सूरह 48 : अल-फ़तह [जीत/ Victory]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] सचमुच हमने आपके लिए एक पक्की जीत का रास्ता खोल दिया है, (1)
ताकि अल्लाह आपके पिछले गुनाहों को और आगे होनेवाली भूल-चूक को माफ़ कर दे, आपके ऊपर अपनी नेमतें [Grace] पूरी कर दे, और आपको सीधे रास्ते पर चलाए, (2)
और अल्लाह आपकी ऐसी मदद करे जो ज़बरदस्त हो। (3)
वही (अल्लाह) था, जिसने ईमान रखनेवालों के दिलों के अंदर (उस समय) शान्ति व सुकून उतार दिया (जब हुदैबिया में ईमानवालों ने अपने रसूल के फ़ैसले को मानने की क़सम खायी), ताकि उनके ईमान में कुछ और ईमान की बढ़ोत्तरी हो जाए ------- आसमानों और ज़मीन की सारी ताक़तें अल्लाह ही की हैं; और वह सब कुछ जाननेवाला, हर चीज़ की समझ-बूझ रखनेवाला है------- (4)
ताकि वह ईमान रखनेवाले मर्दों और ईमानवाली औरतों को (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर दे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे, और उनसे उनकी बुराइयाँ दूर कर दे ----- यह है अल्लाह की नज़र में बहुत बड़ी कामयाबी!----- (5)
और पाखंडी [मुनाफ़िक़/ Hypocrites] मर्दों और औरतों को, और मूर्तिपूजा करनेवाले [Idolatrous] मर्दों और औरतों को (जो अल्लाह के साथ दूसरों को जोड़ते हैं) यातना दे, जिन्होंने अपने दिलों में अल्लाह (और रसूल) के बारे में बुरे विचार बैठा रखे हैं------ वही लोग हैं जो बुराइयों के घेरे में पड़ जाएंगे! ----- जो अल्लाह की नाराज़गी उठाए फिरते हैं, जिन्हें अल्लाह ने (अपनी रहमत से) दूर कर दिया है और जिनके लिए उसने जहन्नम तैयार कर रखी है, और वह कितना बुरा ठिकाना है! (6)
आसमानों और ज़मीन की सारी ताक़तें अल्लाह की हैं; अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (7)
[ऐ रसूल!] हमने आपको (सच की) गवाही देनेवाला, (ईमान व अच्छे कर्मों की) ख़ुशख़बरी सुनानेवाला, और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान करनेवाला बनाकर भेजा है, (8)
ताकि तुम [लोग] अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] करो, उसकी मदद करो, उसका सम्मान करो, और सुबह शाम उसकी तारीफ़ों का बखान किया करो। (9)

[ऐ रसूल] जो लोग आपके साथ अपनी निष्ठा का वचन [बै'त] देते हैं, वे असल में ख़ुद अल्लाह के साथ अपनी निष्ठा का वचन देते हैं-----(लोगों ने रसूल के हाथ पर अपना हाथ रखकर वचन दिया, तो) उनके हाथों के ऊपर अल्लाह का हाथ भी है-----और अगर  कोई अपना वचन तोड़ेगा, तो ऐसा कर के वह ख़ुद अपने आपको ही नुक़सान में डाल लेगा : तो जिस किसी ने अल्लाह के साथ अपना वचन निभाया, उसे अल्लाह बहुत बड़ा इनाम देगा। (10)
अरब के वह देहाती लोग [बद्‌दू] जो (हुदैबिया के अभियान में) साथ नहीं गए थे, वे अब आपसे कहेंगे, "हम (उस समय) अपनी संपत्ति और अपने परिवार (के मामलों) में व्यस्त थे: आप हमारे लिए माफ़ी की दुआ कर दें," मगर वे अपनी ज़बान से जो कुछ कहते हैं, असल में वह उनके दिलों में नहीं होतीं। आप कह दें, "अल्लाह अगर तुम्हें कोई नुक़सान या फ़ायदा पहुँचाना चाहे, तो कौन है जो तुम्हारे लिए उसके सामने कुछ भी कर सके?" नहीं! बल्कि जो कुछ भी तुम (लोग) करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (11)
"नहीं! बल्कि तुमने यह सोचा कि रसूल और उनके साथी ईमानवाले, अब कभी अपने घरवालों के पास लौटकर नहीं आएँगे और इस ख़्याल से तुम्हारे दिलों को ख़ुशी होती थी। तुम्हारी सोच बहुत बुरी व गंदी है, क्योंकि तुम भ्रष्ट लोग हो":  (12)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल में विश्वास [ईमान] नहीं रखते, उनके लिए हमने (जहन्नम की) भड़कती आग तैयार कर रखी है। (13)
आसमानों और ज़मीन का सारा नियंत्रण [बादशाही] अल्लाह के हाथ में है, और वह  जिसे चाहे माफ़ कर देता है, और जिसे चाहे सज़ा देता है : अल्लाह (गुनाहों को) बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (14)

[ऐ ईमानवालो!] जब तुम (जंग के लिए) ऐसी जगह निकल पड़ो जहाँ से 'लूट का माल' [माल-ए- ग़नीमत/ war gains] पाने की उम्मीद हो, तो जो लोग (पिछली बार के अभियान में जान बूझकर) नहीं गए थे, वे कहेंगे, "हमें भी अपने साथ चलने दो।" वे अल्लाह की बात बदल देना चाहते हैं, मगर [ऐ रसूल!] आप उनसे कह दें, "तुम हमारे साथ नहीं चल सकते : अल्लाह ने यह बात पहले ही कह रखी है।" इस पर वे जवाब देंगे, "तुम हम से जलते हो, इसलिए नहीं ले जाते," (अफ़सोस इन पर!) ये कितने ना-समझ हैं! (15)

आप उन अरबी देहातियों (बददुओं) से कह दें, जो (मदीने में ही) रुके रह गए थे, "तुम लोगों को अब जंग में बहुत ही ताक़तवर लोगों का सामना करने और उनसे उस वक़्त तक लड़ने के लिए बुलाया जाएगा, जब तक कि वे समर्पण न कर दें : अगर तुम ने आज्ञा मानी, तो तुम्हें अच्छा इनाम दिया जाएगा, लेकिन अगर तुम ने (लड़ाई से) मुंह मोड़ा, जैसा कि तुम पहले भी कर चुके हो, तो अल्लाह तुम्हें भारी दंड देगा----- (16)
हाँ, अंधे लोगों पर, लँगड़े लोगों पर, और बीमार लोगों पर (जंग में शामिल न होने का) कोई दोष नहीं है।" जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानेगा, उसे वह (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी; जो कोई उससे मुँह मोड़ेगा, उसे वह दर्दनाक सज़ा देगा।  (17)

अल्लाह ईमानवालों से बहुत ख़ुश हुआ, जब (ऐ रसूल) उन लोगों ने (हुदैबिया में) एक पेड़ के नीचे आपके हाथ पर हाथ रख कर आपसे निष्ठा [बै'त] की क़सम खायी : अल्लाह जानता था जो कुछ उनके दिलों में था और इसीलिए उसने उन पर सुकून व शान्ति उतार भेजी और इनाम में उन्हें जल्द मिलने वाली जीत (की ख़बर) दी, (18)
और साथ में यह भी कि (जंग के बाद) बहुत सारे माल, उनके हाथ आ जाएंगे। अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और समझ-बूझ रखनेवाला है। (19)
अल्लाह ने तुम (लोगों) से भविष्य में (जंग के बाद हाथ आने वाले) बहुत से माल का वादा कर रखा है : उसने तुम्हारे लिए ये फ़ायदे बहुत कम समय में ही दे दिए हैं। उसने आक्रमक लोगों के हाथ तुम तक पहुंचने से रोक रखे हैं, (ऐसा इसलिए हुआ) ताकि यह ईमानवालों के लिए एक निशानी बन सके, और यह कि वह तुम्हें सीधे मार्ग पर चलने का सही रास्ता दिखा दे। (20)
इसके अलावा कई दूसरे (लूट के) माल और भी हैं (जो मिलने वाले हैं), मगर अभी उन पर तुम्हारा ज़ोर नहीं चल सकता। (लेकिन) उनके ऊपर अल्लाह का पूरा नियंत्रण है : अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (21)

अगर (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] ने तुम (लोगों) से लड़ाई लड़ी होती, तो वे (मैदान छोड़कर) भाग खड़े होते, और कोई न होता जो उन्हें बचा सकता या उनकी मदद कर सकता :  (22)
अल्लाह की रीति [सुन्नत] पहले भी ऐसी ही थी, और तुम अल्लाह की रीति में कभी कोई बदलाव नहीं पाओगे। (23)
वही (अल्लाह) था जिसने मक्का की घाटी में उनके हाथ तुम तक पहुँचने से, और तुम्हारे हाथ उन तक पहुँचने से रोक लिए, जबकि वह तुम्हें इससे पहले ही उन (मक्का से आ कर हमला करनेवाले) लोगों पर जीत दे चुका था----- जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह सब देखता है। (24)
ये वही लोग हैं जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, तुम्हें पवित्र मस्जिद [काबा] जाने से रोका, और क़ुरबानी के जानवरों को क़ुरबान करने की जगह पहुंचने सेे रोक दिया। अगर उन (काफ़िरों) के बीच बहुत-से ईमानवाले मर्द और औरतें (मक्का में) मौजूद न होते, जिन्हें तुम नहीं जानते हो, तो तुम ने उन्हें अपने क़दमों तले रौंद दिया होता, और अनजाने में ही तुम्हारे हाथों गुनाह हो जाता (इसीलिए युद्ध की अनुमति नहीं दी गयी) ----- अल्लाह जिसे चाहता है, उसे अपनी रहमत के साये में ले लेता है---- अगर (मक्का में) ईमानवाले (काफ़िरों से) अलग-थलग रह रहे होते, तो हम ने विश्वास न करनेवालों को दर्दनाक सज़ा दी होती। (25)
जबकि (एक तरफ़) विश्वास न करनेवाले लोगों केे दिलों में नफ़रत व गुस्सा भरा था ---- जिहालत [अज्ञानता] का ग़ुस्सा---- दूसरी तरफ़ अल्लाह ने अपने रसूल और ईमानवालों के दिलों पर शान्ति व सुकून उतार दिया और उनके लिए (हुदैबिया में पेड़ के नीचे) अल्लाह से किए हुए वादे को निभाना (और ग़लत काम से रुक जाना) ज़रूरी क़रार दिया, क्योंकि यही उनके लिए ज़्यादा सही और उचित था। और अल्लाह को हर चीज की पूरी जानकारी है। (26)

सचमुच अल्लाह ने अपने रसूल के ख़्वाब को पूरा कर दिखाया है : "अल्लाह ने चाहा, तो आप ज़रूर ही उस पवित्र मस्जिद [काबा] में सुरक्षित दाख़िल होंगे, (हज की रीति के अनुसार) अपने सिर के बाल मुंडवाए हुए या बाल छंटवाए हुए, बिना किसी डर-भय के!" ----- अल्लाह वह बातें जानता था जो आप नहीं जानते-----और उसने आपके लिए बहुत जल्द मिलने वाली जीत तय कर दी है।  (27)
वही [अल्लाह] था जिसने अपने रसूल को सही मार्गदर्शन और सच्चे दीन [religion] के साथ भेजा, ताकि यह दिखाया जा सके कि यह दीन सारे (झूठे) दीनों से बढ़कर है। और गवाह की हैसियत से अल्लाह काफ़ी है: (28)

मुहम्मद (सल.) अल्लाह के रसूल [Messenger] हैं।
जो लोग उनके पीछे चलनेवाले हैं, वे विश्वास न करनेवालों के प्रति सख़्त हैं और आपस में एक दूसरे के साथ रहम-दिल हैं। तुम उन्हें देखोगे कि अल्लाह के फ़ज़ल [bounty] की तलाश में और उसकी ख़ुशी की चाहत में वे रुकू [kneeling] और सज्दे [Prostrating] में झुके रहते हैं : उनके चहरों पर सज्दे (में बार-बार झुकने) के कारण निशान पड़ जाते हैं। तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] में उनके बारे में इसी तरह दर्शाया गया है : जैसे किसी बीज से कोंपल निकलती है, फिर वह मज़बूत होती है, फिर बढकर मोटी हो जाती है, फिर अपने तने पर इस तरह सीधी खड़ी हो जाती है कि उसे उगाने वाले देख कर बहुत ख़ुश हो जाते हैं। इस तरह, अल्लाह उन (की तरक़्क़ी) से विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] के दिल जलाता है; जो लोग ईमान रखते हैं, और नेक व अच्छे कर्म करते हैं, उनके (गुनाहों की) माफ़ी के लिए और बहुत बड़े इनाम के लिए अल्लाह ने वादा कर रखा है। (29)



सूरह 5 : अल- माइदा [Al- Ma’ida] :
The Table Spread With Food / तरह-तरह के खाने की दावत]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है

ऐ ईमानवालो! अपने (धार्मिक) दायित्वों [obligations] को पूरा करो। मवेशी चौपाये (का मांस) खाना तुम्हारे लिए वैध [हलाल/ lawful] कर दिया गया है, सिवा उनके जो तुम्हें आगे बताया जा रहा है. (याद रहे), जब तुम हज/ उमरे की (तीर्थ) यात्रा पर रहो, तो (इहराम की हालत में) शिकार करना तुम्हारे लिए वैध नहीं [हराम] है------- अल्लाह जैसा चाहता है, आदेश देता है,  (1)

अत: ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह की निशानियों [हज से जुड़े संस्कारों, रीति-रिवाजों] का अनादर न करो, न उन (चार) महीनों का जो पवित्र ठहराये गए हैं, न क़ुर्बानी के जानवरों का, न उन जानवरों के गले में पड़े हुए पट्टों का, और न उन लोगों का जो अपने रब के फ़ज़ल [bounty] और उसकी ख़ुशी की चाह में पवित्र घर [काबा] को जा रहे हों------- मगर जब तुम हज से जुड़ी रीतियों को पूरा कर चुको, तब शिकार कर सकते हो। और (देखो!), जिन लोगों ने (हुदैबिया की संधि के समय) तुम्हें उस पवित्र मस्जिद [काबा] में (हज के लिए) जाने से रोक दिया था, उनसे तुम्हारी नफ़रत कहीं तुम्हें इस बात पर न उभार दे कि तुम नियमों को तोड़ डालो : भलाई के कामों को करने और बुराई के कामों से बचने में एक दूसरे की मदद किया करो; गुनाह के काम करने और ज़ुल्म व अत्याचार के कामों में (कभी भी) एक दूसरे की मदद न करो। अल्लाह (के आदेश न मानने के नतीजे) से डरो, क्योंकि उसकी सज़ा बड़ी कठोर होती है। (2)

[मुसलमानो!], तुम्हारे लिए (खाने की) ये चीज़ें हराम [Forbidden] कर दी गयी हैं: मरे हुए जानवर का (सड़ा-गला) मांस; ख़ून; सूअर का मांस, कोई भी जानवर जिस पर (काटते समय) अल्लाह को छोड़कर किसी और का नाम लिया गया हो; कोई भी जानवर जिसका गला घोंटकर मारा गया हो, या ज़ोरदार चोट खाकर मर गया हो, या ऊँचाई से गिरकर या सींग लगने से मरा हो या जिसे किसी हिंसक पशु ने फाड़ खाया हो--- मगर हाँ, वह (हराम नहीं) जिसे (मरने से पहले) तुमने (सही तरीक़े से) ज़बह कर लिया हो; या (किसी जानवर का मांस) जो मूर्तिपूजकों के बलि देने की जगह पर काटा गया हो, हराम [Forbidden] है। तुम्हारे लिए यह भी हराम किया जाता है कि लोगों के बीच (मांस के) हिस्सों का बंटवारा निशान लगी हुई जुए की तीरों से किया जाए----- यह बड़े गुनाह की रीति है ----- आज (सच्चाई से) इंकार करनेवाले इस बात की सारी उम्मीद छोड़ चुके हैं कि तुम अपना धर्म छोड़ दोगे. उनसे न डरो : मुझसे डरो। आज के दिन मैंने तुम्हारे दीन को तुम्हारे लिए (हर तरह से) पूरा कर दिया, तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और मैंने तुम्हारे दीन के रूप में "इस्लाम" [एक अल्लाह पर पूरी भक्ति] को पसन्द कर लिया : लेकिन अगर तुम में से कोई भूख से ऐसा मजबूर हो जाए कि उसे हराम चीज़ें खानी पड़ जाएं, तो अगर उसका इरादा गुनाह करने का नहीं था, तो (कोई बात नहीं) अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (3)


[ऐ रसूल!], वे आपसे पूछते हैं कि "क्या क्या चीज़ें उनके खाने के लिए हलाल [lawful] हैं?" कह दें, "सारी अच्छी चीज़ें तुम्हारे लिए हलाल हैं." (इनमें वह भी शामिल हैं) जिन शिकारी चिड़ियों और जानवरों को तुमने शिकार पकड़ने के लिए सधा रखे हों, फिर जैसे अल्लाह ने तुम्हें सिखा दिया है, उन्हें भी सिखा दो, अत: वे जिस जानवर को (शिकार कर के)  तुम्हारे लिए बचाए रखें, उसको (बिना झिझक) खा सकते हो, मगर (शिकारी जानवर को शिकार के लिए छोड़ते हुए) अल्लाह का नाम ले लिया करो। अल्लाह (के हुक्म को न मानने के नतीजे) से डरते रहो : (याद रहे) अल्लाह (कर्मों का) हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।" (4

आज सारी अच्छी चीज़ें तुम्हारे लिए हलाल कर दी गयी हैं, जिन [यहूदी व ईसाई] लोगों को (तुम से) पहले (आसमानी) किताब दी गयी थी, उनका खाना तुम्हारे लिए हलाल है और तुम्हारा खाना उनके लिए हलाल है। इसी तरह, अछूती व शरीफ़ और  ईमानवाली औरतें तुम्हारे लिए हलाल हैं, और साथ में, जिन्हें तुम से पहले किताब दी गयी थी [यहूदी व ईसाई], उन लोगों की भी अछूती व शरीफ़ औरतें तुम्हारे लिए हलाल हैं, शर्त यह है कि तुम ने उनकी मेहर अदा कर दी हो और उनसे शादी की हो. (ध्यान रहे), न तो इसका मक़सद (बिना निकाह के) प्यार-मोहब्बत करना हो, और न ही चोरी-छिपे रखैलों को रखने का होना चाहिए। जिस किसी ने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, उसका सारा किया-धरा (कर्म) बेकार हो गया, और आख़िरत [परलोक] में वह घाटा उठाने वालों में गिना जाएगा। (5)

ऐ ईमान लेनेवालो! जब तुम नमाज़ के लिए उठो तो अपने चहरों को और हाथों को कुहनियों तक धो लिया करो और अपने सिरों पर हाथ फेर लो और अपने पैरों को भी टखनों तक धो लो। और अगर (सेक्स करने या वीर्य निकल जाने के कारण) तुम नापाक हो गए हो, तो अच्छी तरह (नहा-धो कर) पाक हो जाओ। अगर तुम में से कोई बीमार हो, या सफ़र में हो, या शौच करके आया हो या उसका किसी औरत से शारीरिक मिलन हुआ हो, और फिर पानी न मिले तो थोड़े सी साफ़ मिट्टी को लेकर उसे अपने मुँह और हाथों पर फेर लो। अल्लाह तुम पर किसी तरह का बोझ डालना नहीं चाहता : वह तो केवल तुम्हें पाक-साफ़ करना (और हराम चीज़ों से बचाना) चाहता है और तुम पर अपनी नेमत [हिदायत] पूरी कर देना चाहता है, ताकि तुम शुक्र अदा करनेवाले बनो। (6

याद करो उन नेमतों Blessings] को, जो अल्लाह ने तुम पर उतारीं, और वह वचन जिससे तुम्हें बाँधा गया था, जबकि तुमने कहा था - "हम ने सुना और हम ने (आदेश) मान लिया।" अल्लाह से डरते रहो : वह दिलों के अंदर छिपे हुए राज़ की भी पूरी जानकारी रखता है। (7)

ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह की भक्ति में मज़बूती से जमे रहो और निष्पक्ष होकर गवाही देनेवाले बनो : ऐसा नहीं होना चाहिए कि दूसरों के प्रति नफ़रत तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम न्याय करना छोड़ दो। बल्कि हर हाल में न्याय करो, कि यह अल्लाह का डर रखने के ज़्यादा निकट है। अल्लाह से डरते रहो : जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।  (8)

जिस लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया [ईमान] और अच्छे कर्म किए, उनके लिए (गुनाहों की) माफ़ी और बड़े इनाम का अल्लाह ने वादा कर रखा है;  (9)

जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया और हमारी आयतों को ठुकरा दिया, वे (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में पड़नेवाले हैं।  (10

ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह की उस मेहरबानी को याद करो जो उसने तुम पर किया था, जब कुछ लोग तुम्हारे ख़िलाफ़ (ज़ुल्म करने और मार डालने के लिए) हाथ उठाने वाले थे, और अल्लाह ने उनके हाथ (तुम तक पहुँचने से) रोक दिए थे। अत: अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो : ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए। (11)


अल्लाह ने इसराईल की सन्तान से वचन लिया था. हम ने (उनके बारह क़बीले के लिए) उनके बीच से बारह सरदार खड़ा किए, और अल्लाह ने कहा था, "मैं तुम्हारे साथ हूँ : अगर तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ो, निर्धारित ज़कात दो, मेरे रसूलों पर विश्वास करो और उनका साथ दो, और (मेरे रास्ते में ख़र्च कर बाद में कई गुना ज़्यादा पाने के लिए) अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दो, तो मैं तुम्हारे गुनाहों को मिटा दूँगा, और तुम्हें (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करूँगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, तुम में से कोई भी अगर अब भी इस (वचन) को नज़रअंदाज़ करता है, तो वह सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ेगा।" (12)

मगर उन लोगों ने अपने वचन तोड़ दिए, तो फिर हम ने उन्हें (अपने से) दूर कर दिया, और उनके दिल कठोर कर दिए। वे (उतारी गयी किताब के) शब्दों में हेर-फेर कर के उसके अर्थ को बिगाड़ देते हैं, और जो चीज़ उन्हें याद रखने के लिए बोली गयी थी, उसमें से एक बड़ा हिस्सा तो वे बिल्कुल भूल बैठे हैं : (ऐ रसूल) आप उनके कुछ लोगों को छोड़कर बाक़ी सारे लोगों में धोखा देने की प्रवृत्ति पाएंगे। आप इस पर ध्यान न दें, और उन्हें माफ़ कर दें : अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो अच्छा कर्म करते हैं। 
(13).
हम ने उन लोगों से भी वचन लिया था, जो कहते हैं, " हम ईसाई [Christians] हैं", मगर वे भी उनमें से कुछ चीज़ों को भुला बैठे जिसे उन्हें याद रखने के लिए बोला गया था, अत: हम ने उनके बीच क़यामत तक के लिए दुश्मनी और नफ़रत की आग भड़का दी, जब अल्लाह उन्हें बता देगा, जो कुछ उन्होंने किया होगा।  (14)

ऐ किताबवालो [यहूदियों व ईसाइयों]! हमारा रसूल तुम्हारे पास आ चुका है, ताकि वह तुम्हें (आसमानी) किताब की बहुत सी बातों को समझा सके जो तुम लोगों ने छिपा रखी थीं, और (जो कुछ तुम ने किया है), उनमें से बहुत सी चीज़ों को नज़रअंदाज़ कर सके। तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से (रसूल के रूप में) एक रौशनी आ चुकी है, और साथ में चीज़ों को स्पष्ट कर देनेवाली एक किताब [क़ुरआन] भी, (15

जिसके द्वारा अल्लाह उन लोगों को सलामती की राह दिखाता है, जो ऐसी चीज़ के पीछे चलते हैं जिससे अल्लाह ख़ुश होता है, जो उन्हें अल्लाह की मर्ज़ी से, अँधेरों से बाहर निकालकर रौशनी की तरफ़ लाता है, और उन्हें सीधा रास्ता दिखाता है। (16

जो लोग कहते हैं, "अल्लाह तो वही मरयम [Mary] का बेटा मसीह [Jesus] है", वे तो खुले आम सच्चाई को झुठला रहे हैं. कह दें, "अगर अल्लाह मरयम के बेटे, मसीह को, साथ में उसकी माँ को और ज़मीन पर बसनेवाले बाक़ी सबको बर्बाद करना चाहे, तो क्या कोई भी उसे ऐसा करने से रोक सकता है? आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उसके बीच में है, उसका सारा नियंत्रण अल्लाह ही के क़ब्ज़े में है : वह (बिना बाप के मसीह की तरह) जैसा चाहता है, पैदा करता है। अल्लाह को हर चीज़ (करने) की ताक़त है।" (17)

यहूदी और ईसाई कहते है, "हम तो अल्लाह के बच्चे और उसके चहेते हैं।" कह दें, "तो फिर वह तुम्हारे गुनाहों पर तुम्हें दंड क्यों देता है? बात यह नहीं है, बल्कि तुम एक मामूली आदमी हो, जो उसकी पैदा की हुई सृष्टि का एक हिस्सा है :  वह जिसे चाहता है, क्षमा कर देता है और जिसे चाहता है, दंड देता है।" आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उसके बीच में हैं, हर चीज़ का नियंत्रण अल्लाह ही के हाथ में है : सबको अंत में उसी के पास पहुंचना है। (18

ऐ किताबवालो! हमारे रसूलों के आने का सिलसिला एक मुद्दत से बन्द था, मगर अब तुम्हारे पास हमारा रसूल आ गया है, ताकि तुम्हारे लिए वह (हमारे आदेशों को) स्पष्ट कर दे और तुम यह न कह सको कि "हमारे पास (नेक काम की) ख़ुशख़बरी देनेवाला और (बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान करनेवाला कोई नहीं आया।" तो देखो! अब तुम्हारे पास ख़ुशख़बरी देनेवाला और सावधान करनेवाला आ चुका है : अल्लाह को हर चीज़ करने की शक्ति है। (19) 

मूसा [Moses] ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था, "ऐ लोगो! तुम पर की गयी अल्लाह की नेमतों को याद करो : कैसे उसने तुम्हारे बीच से नबियों [Prophets] को खड़ा किया और तुम्हें बादशाह बनाया और (उस ज़माने में) तुम को कुछ ऐसी चीज़ें दीं, जो किसी और क़ौम के लोगों को नहीं मिली थीं। (20)

"ऐ मेरे लोगो! इस पवित्र सरज़मीन [सीरिया व फ़िलिस्तीन क्षेत्र] में (हिम्मत कर के) दाख़िल हो जाओ, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए पहले से तय कर रखा है------  (देखो!) उल्टे पाँव न लौट आओ, वर्ना नुक़सान उठानेवालों में हो जाओगे।" (21

लोगों ने (जवाब में) कहा, "ऐ मूसा! इस सरज़मीन पर तो बड़े ताक़तवर (और डरावने) लोग रहते हैं। जब तक वे लोग वहाँ से चले नहीं जाते, हम तो वहाँ क़दम रखनेवाले नहीं. हाँ, अगर वे वहाँ से निकल जाएँ, तो हम ज़रूर दाख़िल हो जाएँगे।" (22)

तब भी, उन डरनेवाले लोगों में से दो आदमियों ने जिन्हें अल्लाह ने (ईमान की) नेमत दी थी, बोल उठे, "तुम हिम्मत करके उन पर चढ़ाई कर दो और (शहर के) दरवाज़े से जा घुसो और एक बार तुम अंदर घुस गए, तो जीत तुम्हारी ही होगी। अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो अल्लाह पर भरोसा रखो।" (23)

उन लोगों ने कहा, "ऐ मूसा! जब तक वे लोग वहाँ हैं, हम तो वहाँ कभी दाख़िल नहीं होंगे। अगर लड़ना ही है तो तुम और तुम्हारा रब, दोनों वहाँ जाकर उनसे लड़ते रहना, हम तो यहीं बैठे रहेंगे।" (24

मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे अपने और अपने भाई के अलावा किसी और पर कोई अधिकार नहीं है : हम दोनों और इन आज्ञा न माननेवालों के बीच अब तू ही फ़ैसला कर।" (25

अल्लाह ने कहा, "ठीक है, तो अब उनके लिए चालीस साल तक इस ज़मीन पर जाने से रोक लगा दी गयी है : (इस दौरान) ये धरती पर मारे-मारे फिरेंगे, सो (ऐ मूसा!) जो लोग आज्ञा नहीं मानते, उनकी हालत पर शोक न करो" (26)

[ऐ रसूल!], आप उन्हें आदम के दो बेटों की कहानी की सच्चाई के बारे में बता दें : दोनों ने (अल्लाह के सामने) अपनी-अपनी क़ुर्बानी पेश की, उनमें से एक [हाबील/ Abel] की क़ुर्बानी क़बूल हो गई और दूसरे [क़ाबील/ Cain] की क़बूल नहीं हुई। इस पर (क़ाबील ने जलते हुए हाबील से) कहा, "मै तुझे अवश्य मार डालूँगा।" मगर हाबील ने कहा, "अल्लाह तो उन्हीं की क़ुर्बानी क़बूल करता है, जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं। (27

अगर तू मुझे क़त्ल करने के लिए हाथ उठाएगा, तो मैं तुझे मारने के लिए अपना हाथ नहीं उठाउँगा। मैं डरता हूँ अल्लाह से, जो सारे संसार का रब है,  (28

"मैं तो चाहता हूँ कि तू मेरे गुनाह और साथ में अपने गुनाहों का बोझ अपने ही सिर ले ले, और (जहन्नम) की आग में बसनेवालों में से हो जा : शैतानियाँ करनेवालों का बदला ऐसा ही होता है।" (29

मगर उसकी आत्मा ने उसे अपने भाई की हत्या के लिए उकसाया : उसने अपने भाई (हाबील) की हत्या कर डाली और हारे हुए लोगों में शामिल हो गया।  (30)

तब अल्लाह ने एक कौआ भेजा जो ज़मीन कुरेदने लगा, ताकि उसे दिखा दे कि वह अपने भाई की लाश को कैसे छिपाए। यह देख कर (क़ाबील) कहने लगा, "हाय, अफ़सोस मुझ पर! क्या मैं इस कौए जैसा भी न हो सका कि अपने भाई की लाश (ज़मीन खोद कर) छिपा देता?" (अपनी हालत पर) बाद में वह बहुत शर्मिंदा हुआ। (31)

इसी के चलते, हमने इसराईल की सन्तान के लिए यह आदेश लिख दिया था कि अगर कोई आदमी किसी को क़त्ल कर डालता है, तो मानो उसने सारे इंसानों का ख़ून कर दिया, और जिस किसी ने किसी आदमी की जान बचा ली, तो मानो उसने सारे इंसानों की ज़िंदगी बचा ली ------सिवाए इसके, कि यह हत्या किसी और की जान के बदले में हो, या देश में लूट-मार मचानेवालों को सज़ा देने के लिए की गयी हो. हमारे रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आते रहे (और ज़ुल्म करने से रोकते रहे), मगर फिर भी उनमें बहुत-से लोग ऐसे निकले जो ज़मीन पर ज़्यादतियाँ करते ही रहे।  (32

जो लोग अल्लाह और उसके रसूल के विरुद्ध जंग करते हैं और ज़मीन पर फ़साद फैलाने के लिए (डाकू, लुटेरे बन कर) दौड़ते फिरते हैं, (जुर्म के अनुसार) उनकी सज़ा तो यही है कि क़त्ल कर दिए जाएं या सूली पर चढ़ाए जाएँ या उनके हाथ-पाँव विपरीत दिशाओं में काट डाले जाएँ [बायाँ हाथ और दायाँ पाँव या दायाँ हाथ और बायाँ पाँव] या उन्हें देश-निकाला कर दिया जाए : यह अपमान और तिरस्कार तो इस दुनिया के लिए है, और फिर परलोक में भी उनके लिए बड़ी भयानक यातना है,  (33)

मगर (हाँ), इससे पहले कि तुम उन पर क़ाबू पाते हुए धर दबोचो, अगर वे (अपने गुनाहों से) तौबा कर लें------- तो ऐसी हालत में तुम्हें ध्यान रहे कि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (34)

ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे) से डरते रहो, और अल्लाह के नज़दीक पहुँचने का ज़रिया ढूंढो, और उसके मार्ग में जी-तोड़ संघर्ष करो, ताकि तुम्हें कामयाबी मिल सके। (35)

अगर विश्वास न करनेवालों के हाथ में वह सब कुछ (धन-दौलत) आ जाए जो सारी ज़मीन में है और उतना ही और भी (कहीं से) पा लें, फिर वे ये सब कुछ क़यामत के दिन की यातना से बचने के लिए अपनी जान के बदले में देने को तैयार हों, तब भी उनकी ये चीज़ें स्वीकार नहीं की जाएँगी---- उन्हें दर्दनाक यातना होगी।  (36)

वे चाहेंगे कि (जहन्नम की) आग से बाहर निकल आएँ, मगर वे उससे निकल नहीं सकेंगे : उनके लिए कभी न ख़त्म होनेवाली यातना है। (37)

चोर चाहे मर्द हो या औरत, उसके हाथ काट डालो, जो कुछ उन्होंने किया है यह उसकी सज़ा है और अल्लाह की ओर से इस (बुराई) को रोकने का एक तरीक़ा : अल्लाह सब पर प्रभुत्व रखनेवाला, (और आदेश देने में) समझ-बूझ रखनेवाला है.  (38

लेकिन अगर किसी ने अपने बुरे काम [चोरी] से (दिल से) तौबा कर ली और अपनी ग़लतियों को सुधार लिया, तो अल्लाह उसकी तौबा क़बूल कर लेगा : अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, दयावान है। (39

[ऐ रसूल!], क्या आप नहीं जानते कि आसमानों और ज़मीन का सारा नियंत्रण [बादशाही] केवल अल्लाह के पास है? वह जिसे चाहे यातना दे और जिसे चाहे माफ़ कर दे : अल्लाह को हर चीज़ करने की शक्ति है। (40)

ऐ रसूल! जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने में एक दूसरे को पीछे छोड़ देने की दौड़ में लगे हैं, उनके लिए आप दुखी न हों----- वे लोग जो अपने मुँह से कहते हैं, "हम ने विश्वास कर लिया," मगर (असल में) उनके दिल में थोड़ा भी ईमान नहीं, वे यहूदी लोग जो झूठी बातें कान लगाकर सुनते हैं और वे लोग जो तुम्हारे पास आकर मिले तक नहीं, वे (तौरात के) शब्दों में हेर-फेर कर के उसके अर्थ बिगाड़ देते हैं और (एक दूसरे से) कहते हैं, "(जो तौरात का आदेश हम ने बताया है) अगर वैसा ही आदेश तुम्हें (मुहम्मद साहब से) मिले, तो इसे मान लेना और अगर वैसा आदेश न मिले, तो बच कर रहना!"-----(इनकी हरकत देखकर) अगर अल्लाह ही चाहे कि ऐसे लोगों को भटकता छोड़ दे, तो अल्लाह के सामने आपका कोई बस नहीं चलेगा कि आप उनके लिए कुछ कर पाएं। ये वही लोग हैं जिनके दिलों (के मैल) को अल्लाह साफ़ करना नहीं चाहता। इनके लिए इस संसार में भी अपमान और तिरस्कार है और फिर आख़िरत [परलोक] में भी बड़ी भारी यातना है -------  (41)

वे झूठी बातें कान लगा लगा कर सुनते हैं, और बुरे तरीक़ों से (हराम का) माल खाते हैं। [ऐ रसूल], अगर वे आपके पास (किसी मामले का) फ़ैसला कराने के लिए आएं, तो आप या तो उनके बीच फ़ैसला कर दें या चाहें तो मना कर दें ---- अगर आप (फैसला करने से) मना कर दें, तो वे आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते, लेकिन अगर आप उनके बीच फ़ैसला करें, तो इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करें : अल्लाह इंसाफ़ करनेवालों को पसंद करता है------ (42) 

मगर वे आपके पास फ़ैसला कराने के लिए आते ही क्यों हैं, जबकि उनके पास तौरात [Torah] है, जिसमें अल्लाह का हुक्म मौजूद है, इसके बावजूद वे (तौरात के आदेश से) मुँह मोड़ते हैं? असल में वे ईमान नहीं रखते। (43

इसमें संदेह नहीं कि हमने तौरात उतारी, जो रास्ता दिखानेवाली और रौशनी फैलानेवाली थी, और अल्लाह के नबी [Prophets] जो उसकी आज्ञा माननेवाले थे, इसी के (हुक्म के) अनुसार यहूदियों के लिए फ़ैसला किया करते थे। इसी तरह, सभी संतों [rabbis] और किताबों के ज्ञानियों [scholars] ने भी अल्लाह की किताब के उस हिस्से के मुताबिक़ ही फ़ैसले दिए जिसको सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी गयी थी, और वे उसके (आदेशों पर) गवाह भी थे। अत: [ऐ अल्लाहवालो और ज्ञानियों], लोगों से न डरो, बल्कि मुझ से डरो; मेरे संदेशों को (दुनिया के फ़ायदे के लिए) सस्ते दामों में न बेच दो; (याद रखो!), जो लोग अल्लाह के उतारे हुए विधान के अनुसार फ़ैसला न करें, तो ऐसे लोग (अल्लाह की शिक्षाओं को) ठुकरानेवाले [काफ़िर] हैं।  (44

हमने तौरात में यहूदियों के लिए (हुक्म) निर्धारित कर दिया था कि जान के बदले जान, आँख के बदले आँख, नाक के बदले नाक, कान के बदले कान, दाँत के बदले दाँत, ज़ख्म के बदले वैसा ही ज़ख़्म होगा : अगर कोई भलाई की नीयत से अपना बदला लेना माफ़ कर दे, तो यह उसके लिए (बुरे कर्मों का) प्रायश्चित होगा। जो लोग अल्लाह के उतारे गए विधान के अनुसार फ़ैसला नहीं करते, वे लोग बड़े ज़ालिम हैं।  (45)

और फिर (उन नबियों के बाद) उन्हीं के बताए हुए रास्ते पर हमने मरयम के बेटे, ईसा (Jesus) को भेजा, ताकि उससे पहले उतरी हुई किताब 'तौरात' [Torah] की सच्चाई की पुष्टि हो जाए : हम ने उसे इंजील [Gospel] दी, रास्ता दिखानेवाली, रौशनी फैलानेवाली, और अपने से पहली उतरी किताब तौरात की पुष्टि करनेवाली ------ जो अल्लाह का डर रखनेवालों के लिए (अच्छाई का) रास्ता दिखानेवाली और नसीहत बनकर आयी थी। (46

अतः इंजील के माननेवालों को चाहिए कि उसी के विधान के अनुसार फ़ैसला करें, जो अल्लाह ने उसमें उतारा है। (याद रखो!) जो कोई अल्लाह की उतारी हुई किताब के अनुसार फ़ैसला न करे, तो ऐसे ही लोग नियमों को तोड़नेवाले हैं।  (47)

[ऐ मुहम्मद] हम ने आपके पास यह किताब [क़ुरआन] सच्चाई के साथ भेजी है, जो इससे पहले आयी हुई सारी आसमानी किताबों की पुष्टि करती है, और जो उन सब पर निर्णायक [final authority] की हैसियत रखती है : अतः जो हुक्म अल्लाह ने उतारा है, आप उसी के मुताबिक़ लोगों के बीच फ़ैसला करें। जो सच्चाई आपके पास आ चुकी है उससे हटकर उनकी इच्छाओं के पीछे न चलें। तुम में से हर एक गिरोह के लिए हम ने अलग-अलग 'एक क़ानून' [शरीअत] और 'एक रास्ता'[तरीक़ा] निश्चित कर दिया है। अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक समुदाय बना देता, मगर वह चाहता था कि जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उसके द्वारा वह तुम्हारी परीक्षा ले, अतः भलाई के कामों में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करो: तुम सबको अल्लाह के पास लौटकर जाना है, फिर वह तुम्हें बता देगा कि जिन मामलों में तुम मतभेद रखते थे, उसकी हक़ीक़त क्या थी। (48)

अत: [ऐ रसूल], जो कुछ अल्लाह ने आप पर उतारा है, उसी के अनुसार आप उन लोगों के बीच फ़ैसला करें। उनकी इच्छाओं के पीछे न चलें, और उनकी तरफ़ से सावधान रहें कि कहीं ऐसा न हो कि वे आपको धोखे में डालकर किसी ऐसे हुक्म से हटा दें, जो अल्लाह ने आप पर उतारा है। फिर अगर वे (अल्लाह के हुक्म से) मुँह मोड़ें, तो याद रखें कि उनके द्वारा किए गए कुछ गुनाह के कारण अल्लाह उन्हें सज़ा देना चाहता है : इनमें से बहुत सारे लोग नियमों को तोड़नेवाले हैं। (49

अब क्या वे ऐसा फ़ैसला चाहते हैं जो जाहिलियत [ignorance] के ज़माने के नियमों के अनुसार हो? पक्का ईमान रखनेवालों के लिए क्या कोई अल्लाह से बेहतर फ़ैसला करनेवाला हो सकता है? (50)

ऐ ईमानवालो! तुम यहूदियों और ईसाइयों को (जो तुम्हारी दुश्मनी में लगे हैं) अपना साथी व संरक्षक न बनाओ : वे केवल एक-दूसरे के साथी हैं। अब जो कोई उनको अपना संरक्षक बनाएगा, तो वह उन्हीं लोगों में से समझा जाएगा ----- अल्लाह ऐसा ज़ुल्म करनेवालों को मार्ग नहीं दिखाता-------- (51

इसके बावजूद, [ऐ रसूल], आप देखेंगे कि जिनके दिलों में रोग है, वे अपनी हिफ़ाज़त के लिए यह कहते हुए उनके पास दौड़े हुए जाते हैं कि, "हमें डर है कि कहीं हमारा भाग्य, हमारे ही विरुद्ध न हो जाए।" मगर हो सकता है कि अल्लाह तुम्हारे लिए जीत ले आए या उसकी ओर से कोई और बात सामने आ जाए : फिर तो ये लोग जो कुछ राज़ अपने जी में छिपाए हुए थे, उसपर अफ़सोस करेंगे, (52

और उस समय ईमानवाले कहेंगे, "क्या ये वही लोग हैं जो अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाकर विश्वास दिलाते थे कि हम तुम्हारे साथ है?" इनका किया-धरा सब बेकार गया : वे सब कुछ खो बैठे हैं।  (53)

ऐ ईमान रखनेवालो! तुम में से जो कोई अगर अपने पिछले धर्म की ओर लौटता है (और उन्हें अपना मददगार बनाता है), तो अल्लाह जल्द ही तुम्हारे बदले में ऐसे लोगों को ले आएगा जिन्हें वह पसंद करता है और वे उसे पसंद करते हों,  वे ईमानवालों के साथ नर्मी से पेश आएंगे और विश्वास न करनेवालों के साथ कठोरता अपनाएंगे, और वे बिना बुरा-भला कहने वालों की परवाह किए, अल्लाह की राह में जी-तोड़ संघर्ष करेंगे। यह है अल्लाह का फ़ज़ल [bounty], वह जिसे चाहता है प्रदान करता है। अल्लाह के पास कभी न ख़त्म होनेवाला फ़ज़ल भी है और ज्ञान भी।  (54

तुम्हारे सच्चे संरक्षक व मददगार तो अल्लाह, उसका रसूल और वे ईमानवाले हैं ---- जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं, निर्धारित ज़कात देते हैं, और बंदगी में झुके रहते हैं।  (55)

जो लोग अपनी हिफ़ाज़त के लिए अल्लाह, उसके रसूल और ईमानवालों की तरफ़ झुकते हैं, [वे अल्लाह के दलवाले हैं] : और अल्लाह के दलवालों की जीत निश्चित है। (56)

ऐ ईमानवालो! तुम उन्हें अपना साथी व संरक्षक न बनाओ, जो तुम्हारे दीन को अपमानित करते हैं, और उसकी हंसी उड़ाते हैं ----- चाहे वे लोग हों जिन्हें तुम से पहले किताब दी गई थी, या विश्वास न करनेवाले लोग हों ---- और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो। (57)

जब तुम नमाज़ के लिए (अज़ान) पुकारते हो, तो वे उसे तमाशा बनाते हैं, और उसकी हँसी उड़ाते हैं : यह इस कारण से है कि ये लोग बुद्धि से काम नहीं लेते। (58)

[ऐ रसूल], आप कह दें, "ऐ किताबवालो! हमें नापसंद करने का तुम्हारे पास और तो कोई कारण नहीं है सिवाए इसके, कि हम अल्लाह पर ईमान रखते हैं, और उस (सच्चाई) पर ईमान रखते हैं जो हम पर उतारी गई, और उस पर भी जो हम से पहले उतारी जा चुकी हैं, जबकि तुम में से ज़्यादातर लोग (तौरात की) आज्ञाओं का पालन नहीं करते?" (59)

आप कहें, "क्या मैं बताऊँ कि (तुम जो हमारे लिए सज़ा चाहते हो, उससे) कहीं बुरी सज़ा का हक़दार कौन है? वे लोग जिनसे अल्लाह ने अपने आपको दूर कर लिया, जिनसे वह बहुत नाराज़ हुआ, और उनमें से कितनों को बन्दर और सूअर (की तरह) कर दिया, और वे जो मूर्तियों की पूजा करने लगे : यही वे लोग हैं जो सबसे निचले दर्जे में हैं, और सीधे मार्ग से सबसे ज़्यादा भटके हुए हैं।" (60)

[ईमानवालो], जब वे [मदीना के कुछ यहूदी] लोग तुम्हारे पास आते हैं, तो कहते हैं, "हम ने (सच्चाई पर) विश्वास किया," मगर वे मन में (सच्चाई से) इंकार करते हुए आए भी थे और उस पर विश्वास किए बिना चले भी गए हैं ------ वे जो कुछ अपने दिलों में छिपाते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (61

[ऐ रसूल!], आप देखेंगे कि उनमें से ढेर सारे लोग गुनाहों के काम में, अत्याचार करने में  और हराम (का माल) खाने में बड़ी तेज़ी दिखाते है। क्या ही बुरे काम हैं जो ये दिन-रात कर रहे हैं! (62

उनके सन्तों और किताब का ज्ञान रखनेवालों को क्या हो गया है कि उन्हें गुनाह की बात बकने और हराम (का माल) खाने से रोकते नहीं? (अफ़सोस!) कितने बुरे हैं कर्म उनके!  (63

और यहूदियों ने कहा, "अल्लाह ने (देने से) अपनी मुट्ठी बंद कर ली है," मगर (सच्चाई यह है कि) उन्हीं लोगों ने (कंजूसी से) अपनी मुट्ठियाँ बंद कर रखी हैं, और जो कुछ उन्होंने कहा है उसके चलते उन्हें ठुकराया जाता है। सचमुच, अल्लाह के हाथ तो (देने के लिए) पूरी तरह खुले हुए हैं : वह जिस तरह चाहता है, (अपने फ़ज़ल से) देता है। (इसीलिए आप देखेंगे कि) जो कुछ [क़ुरआन] आपके रब ने आप पर उतारा है, उससे (सबक़ सीखने के बजाए) उनमें अधिकतर लोगों के अंदर बुरे व्यवहार और आज्ञा न मानने की प्रवृत्ति और बढ़ जाएगी। (नतीजे में) हमने उनके कई समुदायों के बीच क़यामत तक के लिए दुश्मनी और नफ़रत का बीज बो दिया है। वे जब भी युद्ध की आग भड़काते हैं, अल्लाह उसे (फैलने से बचाते हुए) बुझा देता है। वे ज़मीन में ख़राबी फैलाने की कोशिश करते हैं, मगर अल्लाह फ़साद मचानेवालों को पसन्द नहीं करता।  (64)

अगर किताबवाले लोग ईमान रखते और (अल्लाह का) डर रखते, तो हम ज़रूर उन पर से उनकी बुराइयों (के प्रभाव) को दूर कर देते और उन्हें नेमत भरी जन्नतों में दाख़िल कर देते। (65

अगर वे तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] को, और जो कुछ (किताब) उनके रब की तरफ़ से उनके पास भेजी गयी, उन पर (सच्चाई के साथ) जमे रहते, तो उन्हें अपने ऊपर [आसमान] से भी और अपने नीचे [ज़मीन] से भी भरपूर (रोज़ी) मिली होती : उनमें से कुछ लोग सीधे मार्ग पर चलनेवाले हैं, मगर उनमें से अधिकतर ऐसे हैं कि जो भी करते हैं, बुरा ही करते हैं।  (66) 

ऐ रसूल! आपके रब की तरफ़ से जो कुछ आप पर उतारा गया है, उसे (बंदों तक) पहुँचा दें---- अगर ऐसा न किया, तो (मतलब यह हुआ कि) आपने अल्लाह के सन्देश को पहुँचाने का काम (पूरा) नहीं किया --- और अल्लाह आपको लोगों (की साज़िशों) से सुरक्षित रखेगा। अल्लाह उन्हें सही रास्ता नहीं दिखाता, जो उसपर विश्वास न करने पर अड़े रहते हैं (और हुक्म नहीं मानते)। (67

आप कह दें, "ऐ किताबवालो! जब तक कि तौरात और इंजील, और जो (किताब) तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजी गयी है, उस पर मज़बूती से जमे नहीं रहते, तब तक सही मायने में तुम्हारे दीन का कोई आधार नहीं है," मगर [ऐ रसूल] जो कुछ (संदेश) आपके रब ने आपके पास उतार भेजा है, वह अवश्य ही उनमें से बहुतों के अंदर बुरे व्यवहार और आज्ञा न मानने की प्रवृत्ति को और बढ़ा देगी : सो आप (सच्चाई से) इंकार और अल्लाह के हुक्म को न माननेवालों के बारे में चिंता न करें। (68

जो लोग [क़ुरआन पर] ईमान रखते हैं, जो यहूदी हैं, जो साबई [Sabians] हैं, जो ईसाई हैं -----  जो कोई भी अल्लाह और अन्तिम दिन [क़यामत] पर ईमान रखेगा और अच्छा कर्म करेगा --- उनके लिए (आनेवाली दुनिया में) न तो कोई डर है, और न वे दुखी होंगे। (69)

हमने इसराईल की सन्तान से दृढ़ वचन लिया, और उनकी तरफ़ रसूल भेजे। जब कभी उनके पास कोई रसूल ऐसा संदेश ले कर आया जो उन्हें पसन्द न आया, तो उनमें से कुछ पर तो उन्होंने झूठ बोलने का इल्ज़ाम लगा दिया और कुछ दूसरों को जान से मार डाला;  (70)

वे समझ बैठे कि उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँच सकता, इसलिए वे (अल्लाह से) अंधे और बहरे बन गए। फिर अल्लाह ने (तौबा क़बूल करते हुए) उन पर दया-दृष्टि डाली, मगर उनमें से बहुत-से लोग फिर से (सच्चाई को देखने और सुनने से) अंधे और बहरे हो गए : अल्लाह उनके कामों की पूरी जानकारी रखता है।  (71

जो लोग कहते हैं, "अल्लाह तो वही मरयम का बेटा, मसीह है", उन्होंने (सच्चाई से इंकार करते हुए) अल्लाह के आदेश को चुनौती दी है। वैसे ख़ुद मसीह ने कहा था, "ऐ इसराईल की सन्तानों! अल्लाह की बन्दगी करो, जो मेरा और तुम्हारा रब है।" जिस किसी ने अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) किसी को साझेदार (Partner) ठहराया, तो अल्लाह ने उसके जन्नत में जाने पर रोक लगा दी, और उसका ठिकाना जहन्नम होगा। कोई न होगा जो ऐसे बुरे काम करनेवालों की मदद करेगा।" (72

जो लोग यह कहते हैं कि, "अल्लाह तीन [ख़ुदाओं-- यानी बाप, बेटा, और पवित्र रूह] में से तीसरा है", वे सचमुच सच्चाई से इंकार करते हैं : अल्लाह तो केवल एक ही है। जो कुछ वे कह रहे हैं, अगर ऐसा ही कहने पर अड़े रहे, तो उनमें से जो लोग (सच्चाई से) इंकार करने पर तुले हुए हैं, उन्हें दर्दनाक  यातना धर दबोचेगी। (73)

तो फिर क्यों इन लोगों का झुकाव अल्लाह की तरफ़ नहीं होता कि उससे अपने गुनाहों की माफ़ी माँगें, जबकि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है?  (74

मरयम का बेटा, मसीह तो केवल एक रसूल था; उससे पहले भी बहुत-से रसूल आए और चले गए; उसकी माँ सच्ची व बड़ी नैतिकता वाली औरत थी; दोनों ही (मर-खप जानेवाले लोगों की तरह) खाते-पीते थे। देखो, किस तरह से हम इन निशानियों को उनके लिए स्पष्ट कर देते हैं; फिर भी देखो, ये कैसे धोखे में पड़े हुए है!  (75

कह दें, "तुम अल्लाह को छोड़कर किसी और की बन्दगी कैसे कर सकते हो, जिनके पास न तो तुम्हें नुक़सान पहुँचाने की ताक़त है, न फ़ायदा? वह अल्लाह ही है जो सब बात सुननेवाला, और सब चीज़ जाननेवाला है।" (76)

कह दें, "ऐ किताबवालो! अपने दीन में तुम सच्चाई की सीमा से पार न चले जाओ, और उन लोगों की इच्छाओं के पीछे न चलो, जो तुम से पहले रास्ते से भटक गए ---- उन्होंने दूसरे बहुत से लोगों को भी रास्ते से भटका दिया, और ख़ुद भी (सच्चाई की) सीधी राह से भटकते फिरे।"  (77)

(तो देखो!) इसराईल की सन्तानों में से जिन लोगों ने (सच्चाई को मानने से) इंकार किया था, वे दाऊद [David] और मरयम के बेटे ईसा [Jesus] की ज़बान से ठुकरा दिए गए, क्योंकि उन्होंने आज्ञा नहीं मानी, वे बराबर मर्यादा तोड़ते रहे थे, (78

 वे एक दूसरे को ग़लत काम करने से रोकते न थे। कितने ज़्यादा बुरे थे उनके कर्म! (79)

(ऐ रसूल), आप देखते हैं कि उनमें बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने आपको विश्वास न करनेवालों के साथी व सहायक के रूप में जोड़ लिया है। कितना बुरा है जो कुछ उनकी जानों ने उनके (हिसाब-किताब के) लिए जमा कर रखा है : अल्लाह उनसे बहुत ग़ुस्सा है और वे यातना में ही फंसे रहेंगे। (80

अगर उन्होंने अल्लाह पर, उसके रसूल पर, और  जो (किताब) उनके पास भेजी गयी उसपर विश्वास किया होता, तो उन्होंने कभी भी विश्वास न करनेवालों को अपना साथी व सहायक न बनाया होता, मगर उनमें अधिकतर लोग तो बाग़ी हैं।  (81)


(ऐ रसूल) यह पक्की बात है कि आप यहूदियों को और (अरब के) वे लोग जो दूसरे देवताओं को अल्लाह के साथ जोड़ते हैं उनको, ईमानवालों का सबसे बड़ा विरोधी पाएंगे; और ईमानवालों की दोस्ती में सबसे नज़दीक उन लोगों को पाएंगे, जो कहते हैं कि “वे ईसाई हैं,” क्योंकि उनके बीच ऐसे लोग हैं जो ज्ञान को सीखने में लगे रहते हैं और संयासी हैं। ये लोग घमंड नहीं करते,  (82)

और जब ये (ईसाई) उस (संदेश) को सुनते हैं जो अल्लाह के रसूल पर उतारा गया है, तो आप देखेंगे कि उनकी आंखें आँसुओं से छलकने लगती हैं क्योंकि वे उस बात की सच्चाई पहचान लेते हैं। वे पुकार उठते हैं, " हमारे रब!  हमने विश्वास कर लिया, बस हमें भी इन्हीं में से लिख ले जो तेरी (सच्चाई की) गवाही देने वाले हैं। (83

हम अल्लाह पर और जो सच्चाई हमारे पास पहुँची है, उस पर क्यों न विश्वास करें, जबकि हम आशा करते हैं कि हमारा रब हमें अच्छे व नेक इंसानों के दल में शामिल  करेगा?" (84

तो (देखो), इस बात को कहने पर अल्लाह ने उन्हें बदले में (जन्नत के) ऐसे बाग़ प्रदान किए, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, जिनमें वे हमेशा रहेंगे : यह है उन लोगों का इनाम, जो अच्छा कर्म करते है।  (85

जो लोग सच्चाई को ठुकरा देते हैं और हमारे संदेशों को मानने से इंकार करते हैं, वे (जहन्नम की) भड़कती आग (में पड़ने) वाले हैं। (86)

ऐ ईमानवालो! जो अच्छी चीज़ें अल्लाह ने तुम्हारे लिए वैध [हलाल] कर दी हैं, उन्हें 'हराम'[अवैध] न ठहरा लो ----- (रोक-टोक में) हद से आगे न बढ़ो : अल्लाह हद पार करनेवालों को पसंद नहीं करता। ------ (87)

मगर जो कुछ अल्लाह ने हलाल और अच्छी रोज़ी तुम्हें दे रखी है, उन्हें (बेझिझक) खाओ और अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे से) डरते रहो, जिसपर तुम ने विश्वास कर लिया है।  (88

अल्लाह तुम्हारी उन क़समों के लिए तुम से हिसाब नहीं लेगा जो बे सिर-पैर की हों, हां जो क़सम सोच समझ कर खायी गयी हो, उन पर जरूर तुम्हारी पकड़ होगी : अगर क़सम तोड़नी पड़े तो उसकी भरपाई [atonement] इस तरह होगी कि तुम्हें दस ग़रीब लोगों को खाना खिलाना होगा जैसा कि तुम आमतौर से अपने घर के लोगों को खिलाते हो, या उन्हें कपड़े देना होगा या एक गुलाम को आज़ाद करना होगा ----- अगर कोई आदमी की हैसियत यह सब करने की न हो, तो उसे चाहिए कि वह तीन दिन तक रोज़े रखे। यही तुम्हारी क़समों को तोड़ने की भरपाई है---- (याद रखो) जब क़सम खा लो, तो उसे पूरा किया करो। इस तरह से अल्लाह अपनी आयतों को तुम्हारे सामने स्पष्ट करता है, ताकि तुम उसका शुक्र अदा करनेवाले बनो। (89)

ऐ ईमानवालो! शराब और जुआ, मूर्तिपूजा से जुड़ी रीतियाँ, जुए की तीरें --- ये सब बहुत बुरे और शैतानी काम हैं। तो इनसे बच कर रहो, ताकि तुम कामयाब हो सको।  (90)

शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच दुश्मनी और नफ़रत का भाव पैदा कर दे, और तुम्हें अल्लाह की याद से और नमाज़ से रोक दे. तो क्या तुम (ऐसी बुरी आदतों को) नहीं छोड़ोगे? (91

और (देखो!) अल्लाह की आज्ञा मानो, उसके रसूल की आज्ञा मानो, और (बुराइयों से) बचते रहो : अगर तुमने (मुँह मोड़ा और) इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, तो जान लो कि हमारे रसूल की ज़िम्मेदारी तो बस (हमारे संदेश को) साफ़ व स्पष्ट रूप से पहुँचा देने की है।  (92

जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास कर लिया और अच्छे कर्म किए, तो (हराम चीज़ों के हुक्म से) पहले वे जो कुछ खा-पी चुके हों, उसके लिए उनपर कोई गुनाह नहीं है, शर्त यह है कि वे अल्लाह से डरते हुए (आगे इन चीज़ों से) दूर रहें, ईमान पर क़ायम रहें और अच्छे कर्म करते रहें, फिर (जब उन्हें किसी बात से रोका गया तो) अल्लाह से डरते हुए रुक गए, और (अल्लाह के हुक्म पर) विश्वास किया, इसी तरह (आगे भी) अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता रहे और अच्छे कर्म करता रहे : अल्लाह अच्छा कर्म करनेवालों को बहुत पसंद करता है। (93)

ऐ ईमानवालो! [हज की यात्रा के दौरान] अल्लाह उस शिकार के द्वारा तुम्हें ज़रूर परखेगा जब (जानवर) तुम्हारे  हाथ और भाले [spear] की पहुँच तक आ जाए, ताकि अल्लाह को पता चल जाए कि कौन है जो (शिकार से हाथ रोक लेता है, और) उससे डरता है, हालाँकि वह उसे देख तक नहीं सकता : अब इस (हुक्म) के बाद भी अगर कोई हद पार करे, तो उसके लिए (आनेवाली दुनिया में) दर्दनाक यातना होगी। (94

ऐ ईमानवालो! (हज के लिए जाते हुए) जब तुम इहराम [pilgrim sanctity] की हालत में रहो, तो तुम शिकार के जानवर को न मार डालो। अगर कोई जान-बूझकर उसे मार डाले, तो उसे इसका दंड देना होगा, और (वह यह होगा कि) उसने जो जानवर मारा हो, चौपायों में से ठीक उसी जैसा एक जानवर -- जिसका फ़ैसला तुम्हारे दो न्यायप्रिय आदमी कर दें -- काबा पहुँचाकर क़ुर्बान किया जाए; अगर यह संभव न हो, तो फिर भरपाई के रूप में ज़रूरतमंदों को (उसके दाम के बराबर) खाना खिलाए, या उनकी गिनती के बराबर रोज़े रखे, ताकि वह अपने किए का मज़ा चख ले। जो कुछ पहले हो चुका, उसे अल्लाह ने माफ़ कर दिया; लेकिन अगर किसी ने फिर ऐसा किया, तो अल्लाह उससे बदला लेगा : अल्लाह बहुत ताक़तवाला, सख़्त बदला लेनेवाला है।  (95)

तुम्हारे लिए समंदर (में पाए जानेवाले) जीव का शिकार करना और उसका खाना वैध [हलाल] है ----  तुम भी और दूसरे मुसाफ़िर भी इससे मज़े उठा सकते हैं ---- मगर (हज यात्रा में) जब तुम इहराम की हालत में हो, तो थल [land] का शिकार करना हराम है। अल्लाह (के हुक्म न मानने के नतीजे) से डरते रहो, जिसके पास तुम सबको इकट्ठा करके ले जाया जाएगा।  (96) 

अल्लाह ने पवित्र घर -- 'का'बा' को लोगों के लिए जीविका [support] (और अमन) का साधन बनाया (जहाँ हर जगह के लोग आकर व्यापार कर सकते हैं), और आदर के महीने, (हज के लिए) क़ुर्बानी के जानवर, और वे जानवर जिनके गले में पट्टे पड़े हुए हों : यह सब कुछ (अमन और सुरक्षा का साधन बनाया है)। तुम जान लो कि अल्लाह जानता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, और यह कि अल्लाह हर चीज़ की पूरी ख़बर रखता है। (97)

यह भी जान लो कि अल्लाह (हज की मर्यादाओं को तोड़ने की) सज़ा देने में बहुत कठोर है, मगर साथ ही, बहुत माफ़ करनेवाला, दयावान भी है। (98)

रसूल की ज़िम्मेदारी तो बस लोगों तक सन्देश पहुँचा देने की है: जो कुछ तुम सबके सामने करते हो और जो कुछ तुम छिपाकर करते हो, अल्लाह सब जानता है।  (99)

[ऐ रसूल] आप कह दें, "बुरी चीज़ और अच्छी चीज़ कभी बराबर नहीं हो सकती, चाहे बुरी चीज़ों की बहुतायत तुम्हें अच्छी ही क्यों न लगने लगे।" अतः ऐ समझ-बूझ रखनेवालो! अल्लाह (की आज्ञा न मानने के नतीजे) से डरो, ताकि तुम कामयाब हो सको। (100

ऐ ईमानवालो! ऐसी चीज़ों के बारे में (खोद-खोद कर) न पूछा करो, कि अगर तुम्हें बता दी जाएं, तो हो सकता है कि उसके कारण तुम मुश्किल में पड़ जाओ ----- अगर तुम उन चीज़ों को ऐसे समय में पूछोगे, जबकि क़ुरआन उतारी जा रही हो, तो वे चीज़ें तुम्हें बता दी जाएँगी (जिससे तुम मुश्किल में फँस सकते हो) ---- (आगे से इससे बचो) क्योंकि अल्लाह ने उनके बारे में साफ़ कुछ नहीं कहा था : अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, सहनशील [forbearing] है। (101

(देखो!) तुमसे पहले, (इसराईल की संतानों में से) कुछ लोगों ने किसी चीज़ के बारे में ऐसे ही सवाल पूछे थे, मगर फिर (जवाब पर) अमल नहीं कर सके और (सच्चाई से) इंकार करनेवाले होकर रह गए। (102)

अल्लाह ने तो मूर्तियों की भक्ति के लिए (आज़ाद छोड़े गए) किसी जानवर [ऊँट] को न तो 'बहीरा' ठहराया था, न 'सायबा', न 'वसीला' और न 'हाम'; मगर (सच्चाई से) इंकार करनेवालों ने अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ लीं। उनमें अधिकतर लोग समझ-बूझ से काम नहीं लेते :  (103)

जब उनसे कहा जाता है कि, "आओ उस चीज़ [क़ुरआन] की ओर जो अल्लाह ने उतार भेजी है, और उस रसूल की तरफ़", तो वे कहते हैं, "जो तरीक़ा हम ने अपने बाप-दादा से ग्रहण किया है, हमारे लिए तो वही काफ़ी है," हालाँकि उनके बाप-दादा न तो कुछ जानते थे, और न ही वे सही मार्ग पर थे।  (104

ऐ ईमानवालो!, तुम अपनी जानों के लिए ख़ुद ही ज़िम्मेदार हो; अगर कोई दूसरा (सही रास्ते से) भटक जाता है, तो तुम्हें उस वक़्त तक उससे कोई नुक़सान नहीं होगा, जब तक तुम सही रास्ते पर रहोगे; तुम सबको (अंत में) अल्लाह के पास लौटकर जाना होगा, और वह तुम्हें बता देगा, जो कुछ तुम करते रहे होगे।  (105)


ऐ ईमानवालो! जब तुममें से किसी के मरने का समय आ जाए, तो तुम में से दो न्याय पसंद करनेवाले आदमी को चाहिए कि वसीयत [bequest] बनते समय गवाह के रूप में मौजूद रहें, या अगर तुम कहीं यात्रा पर गए हो और तुम्हारे मरने का समय क़रीब आ पहुँचे, (और मुसलमान गवाह न मिल पाए) तो दूसरे लोगों में से दो आदमी गवाह बन जाएँ। अगर तुम्हें (उनकी सच्चाई पर) कोई सन्देह हो, तो नमाज़ के बाद उन दोनों को रोक लो और उन्हें अल्लाह की क़समें खिलाओ कि (वे कहें), "हम किसी क़ीमत पर भी अपनी गवाही नहीं बेचेंगे, चाहे मामला किसी नज़दीकी रिश्तेदार का ही क्यों न हो। हम अल्लाह के लिए सच्ची गवाही को कभी नहीं छिपायेंगे, क्योंकि अगर हम ने ऐसा किया, तो हम गुनाह करनेवालों में शामिल हो जाएंगे।" (106)

अगर बाद में पता चल जाए कि उन दोनों ने (झूठी गवाही दे कर) गुनाह कर डाला है, तो फिर उनकी जगह, जिन लोगों का हक़ [rights] मारा गया है, उनमें से दो आदमी खड़े हो जाएँ, क्योंकि उन्हें गवाही देने का ज़्यादा हक़ बनता है। फिर वे दोनों अल्लाह की क़सम खाकर कहें,  "हमारी गवाही उन दोनों की गवाही से ज़्यादा सच्ची है। हमने जो कहा, सच के सिवा कुछ न कहा, अगर झूठ कहा हो, तो हम ज़ालिमों में से होंगे": (107

इस तरह (क़समें दिलाने) से इस बात की सम्भावना ज़्यादा है कि वे सच्ची और सही  गवाही देंगे, या (कम से कम) डरेंगे कि उनकी क़समों को दूसरे गवाहों द्वारा बाद में झूठा साबित किया जा सकता है। (देखो!) अल्लाह का (हुक्म न मानने के नतीजे से) डरते रहो और सुनो; अल्लाह उन लोगों को सही मार्ग नहीं दिखाता, जो उसका क़ानून तोड़ते हैं। (108)

उस दिन जब अल्लाह सब रसूलों को इकट्ठा करेगा और फिर पूछेगा, "(अपने लोगों के बीच शिक्षा देने से) उनकी तरफ़ से तुम्हें क्या प्रतिक्रिया [response] मिली (यानी उनका अमल कैसा रहा)?" वे कहेंगे, "हमें इसकी कोई जानकारी नहीं : एक तू ही है जो छिपी बातों को भी जानता है।" (109

उसके बाद अल्लाह कहेगा, "ऐ मरयम के बेटे, ईसा [Jesus]! याद करो मेरे उस ख़ास करम [favour] को, जो मैंने तुम पर और तुम्हारी माँ पर किया : किस तरह मैंने पवित्र आत्मा [holy spirit] से तुम्हें ताक़त दी थी, कि जब तुम (छोटे बच्चे थे, तो) पालने में भी लोगों से बात करते थे और बड़े उम्र के आदमी के रूप में भी; फिर किस तरह मैंने तुम्हें किताब और समझ-बूझ, तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] सिखा दी थी; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, मिट्टी से चिड़िये की शक्ल जैसी चीज़ बनाते, फिर उसमें फूँक मारते थे, तो वह मेरे आदेश से (सचमुच की) चिड़िया बन जाती थी; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, अंधे और कोढ़ी [leper] मरीज़ को बिल्कुल चंगा कर देते थे; किस तरह, तुम मेरे आदेश से, मरे हुए आदमी को फिर से ज़िंदा खड़ा कर देते थे; और याद करो किस तरह, मैंने इसराईल की संतानों को तुम्हें नुक़सान पहुँचाने से रोके रखा जब तुम उनके पास साफ़-साफ़ निशानियाँ लेकर पहुँचे थे, उनमें से जो विश्वास नहीं करनेवाले थे, वे कहने लगे, यह तो कुछ और नहीं, साफ़ जादूगरी है";  (110)

और (देखो!), किस तरह मैंने (ईसा के) शिष्यों [disciples] के दिल में यह बात डाली कि मुझ पर और मेरे रसूल पर विश्वास करो -----  तो उन्होंने कहा था, "हम विश्वास करते हैं, और (ऐ ख़ुदा) तू गवाह रहना कि हम अपने आपको (अल्लाह की भक्ति में) समर्पित करते हैं।" (111)

और (देखो!) जब (ईसा के) शिष्यों ने कहा, "ऐ मरयम के बेटे, ईसा! क्या तुम्हारा रब हमलोगों के लिए आसमान से खाने से भरा थाल उतार सकता है?" ईसा ने कहा, "अल्लाह से डरो, (और ऐसी फरमाइश न करो) अगर तुम पक्का ईमान रखते हो।" (112)

वे बोले, "हम चाहते हैं कि उसमें से खाएँ; ताकि हमारे दिलों को संतोष मिल जाए; हम जान लें कि तूने जो कुछ बताया, वह सच था, और इस पर हम गवाह रहें।"(113)

मरयम के बेटे, ईसा ने दुआ की, "ऐ अल्लाह, हमारे रब! हम पर आसमान से खाने से भरा थाल उतार दे, जो ख़ुशी का एक त्योहार बन जाए ----हम में से पहले और हम में से आख़िरी (आदमी) के लिए----- और तेरी तरफ़ से एक निशानी हो। हमें रोज़ी दो, कि तू सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है।" (114

अल्लाह ने कहा, "मैं तुम्हारे लिए (खाने का थाल) भेज दूँगा, मगर इसके बाद भी अगर किसी ने विश्वास नहीं किया, तो उसे सज़ा दी जाएगी, ऐसी सज़ा जो पूरी दुनिया में किसी और को नहीं दूँगा।" (115)

जब अल्लाह कहेगा, 'ऐ मरयम के बेटे, ईसा! क्या तू ने लोगों से यह कहा था कि "अल्लाह के साथ मुझे और मेरी माँ को ख़ुदा बना लो?" ईसा कहेगा, "महिमावान है तू! मैं वह बात कभी नहीं कह सकता, जिसको कहने का मुझे कोई हक़ नहीं है ------ अगर  मैंने ऐसा कहा होगा, तो ज़रूर तुझे मालूम होगा : तू जानता है, जो कुछ मेरे मन में है, हालाँकि मैं नहीं जानता जो कुछ तेरे मन के भीतर है, केवल तू ही है जो छिपी हुई सारी बातों को जाननेवाला है ----- (116

मैंने उन लोगों को केवल वही बताया था, जिसका तूने मुझे आदेश दिया था : "अल्लाह की बन्दगी करो, जो मेरा और तुम्हारा रब है।" जब तक मैं उनके बीच रहा, मैं उनके हाल पर नज़र रखता था. फिर जब से तूने मुझे उठा लिया, उस समय से तू ही अकेला उनकी निगरानी करता रहा है : तू तो सारी चीज़ों का गवाह है,  (117

और अगर तू उन्हें यातना देना चाहे, तो ये तो तेरे ही बन्दे हैं; अगर तू उन्हें माफ़ कर दे, तो तू सबसे ज़्यादा ताक़तवाला, और (हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।" (118

अल्लाह कहेगा, "यह वह दिन है कि सच्चे इंसानों को उनकी सच्चाई काम आएगी। उनके लिए (जन्नत में) ऐसे बाग़ हैं, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, उनमें वे हमेशा के लिए रहेंगे। अल्लाह उनसे ख़ुश हुआ और वे अल्लाह से ख़ुश हुए : यही सबसे बड़ी कामयाबी है।" (119)

आसमानों की और ज़मीन की और जो कुछ उनमें है, सब पर अल्लाह ही की बादशाही [नियंत्रण] है : उसे हर चीज़ करने की ताक़त है।  (120)




सूरह 9 : अत-तौबा [गुनाहों पर पछतावा/ Repentance]

[मुसलमानो!] तुमने जिन बहुदेववादियों [मुशरिकों/Idolaters] के साथ शांति-समझौता कर रखा था, अब अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ से तुम्हें उन (समझौतों) से मुक्ति [आज़ादी] (दी जाती) है------ (1)

[ऐ बहुदेववादियो!] तुम (अरब की) इस धरती पर (अगले) चार महीने तक बिना रोक-टोक चल-फिर सकते हो (उसके बाद युद्ध की हालत शुरू हो जाएगी), मगर तुम्हें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि तुम अल्लाह की पकड़ से बच नहीं सकोगे, और यह भी कि जो लोग उसका आदेश मानने से इंकार करेंगे, अल्लाह उन्हें अपमानित कर के रहेगा। (2)

बड़े हज के दिन, अल्लाह और उसके रसूल की ओर से सभी लोगों के लिए (एक घोषणा की जाएगी) : "अल्लाह और उसके रसूल बहुदेववादियों (के साथ हुए समझौते की शर्तों को मानने) से अब आज़ाद हैं। [ऐ मुशरिको!], तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम (अपने ज़ुल्म से) तौबा कर लो; अगर तुम (अब भी) नहीं मानोगे, तो जान लो कि तुम अल्लाह की पकड़ से भाग नहीं सकते।" जिन लोगों ने (सच्चाई से) इंकार का रास्ता अपना लिया है, [ऐ रसूल!], आप उन्हें दर्दनाक यातना की ख़ुशख़बरी सुना दें।  (3)

हाँ, मुशरिकों में से वे लोग जिन्होंने तुम्हारे साथ किए गए शांति-समझौते की शर्तों को सही ढंग से माना, और तुम्हारे विरुद्ध मुक़ाबले में किसी की सहायता नहीं की : तो उनके साथ हुए क़रार [Agreement] को निर्धारित अवधि ख़त्म होने तक पूरा करो। अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।  (4

जब वह (चार) महीने बीत जाएँ जिसमें जंग करना मना है, तो फिर उन मुशरिकों के साथ (जिन्होंने समझौते की शर्तों को तोड़ा है) जहाँ कहीं सामना हो (मक्का परिसर के अंदर या बाहर), उनका क़त्ल करो, उन्हें गिरफ़्तार कर लो, उन्हें घेर लो, और हर चौकी पर घात लगाकर उनकी ताक में बैठो; फिर अगर ऐसा हो कि वे (बुराइयों से) तौबा कर लें, पाबंदी से नमाज़ पढ़ें, और निर्धारित की हुई ज़कात दें, तो उन्हें उनके रास्ते जाने दो, कि सचमुच अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (5)

अगर मुशरिकों में से कोई भी आप से शरण [पनाह /protection] माँगे, तो [ऐ रसूल!], आप उसे शरण दे दें, ताकि वह (अच्छी तरह) अल्लाह की वाणी सुन सके, फिर उसे ऐसी जगह पहुँचा दें जो उसके लिए सुरक्षित हो, क्योंकि ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें (अल्लाह के संदेश की सच्चाई का) ज्ञान नहीं है। (6)

ऐसे मुशरिकों [बहुदेववादियों] के साथ अल्लाह और उसके रसूल की कोई संधि कैसे हो सकती थी? हाँ, मगर जिन लोगों के साथ आप ने पवित्र मस्जिद [काबा] के पास (हुदैबिया में) संधि की थी, जब तक वे उस (संधि की शर्तों) पर क़ायम रहते हैं, आप भी उन (शर्तों) पर क़ायम रहें; अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो उससे डरते हुए ग़लत कामों से बचते हैं।  (7)

(कैसे), जबकि उनका हाल यह है कि अगर वे तुम्हारे ऊपर हावी हो जाएं, तो वे तुम्हारे साथ न तो किसी तरह के बंधन का मान रखेंगे, न किसी रिश्ते-नाते का, न किसी संधि का? वे अपनी ज़बान से तुम्हें ख़ुश करना चाहते हैं, मगर उनके दिल तुम्हारा विरोध करते रहते हैं और उनमें ज़्यादातर लोग (अच्छाई के) नियमों को तोड़ने वाले हैं।  (8)

उन लोगों ने मामूली से फ़ायदे के लिए अल्लाह के संदेश को बेच डाला है, और दूसरों को उसके मार्ग (पर चलने) से रोका है। कितने बुरे हैं काम उनके! (9)

ईमान रखनेवालों के साथ, न तो वे रिश्ते-नाते का, और न किसी संधि का कोई मान रखते हैं। यही वे लोग हैं जो (ज़ुल्म करते हुए) आक्रामक क़दम उठा रहे हैं। (10)

अगर वे अल्लाह के सामने (तौबा के लिए) झुक जाएं, पाबंदी से नमाज़ पढ़ें, और निर्धारित की हुई ज़कात दें, तो फिर वे तुम्हारे धर्म के भाई हैं : जो लोग जानना चाहते हैं, उन लोगों के लिए हम अपने संदेश (आयतें) स्पष्ट व खोलकर बता देते हैं। (11

लेकिन अगर वे तुम्हारे साथ समझौता होने के बाद अपनी प्रतिज्ञा तोड़ डालॆं और तुम्हारॆ दीन [धर्म] को बुरा भला कहने लगॆं, तॊ फिर अधर्म (disbelief) कॆ सरदारों सॆ युद्ध करॊ ----- उन्हें प्रतिज्ञा से कोई मतलब नहीं है ---- ताकि वॆ (ज़ुल्म करने और प्रतिज्ञा तोड़ने) जैसे काम से रुक जाऐं। (12)

[मुसलमानो!], ऐसॆ लॊगॊं सॆ तुम क्यों नहीं लड़ॊगॆ जिन्हॊंनॆ अपनी ली हुई प्रतिज्ञाएं तोड़ डालीं, जिन्होंने अल्लाह के रसूल को निकाल बाहर करने की कोशिश की, पहले जिन्होंने तुम पर हमला किया? क्या तुम उनसे डरते हो? अगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तो असल में तो अल्लाह है जिसका डर तुम्हारे दिलों में होना चाहिए। (13)

उनसे (बेझिझक) लड़ो : अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन्हें सज़ा देगा, वह उन्हें अपमानित कर देगा, और उन पर जीत हासिल करने में वह तुम्हारी मदद करेगा, वह ईमानवालों की (आहत) भावनाओं पर मरहम का काम करेगा, (14)

और उनके दिलों के अंदर के गु़स्से को मिटा देगा। फिर अल्लाह जिस पर चाहेगा, उस पर अपनी दया-दृष्टि डालेगा; अल्लाह सब जाननेवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (15

[मुसलमानो!], क्या तुम्हें लगता है कि तुम बिना परखे ही छोड़ दिए जाओगे, बिना अल्लाह द्वारा इस बात की पहचान किए हुए कि तुम में से कौन है जो उसके रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करेगा, और अल्लाह, उसके रसूल और दूसरे ईमानवालों को छोड़कर किसी और को अपना मददगार नहीं बनाएगा? तुम्हारे हर काम की अल्लाह पूरी ख़बर रखता है। (16)

यह मुशरिकों के लिए ठीक नहीं है कि (दिखावे के लिए) उनका झुकाव अल्लाह की इबादत की जगहों की ओर हो, जबकि वे स्वयं विश्वास न करने की गवाही दे रहे हैं : ऐसे लोगों के सारे कर्म बेकार हो जाएंगे और वे जहन्नम (की आग) में रहने वाले हैं। (17)

असल में अल्लाह की इबादत की जगहों को आबाद करने का हक़ तो केवल उन्हीं लोगों को होना चाहिए जो अल्लाह और अंतिम दिन पर विश्वास रखते हों, जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हों, निर्धारित ज़कात देते हों और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते हों : ऐसे ही लोग सीधा मार्ग पानेवालों में शामिल होने की उम्मीद कर सकते हैं।  (18)

क्या तुमने हाजियों को पानी पिलाने और पवित्र मस्जिद [काबा] के इंतिजा़म करने को उस आदमी के कर्मों के बराबर ठहरा लिया है, जो अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखता है और अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करता है? अल्लाह की नज़र में वे बराबर नहीं हैं। अल्लाह (ज़ुल्म करनेवाले) ऐसे जाहिलों को सही रास्ता नहीं दिखाता है। (19)

जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया, (मक्का से घर-बार छोड़कर) हिजरत कर के (मदीना) चले गए, और अल्लाह के रास्ते में अपने मालों और अपनी जानों से कड़ा संघर्ष [जिहाद] किया, उनका दर्जा अल्लाह की नज़र में कहीं ऊंचा है; यही लोग हैं जो कामयाब होंगे; (20)

उनका रब उन्हें अपनी रहमत और प्रसन्नता की ख़ुशख़बरी सुनाता है, उनके लिए (जन्नत के) बाग़ों में कभी न ख़त्म होने वाला आनंद होगा (21)

और जहां वे हमेशा हमेशा रहेंगे : सचमुच अल्लाह के पास (उनके लिए) बड़ा भारी इनाम है। (22)

ऐ ईमानवालो! अपने बाप और अपने भाइयों के साथ कोई गठबंधन न करो, अगर वे (सच्चाई पर) ईमान रखने के बजाए इंकार पर अड़े रहना पसंद करते हैं : तुममें से जो कोई ऐसा करता है, वह ग़लत काम कर रहा है। (23

(ऐ रसूल!) आप (मुसलमानों से) कह दें, "तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी बीवियां, तुम्हारे रिश्ते-नातेवाले, तुम्हारी धन-दौलत जो तुमने कमायी हैं, वह कारोबार जिसके मंदा पड़ जाने का तुम्हें डर लगा रहता है, और रहने के घर जिन्हें तुम पसन्द करते हो, अगर ये सब तुम्हें अल्लाह और उसके रसूल, और उसके रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करने से ज़्यादा प्यारे हैं, तो फिर इंतजा़र करो, यहाँ तक कि अल्लाह की भेजी हुई यातना तुम्हारे सामने आ जाए।” अल्लाह ऐसे लोगों को रास्ता नहीं दिखाता जो हर बंधन तोड़ डालते हैं।" (24)

(ऐ ईमानवालो!), अल्लाह कई बार युद्ध के मैदान में तुम्हारी मदद कर चुका है, (मक्का और तायफ की घाटी़ के बीच) हुनैन की लड़ाई के दिन भी, जब तुम अपनी बड़ी संख्या पर फूले हुए थे, मगर वह तुम्हारे कुछ काम न आयी : ज़मीन अपने फैलाव के बावजूद तुम पर तंग होती हुई महसूस हुई, और फिर तुम मैदान से पीठ दिखा कर भाग खड़े हुए थे। (25)

तब अल्लाह ने अपने रसूल पर और ईमानवालों पर अपनी तरफ़ से दिल का सुकून (calm) उतारा, और ऐसी सेनाएँ उतारी जो दिखाई नहीं देती थीं। अल्लाह ने (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों को सज़ा दी ---- इंकार करनेवाले तो इसी लायक़ हैं ---- (26)

मगर अल्लाह जिस किसी पर चाहता है, (उसकी तौबा क़बूल करते हुए) अपनी रहमत से लौट आता है। अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (27)

ऐ ईमानवालो!, जो लोग अल्लाह के साथ दूसरों को उसका साझेदार [Partner] ठहराते हैं, सचमुच वे (अपनी सोच में) अपवित्र हैं : इस साल के बाद उन्हें पवित्र मस्जिद [काबा] के नज़दीक मत आने दो। [मुसलमानो], अगर तुम्हें इस बात का डर है कि तुम ग़रीब हो जाओगे, तो (याद रखो!), कि अगर अल्लाह ने चाहा, तो तुम्हें अपने फ़ज़ल [bounty] से मालामाल कर देगा: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझवाला है। (28)

ऐसे किताबवाले (यहूदी व ईसाई), जो अल्लाह और आख़िरी दिन [क़यामत] पर (सच्चे दिल से) विश्वास [ईमान] नहीं रखते, जो उन चीज़ों से (लोगों को) नहीं रोकते, जिनसे अल्लाह और उसके रसूल ने (उनकी किताब में) रोका है, जो इंसाफ़ के नियमों का पालन नहीं करते, उनसे भी उस समय तक लड़ो जब तक कि वे (अपनी सुरक्षा के बदले में) कर [जज़िया] अदा न कर दें, और (आगे से देने के लिए) तैयार न हो जाएं। (29

यहूदी कहते थे, "उज़ैर (Ezra) अल्लाह का बेटा है," और ईसाई कहते थे, "मसीह (Messiah) अल्लाह का बेटा है": ये सब उनके अपने मुँह की बातें थीं, यह वही बातें दोहराते थे, जो उनसे पहले के विश्वास न करनेवाले कहा करते थे। अल्लाह की मार हो इन पर! ये सीधे रास्ते से कितनी दूर जा पड़े हैं! (30)

उन्होंने अपने धर्म गुरुओं और संत-महात्माओं को और साथ में मरयम के बेटे ईसा को भी अपना रब बना रखा है। मगर उन्हें तो केवल एक अल्लाह की बंदगी करने का आदेश दिया गया था : उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है; जिस किसी को वे अल्लाह का साझेदार [partner] ठहराते हैं, उनसे अल्लाह कहीं ज़्यादा ऊंचा है!  (31)

वे इस कोशिश में लगे हैं कि अल्लाह की रौशनी को अपने मुँह से (फूंक मारकर) बुझा दें, मगर अल्लाह अपनी रौशनी को पूरी तरह फैलाये बिना नहीं रहेगा, चाहे विश्वास न करनेवालों को यह बात कितनी ही बुरी लगे। (32)

वही (अल्लाह) है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सच्चे दीन के साथ भेजा, यह दिखाने के लिए कि यह दीन सभी (दूसरे) धर्मों से बढ़ कर है, चाहे बहुदेववादी इससे कितनी ही नफ़रत करें। (33)

ईमानवालो, बहुत-से धर्मगुरु और संत-महात्मा ऐसे हैं जो ग़लत तरीक़े से लोगो के माल हड़प लेते हैं और लोगों को अल्लाह के मार्ग से दूर हटा देते हैं। (ऐ रसूल), जो लोग अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने के बजाए, सोना और चाँदी की जमाख़ोरी में लगे रहते हैं, आप उनसे कह दें कि उन्हें बड़ी दर्दनाक सज़ा होगी :  (34)

उस (क़यामत के) दिन जब (ज़ेवरों को) जहन्नम की आग में तपाया जाएगा, फिर उससे उनके माथों, पहलुओं और उनकी पीठों को दाग़ा जाएगा, फिर उनसे कहा जाएगा, "यही है वह जिसे तुमने अपने लिए जमा कर रखा था! जो कुछ तुम जमा करते रहे हो, अब उसका दर्द महसूस करो!" (35)

अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है कि (साल में) बारह महीने होते हैं----यह तो अल्लाह की किताब में उसी दिन से तय किया हुआ है, जिस दिन उसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया था ----- उसमें से चार महीने आदर के हैं : यही सही हिसाब है। इन महीनों में (मारपीट करके) अपनी जानों पर अत्याचार न करो ----- हालांकि मुशरिकों से तुम किसी भी समय लड़ सकते हो, अगर वे तुम पर पहले हमला कर दें ---- याद रखो, अल्लाह उनके साथ होता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से (हर हाल में) बचते रहते हैं।  (36)

आदर के (चार) महीनों को उसकी जगह से आगे-पीछे हटा देना, आज्ञा न मानने की एक और निशानी है जिसके चलते वे लोग जो (अल्लाह के) आदेश पर ध्यान नहीं देते, वे सही रास्ते से भटका दिए जाते हैं : (अपनी इच्छा से) किसी साल तो उन (महीनों) का आदर करते हुए उसे अवैध [हराम] ठहरा लेते हैं (और युद्ध नहीं करते), और अगले साल उसको वैध [हलाल] कर के (मारपीट को सही) ठहरा लेते हैं, ताकि ऊपर से यह दिखा सकें कि वे अल्लाह के द्वारा ठहराए हुए पवित्र महीनों की गिनती का सही तरीक़े से पालन करते हैं, मगर ऐसा करने में होता यह है कि जिस चीज़ को अल्लाह ने अवैध [Forbidden] ठहरा दिया है, वे उसे वैध [Permit] कर देते हैं। उनके द्वारा किए गए शैतानी कर्म, उनके लिए सुहाने बना दिए गए हैं : अल्लाह उसे सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो उसके आदेशों पर कोई ध्यान नहीं देता।  (37

ईमानवालो!, जब तुमसे कहा जाता है, "अल्लाह के रास्ते में लड़ाई के लिए निकलो", तो क्यों तुम्हारे पाँव बोझल होकर ज़मीन पकड़ लेते हैं? क्या तुम आनेवाली दुनिया [आख़िरत] के मुक़ाबले इस दुनिया की ज़िंदगी पर रीझ गए हो? आनेवाली दुनिया के मुक़ाबले इस दुनिया की खुशियां कितनी कम हैं! (38)

अगर तुम बाहर निकलकर लड़ाई नहीं लड़ोगे, तो अल्लाह तुम्हें कठोर सज़ा देगा और वह तुम्हारी जगह दूसरे लोगों को ला खड़ा करेगा, और तुम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकोगे : अल्लाह की ताक़त हर चीज़ पर छायी हुई है। (39)

अगर तुम अपने रसूल की मदद न भी करो, तो यह जान लो कि अल्लाह ने उस समय भी उनकी मदद की थी जब इंकार करनेवालों [काफ़िरों] ने उन्हेंं (घर से) निकाल बाहर किया था : जब उनमें से दो लोग (सूर की) गुफ़ा में (छिपे हुए) थे, उनमें एक तो रसूल [मुहम्मद सल.] थे, जिन्होंने अपने साथी से कहा था, “चिंता न करो, अल्लाह हमारे साथ है", और फिर अल्लाह ने उन पर चैन व सुकून उतार भेजा था, उनकी मदद ऐसी सेनाओं से की थी जो तुम्हें दिखायी नहीं देती थी, और इस तरह विश्वास न करनेवालों की योजना को चौपट कर दिया था। अल्लाह की योजना तो बहुत ऊँची है: अल्लाह बहुत ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (40)

अत: निकल खड़े हो, और अल्लाह के मार्ग में अपने मालों और अपनी जानों के साथ संघर्ष [जिहाद] करो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता चाहे तुम्हारे पास हल्के हथियार हों या भारी : यही तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानते। (41

(ऐ रसूल), वे [पाखंडी] आपके पीछे ज़रूर हो लेते, अगर उन्हें (युद्ध से) मिलनेवाला फ़ायदा सामने दिखाई देता और सफ़र छोटा होता, मगर यात्रा उनके लिए कुछ ज़्यादा ही लम्बी (व कठिन) महसूस हुई। अब (देखो!) वे अल्लाह की (झूठी) क़समें खाएँगे, "अगर हम जा सकते, तो ज़रूर आपके साथ (युद्ध के लिए) निकल गए होते," मगर वे अपने आपको तबाही में डाल रहे हैं, क्योंकि अल्लाह जानता है कि वे झूठ बोल रहे हैं।  (42

[ऐ रसूल!] अल्लाह आपको माफ़ करता है! (मगर) इससे पहले कि आप जान पाते कि उनमें से कौन लोग हैं जो सच बोल रहे हैं, और कौन लोग हैं जो झूठे हैं, आपने उन्हें पहले ही (युद्ध में जाने के बजाए) घर पर रुके रहने की अनुमति क्यों दे दी? (43)

जो लोग अल्लाह और आख़िरी दिन [क़यामत] पर ईमान रखते हैं, वे कभी आप से यह नहीं चाहेंगे कि उन्हें अपने मालों और अपनी जानों के साथ संघर्ष [जिहाद] करने से छूट दे दी जाए ----- अल्लाह जानता है कि कौन है जो सचमुच उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचता है ------ (44)

केवल वही लोग आप से घर पर रुके रहने की अनुमति माँगते हैं, जो अल्लाह पर और आख़िरी दिन पर ईमान नहीं रखते : उनके दिलों में सन्देह है, और इसीलिए वे डाँवाडोल हो रहे हैं। (45

अगर वे सचमुच आपके साथ (युद्ध में) निकलना चाहते, तो इसके लिए उन्होंने कुछ तैयारियाँ की होतीं, मगर अल्लाह ने उनके उठ खड़े होने को पसन्द नहीं किया, और उन्हें (अपनी जगह) पड़े रहने दिया। उनसे कहा गया, "बैठे रहनेवाले (अपाहिज) लोगों के साथ तुम भी (घरों में) बैठे रहो।" (46)

अगर वे (लड़ने के लिए) आपके साथ निकले भी होते, तो उन लोगों ने आपको परेशानी के सिवा कुछ न दिया होता : वे तुम लोगों के बीच फूट डालने की कोशिश करते, यहां वहां उपद्रव मचाते फिरते, और तुममें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने उनकी बातें बड़े चाव से सुनी भी होतीं ------- अल्लाह अच्छी तरह जानता है कि कौन लोग ज़ुल्म करनेवाले हैं। (47)

यक़ीनन, उन्होंने इससे पहले भी कुछ मुद्दे उठाकर झमेला बढ़ाने की कोशिश की थी : वे आपके ख़िलाफ़ हर तरह की चालें चलने में लगे रहे, यहाँ तक कि सच्चाई जग ज़ाहिर हो गयी और उन लोगों के कुढ़ते रहने के बावजूद अल्लाह की इच्छा पूरी हो कर रही।  (48)

उन (पाखंडियों) में से कुछ लोगों ने कहा, "मुझे घर पर ही रुके रहने की इजाज़त दे दीजिए : मुझे परेशानी में न डालिए।" मगर वे तो पहले ही परेशानी में पड़ चुके हैं : जहन्नम विश्वास न करनेवालों को अपने घेरे में ले लेगी। (49)

(ऐ रसूल), अगर आपकी क़िस्मत से कुछ अच्छा हो, तो वह उन्हें दुखी कर देगा, लेकिन अगर आप पर कोई मुसीबत आ जाए, तो वे अपने आप से कहेंगे, "इसीलिए तो हमने इस काम में सावधानी बरती थी", और वे ख़ुश होते हुए वहां से चल देंगे।  (50

कह दें, "हमारे साथ तो बस वही होना है जो अल्लाह ने हमारे बारे में फ़ैसला कर रखा है। वही हमारा मालिक है : ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।" (51

कह दें, "तुम हमारे साथ जिस घटना [यानी,क़त्ल हो जाने] की उम्मीद लगाए बैठे हो, वह हमारे लिए दो सबसे अच्छी चीज़ों (लड़ाई में जीत या शहीद होकर परलोक  में मिलनेवाले इनाम) को छोड़कर और क्या है? वैसे हम अल्लाह से यह उम्मीद रखते हैं कि वह तुम्हारे ऊपर कोई यातना उतार दे, ऐसा वह चाहे ख़ुद ही करे या फिर हमारे हाथों कराए. अत: अब (नतीजे का) इंतज़ार करो; हम भी (तुम्हारे साथ) इंतज़ार करते हैं।" (52)

कह दें, "(सच्चाई के रास्ते में) तुम चाहे ख़ुशी से दो या मन मार कर दो, तुम जो कुछ भी दोगे, वह स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि तुम आज्ञा माननेवाले लोग नहीं हो।" (53)

जो कुछ भी वे देते हैं, उसे स्वीकार कर लेने में बस एक ही रुकावट है, और वह यह कि वे अल्लाह और उसके रसूल के आदेश को मानने से इंकार करते हैं, नमाज़ पढ़ने आते हैं, तो बड़ी सुस्ती से, और कुछ देते भी हैं, तो बड़े बेमन से।  (54)

अतः (ऐ रसूल!), आप उनके माल और उनके बाल-बच्चों को देखकर प्रभावित न हो जाएं : अल्लाह का इरादा यो यह है कि इन्हीं (माल व औलाद) के द्वारा उन्हें इस दुनिया में सज़ा दे, और (सच्चाई पर) विश्वास न करने [कुफ्र] की हालत में ही उनकी जान निकले। (55)

वे अल्लाह की क़समें खाते हैं कि वे तुम्हीं [ईमानवालों] में से हैं, मगर (असल में) वे तुममें से नहीं हैं. वे बड़े डरपोक व बुज़दिल लोग हैं : (56)

अगर उन्हें कोई छिपने की जगह मिल जाए, या कोई गुफा या कोई ऐसी जगह जहाँ रेंगकर भी घुसा जा सके, तो वे उसकी ओर ऐसे दौड़ पड़ेंगे मानो रस्सी तोड़कर भागे जा रहे हों।  (57)

[ऐ रसूल], उनमें से कुछ लोग, ग़रीबों को दिए जाने वाले माल [ज़कात] के बँटवारे को लेकर आप पर सवाल उठाते हैं : अगर इसमें से उन्हें हिस्सा दे दिया जाता है, तो वे संतुष्ट हो जाते हैं, और अगर न दिया जाए तो भड़क जाते हैं।   (58)

काश कि वे उतने पर ही संतोष कर लेते जितना कि अल्लाह और उसके रसूल ने उन्हें दिया था, औऱ कहते कि "हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है ----- हमें अल्लाह अपने फ़ज़ल से (बहुत कुछ) देगा, और उसका रसूल भी------ (माफ़ी पाने की) उम्मीद में हम तो केवल अल्लाह के ही सामने झुकते हैं।" (तो यह उनके लिए अच्छा होता!) (59)

यह माल (सदक़ा) तो बस ग़रीबों, ज़रूरतमंदों, ऐसे लोग जो इसके वसूली के काम में लगे हों, ऐसे लोग जिनके दिलों को (सच्चाई से) जीतने की ज़रूरत है, ग़ुलामों को आज़ाद करने के लिए और ऐसे लोगों की मदद के लिए जो क़र्ज़ में डूबे हों, अल्लाह के रास्ते में ख़र्च के लिए और ज़रूरतमंद मुसाफ़िरों की मदद के लिए है (जो अपने घर न पहुँच पा रहे हों)। यह अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है; अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (60)

कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो नबी का यह कहकर अपमान करते हैं, "वह तो (कान के कच्चे हैं) कुछ भी सुन लेंगे।" आप कह दें, "वह तो तुम्हारी ही भलाई के लिए सुनता है : वह अल्लाह पर विश्वास रखता है, ईमानवालों पर भरोसा करता है, और तुम में से जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए तो वह रहमत है।” जो लोग अल्लाह के रसूल का अपमान करते हैं, उनके लिए दर्दनाक यातना होगी। (61)

(ईमानवालो), वे तुम्हें ख़ुश करने के लिए अल्लाह की क़समें खाते हैं : अगर वे सच्चे ईमानवाले होते, तो उनके लिए ज़्यादा उपयुक्त तो यह होता कि वे अल्लाह और उसके रसूल को मनाने व ख़ुश करने की कोशिश करते। (62)

क्या वे जानते नहीं कि जो कोई अल्लाह औऱ उसके रसूल का विरोध करेगा, वह जहन्नम की आग में जाएगा और वहीं हमेशा रहेगा? यही सबसे बड़ी बेइज़्ज़ती है। (63)

मुनाफ़िक़ों [पाखंडियों] को डर है कि कहीं कोई ऐसी सूरह न उतर जाए जो उनके दिलों के अंदर की छिपी हुई बात को सबके सामने ज़ाहिर कर दे ------ कह दें, "तुम मज़ाक़ उड़ाते रहो : जिस चीज़ का तुम्हें डर है, अल्लाह उसे सामने लाकर रहेगा!"------ (64)

फिर भी अगर आप उनसे पूछते, तो उनका जवाब ज़रूर यही होता, "हम तो बस ऐसे ही बातें कर रहे थे और आपस में हँसी-मज़ाक़ कर रहे थे।" कह दें, "क्या तुम अल्लाह, उसकी उतारी गयी आयतों, और उसके रसूल के बारे में हँसी-मज़ाक़ करते हो? (65

"तुम अपनी तरफ़ से सफ़ाई देने की कोशिश न करो; तुम (सच्चाई पर) विश्वास कर लेने के बाद अब विश्वास करने से इंकार करते हो." तुम में से कुछ को तो हम माफ़ कर सकते हैं, मगर बाक़ी बचे लोगों को तो हम ज़रूर सज़ा देंगे : वे मुजरिम लोग हैं।" (66

मुनाफ़िक़ लोग [Hypocrites], चाहे मर्द हों या औरत, सब एक ही तरह के हैं : वे बुरे काम करने का हुक्म देते हैं, और भलाई के काम से रोकते हैं; उन्होंने (सच्चाई के रास्ते में ख़र्च करने से) अपने हाथों की मुठ्ठियाँ बन्द कर रखी हैं। वे अल्लाह को भुला बैठे हैं, सो अल्लाह ने भी उन पर ध्यान देना छोड़ दिया है। मुनाफ़िक़ लोग बड़े ही नाफ़रमान [Disobedient] लोग हैं। (67)

मुनाफ़िक़ लोग, चाहे मर्द हों या औरत, और (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार करनेवालों के लिए अल्लाह ने जहन्नम की आग का वादा कर रखा है, जिसमें वे हमेशा के लिए रहेंगे: ये उनके लिए काफ़ी है। अल्लाह ने उन्हें ठुकरा दिया है, और एक कभी न ख़त्म होनेवाली यातना उनके इंतज़ार में है।  (68)

"तुम भी उन्हीं की तरह हो, जो तुम से पहले (यहाँ) रहते थे : वे (ताक़त में) तुम से कहीं ज़्यादा मज़बूत थे, और धन-दौलत और औलाद में भी तुम से बढ़े हुए थे; उन्होंने भी इस दुनिया में अपने हिस्से की ज़िंदगी का मज़ा उठाया, जैसा कि तुम अभी उठा रहे हो; उनकी ही तरह, तुम भी बेकार बातों में उलझे हुए हो।" उनके किए गए कर्म बेकार चले गए, इस दुनिया में भी और आनेवाली दुनिया में भी; ये वही लोग हैं जो आनेवाली ज़िंदगी में सब कुछ गँवा बैठेंगे।  (69)

क्या उन लोगों ने कभी अपने पूर्वजों की कहानियाँ नहीं सुनीं ---  नूह [Noah] के लोगो की, आद और समूद की, इबराहीम [Abraham] की, मदयनवालों [Midians] की और उन खंडहर बनी बस्तियों की? उनके रसूल उनके पास सच्चाई के स्पष्ट प्रमाण ले कर आए थे : अल्लाह ने उन्हें धोखे में नहीं डाला था, उन्होंने तो ख़ुद अपने आपको धोखा दिया था।  (70)

ईमान रखनेवाले, मर्द और औरत दोनों ही एक दूसरे की मदद करते हैं; वे भलाई के काम करने का हुक्म देते हैं, और बुरे कामों से रोकते हैं; वे पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और निर्धारित ज़कात अदा करते हैं; और वे अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा को मानते हैं। अल्लाह ऐसे लोगों को अपनी रहमत से माफ़ कर देगा : अल्लाह बहुत ताक़तवाला, बेहद समझ-बूझवाला है।  (71

ईमान रखनेवाले मर्द और औरतों, दोनों से अल्लाह ने (जन्नत के) ऐसे बाग़ों का वादा कर रखा है जिनके नीचे नहरें बहती हैं और जहाँ उन्हें हमेशा के लिए रहना है, सदाबहार आनंद के बाग़ों के बीच अच्छे, सुकून के घरों में; और --- सबसे बढ़कर बात--- अल्लाह की ख़ुशी और रज़ामन्दी के साथ रहेंगे; यही सबसे बड़ी कामयाबी है।  (72)

ऐ नबी! विश्वास करने से इंकार करनेवालों और मुनाफ़िक़ों [पाखंडियों] के ख़िलाफ़ संघर्ष [जिहाद] करें और उनके साथ सख़्ती से पेश आएं। जहन्नम उनका आख़िरी ठिकाना है ----- और क्या ही बुरा ठिकाना है यह! (73)

वे अल्लाह की क़समें खाते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा, मगर असल में, उन्होंने बेधड़क हुक्म न मानने की बात कही थी, और ईमान लाने व अल्लाह के सामने झुकने के बाद, वे इसके खुले विरोधी बन गए; उन्होंने (रसूल को नुक़सान पहुँचाने की) कोशिश की, हालाँकि वे ऐसा कर नहीं पाए, ----- उनकी ईर्ष्या व द्वेश का कारण तो बस यह है कि अल्लाह और उसके रसूल ने अपने फ़ज़ल से उन्हें समृद्ध कर दिया। उनके लिए बेहतर यही होगा कि फिर से (अल्लाह के आगे] झुक कर तौबा कर लें : अगर वे मुँह मोड़ते हैं, तो अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत [Hereafter] में सज़ा देगा, और धरती पर कोई न होगा जो उन्हें बचा सके या उनकी मदद कर सके।  (74)

उनमें से कुछ लोगों ने अल्लाह के सामने यह कहते हुए वचन दिया था कि,  "अगर अल्लाह अपने फ़ज़ल से कुछ हमें देगा, तो हम ज़रूर दान करेंगे, और नेक व अच्छे बनकर रहेंगे",  (75)

मगर जब अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़ल से सचमुच दे दिया, तो वे उसमें कंजूसी करने लगे और अपने वचन से फिर गए।  (76)

क्योंकि उन लोगों ने अल्लाह से किए गए वादे को तोड़ डाला, वह सारे झूठ जो वे बोलते रहे, इन सबके नतीजे में अल्लाह ने उनके दिलों में 'पाखंड' [Hypocrisy] को उस दिन तक के लिए बैठा दिया, जिस दिन कि वे अल्लाह से मिलेंगे।  (77)

क्या वे नहीं समझते कि अल्लाह उनके सारे राज़ और उनकी अकेले में की गयी कानाफुसियों को अच्छी तरह जानता है? और यह कि अल्लाह नज़रों से छिपी हुई [ग़ैब] सारी बातों को जानता है? (78

ये (मुनाफ़िक़) वही लोग हैं, जो दिल खोलकर दान [सदक़ा] देनेवाले ईमानवालों को भी बुरा-भला कहते हैं, और उनको भी जो बड़ी मुश्किल से (अपनी आमदनी से) थोड़ा दान दे पाते हैं : वे ऐसे लोगों की हँसी उड़ाते हैं, मगर अल्लाह (की तरफ़ से) उनकी हँसी उड़ायी जाती है ------ उनके लिए दर्दनाक यातना तैयार है। (79)

[ऐ रसूल], आप ऐसे लोगों की माफ़ी के लिए दुआ करें या न करें, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा : अगर आप उनके लिए सत्तर बार भी दुआ करेंगे, तब भी अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा, यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल को मानने से इंकार कर दिया. अल्लाह ऐसे लोगों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो उससे बग़ावत [rebel] कर बैठते हैं। (80)

अल्लाह के रसूल जब (तबूक की लड़ाई के लिए) निकल पड़े, तो जिन लोगों को (अपने घरों में) रुके रहने के लिए छोड़ दिया गया था, वे वहाँ अपने बैठे रहने पर बड़े ख़ुश थे; वे अल्लाह के रास्ते में अपने माल और जान के साथ संघर्ष [जिहाद] करने के विचार से ही चिढ़ते थे। वे एक दूसरे से कहते थे, "इतनी गर्मी में (युद्ध के लिए) न निकलो।" कह दें, "जहन्नम की आग इससे कहीं अधिक गर्म होगी," काश, कि वे समझ पाते (तो ऐसा न कहते)! (81

उन्हें अभी थोड़ा सा हँसने दो; जो कुछ उन्होंने किया है, उसके बदले में उन्हें बहुत रोना पड़ेगा।  (82)

अत: [ऐ रसूल], अगर अल्लाह आपको ऐसे लोगों के एक समूह के पास फिर से ले आए, जो आपके साथ (युद्ध में) जाने की अनुमति माँगते हों, तो कह देना, "तुम मेरे साथ कभी भी दुश्मनों से लड़ने के लिए नहीं जा सकते हो : तुम ने पहली बार (जिस तरह) घर पर बैठे रहने को पसंद किया, तो अब उन्हीं के साथ (घरों में) बैठे रहो जो पीछे रह जाते हैं।" (83)

इन (पाखंडियों) में से अगर कोई मर जाए, तो (ऐ रसूल), इनमें से किसी के लिए आप (जनाज़े की) नमाज़ न पढ़ाएं, और न कभी उसकी क़ब्र पर (दुआ के लिए) खड़े हों : इन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास करने से इंकार कर दिया और मरे इस हाल में कि बाग़ी बने रहे।  (84)

और (देखो), उनके माल और उनकी औलाद तुम्हें मोहित न करे दे : अल्लाह तो यह चाहता है कि इन्हीं चीज़ों के द्वारा उन्हें इस संसार में सज़ा दे और यह कि उनकी जान निकलते समय भी वे (सच्चाई पर) विश्वास करनेवाले न हों।  (85)

जब (क़ुरआन की) कोई सूरह उतरती है (जिसमें कहा जाता है), "अल्लाह पर विश्वास करो और उसके रसूल के साथ मिलकर कड़ा संघर्ष [जिहाद] करो", तो उनके अमीर लोग यह कहते हुए आप से (जिहाद में न जाने की) अनुमति माँगने लगते हैं कि, "दूसरे लोगों के साथ हमें भी यहीं रुके रहने के लिए छोड़ दिया जाए": (86)

वे इस बात को ज़्यादा पसंद करते हैं कि वे पीछे रुके रह जानेवालों [औरतों व अपाहिजों] के साथ रह जाएँ। (असल में) उनके दिलों को बंद कर के मुहर लगा दी गयी है : इसलिए वे समझते नहीं हैं।  (87)

मगर, अल्लाह के रसूल और उनके साथ वे जो ईमान रखते हैं, अपने मालों और अपनी जानों के साथ जमकर संघर्ष [जिहाद] करते हैं, तो उन्हीं के लिए सबसे बेहतर चीज़ें होंगी; यही वे लोग हैं जो कामयाब होंगे। (88)

अल्लाह ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं, जिनमें बहती हुई नहरें होंगी और वे हमेशा वहीं रहेंगे। यही सबसे बड़ी जीत है।  (89)

अरब के कुछ देहाती लोग [बद्दू] भी बहाने बनाते हुए आए, कि उन्हें भी (युद्ध में) जाने से छूट मिल जाए। जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल से झूठी बातें बनायीं, वे घरों में ठहरे रहे। उनमें से जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े रहे, उन्हें दर्दनाक सज़ा होगी,  (90)

मगर, जो लोग कमज़ोर हैं, बीमार हैं, या जिनके पास ख़र्च करने का कोई साधन नहीं है, ऐसे लोगों पर कोई दोष न होगा, शर्त यह है कि वे अल्लाह और उसके रसूल के लिए निष्ठा रखते हों ------ जो अच्छा व नेक कर्म करते हैं, तो कोई कारण नहीं कि उन पर दोष लगाया जाए : अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (91)

और उन लोगों पर भी कोई दोष न होगा जो [ऐ रसूल] आपके पास आये थे कि आप उनके (युद्ध में जाने के) लिए कोई सवारी का प्रबन्ध कर देते, जिन्हें आप ने कहा था, "तुम्हारी सवारी के लिए अभी मेरे पास कुछ नहीं है": वे दुखी मन से रोते हुए वहाँ से चले गए कि उनके पास देने के लिए कुछ भी न था।  (92)

इल्ज़ाम तो बस उन पर है जो धन-दौलत के होते हुए भी आप से (युद्ध में जाने से) छुटकारा पाना चाहते थे, और वे पीछे ठहरे हुए लोगों के साथ रुके रहने को प्राथमिकता देते थे। अल्लाह ने उनके दिलों को बंद कर के मुहर लगा दी है : इसलिए वे समझते-बूझते नहीं। (93)

जब तुम (युद्ध कर के) अपने अभियान से वापस आओगे, तो [ऐ ईमानवालो], वे तुम्हारे पास बार बार अपने बहानों के साथ आएंगे। तुम कह देना, "बहाने न बनाओ। हम तु्म पर विश्वास नहीं करते: अल्लाह ने हमें तुम्हारे बारे में बता दिया है। अल्लाह और उसके रसूल अब तुम्हारे काम पर नज़र रखेंगे, और अंत में तुम्हें उस हस्ती के पास लौटना होगा, जो हर दिखायी देनेवाली और छिपी चीज़ को जानता है। फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम ने किया होगा।" (94

जब तुम उनके पास वापस आओगे, तो वे तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाएँगे, ताकि तुम उन्हें उनकी हालत पर छोड़ दो ----- सो तुम उन्हें अकेला छोड़ दो : वे घृणा के पात्र हैं, और उनका ठिकाना जहन्नम होगा, जो उनके कर्मों का बदला है -------- (95)

वे तुम्हारे सामने क़समें खाएँगे ताकि तुम उन्हें स्वीकार कर लो, लेकिन (याद रखो!), अगर तुम ने उन्हें स्वीकार कर भी लिया, तब भी अल्लाह ऐसे लोगों को नहीं अपनाता जो उससे बग़ावत कर देते हैं। (96)

अरब के देहाती लोग [बद्दू], विश्वास न करने [कुफ़्र] और पाखंड में सबसे ज़्यादा कट्टर हैं। इस बात की संभावना बहुत ही कम है कि अल्लाह ने अपने रसूल पर जो आदेश उतारे हैं, उनकी सीमाओं को वे ठीक ढंग से पहचान पाएंगे। अल्लाह सब (का हाल) जाननेवाला और सब कुछ समझनेवाला है। (97)

उनमें से कुछ अरब के देहाती ऐसे हैं कि वे जो कुछ ख़र्च करते हैं, उसे थोपी हुई चीज़ समझते हैं; वे इस इंतज़ार में हैं कि कब तुम्हारी क़िस्मत ख़राब होती है, मगर क़िस्मत तो असल में उनकी ख़राब होनेवाली है। अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ जाननेवाला है।  (98)

मगर अरब के देहातियों में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अल्लाह और अन्तिम दिन [क़यामत] पर विश्वास रखते हैं और जो कुछ (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च करते है, उसे अल्लाह से और नज़दीक होने का, और रसूल की दुआएं हासिल करने का ज़रिया मानते हैं : ये सचमुच उन्हें अल्लाह के और नज़दीक कर देगा, और अल्लाह उन्हें अपनी रहमत में शामिल कर लेगा। अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है। (99)

अल्लाह उन लोगों से बहुत ख़ुश होगा जो (मक्का से मदीना) हिजरत करके सबसे पहले गए [मुहाजिर], और (मदीना के वे लोग) जो उनके मददगार हुए [अंसार], और जो लोग अच्छाई के रास्ते में उनके पीछे-पीछे चले, और (उसी तरह) वे लोग भी अल्लाह से उतने ही ख़ुश होंगे : उसने उनके लिए बहती हुई नहरों के साथ बाग़ [Gardens] तैयार कर रखे हैं, जिसमें उन्हें हमेशा रहना है। यही सबसे बड़ी कामयाबी है।  (100)


तुम्हारे आस-पास बसनेवाले कुछ देहाती लोग पाखंडी [मुनाफ़िक़] हैं, इसी तरह मदीना के भी कुछ लोग हैं ------ वे अपने पाखंड में अड़ियल हैं. [ऐ रसूल], आप उन्हें नहीं जानते, मगर हम उन्हें अच्छी तरह जानते हैं : हम उन्हें दो बार यातना देंगे, और उसके बाद (आख़िरत में) उन्हें दर्दनाक सज़ा का सामना करने के लिए लौट कर आना होगा।  (101)

और कुछ दूसरे लोग हैं जिन्होंने अपने गुनाह करने को क़बूल किया है, उन्होंने कुछ अच्छे कर्म किए हैं और कुछ बुरे कर्म : अल्लाह उनकी तौबा [Repentance] क़बूल कर सकता है, क्योंकि अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और दयावान है।  (102)

[ऐ रसूल], इन लोगों के मन की सफ़ाई और शुद्धि के लिए आप उनकी संपत्तियों में से कुछ तोहफ़े [सदक़ा] स्वीकार कर लें (कि उनमें सुधार हो), और उनके लिए दुआ करें ----- आपकी दुआ उनके दिल को बड़ा सुकून पहुँचाएगी। अल्लाह (दुआएं) सुननेवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (103)

क्या वे जानते नहीं कि वह अल्लाह है जो ख़ुद अपने बंदों की तौबा क़बूल करता है और उसके रास्ते में जो कुछ खुले दिल से दिया जाता है, उसे स्वीकार करता है? वह हमेशा (दिल से की गयी) तौबा को क़बूल करने के लिए तैयार रहता है, वह बेहद दयावान है।  (104)

[ऐ रसूल!] कह दें, "कर्म किए जाओ! अल्लाह तुम्हारे कर्मों को देखेगा ------  उसका रसूल और ईमानवाले भी तुम्हारे कर्मों को देखेंगे------ फिर तुम लौट कर उसके पास जाओगे, जो हर दिखनेवाली और छिपी चीज़ को जानता है, और वह सब बता देगा जो कुछ तम करते रहे हो।" (105)

और कुछ दूसरे लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे हैं, चाहे वह उन्हें सज़ा दे या उन पर दया कर दे। अल्लाह सब जाननेवाला, बहुत समझ-बूझवाला रखनेवाला है। (106)

और (मुनाफ़िक़ों में) कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने एक मस्जिद बनायी थी ------ इस विचार से कि नुक़सान पहुँचाएं, अविश्वास बढ़ाएं, और ईमानवालों के बीच फूट डालें -----वह उन लोगों के लिए एक 'निगरानी- चौकी' के रूप में हो, जो पहले अल्लाह और उसके रसूल से लड़ाइयाँ लड़ चुके हों : वे इस तरह क़समें खाएँगे कि "हमने तो बस अच्छा ही चाहा था," मगर अल्लाह गवाही देता है कि वे बिल्कुल झूठे हैं।  (107)

[ऐ रसूल!] आप कभी भी उस मस्जिद में (नमाज़ पढ़ने के लिए) खड़े न हों। बल्कि आपको ऐसी ही मस्जिद में नमाज़ पढ़ना चाहिए, जिसकी बुनियाद पहले दिन से ही अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचने के इरादे से रखी गयी थी : इस मस्जिद में ऐसे लोग आते हैं, जो (अपने मन की) सफ़ाई को और बढ़ाना चाहते हैं------ अल्लाह ऐसे लोगों को पसन्द करता है जो अपने आपको शुद्ध [purify] करना चाहते हैं।  (108)

अब बताओ कौन अच्छा हुआ, वह जो अपनी इमारत की बुनियाद अल्लाह से डरते हुए और उसकी ख़ुशी हासिल करने के इरादे से रखता है, या वह जिसने अपनी इमारत की बुनियाद किसी खाई के टूटते हुए किनारे पर रखी हो, फिर वह उसे लिए दिए लुढ़कती हुई जहन्नम की आग में जा गिरे? अल्लाह शैतानी करनेवालों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता :  (109

जो इमारत इन लोगों ने बनायी है, वह हमेशा उनके दिलों के अंदर उस समय तक संदेह पैदा करती रहेगी, जबतक कि उनके दिल ही टुकड़े-टुकड़े न हो जाएँ। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और (हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।  (110)

अल्लाह ने जन्नत [Garden] के बदले में, ईमानवालों से उनकी जान और उनके माल ख़रीद  लिए हैं ------ वे अल्लाह के रास्ते में लड़ते हैं : वे जान मारते भी हैं, और मारे भी जाते हैं---- यह अल्लाह का किया हुआ एक पक्का वादा है जो तौरात [Torah], इंजील [Gospel] और क़ुरआन में मौजूद है। अल्लाह से बढ़कर अपने वादे को पूरा करनेवाला कौन हो सकता है? अतः जो सौदा तुमने उससे किया है, उस पर खु़शियाँ मनाओ : यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (111)

(ईमानवाले वो हैं), जो (गुनाहों से) तौबा के लिए अल्लाह के सामने झुकते हैं; उसकी बन्दगी और उसका (दिन-रात) गुणगान करते हैं; जो (सच की खोज में) घूमते रहते हैं; जो रुकू और सज्दे में (अल्लाह के आगे) अपने आपको झुकाते हैं; जो अच्छा काम करने का हुक्म देते हैं, और बुरे काम से रोकते हैं और अल्लाह की तय की हुई सीमाओं की निगरानी करते हैं. ऐसे ईमानवालों को ख़ुशख़बरी सुना दें।  (112)


यह बात नबी [Prophet] और ईमान रखनेवालों के लिए उचित नहीं कि वे बहुदेववादियों [Idolaters] के लिए माफ़ी की दुआ करें ----- चाहे वे उनके नातेदार ही क्यों न हो ---- जबकि उनपर यह बात खुल चुकी है कि वे (जहन्नम की) भड़कती आग में रहनेवाले हैं :  (113)

इबराहीम ने अपने बाबा की माफ़ी के लिए जो दुआ की थी, वह इस कारण से थी कि उसने अपने बाप से एक वादा कर लिया था, मगर एक बार जब उसकी समझ में आ गया कि उसके बाप अल्लाह (की सच्चाई) के दुश्मन हैं, तो फिर वह उनसे अलग हो गया। असल में, इबराहीम बड़ा ही नर्म दिल, और बहुत सहनशील था।  (114

अल्लाह ऐसा नहीं है कि लोगों को (ईमान का) सही रास्ता दिखा देने के बाद उन्हें भटकता छोड़ दे, जब तक कि वह उन्हें पूरी तरह साफ़-साफ़ बता न दे कि उन्हें किन चीज़ों से बचना चाहिए। अल्लाह के पास हर चीज़ की जानकारी है;  (115

आसमानों और ज़मीन का नियंत्रण [बादशाही] अल्लाह के ही पास है; वही है जो ज़िंदगी और मौत देता है; उसके सिवा तुम्हारा कोई दोस्त और मददगार नहीं है। (116)

अल्लाह ने अपने नबी [Prophet] पर और मुहाजिरों [Emigrants] और अंसार [Helpers] पर अपनी रहमत व ख़ास दया दृष्टि डाली, जिन्होंने ऐसी मुश्किल घड़ी में (नबी का) साथ दिया, जबकि उनमें से कुछ के दिल क़रीब क़रीब डगमगा गए थे : फिर अल्लाह ने (माफ़ करते हुए) उनके हाल पर रहम किया; सचमुच वह उनके लिए बेहद उदार और मेहरबान था।  (117)

और वे तीन आदमी जो (घर पर) रुके रह गए थे : जब ज़मीन अपने पूरे फैलाव के बावजूद उन पर तंग हो गई थी, और जब वे ख़ुद अपनी जानों से तंग आ गए थे, और जब उन्हें समझ आ गया कि अल्लाह (की पकड़) से बचने के लिए उसकी शरण के सिवा कहीं कोई शरण नहीं मिल सकती है, फिर अल्लाह ने उन पर अपनी रहमत [Mercy] दिखायी, ताकि वे (उसकी ओर तौबा करते हुए) लौट आएँ। सचमुच अल्लाह हमेशा ग़लतियों को माफ़ करनेवाला, बेहद मेहरबान है।  (118)

ऐ ईमानवालो!, तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो : और सच्चे लोगों के साथ हो जाओ।  (119)

मदीना के लोगों और उसके आसपास बसनेवाले देहाती लोगों को अल्लाह के रसूल का साथ देने से अपने आपको न तो रोकना चाहिए था, और न ही उन्हें उस (रसूल) की जान से ज़्यादा अपनी जान की फ़िक्र करनी चाहिए थी : अल्लाह के रास्ते में (लड़नेवालों को) जब कभी प्यास लगती है, थकान होती है, या भूख सताती है, या जब वे कोई ऐसा क़दम उठाते हैं जिससे काफ़िरों का क्रोध भड़के, या किसी दुश्मन को कोई नुक़सान पहुँचाते हैं, तो ऐसे हर काम पर उनके कर्म-खाते में नेकी लिख ली जाती है----- अच्छा कर्म करने का बदला [reward], अल्लाह कभी बेकार नहीं जाने देता ------  (120)

अल्लाह के रास्ते में चाहे वे थो़ड़ा ख़र्च करें या ज़्यादा, या किसी पहाड़ की घाटी को पार कर लें, ये सारी चीज़े उनके हिसाब में लिख ली जाती हैं, ताकि अल्लाह उन्हें हर ऐसे काम का इनाम दे जो उनके बेहतरीन कर्मों के लिए तय है।  (121)

हाँ, यह बात ठीक नहीं होगी कि सब के सब ईमानवाले एक साथ (युद्ध के लिए) निकल खड़े हों : हर एक समुदाय में से लोगों का एक दल होना चाहिए जो बाहर निकल कर दीन [Religion] की सही समझ हासिल करे, ताकि वह अपने लोगों को सिखा सके जब वे (युद्ध से) लौटकर आएं और ताकि वे अपने आपको बुरे कामों से बचा सकें।  (122)

ऐ ईमानवालो! तुम उन विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] से लड़ो जो तुम्हारे आसपास फैले हुए हैं, और उन्हें लगना चाहिए कि तुम (जंग के लिए) मज़बूती से खड़े हो : यह जान लो कि अल्लाह उन लोगों के साथ होता है जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं।  (123

जब भी कोई सूरह (अल्लाह की तरफ़ से) उतारी गई, तो उन (पाखंडियों) में से कुछ लोग कहते हैं, "क्या तुम में से किसी के भी ईमान में इससे मज़बूती आयी है?" निश्चय ही इससे विश्वास रखनेवालों [मोमिनों] का ईमान और भी मज़बूत हो जाता है, और वे (नये संदेश के आने की) ख़ुशियाँ मनाने लगते हैं,  (124)

रहे वे लोग जिनके दिलों में (ग़लती पर अड़े रहने का) रोग है, तो हर नई सूरह उनके इस अड़ियल रोग को और ज़्यादा बढ़ा देती है। (नतीजा यह है कि) वे विश्वास नहीं करते और इसी हाल में मर जाते हैं। (125)

क्या वे देखते नहीं कि हर साल वॆ एक या दो बार किसी न किसी आज़माईश [Test] में डाले जाते हैं? फिर भी न तो वे (गुनाहों से) तौबा करते हैं, और न कुछ सबक़ सीखते हैं।  (126)

जब कभी कोई सूरह उतरती [reveal] है, (और उसमें अगर पाखंडियों का ज़िक्र हो) तो वे (चौंककर) एक-दूसरे को देखते हैं, और (इशारों में) कहते हैं, "तुम्हें कोई देख तो नहीं रहा है?" और फिर वहाँ से (मुँह फेरकर) चल देते हैं---- अल्लाह ने उनके दिल फेर दिए हैं, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझ-बूझ से काम नहीं लेते।  (127)


[लोगो!] तुम्हारे पास (अल्लाह का) एक रसूल आ गया है, जो तुम्हीं लोगों में से है. तुम्हारी तकलीफ़ें उसे बहुत दुखी कर देती हैं : वह तुम्हारी भलाई के लिए बहुत चिंतित रहता है, और ईमानवालों के प्रति वह बहुत नर्म दिल और बेहद मेहरबान है।  (128)

अगर फिर भी ये लोग मुँह मोड़ें, तो [ऐ रसूल!], आप कह दें, "मेरे लिए अल्लाह का सहारा काफ़ी है : उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं; उसी पर मैंने भऱोसा किया है; वह बड़े महान सिंहासन [अर्श/Throne] का मालिक है।" (129)



सूरह 110 : अन नस्र [मदद, Help]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

(ऐ रसूल), जब अल्लाह की मदद आ पहँचे और वह (मक्का की जीत के लिए) आपका रास्ता खोल दे,  (1)

और आप (जब) लोगों को देख लें (कि) वे अल्लाह के दीन [धर्म] में गिरोह के गिरोह शामिल हो रहे हैं, (2)

तो आप (शुक्र अदा करते हुए) अपने रब की बड़ाई के साथ उसका ख़ूब गुणगान करें और उसी से माफ़ी माँगें :  (3)

सचमुच वह हमेशा (अपने बंदों की) तौबा [repentance] क़बूल करने के लिए तैयार रहता है। (4)

 

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...