Later Meccans-2 [620--623 AD]
सूरह 46 : अल अहक़ाफ़ [रेत के टीले, The Sand Dunes]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हा॰ मीम॰ (1)
इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़ से उतारा जा रहा है, जो बहुत ताक़त व इज़्ज़तवाला, गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है। (2)
हमने आसमानों और ज़मीन, और जो कुछ उन दोनों के बीच मौजूद है, उनकी रचना एक ख़ास मक़सद और एक तय की हुई अवधि तक के लिए ही की है, इसके बावजूद जिन लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया है, वे उन चेतावनियों पर ध्यान नहीं देते जो उन्हें दी जाती रही हैं। (3)
[ऐ रसूल] आप कहें, "तुम अल्लाह को छोड़कर जिनकी पूजा करते हो, क्या तुमने उनके बारे में कभी सोचा है : मुझे दिखाओ तो सही कि इस धरती का कौन सा हिस्सा है जिसे उन्होंने पैदा किया है या बताओ कि आसमानों में क्या कोई हिस्सा है जो इनके क़ब्ज़े में है; मेरे पास इस [क़ुरआन] से पहले की कोई किताब [Scripture] ले आओ या दिव्य ज्ञान की कोई बची हुई मान्यताओं को ही (सबूत में) पेश करो---- अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो।" (4)
उस आदमी से बढ़कर ग़लती पर और कौन होगा जो अल्लाह को छोड़कर उन (गढे हुए देवताओं) को पुकारता हो, जो क़यामत के दिन तक उसकी पुकार का जवाब नहीं दे सकते, उन्हें तो यह भी ख़बर नहीं कि उन्हें कोई पुकार रहा है; (5)
और जब सारे लोग (क़यामत के दिन) इकट्ठा किए जाएँगे तो वे [गढे हुए देवता] ख़ुद उस आदमी के दुश्मन हो जाएंगे और उसके द्वारा की गयी पूजा को न मानते हुए उससे अलग हो जाएंगे! (6)
जब हमारी (क़ुरआन की) आयतें उन्हें पढ़कर स्पष्ट रूप से सुनाई जाती हैं तो वह सच्चाई जो उन लोगों तक पहुँचती है, उसके बारे में इंकार करनेवाले लोग [काफ़िर] यह कह देते हैं कि "यह तो सचमुच जादू है।" (7)
या वे कहते हैं कि, "उस [रसूल] ने इस (क़ुरआन) को स्वयं अपनी तरफ़ से गढ लिया है?" [ऐ रसूल] आप कह दें, "अगर मैंने इसे सचमुच गढा है तो तुम मुझे अल्लाह की पकड़ से ज़रा भी नहीं बचा सकते। जिसके बारे में तुम बातें बनाने में लगे हो, वह [अल्लाह] उसे भली-भाँति जानता है। और वह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह की हैसियत से काफ़ी है। और वही बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (8)
कह दें, "मैं अल्लाह के रसूलों में कोई पहला (या अलग) रसूल तो नहीं हूँ। मैं (निजी तौर पर) नहीं जानता कि मेरे साथ क्या किया जाएगा और न यह मालूम है कि तुम्हारे साथ क्या होगा; (अल्लाह की ओर से) जो भी “वही” [revelation] मुझे भेजी जाती है, मैं बस उसी का अनुसरण करता हूँ; और मैं सीधे सीधे (अल्लाह की ओर से) सावधान करनेवाला हूँ।" (9)
आप कहें, "क्या तुमने सोचा भी है : क्या होगा अगर यह क़ुरआन सचमुच अल्लाह की तरफ़ से हुई और फिर भी तुमने उसको मानने से इंकार कर दिया? क्या होगा अगर इसराईल की सन्तानों में से कोई इस किताब को पुरानी आसमानी किताबों [तोरैत, इंजील] से मिलती जुलती होने की गवाही दे दे, और उसमें विश्वास करने लगे, मगर तब भी तुम घमंड में इतने पड़े रहो (कि विश्वास न कर सको)? सचमुच अल्लाह शैतानियाँ करनेवालों को मार्ग नहीं दिखाता।" (10)
जो लोग सच्चाई से इंकार करने पर अड़े रहे, वे विश्वास रखनेवालों के बारे में कहते हैं, "अगर इस (क़ुरआन) में कुछ भी अच्छा होता, तो हम लोगों से पहले उन (गरीब ईमानवालों) ने इसमें विश्वास न किया होता", और चूँकि उन [काफ़िरों] ने उससे मार्गदर्शन लेने से इंकार कर दिया, सो अब वे कहते हैं, "यह तो वही पुराना झूठ है!" (11)
हालाँकि इससे पहले मूसा [Moses] की किताब [तोरैत/Torah] एक रास्ता दिखाने वाली और रहमत [mercy] के रूप में उतारी जा चुकी थी, और यह (क़ुरआन) अरबी भाषा में एक ऐसी किताब है जो उस (तोरैत) के सही व सच्चे होने की पुष्टि करती है, ताकि बुरे कर्म करने वालों को सावधान कर दे, और अच्छा कर्म करने वालों के लिए ख़ुशख़बरी ले आए। (12)
इसमें शक नहीं कि जिन लोगों ने कह दिया, "हमारा रब अल्लाह है, "फिर वे सीधे मार्ग पर जमे रहे, तो उन्हें न तो किसी बात का डर होगा और न वे दुखी होंगे : (13)
वही जन्नतवाले लोग हैं, वहाँ वे हमेशा के लिए रहेंगे-- यह उन कर्मों का इनाम [reward] है जो वे (दुनिया में) किया करते थे। (14)
हमने आदमी को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है : उसकी माँ तकलीफ़ उठाकर उसे (पेट में) लिए फिरी और उसे बड़ी तकलीफ़ के साथ जन्म दिया---- और उसके गर्भ की अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने में पूरे तीस माह लगे, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी जवानी को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी मदद कर कि मैं तेरे इस एहसान का शुक्रिया अदा कर सकूँ जो तुने मुझपर और मेरे माँ-बाप पर किया है; और यह कि मैं अच्छे कर्म कर सकूँ जिससे तू ख़ुश हो जाए; मेरी संतान को भी अच्छा व नेक बना। मैं (तौबा के लिए) तेरी ही ओर झुकता हूँ; और मैं उन लोगों में से हूँ जो पूरी तरह से तुझ पर समर्पित [मुस्लिम] हैं।" (15)
ऐसे ही लोगों के द्वारा किए गए कर्मों में से बेहतरीन कामों को हम क़बूल कर लेते हैं, और हम उनके बुरे कर्मों को (माफ़ करते हुए) उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं । वे जन्नतवालों में शामिल होंगे---- यह सच्चा वादा है जो उनसे किया गया है। (16)
किन्तु एक आदमी है जो अपने माँ-बाप से कहता है, "उफ़्फ़! क्या आप सचमुच मुझे डरा रहे हैं कि मैं अपनी क़ब्र से ज़िंदा उठाया जाऊँगा, हालाँकि कितनी ही नस्लें हैं जो गुज़र चुकी हैं और मुझ से पहले जा चुकीं?" उसके माँ-बाप अल्लाह से फ़रियाद करते हैं, और (बेटे से) कहते हैं, "अफ़सोस है तुमपर! विश्वास करो! निस्संदेह अल्लाह का वादा सच्चा है।" मगर तब भी वह कहता है, "ये तो बस पहले के लोगों की झूठी कहानियाँ हैं और कुछ नहीं।" (17)
ऐसे सभी लोगों (की सज़ाओं) का फ़ैसला तय हो चुका है, और इनमें ऐसे सभी गिरोह शामिल हैं जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं—चाहे वे जिन्न हों या इंसान : सचमुच वे बड़े घाटे में रहे। (18)
(अच्छे और बुरे) कर्मों के मुताबिक़ हर एक का दर्जा तय किया जाएगा और जो कुछ उन्होंने किया है, अल्लाह उन्हें उसका पूरा-पूरा बदला दे देगा : और उनपर कोई ज़ुल्म नहीं होगा। (19)
और एक दिन आएगा जब सच्चाई से इंकार करने वाले लोगों को (जहन्नम की) आग के सामने पेश किया जाएगा, और उनसे कहा जाएगा, "तुम अपने सांसारिक जीवन में अपने हिस्से की अच्छी चीज़ों को बेकार [waste] कर चुके और उनका मज़ा ले चुके हो, अतः आज के दिन तुम्हें अपमानित करनेवाली सज़ा दी जाएगी : क्योंकि तुम धरती पर बिना किसी अधिकार के घमंड करते रहे और तुमने (मर्यादा) की सभी सीमाएं तोड़ डालीं।" (20)
[ऐ रसूल] आद के भाई [हूद] की चर्चा करें : जब उन्होंने (यमन में स्थित) रेत के टीलों के बीच बसने वाले आद के लोगों को सावधान किया था, और ऐसा सावधान करने वाले उनसे पहले भी और उनके बाद भी कई आए और कई गुज़र चुके थे --- (सब एक ही बात कहते कि), "अल्लाह को छोड़ कर किसी की उपासना [इबादत] न करो। मुझे तुम्हारे लिए डर है कि एक भयानक दिन में तुम्हें दंडित किया जाएगा।" (21)
मगर उन्होंने कहा, "क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हमको अपने देवताओं से अलग-थलग कर दो? तुम अगर अपनी बात में सच्चे हो, तो फिर ले आओ हम पर वह सज़ा, जिसकी धमकी तुम हमें देते हो!" (22)
हूद ने कहा, "यह तो केवल अल्लाह ही जानता है कि वह दिन कब आएगा : मैं तो तुम्हें बस वह संदेश पहुँचा रहा हूँ जो मुझे देकर भेजा गया है, मगर मैं देख रहा हूँ कि तुम बड़े अक्खड़ व जाहिल लोग हो।" (23)
फिर जब उन लोगों ने बादलों को उनकी घाटी की तरफ़ आता हुआ देखा, तो वे कहने लगे, "यह बादल है जो हम पर बरसनेवाला है!', (हूद ने कहा), "नहीं!, बल्कि यह तो वही चीज़ है जिसके लिए तुमने जल्दी मचा रखी थी : यह तो दर्दनाक सज़ा लिए हुए एक तूफ़ानी हवा है (24)
जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को अपने रब के आदेश से तहस नहस कर देगी।" (अगली सुबह) वहाँ मकानों के खंडहर के सिवा देखने के लिए कुछ भी बाक़ी नहीं बचा था : अपराधियों को हम ऐसा ही बदला देते हैं। (25)
[ऐ मक्का के लोगो!] हमने (आद की क़ौम के) लोगों को कुछ चीज़ों में ऐसी ताक़त व सलाहियत दे रखी थी, कि वैसी ताक़त तुम्हें नहीं दी; हमने उन्हें कान, आँखें और दिल दिए थे, इसके बावजूद न तो उनके कान, न उनकी आँखें और न उनके दिल ही उनके किसी काम आ सके, क्योंकि वे अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार करते थे। जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते थे, उसी यातना ने उन्हें आ घेरा। (26)
हम तुम्हारे आस-पास बसी हुई दूसरे समुदायों की बस्तियों को भी तबाह-बर्बाद कर चुके हैं---- हमने उन्हें भी अपनी बहुत सारी निशानियाँ दी थीं, ताकि वे सही रास्ते पर वापस आ सकें--- (27)
(वे कहते थे कि) अल्लाह से नज़दीकी हासिल करने के लिए उन लोगों ने कुछ देवताओं को अल्लाह के बजाए अपना ख़ुदा बना लिया था, (अगर यह नज़दीकी वाली बात सच होती तो) फिर क्यों उनके देवताओं ने उनकी कोई मदद नहीं की? बिल्कुल नहीं! बल्कि वे (देवता) उन्हें छोड़ कर ख़ुद ही चले गए : असल में यह एक झूठी बात थी जो ख़ुद उन्हीं लोगों ने गढ कर बना ली थी। (28)
और याद करें [ऐ रसूल], जब हमने जिन्नों के एक समूह को आपके पास क़ुरआन को सुनने के लिए भेजा था, तो जब वे वहाँ पहुँच कर उसे सुनने लगे तो उन लोगों ने (एक दूसरे से) कहा, "चुप हो जाओ!" फिर जब उस (क़ुरआन) का पाठ पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर लौट गए और उन्हें (अल्लाह की ओर से) चेतावनियाँ दीं। (29)
उन (जिन्नों) ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! हमने एक ऐसी किताब [क़ुरआन] सुनी है, जो मूसा (की तौरात) के बाद उतारी गई है, जो अपने से पहले उतारी गयी किताबों को सच्चा मानती है, और सच्चाई और सीधे मार्ग की तरफ़ मार्गदर्शन करती है। (30)
(आगे कहा) ऐ लोगो! उसकी बात मान लो जो तुम्हें अल्लाह की तरफ़ बुलाता है। उस (अल्लाह) में विश्वास करो : अल्लाह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा और तुम्हें दर्दनाक यातना से बचा लेगा।” (31)
और जो कोई अल्लाह की तरफ़ बुलानेवाले की बात नहीं मानता, तो वह धरती पर कहीं भी अल्लाह के क़ाबू से बच निकलने वाला नहीं है, और न कोई अल्लाह से उसकी रक्षा करने वाला होगा : ऐसे लोग सचमुच रास्ता भटक कर दूर जा पड़े हैं। (32)
क्या इंकार पर अड़े लोग [काफ़िर] यह नहीं समझते कि वह अल्लाह जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, और जो ऐसा करने में ज़रा थका भी नहीं, उसमें इतनी ताक़त नहीं है कि वह मरे हुए लोगों को फिर से ज़िंदा कर दे? क्यों नहीं! बेशक, हर एक चीज़ उसके क़ब्ज़े में है। (33)
और जिस दिन इंकार पर अड़े काफ़िरों को जहन्नम की आग के सामने लाया जाएगा, (और उनसे पूछा जाएगा), "क्या यह (जहन्नम) सचमुच असली नहीं है?" वे जवाब देंगे, "हमारे रब की क़सम! यह सचमुच असली है", तब अल्लाह कहेगा, "सच्चाई से इंकार करने के नतीजे में अब चखो मज़ा अपनी सज़ा का!” (34)
अत: [ऐ मुहम्मद] आप धीरज रखते हुए अपने काम पर जमे रहें! जिस तरह (आप से पहले) पक्के इरादों वाले रसूलों [नूह, इबराहीम,मूसा,ईसा] ने धीरज से काम लिया था। आप उन [इंकार पर अड़े काफ़िरों] के लिए सज़ा माँगने में जल्दी न करें : जिस दिन वे लोग उस चीज़ को देख लेंगे जिसके बारे में उन्हें सावधान किया जाता था, तो वे महसूस करेंगे कि जैसे वे बस दिन की एक घड़ी भर से ज़्यादा (इस दुनिया में) नहीं ठहरे थे। यह एक (चेतावनी भरा) संदेश है। अब कौन है जो बर्बाद होगा सिवाए हर बात का विरोध करनेवाले और आदेश न माननेवालों के? (35)
सूरह 51 : अज़ ज़ारियात [उड़ाकर बिखेर देनेवाली हवा, Scattering winds]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है उन (हवाओं) की, जो दूर दूर तक फैल जाती हैं, (1)
और उनकी, जो बारिश की बूंदों से लदी होती हैं, (2)
जो आसानी से तेज गति के साथ चलती रहती है, (3)
जो उन (बारिशों) को बाँट देती हैं जैसा कि उन्हें हुक्म हुआ हो! (4)
जिस चीज़ का तुम (लोगों) से वादा किया जा रहा है, वह बिलकुल सच्चा है : (5)
(कर्मों का) फ़ैसला ज़रूर होगा--- (6)
आसमान की क़सम जहाँ (तारों से भरे) रास्ते हैं, (7)
तुम [लोग] (मरने के बाद के जीवन पर) अलग-अलग व परस्पर विरोधी बातों में पड़े हुए हो ---- (8)
इस [परलोक की हक़ीक़त] से जो लोग मुँह मोड़ते हैं, वे सच्चाई को समझने में (पूरी तरह) धोखा खा चुके हैं। (9)
तबाह हो जाएँ वे, (जो बिना किसी आधार के) यूँ ही अटकलें लगाते व झूठी बातें बनाया करते हैं; (10)
जो ग़लतियों में ऐसे डूबे हुए हैं कि सब कुछ भुलाए बैठे हैं और उन्हें कुछ ख़बर नहीं! (11)
वे (व्यंग्य से) पूछते है, "वह फ़ैसले का दिन कब आएगा?" (12)
(कह दें), उस दिन आएगा, जब वे (जहन्नम की) आग पर तपाए जाएँगे, (13)
"चखो मज़ा अब अपनी सज़ा का! यही है वह चीज़ जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।" (14)
अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचनेवाले लोग (जन्नत के) बाग़ों और (बहते हुए) पानी के सोतों (springs) में (मज़े कर रहे) होंगे। (15)
उनका रब जो कुछ नेमत उन्हें देगा, वे उसे (ख़ुशी-ख़ुशी) ले रहे होंगे, क्योंकि वे इससे पहले (दुनिया में) अच्छे कर्म करने वाले थे : (16)
रातों को कम ही सोते थे, (17)
भोर के समय इबादत करते हुए अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते थे, (18)
और अपनी दौलत में से माँगनेवाले और ठुकराए हुए लोगों को बाक़ायदा हिस्सा देते थे। (19)
पक्का विश्वास रखनेवालों के लिए इस धरती पर बहुत-सी निशानियाँ हैं--- (20)
और स्वयं तुम्हारे अंदर भी! तो क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता?--- (21)
तुम्हारी रोज़ी [sustenance] आसमान में (तय होती) है, और वह चीज़ [अंतिम फ़ैसला] भी, जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है। (22)
क़सम है आसमान और ज़मीन के रब की! सचमुच यह बात ऐसी ही पक्की [Real] है जैसे तुम (अपने मुँह से) अभी बोल रहे हो। (23)
[ऐ रसूल!] क्या आपने इबराहीम के इज़्ज़तवाले मेहमानों का क़िस्सा सुना है? (24)
जब वे [फ़रिश्ते] इबराहीम के पास आए, तो "सलाम” कहा, (जवाब में इबराहीम ने भी) “सलाम” कहा, (और मन में सोचा) "ये तो अजनबी लोग हैं।" (25)
फिर वह जल्दी से अपने घरवालों के पास गए, और एक मोटा-ताज़ा बछड़े (का भूना हुआ मांस) ले आए (26)
और उसे मेहमानों के सामने पेश किया। कहने लगे, "क्या आप लोग नहीं खाएंगे?" (27)
(इबराहीम को) उनसे डर महसूस होने लगा, मगर उनलोगों ने कहा, "डरिए नहीं", और उन्हें एक लड़के [इसहाक़] के होने की ख़ुशख़बरी दी, और कहा कि वह बड़े ज्ञानवाला होगा, (28)
इस पर उनकी बीवी [सारा] चिल्लाती हुई वहाँ आयीं, और वह (चकित हुईं व झेंपते हुए) अपने मुँह पर हाथ मारते हुए कहने लगीं, "एक बूढ़ी बाँझ औरत (बच्चा जनेगी!)!" (29)
मेहमानों ने कहा, "ऐसा ही होगा, तेरे रब ने यही कहा है, और वह गहरी समझ-बूझ रखनेवाला [Wise], सब कुछ जाननेवाला है।" (30)
इबराहीम ने कहा, "ऐ (अल्लाह के भेजे हुए) फ़रिश्तो, आप लोगों के यहाँ (धरती पर) आने का क्या मक़सद है?" (31)
उन्होंने कहा, "हमें ऐसे लोगों [लूत की क़ौम] के पास भेजा गया है जो गुनाहों में डूबे हुए हैं; (32)
"ताकि हम उनके ऊपर पकी हुई मिट्टी के पत्थर (कंकड़) बरसाएँ, (33)
जिनपर (गुनाहों की) सीमा पार कर जानेवालों के लिए आपके रब की तरफ से ख़ास निशान भी लगा होगा।" (34)
फिर ऐसा हुआ कि उस बस्ती में जो ईमानवाले थे, उन्हें हमने वहाँ से बाहर निकाल लिया; (35)
किन्तु हमने वहाँ केवल एक ही घर ऐसा पाया जिसमें रहनेवाले अल्लाह पर पूरी भक्ति से झुकनेवाले थे ---- (36)
इस तरह, हमने वहाँ (हमेशा के लिए) एक निशानी छोड़ दी, उन लोगों के लिए जो दर्दनाक यातना से डरते हों। (37)
मूसा [Moses] (की घटना) में भी ऐसी ही निशानियाँ हैं : हमने उन्हें फ़िरऔन [Pharaoh] के पास स्पष्ट प्रमाण [Clear Authority] के साथ भेजा था, (38)
किन्तु उस [फ़िरऔन] ने अपने सहायकों समेत सच्चाई से मुँह फेर लिया और (अपनी ताक़त के घमंड में) कहने लगा, (यह मूसा) "जादूगर है या कोई दीवाना," (39)
अतः हमने उसे और उसकी सेना को धर-दबोचा और उन्हें समंदर में फेंक दिया : दोष भी उसी का था। (40)
और आद (की क़ौम की तबाही) में भी तुम्हारे लिए निशानी है जबकि हमने उनपर ज़िंदगी तबाह करनेवाली आँधी भेजी, (41)
वह हवा जिस चीज़ के सामने से गुज़री, उसे उसने चूर-चूर कर के भूंसा बना डाला। (42)
और समूद (की क़ौम की तबाही) में भी (तुम्हारे लिए ऐसी ही निशानी है) : जबकि उनसे कहा गया था, "थोड़े समय तक मज़े कर लो!" [न सुधरे, तो तबाही आएगी] (43)
मगर उन्होंने अपने रब के आदेश की अवहेलना की; फिर एक धमाकेदार कड़क ने उन्हें आ दबोचा और वे देखते ही रह गए : (44)
हाल यह हुआ कि अपना बचाव करना तो दूर, वे तो खड़े तक न रह पाए। (45)
और इससे भी पहले, नूह [Noah] की क़ौम को भी हमने अपनी पकड़ में ले कर तबाह किया था. वे सचमुच बड़े गुनाहगार लोग थे! (46)
हमने अपनी ताक़त से आसमानों को बनाया है और उसे बहुत विस्तार से फैलाया है, (47)
और धरती को हमने (रहने के लिए) बिछा दिया --- तो क्या ही अच्छे ढंग से हमने इसे सँवारा और बिछाया है! (48)
और हमने हर चीज़ के जोड़े बनाए, ताकि तुम [लोग] ध्यान दो और समझो। (49)
[अतः ऐ रसूल, आप उन लोगों से कह दें कि], “अल्लाह के आगे (गुनाहों की माफ़ी के लिए) जल्दी से झुक जाओ---- (यक़ीन करो), मैं उसकी तरफ़ से तुम्हें साफ़ साफ़ चेतावनी देने के लिए भेजा गया हूँ --- (50)
और किसी भी दूसरे भगवान को अल्लाह के साथ बराबरी का न ठहराओ। मैं उसकी तरफ़ से तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देने के लिए भेजा गया हूँ!” (51)
इसी तरह, उनसे पहले गुज़र चुके लोगों के पास भी जब कभी कोई रसूल आया, तो उन्होंने भी (रसूलों को) "जादूगर या दीवाना कहा!" (52)
क्या उन्होंने एक-दूसरे को ऐसा कहने के लिए पहले से तय कर रखा था? नहीं! बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने सारी हदें पार कर दी हैं, (53)
अतः [ऐ रसूल] उनकी तरफ़ ध्यान न दें --- अब आपका कोई दोष नहीं, (54)
और आप (लोगों को) बराबर नसीहतें देते रहें, क्योंकि याद दिलाते रहना ईमानवालों के लिए अच्छा होता है। (55)
मैंने तो जिन्नों और इंसानों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी ही बन्दगी [worship] करें : (56)
मैं उनसे किसी तरह की रोज़ी (कमाई) तो नहीं चाहता, और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे (खाना) खिलाएँ --- (57)
अल्लाह तो ख़ुद ही है रोज़ी देनेवाला, बेहद ताक़तवाला, सबसे मज़बूत! (58)
जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है, और (उन जैसे) उनके साथी जो पहले गुज़र चुके हैं, उनके लिए तो यातनाओं का हिस्सा तय किया हुआ है ---- वे मुझसे जल्दी (यातनाओं) की माँग न करें --- (59)
सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए उस दिन के कारण बड़ी खराबी होगी, जिसका उनसे वादा किया जा रह है। (60)
सूरह 88 : अल ग़ाशियह
[छा जानेवाली घटना / The Overwhelming Event]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क्या [ऐ रसूल!] आपको (हर चीज पर) छा जाने वाली घटना [क़यामत] की खबर पहुंची है? (1)
उस दिन कितने ही चेहरे अपमानित और उतरे हुए होंगे, (2)
(सांसारिक फ़ायदे के लिए) मुसीबत झेलते हुए, थकान से चूर! (3)
वे (जहन्नम की) दहकती हुई आग में जा गिरेंगे (4)
और उन्हें खौलते हुए सोते [spring] से (पानी) पिलाया जाएगा, (5)
उनके लिए काँटेदार सूखी ज़हरीली झाड़ियों के अलावा कुछ खाना नहीं होगा (6)
जो न बदन को मोटा [nourish] करेगा और न भूख ही मिटायेगा। (7)
(इसके विपरीत) उस दिन बहुत से चेहरे ऐसे भी होंगे जो ख़ुशी से चमकते और खिले-खिले होंगे, (8)
(दुनिया में अच्छे काम के लिए) अपनी की हुई मेहनत के नतीजे में बहुत खुश होंगे, (9)
आलीशान जन्नत में (ठहरे) होंगे, (10)
जहाँ कोई बेकार और व्यर्थ बात न सुनेंगे, (11)
बहते हुए पानी के सोतों [spring] के बीच, (12)
ऊँचे (बिछे हुए) तख्त होंगे, (13)
प्याले (सजा के) सामने रखे हुए होंगे,(14)
और गाओ तकिये लाइन से लगे होंगे, (15)
और (मुलायम व नफीस [refined]) कालीनें बिछी होंगी। (16)
क्या विश्वास न करनेवाले देखते नहीं कि ऊँट किस तरह (अजीब ढाँचे का) पैदा किया गया है? (या क्या ये लोग बारिश से भरे हुए बादलों को नहीं देखते कि वे कैसे तैयार होते हैं), (17)
आसमान को कैसे (ज़बरदस्त विस्तार के साथ) उठाया गया है, (18)
पहाड़ों को कैसे (ज़मीन से उभार कर) खड़ा किया गया है, (19)
पृथ्वी कैसे (गोलाई के बावजूद) बिछाई गई है? (20)
इसलिए (ऐ रसूल!) आप उन्हें चेतावनी दे दें : आपका तो काम ही नसीहत करना है, (21)
आपका काम उनलोगों पर नियंत्रण [control] रखना नहीं है (कि लोगों को ईमान लाने पर मजबूर करें)। (22)
रहे वे लोग जिन्होंने (सच्चाई से) मुँह मोड़ा और विश्वास करने से इंकार किया, (23)
तो अल्लाह उनपर ज़बरदस्त यातना थोप देगा। (24)
हमारे ही पास उन सबको लौट कर आना है, (25)
और फिर (उनके कर्मों का) हिसाब लेने की जिम्मेदारी हमारी है। (26)
सूरह 18 : अल-कहफ़ [गुफ़ा/ The Cave]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं जिसने अपने बन्दे पर यह किताब [क़ुरआन] उतार भेजी, और उसे बिना किसी टेढ़ेपन के (सीधी) बनाया, (1)
(उस किताब को) ठीक व सीधी बनाया, जो लोगों को उस (अल्लाह) की ओर से कठोर सज़ा की चेतावनी देनेवाली है, और विश्वास करनेवालों को उनके अच्छे कर्मों के लिए ख़ुशख़बरी सुनानेवाली है---कि (उनके लिए) क्या ही अच्छा इनाम होगा, (2)
जिसका मज़ा वे हमेशा वहाँ उठाएंगे। (3)
यह उन लोगों को चेतावनी देती है, जो यह कहते हैं कि, "अल्लाह की कोई औलाद है।" (4)
इसके बारे में उन्हें न तो कोई जानकारी है, न ही उनके बाप-दादा को थी--- यह बड़ी गम्भीर बात है जो उनके मुँह से निकलती है : जो कुछ वे कहते हैं वह सिवाए झूठ के कुछ नहीं है। (5)
मगर [ऐ रसूल], अगर वे (अल्लाह के) इस संदेश में विश्वास नहीं करते हैं, तो क्या उसकी चिंता में आप अपनी जान ही दे देंगे? (6)
हम ने धरती को बड़ी आकर्षक चीज़ों से सजाया है, ताकि हम, लोगों की परीक्षा लें और जान सकें कि उनमें से किन लोगों ने बेहतरीन कर्म किए, (7)
मगर हम (धरती की) इन सारी चीज़ों को (समाप्त कर के) एक दिन चटियल मैदान बना डालेंगे। (8)
[ऐ रसूल!] क्या हमारी अन्य निशानियों में से आपको गुफा और रक़ीम (नामक शहर के) लोगों (की घटना) ज़्यादा ही अजूबा लगी? (9)
(जब ऐसा हुआ था कि) उन नौजवान लड़कों ने गुफ़ा में शरण लेनी चाही थी और कहा था, "ऐ हमारे रब! हम पर रहम कर और इस हालत में हमारे लिए भलाई का कोई रास्ता निकाल दे।" (10)
फिर हमने उन्हें कई वर्षो के लिए गुफा में (इस तरह सुला दिया कि) उनके कान (दुनिया की आवाज़ सुनने से) बंद कर दिए गए, (11)
फिर हमने उन्हें जगा दिया, ताकि मालूम कर सकें कि (लड़कों के) उन दो समूहों में से कौन सा समूह है जो अपने वहाँ रहने की अवधि के बारे में ज़्यादा सही गिनती बता सकता है। (12)
[ऐ रसूल] असल में जो घटना हुई थी हम उसकी सही सही कहानी आपको सुना देते हैं : वे कुछ नौजवान थे जो अपने रब में विश्वास रखते थे, और हमने उनका ज़्यादा से ज़्यादा मार्गदर्शन किया था। (13)
हमने उनके दिलों को (ईमान की ताक़त से) मज़बूत कर दिया था, सो (एक दिन) वे उठ खड़े हुए और कहा, "हमारा रब तो वह है जो आसमानों और ज़मीन का रब है। हम उसे छोड़ कर कभी भी किसी दूसरे प्रभु को नहीं पुकारेंगे, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो यह बिल्कुल बेकार व सच्चाई से हटी हुई बात होगी। (14)
ये हमारी क़ौम के लोग हैं जिन्होंने उस (अल्लाह) को छोड़ कर अन्य (देवताओं को) अपना प्रभु बना रखा है। (अगर ये सही हैं तो) आख़िर ये उनके बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण क्यों नहीं लाते? उस आदमी से बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़े? (15)
(साथियो), अब जबकि तुम इन लोगों से अलग हो चुके हो, और उनसे भी जिनको ये अल्लाह के बजाए पूजते हैं, तो अब चल कर (किसी) गुफ़ा में शरण ली जाए। अल्लाह तुम पर ज़रूर अपनी रहमत की बारिश करेगा और तुम्हारे काम में आसानी के साधन जुटा देगा।" (16)
अगर आप उस (गुफ़ा) को देखते जिसके भीतर एक बड़ी सी जगह में वे सोए हुए थे, तो वह ऐसी थी कि जब सूरज निकलता था तो उसकी किरणें गुफ़ा के दाहिनी तरफ़ से बचकर निकल जाती थीं और जब वह डूबने लगता तो उसकी किरणें गुफ़ा के बायीं ओर से निकल जाती थीं। यह अल्लाह की निशानियों में से है : जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, वही सही मार्ग पानेवाला है और जिसे वह भटकता छोड़ दे, तो कोई बचानेवाला ऐसा नहीं जो उसे सीधे मार्ग पर ले आए। (17)
आप (उन्हें देखकर) यही समझते कि वे जागे हुए हैं, हालाँकि वे सोए हुए थे। हम उन्हें दाएँ और बाएँ करवट दिलाते रहते थे, और उनका कुत्ता चौखट पर अपने (आगे के) दोनों पाँव फैलाए हुए (बैठा) था। अगर आप उन्हें कहीं देख लेते, तो आप में उनका डर समा जाता और वहाँ से उलटे पाँव भाग खड़े होते। (18)
फिर जब समय (पूरा) हो गया तो हमने उन्हें (नींद से) उठा दिया, और वे आपस में पूछताछ करने लगे। उनमें से एक ने पूछा, "तुम कितनी देर यहाँ रहे होगे?" (किसी ने) जवाब दिया, "यही कोई एक दिन या एक दिन का कोई भाग होंगे", मगर फिर (कुछ और लोगों) ने कहा, "तुम्हारा रब ही सही जानता है कि तुम यहाँ असल में कितनी अवधि तक रहे। तुम में से कोई एक चाँदी के सिक्के के साथ शहर चला जाए, और वहाँ पता लगाए कि सबसे अच्छा खाना कहाँ मिलता है, फिर उसमें से कुछ खाने को ले आए। मगर होशियार रहना कि कहीं किसी को तुम्हारे बारे में ख़बर न होने पाए : (19)
अगर उन्हें तुम्हारे बारे में पता चल गया तो वे तुम्हें पत्थरों से मार डालेंगे या तुम्हें अपने धर्म में लौट आने पर मजबूर करेंगे, और तब तो तुम कभी भी कामयाब न हो पाओगे।" (20)
इस तरह हम उन (गुफ़ावालों) की घटना पर (शहर के) लोगों का ध्यान खींच पाए, ताकि वे जान सकें कि (मरने के बाद दोबारा उठाए जाने का) अल्लाह का वादा सच्चा है, और यह कि क़यामत की घड़ी के आने में कोई सन्देह नहीं है, (हालाँकि) लोग इसके बारे में आपस में बहस करते रहते हैं।
फिर (कुछ लोगों ने) कहा, "इस गुफ़ा के ऊपर एक भवन बना दो : उनके बारे में उनका रब ही बेहतर जानता है।" उनमें से असरदार लोगों ने कहा, "हम अवश्य इसके ऊपर (यादगार के तौर पर) एक इबादत करने की जगह बनाएँगे।" (21)
(कुछ लोग) कहते हैं, "वे [गुफ़ावाले] तीन थे और चौथा उनका कुत्ता था", कुछ दूसरे कहते हैं, "वे पाँच थे और छठा उनका कुत्ता था" ----- वे अँधेरे में तीर चलाते हैं---- और कुछ यह भी कहते हैं, "वे सात थे और आठवाँ उनका कुत्ता था।" [ऐ रसूल] आप कह दें, "मेरा रब ही बेहतर जानता है कि असल में वे कितने थे।" बहुत ही कम लोग हैं जिनको उन (गुफ़ावालों) की सही जानकारी है, अत: इस पर बहस न करें, मगर जो बात स्पष्ट है उस पर जमे रहें, और उनके बारे में इन लोगों में किसी से भी कुछ न पूछें; (22)
और ऐसी बात कभी न कहें कि, "मैं कल इसे कर दूँगा", (23)
बल्कि (यह जोड़ दें) कि “अल्लाह ने चाहा तो” (कर दूँगा), और, जब कभी आप भूल जाएं, तो अपने रब को याद कर लें और कहें, " आशा है कि मेरा रब सही चीज़ की तरफ़ ही मेरा मार्गदर्शन कर दे।" (24)
(कुछ लोग कहते हैं), “गुफ़ा में सोनेवाले वहाँ तीन सौ साल तक रहे थे”, कुछ इसमें नौ वर्ष और जोड़ देते हैं। (25)
[ऐ रसूल] कह दें, "अल्लाह ही बेहतर जानता है कि असल में वे (गुफ़ा में) कितने दिन रहे।" आसमानों और ज़मीन की हर ढकी छिपी चीज़ उसकी जानकारी में है---- क्या ख़ूब वह देखनेवाला है! क्या ही अच्छा वह सुननेवाला है!---- उस (अल्लाह) के सिवा उन्हें बचानेवाला कोई नहीं है; और वह अपनी हुकूमत (या अपने फ़ैसले) में किसी को हिस्सेदार नहीं बनाता है। (26)
[ऐ रसूल] अपने रब की क़िताब से जो कुछ ‘वही’ [revelation] के द्वारा आप पर उतारा गया है, उसे पढ़ कर सुनाएं : उसके शब्दों को कोई बदल नहीं सकता, और न ही उसके सिवा आपको कोई शरण लेने की जगह मिल सकती है। (27)
आप धीरज मन से उन लोगों के साथ जमे रहें जो सुबह शाम अपने रब की इबादत में इस इच्छा से लगे रहते हैं कि वह ख़ुश होकर क़बूल कर ले, और देखें, ऐसा न हो कि सांसारिक जीवन की चमक-दमक को पाने के मोह में आप अपने ही लोगों से नज़रें फेर लें : कहीं दबाव में आकर ऐसे लोगों की बात न मान लें जिनके दिलों को हमने ऐसा कर दिया है कि वह मेरे संदेशों को भुला बैठे हैं, और वे बस अपनी नीच इच्छाओं के पीछे चले जा रहे हैं, और वे अपने मामलों में बेलगाम हैं। (28)
कह दें, "तुम्हारे रब की ओर से अब सच्चाई आ चुकी है : तो जो लोग इसमें विश्वास करना चाहें, वे विश्वास कर लें और जो लोग इसे मानने से इंकार करना चाहें, वे इंकार कर दें।" हमने ग़लत काम करनेवालों के लिए एक आग तैयार कर रखी है, जो उनको चारों तरफ़ से घेर लेगी। अगर वे (अपनी हालत में) थोड़ी सी राहत के लिए फ़रियाद करेंगे तो उन्हें राहत के तौर पर ऐसा पानी मिलेगा जो किसी पिघले हुए धातु जैसा होगा, जो उनके चेहरों को भून डालेगा। कितनी बुरी है वह पीने की चीज़! कैसी दर्दनाक है वह आराम करने की जगह! (29)
रहे वे लोग जो ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं---- तो जिस किसी ने भी अच्छा कर्म किया, उसके कर्मों के इनाम [reward] को हम कभी बेकार नहीं जाने देते---(30)
उनके लिए परम आनंद के सदाबहार बाग़ होंगे जहाँ नहरें बह रही होंगी। वहाँ उन्हें सोने के कंगनों से सजाया जाएगा। वहाँ वे हरे रंग के महीन रेशम और ज़री के कपड़े पहनेंगे और ऊँचे (गद्देदार) तख़्तों पर तकिया लगाए बैठे होंगे। क्या ही अच्छा इनाम है! कितनी हसीन जगह है आराम करने की! (31)
[ऐ रसूल] आप उनको दो आदमियों की मिसाल बता दें : उनमें से एक को हमने अंगूरों के दो बाग़ दे रखे थे, जो चारों तरफ़ से खजूरों के पेड़ों से घिरे हुए थे और उन दोनों बाग़ों के बीच अनाज के खेत लगे हुए थे; (32)
दोनों बाग़ में ख़ूब फल हुए और पैदावार में किसी तरह की भी कमी न हुई; और उन दोनों के बीच हमने (सिंचाई के लिए) एक नहर भी बहा दी थी, (33)
इस तरह, उसे भरपूर फल हासिल हुए. एक दिन वह अपने दोस्त से बातचीत करते हुए कहने लगा, "मैं तुझसे माल व दौलत में बढ़कर हूँ और मेरे पीछे चलनेवाले (लोग) भी कहीं ज़्यादा हैं।" (34)
(फिर बातें करते हुए) वह अपने बाग़ में गया, और यह कह कर अपने आपको नुक़सान में डाल बैठा कि, "मुझे नहीं लगता कि ऐसा हरा भरा बाग़ कभी बर्बाद भी हो सकता है। (35)
और यह कि मैं नहीं समझता कि वह (क़यामत की) घड़ी कभी आएगी--- और अगर मुझे कभी अपने रब के पास वापस ले भी जाया गया, तो मुझे यक़ीन है कि मुझे वहाँ इससे भी बेहतर चीज़ मिलेगी।" (36)
उसके साथी ने उससे बातचीत करते हुए जवाब में कहा, "क्या तू उस (रब) में विश्वास नहीं रखता, जिसने तुझे (पहली बार) मिट्टी से बनाया, फिर वीर्य [sperm] की बूँद से पैदा किया, उसके बाद तुझे एक पूरा आदमी बना दिया? (37)
मगर मेरे लिए तो, मेरा रब वही (अल्लाह) है, और मैं कभी भी किसी को अपने रब के साथ साझेदार [Partner] नहीं बनाउंगा। (38)
जब तू अपने बाग़ में दाख़िल हो रहा था, काश कि तूने ऐसा कहा होता, “जो भी होता है सब अल्लाह की मर्ज़ी से होता है, और उसकी मदद के बिना किसी में कोई ताक़त नहीं।” हालाँकि तू देखता है कि मैं धन-दौलत और औलाद में तुझसे कम हूँ, (39)
मगर मेरा रब चाहे, तो मुझे कोई ऐसी चीज़ दे सकता है जो तेरे बाग़ से अच्छी हो, और तेरे इस बाग़ पर आसमान से कोई बिजली गिरा सकता है जिससे वह बंजर ज़मीन का ढेर बन कर रह जाए; (40)
या उस बाग़ का पानी धरती की सतह से इतना नीचे चला जाए कि फिर तू किसी तरह भी उस तक न पहुँच सके।" (41)
और ऐसा ही हुआ : उसके फल पूरी तरह से बर्बाद हो गए, उसने बाग़ पर जो कुछ ख़र्च किया था उसपर वह दुखी मन से बस हाथ मलता रह गया, जबकि बाग़ अपनी टट्टियों पर गिरा पड़ा था, वह कहने लगा, "ऐ काश! मैंने अपने रब के साथ किसी को साझेदार [Partner] न बनाया होता!" (42)
अल्लाह को छोड़ कर अब उसके पास (गढ़े हुए ख़ुदाओं की) कोई ताक़त ऐसी न थी जो उसकी कोई मदद कर सकती--- वह तो ख़ुद अपनी भी कोई मदद नहीं कर सका। (43)
ऐसी हालत में, शरण लेने की केवल एक ही जगह है और वह है अल्लाह की शरण, वही असली ख़ुदा है (जिसके पास हर चीज़ की ताक़त है) : वही सबसे अच्छा बदला [reward] देता है और वही सबसे अच्छा अंजाम दिखाता है। (44)
[ऐ रसूल] उनलोगों को इस दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल भी बता दें कि यह ऐसी है जैसे : हम ने आसमान से पानी बरसाया, धरती के पेड़ पौधों ने उसे अपने अंदर सोख लिया और हरे भरे हो गए, फिर कुछ समय बाद ऐसा होता है कि पेड़ पौधे सूखी घांस व भूंसों में बदल जाते हैं जिसे हवाएँ उड़ा ले जाती हैं: अल्लाह को हर चीज़ करने की पूरी पूरी ताक़त है। (45)
धन दौलत और बच्चे तो केवल इसी सांसारिक जीवन के आकर्षण हैं, मगर असल में, बाक़ी रहनेवाले तो अच्छे कर्म हैं, जिसके लिए अल्लाह के यहाँ बेहतर बदला मिलेगा और यही (अच्छे नतीजे की) उम्मीद लगाए रहने का कारण भी होगा। (46)
एक दिन आएगा जब हम पहाड़ों को चला देंगे, और तुम धरती को खुले हुए चटियल मैदान की तरह देखोगे। हम सभी लोगों को एक साथ इकट्ठा करेंगे, कोई भी पीछे छूट नहीं पाएगा। (47)
वे तुम्हारे रब के सामने लाइनों में खड़े किए जाएँगे: "जैसा हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था, उसी तरह आज तुम्हें हमारे सामने आना पड़ा, हालाँकि तुम तो यह दावा करते थे कि तुम से दोबारा मिलने का कोई समय हम ने तय नहीं कर रखा है।" (48)
और (उस वक़्त) उनके कर्मों की बही [record of deeds] जब खोल कर सामने रख दी जाएगी, तो अपराधियों को देखोगे कि उसमें लिखी हुई (बातों को) देखकर घबरा जाएंगे, और कहेंगे, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! यह (कर्मों की) कैसी किताब है! छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा, कोई भी कर्म ऐसा नहीं जिसे इस किताब में लिखा न गया हो।" वह सब अच्छे–बुरे कर्म जो उन्होंने कभी भी किए होंगे, सब सामने मौजूद पाएँगे : तुम्हारा रब किसी के साथ भी नाइंसाफ़ी नहीं करेगा। (49)
और जब (ऐसा हुआ था कि) हमने फ़रिश्तों से कहा था, "आदम के सामने झुक जाओ", तो सब (फरिश्ते सज्दे में) झुक गए, मगर इबलीस नहीं झुका : वह जिन्नों में से था और उसने अपने रब के आदेश को मानने से इंकार कर दिया था। तो क्या तुम (लोग) मुझे छोड़कर उस [इबलीस] को और उसकी संतानों को अपना स्वामी बनाना चाहते हो, बावजूद इसके कि वे तुम्हारे दुश्मन हैं? शैतानियाँ करनेवालों के पास कितना बुरा विकल्प है! (50)
मैंने आसमानों और ज़मीन को बनाते समय इन [शैतानों] को नहीं बुलाया था कि वे उस (प्रक्रिया) को देख पाते, और न वे ख़ुद अपनी सृष्टि के समय वहाँ हाज़िर थे; मैं ऐसे लोगों को अपना मददगार नहीं बनाता जो दूसरों को राह से भटका देते हैं। (51)
एक दिन आएगा जब अल्लाह कहेगा, "बुलाओ उन सबको जिनके बारे में तुम दावा करते थे कि वे (ख़ुदायी में) मेरे साझेदार [Partners] हैं”, वे उनको पुकारेंगे, मगर उनसे कोई जवाब नहीं मिलेगा; हम उनके बीच एक भयानक खाई बना देंगे। (52)
शैतानियाँ करनेवाले लोग उस भड़कती आग को देखेंगे और समझ जाएंगे कि वे उसमें गिरने ही वाले हैं : वे वहाँ से बच निकलने का कोई रास्ता न पाएँगे। (53)
हमने लोगों के फ़ायदे के लिए इस क़ुरआन में हर तरह के विषयों को मिसाल के साथ बार-बार बयान किया है, मगर आदमी बड़ा ही झगड़ालू होता है! (54)
अब जबकि उनके पास मार्गदर्शन आ चुका है, तो उस पर विश्वास करने से और अपने रब से (अपने कर्मों की) माफ़ी माँगने से उन्हें किस चीज़ ने रोक रखा है? क्या वे इस इंतज़ार में हैं कि उनका अंजाम भी वैसा ही विनाशकारी हो जैसा कि उनके पीछे गुज़र चुकी पीढ़ियों का हुआ था, या ये कि उनकी यातना उनके बिल्कुल सामने आ खड़ी हो? (55)
रसूलों [Messengers] को हम केवल इसलिए भेजते हैं कि वे (ईमान व अच्छे कर्म के लिए) ख़ुशख़बरी सुना दें और (बुरे कर्म करनेवालों को) चेतावनी दे दें, मगर इसके बावजूद (सच्चाई से) इंकार पर अड़े लोग अपनी झूठी दलीलों से सच्चाई को ग़लत साबित करना चाहते हैं, और मेरे संदेशों [आयतों] और मेरी चेतावनियों का मज़ाक़ उड़ाते हैं। (56)
उस आदमी से बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है जिसे उसके रब के संदेशों द्वारा जब याद दिलाया जाता है, तो वह उनसे मुँह फेर लेता है, और इस बात को भूल जाता है कि कितने बुरे कर्म वह पहले कर चुका है? (उनके कुकर्मों के चलते) हमने उनके दिलों पर ग़िलाफ़ [cover] चढ़ा दिए हैं, सो वे इस (क़ुरआन) को समझ नहीं सकते, और उनके कानों में (बहरेपन का) बोझ डाल दिया है सो वे सुन नहीं सकते : हालाँकि [ऐ रसूल] आप उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाते हैं, मगर वे कभी मार्ग पानेवाले नहीं! (57)
[ऐ रसूल] आपका रब बेहद माफ़ करनेवाला, बड़ा ही रहम करनेवाला है : जो गुनाह उन लोगों ने किए हैं, अगर वह [अल्लह] इसके लिए उन्हें पकड़ना चाहता, तो जल्दी ही उन पर यातना ले आता। मगर उनके लिए एक तय किया हुआ समय निश्चित है, और उससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होगा, (58)
(ठीक वैसे ही) जैसे हम ने पुरानी क़ौमों को उनके गुनाह की वजह से बर्बाद कर दिया : हम ने उनके विनाश का समय भी निश्चित कर रखा था। (59)
(उस समय की घटना सुनिए कि) जब मूसा ने अपने (जवान) सेवक से कहा था, "मैं अपनी यात्रा तब तक नहीं रोकूँगा, जब तक कि मैं उस जगह न पहुँच जाऊँ जहाँ दो समंदर आपस में मिलते हैं, चाहे मुझे वहाँ पहुँचने में बरसों लग जाए!” (60)
मगर जब वे दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ दो समंदर मिलते थे, तो उस मछ्ली का उन्हें ध्यान न रहा (जो उन्होंने रख ली थी), और वह (मछली) समंदर में सुरंग जैसा रास्ता बनाती हुई भाग निकली। (61)
जब वे आगे बढ़े तो (एक जगह) मूसा ने अपने सेवक से कहा, "लाओ! खाना खा लें! हमारी यह यात्रा बड़ी थका देनेवाली है", (62)
और उस (सेवक) ने कहा, "याद है आपको, जब हम (समंदर के किनारे) उस चट्टान के पास आराम कर रहे थे? मैं तो आपको मछली के बारे में बताना ही भूल गया--- उसने अजीब तरीक़े से समंदर में अपना रास्ता बना लिया था--- और यह शैतान ही काम है कि मैं इसके बारे में आपको बताना भूल गया।" (63)
(मूसा ने) कहा, "कितनी अजीब बात है! तब तो हो न हो, यह वही जगह थी जिसे हम तलाश कर रहे थे।" अत: दोनों अपने क़दमों के निशान देखते हुए वापस (उसी जगह को) चल दिए, (64)
(जब उस चट्टान के पास पहुँचे तो) वहाँ उनको हमारे ख़ास बंदों में से एक बंदा [ख़िज़्र अलै.] मिला ---- एक ऐसा आदमी जिस पर हम ने अपनी विशेष दया की थी और उसे अपने पास से एक विशेष ज्ञान दिया था। (65)
मूसा ने उनसे कहा, "क्या मैं आपके साथ रह सकता हूँ ताकि आपको जो कुछ ज्ञान दिया गया है, उसमें से सही मार्गदर्शन की कुछ बातें मैं भी सीख सकूँ?" (66)
उस आदमी ने कहा, "हाँ, मगर तुम मेरे साथ रह कर धीरज नहीं रख पाओगे, (67)
जो चीज़ तुम्हारी जानकारी की सीमा से बाहर हो, उस पर तुम धीरज रख भी कैसे सकते हो?" (68)
(मूसा ने) कहा, "अगर अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे सब्र करने वाला पाएँगे। मैं आपके किसी भी आदेश को नहीं तोड़ूंगा।" (69)
उन्होंने कहा, "अच्छा, अगर तुम मेरे साथ चलोगे तो मैं चाहे कुछ भी करूं, तुम मुझसे कोई भी सवाल मत पूछना, जब तक कि मैं ख़ुद ही तुम्हें वह बात बता न दूं।" (70)
इस तरह, वे दोनों चल पड़े, फिर जब वे नौका में सवार हुए तो उस आदमी ने नौका में एक जगह छेद कर दिया, (यह देखते ही) मूसा ने कहा, "आप ऐसा कैसे कर सकते हैं कि (आप ने) इस नौका में छेद कर दिया? क्या आप इसमें बैठे हुए मुसाफिरो़ को डुबा देना चाहते हैं? आपने तो एक ख़तरनाक हरकत कर डाली!" (71)
उन्होंने कहा, "क्या मैंने कहा नहीं था कि तुम मेरे साथ धीरज न रख सकोगे?" (72)
मूसा ने कहा, "आप मुझे माफ़ कर दें, यह बात तो मैं भूल ही गया था। कृपया इस मामले को मेरे लिए इतना कठिन न बनाएं कि आपके साथ रहना मुश्किल हो जाए।" (73)
और इस तरह वे दोनों फिर चल पड़े। फिर जब (एक बस्ती के पास पहुँचे तो) ऐसा हुआ कि उन्हें एक नौजवान लड़का मिला, तो उस आदमी ने उसे मार डाला, मूसा ने कहा, "आप एक बेगुनाह आदमी का क़त्ल कैसे कर सकते हैं? उसने तो किसी की हत्या नहीं की थी!, यह तो आपने बहुत ही बुरा किया!" (74)
उन्होंने जवाब दिया, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि तुम धीरज रखते हुए कभी भी मुझे सहन नहीं कर पाओगे?" (75)
मूसा ने कहा, "अब इसके बाद, अगर मैं आपसे कुछ भी पूछूं, तो आप मुझे साथ न रखें--- पहले ही आप मुझे काफ़ी हद तक बर्दाश्त कर चुके हैं।" (76)
फिर से वे दोनों आगे चल दिए। उसके बाद, जब वे एक बस्ती के पास पहुँचे, तो वहां के निवासियों से खाना माँगा, किन्तु उन लोगों ने खाना खिलाने से इंकार कर दिया, इसी बीच वहाँ उन्हें एक (पुरानी) दीवार दिखाई दी जो बस गिरने ही वाली थी, तो उस आदमी ने उस (दीवार) की मरम्मत कर के उसे मज़बूत कर दिया। (मूसा ने) कहा, "लेकिन अगर आप चाहते तो इस काम के लिए कुछ मज़दूरी ले सकते थे।" (77)
उसने कहा, "अब मेरे और तुम्हारे अलग होने का समय आ गया है। अब मैं तुमको उन चीजों के मतलब बता देता हूँ, जिन पर तुम धीरज न धर सके" : (78)
वह जो नौका थी, कुछ ग़रीब लोगों की थी जिनकी रोज़ी-रोटी समंदर से ही होती थी और मैंने उनकी नौका इसलिए ख़राब कर दी क्योंकि मुझे मालूम था कि वे जिधर बढ रहे थे वहाँ एक राजा था जो हर एक (अच्छी) नौका को ज़बरदस्ती छीन लेता था। (79)
और रहा वह जवान लड़का, तो उसके माँ-बाप तो ईमानवाले थे, मगर यह आशंका थी कि वह अपनी शैतानी और ईमान न रखने के चलते उन्हें तकलीफ़ पहुँचाएगा, (80)
इसलिए मैं ने चाहा कि उनका रब उन्हें इसके बदले दूसरी संतान दे---जिसका दिल अधिक साफ़ हो और जिसमें ज़्यादा दया का भाव हो। (81)
और रही वह दीवार, तो वह उस बस्ती में रहने वाले दो अनाथ लड़कों की थी और उस दीवार के नीचे उनका ख़जाना गड़ा हुआ था, (दीवार गिरने से भेद खुल जाता, सो दीवार खड़ी कर दी)। उनका बाप एक सच्चा व अच्छा आदमी था, इसलिए तुम्हारे रब ने चाहा कि जब वे अपनी जवानी को पहुँच जाएं, तो अपने रब की दया से अपना ख़जाना सुरक्षित निकाल लें। असल में, मैंने अपनी मर्ज़ी से ये सब नहीं किया : यह है वास्तविकता उन चीजों की, जिन पर तुम धीरज न रख सके।" (82)
(ऐ रसूल) वे आप से ज़ुलक़रनैन (दो सींगों वाले) के बारे में पूछते हैं। कह दें, "मैं उसके बारे में तुम्हें कुछ बताता हूँ।" (83)
हमने धरती पर उसकी सत्ता स्थापित की थी, और उसे हर चीज़ हासिल करने के लिए संसाधन दिए थे। (84)
उसने एक बार (पश्चिम के) रास्ते पर अपना अभियान शुरू किया; (85)
फिर जब वह सूरज डूबने की जगह के पास पहुँचा, तो उसे ऐसा लगा मानो सूरज दलदल जैसे काले पानी की एक झील में डूब रहा हो। नज़दीक ही उसे कुछ लोग दिखाई दिए, और हमने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! तुझे अधिकार है कि चाहे तो उन्हें दंड दे या उनके साथ अच्छा व्यवहार कर।" (86)
उसने जवाब दिया, " जिन लोगों ने शैतानियां की हैं, हम उन्हें दंड देंगे, और फिर जब वह अपने रब के पास लौट कर जाएंगे तो वह उन्हें और भी कठोर यातना देगा, (87)
जबकि जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, तो उनके लिए तो बेहतरीन बदला होगा: हम उन्हें ऐसे ही काम का आदेश करेंगे जो उनके लिए आसान होगा।" (88)
वह उसके बाद एक और यात्रा पर (पूरब की तरफ़) निकला; (89)
फिर जब वह सूरज निकलने की जगह पर पहुँचा, तो उसने सूरज को ऐसे लोगों पर निकलते हुए पाया जिनके लिए हमने सूरज की गर्मी से बचने के लिए कोई छाया नहीं रखी थी। (90)
और वहां की हालत ऐसी ही थी : हमें उसकी पूरी जानकारी थी। (91)
बाद में, वह एक और सफ़र पर निकल पड़ा; (92)
जब वह दो पर्वतों के बीच (mountain barrier) पहुँचा, तो उसे उनके बीच ऐसी क़ौम के लोग मिले, जो लगता था कि कोई बात नहीं समझते। (93)
उन्होंने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! याजूज और माजूज (Gog and Magog) इस भूभाग में उत्पात मचाते रहते हैं। क्या तुम उनके और हमारे बीच एक रोक बना दोगे, अगर हम तुम्हें इस काम के लिए उचित मुआवज़ा दें?” (94)
उसने जवाब दिया, "मेरे रब ने मुझे जो कुछ अधिकार एवं शक्ति दी है वह किसी मुआवज़े से कहीं बेहतर है, लेकिन अगर तुम लोग मेरे काम में हाथ बटाओ, तो मैं तुम्हारे और उनके बीच एक मज़बूत दीवार खड़ी कर सकता हूँ : (95)
मुझे लोहे के टुकड़े ला कर दो!", और फिर, जब वह दोनों पहाड़ों के बीच की ख़ाली जगह को पाटकर बराबर कर चुका, तो (उसने कहा), "अब आग दहकाओ!", फिर जब वह (दीवार) आग की तरह लाल हो गयी, तब उसने कहा, "मुझे पिघला हुआ ताँबा ला कर दो, ताकि मैं उसपर उँडेल दूँ!" (96)
अब न तो उनके दुशमन (याजूज-माजूज) उस दीवार पर चढ़कर आ सकते थे, और न वे उसमें सेंध ही लगा सकते थे, (97)
और उसने कहा, "यह मेरे रब की तरफ़ से रहमत [Mercy] है (कि ऐसी दीवार बन गयी)। मगर जब मेरे रब के वादे का समय पूरा हो जाएगा, तो वह इस दीवार को गिराकर बराबर कर देगा : मेरे रब की कही हुई बात सच है, टलनेवाली नहीं!" (98)
और एक दिन आएगा जब हम उनकी ऐसी हालत कर देंगे कि एक क़ौम के लोग दूसरी क़ौम के लोगों से लहरों की तरह टकरा रहे होंगे, और फिर, नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा और हम उन सबको एक साथ इकट्ठा कर देंगे। (99)
हम (सच्चाई से) इंकार करनेवालों के सामने जहन्नम को इस तरह ला खड़ा करेंगे, जैसे एक चीज़ नज़र के सामने दिखायी दे, (100)
वे इंकार करनेवाले जिनकी आँखें मेरी निशानियों को देखने से अंधी थीं, और वे लोग (जिनके कानों में बोझ था कि) कोई बात सुन नहीं सकते थे, (101)
क्या वे ऐसा सोचते थे कि मुझे छोड़ कर वे मेरे ही बन्दों को अपना रखवाला बना लेंगे? हमने ऐसे इंकार करनेवालों की आवभगत के लिए जहन्नम तैयार कर रखी है। (102)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "क्या हम तुम्हें बताएं कि कौन है जो अपने कर्मों के चलते सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाएगा, (103)
वह--- जिसकी सारी दौड़-धूप इस दुनिया में ग़लत दिशा में होती है, हालाँकि वे इसी धोखे में रहते हैं कि वे बहुत अच्छा कर्म कर रहे हैं? (104)
यही वे लोग है जिन्होंने अपने रब के संदेशों पर विश्वास नहीं किया और इस बात से भी इंकार किया कि उन्हें अपने रब के सामने पेश होना है।“ अत: उनके सारे कर्म बेकार गए : क़यामत के दिन हम उनके (कर्मों के) वज़न को स्वीकार नहीं करेंगे। (105)
उनका बदला तो वही जहन्नम होगा, इसलिए कि उन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया था और मेरे संदेशों और मेरे रसूलों की हँसी उड़ायी थी। (106)
मगर जिन लोगों ने (सच्चाई में) विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, तो उनको जन्नत के बाग़ दिए जाएंगे। (107)
जिनमें वे हमेशा रहेंगे, और कभी वहाँ से हटना पसंद नहीं करेंगे।" (108)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "अगर सारे समंदर मेरे रब की बातों को लिखने के लिए सयाही बन जाएं, तो सयाही सूख जाएगी मगर मेरे रब की बातें ख़त्म न होंगी--- यहाँ तक कि हम एक और समंदर जोड़ लें, तब भी नहीं।" (109)
कह दें, "मैं तो बस तुम्हारे ही जैसा एक आदमी हूँ, जिस पर यह बात (वही द्वारा) उतारी गयी है कि तुम्हारा ख़ुदा वही एक है। अतः जो कोई अपने रब के सामने खड़े होने से डरता हो, उसे चाहिए कि अच्छा कर्म करे और अपने रब की बन्दगी में किसी को साझेदार [Partner] न ठहराए।" (110)
सूरह 16 : अल-नह्ल [मधु-मक्खी,The Bee]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अल्लाह का फ़ैसला बस आ पहुँचा है, अत: उसे और जल्दी ले आने के लिए मत कहो। महान है वह! अल्लाह ऐसी किसी भी चीज़ से कहीं ऊँचा है जिसे वे उसकी ख़ुदायी के साथ (साझेदार के रूप में) जोड़ते हैं! (1)
वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, चुन लेता है, और उस पर अपने हुक्म से ‘वही’[रूह, Inspiration] भेजता है जिसे फ़रिश्ते ले कर उतरते हैं, ताकि लोगों को (उसकी ओर से) चेतावनी दे दे: “मेरे सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं। अतः तुम मुझ से डरो (और सच्चाई से इंकार करना व बुरे कर्म करना छोड़ दो)।" (2)
उसने आसमानों और ज़मीन को एक सही मक़सद के साथ पैदा किया, और वह ऐसी किसी भी चीज़ से कहीं ऊँचा है जिसे वे उसकी ख़ुदायी के साथ (साझेदार/Partner के रूप में) जोड़ते हैं! (3)
उसने इंसान को (वीर्य, Sperm की) एक बूँद से पैदा किया है, इसके बावजूद क्या देखते हैं कि इंसान खुले आम उस [अल्लाह] को ही चुनौती देने लग गया! (4)
और रहे पालतू जानवर---- तो उसी ने इन्हें भी पैदा किया. उनकी (खाल और ऊन से ठंड के समय) तुम्हें गर्मी मिलती है, और उनसे दूसरे फ़ायदे भी हैं : उनमें से कुछ (का मांस) तुम खाते भी हो; (5)
जब तुम शाम को उन्हें (मैदानों से चराकर) घर वापस लाते हो और जब सुबह में उन्हें चराने के लिए (मैदानों में) ले जाते हो, तो यह दृश्य तुम्हारी आँखों को कितना ख़ूबसूरत लगता है। (6)
और यही जानवर हैं जो तुम्हारा बोझ लादे हुए (दूर के) शहरों तक ले जाते हैं, जहाँ तुम जी-तोड़ मेहनत व थकान के बिना नहीं पहुँच सकते थे---निस्संदेह तुम्हारा रब बड़ा ही उदार व दया करनेवाला है----(7)
घोड़े, खच्चर और गधे (अल्लाह ने पैदा किए) हैं जो तुम्हारे लिए सवारी का काम देते हैं, इनसे शोभा भी बढ़ती है, और ऐसी बहुत सी चीज़ें पैदा करता रहता है जिनके बारे में तुम (अभी) कुछ नहीं जानते। (8)
और सही रास्ता बता देना अल्लाह का काम है, (मगर लोग भटक जाते हैं) क्योंकि कुछ टेढ़े रास्ते ग़लत मंज़िल की तरफ़ ले जाते हैं: (हालाँकि) अगर वह चाहता, तो तुम सबको (एक ही) सही मार्ग दिखा सकता था। (9)
वही है जो आसमान से पानी बरसाता है, इसमें से कुछ तो तुम्हारे पीने के काम आता है, और उसी से पेड़ व झाड़ियाँ उग जाती हैं, जिनमें तुम अपने जानवरों को चराते हो। (10)
और इसी पानी से वह तुम्हारे लिए (अनाज की) फ़सलें, ज़ैतून, खजूर, अंगूर और हर तरह के फल उगा देता है। सचमुच सोच-विचार करनेवालों के लिए इसमें एक बड़ी निशानी है। (11)
और (देखो!) उसने अपने हुक्म से रात और दिन को, सूरज और चांद को और इसी तरह तारों को भी तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो बुद्धि से काम लेते हैं। (12)
और ज़मीन पर तुम्हारे फ़ायदे के लिए उसने रंग-बिरंग की चीज़ें बिखेर रखी हैं। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ है जो सोचने समझने वाले हैं। (13)
वही है जिसने समंदर को तुम्हारे फ़ायदे के लिए काम पर लगा रखा है : तुम उसमें से मछलियों के ताज़ा मांस निकालकर खाते हो, और (सजने सँवरने के लिए क़ीमती) ज़ेवर भी निकालते हो; तुम देखते हो कि पानी के जहाज़ किस तरह लहरों को चीरते हुए चलते हैं, (ताकि तुम इसमें सवार होकर) उसकी कृपा से रोज़ी ढूंढ सको और उसकी (नेमतों का) शुक्र अदा कर सको। (14)
और (देखो!) उसने ज़मीन पर पहाड़ों को मज़बूती से जमा दिया, ताकि तुम्हारे नीचे की ज़मीन हिलने डुलने से बची रहे, और नदियाँ बहा दीं और रास्ते निकाल दिए, ताकि तुम (जल व थल के रास्ते) अपनी मंज़िल तक पहुँच सको, (15)
और लोगों को रास्ते की पहचान के लिए (तरह तरह के) ख़ास निशान [Landmarks] बनाए, और (रात में) तारों से भी लोग मार्ग पा लेते हैं। (16)
अब बताओ कि वह [अल्लाह] जो हर चीज़ को पैदा करता है, क्या उसकी तुलना उससे हो सकती है जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकता? फिर क्या तुम समझते बूझते नहीं? (17)
अगर तुम अल्लाह की नेमतों [Blessings] को गिनना चाहो, तो वह इतनी हैं कि कभी गिन न सको : सचमुच अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दया करनेवाला है। (18)
और अल्लाह सब कुछ जानता है; वह भी जो कुछ तुम छिपाते हो और वह भी जो कुछ तुम (सबके सामने) बता देते हो। (19)
जिन (देवताओं) को वे अल्लाह को छोड़कर पुकारते हैं, वे किसी भी चीज़ को पैदा नहीं करते; बल्कि वे तो स्वयं पैदा किए गए हैं। (20)
वे बेजान हैं मरे हुए, उनमें कोई जान नहीं है, उन्हें तो यह भी मालूम नहीं कि वे कब (मौत से) उठाए जाएँगे। (21)
तुम्हारा ख़ुदा तो एक ही ख़ुदा है (इसके सिवा कोई नहीं)। वे लोग जो आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] में विश्वास नहीं रखते, उनके दिल सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं, और वे अपने घमंड में चूर हैं। (22)
इसमें कोई शक नहीं कि अल्लाह ख़ूब जानता है, जो कुछ वे (अपने दिल में) छिपाते हैं और जो कुछ (ज़बान से) बता देते हैं। और वह घमंड करनेवालों को पसंद नहीं करता। (23)
और जब उनसे पूछा जाता है कि "तुम्हारे रब ने क्या उतारा है?" तो कहते हैं, "(कुछ नहीं), बस पिछ्ले लोगों की कहानियाँ हैं।" (24)
(नतीजा यह होगा कि) वे क़यामत के दिन अपने (गुनाहों का) बोझ तो पूरा पूरा उठाएँगे ही, साथ में उन लोगों के बोझ का भी एक हिस्सा उठाना होगा जिन्हें वे बिना सही जानकारी के भटका रहे हैं। क्या ही बुरा बोझ है जिसे वे अपने ऊपर लादेंगे! (25)
उनसे पहले जो लोग गुज़र चुके हैं, उन्होंने भी (सच्चाई के ख़िलाफ़) चालें चली थीं, मगर उन्होंने अपने ख़्यालों का जो महल बना रखा था, अल्लाह ने उनके महल की नीवों को ही हिला कर रख दिया. उनकी (ही बनायी हुई) छत उनके ही दम पर आ गिरी: बस ऐसी दिशा से यातना आ गयी जिसके बारे में उन्होंने कल्पना तक न की थी। (26)
अंत में, क़यामत के दिन, अल्लाह उन्हें यह कहते हुए अपमानित करेगा, "कहाँ गए मेरे वे “साझेदार [Partners]” (जिनको तुम ने ख़ुदा बना रखा था), जिनकी ख़ातिर तुम (मेरा) विरोध करते थे?" जिन्हें ज्ञान दिया गया था, वे (उस दिन) कहेंगे, "निश्चय ही आज इंकार करनेवालों [काफ़िरों] के लिए शर्म और बदहाली से डूब मरने का दिन है!" (27)
ऐसे (काफ़िर) लोग जिनकी जान फ़रिश्ते इस हालत में लेते हैं जबकि वे (इंकार पर अड़े होने के चलते) ख़ुद अपने आप पर ज़ुल्म कर रहे होते हैं, पर इस मौक़े पर वे आज्ञा माननेवाले बन जाएंगे (और कहेंगे) : "हम तो कोई शैतानी के काम नहीं कर रहे थे।" (उनसे कहा जाएगा), "बिल्कुल, तुम कर रहे थे: तुम ने जो कुछ किया है, अल्लाह उसे बहुत अच्छी तरह जानता है, (28)
तो बस अब जहन्नम के दरवाज़े में घुस जाओ. तुम्हें हमेशा के लिए इसी में रहना है----सचमुच घमंड करनेवालों का कितना बुरा ठिकाना है!" (29)
लेकिन, जब नेक व सच्चे लोगों से पूछा जाता है, "तुम्हारे रब ने क्या उतारा है? "वे कहेंगे, "सारी चीज़ें जो अच्छी हैं।" जो लोग अच्छा काम करते हैं, उनके लिए तो इस दुनिया में भी अच्छा बदला है, मगर आख़िरत [परलोक] में उनका घर कहीं अच्छा है : नेक व सच्चे लोगों का क्या ही अच्छा घर होगा। (30)
वे हमेशा हमेशा रहने के बाग़ में दाख़िल होंगे, जिनके बीच बहती हुई नहरें होंगी, वे जो कुछ चाहेंगे, वहाँ हर एक चीज़ मौजूद होगी। अल्लाह अपने अच्छे बंदों को इसी तरह इनाम देता है, (31)
ऐसे (परहेज़गार) लोग जिनकी जान फ़रिश्ते इस हालत में लेते हैं जबकि वे (ईमान व मन की शांति के कारण) ख़ुशहाल होते हैं. फ़रिश्ते उन्हें कहते हैं, "तुम पर सलामती हो! जन्नत में दाख़िल हो जाओ, यह उन कामों का इनाम है जो तुम किया करते थे।"(32)
[ऐ रसूल!] क्या विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] अब इसी बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि फ़रिश्ते उनके पास उतर आएं या आपके रब का (तय किया हुआ) फ़ैसला ही सामने आ जाए? ऐसा ही उन लोगो ने भी किया था, जो इनसे पहले गुज़र चुके हैं। अल्लाह ने उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि वे ख़ुद अपनी जानों पर ज़ुल्म करते रहे। (33)
इस तरह, (नतीजा यह हुआ कि) जो बुरे कर्म उन्होंने किए थे उनकी बुराइयों का अंजाम उन्हें भुगतना पड़ा, और जिस चीज़ का वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे, उसी चीज़ ने उन्हें आ घेरा। (34)
जो लोग अल्लाह के साथ दूसरों की भी पूजा करते थे, वे कहते हैं, "अगर अल्लाह चाहता तो कभी ऐसा नहीं होता कि हम या हमारे बाप-दादा उसे छोड़कर दूसरी हस्तियों की पूजा करते, और न हम बिना उसकी मंज़ूरी के किसी चीज़ को (अपने मन से) हराम [forbidden] ठहरा देते।" मगर उनसे पहले के लोगों ने भी ऐसी ही बात कही थी। तो फिर (बताओ) रसूलों की ज़िम्मेदारी इसके सिवा और क्या है कि साफ़-साफ़ (अल्लाह का) सन्देश पहुँचा दें? (35)
यह सच्चाई है कि हमने हर समुदाय में कोई न कोई रसूल ज़रूर भेजा, ताकि वह यह संदेश सुना दे, "अल्लाह की बन्दगी करो और (शैतान या बुत जैसे) झूठे ख़ुदाओं से बचो।" फिर उन (समुदायों) में से कुछ तो अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चले; जबकि कुछ दूसरे (समुदाय) सही रास्ते से भटक कर रह गए। अत: ज़मीन पर ज़रा घूम-फिर कर देखो कि (सच्चाई से) इंकार करनेवालों का अंत में कैसा अंजाम हुआ। (36)
[ऐ रसूल] आप हालाँकि मन से बहुत चाहते हैं कि ये लोग सीधे रास्ते पर आ जाएं, मगर अल्लाह जिसे (सच्चाई से इंकार व दूसरों को बहकाने के कारण) भटकता छोड़ दे, उसे वह मार्ग नहीं दिखाया करता, और कोई न होगा जो ऐसे लोगों की मदद करेगा। (37)
उन लोगों ने अल्लाह की क़समें खाकर कड़ी प्रतिज्ञाएं ली हैं कि मरे हुए लोगों को अल्लाह दोबारा (ज़िंदा कर के) नहीं उठाएगा। मगर वह ऐसा ज़रूर करेगा--- यह तो एक पक्का व अटूट वादा है, मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं समझते----(38)
और यह इसलिए होगा ताकि जिस बात पर वे मतभेद रखते हैं, वह उनके सामने स्पष्ट हो जाए और यह भी कि (सच्चाई से) इंकार करनेवाले मान सकें कि वे जो कहते थे, वह झूठ था। (39)
जब हम किसी चीज़ के होने या करने का इरादा करते हैं, तो बस इतना ही कहते हैं कि "हो जा!" और वह हो जाती है। (40)
और जिन लोगों ने दूसरों के ज़ुल्म सहने के बाद अल्लाह के लिए अपने घर-बार छोड़ दिए और दूसरी जगह जा बसे, उन्हें हम इस दुनिया में अच्छा ठिकाना तो देंगे ही, मगर काश! कि वे यह जान पाते कि आख़िरत [परलोक] में उनका इनाम कहीं बड़ा होगा। (41)
ये वे लोग हैं जो मज़बूती से जमे रहते हैं, और वे अपने रब पर पूरा भरोसा रखते हैं। (42)
[ऐ रसूल] हमने आपसे पहले भी (किसी फ़रिश्ते को नहीं, बल्कि) इंसानों को ही रसूल बनाकर भेजा था, जिन पर हम ने ‘वही’[Revelation] उतारी थी: तुम (लोग) अगर नहीं जानते, तो उन (यहूदी/ईसाइ) लोगों से पूछो जो (आसमानी किताबों) के बारे में जानते हैं। (43)
हम ने उन्हें स्पष्ट निशानियों और आसमानी किताबों के साथ भेजा था, (इसी तरह) हम ने आप पर भी अपना संदेश[क़ुरआन] उतारा है, ताकि जो संदेश लोगों के लिए भेजा गया है, आप उन्हें अच्छी तरह से समझा सकें, और ताकि लोग इस पर सोच-विचार कर सकें। (44)
फिर क्या वे लोग जो शैतानी योजनाएं बनाते हैं, उन्हें इस बात का पक्का यक़ीन है कि अल्लाह उन्हें कभी धरती के भीतर नहीं धँसा सकता है या उन पर कोई ऐसी जगह से यातना नहीं आ सकती जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक न हो, (45)
या (किसी दिन) आते-जाते उन्हें अचानक वह अपनी पकड़ में नहीं ले सकता----क्योंकि वे अल्लाह को (अपनी चालों से) रोक तो नहीं सकते---- (46)
या कि ऐसा हो वह उन्हें पहले डरा के और फिर धीरे धीरे अपनी पकड़ में नहीं ले सकता? बेशक तुम्हारा रब बहुत मेहरबान और बड़ा ही दयावान है। (47)
क्या अल्लाह की पैदा की हुई चीज़ों को उन (विश्वास न करनेवालों) ने ध्यान से नहीं देखा कि अल्लाह के सामने किस तरह उनकी परछाइयाँ विनम्र भाव से झुकी हुई दाएँ और बाएँ ढलती रहती हैं? (48)
यह अल्लाह है कि जिसके सामने आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ झुकती है, हर एक चलता फिरता जानवर, यहाँ तक कि फ़रिश्ते भी ---- उनमें घमंड नहीं होता: (49)
वे अपने रब से डरते रहते हैं जो उनके ऊपर मौजूद है, और वही करते हैं जैसा उन्हें आदेश दिया जाता है। (50)
अल्लाह ने कहा, "पूजने के लिए दो-दो ख़ुदा न बना बैठो”---- क्योंकि वह तो बस एक ही ख़ुदा है। “केवल मैं ही अकेला ख़ुदा हूँ जिससे तुम्हें डरना चाहिए।" (51)
आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ उसी की है : (सब के लिए) उसकी आज्ञा का सदा पालन करना ज़रूरी है। तो फिर क्या अल्लाह के सिवा तुम किसी और के बारे में सोचोगे? (52)
जो कुछ भी अच्छी चीज़ें तुम्हारे पास हैं वह अल्लाह की तरफ़ से आती हैं, फिर जब तुम्हें कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो तुम सिर्फ़ उसी को मदद के लिए पुकारते हो, (53)
फिर जब वह उस मुसीबत को तुमसे टाल देता है--- तो देखो!---कि तुममें से कुछ लोग अपने रब के साथ दूसरों (को ख़ुदायी में) साझेदार [Partners] ठहराने लगते हैं। (54)
जो कुछ मेहरबानियाँ हमने उन पर की हैं, इसके बदले में उन्हें नाशुक्री [Ingratitude] कर लेने दो; “ठीक है, ज़िंदगी के थोड़े दिन कुछ मज़े कर लो---- जल्द ही तुम्हें (इसका नतीजा) मालूम हो जाएगा।” (55)
फिर (देखो!) जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दे रखी है उसमें से कुछ हिस्सा वे (मूर्तियों के लिए) अलग कर लेते हैं, जिनकी हक़ीक़त उन्हें मालूम तक नहीं। क़सम है अल्लाह की! जो झूठ तुम ने गढ़े हैं उसके बारे में तुमसे ज़रूर पूछताछ की जाएगी। (56)
(फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटी मानते हुए) वे बेटियों को अल्लाह के साथ जोड़ते हैं----महान है वह!--- (अल्लाह के लिए बेटियाँ!) और ख़ुद अपने लिए वे (बेटा) चाहते हैं। (57)
और जब उनमें से किसी को बेटी के पैदा होने की ख़बर दी जाती है, तो सुनकर उसका चेहरा काला पड़ जाता है और वह उदास हो जाता है। (58)
इस बुरी ख़बर को सुनने के बाद वह मारे शर्म के अपने ही लोगों से छिपता फिरता है, और (मन ही मन में सोचता रहता है) कि अपमान सहन करके उस बच्ची को रहने दे या उसे मिट्टी में गाड़ दे। देखो, वे कितना बुरा फ़ैसला करते हैं! (59)
जो लोग आख़िरत [परलोक] को नहीं मानते, उन्होंने अपने दिल में (अल्लाह की विशेषताओं के बारे में) बहुत बुरी तस्वीर [image] बना रखी है, हालाँकि अल्लाह के लिए कल्पना में भी जो तस्वीर उभरती है वह सबसे बेहतरीन होनी चाहिए : वह बहुत ताक़तवाला और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (60)
अगर अल्लाह लोगों को उनकी शैतानियों पर तुरंत सज़ा देने लगता, तो ज़मीन पर कोई भी जीव ज़िंदा नहीं बच पाता, किन्तु वह उन्हें एक निश्चित समय तक ढील देता है: फिर जब उनका समय आ जाता है तब उसे घड़ी भर के लिए भी टाला नहीं जा सकता और न ही नियत समय को ही बढाया जा सकता है। (61)
(और देखो!) ये लोग अल्लाह के लिए (बेटियों के रूप में) ऐसी बातें ठहराते हैं, जिसे ख़ुद अपने लिए पसन्द नहीं करते, जबकि वे ख़ुद अपनी ज़बान से सफ़ेद झूठ बोलते हैं कि सारी बेहतरीन चीज़ [बेटा] उन्हीं के हिस्से में आयी है। इस में कोई शक नहीं कि उनके हिस्से में तो (जहन्नम की) आग है: वहां (आग में) ये सबसे पहले जानेवाले हैं। (62)
क़सम है अल्लाह की! [ऐ रसूल] हम आपसे पहले दूसरे समुदायों के पास भी अपने रसूल भेज चुके हैं, मगर शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए बड़ा लुभावना बना कर पेश किया। वह आज भी (मक्का के) विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] का संरक्षक बना हुआ है, और अंत में, उन सब के लिए एक दर्दनाक यातना तैयार है। (63)
हमने यह किताब [क़ुरआन] आप पर इसीलिए उतारी है ताकि जिन बातों में वे मतभेद रखते हैं, वे बातें अच्छी तरह उन्हें समझा दी जाएं और जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए यह (किताब) रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] है। (64)
यह अल्लाह है जो आसमान से पानी बरसाता है और इसी (पानी के) द्वारा मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन में फिर से जान पड़ जाती है। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो बात सुनते हैं। (65)
और मवेशियों में भी तुम्हारे लिए एक सबक़ है ----- हम पेट के तत्वों में से तुम्हारे लिए पीने की चीज़ देते हैं, उनके पेट में जो गोबर और ख़ून है, उसके बीच से हम तुम्हें साफ़ सुथरा दूध निकाल देते हैं जो पीनेवालों के लिए बेहद प्रिय है, (66)
खजूरों और अंगूरों के फलों से तुम मीठे रस [शराब/ शरबत] बना लेते हो, और यह एक भरपूर रोज़ी है। सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो बुद्धि से काम लेते है। (67)
और तुम्हारे रब ने मुधमक्खी के दिल में यह बात डाल दी कि "तू पहाड़ों में, पेड़ों में और लोगों के बनायी हुई (फूलों की) छत्रियों में अपने लिए घर [छ्त्ते] बना। (68)
और हर क़िस्म के फल-फूलों को अपनी ख़ुराक बना और फिर उन रास्तों पर चल जिस पर चलना तेरे रब ने तेरे लिए आसान बना दिया है।" (इस तरह) उसके पेट से विभिन्न रंगों का एक पेय [शहद] निकलता है, जिसमें लोगों की बीमारियों का इलाज है। सचमुच ही सोच-विचार करनेवाले लोगों के लिए इसमें एक बड़ी निशानी है। (69)
यह अल्लाह है जिसने तुम्हें पैदा किया है और समय पूरा हो जाने पर वह तुम्हें मौत दे देता है. तुम में से कोई ऐसा भी होता है कि बुढापे की ऐसी निरीह अवस्था तक पहुँच जाता है जहाँ एक अच्छी समझ-बूझ रखने वाला आदमी भी नासमझ हो कर रह जाता है: सचमुच अल्लाह सब जाननेवाला, हर चीज़ की ताक़त रखनेवाला है। (70)
और (देखो!) अल्लाह ने तुममें से कुछ को दूसरों की अपेक्षा ज़्यादा अच्छी रोज़ी दे रखी है। मगर जिन्हें (कमाई में) ज़्यादा दिया गया है वह यह नहीं चाहते कि अपनी रोज़ी का हिस्सा अपने अधीन ग़ुलामों को भी दें, ताकि वह भी इनके बराबर हो जाएँ। तो फिर कैसे ये लोग अल्लाह की नेमतों को मानने से इंकार कर सकते हैं? (71)
यह अल्लाह है जिसने तुम ही में से तुम्हारे लिए जोड़े [पति/पत्नियाँ] बना दिए और फिर इनके द्वारा तुम्हारे लिए बेटे/बेटियाँ और पोते/पोतियाँ पैदा कर दिए और तुम्हें अच्छी अच्छी चीज़ों में से रोज़ी दी गयी; फिर भी यह कैसे हो सकता है कि वे झूठ में विश्वास करें और अल्लाह की नेमतों को मानने से इंकार करें? (72)
अल्लाह को छोड़ कर जिनकी ये पूजा करते हैं, उनमें कोई ताक़त नहीं है कि वह आसमान या ज़मीन से उन्हें कुछ भी रोज़ी दे सकें : वे कुछ नहीं कर सकते। (73)
अतः (राजाओं को देखकर) अल्लाह के बारे में कोई तस्वीर न बना डालो : अल्लाह जानता है, तुम कुछ नहीं जानते। (74)
अल्लाह एक मिसाल बयान करता है: एक ग़ुलाम है जो अपने मालिक के नियंत्रण में है और उसे किसी भी चीज़ का कोई अधिकार नहीं है, और एक दूसरा आदमी है जिसे हमारी कृपा से अच्छी रोज़ी मिली हुई है और उसमें से वह ढके-छिपे भी और सबके सामने भी (जिस तरह चाहता है) दान देता रहता है। (अब बताओ) क्या वे दोनों बराबर हो सकते हैं? सारी तारीफ़ें अल्लाह के लिए हैं, किन्तु उनमें अधिकतर लोग हैं जो इस बात को नहीं मानते। (75)
(देखो!) अल्लाह ने एक और मिसाल बयान की है: दो आदमी हैं, उनमें से एक गूँगा है, कोई काम नहीं कर सकता, वह अपने मालिक पर एक बोझ है--- उसका मालिक जो भी काम करने को कहता है, वह कुछ भी ढंग से नहीं कर पाता----- क्या ऐसा आदमी उस दूसरे आदमी के बराबर हो सकता है जो लोगों को इंसाफ़ की बातों का आदेश देता है और स्वयं भी सीधे मार्ग पर हो? (76)
आसमानों और ज़मीन की वे सारी चीज़ें जो नज़रों से ओझल हैं, उनके (रहस्यों की) जानकारी अल्लाह ही के पास है। और उस फ़ैसले की घड़ी का (अचानक) आना ऐसा होगा जैसे आँखों का झपकना या इससे भी जल्दी: हर एक चीज़ अल्लाह के क़ाबू में है। (77)
(और देखो!) अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी माँओ के पेट से इस हाल में निकाला कि तुम कुछ भी नहीं जानते थे। फिर उसने तुम्हें सुनने, देखने, और सोचने-समझने की ताक़त दी ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा कर सको। (78)
क्या वे चिड़ियों को आसमान में नहीं देखते कि किस तरह हवाओं के बीच उड़ती फिरती हैं? अल्लाह के सिवा कौन है जो उन्हें (हवा में) थामें हुए होता है। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो (सच्चाई में) विश्वास रखते हैं। (79)
यह अल्लाह है जिसने तुम्हारे घरों को तुम्हारे लिए आराम करने की जगह बना दिया, और जानवरों की खालों से भी तुम्हारे लिए ऐसे घर [ख़ेमा,Tent] बना दिए जिन्हें हल्का-फुल्का होने के कारण तुम सफ़र में भी अपने साथ लिए फिरते हो और जहाँ चाहते हो पड़ाव भी डाल लेते हो; फिर चौपायों के ऊन से, रोवों [Fur] से और बालों से कितने ही घरेलू सामान और ज़रूरी चीज़ें बना दीं कि एक अवधि तक काम देती हैं। (80)
यह अल्लाह है जिसने अपनी पैदा की हुई चीज़ों से तुम्हारे लिए छाँव बनायी और पहाड़ों में पनाह लेने की जगहें बनायीं; ऐसे कपड़े दिए जो तुम्हें गर्मी से बचाते हैं और कुछ ऐसे भी (लोहे के) कपड़े दिए जो युद्ध में तुम्हारे लिए बचाव का काम करते हैं। इस तरह, अल्लाह तुम पर अपनी नेमतें [blessings] पूरी करता है, ताकि तुम पूरी भक्ति से उसके आगे झुक सको। (81)
फिर भी अगर वे [काफ़िर] मुँह मोड़ते हैं तो [ऐ रसूल!], आपकी ज़िम्मेदारी तो बस इतनी ही है कि (अल्लाह के) संदेश को उन तक साफ़-साफ़ पहुँचा दें। (82)
ये लोग अल्लाह की नेमतों को जानते हैं, मगर उसे पहचानने से इंकार करते हैं: उनमें अधिकतर ऐसे हैं (जो शुक्र अदा नहीं करते और) जिन्हें सच्चाई से इंकार है। (83)
एक दिन आएगा जब हम हर समुदाय में से एक गवाह [रसूल] खड़ा करेंगे, फिर जिन्होंने (सच्चाई में) विश्वास करने से इंकार किया होगा उन्हें इस बात की कोई अनुमति न होगी कि वे कोई बहाने बना सकें या अपनी भूल-चूक में सुधार कर सकें। (84)
जब शैतानियाँ करनेवाले लोग अपनी सज़ा भुगतेंगे, तो न उनके लिए सज़ा हल्की की जाएगी और न उन्हें थोड़ी देर की राहत ही मिलेगी। (85)
जिन लोगों ने (ख़ुदायी में) अल्लाह के साथ साझेदार [Partner] ठहराए, (क़यामत के दिन) जब वे अपने बनाए हुए साझेदारों को देखेंगे, तो कहेंगे, "हमारे रब! ये हैं हमारे वे साझेदार जिन्हें हम तेरे सिवा पुकारा करते थे।" इस पर वे [साझेदार] तुरंत पलट कर जवाब देंगे, "तुम बिलकुल झूठे हो।" (86)
उस दिन वे सब आज्ञाकारी बने हुए अल्लाह के आगे सिर झुका देंगे: उनके बनाए हुए झूठे ख़ुदा उन्हें अकेला छोड़ जाएंगे। (87)
जो लोग अविश्वास पर अड़े रहे, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोकते रहे थे, उनलोगों ने फ़साद [corruption] मचा रखा था, और इसीलिए हम उनके लिए यातना पर यातना बढ़ाते रहेंगे। (88)
एक दिन आएगा जब हम हर समुदाय में से उन लोगों के ख़िलाफ़ एक गवाह [रसूल] खड़ा करेंगे, और हम [ऐ रसूल] आपको इन (मक्का के) लोगों के ख़िलाफ़ गवाह के रूप में लाएंगे, क्योंकि हमने आप पर किताब [क़ुरआन] उतार भेजी है जिसमें हर चीज़ को खोलकर खोलकर बता दिया गया है, यह उनलोगों के लिए एक मार्गदर्शन [Guidance] है, रहमत [Mercy] है, और अच्छी ख़बर सुनानेवाली है जो लोग पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकते हैं। (89)
बेशक अल्लाह (सबके साथ) न्याय करने का, भलाई करने का और रिश्तेदारों को (उनके हक़) देते रहने का आदेश देता है और गंदी व अश्लील बातों से, हर तरह की बुराइयों से और अत्याचार व ज़्यादती करने से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम ध्यान दो व समझो। (90)
अल्लाह के नाम से अगर कोई प्रतिज्ञा करो, तो उसे पूरा किया करो, और (इसी तरह) अगर किसी चीज़ की पक्की शपथ ले लो तो उसे मत तोड़ो, क्योंकि तुम अल्लाह को अपना गवाह बना चुके हो: अल्लाह हर एक चीज़ जानता है जो कुछ तुम करते हो। (91)
तुम अपनी क़समों का इस्तेमाल एक दूसरे को धोखा देने के लिए मत किया करो----(प्रतिज्ञा करके अपने ही हाथों मत तोड़ दो, और) उस औरत की तरह न हो जाओ जो अपना सूत मेहनत से कातने के बाद उसे उधेड़ कर धागा धागा अलग कर देती है---केवल इसलिए कि एक गिरोह दूसरे गिरोह से गिनती व ताक़त में बढ़ गया। बात केवल यह है कि अल्लाह इस प्रतिज्ञा के द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेता है और जिस बात पर तुम आपस में मतभेद रखते हो, उसकी सच्चाई तो वह क़यामत के दिन अवश्य ही तुम पर खोल देगा। (92)
अगर अल्लाह ऐसा चाहता, तो तुम सबको एक ही (दीन माननेवालों का) समुदाय बना देता, मगर वह जिसको चाहता है (उसकी हठधर्मी के कारण) उसको भटकता छोड़ देता है, और जिसको चाहता है सीधा मार्ग दिखा देता है। तुम जो कुछ भी करते हो उसके बारे तुमसे अवश्य पूछताछ होगी। (93)
तुम अपनी क़समों का इस्तेमाल एक दूसरे को धोखा देने के लिए मत किया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे क़दम मज़बूती से जम जाने के बाद लड़खड़ा जाएं। और कहीं ऐसा न हो कि अल्लाह के मार्ग से दूसरों को रोकने के बदले में तुम्हें दंड का मज़ा चखना पड़े, और तुम्हें एक भयानक यातना झेलनी पड़ जाए। (94)
अल्लाह के नाम से की गयी किसी प्रतिज्ञा को (थोड़े से फ़ायदे के लिए) मामूली दाम पर मत बेच दो : अल्लाह के पास (देने के लिए) जो है वह तुम्हारे लिए कहीं बेहतर है, काश कि तुम इस बात को समझ पाते। (95)
जो तुम्हारे पास है वह तो (एक दिन) समाप्त हो जाएगा, मगर जो अल्लाह के पास है वह बाक़ी रहनेवाला है। जिन लोगों ने धैर्य [सब्र] से काम लेते हुए (दुनिया की मुसीबतें झेल ली) होगी, हम उन्हें उनके बेहतरीन कर्मों के मुताबिक़ उनका इनाम ज़रूर प्रदान करेंगे। (96)
जो कोई मर्द हो या औरत, अगर अच्छे कर्म करता है, और ईमान भी रखता है, तो हम उसे (दुनिया में) अवश्य अच्छी ज़िंदगी देंगे और उनके बेहतरीन कर्मों के मुताबिक़ (आख़िरत में भी) उन्हें इनाम देंगे। (97)
अतः [ऐ रसूल] जब आप क़ुरआन पढ़ा करें, तो दुतकारे हुए [Outcast] शैतान (के बहकावे) से अपनी हिफ़ाज़त के लिए अल्लाह से दुआ माँग लिया करें। (98)
उस [शैतान] का उन लोगों पर कोई ज़ोर नहीं चलता जो ईमानवाले हैं और अपने रब पर भरोसा रखते हैं; (99)
उसका ज़ोर तो बस उन्हीं लोगों पर चलता है जो उसे अपना साथी बनाते हैं और जो उसी (शैतान) के चलते, अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] ठहरा लेते हैं। (100)
जब हम एक आयत की जगह दूसरी आयत बदलकर लाते हैं----- और अल्लाह ही बेहतर जानता है जो कुछ वह उतारता [Reveal] है---- तो वे कहते हैं, "तुम तो बस अपने मन से ही इसे बना लेते हो!", मगर उनमें से अधिकतर लोगों को हक़ीक़त की कोई जानकारी नहीं है। (101)
[ऐ रसूल] बता दें, "इस (क़ुरआन) को तो पवित्र आत्मा [जिबरील फ़रिश्ता] ने तुम्हारे रब की ओर से थोड़ा थोड़ा करके ठीक ठीक उतारा है, ताकि ईमानवालों के दिल मज़बूती से जमे रहें, और आज्ञा माननेवाले बंदों [मुस्लिम] के लिए मार्गदर्शन और ख़ुशख़बरी का सामान हो। (102)
[ऐ रसूल] हम अच्छी तरह से जानते हैं जो ये (आपके बारे में) कहते हैं, "उसको तो एक आदमी है जो (ये बातें) पढ़ा देता है।" हालाँकि जिसकी ओर वे संकेत करते हैं उसकी भाषा विदेशी है, जबकि यह [क़ुरआन] साफ़ अरबी भाषा में है। (103)
जो लोग अल्लाह की आयतों में विश्वास नहीं रखते, अल्लाह उनको सही रास्ता नहीं दिखाता, और उन्हें तो दर्दनाक यातना होगी। (104)
असल में, झूठ तो उन्हीं लोगों ने गढ़ा है जो अल्लाह की आयतों में विश्वास नहीं रखते : वे बिल्कुल झूठे हैं। (105)
जो कोई (अल्लाह पर) ईमान लाने के बाद अल्लाह को मानने से इंकार कर बैठा, और उसका दिल इस इंकार पर जम गया, तो ऐसे लोगों पर अल्लाह का सख़्त ग़ुस्सा टूट पड़ेगा और उनके लिए बड़ी दर्दनाक यातना तैयार है। मगर हाँ, उनकी बात अलग है जिन्हें (डरा धमका कर) यह कहने पर मजबूर किया गया हो कि वे ईमान नहीं रखते, हालाँकि उनके दिलों में ईमान मज़बूती से जमा हुआ हो (तो उनकी पकड़ नहीं होगी)। (106)
यह (यातना) इसलिए होगी कि उन्हें आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की अपेक्षा इस सांसारिक जीवन से बहुत लगाव है, और अल्लाह (का क़नून है कि वह) उन्हें सही रास्ता नहीं दिखाता जो उसे मानने से इंकार करते हैं। (107)
ये ऐसे लोग हैं (जो अक़्ल से काम नहीं लेते और) जिनके दिलों को, कानों को और आँखों को अल्लाह ने बंद कर के मुहर लगा दी है : वे (अपने अंजाम को) बिल्कुल भुलाए बैठे हैं, (108)
और इस बात में कोई शक नहीं कि आख़िरत में वे बड़े घाटे में रहेंगे। (109)
जिन लोगों ने अपने ऊपर हुए ज़ुल्म के बाद घर-बार छोड़ा, फिर (सच्चाई के रास्ते में) संघर्ष [जिहाद] किया और (मुश्किल के बावजूद) दृढता से जमे रहे, तो ऐसे लोगों के लिए तुम्हारा रब बड़ा माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है। (110)
एक दिन आएगा जब हर एक जान (केवल) अपने अपने बचाव की दलीलें ले कर आएगी, तब हर एक जान को उसके कर्मों के अनुसार पूरा पूरा बदला चुका दिया जाएगा--- किसी के साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (111)
अल्लाह एक ऐसे शहर की मिसाल बताता है जो अमन चैन की जगह थी। ज़रूरत का हर सामान बड़ी मात्रा में सब जगह से आता रहता था। फिर ऐसा हुआ कि (वहाँ के लोगों ने) अल्लाह की नेमतों [blessings] पर शुक्र अदा करना छोड़ दिया, तब अल्लाह ने भी उनकी करतूतों के कारण उन पर भूख और डर का साया डाल दिया। (112)
फिर उनके पास उन्हीं में से एक रसूल आए, मगर उन लोगों ने उसे झूठा कहा। अन्ततः भयानक यातना ने उन्हें उस वक़्त धर दबोचा जबकि वे शैतानियाँ करने में मगन थे। (113)
अतः जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें रोज़ी दे रखी है, उसमें से अच्छी और हलाल [Lawful] चीज़ें खाओ पिओ, और (साथ में) अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करो, अगर तुम सचमुच उसी की इबादत [पूजा] करते हो। (114)
उसने (खाने की) केवल इन चीज़ों को तुम्हारे लिए मना [हराम] किया है : मरे जानवर का सड़ा हुआ गोश्त, ख़ून, सुअर का मांस और जिस जानवर को अल्लाह के सिवा किसी और का नाम ले कर काटा गया हो। लेकिन, अगर (हलाल खाना न मिलने पर) कोई भूख से एकदम मजबूर हो जाए, हालाँकि उसे इच्छा न हो, और बस (जान बचाने के लिए) उतना ही सा खा ले जिससे उसकी उस वक़्त की ज़रूरत पूरी हो जाए (तो उसे खा सकता है) और अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (115)
और अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ते हुए ऐसी ग़लत बातें मत कहा करो, "यह हलाल [Lawful] है और यह हराम [Forbidden] है" : जो लोग अल्लाह के बारे में झूठ गढ़ते हैं, वे कभी कामयाब नहीं होंगे---- (116)
वे थोड़ा सा मज़ा (इस दुनिया में) उठा सकते हैं, मगर उन्हें (आख़िरत में) दर्दनाक यातना मिलने वाली है। (117)
और [ऐ रसूल] यहूदियों के लिए हम ने जो चीज़ें हराम की थीं, उसके बारे में हम आपको पहले ही (क़ुरआन में) बता चुके हैं. हम ने (पाबंदी लगा कर) उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया था, बल्कि वे ख़ुद ही अपने ऊपर ज़ुल्म करते रहे थे। (118)
मगर जो लोग अनजाने में ग़लतियाँ कर बैठते हैं, फिर इनसे तौबा कर लेते हैं, और उसमें सुधार करते हैं, तो उनके लिए तुम्हारा रब बड़ा क्षमा करनेवाला, बेहद मेहरबान है। (119)
सचमुच इबराहीम की मिसाल पूरे समुदाय जैसी थी : वह पूरी भक्ति से झुक कर अल्लाह की आज्ञा मानने वाला और ईमान का पक्का था। वह मूर्तियों को पूजने वाला न था; (120)
वह अल्लाह की रहमतों का शुक्र अदा करने वाला था, अल्लाह ने उसे चुन लिया था और उसे (सच्चाई का) सीधा मार्ग दिखाया था। (121)
और हमने उस पर दुनिया में भी अपनी ख़ास कृपा दृष्टि रखी और आख़िरत में भी वह अच्छे व नेक लोगों मे से होगा। (122)
फिर [ऐ रसूल] हमने आप पर अपना संदेश उतारा कि, "इबराहीम के तरीक़े पर चलो, जो ईमान का बिलकुल पक्का था, और (एक अल्लाह को छोड़ कर) कई देवी-देवताओं को माननेवालों [Idolators] में से न था।" (123)
'सब्त' [Sabbath] मनाने का दिन तो केवल उन लोगों पर अनिवार्य कर दिया गया था जिन्हें उसके बारे में आपस में मतभेद था। क़यामत के दिन तुम्हारा रब उनके बीच फ़ैसला कर देगा, जिन बातों में उन्हें आपस में मतभेद था। (124)
(ऐ रसूल) लोगों को अपने रब के मार्ग की ओर जब बुलाया करें तो ज्ञान और अच्छी शिक्षा के साथ बुलाएं। और उनसे आदर के साथ वाद विवाद करें, कि आपका रब अच्छी तरह जानता है कि कौन है जो सही मार्ग से भटक गया है और कौन है जो सही मार्ग पर है। (125)
(ऐ ईमानवालो), अगर तुम अपने ऊपर किए गए किसी हमले का बदला लो, तो बदला उतना ही होना चाहिए जितना तुम्हें कष्ट पहुँचा हो, लेकिन अगर तुम सब्र कर लो और (बदला न लो), तो निश्चय ही यह ज़्यादा अच्छा होगा। (126)
अतः (ऐ रसूल) आप सब्र से काम लें: और आपको सब्र केवल अल्लाह ही की मदद से मिलेगा । उनके हाल पर दुखी न हों और न उनकी विरोधी चालों से मायूस हों, (127)
क्योंकि अल्लाह उनके साथ है जो हर समय उस का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहते हैं। (128)
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