Chronological Quran : Later Meccans-4 [620--623 AD]
सूरह 69 : अल-हाक़्क़ा
[वह सच्चाई जिससे इंकार न किया जा सके/ ज़रूर आनेवाली घड़ी, The Sure Reality/ The inevitable Hour]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
वह घड़ी [Inevitable Hour] जो ज़रूर आ कर रहेगी (जिसकी सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता)! (1)
यह कौन सी घड़ी है जो ज़रूर आ कर रहेगी? (2)
और [ऐ रसूल], आप क्या जानें कि वह ज़रूर आनेवाली घड़ी क्या है? (3)
समूद [Thamud] और आद ['Ad] की क़ौम के लोगों ने इस बात को मानने से इंकार किया था कि (एक दिन तोड़-फोड़ कर रख देनेवाली) धमाकेदार टक्कर की घटना [क़यामत] होगी : (4)
समूद की क़ौम के लोग तो एक कान फाड़ देनेवाले धमाके से मार डाले गए (जिससे उनके कलेजे फट गये थे); (5)
आद की क़ौम के लोग एक ऐसी तेज़ और बेक़ाबू आंधी से मार दिए गए (6)
जिसे अल्लाह ने उन पर लगातार सात रातों और आठ दिनों तक लगातार चलाए रखा, सो तुम (अगर वहाँ होते तो) उन लोगों को (उस अवधि) में (इस तरह) मरे पड़े देखते जैसे वे खजूर के गिरे हुए पेड़ों की खोखली जड़ें हों. (7)
क्या तम इनमें से किसी को भी अब बाक़ी बचा हुआ देखते हो? (8)
फ़िरऔन ने भी, और जो उसके पहले थे, और (लूत के लोगों की) खंडहर हुई बस्तियों (में रहनेवाले) : इन लोगों ने बड़े भारी गुनाह किए थे (9)
और अपने रब के रसूल का कहना नहीं माना, सो अल्लाह ने उन्हें बहुत सख़्त पकड़ में ले लिया। (10)
मगर जब (नूह के सामने) बहुत ज़ोर का सैलाब [flood] उठा, तो हमने तुम्हें एक तैरती हुई नाव में सवार कर के बचा लिया, (11)
और इस (घटना) को तुम्हारे लिए (याद रखनेवाली) नसीहत [Reminder] बना दिया : ध्यान से सुननेवाले कान उसे (सुन कर) याद रखें। (12)
जब नरसिंघे [trumpet] में एक बार फूंक मार कर बजा दिया जाएगा, (13)
जब ज़मीन और उसके पहाड़ों को ऊँचा उठाया जाएगा और फिर एक ही झटके में चूर चूर कर दिया जाएगा, (14)
सो उस दिन (क़यामत की) वह महान घटना सामने आ खड़ी होगी। (15)
उस दिन आसमान (सारे पिंडों के साथ) फट जाएगा, और वह बहुत कमज़ोर पड़ जाएगा। (16)
और फरिश्ते उसके सभी किनारों पर खड़े होंगे और, उनमें से आठ फ़रिश्ते आपके रब के सिंहासन को उस दिन, उनके ऊपर उठाए हुए होंगे। (17)
उस दिन तुम (अपने कर्मों के) फ़ैसले के लिए अल्लाह के सामने पेश किए जाओगे, और तुम्हारी कोई भी राज़ की बात, छुपी नहीं रहेगी। (18)
फिर जिस किसी को उसके कर्मों का लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वह (खुशी से) कहेगा, “लोगो, यह मेरे कर्मों का हिसाब है, आओ इसे पढ़ लो। (19)
मैं तो पहले से जानता था कि मुझे (अपने कर्मों के) हिसाब का सामना करना होगा,” (20)
और इस तरह वह सुखी व मनपसंद ज़िंदगी गुज़ारेगा (21)
(जन्नत के) उस ऊँचे बाग़ में, (22)
जिसके फलों के गुच्छे (लदे होने के कारण) झुके पड़े होंगे। (23)
(उनसे कहा जाएगा) : "खूब मज़े से खाओ और पियो उन (अच्छे कर्मों) के बदले, जो तुमने गुज़रे हुए (जीवन के) दिनों में किए थे।" (24)
रहा वह आदमी जिसके कर्मों का हिसाब उसके बाएं हाथ में दिया जाएगा, तो वह कहेगा, “काश! मुझे मेरे कर्मों का हिसाब दिया ही न जाता (25)
और मैं अपने हिसाब-किताब के बारे में कुछ नहीं जानता। (26)
काश! कि मेरी मौत पर ही मेरा काम तमाम हो चुका होता! (27)
(आज) मेरी दौलत मेरे किसी काम की न रही, (28)
और मेरी शक्ति (और सत्ता भी) खो चुकी है।” (29)
(आदेश होगा), “पकड़ो उसे, और उसके गले में तौक़ [Collar] पहना दो, (30)
और उसे ले जाकर जहन्नम (की भड़कती हुई आग) में झोंक दो, (31)
और उसे ऐसी ज़ंजीर में जकड़ दो जिसकी लम्बाई सत्तर हाथ हो : (32)
वह बड़ी महिमावाले अल्लाह पर ईमान नहीं रखता था, (33)
वह कभी भी ग़रीब मुहताज को खाना खिलाने पर नहीं उभारता था, (34)
सो आज के दिन यहाँ उसका कोई भी असली दोस्त व मददगार नहीं है, (35)
और खाने के लिए उसके पास सिवाए पीप के और कुछ नहीं (36)
जिसे केवल गुनाहगार खाते हैं,” (37)
सो मैं क़सम खाता हूँ उन चीज़ों की, जो तुम देख सकते हो, (38)
और इन चीजों की (भी) जिन्हें तुम नहीं देख सकते : (39)
बेशक यह (कुरआन) एक बहुत इज़्ज़तवाले व महान रसूल पर (अल्लाह द्वारा उतारी गयी) वाणी है, (40)
ये किसी कवि के शब्द नहीं हैं ---- (मगर अफ़सोस!) तुम कितना कम विश्वास करते हो! ---- (41)
न ही किसी भविष्यवक्ता की कही हुई बातें हैं ---- (मगर) तुम सोच-विचार कितना कम करते हो! (42)
यह (क़ुरआन) सारे जहाँनों के रब की तरफ से भेजा गया संदेश है : (43)
अगर (मान लो कि) यह पैग़म्बर [Prophet] हमारी वाणी में कोई (एक) बात भी झूठी गढ कर कह देते, (44)
तो (याद रखो!) हम ज़रूर उनका दाहिना हाथ पकड़ लेते, (45)
और उनकी मुख्य रग [life artery] काट डालते, (46)
फिर तुम में से कोई भी उनका बचाव नहीं कर पाता। (47)
यह (कुरआन) अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचनेवालों के लिए एक नसीहत [Reminder] है। (48)
हम जानते हैं कि तुम में से कुछ लोग (इस सच्चाई को) झुठ मानते हैं ---- (49)
विश्वास न करनेवालों के लिए यह (क़ुरआन) एक दुखद पछतावे (का कारण) है ---- (50)
मगर असल में यह एकदम सच है। (51)
सो (ए रसूल!) आप महानता वाले रब के नाम का गुणगान करते रहें। (52)
सूरह 70 : अल- मआरिज [The Ways of Ascent]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
एक आदमी ने (मज़ाक़ उड़ाते हुए) सज़ा दिए जाने की मांग की थी। (1)
यह विश्वास न करनेवालों पर आ पड़ेगी ----- कोई नहीं है जो इसे टाल सके ---- (2)
(वह यातना) अल्लाह की तरफ से आएगी जो चढने वाले तमाम आसमानी रास्तों का मालिक है, (3)
(जिससे हो कर) फरिश्ते और रूह [जिबरील], उस (अल्लाह) तक एक दिन में चढकर जाते हैं, जिस दिन की लम्बाई (इस दुनिया के हिसाब से) पचास हजार साल की है। (4)
तो (ए रसूल!), आप धीरज से काम लें, जो आपके लिए बहुत अच्छा होगा. (5)
विश्वास न करनेवाले (तो) उस (क़यामत के दिन) को दूर समझते हैं, (6)
मगर हम जानते हैं कि वह (दिन) नज़दीक ही है. (7)
(वह यातना उस दिन आएगी) जिस दिन आसमान पिघले हुए ताम्बे (या तेल की तलछट) की तरह हो जाएगा, (8)
और पहाड़ (धुनी हुई) रंगीन ऊन की तरह हो जाएंगे, (9)
जब कोई दोस्त अपने किसी दोस्त को पूछेगा तक नहीं, (10)
यहां तक कि वह एक दूसरे की नज़र के सामने दिखायी भी दे जाएंगे। अपराधी आदमी यह इच्छा करेगा कि उस दिन की यातना (से रिहाई) के बदले में अपने बेटे को कुर्बान कर दे, (11)
अपनी पत्नी, अपने भाई (दे डाले), (12)
अपना (पूरा) ख़ानदान (भी दे दे) जो उसे शरण देता था, (13)
और जितने लोग भी जमीन में रहते हैं, इन सबको (बदले में दे कर) अपने आपको (यातना से) बचा ले। (14)
लेकिन नहीं! वह (जहन्नम) तो एक भड़कती हुई आग है, (15)
(सिर और बदन के) सभी अंगों की खाल उतार देने वाली है, (16)
वह हर उस आदमी को बुला लेगी जिसने (सच्चाई से) पीठ फेरी और मुँह मोड़ा होगा, (17)
और (जिसने) धन दौलत इकट्ठा की, फिर उसे जमा कर कर के रखा [लोगों को बाँटा नहीं]। (18)
सचमुच इंसान बड़ा अधीर (और लालची) पैदा हुआ है : (19)
जब उसे कोई मुसीबत (या हानि) पहुंचती है, तो बहुत घबरा जाता है। (20)
और जब उसके पास भलाई (या ख़ुशहाली) आती है, तो कंजूसी करने लगता है। (21)
मगर नमाज़ अदा करने वाले (लोगों की बात अलग है), (22)
जो अपनी नमाज़ की हमेशा पाबंदी करते हैं; (23)
जो अपने धन में से उचित हिस्सा देते हैैं (24)
मांगनेवाले और ज़रूरतमंदों को; (25)
जो फ़ैसले के दिन पर विश्वास रखते हैं, (26)
और जो अपने रब की यातना से डरे सहमे रहते हैं ---- (27)
इस (यातना) से कोई भी अपने आपको पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता ----- (28)
जो लोग अपनी इज़्ज़त [chastity] (सभी से) बचाकर रखते हैं, (29)
अपनी पत्नियों या अपने अधिकार में आयी हुई दासियों [लौंडियों] को छोड़कर ---- क्योंकि इस (तरह के रिश्तों) में उन लोगों पर कोई दोष नहीं है, (30)
सो जिस किसी ने (अपनी बीवी या दासी के साथ शारीरिक संबंध के) अतिरिक्त कुछ और (रिश्ता बनाना) चाहा, तो ऐसे ही लोग सचमुच मर्यादा तोड़नेवाले हैं ---- (31)
जो अपने पास रखी गयी अमानतों [trusts] की हिफ़ाज़त करते हैं, और (किये गये) वादों को निभाते हैं; (32)
जो अपनी गवाहियों को ठीक-ठीक ईमानदारी से देते हैं और उन पर क़ायम रहते हैं (33)
और अपनी नमाज़ों को पाबंदी से व सही तरीक़े से पढ़ा करते हैं। (34)
तो यही लोग हैं जिनकी परम आनंद के बाग़ों [जन्नतों] में बड़ी इज़्ज़त होगी। (35)
[ऐ रसूल!] इन काफ़िरों को क्या हो गया है कि (आप को क़ुरआन पढते देख) आपकी ओर चढे चले आ रहे हैं, (36)
दाएँ से (भी) और बायीं ओर से (भी), टोलियाँ बना बना कर [वे जन्नत में जाने के बारे में रसूल का मज़ाक़ उड़ाते और कहते थे कि आपसे पहले हमलोग जन्नत में जाएंगे]। (37)
क्या उनमें से हर आदमी यह लालसा रखता है कि वह (बिना ईमान और अच्छे कर्म किए) नेमतों वाली जन्नत में चला जाए? (38)
कभी नहीं! हमने उन्हें उस चीज़ से पैदा किया है जिसे वह (ख़ुद भी) जानते हैं, (39)
और, मैं क़सम खाता हूँ पूरब और पश्चिम के सभी स्थानों के रब की (जहाँ से सितारे निकलते और डूबते हैं), कि बेशक हम पूरा सामर्थ्य रखते हैं, (40)
इस बात पर, कि उन लोगों की जगह उनसे बेहतर लोग ले आएं ---- और ऐसा करने से कोई हमें रोक नहीं सकता। (41)
सो आप उन्हें छोड़ दीजिए कि वे बेकार की बातों और खेल तमाशों में पड़े रहें, यहाँ तक कि उस दिन से उनका सामना हो जाए, जिसका उनसे वादा किया जा रहा है, (42)
उस दिन वह अपनी क़ब्रों से इस तरह हड़बड़ाते हुए बाहर निकल आएंगे, जैसे वे किसी झंडे के पीछे दौड़े जा रहे हों, (43)
उनकी आँखें (शर्म से) झुकी होंगी और ज़िल्लत उन पर छायी होगी : यही वह दिन होगा जिसके बारे में उन्हें चेतावनी दी जाती थी। (44)
सूरह 78 : अन नबा
[(क़यामत की) घोषणा / The Announcement]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ये (काफ़िर) लोग आपस में किस (चीज़) के बारे में सवाल कर रहे हैं? (1)
उस सबसे महत्वपूर्ण घोषणा [क़यामत] की (2)
जिसके बारे में वे मतभेद रखते हैं। (3)
(यह घोषणा इंकार के योग्य) नहीं! उन्हें (सच्चाई का) पता लग जाएगा। (4)
अंत में उन्हें सचमुच पता लग जाएगा। (5)
क्या हमने धरती को फ़र्श की तरह (आराम करने के लिए) बिछा नहीं दिया, (6)
और इसका संतुलन बनाए रखने के लिए (इसमें) पहाड़ों को गाड़ दिया? (7)
क्या हमने तुम्हें (नस्ल बढाने के लिए) जोड़े में पैदा नहीं किया, (8)
हमने (थकान से) आराम के लिए तुम्हें नींद दी, (9)
रात को (उसके अंधेरे के कारण) पर्दा डाले हुई बनाया, (10)
और हमने दिन को रोज़ी-रोटी कमाने का (समय) बनाया? (11)
और (देखो!) क्या हमने तुम्हारे ऊपर सात मजबूत (आसमान) नहीं बनाए, (12)
और (सूरज को) रौशनी और ताप का (ज़बरदस्त) स्रोत बनाया? (13)
क्या हमने भरे बादलों से मूसलाधार पानी नहीं बरसाया (14)
ताकि हम इस (बारिश) के द्वारा (धरती से) अनाज और वनस्पति उगाएँ, (15)
और घने-घने उद्यान (उगाएँ)? (16)
फ़ैसले के दिन [क़यामत] के लिए एक समय तय किया हुआ है : (17)
जिस दिन नरसिंघा [Trumpet] फूँक कर बजा दिया जाएगा, तो तुम गिरोह के गिरोह (अल्लाह के सामने) चले आओगे, (18)
और जब आसमान (की पर्तें को) फाड़ दिया जाएगा, तो (फटने से जैसे) वह चौड़े-चौड़े दरवाजों की तरह खुल जाएगा, (19)
और जब पहाड़ (धुआँ बनकर उड़ा दिए जाएंगे, तो वे) मिरीचिका की तरह (नज़र का धोखा मात्र होकर) ग़ायब हो जाएंगे। (20)
जहन्नम (बुरे लोगों की ताक में) घात लगाकर बैठी हुई है, (21)
(सच्ची बातों को न मानने वाले) ज़ालिमों का यही घर होगा, (22)
(जहाँ) उन्हें बहुत लम्बे लम्बे समय तक पड़े रहना है, (23)
न वे इसमें (किसी तरह की) ठंढक का मज़ा चखेंगे, और न किसी पीने की चीज़ का, (24)
सिवाए खौलते हुए पानी और (जहन्नमियों के घावों से) बहती हुई पीप के ---- (25)
यही (उनके कर्मों का) एकदम सही बदला है, (26)
क्योंकि वे (फैसले के दिन होनेवाले) हिसाब-किताब से बिल्कुल नहीं डरते थे, (27)
और उन्होंने हमारे संदेशों [आयतों] को झुठ मानते हुए ठुकरा दिया। (28)
हमने हर (छोटी बड़ी) चीज़ को लिखकर खाते में सुरक्षित कर रखा है। (29)
(ऐ इंकार करने वालो!), “अब तुम (अपने किए का) मजा चखो : हमारी तरफ़ से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, सिवाए और अधिक यातना के।” (30)
जो लोग अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचनेवाले हैं, उनके लिए सबसे बड़ी कामयाबी है : (31)
(उनके लिए) निजी बाग़ होंगे और अंगूर (के बाग़ीचे), (32)
ख़ूबसूरत भरी-पूरी, बराबर उम्र की साथी (companions) (होंगी), (33)
और (तहूर के) छलकते हुए जाम (होंगे). (34)
वहाँ वे (लोग) कोई बेकार या झूठी बात नहीं सुनेंगे : (35)
यह तुम्हारे रब की तरफ से इनाम होगा, और एक उपयुक्त तोहफा होगा, (36)
उस रब की तरफ़ से जो आसमानों और ज़मीन का, और जो कुछ इन दोनों के बीच में है, (सब) का पालनहार है, बड़ी ही रहमतवाला है.
(लेकिन क़यामत के दिन उसके रोब व जलाल का हाल यह होगा कि) उन्हें अल्लाह के सामने कुछ बोलने की अनुमति नहीं होगी। (37)
उस दिन जब जिबराईल [रूहुल अमीन] और (सभी) फरिश्ते क़तार में खड़े होंगे, वे कुछ नहीं बोलेंगे सिवाए उनके, जिन्हें रहम करनेवाले रब [रहमान] ने बोलने की इजाज़त दी हो, और जो वही बात कहेगा जो सही हो। (38)
वह (फैसले का) दिन तो सच्चाई का दिन है। अत: जो कोई (कामयाबी) चाहता है, उसे ऐसा रास्ता अपनाना चाहिए जो उसके रब के पास ले जाता हो। (39)
हमने तुम्हें उस यातना से सावधान कर दिया है जो जल्द ही आनेवाली है, उस दिन जब हर आदमी उन (कर्मों) को अपनी आँखों से देख लेगा जो उसके हाथों ने आगे भेज रखे हैं, और जब विश्वास न रखनेवाला कहेगा, "काश! मैं मिट्टी होता! (कि यातनाओं से बच जाता!)" (40)
सूरह 79 : अन नाज़ियात
[वे (फ़रिश्ते) जो हवा में तैरते हुए जाते हैं / Those Who Fly Out]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
उन (फरिश्तों) की क़सम, जो (काफ़िरों की आत्मा) सख्ती से खींच लेते हैं, (1)
और उन (फरिशतों) की क़सम, जो (ईमानवालों की रूह) आसानी से निकाल ले जाते हैं, (2)
जो (ज़मीन और आसमान के बीच) तेजी से तैरते हुए जाते हैं, (3)
और जो (आदेश को पूरा करने के लिए) दौड़ते हुए (दूसरों से) आगे बढ़ जाते हैं, (4)
ताकि उन कामों को पूरा कर दें, (जो उन्हें सौंपा जाता है), (5)
उस दिन जब (अचानक एक ज़ोरदार धमाके के साथ) भूँचाल आ जाएगा, (6)
उसके बाद एक और ज़ोर का झटका आएगा (और क़यामत आ जाएगी), (7)
लोगों के दिल (मारे डर और घबराहट के) बुरी तरह धड़क रहे होंगे (8)
और उनकी आँखें झुकी होंगी। (9)
(मक्का के विश्वास न करनेवाले लोग) कहते हैं : “क्या? हमें (पहले की तरह) फिर से ज़िंदगी दी जाएगी, (10)
जबकि हम सड़ी-गली हड्डियों में बदल चुके होंगे?" (11)
और वे कहते हैं, “(पुरानी हालत में लौटना मुमकिन नहीं!) अगर ऐसा हुआ, तो यह बड़े घाटे की वापसी होगी।" (12)
मगर (यह कोई मुश्किल नहीं), बस एक ही धमाका काफ़ी होगा, (13)
और वे सब खुले मैदान में (अपनी पुरानी हालत में) लौटकर इकट्ठा हो जाएंगे। (14)
(ऐ रसूल!) क्या आपने मूसा [Moses] की कहानी सुनी है? (15)
जब उनके रब ने (सीना/Sinai के रेगिस्तान में) तुवा [Tuwa] की पवित्र घाटी में उन्हें पुकारा था : (16)
(और आदेश दिया था कि) फ़िरऔन [Pharaoh] के पास जाओ कि उसने लोगों पर ज़ुल्म व अत्याचार करने की हर सीमा पार कर दी है, (17)
और (उससे) पूछो, “क्या तू चाहता है कि तू (गुनाहों से) पाक-साफ़ हो जाए? (18)
और क्या तू चाहता है कि मैं तेरे रब की तरफ तेरा मार्गदर्शन करूँ, ताकि तू (उसके सामने झुके और उससे) डरने लगे?” (19)
फिर मूसा ने उसे बड़ी ज़बरदस्त निशानी दिखाई (जब लाठी साँप में बदल गयी और उनका हाथ चमकने लगा), (20)
मगर फ़िरऔन ने इन (निशानियों) को ठुकरा दिया, और विश्वास करने से इंकार कर दिया। (21)
उसने (सच्ची बातों से) मुँह मोड़ लिया और जल्दी जल्दी (मूसा के विरोध में), (22)
उसने (लोगों को) जमा किया और पुकार कर कहने लगा, (23)
“मैं तुम्हारा सबसे बड़ा स्वामी हूँ,” (24)
नतीजा यह हुआ कि अल्लाह ने उसे दोहरी सज़ा में पकड़ लिया, आनेवाली ज़िन्दगी में भी और इस ज़िंदगी में भी : (25)
सचमुच इस (घटना) में हर उस आदमी के लिए बड़ी शिक्षा है जो अल्लाह का डर रखता हो। (26)
किसे पैदा करना ज़्यादा कठिन काम है : तुम लोगों को या पूरे आसमान [ब्रह्मांड] को, जिसे उसने बनाया, (27)
उसने आकाश के सभी पिंडों को (पैदा कर के) बुलंद किया, फिर (उनकी संरचना और चक्कर लगाने की गतियों में संतुलन पैदा करके) उन्हें ठीक-ठाक किया, (28)
फिर रात को अंधेरी बनाया और सुबह को चमकदार उजाले के साथ निकाला, (29)
उसी ने ज़मीन को भी (रहने लायक़ बनाने के लिए) बिछा दिया, (30)
ज़मीन (के अंदर) से उसका पानी और चारा [pastures] निकाला, (31)
और ज़मीन में ठोस पहाड़ों को जमा दिया, (32)
(ये सब कुछ) तुम्हारे और तुम्हारे चौपायों के फ़ायदे के लिए किया? (33)
फिर जब हर चीज़ पर छा जानेवाली आफ़त [क़यामत] आ जाएगी, (34)
उस दिन आदमी अपना सब किया-धरा याद करेगा, (35)
और हर देखने वाले के लिए जहन्नम ज़ाहिर कर दी जाएगी। (36)
फिर जिस आदमी ने सारी सीमाएं तोड़ी [सरकशी की] होंगी (37)
और इसी संसार की ज़िंदगी को (आखिरत/परलोक के मुक़ाबले) ज़्यादा पसंद किया होगा, (38)
तो जहन्नम ही (उसका) ठिकाना होगा; (39)
और जो आदमी अपने रब के सामने खड़े होने से डरता रहा, और उसने (अपने) मन को (बुरी) इच्छाओं से रोके रखा, (40)
तो जन्नत ही (उसका) ठिकाना होगा। (41)
(विश्वास न करनेवाले लोग) आप [पैग़म्बर] से क़यामत के बारे में पूछते हैं कि, “वह घड़ी कब आएगी?”, (42)
मगर आप उन्हें यह कैसे बता सकते हैं? (43)
उस (क़यामत) के आने का ठीक समय तो केवल आपके रब को ही मालूम है; (44)
आप तो केवल इसलिए भेजे गए हैं ताकि आप उन लोगों को सावधान कर दें, जो इस (क़यामत) से डरते हों. (45)
जिस दिन वे उसको देख लेंगे, तो उन्हें ऐसा लगेगा मानो वे (दुनिया में) एक शाम या उसकी सुबह से अधिक ठहरे ही नहीं थे। (46)
सूरह 82 : अल इंफ़ितार
[चीर कर अलग कर देना / Torn Apart]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब आसमान चीर कर अलग कर दिया जाएगा, (1)
जब तारे (और ग्रह) गिर कर बिखर जाएंगे, (2)
जब समुंदर भड़क उठेंगे (और अपने किनारे तोड़ डालेंगे), (3)
जब क़ब्रें उखाड़ दी जाएंगी (और मुर्दे बाहर निकाल दिये जाएंगे) : (4)
तो हर आदमी जान लेगा कि क्या (अच्छा/बुरा कर्म) उसने (दुनिया में) किया है, और क्या (कर्म) छोड़ आया है जो वह नहीं कर सका। (5)
ऐ इंसान! तुझे किस चीज़ ने अपने रहम करनेवाले रब [रहमान] के बारे में धोखे में डाल रखा है? (6)
जिसने तुझे पैदा किया, फिर उसने तुझे (ढाँचा और अंग बनाने के लिए) ठीक-ठाक किया, फिर तेरी संरचना को सही अनुपात दिया, (7)
जिस रूप में भी चाहा, उसने तुझे जोड़ कर तैयार कर दिया? (8)
फिर भी तुम उस फैसले के दिन को अभी तक झूठ जानते हो! (9)
हालांकि तुम पर निगरानी रखनेवाले [फ़रिश्ते] निर्धारित हैं, (10)
(जो) बहुत सम्मानित हैं, (तुम्हारे कर्मों का लेखा-जोखा) लिखते रहते हैं, (11)
वह उन (सभी कार्यों) को जानते हैं जो तुम करते हो : (12)
अच्छा कर्म करनेवाले (जन्नत की) नेमतों में आनंद से होंगे, (13)
और बुरे कर्म वाले जहन्नम (की भड़कती हुई आग) में जलेंगे। (14)
वे इसमें फैसले के दिन [क़यामत] दाखिल होंगे, (15)
और वे इस (नरक) से (कभी भी) भाग नहीं सकेंगे। (16)
और आपने क्या समझा कि वह फैसले का दिन क्या है? (17)
हाँ! आपको क्या मालूम कि फैसले का दिन क्या है? (18)
(यह) वह दिन होगा जब कोई भी जान किसी दूसरे के लिए कुछ भी नहीं कर सकेगी; और उस दिन (हर) आदेश, अल्लाह का ही चलेगा। (19)
सूरह 84 : अल इंशिक़ाक़ [फट पड़ना / Ripped Apart]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब आसमान फट पड़ेगा, (1)
अपने रब का आदेश मानते हुए, कि यही करना उस (आसमान) के लिए ज़रूरी होगा, (2)
जब ज़मीन (खींच करके) फैला दी जाएगी, (3)
तो जो कुछ उसके अंदर है उसे बाहर फेंक देगी, और ख़ाली हो जाएगी, (4)
अपने रब का आदेश मानते हुए, कि यही करना उस (ज़मीन) के लिए ज़रूरी होगा, (5)
ऐ इंसान! तू अपने रब तक पहुंचने में (ज़िंदगी भर) भारी मेहनत करता रहा, अंतत: तू उस (रब) से जा मिलेगा : (6)
तो जिस आदमी के कर्मों का लेखा-जोखा उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा, (7)
तो उससे आसान सा हिसाब लिया जाएगा (8)
और वह अपने घरवालों के पास खुशी-खुशी लौटेगा। (9)
मगर जिस किसी को उसका लेखा-जोखा उसकी पीठ के पीछे से (बायें हाथ में) दिया जाएगा, (10)
तो वह अपनी बर्बादी को पुकार उठेगा ------ (11)
वह जहन्न्म की भड़कती हुई आग में जलेगा। (12)
वह (दुनिया में) अपने परिवार के साथ हँसी खुशी रहा करता था। (13)
उसको ऐसा लगता था कि (अल्लाह के सामने) वह कभी लौट कर नहीं जाएगा ---- (14)
सचमुच! (वह ज़रूर लौटेगा!) उसका रब उसको देख रहा था। (15)
मुझे क़सम है सूरज डूबने के समय की लाली की, (16)
क़सम है रात की, और उन चीजों की जिन्हें वह ढक लेती है, (17)
और क़सम है चांद की, जब वह (बढ़ते-बढ़ते) पूरा दिखाई देता है, (18)
तुम (जीवन के) एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक [बचपन, जवानी, अधेड़ उम्र, बुढापा] इसी तरह से बढ़ते जाओगे। (19)
तो वे (सच्चाई पर) विश्वास क्यों नहीं करते? (20)
जब उनके सामने कुरआन पढ़ी जाती है, तो वे (अल्लाह के सामने) सज्दे में क्यों नहीं झुक जाते? (21)
नहीं! बल्कि विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] लोग क़ुरआन को ठुकरा देते हैं ---- (22)
अल्लाह बेहतर जानता है जो कुछ इन लोगों ने अपने अंदर छिपा रखा है---- (23)
सो आप उन्हें दर्दनाक यातना की ख़ुशख़बरी सुना दें। (24)
मगर जो लोग विश्वास रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, तो उनके लिए कभी ख़त्म न होने वाला इनाम [reward] होगा। (25)
सूरह 30 : अर रुम [पूर्वी रोमन साम्राज्य, The Byzantines]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)
रोम (साम्राज्य की सेना) को (फ़ारस के हाथों) हार हुई है, (2)
नज़दीक के देश [सीरिया के आसपास हुए युद्ध] में। (मगर देखना) वे अपनी हार को जीत में बदल देंगे, (3)
कुछ ही साल [3 - 9 वर्ष] की अवधि में (रोम की सेना की जीत होगी) --- हर मामले में अल्लाह को ही पूरा अधिकार है, पहले भी और आख़िर में भी। और उस दिन ईमान रखनेवाले अल्लाह की मदद से होनेवाली (रोमियों की फ़ारस पर) जीत की ख़ुशियां मनाएंगे। (4)
वह जिसकी चाहता है, मदद करता है : वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, दयावान है। (5)
यह अल्लाह का वादा है : अल्लाह अपने वादे को कभी नहीं तोड़ता है। मगर अधिकतर लोग यह बात नहीं जानते : (6)
वे तो इस सांसारिक जीवन के केवल बाहरी रूप को ही जानते हैं। किन्तु आने वाली दुनिया [आख़िरत] के बारे में वे बिलकुल ही अंजान बने हुए हैं। (7)
क्या उन्होंने ख़ुद अपने बारे में सोच-विचार नहीं किया? अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच है, उन्हें बिना किसी ख़ास मक़सद के और बिना एक तय की हुई अवधि के, यूँ ही नहीं पैदा कर दिया है, मगर फिर भी, सचमुच बहुत-से लोग इस बात को मानने से इंकार करते हैं कि उन्हें (एक दिन) अपने रब के सामने जाना होगा। (8)
क्या वे ज़मीन पर यहाँ-वहाँ चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का क्या अंजाम हुआ जो उनसे पहले वहां रहते थे? वे ताक़त में इन लोगों से कहीं अधिक ज़ोर रखते थे : उन्होंने धरती में खेतों की अधिक जुताई की थी और उस पर बस्तियों के निर्माण भी कहीं अधिक किए थे। उनके पास भी उनके रसूल साफ़-साफ़ निशानियाँ लेकर आए थे : (मगर उन्होंने सच्चाई को न माना और तबाह हुए), सो अल्लाह तो ऐसा न था कि उन पर ज़ुल्म करता, किन्तु वे स्वयं ही अपने आप पर ज़ुल्म करने वाले थे। (9)
बाद में शैतानी करने वाले लोगों का अंजाम बहुत बुरा हुआ, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की आयतों को झूठ माना और उनकी (बराबर) हंसी उड़ाते रहे। (10)
अल्लाह ही सृष्टि कर के जीवन की शुरुआत करता है, फिर वही उसको दोबारा पैदा करेगा, और फिर उसी की ओर तुम्हें लौट कर जाना होगा। (11)
और जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ खड़ी होगी, उस दिन गुनाहगार एकदम से निराश हो जाएँगे। (12)
उनलोगों ने जिनको (शक्ति में) अल्लाह के बराबर का साझेदार [Partners] मान रखा था, उनमें से कोई भी उनके लिए सिफ़ारिश करनेवाला न होगा---- और वे स्वयं ही इन (झूठे) साझेदारों को मानने से इंकार कर देंगे। (13)
और जब (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, उस दिन लोगों को अलग-अलग (समूह में) बाँट दिया जाएगा : (14)
अतः जिन लोगों ने ईमान रखा था और अच्छे कर्म किए थे, वे बाग़ [जन्नत] में खुशियाँ मनाएंगे, (15)
किन्तु जिन लोगों ने (सच्चाई को) मानने से इंकार किया था, और हमारी आयतों [संदेशों] को और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में हमारे सामने होने वाली पेशी को झूठ जाना था, वे सज़ा के लिए वहां पकड़ कर लाए जाएँगे। (16)
अतः अल्लाह की महानता का गुणगान करो, शाम में भी और सुबह में भी ---- (17)
और आसमानों और ज़मीन में सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं, ---- सो (अल्लाह का गुणगान करो) तीसरे पहर सूरज ढलने के समय भी और दोपहर में भी। (18)
वह बेजान चीज़ से जीवित चीज़ को निकाल लाता है, और जीवित चीज़ से बेजान चीज़ को निकाल लाता है। वह मुर्दा पड़ी हुई धरती में (बारिश के द्वारा) फिर से जान डाल देता है, इसी तरह तुम भी (क़ब्रों से ज़िंदा) निकाले जाओगे। (19)
यह उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया---- और फिर देखते देखते तुम आदमी बन गए, और धरती पर दूर दूर तक फैल गए। (20)
और यह भी उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हीं लोगों में से तुम्हारे लिए (मर्द-औरत के रूप में) जोड़े पैदा कर दिए, ताकि तुम उनके साथ शान्ति व सुकून से रह सको : और उसने तुम्हारे बीच आपस में प्रेम और दया का भाव पैदा कर दिया। सचमुच इसमें उन लोगों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं जो सोच-विचार करते हैं। (21)
उसकी एक और निशानियों में से है आसमानों और ज़मीन को बनाना, और उसमें पायी जानेवाली विविधता -- तुम्हारी भाषाओं की और तुम्हारे (शरीर के) रंगों की। सचमुच उन लोगों के लिए इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं जो जानकारी रखते हैं। (22)
और उसकी निशानियों में से तुम्हारा रात और दिन के समय का सोना, और (रोज़ी के लिए) उसके फ़ज़ल [bounty] की तलाश करना भी है। सचमुच ही इसमें निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो सुनना चाहते हों। (23)
और उसकी निशानियों में से यह भी है कि वह तुम्हें बिजली की चमक दिखाता है जिससे डर भी लगता है और उम्मीद भी जागती है; और वह आसमान से पानी बरसाता है जिससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन में फिर से जान पड़ जाती है। सचमुच इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो बुद्धि से काम लेते हैं। (24)
और उसकी निशानियों में से यह भी है कि आसमान और ज़मीन उसके आदेश से मज़बूती से जमे हुए हैं। आख़िर में, जब वह तुम्हें एक बार ज़मीन से पुकारेगा, उसी वक़्त तुम सब (उसकी ओर) निकल पड़ोगे। (25)
आसमानों और ज़मीन में हर एक चीज़ का वही मालिक है, और तमाम चीज़ें उसकी इच्छा का पालन करती हैं। (26)
वही (अल्लाह) है जिसने सृष्टि की पहली बार रचना की थी। फिर वही उसको दोबारा बना देगा---- और यह उसके लिए पहले से ज़्यादा आसान होगा। वह आसमानों और ज़मीन में किसी भी तरह की तुलना से परे है; वह सबसे ज़्यादा ताक़तवाला और गहरी समझ-बूझ रखनेवाला है। 27)
वह तुम्हें एक उदाहरण देता है, जो ख़ुद तुम्हारी ज़िंदगी से लिया गया है : जो कुछ माल हम ने तुम्हें दे रखा है, क्या तुम अपने ग़ुलाम को (अपने माल में) बराबर- बराबर का हिस्सेदार [Partner] बना सकते हो? क्या तुम उनसे (बिना पूछे ख़र्च करने से पहले) ऐसे ही डरोगे जैसे आपस में (अपने हिस्सेदारों से) डरते हो? इसी तरह से हम अपने संदेशों [आयतों] को उन लोगों के लिए साफ़ व स्पष्ट रूप से पेश करते हैं जो समझ-बूझ से काम लेते हैं। (28)
और तब भी (सच्चाई से) इंकार करनेवाले [बहुदेववादी, Idolaters] बिना (सच्चाई की) जानकारी के अपनी इच्छाओं के पीछे भागते फिरते हैं। मगर जिसे अल्लाह ही भटकता छोड़ दे, उसे कौन मार्ग दिखा सकता है? कोई नहीं होगा जो इनकी मदद कर सके। (29)
अतः [ऐ रसूल], पक्के ईमानवाले होने के नाते, अपने मज़हब [दीन] पर पूरी भक्ति से मज़बूती के साथ जमे रहें। यह एक प्राकृतिक स्वभाव [फ़ितरत] है जिसे अल्लाह ने हर आदमी में डाल कर पैदा किया है--- अल्लाह की बनाई हुई संरचना बदली नहीं जा सकती--- यही सीधा व सही दीन है, किन्तु अधिकतर लोग मानते नहीं हैं। (30)
तुम सब, पूरी भक्ति से (तौबा के लिए) केवल उसी की ओर झुका करो। तुम्हें उससे डरते हुए बुराइयों से बचते रहना चाहिए; नमाज़ को पाबंदी से पढ़ा करो; और उनलोगों के साथ शामिल न हो जाओ जो अल्लाह के साथ उसका साझेदार [partner] ठहराते हैं, (31)
या जिन्होंने अपने दीन [धर्म] को कई फ़िरक़ों [sects] में बाँट दिया, हर फ़िरक़े के पास जो कुछ है, उसी में ख़ुश और मगन है। (32)
और जब लोगों को कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो वे अपने रब को पुकारते हैं और मदद के लिए उसी की ओर झुकते हैं, मगर जैसे ही वह उन्हें अपनी दयालुता का रस चखाता है--- तो क्या देखते हैं कि --- उनमें से कुछ लोग अचानक (किसी और को) अपने रब का साझेदार [partners] ठहराने लगते है़ं, (33)
और (ऐसा लगता है कि) जो कुछ हमने उन्हें दिया था, उसके बदले में वे जान-बूझ कर शुक्र तक अदा करना नहीं चाहते। "अच्छा तो मज़े उड़ा लो, जल्द ही तुम्हें पता चल जाएगा!" (34)
या क्या हमने उन पर ऐसा कोई प्रमाण उतारा है जो अल्लाह के साथ (किसी को) साझेदार ठहराने की अनुमति देता हो? (35)
और हम जब लोगों को अपनी रहमत [mercy] का मज़ा चखने देते हैं, तो वे उस पर बहुत ख़ुश हो जाते हैं, मगर जब उनके साथ कोई बुरी घटना घट जाती है ----और वह भी उन्हीं के करतूतों के कारण--- तो वे बहुत जल्द पूरी तरह निराश हो जाते हैं। (36)
क्या वे नहीं देखते कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढ़ा-चढ़ा कर देता है और (जिसके लिए चाहता है) रोज़ी को घटा देता है? सचमुच इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है, जो ईमान रखते हैं। (37)
अतः रिश्तेदार को, ज़रूरतमंद को और (ग़रीब) मुसाफ़िर को उनका हक़ देते रहो---- यह उनके लिए बेहतर है जिनका मक़सद अल्लाह की ख़ुशी हासिल करना हो : यही वह लोग हैं जो कामयाब होंगे। (38)
जो कुछ क़र्ज़ तुम ब्याज पर देते हो, ताकि लोगों के धन के ज़रिये तुम्हारी सम्पत्ति बढ़ जाए, तो वह अल्लाह की नज़रों में नहीं बढ़ती; मगर अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने की इच्छा से जो कुछ तुम दान (ज़कात) में देते हो, तो बदले में (अल्लाह के यहाँ) तुम कई गुना इनाम कमा लोगे। (39)
वह अल्लाह है जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हें रोज़ी दी, वह तुम्हें मौत भी देगा और उसके बाद तुम्हें दोबारा जीवित करेगा। क्या तुम्हारे ठहराए हुए (अल्लाह के) साझेदारों [Partners] में से कोई भी है जो इनमें से एक काम भी कर सके? महान है अल्लाह, और वह उनसे बहुत ऊँचा व बड़ा है जिन्हें वे (अल्लाह का) साझेदार मानते हैं। (40)
लोगों के ग़लत कामों के चलते थल [land] और जल [sea] में बिगाड़ [फ़साद, corruption] पैदा हो गया है, और अल्लाह उनके कुछ बुरे कामों के नतीजे में उन्हें अपनी सज़ा का मज़ा चखाएगा, ताकि वे उन (बुरे कामों) से अपने को रोक सकें। (41)
कह दें, "धरती में यहाँ-वहाँ चल-फिरकर देखो कि जो लोग तुमसे पहले गुज़रे हैं, उन लोगों का अंत किस तरह हुआ-- --- उनमें अधिकतर बहुदेववादी [Idolaters] ही थे।" (42)
अतः [ऐ रसूल] आप एक सच्चे व सही दीन की भक्ति में मज़बूती से जमे रहें, इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जिसे टाला न जा सके। उस दिन, मानव-जाति को अलग-अलग बाँट दिया जाएगा : (43)
जिन लोगों ने सच्चाई (को मानने) से इंकार किया था तो उनको इंकार करने का नतीजा भुगतना होगा, और जिन लोगों ने अच्छे कर्म किए थे तो उन्होंने अपने लिए अच्छी जगह बना ली होगी। (44)
अल्लाह अपने फ़ज़ल [bounty] से उन लोगों को इनाम देगा जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए; वह उन्हें पसंद नहीं करता जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं। (45)
और अल्लाह की निशानियों में से यह (भी) है कि वह (वर्षा की) ख़ुशख़बरी सुनानेवाली हवाएँ भेजता है, ताकि तुम उसकी रहमत [grace] का मज़ा उठा सको, और उसके हुक्म से (हवा के द्वारा) पानी में नौकाएं चल सकें, और तुम (उसमें यात्रा करके) अपने लिए रोज़ी तलाश कर सको, ताकि तुम (अल्लाह का) शुक्र अदा कर सको। (46)
[ऐ रसूल] आपसे पहले, हम हर रसूल को उनकी अपनी क़ौमों के पास भेज चुके हैं : वे उनके पास साफ़ व स्पष्ट प्रमाण लेकर आए, (मगर वे लोग न माने) और उसके बाद, हमने शैतानी करनेवालों को दंड दिया। मगर ईमानवालों की मदद करना तो हमारा कर्तव्य बनता है। (47)
अल्लाह ही है जो हवाओं को भेजता है; फिर वे बादलों में हलचल मचा देती हैं; फिर वह जिस तरह चाहता है उन बादलों को आसमान में फैला देता है; फिर उन परतोंवाली घटाओं के टुकड़े कर देता है, और तब तुम देखते हो कि उनके बीच से बारिश की बूँदें टपकी चली आती हैं। वह अपने बन्दों में से जिनपर चाहता है, पानी बरसाता है, और जब ऐसा होता है तो देखो कि कैसे वे ख़ुशियाँ मनाने लगते हैं, (48)
हालाँकि इससे पहले जब तक उन पर बारिश नहीं हुई थी, वे सारी उम्मीद छोड़ चुके थे। (49)
अब ज़रा देखो, अल्लाह की दयालुता [रहमत] की निशानियाँ! वह किस तरह से मुर्दा पड़ी हुई धरती में फिर से एक नई जान डाल देता है : वही अल्लाह मुर्दा पड़े हुए लोगों को भी (उसी तरह) फिर से ज़िंदा कर देगा---- और तमाम चीज़ें उसी के क़ब्ज़े में हैं। (50)
अगर हम एक (जला देनेवाली गर्म) हवा भेज दें, जिसके नतीजे में वे अपनी फ़सल को पीली पड़ी हुई देखे लें, तब भी वे विश्वास न करने पर अड़े रहेंगे। (51)
अतः [ऐ रसूल] आप मुर्दों को अपनी बात नहीं सुना सकते और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हैं, जबकि वे पीठ फेरे चले जा रहे हों; (52)
और न आप अंधों को ग़लत रास्ते से फेरकर सही मार्ग पर ला सकते हैं : आप तो केवल उन्हीं को अपनी बात सुना सकते हैं जो हमारी आयतों मॆं विश्वास रखते हैं और पूरी भक्ति के साथ (हमारे सामने) झुकते हैं। (53)
वह अल्लाह ही है जिसनें तुम्हें कमज़ोर पैदा किया, फिर कमज़ोरी के बाद तुम्हें ताक़त दी, ताक़त के बाद (बुढ़ापे में) फिर से कमज़ोरी दी और तुम्हारे बाल पक गए : वह जो कुछ चाहता है पैदा करता है, वह सब जाननेवाला, हर चीज़ पर क़ाबू रखनेवाला है। (54)
जिस दिन वह (क़यामत की) घड़ी आ जाएगी, गुनाहगार लोग क़समें खाएँगे कि वे (क़ब्रों में) घड़ी भर से अधिक नहीं ठहरे----(सचमुच) वे दुनिया में हमेशा से ही धोखे में पड़े रहे थे ---- (55)
किन्तु जिन लोगों को ज्ञान और ईमान दिया गया था, वे कहेंगे, "अल्लाह के लिखे हुए रिकार्ड के मुताबिक़ तो तुम असल में ‘दोबारा उठाए जाने के दिन’ तक (दुनिया में) ठहरे रहे थे : यही तो है ‘ज़िंदा उठाए जाने का दिन’ [Day of Resurrection], मगर तुम तो समझते ही न थे।" (56)
उस दिन शैतानी करनेवालों के कोई भी बहाने उनके किसी काम न आएंगे : उन्हें (अपनी ग़लतियों में) सुधार करने का कोई मौक़ा नहीं दिया जाएगा। (57)
हमने इस क़ुरआन में लोगों के सामने हर क़िस्म की मिसालें पेश कर दी हैं, इसके बावजूद अगर [ऐ रसूल], आप इनके सामने कोई चमत्कार भी ला कर दिखाएं, तब भी विश्वास न करनेवाले यही कहेंगे, "तुम तो बस झूठ गढ़ते हो।" (58)
इस तरह से, अल्लाह उन इंकार पर अड़े हुए लोगों के दिलों को ठप्पा [seal] लगा (कर बंद कर) देता है जो समझते ही नहीं हैं। (59)
अतः धीरज [सब्र] से काम लें, निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है : ऐसे लोगों से निराश होने की ज़रूरत नहीं है जो लोग पक्का विश्वास नहीं रखते। (60)
सूरह 29 : अल अंकबूत [मकड़ी / The Spider]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)
क्या लोगों ने यह समझ रखा है कि वे इतना कह देने मात्र से छोड़ दिए जाएँगे कि "हम विश्वास करते हैं" और उनकी परीक्षा नहीं ली जाएगी? (2)
वे लोग जो इनसे पहले गुज़र चुके हैं, हमने उन सब लोगों की भी परीक्षा ली थी : अल्लाह उनकी पहचान ज़रूर कर लेगा, कि कौन लोग हैं जो सच्चाई पर हैं, और कौन हैं जो झूठे हैं। (3)
क्या बुरे कर्म करनेवाले ऐसा सोचते हैं कि वे हम से बच कर निकल जाएँगे? (अगर हाँ), तो क्या ही ग़लत अंदाज़ा है उनका! (4)
मगर, वे लोग जो अल्लाह से जा मिलने की उम्मीद में लगे रहते हैं, तो वह यक़ीन रखें कि अल्लाह का तय किया हुआ समय ज़रूर आकर रहेगा; और वही हर चीज़ का सुननेवाला, जाननेवाला है। (5)
और जो लोग (अल्लाह के रास्ते में) संघर्ष करते हैं, तो वे ऐसा अपने ही फ़ायदे के लिए करते हैं---- अल्लाह को अपनी सृष्टि में किसी की भी ज़रूरत नहीं है----- (6)
और जो लोग (एक अल्लाह में) विश्वास रखते हैं, और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो हम ज़रूर उनके बुरे कर्मों को (उनके रिकार्ड से) मिटा देंगे, और उन्हें उनके बेहतरीन कर्मों के हिसाब से (बदले में) इनाम देंगे। (7)
और हमने लोगों को यह आदेश दिया है कि वे अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करें. किन्तु अगर तुम्हारे माँ-बाप तुम पर ज़ोर डालें कि तुम मेरे सिवा, किसी ऐसे (देवता) को मेरे बराबर का ठहराओ, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानो : तुम्हें मेरी ही पास लौट कर आना होगा, फिर मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुम ने किया होगा। (8)
जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते रहे, तो हम उन्हें अवश्य ही नेक लोगों के दर्जे में शामिल करेंगे। (9)
लोगों में कुछ ऐसे हैं जो यह कहते है कि "हम अल्लाह में विश्वास रखते हैं," मगर, जब अल्लाह के रास्ते में उन्हें कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो वे लोगों की दी हुई सख़्त तकलीफ़ को अल्लाह की दी हुई सज़ा समझ बैठते हैं---- फिर भी, आप के रब की तरफ़ से [ऐ रसूल], जब आपको कोई मदद पहुँचती है, तो वे कहते हैं, "हम तो हमेशा से तुम्हारे साथ हैं।" क्या जो कुछ दुनियावालों के सीनों में छिपा है, उसे अल्लाह अच्छी तरह नहीं जानता? (10)
अल्लाह ज़रूर उन लोगों को पहचान लेगा कि कौन लोग हैं जो सचमुच ईमान रखते हैं, और कौन लोग हैं जो पाखंडी [मुनाफ़िक़/Hypocrite] हैं। (11)
जो लोग (सच्चाई में) विश्वास नहीं रखते, वे ईमानवालों से कहते हैं, "तुम हमारे मार्ग पर चलो और हम तुम्हारे गुनाहों (के नतीजे) को झेलने के लिए तैयार रहेंगे", हालाँकि वे ऐसा करनेवाले तो हैं नहीं--- सचमुच वे बिल्कुल झूठे हैं। (12)
वे अपने (गुनाहों का) बोझ अवश्य ही उठाएँगे, और इसके साथ दूसरों के (बोझ भी) : क़यामत के दिन उनके झूठे व फ़र्ज़ी दावों के बारे में ज़रूर पूछताछ होगी। (13)
हमने नूह [Noah] को उनकी क़ौम के पास भेजा। वह पचास कम एक हजार साल [950 साल] उनके बीच रहे, मगर जब तूफ़ानी बाढ ने उन्हें घेर लिया, तब तक वे शैतानियों में ही लगे हुए थे। (14)
फिर हमने उन्हें और उनके साथ नौका में सवार लोगों को बचा लिया, और उस (घटना) को सारी दुनिया के लिए एक निशानी बना दिया। (15)
और हम ने इबराहीम [Abraham] को भी भेजा, उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "अल्लाह की बन्दगी करो, और उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो : यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम सचमुच समझ पाओ। (16)
तुम अल्लाह को छोड़ कर जिसे पूजते हो, वे तो बस मूर्तियाँ हैं; और जो तुम गढते रहते हो, वे झूठी बातों के सिवा कुछ नहीं है। तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो, वे तुम्हें रोज़ी देने का कोई अधिकार नहीं रखते, अतः तुम अल्लाह से ही रोज़ी मांगा करो, उसी की बन्दगी करो, और उसका शुक्र अदा करो : तुम सभी को उसके पास लौटकर जाना होगा। (17)
और अगर तुम कहते हो कि यह बातें झूठी हैं (तो सावधान किया जाता है कि) तुमसे पहले भी कितने ही समुदायों ने इसे झूठ ही बताया था। हमारे रसूल पर तो बस यही ज़िम्मेदारी है कि वह साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से (अल्लाह के संदेश द्वारा) सचेत कर दे।" (18)
क्या वे नहीं देखते कि अल्लाह किस तरह किसी चीज़ को (पहली बार) पैदा करता है, और फिर उसको दोबारा भी पैदा कर देता है? सचमुच यह अल्लाह के लिए बेहद आसान है। (19)
कहें कि, "धरती के बड़े हिस्सों में घूमो-फिरो और देखो कि किस तरह अल्लाह ने सृष्टि की रचना की है : अगले जीवन में भी वह इसी तरह उन्हें (दोबारा) पैदा कर देगा। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (20)
वह जिसे चाहे दंड दे और जिसपर चाहे दया करे। और तुम सब को उसी के पास लौट कर जाना होगा। (21)
तुम न तो धरती पर उससे बच कर निकल सकते हो, और न आसमानों में; और अल्लाह को छोड़कर कोई न होगा जो तुम्हें बचा सके या तुम्हारी मदद कर सके।” (22)
और जिन लोगों ने अल्लाह की उतारी गयी आयतों [Revelations] को और उससे जा मिलने की बात को मानने से इंकार किया, उन्हें मेरी तरफ़ से दया किए जाने की कोई आशा नहीं : उन्हें बड़ी दर्दनाक यातना होगी। (23)
इबराहीम [Abraham] की क़ौम के लोगों ने जवाब में बस इतना ही कहा था, "मार डालो या जला डालो!” मगर अल्लाह ने इबराहीम को (नमरूद की लगायी हुई) आग से बचा लिया : विश्वास रखनेवालों के लिए सचमुच इस (घटना) में (सीखने के लिए) निशानियाँ हैं। (24)
इबराहीम ने उनसे कहा, "अल्लाह को छोड़कर तुमने मूर्तियों को (ख़ुदा) चुना है (ताकि तुम्हारे दोस्त ख़ुश रहें), मगर उनसे यह तुम्हारा मेल-मिलाप केवल इसी सांसारिक जीवन तक ही चल पाएगा : क़यामत के दिन, तुम एक-दूसरे को दोस्त मानने से इंकार करोगे और एक-दूसरे को बुरा भला कहोगे। जहन्नम (की आग) ही तुम्हारा ठिकाना होगा और तुम्हारी मदद करनेवाला कोई न होगा।" (25)
लूत [Lot] ने उन [इबराहीम] में विश्वास किया, औऱ कहा, "(सुदोम की तबाही के बाद) जहाँ मेरा रब मुझे ले जाए, मैं यहाँ से उसी जगह जा रहा हूँ : अल्लाह सबसे प्रभुत्वशाली और (अपने हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।" (26)
हमने इबराहीम को इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] (जैसी औलाद) दी, और उसकी संतानों में (कई लोगों को) पैग़म्बरी [Prophethood] अता की और (कई आसमानी) किताबें उन पर उतारीं. हमने बदले में उसे इस संसार में भी इनाम दिए और आने वाली दुनिया [परलोक] में भी वह नेक बंदों में शामिल होगा। (27)
और (याद करें) लूत [Lot] को : जब उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम ऐसे बेशर्मी के [अश्लील] काम में लगे रहते हो, जिसे दुनिया में तुमसे पहले कभी किसी ने नहीं किया। (28)
किस तरह तुम (मर्द लोग) मर्दों के पास (सेक्स की इच्छा से) जाते हो, यात्रियों का रास्ता रोक कर ज़ोर-ज़बरद्स्ती करते हो और अपने समारोहों में भद्दी हरकतें करते हो?" इस बात पर उसकी क़ौम के लोगों का जवाब बस यही था, "तुम जो कहते हो वह अगर सच है, तो ले आओ हम पर अल्लाह की यातना!" (29)
तो लूत ने दुआ की, "ऐ मेरे रब! (समाज में) बिगाड़ पैदा करनेवाले लोगों के मुक़ावले में मेरी मदद कर।" (30)
हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) जब इबराहीम के पास (उसके यहाँ बेटा होने की) ख़ुशख़बरी लेकर गए थे, तब उन्होंने (इबराहीम को) बताया, "हम उस (लूत के लोगों की) बस्ती [सुदोम] को बर्बाद करनेवाले हैं। निस्संदेह उस बस्ती के लोग शैतानी करनेवाले हैं।" (31)
इबराहीम ने कहा, "मगर वहाँ तो लूत मौजूद हैं।" फ़रिश्तों ने जवाब दिया, "वहाँ कौन रहता है, यह बात हम आप से ज़्यादा अच्छी तरह जानते हैं। हम उसको और उसके घरवालों को बचा लेंगे, सिवाए उसकी पत्नी के : वह उन लोगों में शामिल होगी जो पीछे छूट जाते हैं।" (32)
फिर जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे, तो वह उनके वहाँ आने के मक़सद को सुनकर परेशान और दुखी हो गया। फ़रिश्तों ने कहा, "आप डरें नहीं और न दुखी हों : हम आपको और आपके घरवालों को ज़रूर बचा लेंगे, सिवाए आपकी पत्नी के----- वह उन लोगों में शामिल होगी जो पीछे छूट जाते हैं ---- (33)
हम इस बस्ती के लोगों पर आसमान से एक भयानक यातना उतारनेवाले हैं, इस कारण कि वे गंदे [अश्लील] कर्मों में लगे हुए हैं।" (34)
हमने उस बस्ती के कुछ हिस्से [खंडहर] को उन लोगों के लिए एक स्पष्ट निशानी के रूप में छोड़ दिया, जो बुद्धि से काम लेते हैं। (35)
और मदयन [Midian] की तरफ़ हम ने उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की इबादत [उपासना] करो, और आने वाले अंतिम दिन [क़यामत] के बारे में सोचो। शैतानियाँ न करो और धरती में बिगाड़ मत फैलाओ।" (36)
मगर उन्होंने उसे झूठा कहा और अन्ततः भूकम्प ने उन्हें दबोच लिया। जब सुबह हुई, तो वे सब अपने घरों में मरे पड़े थे। (37)
और (याद करो) आद और समूद की क़ौम को : (उनकी बर्बादी की कहानी) उनके घरों के बचे हुए खंडहरों को देखकर तुम साफ़ तौर से समझ चुके हो। शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए सुहाना बना कर पेश किया, और उन्हें सीधे मार्ग से रोक दिया, हालाँकि वे समझ-बूझ रखनेवाले लोग थे। (38)
और (याद करें) क़ारून [Korah] और फ़िरऔन [Pharaoh] और हामान को : मूसा उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए, किन्तु उन्होंने धरती पर बड़े घमंड से काम लिया। मगर वे हमसे बच कर नहीं निकल सकते थे। (39)
और अन्ततः हमने हर एक को उसके गुनाहों के कारण दंड दिया : उनमें से कुछ पर तो हमने पत्थर बरसानेवाली भयानक आँधी भेजी; कुछ को अचानक हुई एक ज़ोरदार आवाज़ ने आ लिया; कुछ को हमने ज़मीन में धँसा दिया; और उनमें से कुछ को हमने पानी में डुबा दिया। अल्लाह तो ऐसा न था कि उन लोगों पर ज़ुल्म करता; मगर वे स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया करते थे। (40)
जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़ कर अपने लिए दूसरे संरक्षक बना रखे हैं, उनकी मिसाल मकड़ियों जैसी है जो अपने लिए घर बनाती हैं ---- और सच है कि सब घरों से कमज़ोर घर मकड़ी का ही होता है--- काश वे इस बात को समझ पाते! (41)
वे लोग अल्लाह को छोड़ कर जिस चीज़ [बुतों] को पुकारते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है : वह सबसे प्रभुत्वशाली और समझ-बूझ रखनेवाला है। (42)
हम ऐसी मिसालें लोगों के (समझाने के) लिए देते हैं, परन्तु इनको समझ वही सकते हैं जो ज्ञान रखते हैं। (43)
अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को सच्चे मक़सद के साथ पैदा किया है। जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए सचमुच इसमें एक बड़ी निशानी है। (44)
[ऐ रसूल] उस किताब को पढ़ कर सुनाएं जो आप पर 'वही' द्वारा भेजी गई [revealed] है; नमाज़ को बराबर अदा करें : नमाज़ अश्लीलता और बुरे आचरण से रोकती है। और अल्लाह को याद करते रहना सबसे बेहतर चीज़ है : जो कुछ तुम करते हो अल्लाह (तुम्हारे) हर काम को जानता है। (45)
और [ऐ मुसलमानो] किताबवालों [यहूदी,ईसाई] से जब बहस करना पड़े तो बेहतरीन ढंग से ही बहस करो, हाँ जो लोग उनमें से अन्याय करते हैं, उनकी बात अलग है। (उनसे) कहो, "हम विश्वास रखते हैं उस (किताब) पर जो हम पर उतारी गयी, और उस पर भी ईमान रखते हैं जो तुम पर उतारी गयी थी; हमारा ख़ुदा और तुम्हारा ख़ुदा एक ही है; और हम उसी की आज्ञा माननेवाले हैं।" (46)
इसी तरह हमने [ऐ रसूल] आप पर किताब उतारी है, तो (मक्का के) लोगों में से जिन्हें [यहूदी व ईसाई को] हमने पहले से किताब दे रखी थी वे उस (क़ुरआन) में विश्वास रखते हैं, और उन (मक्का के मूर्तिपूजकों) में से भी कुछ लोग इस पर विश्वास रखते हैं। हमारी आयतों को मानने से केवल वही इंकार करते हैं जो (सच्चाई को) न मानने की ज़िद्द पर अड़े रहते हैं। (47)
[ऐ रसूल] यह (किताब) जो आप पर उतारी गयी, उससे पहले आपने कभी कोई किताब न तो पढ़ी थी; और न ही कभी कोई किताब अपने हाथ से लिखी थी। अगर आपने ऐसा किया होता, तो झूठे लोगों को सन्देह करने का बहाना मिल गया होता। (48)
मगर नहीं, यह (क़ुरआन) तो (अल्लाह द्वारा) उतारी गयी है, और यह बात उन लोगों के दिलों में एकदम स्पष्ट है जिन्हें ज्ञान दिया गया है। हमारी आयतों को मानने से केवल वही इंकार करते हैं जो शैतानी कामों में डूबे रहते हैं। (49)
वे [काफ़िर] कहते हैं, "उस (रसूल) के रब ने उसके पास कोई चमत्कार दे कर क्यों नहीं भेजा?" आप कह दें, "चमत्कार तो बस अल्लाह के हाथ में है; मैं तो यहाँ केवल इसीलिए हूँ कि तुम्हें साफ़ तौर से सावधान कर दूँ।" (50)
क्या उन लोगों के लिए यह बात काफ़ी नहीं कि हमने आप पर किताब उतारी, जो उन्हें पढ़कर सुनाई जाती है? उन लोगों के लिए सचमुच इसमें बड़ी रहमत [mercy] है, और सीखने के लिए सबक़ है जो ईमान रखते हैं। (51)
कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह गवाह के रूप में काफ़ी है : जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, वह (सब) जानता है. जो लोग झूठे (देवताओं) में विश्वास रखते हैं, और (एक) अल्लाह को नहीं मानते, वे सख़्त घाटे में रहेंगे।” (52)
वे आपको (उनके लिए) यातना जल्दी बुलाने की चुनौती देते हैं : अगर अल्लाह ने इसका एक नियत समय पहले ही तय न कर दिया होता, तो उनपर अब तक यातना आ चुकी होती, मगर वह आएगी ज़रूर, और इतनी अचानक आएगी कि उन्हें ख़बर तक न होगी। (53)
वे आपको (उनके लिए) यातना जल्दी बुलाने की चुनौती देते हैं : सच्चाई से इंकार करनेवालों को जहन्नम अपने घेरे में ले लेगी, (54)
उस दिन जब यातना उन्हें ऊपर से घेर लेगी और उनके अपने पाँव के नीचे से भी, तब उनसे कहा जाएगा, "अब चखो उसका मज़ा जो कुछ तुम किया करते थे!" (55)
ऐ मेरे ईमानवाले बन्दो! मेरी धरती विशाल व बहुत फैली हुई है, अतः तुम मेरी और केवल मेरी ही बन्दगी करो। (56)
हर जान [जीव] को मौत का मज़ा चखना है, फिर तुम हमारे ही पास लौट कर आओगे। (57)
जो लोग (सच्चाई में) विश्वास [ईमान] रखते थे, और अच्छे कर्म करते थे, उन्हें हम बाग़ों [जन्नत] के ऊँचे महलों में रहने की जगह देंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वे उसमें हमेशा रहेंगे। क्या ही अच्छा इनाम है उन लोगों के लिए, जो (सही मार्ग पर चलने के लिए) मेहनत करते हैं, (58)
(सच्चाई पर) सब्र व धैर्य से जमे रहते हैं, और जो अपने रब पर भरोसा रखते हैं! (59)
कितने जीव-जंतु ऐसे हैं जो अपनी रोज़ी जमा करके नहीं रखते! अल्लाह ही उन्हें भी रोज़ी देता है और तुम्हें भी : वही तो है जो सब कुछ सुनता है, और सब जानता है। (60)
और अगर तुम उन (विश्वास न करनेवालों) से पूछो कि "किसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया और सूरज और चाँद को काम में लगा दिया?" तो वे ज़रूर कहेंगे, "अल्लाह ने!" तो फिर क्यों वे उस (अल्लाह) से मुँह मोड़ते हैं? (61)
वह अल्लाह ही है जो अपने बन्दों में से जिसे चाहता है भरपूर रोज़ी देता है और जिसे चाहता है, रोज़ी में कमी कर देता है : अल्लाह हर एक चीज़ की पूरी जानकारी रखता है। (62)
और अगर तुम उनसे पूछो कि "कौन है जो आसमान से पानी बरसाता है, और उससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को फिर से ज़िंदा कर देता है?" तो वे ज़रूर बोल पड़ेंगे, "अल्लाह!" आप कहें, "सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है!" किन्तु उनमें से अधिकतर लोग बुद्धि से काम नहीं लेते। (63)
इस दुनिया की ज़िंदगी तो बस खेल-तमाशा और दिल का भटकाव मात्र है; असल ज़िंदगी तो आनेवाली दुनिया [परलोक] में है, अगर वे सचमुच जान पाते! (64)
जब कभी वे पानी के जहाज़ों में सवार होते हैं, तो वे (मुसीबत में अपने देवताओं को छोड़कर) अपनी पूरी भक्ति केवल अल्लाह में दिखाते हुए उसे ही पुकारते हैं। मगर जैसे ही वह उन्हें सही-सलामत वापस ज़मीन पर ले आता है, तो क्या देखते हैं कि वे अचानक दूसरों को उस (अल्लाह) का साझीदार [Partner] ठहराने लग जाते हैं! (65)
जो कुछ (नेमत) हमने उन्हें दिया है उसके बदले में उन्हें कर लेने दो हमारी नाशुक्री [ingratitude]; और उड़ा लेने दो कुछ मज़े---- जल्द ही उन्हें पता चल जाएगा। (66)
क्या वे देखते नहीं कि हमने (उनके शहर मक्का को) एक शांत व सुरक्षित जगह बनाया है, जबकि उसके आसपास की जगहों में लोगों के साथ छीना-झपटी होती है? तब भी, कैसे वे झूठी चीज़ में विश्वास रखते हैं और अल्लाह के एहसानों को मानने से इंकार करते हैं? (67)
उस आदमी से बड़ा शैतान कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ता हो, या जब उसके पास सच्ची बात पहुँचे तो उसको झूठी बताए? क्या (ऐसे) इंकार करनेवालों का ठिकाना जहन्नम नहीं होगा? (68)
जो लोग हमारे मक़सद के लिए जी-तोड़ कोशिश करते हैं, उन्हें अवश्य ही रास्ता दिखाते हुए हम अपने मार्ग पर लगा देंगे : अल्लाह हमेशा अच्छा कर्म करनेवालों के साथ है। (69)
सूरह 83 : अल मुतफ़्फ़िफ़ीन
[जो लोग नाप-तौल में कमी करते हैं / Those Who Give Short Measure]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
बर्बादी है नाप-तौल में कमी करने वालों के लिए, (1)
यह लोग जब (दूसरे) लोगों से नापकर (कुछ) लेते हैं, तो (उनसे) पूरा-पूरा लेते हैं, (2)
और जब उन्हें (स्वयं) नापकर या तौलकर देते हैं, तो घटा कर देते हैं! (3)
क्या ये लोग इस बात का यक़ीन नहीं रखते कि वह (मरने के बाद दोबारा ज़िंदा करके) उठाए जाएंगे, (4)
एक बड़े भारी (क़यामत के) दिन में, (5)
जिस दिन सब लोग तमाम जहाँनों के रब के सामने (हिसाब देने के लिए) खड़े होंगे? (6)
हरगिज़ नहीं! दुराचारियों [wicked] के नामों का लेखा-जोखा “सिज्जीन" में है ---- (7)
और आप क्या जानें कि “सिज्जीन” क्या है? ----- (8)
यह (एक साफ़-साफ़) लिखी हुई किताब है जिसमें (जहन्नम में जानेवालों के) नामों की सूची है. (9)
उस दिन (सच्चाई को) झुठलाने वालों के लिए तबाही होगी, (10)
जो लोग फ़ैसले के दिन को मानने से इंकार करते हैं! (11)
उस (दिन) से केवल वही इंकार करता है जो हद से बढ़ा हुआ पापी हो : (12)
उसे जब हमारी आयतें पढ़कर सुनाई जाती हैं, तो कहता है, “(यह तो) पिछले लोगों की कहानियाँ हैं!” (13)
(ऐसा) बिल्कुल नहीं! (बल्कि) जो कुछ वे किया करते थे, उन (बुरे) कर्मों का ज़ंग [rust] उनके दिलों पर चढ़ गया है (इसलिए ये आयतें उनके दिल पर असर नहीं करतीं)। (14)
बिल्कुल नहीं! उस दिन वे अपने रब (की रहमत से और उसके दर्शन) से रोक दिए जाएंगे, (15)
फिर वे जहन्नम (की आग) में जलेंगे, (16)
और उनसे कहा जाएगा, “यही है वह (जहन्नम की यातना), जिसे तुम झूठ बताते थे।” (17)
बिल्कुल नहीं! जो सचमुच अच्छे लोग हैं, उनके नामों की सूची ‘इल्लीयीन” में है----- (18)
और आप क्या जानें कि “इल्लीयीन” क्या है?----- (19)
यह एक साफ़-साफ़ लिखी हुई किताब है जिसमें उन जन्नत वालों के नाम (और उनके कर्मों का लेखा-जोखा) दर्ज है, (20)
जिसे वे (फरिश्ते, और चुने हुए बंदे) देखते हैं जिन्हें अल्लाह की नज़दीकी हासिल होगी। (21)
जो सचमुच नेक लोग होंगे, वे (नेमतों वाले जन्नत में) परम आनंद में होंगे, (22)
(आरामदेह) तख़्तों पर बैठे हुए इधर-उधर देख रहे होंगे। (23)
तुम उनके चेहरों पर ख़ुशी की चमक से ही पहचान लोगे। (24)
उन्हें मुहर लगी हुई [sealed] बड़ी लज़ीज़ व शुद्ध शराब [तहूर] पिलायी जाएगी (25)
उसकी मुहर कस्तूरी (जैसी खुशबूदार चीज़) की होगी ----- जो लोग कुछ पाने की कोशिश में लगे रहते हैं, उन्हें चाहिए कि वे इसे पाने की कोशिश करें ---- (26)
उस (शराब) में ‘तसनीम’ के पानी की मिलावट होगी, (27)
यह (तसनीम) एक ऐसा बड़ा पानी का सोता [Spring] है, जहां से केवल वही लोग पिएंगे जिन्हें अल्लाह से नज़दीकी हासिल है। (28)
शैतानी करनेवाले लोग (दुनिया में) ईमान रखनेवालों का मज़ाक उड़ाया करते थे ---- (29)
जब वे ईमानवालों के पास से गुजरते, तो आपस में आंखों से इशारेबाज़ी करते थे, (30)
और जब वे अपने लोगों के बीच वापस जाते, तो ईमानवालों के बारे में हँसी-मज़ाक़ करते थे, (31)
और जब वे उन (कमजोर हाल मोमिनों) को देखते, तो कहते: “ये लोग सही रास्ते से भटक गए हैं,” (यानी यह दुनिया गँवा बैठे हैं और परलोक तो है ही केवल गढी हुई कहानी!) (32)
हालाँकि वे उन (मुसलमानों) के हाल पर निगरानी करनेवाले [keeper] बनाकर तो भेजे नहीं गए थे ----- (33)
सो आज (क़यामत के दिन) देखो, ईमानवाले, विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] पर हँस रहे हैं, (34)
सजे हुए तख्तों पर बैठे हुए (अपनी खुशहाली और काफ़िरों की बदहाली को) देख रहे हैं। (35)
तो क्या विश्वास न करनेवालों [काफिरों] को उन कर्मों का पूरा बदला (नहीं) दे दिया गया जो कुछ वे किया करते थे? (36)
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