Chronological Quran:
Medinan Period-3 [मदनी काल-3] : 625--626 AD
सूरह 4 : अन-निसा [औरतें/ Women]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है
ऐ लोगो! अपने रब से डरो, जिसने तुम्हें एक अकेली जान [आदम/Adam] से पैदा किया, और उसी (के सत/essence) से उसका जोड़ीदार [हव्वा/Eve] पैदा किया, और फिर उन दोनों की नस्ल से अनगिनत मर्दों और औरतों को पैदा कर दूर-दूर तक फैला दिया; अल्लाह (के आदेश न मानने के नतीजे) से डरते रहो, जिसके नाम से तुम एक-दूसरे से (अपने हक़) माँगते हो। रिश्तेदारों से संबंध न तोड़ डालो : (याद रहे!) अल्लाह हमेशा तुम पर नज़र रखता है। (1)
और (देखो!) अनाथों को उनका माल (ईमानदारी से वापस) दे दो, उनकी अच्छी चीज़ों को बदल कर बुरी चीज़ें न दे दो, और उनके माल को अपने माल के साथ मिलाकर न खा जाओ--- यह बड़ा भारी गुनाह है। (2)
अगर तुम्हें (शादी करनी हो, और) इस बात का डर हो कि तुम अनाथ लड़कियों के साथ न्याय से पेश नहीं आ सकोगे, तो (दूसरी) औरतों में से जो तुम्हें अच्छी लगे, उनमें से (एक समय में) दो, तीन या चार के साथ शादी कर सकते हो। अगर तुम्हें डर हो कि तुम उनके साथ एक जैसा व्यवहार न कर सकोगे, तो फिर एक ही से शादी करो, या फिर अपनी दासी (लौंडी) से शादी कर लो जो (युद्ध के क़ैदियों में) तुम्हारे हाथ आ गयी हो : इसमें तुम्हारे लिए पक्षपात करने से बचने की अधिक सम्भावना है। (3)
शादी के मौक़े पर औरतों को उनकी ‘मेहर’[bridal gift] अदा कर दो, हाँ, अगर उस (मेहर) में से वे अपनी ख़ुशी से कुछ तुम्हारे लिए छोड़ दें, तो उसे तुम बेझिझक अपने काम में ला सकते हो। (4)
किसी नासमझ (अनाथ) को अपनी (या उसकी) संपत्ति मत सौंप दो। अल्लाह ने इसे तुम्हारे लिए जीने का सहारा बनाया है : उसमें से उन्हें खिलाओ-पिलाओ, कपड़े पहनाओ और उनसे प्यार से बात किया करो। (5)
(अभिभावकों को चाहिए कि) अनाथों की (समझदारी की) जाँच-परख करते रहें, जब तक कि वे शादी करने की अवस्था को न पहुँच जाएँ; फिर अगर तुम्हें लगे कि अब उनमें सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ आ गई है, तब उनकी संपत्ति उनके हवाले कर दो। और (देखो) यह सोच कर कि कहीं वे बड़े होकर अपना हक़ माँगने न लग जाएँ, तुम उनके माल जल्दी जल्दी खा कर उड़ा न डालो : अगर (अनाथों के) अभिभावक [Guardian] अच्छे पैसेवाले हों, तो उन्हें अनाथों की संपत्ति से दूर ही रहना चाहिए, हाँ, अगर वह ग़रीब है, तो अपनी ज़रूरत के हिसाब से उतना ले सकता है जितना उचित हो। फिर जब तुम उनके माल उन्हें सौंपने लगो, तो लोगों को गवाह बना लो; मगर (याद रखो) तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह हर चीज़ का हिसाब रखने के लिए काफ़ी है। (6)
मर्दों का उस माल में हिस्सा होगा जो उनके माँ-बाप और नज़दीकी रिश्तेदार छोड़ जाएं, और औरतों का भी उस माल में हिस्सा होगा जो उनके माँ-बाप और रिश्तेदारों ने छोड़ा हो - चाहे वह थोड़ा हो या अधिक हो : यह हिस्सा अल्लाह का तय किया हुआ है। (7)
हिस्सा बाँटते समय, अगर दूर के रिश्तेदार, (ख़ानदान के) अनाथ और ज़रूरतमंद लोग भी आ जाएं, तो उन्हें भी उसमें से थोड़ा बहुत दे दो और उनसे प्यार व नर्मी से बात करो। (8)
वे लोग अगर मर जाते, तो जिस तरह अपने बेसहारा बच्चों के भविष्य के लिए डरे रहते, उसी तरह उन्हें अनाथों की भी चिंता करनी चाहिए; उन्हें अल्लाह से डरना चाहिए और सही और इंसाफ़ की बात कहनी चाहिए। (9)
जो लोग अनाथों का माल अन्याय से खा लेते हैं, असल में वे अपने पेट में आग के अंगारे भर रहे हैं : वे भड़कती हुई आग में झोंके जाएंगे। (10)
तुम्हारी सन्तान के बारे में अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि एक बेटे का हिस्सा दो बेटियों के हिस्से के बराबर होना चाहिए. अगर केवल बेटियाँ हों, तो दो या दो से अधिक बेटियों का हिस्सा छोड़ी हुई सम्पत्ति का दो तिहाई होगा, अगर वह अकेली हो तो उसका हिस्सा आधा होगा। मरनेवाले के माँ-बाप में से हर एक को संपत्ति का छठा हिस्सा मिलेगा, अगर मरनेवाले के बाल-बच्चे हों; अगर उसकी संतान न हो, और उसके माँ-बाप ही उसके वारिस हों, तो उसकी माँ का हिस्सा एक तिहाई होगा (और बाक़ी बाप का), हाँ, अगर उस (मरनेवाले) के भाई भी हों, तो उस हालत में माँ का हिस्सा छठा होगा। [याद रहे कि इन सभी मामले में] अगर मरनेवाले ने कोई वसीयत की हो, या उस पर क़र्ज़ हो, तो इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा। तुम यह नहीं जानते कि तुम्हारे माँ-बाप और बाल-बच्चों में कौन तुम्हारे लिए ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाने वाला है (और किसका हक़ ज़्यादा होना चाहिए, किसका कम) : यह (हिस्सा) अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है, और वह सब कुछ जानता है, हर काम की समझ-बूझ रखता है। (11)
तुम्हारी बीवियाँ जो कुछ (संपत्ति) छोड़ जाएं, उसमें तुम्हारा [पति का] हिस्सा आधा है, अगर उनसे औलाद (ज़िंदा) न हो; अगर उनकी औलाद हो, तो तुम एक चौथाई हिस्से के वारिस होगे. [इन सभी मामले में] इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा। अगर तुम्हारी कोई औलाद नहीं है, तो तुम्हारी बीवियों का हिस्सा चौथाई होगा; अगर तुम्हारी औलाद है, तो तुम्हारी बीवियाँ आठवें हिस्से की वारिस होंगी. [इन सभी मामले में] इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा। अगर कोई मर्द या औरत मर जाए और उसकी न तो कोई औलाद हो और न ही माँ-बाप बचे हों, मगर (माँ की तरफ़ से) उसका एक भाई या बहन हो, तो वह भाई या बहन छठे हिस्से का वारिस होगा; अगर भाई-बहन एक से ज़्यादा हुए, तो फिर एक तिहाई हिस्से में वे सब बराबर के भागीदार होंगे, [इन सभी मामले में] इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा, शर्त यह है कि इससे किसी को कोई नुक़सान न पहुँचे : यह सब कुछ अल्लाह का हुक्म है : और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत नर्म दिल व मेहरबान है। (12)
ये अल्लाह की ठहराई हुई सीमाएँ हैं : जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करेगा, उसे वह (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, और वे वहां हमेशा रहेंगे---- यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (13)
मगर जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा नहीं मानेगा और उसकी ठहराई हुई सीमाओं को लांघेगा, उसे अल्लाह द्वारा (जहन्नम की) आग में झोंक दिया जाएगा, जिसमें उसे रहना होगा---- अपमानित करनेवाली यातना उनके इंतजार में है। (14)
अगर तुम्हारी औरतों में से कोई (बदचलन हो जाए, और) अपना मुँह काला [Lewd act] करा बैठे, तो तुम अपने में से चार आदमियों को गवाही के लिए बुला लो, फिर, अगर वे उसके जुर्म की गवाही दे दें, तो ऐसी औरतों को घरों में बन्द रखो, यहाँ तक कि उनकी मौत आ जाए या अल्लाह उनके लिए कोई दूसरा रास्ता निकाल दे (15)
और अगर तुम में से दो (मर्द आपस में बदचलनी का) ऐसा काम [Lewd act] कर बैठें, तो दोनों को पिटवाओ और सबके सामने फटकार लगाओ; फिर अगर वे तौबा [repentance] कर लें और अपने आपको सुधार लें, तो उन्हें छोड़ दो ---- तौबा करनेवालों को अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (16)
मगर (याद रहे कि) अल्लाह उन्ही लोगों की तौबा क़बूल करता है जो भावनाओं में बह कर नादानी से कोई बुराई कर बैठते हैं, फिर (ग़लती का अहसास होते ही) तुरंत तौबा कर लेते हैं : ऐसे ही लोग हैं जिनको अल्लाह माफ़ कर देगा, वह सब कुछ जाननेवाला, और (अपने हर काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (17)
ऐसी तौबा तो सच्ची तौबा नहीं है कि लोग (सारी उम्र) बुरे काम किए जाएं, और फिर जब मौत उनके सामने आ खड़ी हो, तो कोई यह कहे कि, "अब मैं तौबा करता हूँ," और न ही उनकी तौबा (क़बूल होगी) जो मरते दम तक (सच्चाई को) मानने से इंकार ही करते रहे : ऐसे लोगों के लिए हमने दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है। (18)
ऐ ईमानवालो! तुम्हारे लिए यह वैध नहीं कि तुम (विधवा) औरतों (पर क़ब्ज़ा कर) के ज़बरदस्ती वारिस बन बैठो, और न ऐसा करना चाहिए कि जो कुछ (माल व सामान) अपनी बीवियों को दे चुके हो, उसमें से कुछ वापस लेने के चक्कर में उनके साथ सख़्ती करो, और न ही उन्हें (दोबारा शादी करने से) रोक रखो, हाँ, अगर वे खुले आम कोई बदचलनी के काम [adultery] कर बैठें, तो दूसरी बात है। उनके साथ ज़िंदगी बसर करने में नर्मी और इंसाफ़ से काम लो : अगर तुम उन्हें (किसी कारण से) पसंद नहीं करते, तो सम्भव है कि जो बात तुम पसन्द नहीं करते हो, और उसी में अल्लाह ने तुम्हारे लिए ज़्यादा भलाई रख दी हो। (19)
अगर तुम एक बीवी को छोड़कर दूसरी बीवी लाना चाहो, तो चाहे तुमने उस बीवी को (तोहफ़े में) ढेर सारी सोने की मोहरें ही क्यों न दे रखी हों, तब भी (छोड़ते समय) उसमें से तुम्हें कुछ भी वापस नहीं लेना चाहिए। क्या तुम चाहते हो कि अपना दिया हुआ माल उस पर झूठा आरोप लगाकर और खुला ज़ुल्म कर के वापस ले लो? (20)
और तुम उस (बीवी) से कैसे वापस ले सकते हो, जबकि तुम (मियाँ-बीवी के रूप में) एक-दूसरे के साथ सो चुके हो, और वह (शादी के समय) तुमसे (अपने हक़ के लिए) पक्का वचन ले चुकी है? (21)
जिन औरतों से तुम्हारे बाप शादी कर चुके हैं, उन औरतों से तुम शादी न करो ---- हां, जो पहले हो चुका सो हो चुका। सचमुच यह एक शर्मनाक, अत्यन्त अप्रिय, और बुराई की तरफ़ ले जानेवाला काम है। (22)
तुम्हारे लिए (बीवी के रूप में) हराम [forbidden] की जाती हैं तुम्हारी माएँ, बेटियाँ, बहनें, फूफियाँ, मौसियाँ, भतीजियाँ, भाँजियां, और तुम्हारी वे माएँ जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया हो और दूध के रिश्ते से तुम्हारी बहनें, तुम्हारी सासें, और तुम्हारी सौतेली बेटियाँ जो तुम्हारी देखरेख में हैं---- जो उन मांओं से पैदा हुई हों जिनसे शादी के बाद तुम्हारा मिलन हो चुका हो, हां अगर (शादी के बाद) शारीरिक संबंध नहीं बना हो, तो इसमें तुम पर कोई गुनाह नहीं ----इसी तरह, तुम्हारे (अपने) बेटों की बीवियां, एक साथ दो बहनों (से शादी भी हराम है)---- मगर पहले जो हो चुका सो हो चुका : अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है---- (23)
विवाहित औरतें भी हराम हैं, सिवाए उनके जो लौंडी [female slave] (लड़ाई के बाद) तुम्हारे हाथ आ गयी हो। अल्लाह ने ये सारे आदेश तुम्हारे लिए दिए हैं। (इनको छोड़कर) दूसरी सभी औरतें तुम्हारे लिए वैध हैं, शर्त यह है कि तुम अपना माल (मेहर के रूप में) ख़र्च कर के उनसे शादी करने की चाहत रखो, न कि काम वासना पूरी करने के लिए ऐसा करो। अगर तुम शादी कर के औरतों के साथ (दाम्पत्य जीवन के) मज़े उठाना चाहते हो, तो उनकी 'मेहर' [bride-wealth] अदा कर दो ---- यह तुम्हारे लिए फ़र्ज़ है ---- हां, इस फ़र्ज़ को अदा करने के बाद भी, अगर तुम दोनों आपसी सहमति से (मेहर में कमी-बेशी के बारे में) कोई समझौता कर लो, तो इसमें तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं होगा : अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, समझ बूझ रखनेवाला है। (24)
अगर तुम में से किसी के पास इतना साधन न हो कि वह किसी आज़ाद ईमानवाली औरत से शादी कर सके, तो (इस बात में कोई बुराई नहीं कि) उसे ईमानवाली ग़ुलाम लौंडी [female slave] से शादी कर लेना चाहिए----- (असल चीज़ तो ईमान है, और) अल्लाह तुम्हारे ईमान (की गहराई) को ख़ूब अच्छी तरह जानता है : (इंसान होने के नाते) तुम (सब) एक ही ख़ानदान का हिस्सा हो ---- तो उनके मालिकों की अनुमति से, उचित 'मेहर' [bride-wealth] अदा कर के तुम उनसे शादी कर लो। उन्हें (इज़्ज़तदार) विवाहित औरतें बनाओ, न कि काम-वासना में डूबी हुई या चोरी-छिपे प्रेम करनेवाली। फिर जब ये (ग़ुलाम औरतें) शादी के बाद किसी (दूसरे मर्द) के साथ मुँह काला कर बैठें, तो जो दंड आज़ाद औरतों के लिए होता, उसका आधा उनके लिए होगा। यह (आदेश) तुम में से उनके लिए है, जिसे इस बात का डर हो कि (बिना शादी के) वह कोई गुनाह कर बैठेगा; उनके लिए यही बेहतर होगा कि वे अपने आपको संयम में रखने की आदत डालें। अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है, (25)
अल्लाह चाहता है कि वह अपने नियम-क़ानून तुम्हारे सामने स्पष्ट कर दे और तुम्हें उन लोगों के अच्छे रास्ते पर चलाए, जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं। वह तुम पर अपनी दयादृष्टि डालना चाहता है ------ अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है----- (26)
अल्लाह तुम पर अपनी दयादृष्टि डालना चाहता है, मगर जो लोग अपनी ग़लत इच्छाओं के पीछे चलते हैं, वे चाहते हैं कि तुम भटक कर सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ो। (27)
अल्लाह चाहता है (कि ज़्यादा कड़ाई या रुकावटों के) बोझ को तुम्हारे लिए हल्का कर दे; कि इन्सान (सेक्स करने की इच्छा को रोक पाने में) बड़ा कमज़ोर पैदा किया गया है। (28)
ऐ ईमानवालो! तुम एक-दूसरे का माल ग़लत तरीक़े से न खा जाओ, हाँ, अगर व्यापार आपसी सहमति से मिल जुल कर किया जाए, (तो अपना हिस्सा ले सकते हो)। और (देखो!) अपने आपको (यानी एक दूसरे को) क़त्ल न करो, कि अल्लाह तो तुम पर बहुत दयावान है। (29)
तुम में से जो कोई दुश्मनी और ज़ुल्म के कारण ऐसा करेगा, तो उसे हम (जहन्नम की) आग में झोंक देंगे : ऐसा करना अल्लाह के लिए बहुत आसान है। (30)
लेकिन अगर तुम उन बड़े गुनाहों से बचते रहो, जिनसे तुम्हें रोका जा रहा है, तो हम तुम्हारे छोटे-मोटे गुनाहों को मिटा देंगे, और तुम्हें प्रतिष्ठा के दरवाज़े के अंदर जाने देंगे। (31)
उस चीज़ की कामना न करो जिसे अल्लाह ने तुम में से किसी को दूसरों से ज़्यादा दिया है ---- मर्दों ने (अपने कर्मों से) जो कुछ कमाया है, उसके अनुसार उनका हिस्सा है; और औरतों ने (अपने कर्मों से) जो कुछ कमाया है, उसके अनुसार उनका हिस्सा है ---- (एक-दूसरे से जलने के बजाए) तुम्हें चाहिए कि अल्लाह से उसका कुछ फ़ज़ल [Bounty] मांगा करो : उसे हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (32)
वो सारी चीज़ जो माँ-बाप और नज़दीकी रिश्तेदार छोड़ जाएँ, उनके लिए हम ने वारिस ठहरा दिए हैं, साथ में वे (औरतें) भी जिनसे तुम (शादी के लिए) अपना हाथ देने का वचन दे चुके हो, तो उन्हें उनका उचित हिस्सा दे दो : अल्लाह हर चीज़ का गवाह है। (33)
मर्दों पर औरतों की देखभाल और उनके बंदोबस्त की ज़िम्मेदारी है, इसलिए कि अल्लाह ने अपने फ़ज़ल [bounties] से किसी को (ख़ास ख़ास चीज़ों में) दूसरों से ज़्यादा दे रखा है, और इसलिए भी कि मर्द अपने धन में से (औरतों पर) ख़र्च करते हैं. तो जो नेक बीवियाँ होती हैं, वे (पति के लिए) समर्पित होती हैं, (पति की अनुपस्थिति में) उसके (हितों और) भरोसे को बचा कर रखती हैं, जैसा कि अल्लाह चाहता है कि उन चीज़ों को बचा कर रखा जाए। अगर तुम्हें अपनी बीवियों के सिर चढ़ जाने [high handedness] का डर हो, तो पहले उन्हें (प्यार से) समझाओ-बुझाओ, फिर (न मानें, तो) सोने के समय उनसे अलग रहने लगो, और (अगर इस पर भी न मानें, तो) उन्हें (सुधारने के लिए हल्के से) मार भी सकते हो। अगर वे तुम्हारी बातें मानने लगें, तब तुम्हें उनके विरुद्ध कोई क़दम उठाने का कोई हक़ न होगा : (याद रहे) अल्लाह सबसे ऊँचा, सबसे ज़्यादा बड़ाई रखनेवाला है। (34)
(ऐ ईमानवालो) अगर तुम्हें पति-पत्नी के बीच अलगाव होने का डर हो, तो उनमें सुलह कराने के लिए एक आदमी मर्द के घरवालों में से और एक आदमी औरत के घरवालों में से नियुक्त कर दो। फिर अगर पति-पत्नी आपस के मामले को सुधारना चाहें, तो अल्लाह उनके बीच फिर से मेल-मिलाप पैदा कर देगा : वह सब कुछ जानता है, हर चीज़ की ख़बर रखता है। (35)
अल्लाह की बन्दगी करो; उसके साथ किसी और को साझेदार [Partner] न बनाओ। अच्छा व्यवहार करो अपने माँ-बाप के साथ, रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंदों के साथ, नज़दीक और दूर में रहनेवाले पड़ोसियों के साथ, पास के बैठेने-उठने वालों के साथ, ज़रूरतमंद मुसाफ़िरों के साथ, और अपने ग़ुलामों के साथ। अल्लाह घमंड करनेवालों को और डींगे मारनेवालों को पसन्द नहीं करता, (36)
जो स्वयं कंजूसी करते हैं और दूसरे लोगों को भी कंजूसी करने पर उभारते हैं, और उन नेमतों को छिपाते हैं जो अल्लाह ने उन्हें दे रखा है। ऐसे नाशुक्रे लोगों के लिए हमने अपमानित कर देनेवाली यातना तैयार कर रखी है। (37)
[अल्लाह उन्हें भी पसंद नहीं करता] जो अपनी दौलत लोगों को दिखाने के लिए ख़र्च करते हैं, जो न अल्लाह पर विश्वास रखते हैं, और न ही अन्तिम दिन [क़यामत] पर. जिस किसी ने शैतान को अपना साथी बनाया, तो क्या ही बुरा साथी है वह! (38)
भला उनका क्या नुक़सान हो जाता, अगर वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर विश्वास कर लेते, और अल्लाह ने जो कुछ रोज़ी उन्हें दे रखी है, उसमें से (अच्छे कामों पर) ख़र्च कर देते? अल्लाह उन्हें अच्छी तरह से जानता है। (39)
अल्लाह रत्ती-भर भी किसी के साथ ज़ुल्म नहीं करता : वह किसी भी अच्छे कर्म को दुगना कर देता है और ख़ुद अपनी तरफ़ से ज़बरदस्त इनाम देता है। (40)
उस वक़्त वे क्या करेंगे जब हम हर समुदाय में से एक गवाह लाएँगे, और (ऐ रसूल) आपको इन लोगों के ख़िलाफ़ गवाह बनाकर पेश करेंगे? (41)
उस दिन, जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते थे और हमारे रसूल की आज्ञा नहीं मानते थे, वे तमन्ना करेंगे कि काश हमें ज़मीन निगल जाती : वे अल्लाह से कोई भी चीज़ छिपा नहीं पाएंगे। (42)
ऐ ईमानवालो! अगर तुम नशे की हालत में हो, तो नमाज़ के नज़दीक मत जाओ, उस वक़्त तक न जाओ जब तक तुम्हें यह होश न हो कि तुम क्या कह रहे हो; न ही अगर तुम नापाकी [ritual impurity] की हालत में हो ---- हालाँकि तुम मस्जिद से होकर गुज़र सकते हो------ जब तक तुम नहा-धोकर पाक न हो जाओ (नमाज़ नहीं होगी); अगर तुम बीमार हो, सफ़र में हो, शौच करके आए हो, या तुमने सेक्स किया हो, और फिर तुम्हें कहीं पानी न मिले, तो थोड़ी सी साफ़ मिट्टी लो और उससे अपने हाथों और मुँह पर मल लो। अल्लाह तो हमेशा गलतियों को माफ़ करने के लिए तैयार रहता है। (43)
[ऐ रसूल] क्या आपने इस पर विचार नहीं किया कि किस तरह वे लोग जिन्हें (आसमानी) किताब का हिस्सा दिया गया था, वे गुमराही के खरीदार बने हुए हैं, और चाहते हैं कि तुम [ईमानवाले] भी सही रास्ते से भटक जाओ? (44)
अल्लाह आपके दुश्मनों को बहुत अच्छी तरह से जानता है : आपकी हिफ़ाज़त के लिए, और आपकी मदद के लिए अल्लाह काफ़ी है। (45)
कुछ यहूदी लोग ऐसे हैं जो (तौरात के) शब्दों के अर्थ बिगाड़ देते हैं : वे कहते हैं, "हमने सुना, मगर हम नहीं मानते," और “सुनो", और "ख़ुदा करे तुम न सुनो," और "रा'इना" [हमारी ओर देखो!]," वे अपनी ज़बानों को बुरा-भला कहने के लिए तोड़-मरोड़कर बोलते हैं, ताकि तुम्हारे दीन को नीचा दिखा सकें। अगर वे कहते, "हमने सुना और मान लिया," और "सुनिए," और "उनज़ुरना" [हमारी ओर निगाह करें]," तो यह उनके लिए ज़्यादा अच्छा और उचित होता। मगर उनके द्वारा आज्ञा न मानने और विश्वास न करने के कारण उन पर अल्लाह की फिटकार पड़ी हुई है; वे बहुत थोड़े हैं जो ईमान रखते हैं। (46)
ऐ किताबवालो, विश्वास करो उस (क़ुरआन) पर, जो हमने उतार भेजी है, जो उस (किताब) की सच्चाई की पुष्टि करती है जो तुम्हारे पास पहले से है, इससे पहले कि हम तुम्हारे अंदर दिशा (की समझ) को मिटा दें, तुम्हें पीठ के पीछे उलट दें, या उन पर लानत करें, जिस तरह 'सब्त' [Sabbath] के नियम तोड़नेवालों पर हमारी फिटकार पड़ी थी। और अल्लाह की मर्ज़ी तो पूरी होकर ही रहती है। (47)
अल्लाह इस बात को कभी माफ़ नहीं करता कि उसकी (ख़ुदायी के) साथ किसी साझेदार [Partner] को जोड़ा जाए : इसके अलावा जैसा भी निचले दर्जे का गुनाह हो, वह जिसे चाहेगा, माफ़ कर देगा, मगर जिस किसी ने अल्लाह का साझेदार ठहराया, तो उसने एक बड़ा झूठ गढ़ लिया। (48)
(ऐ रसूल), क्या आपने उन लोगों पर विचार नहीं किया जो अपने आपको पवित्र होने का दावा करते हैं? नहीं! बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है, उसे (बुराइयों से बचाकर) पवित्र बना देता है : किसी के साथ राई के दाने बराबर भी ज़ुल्म नहीं किया जाएगा। (49)
देखो! वे किस तरह अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ते हैं? यह तो अपने आप में ही बड़ा भारी गुनाह है! (50)
क्या तुम नहीं देखते कि जिन लोगों को अल्लाह की किताब (के ज्ञान) का एक हिस्सा दिया गया था, वे अब मूर्तियों और शैतानी ताक़तों में विश्वास रखते हैं? वे (अरब के) विश्वास न करनेवालों के बारे में कहते हैं, "ये ईमानवालों से ज़्यादा सही रास्ते पर हैं।" (51)
ये वे लोग हैं जिन्हें अल्लाह ने ठुकरा दिया है : और जिसे अल्लाह ने ठुकरा दिया हो, तो (ऐ रसूल) आप उसका कोई मददगार नहीं पाएंगे। (52)
जो कुछ अल्लाह के पास है, क्या उसमें इनका कोई हिस्सा है? अगर है, फिर तो ये लोगों को राई बराबर भी नहीं देंगे। (53)
क्या ये (दूसरे) लोगों से जलते हैं कि अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़ल से (रसूल क्यों बना) दिया है? हमने इबराहीम के उत्तराधिकारियों को किताब और समझ-बूझ प्रदान किया था ----- और हम ने उन्हें बड़ा राज-पाट दिया था---- (54)
फिर उनमें से कुछ ने तो उसमें विश्वास कर लिया, और कुछ ने उससे मुँह मोड़ लिया। जहन्नम की आग बहुत बुरी तरह भड़क रही है। (55)
वे लोग जो हमारी आयतों को मानने से इंकार करते हैं, उन्हें हम (जहन्नम की) आग में झोंक देंगे। जब उनकी खालें पूरी तरह जल भुन जाएँगी, तो हम उनकी जगह नयी खालों को चढ़ा देंगे, ताकि उन्हें दर्द का अहसास होता रहे : अल्लाह प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (56)
और जो लोग (हमारी आयतों पर) ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें हम ऐसे बाग़ो में दाखिल करेंगे, जिनके नीचे नहरें बह रहीं होगी, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। उनके लिए वहाँ (मर्दों और औरतों के) पवित्र जोड़े होंगे, और हम उन्हें ठंडी तरोताज़ा छाँव में दाखिल करेंगे। (57)
अल्लाह तुम (लोगों) को आदेश देता है कि तुम्हारे पास अगर किसी की अमानतें [Deposits] हों, तो उसे उसके सही हक़दारों को वापस कर दो, और, जब लोगों के बीच फ़ैसला करो, तो इंसाफ़ करो : अल्लाह ने तुम्हें जो नसीहतें दी हैं, सब कितनी अच्छी हैं, क्योंकि अल्लाह सब कुछ सुनता, सब देखता है। (58)
ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो, और उनका भी कहना मानो जो तुम में से हाकिम हैं। अगर तुम्हारे बीच किसी मामले में झगड़ा हो जाए, तो तुम फ़ैसले के लिए उस मामले को अल्लाह और रसूल के पास ले जाओ, अगर सचमुच तुम अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते हो : यह ज़्यादा अच्छा होगा और नतीजे के हिसाब से भी बेहतर होगा। (59)
(ऐ रसूल), क्या आप उन (पाखंडी) लोगों को नहीं देखते, जो यह दावा करते हैं कि वे उस चीज़ पर ईमान रखते हैं जो आप पर उतारी गई है, और उस पर भी जो आप से पहले उतारी गई है, मगर इसके बावजूद वे आपस के मामलों में फ़ैसले के लिए ना-इंसाफ़ ज़ालिमों के पास जाते हैं, हालांकि उन्हें हुक्म दिया गया है कि वे उन (ज़ालिमों) को ठुकरा दें? शैतान तो उन्हें भटकाकर सीधे रास्ते से बहुत दूर ले जाना चाहता है। (60)
जब उनसे कहा जाता है कि "(फ़ैसला कराने के लिए) अल्लाह की आयतों की तरफ़, और रसूल की तरफ़ आओ" तो (ऐ रसूल), आप पाखंडियों [मुनाफ़िकों] को देखते हैं कि वे आपसे मुँह मोड़कर चल देते हैं। (61)
जब उनकी अपनी करतूतों के कारण उन पर कोई बड़ी मुसीबत आ जाती है, तब वे आपके पास अल्लाह की क़समें खाते हुए आते हैं, (और कहते हैं), "हम तो केवल भलाई का काम और आपस में मेल-मिलाप चाहते हैं? (62)
इनके दिलों के अंदर क्या है, उसे अल्लाह अच्छी तरह जानता है, अत: जो कुछ वे कहते हैं उन पर ध्यान न दें, उन्हें नसीहत करें, और उनके बारे में उनसे दिल में उतर जानेवाले शब्दों में बात करें। (63)
हमने जितने भी रसूलों को भेजा, इसलिए भेजा कि अल्लाह की अनुमति से उनकी आज्ञा का पालन किया जाए। [ऐ रसूल] अगर ये (पाखंडी) लोग आपके पास आए होते, जब वे कोई गुनाह कर बैठते, और उन्होंने अल्लाह से माफ़ी की गुहार लगायी होती, और रसूल ने उनकी माफ़ी के लिए दुआ की होती, तो वे पाते कि अल्लाह तौबा [repentance] क़बूल करता है और वह बेहद दयावान है। (64)
आपके रब की कसम! ये उस वक़्त तक पक्के ईमानवाले नहीं होंगे जब तक कि वे आपस के सारे झगड़ों का फ़ैसला आपसे न कराएँ, और फिर आपके फ़ैसले पर अपने दिलों में किसी तरह की खटक न पाएँ, और उसे पूरी तरह मान लें---- (65)
अगर कहीं हमने उन्हें आदेश दिया होता कि "अपनी जान दे दो” या “अपने घरों से (हिजरत कर के) निकल खड़े हो," तो बहुत थोड़े लोगों को छोड़कर, उन्होंने ऐसा नहीं किया होता ---- अगर उन्होंने वह किया होता जैसा उनको कहा गया था, तो उनके लिए कहीं बेहतर होता और उनके ईमान की ज़्यादा मज़बूती से पुष्टि हो जाती, (66)
और हम ने अपनी ओर से उन्हें बड़ा भारी इनाम दिया होता, (67)
और उन्हें सीधा रास्ता दिखाया होता, (68)
जो कोई अल्लाह और रसूल की आज्ञा मानता है, वह उन लोगों में शामिल होगा जिन पर अल्लाह ने अपनी नेमतें [blessing] उतारी हैं : (उनमें) नबियों की जमाअत, हमेशा सच बोलने वाले, सच्चाई की गवाही देनेवाले, और नेक व अच्छे लोग हैं--- क्या ही अच्छे साथी हैं ये! (69)
यह अल्लाह का ख़ास करम [favour] है। कोई नहीं है जो अल्लाह से बेहतर (इंसान का हाल) जानता हो। (70)
ऐ ईमानवालो! अपने बचाव के लिए (हथियार के साथ) तैयार रहो। फिर (युद्ध के लिए) चाहे छोटी टुकड़ियों में निकलो या इकट्ठे होकर एक साथ निकलो। (71)
तुम्हारे बीच कोई ऐसा भी आदमी है जो (युद्ध में जाने के समय) ज़रूर पीछे रह जाए : अगर तुम पर कोई मुसीबत आ पड़े, तो (ख़ुश हो कर) कहता है कि "अल्लाह ने मुझ पर बड़ी मेहरबानी की कि मैं उन लोगों के साथ न गया," (72)
इसके बावजूद, अगर (युद्ध में) तुम पर अल्लाह की मेहरबानी हो जाए, तो वह (जल मरेगा, और) ज़रूर यह कहेगा, " काश! मैं भी (युद्ध में) उन लोगों के साथ होता, तो मुझे भी बहुत कुछ (लूट का सामान) हासिल हुआ होता," जैसे मानो तुम्हारे और उसके बीच प्रेम व भाईचारे का कोई सम्बन्ध था ही नहीं। (73)
तो तुम में से जो लोग आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] के बदले इस संसार की ज़िंदगी को (अल्लाह के हाथों) बेचने के लिए तैयार हों, तो उन्हें चाहिए कि अल्लाह के रास्ते में लड़ें। जो कोई अल्लाह के रास्ते में लड़ता है, चाहे वह मारा जाए या वह जीत जाए, हम उसे बड़ा भारी इनाम देंगे। (74)
[ईमानवालो!] तुम्हें क्या हुआ है कि तुम अल्लाह के रास्ते में नहीं लड़ते? हालाँकि कितने ही सताए हुए मर्द हैं, औरतें हैं, बच्चे हैं, जो (ज़ुल्म से तंग आकर) पुकारते हैं, "हमारे रब! हमें इस (मक्का की) बस्ती से छुटकारा दिला जहाँ के लोग ज़ुल्म करने में लगे हैं! और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा रखवाला बना दे और किसी को हमारी मदद करने के लिए खड़ा कर दे।" (75)
ईमानवालों का लड़ना तो अल्लाह के ही रास्ते में होता है, जबकि (सच्चाई से) इंकार करनेवाले शैतान व अन्याय के रास्ते में लड़ते हैं। अतः तुम शैतान के सहयोगियों से लड़ो : शैतान की चालें (सच्चाई के मुक़ाबले में) सचमुच कमज़ोर होती हैं। (76)
[ऐ रसूल], क्या आपने उन लोगों की हालत नहीं देखी जिनसे (पहले) कहा गया था कि "(युद्ध करने से) अपने हाथ रोके रखो, पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो और ज़कात अदा करो?" फिर जब उन्हें युद्ध करने का आदेश दिया गया, तो उनमें से कुछ लोग इंसानों से ऐसा डरने लगे जैसे कोई अल्लाह से डरता हो, बल्कि उससे भी ज़्यादा डरने लगे, और कहने लगे, "हमारे रब! तूने हमें युद्ध करने का क्यों आदेश दे दिया? काश कि तू ने हमें थोड़ा सा और समय दिया होता।" आप उनसे कह दें, "इस दुनिया की ख़ुशियाँ तो बहुत थोड़ी हैं, जो लोग (इंसानों से डरने के बजाए) अल्लाह का डर रखते हैं, उनके लिए आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी कहीं बेहतर है : वहाँ तुम्हारे साथ राई के दाने के बराबर भी अन्याय नहीं होगा। (77)
तुम कहीं भी रहो, मौत तो तुम्हें आकर रहेगी, चाहे तुम किसी ऊँचे क़िलों में ही क्यों न (छिपे) हो।" जब उनके साथ कोई अच्छी घटना घटती है, तो कहते हैं, "यह तो अल्लाह की तरफ़ से (हमारी कोशिशों का बदला) है," मगर जब उन्हें कोई नुक़सान पहुँचता है, तो [ऐ रसूल], वे कहते हैं, "यह तुम्हारे कारण हुआ है।" आप कह दें, "जो कुछ भी होता है, सब अल्लाह की ही तरफ़ से होता है।" आख़िर इन लोगों को क्या हो गया कि कोई भी बात कही जाए, लगता है कि ये इसे समझते ही नहीं? (78)
(सच तो यह है कि) कोई भी अच्छी चीज़ जो तुम्हारे साथ होती है, वह अल्लाह की तरफ़ से होती है; और कोई भी बुरी हालत जो तुम्हें पेश आती है, वह असल में ख़ुद तुम्हारी तरफ़ से (बुरे कर्मों के चलते) होती है। [ऐ रसूल], हमने आपको लोगों के पास संदेश पहुँचानेवाला [रसूल] बनाकर भेजा है; और (इस बात पर) अल्लाह का गवाह होना ही काफ़ी है। (79)
जिस किसी ने रसूल की आज्ञा मानी, उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया। और जिस किसी ने मुँह मोड़ा, तो [ऐ रसूल], हमने आपको ऐसे लोगों पर कोई रखवाला [overseer] बनाकर तो नहीं भेजा है। (80)
वे (आप से तो) कहते हैं, "आपका हुक्म मान लिया," मगर जैसे ही वे आपके पास से उठ कर बाहर जाते हैं, तो उनमें से कुछ लोग आपकी बातों के ख़िलाफ रात में षड्यंत्र करते हैं। जो कुछ वे षड्यंत्र करते हैं, अल्लाह उसका हिसाब लिख लेता है, सो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें, और अल्लाह पर भरोसा रखें : आपके काम बनाने के लिए अल्लाह ही काफ़ी है! (81)
क्या वे इस क़ुरआन में सोच-विचार नहीं करते? अगर यह अल्लाह के अलावा किसी दूसरे की तरफ़ से होती, तो ज़रूरी था कि उन लोगों ने इसमें बहुत सी बेमेल बातें [inconsistency] पायी होतीं। (82)
जब कभी उनके पास किसी मामले की ख़बर पहुँचती है, चाहे वह शांति से जुड़ी बात हो या युद्ध से, तो वे उसे (तुरंत) लोगों में फैलाने लगते हैं; हालाँकि अगर वे उस (ख़बर) को अल्लाह के रसूल और उनमें जो लोग अधिकार रखते हैं, उनके पास ले जाते, तो उन लोगों ने मामले की जाँच-पड़ताल से सच्चाई जान ली होती। अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत [mercy] न होती, तो थोड़े लोगों के सिवा तुम सब शैतान के पीछे चलने लग जाते। (83)
अतः [ऐ रसूल!] अल्लाह के रास्ते में युद्ध करें। आप तो केवल अपने काम के लिए ही ज़िम्मेदार हैं। ईमानवालों को भी (लड़ने के लिए) उभारते रहें। बहुत सम्भव है कि अल्लाह विश्वास न करनेवालों की ताक़त को बहुत कम कर दे, कि अल्लाह ताक़त में बहुत मज़बूत, और सज़ा देने में बड़ा कठोर है। (84)
जो कोई अच्छाई के रास्ते पर चलने के पक्ष में बोलता है, तो वह उससे होनेवाले फ़ायदे में हिस्सेदार होगा, और जो कोई बुराई के रास्ते पर चलने के पक्ष में बोलेगा, तो वह उससे होनेवाली बुराई के बोझ का हिस्सेदार होगा : अल्लाह को हर चीज़ पर नियंत्रण हासिल है। (85)
[ईमानवालो], जब कभी तुम्हें दुआ देकर सलाम किया जाए, तो (चाहे युद्ध हो रहा हो, तब भी) तुम सलामती की उससे अच्छी दुआ दिया करो, या (कम से कम) जो कहा गया है, जवाब में उसी को दोहरा दो : अल्लाह हर चीज़ का हिसाब रखता है। (86)
वह अल्लाह है : उसके सिवा कोई बंदगी के लायक़ [ख़ुदा] नहीं। वह क़यामत के दिन तुम सब को एक साथ (अपने सामने) इकट्ठा करेगा, इस बात में कोई संदेह नहीं, और अल्लाह से बढ़कर किस की बात सच्ची हो सकती है? (87)
[ईमानवालो!], तुम्हें क्या हो गया है कि पाखंडियों [मुनाफ़िक़ो/ Hypocrites] के बारे में तुम दो गिरोह में बँट रहे हो, जबकि अल्लाह ने तो ख़ुद उनकी करतूतों के कारण उन्हें ठुकरा दिया है? क्या तुम उन्हें सही रास्ता दिखाना चाहते हो जिसे अल्लाह ने भटकता छोड़ दिया है? (याद रहे), जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, [ऐ रसूल], उसके लिए आप कभी कोई रास्ता नहीं ढूँढ सकते। (88)
उन (पाखंडियों] की दिली तमन्ना यह है कि तुम भी (सच्चाई पर) ईमान से इंकार कर दो, जैसा कि इन लोगों ने ख़ुद किया है, ताकि तुम भी उन्हीं जैसे हो जाओ; अत: उन्हें उस वक़्त तक अपना सहयोगी न बनाओ, जब तक कि वे अल्लाह के रास्ते में (मक्का के) अपने घर-बार छोड़कर (मदीना) न आ जाएं। अगर वे (मदीना आने से) पीठ फेरें, तो (यह दुश्मनों का साथ देना होगा, सो) उन्हें पकड़ो और जहाँ कहीं उनसे सामना हो जाए, उन्हें क़त्ल कर दो। उनमें से किसी को न अपना सहयोगी बनाना और न ही मददगार। (89)
मगर हाँ, उनमें से जो लोग (दुश्मनों का साथ छोड़कर) किसी ऐसी क़ौम के लोगों के साथ जा मिलें, जिनके साथ तुम ने कोई 'शांति-समझौता' [Peace treaty] कर रखा हो, या वे तुम्हारे पास इस हालत में आएँ कि उनके दिल लड़ने-भिड़ने से तंग आ चुके हों, न वे तुम से लड़ें और न (तुम्हारी तरफ़ से) अपनी क़ौम के लोगों से लड़ें (तो ऐसे लोगों पर हाथ न उठाओ)। (याद रखो), अगर अल्लाह चाहता तो उन लोगों को तुम पर हावी कर देता, और वे तुम से ज़रूर लड़े होते। सो अगर वे तुम से अलग रहें और तुम से न लड़ें, और तुम्हारी तरफ़ शांति का हाथ बढ़ाएँ, तो फिर अल्लाह ने उनके विरुद्ध क़दम उठाने का तुम्हारे लिए कोई रास्ता नहीं रखा है। (90)
इनके अलावा कुछ ऐसे लोग भी मिलेंगे जो अमन-चैन से रहना चाहते हैं, तुम्हारी तरफ़ से, और अपनी क़ौम के लोगों की तरफ़ से भी, मगर जब कभी उन्हें (तुम्हारे विरुद्ध) फ़साद व गड़बड़ी फैलाने का मौक़ा दोबारा मिल जाए, (तो वे मचल उठें, और) उसमें औंधे मुँह गिर पड़ें। अत: अगर ऐसे लोग तुम से (युद्ध करने से) न तो अपने को अलग-थलग करें, और न तुम्हारी ओर शांति का हाथ बढ़ाएँ, और न ही (तुम्हारे विरुद्ध) लड़ाई से अपने हाथ रोकें, तो उन्हें भी पकड़ो और जहाँ कहीं भी उनसे सामना हो जाए, उनका क़त्ल करो : ऐसे लोगों के विरुद्ध हमने तुम्हें खुला अधिकार दे रखा है। (91)
और (देखो!), ऐसा कभी नहीं होना चाहिए कि एक ईमानवाला दूसरे ईमानवाले की हत्या कर डाले, हाँ, अगर भूल-चूक से ऐसा हो जाए तो बात और है। अगर कोई ग़लती से एक ईमानवाले की हत्या कर दे, तो उसे एक मुस्लिम ग़ुलाम [slave] को आज़ाद करना होगा और मारे गए आदमी के घरवालों को भरपाई [compensation] में "ख़ून-बहा" [blood-money] अदा करना होगा, हाँ, अगर घरवाले उदारता से (ख़ून-बहा) माफ़ कर दें तो और बात है; अगर मरनेवाला किसी ऐसी (दुश्मन) क़ौम से हो जिनसे लड़ाई चल रही हो, मगर ख़ुद वह ईमानवाला हो, तो ऐसी हालत में भरपाई में केवल एक मुस्लिम ग़ुलाम को आज़ाद करना होगा (ख़ून-बहा देने की ज़रूरत नहीं); अगर मरनेवाला उस क़ौम के लोगों में से हो जिसके साथ तुम ने कोई शांति-समझौता कर रखा हो, तो भरपाई में उसके घरवालों को 'ख़ून-बहा' भी देना होगा, और साथ में एक मुस्लिम ग़ुलाम को आज़ाद भी करना होगा। अगर किसी के पास ग़ुलाम न हो (और न ही ग़ुलाम को ख़रीद कर आज़ाद करने के लिए माल हो), तो अल्लाह के सामने (अपने गुनाह की) तौबा [repentance] के लिए उसे चाहिए कि वह लगातार दो महीने रोज़े रखे : अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और (अपने हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है। (92)
अगर एक ईमानवाला दूसरे ईमानवाले की जान-बूझकर हत्या कर डाले, तो उसकी सज़ा जहन्नम है, जिसमें वह हमेशा रहेगा : (समझ लो कि) अल्लाह उससे सख़्त नाराज़ हुआ, उसे ठुकरा दिया गया, और उसके लिए अल्लाह ने ज़बरदस्त यातना तैयार कर रखी है। (93)
अत: ऐ ईमानवालो! जब तुम अल्लाह के रास्ते में लड़ने के लिए निकलो, तो अच्छी तरह पता लगा लो, और अगर कोई तुम्हें सलामती की दुआ के साथ 'सलाम' करे, तो इस लालच से कि तुम्हें कुछ सांसारिक जीवन का माल (लूट में) हासिल हो जाए, उससे यह न कहो कि "तुम ईमान नहीं रखते,"(और लड़ने लग जाओ) ----- अल्लाह के पास तुम्हारे लिए बहुत सारी नेमतें हैं। एक समय तुम्हारी हालत भी ऐसी ही थी, इसलिए ठीक से पता लगा लिया करो : तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (94)
ईमानवालों में से वे लोग जो शरीर से मजबूर नहीं हैं, और (बिना कारण) घर में बैठ रहते हैं, वे उनके बराबर नहीं हो सकते जो लोग अल्लाह के रास्ते में अपनी जानों और अपने माल से जी-तोड़ संघर्ष [जिहाद] करते हैं। अल्लाह ने ऐसे लोगों का दर्जा घर में रुके रह जानेवालों से ऊँचा रखा है----हालाँकि उसने हर ईमानवाले से अच्छे इनाम का वादा कर रखा है, मगर (अल्लाह के रास्ते में) जी-तोड़ संघर्ष [जिहाद] करनेवालों पर अपना ख़ास करम करते हुए वह बहुत ज़बरदस्त इनाम देगा, जो घर में रुके रहनेवालों से कहीं बड़ा होगा ----- (95)
यह ऊँचे दर्जे हैं जो उसकी तरफ़ से दिए जाएंगे, और साथ में गुनाहों की माफ़ी, और उसकी रहमत [mercy] : अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बड़ा दयावान है। (96)
जो लोग (दुश्मनों के साथ रहकर) अपने हाथों अपना नुक़सान कर रहे हैं, उनकी रूहें निकालते समय फ़रिश्ते उनसे पूछेंगे, "तुम किस हाल में थे?" वे कहेंगे, "हम ज़मीन पर बेबस थे, हम पर बड़े ज़ुल्म किए गए थे।" फ़रिश्ते कहेंगे, "मगर क्या अल्लाह की ज़मीन इतनी फैली हुई न थी कि तुम घर-बार छोड़कर कहीं ओर चले जाते?" इन लोगों का ठिकाना जहन्नम होगा, और क्या ही बुरा ठिकाना है वह! (97)
मगर हाँ, जो मर्द, औरतें और बच्चे सचमुच बेबस और मजबूर थे जिनके बस में कोई साधन नहीं था और न ही वहाँ से निकलने का कोई रास्ता ------ (98)
तो सम्भव है कि अल्लाह ऐसे लोगों को माफ़ कर दे; क्योंकि अल्लाह ग़लतियों को माफ़ करनेवाला और बेहद क्षमा करनेवाला है। (99)
जो कोई अल्लाह के रास्ते में घर-बार छोड़कर निकलेगा, वह ज़मीन में शरण लेने की बहुत जगह और साथ में बहुत कुछ पाएगा, और अगर कोई अपने घर से सब कुछ छोड़कर अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ निकले, और फिर उसकी मौत हो जाए, तब भी उसका इनाम अल्लाह की तरफ़ से बिल्कुल पक्का है। अल्लाह (हर हाल में) बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (100)
[ईमानवालो], जब तुम (युद्ध के लिए) यात्रा कर रहे हो, और अगर तुम्हें डर हो कि विश्वास न करनेवाल्रे तुम्हें नुक़सान पहुंचा सकते हैं, तो तुम पर इस बात में कोई गुनाह नहीं अगर तुम नमाज़ को कुछ छोटी कर लो : विश्वास न करनेवाले लोग तुम्हारे कट्टर दुश्मन हैं। (101)
[ऐ रसूल!], जब आप (लड़ाई के दौरान) ईमानवालों के बीच हों, और उन्हें नमाज़ पढ़ाने के लिए खड़े हों, तो उनमें से एक गिरोह को चाहिए कि आपके साथ नमाज़ के लिए खड़ा हो जाए, और अपने हथियार साथ लिए रहे, और फिर जब वे सजदा कर लें, तो उन्हें चाहिए कि वे पीछे जाकर अपना मोर्चा संभाल लें। उसके बाद, दूसरे गिरोह के लोग, जिन्होंने अभी तक नमाज़ न पढ़ी हो, उन्हें आगे आकर आपके साथ नमाज़ पढ़नी चाहिए, और उन्हें भी अपने बचाव के सामान और हथियारों से लैस होना चाहिए : विश्वास न करनेवाले तो दिल से चाहते हैं कि तुम (लोग) अपने हथियारों और सामान से बेपरवाह हो जाओ, ताकि वे तुम पर एक झटके में टूट पड़ें। अगर तेज़ बारिश या बीमारी ने तुम्हें आ घेरा हो, तो इस बात के लिए तुम दोषी नहीं होगे अगर तुम अपने हथियार किनारे रख दो, मगर तुम अपने बचाव के लिए तैयार रहा करो। सचमुच अल्लाह ने विश्वास न करनेवालों के लिए अपमानित कर देनेवाली यातना तैयार कर रखी है। (102)
नमाज़ पढ़ लेने के बाद भी बराबर अल्लाह को याद करते रहो--- खड़े हुए, बैठे हुए, और करवट लेटे हुए भी----- एक बार जब तुम (दुश्मनों से) सुरक्षित हो जाओ, तो फिर नमाज़ पूरे नियम के अनुसार पढ़ो, क्योंकि ईमानवालों के लिए निर्धारित समय पर पाबन्दी से नमाज़ पढना ज़रूरी है। (103)
दुश्मन का पीछा करने में ऐसे कमज़ोर दिल न बन जाओ : अगर तुम तकलीफ़ झेल रहे हो, तो वे भी तकलीफ़ झेल रहे हैं, मगर तुम अल्लाह से कुछ मिल जाने की उम्मीद रखते हो, जबकि वे अल्लाह से कोई उम्मीद नहीं रख सकते। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (104)
[ऐ रसूल], हम ने आप पर यह किताब सच्चाई के साथ उतार भेजी है, ताकि जैसा अल्लाह ने आपको बता दिया है, उसी के मुताबिक़ आप लोगों के बीच फ़ैसला करें। आप उन लोगों की वकालत न करें जिन्होंने भरोसे को तोड़ डाला है। (105)
अल्लाह से माफ़ी चाहें : वह बहुत माफ़ करनेवाला, दयावान है। (106)
आप ऐसे लोगों की वकालत न करें जो ख़ुद अपनी जानों के साथ विश्वासघात करते हैं : अल्लाह ऐसे किसी आदमी को पसंद नहीं करता, जो धोखा देने और गुनाह करने में लगा हो। (107)
वे लोगों से अपने आपको छिपाने की कोशिश करते हैं, मगर वे अल्लाह से नहीं छिप सकते। अल्लाह तो उस समय भी उनके साथ मौजूद होता है, जब वे रातों में शैतानी योजनाएं बनाते हैं, और ऐसी बातें करते हैं जो अल्लाह को पसंद नहीं : जो कुछ भी वे करते हैं, वह अल्लाह के ज्ञान के घेरे से बाहर नहीं। (108)
(ईमानवालो), इस दुनिया में तो तुम इन लोगों की तरफ़ से बहस कर रहे हो, मगर क़यामत के दिन उनकी तरफ़ से अल्लाह के साथ कौन बहस करेगा? उनके बचाव में कौन होगा? (109)
तब भी, जो कोई बुरा कर्म करे या अपने हाथों अपना नुक़सान कर बैठे, और फिर अल्लाह से माफ़ी की प्रार्थना करे, तो वह अल्लाह को बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान पाएगा। (110)
वह जो गुनाह के काम करता है, तो वह अपनी ही जान पर ज़ुल्म करता है----- अल्लाह सब जाननेवाला, (और हर काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है--- (111)
अगर कोई आदमी जुर्म करता है, या गुनाह करता है, और फिर उसका इल्ज़ाम किसी निर्दोष आदमी पर थोप देता है, तो उसने एक बड़े धोखे और भारी गुनाह का बोझ अपनी गर्दन पर डाल लिया। (112)
[ऐ रसूल], अगर अल्लाह का फ़ज़ल [Grace] और उसकी रहमत [mercy] आपके साथ न होती, तो उनमें से कुछ लोगों ने आपको सीधे रास्ते से भटका देने की कोशिश ज़रूर की होती; हालाँकि वे ख़ुद अपने आपको ही भटका रहे हैं, और वे आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते, क्योंकि अल्लाह ने आप पर किताब उतारी है और (हर चीज़ की) समझ-बूझ दी है, और वह सिखाया है जो आप नहीं जानते थे। आप पर अल्लाह का फ़ज़ल [bounty] सचमुच बहुत ज़्यादा रहा है। (113)
उनकी अधिकतर गोपनीय बातों में कोई भलाई की बात नहीं होती। हाँ, जो आदमी दान देने या भलाई करने या लोगों के बीच मेल-जोल बढ़ाने के लिए कोई आदेश दे, तो उसकी बात और है। तो जो कोई इन कामों को अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए करेगा, उसे हम ज़बरदस्त इनाम देंगे; (114)
कोई आदमी जिसके सामने (अल्लाह की तरफ़ से भेजा हुआ) मार्गदर्शन स्पष्ट कर दिया गया हो, फिर भी अगर वह अल्लाह के रसूल का विरोध करता है, और ईमानवालों का रास्ता छोड़कर कोई दूसरे रास्ते पर चलता है, तो हम उसे उसके चुने हुए रास्ते पर चलने के लिए छोड़ देंगे ---- हम उसे जहन्नम में जलायेंगे, और क्या ही बुरा ठिकाना है वह! (115)
अल्लाह को छोड़कर किसी दूसरे की इबादत की जाए, इसको वह कभी माफ़ नहीं करता ---- हालाँकि वह जिसके लिए चाहे, उसके छोटे-मोटे गुनाह माफ़ कर ही देता है---- तो जिस किसी ने ऐसा किया, वह भटक कर सीधे रास्ते से बहुत दूर जा पड़ा। (116)
मूर्तिपूजकों का हाल यह है कि वे अल्लाह के बदले बस कुछ देवियों को पुकारते हैं, और उस शैतान को पुकारते हैं, (117)
जो बाग़ी हो गया, और जिसे अल्लाह ने ठुकरा दिया था, उसने कहा था, "मैं तेरे बन्दों में से (गुमराह लोगों का) एक हिस्सा लेकर रहूँगा ; (118)
मैं उन्हें सीधे रास्ते से भटकाऊँगा और उनके अंदर झूठी कामनाएं जगाउंगा; मैं उन्हें हुक्म दूँगा कि वे चौपायों के कानों में चीर लगा दें, और उन्हें मैं हुक्म दूँगा कि वे अल्लाह की रचना [creation] में बिगाड़ पैदा कर दें।" जिस किसी ने अल्लाह से हटकर शैतान को अपना संरक्षक बनाया, वह पूरी तरह बर्बाद हो गया : (119)
वह उनसे तरह-तरह के वादे करता है, और उनके अंदर झूठी उम्मीदें बढ़ा देता है, मगर शैतान का वादा तो धोखे के सिवा कुछ नहीं होता। (120)
ऐसे लोगों के लिए जहन्नम ही उनका घर होगा, और वे वहाँ से निकल भागने का कोई रास्ता न पाएंगे, (121)
मगर जो लोग ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें हम (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेंगे, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ उन्हें हमेशा रहना है ------ अल्लाह की तरफ़ से यह सच्चा वादा है, और अल्लाह से बढ़कर सच्चाई की बात कौन बोल सकता है। (122)
यह न तो तुम्हारी (झूठी) उम्मीदों के मुताबिक़ होगा, और न ही उनकी जो किताबवाले हैं : जो कोई भी बुरे काम करेगा, उसे उसका फल मिलेगा और उसे ऐसा कोई नहीं मिलेगा जो अल्लाह के खिलाफ़ उसको बचा सके या उसकी मदद कर सके; (123)
जो कोई भी अच्छे कर्म करेगा, चाहे मर्द हो या औरत, और वह ईमान रखता हो, तो वह जन्नत में दाख़िल होगा, और उसके साथ रत्ती भर भी ज़ुल्म नहीं होगा। (124)
दीन [धर्म] के मामले में उन लोगों से बेहतर कौन हो सकता है, जो अपने आपको पूरी तरह अल्लाह के सामने झुका दे, अच्छा कर्म करे, और इबराहीम के दीन (को सही मानकर उस रास्ते) पर चले, जो अपने ईमान में सच्चा था? (यह जान लो कि) अल्लाह ने इबराहीम को अपना दोस्त बनाया था। (125)
[याद रखो!] आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की है: अल्लाह सारी चीज़ों की ख़बर रखता है। (126)
[ऐ रसूल!], लोग आपसे औरतों के क़ानून के बारे में पूछते हैं, आप कह दें, "अल्लाह ख़ुद ही तुम्हें उनसे जुड़े क़ानून बताता है. तुम्हारे सामने पहले ही हमारी किताब [क़ुरआन] की वह आयतें पढ़ कर सुनायी जा चुकी हैं, जो उन अनाथ लड़्कियों के बारे में हैं [जो तुम्हारी देख-रेख में हैं], जिनकी (विरासत का) निर्धारित हिस्सा तुम अदा नहीं करते और (इसीलिए) उनके साथ शादी कर लेना चाहते हो, और (इसी तरह) बेसहारा बच्चों के बारे में भी आदेश है ------ अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अनाथों के साथ इंसाफ़ से पेश आओ : जो कुछ भलाई का काम तुम करते हो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है।" (127)
अगर किसी औरत को अपने पति की तरफ़ से ज़ोर-ज़बरद्स्ती करने या अलग हो जाने का डर हो, तो इस बात के लिए उन दोनों का कोई दोष नहीं होगा, अगर वे आपस में मेल-मिलाप की कोई राह निकाल लें, कि मेल-मिलाप तो बहुत अच्छी चीज़ है। हालाँकि आदमी के मन में लालच व स्वार्थ की प्रवृत्ति पायी जाती है, फिर भी अगर तुम अच्छा व्यवहार करो और (अल्लाह का) डर रखो, तो जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखनेवाला है। (128)
चाहे तुम कितनी ही कोशिश कर लो, तुम कभी यह नहीं कर सकते कि अपनी बीवियों के साथ एक-बराबर का व्यवहार कर सको, हाँ मगर ऐसा न करो कि किसी एक बीवी पर बिल्कुल ही ध्यान न दो, और उसे (शादी और तलाक़ के बीच) लटका कर रख दो। अगर तुम (बीवियों के मामले में) अपने आपको सुधारते रहो, अल्लाह से डरते (हुए अन्याय करने से बचते) रहो, तो अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, दयावान है, (129)
अगर पति और पत्नी अलग हो ही जाएं, तो अल्लाह अपने बेपनाह फ़ज़ल [Bounty] से दोनों के लिए (बेहतर) व्यवस्था कर देगा : अल्लाह असीमित फैलाव वाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है. (130)
आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब चीज़ अल्लाह की ही है।
हम ने तुमसे पहले जिन लोगों को किताब दी थी, उन्हें भी हुक्म दिया था, और हम तुम्हें भी हुक्म देते हैं कि "अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचो।" अगर तुम अल्लाह की बात पर ध्यान न भी दो, तब भी आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब अल्लाह का ही है, और वह तो किसी पर निर्भर नहीं, वही सारी प्रशंसा के लायक़ है। (131)
हाँ, सचमुच आसमानों और ज़मीन की सारी चीज़ें अल्लाह की ही हैं, और जो लोग अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, तो उनका काम बनाने के लिए वह काफ़ी है। (132)
ऐ लोगो! अगर वह चाहे तो तुम्हें पूरी तरह हटा दे, और तुम्हारी जगह नये लोगों को ले आए : उसे ऐसा करने की पूरी शक्ति है। (133)
अगर कोई इस दुनिया का बदला चाहता है, तो (याद रहे) इस दुनिया का बदला और आने वाली दुनिया का बदला, दोनों तो अल्लाह को ही देना है : वह हर चीज़ सुनता भी है, देखता भी है। (134)
ऐ ईमानवालो! तुम इंसाफ़ से काम लिया करो, और अल्लाह के लिए (सच्ची) गवाही देनेवाले बनो, चाहे मामला ख़ुद तुम्हारे विरुद्ध हो, या तुम्हारे माँ-बाप और रिश्तेदारों के विरुद्ध ही क्यों न हो, चाहे आदमी अमीर हो या ग़रीब, अल्लाह दोनों की बेहतर देखभाल कर सकता है। अपनी इच्छाओं के पीछे चलने से बचो, ताकि तुम इंसाफ़ से काम ले सको --- (गवाही के समय) अगर इंसाफ़ से छेड़-छाड़ करोगे या उसे नज़रअंदाज़ करोगे, तो जो कुछ तुम करते हो, (याद रखो) अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर रहती है। (135)
ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह पर और उसके रसूल पर विश्वास करो, और उस किताब [क़ुरआन] पर विश्वास करो जो उसके रसूल पर उतारी गयी है, और उन (किताबों) पर भी, जिनको वह इसके पहले (दूसरे पैग़म्बरों पर) उतार चुका है। कोई आदमी जो अल्लाह पर ईमान न रखता हो, और न ही उसके फ़रिश्तों पर, न उसकी किताबों पर, न उसके रसूलों पर, और न ही आख़िरी दिन पर विश्वास रखता हो, तो वह भटक कर (सही रास्ते से) बहुत दूर जा पड़ा। (136)
रहे वे लोग जो (सच्चाई पर) ईमान लाए, फिर ईमान को ठुकरा दिया, उसके बाद फिर से विश्वास कर लिया, और फिर दोबारा ईमान को ठुकरा दिया और फिर (सच्चाई को मानने से) इंकार में बढ़ते ही चले गए, तो ऐसों को अल्लाह माफ़ नहीं करेगा, और न ही उन्हें (कामयाबी का) कोई रास्ता दिखाएगा। (137)
[ऐ रसूल], ऐसे पाखंडियों [मुनाफ़िको] से कह दें, कि उनके लिए दुख देनेवाली यातना तैयार है; (138)
वे (पाखंडी) जो ईमानवालों को छोड़कर विश्वास न करनेवालों को अपना सहयोगी बनाते हैं, क्या वे उनके द्वारा इज़्ज़त व ताक़त चाहते हैं? हक़ीक़त यह है कि सारी की सारी इज़्ज़त व ताक़त अल्लाह की है (वह जिसे चाहे, दे दे)। (139)
और (ईमानवालो, देखो!), अल्लाह अपनी 'किताब' में तुम्हारे लिए यह हुक्म उतार चुका है कि जब तुम देखो कि अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार किया जा रहा है और उनकी हँसी उड़ायी जा रही है, तो (वहाँ से हट जाओ, और) जब तब वे किसी दूसरी बात में न लग जाएँ, उनके साथ न बैठो, नहीं तो तुम ख़ुद भी उन्हीं के जैसे हो जाओगे : अल्लाह पाखंडियों [मुनाफिक़ों] और विश्वास न करनेवालों को (जो ऐसी बातों में लगे रहते हैं) एक साथ जहन्नम में इकट्ठा करनेवाला है। (140)
ये (पाखंडी) लोग तुम्हारी हालत देखते रहते हैं और प्रतीक्षा करते हैं कि तुम्हारे साथ क्या होता है, अगर अल्लाह की तरफ़ से तुम्हें जीत मिलती है, तो कहते हैं, "क्या हम भी तुम्हारे साथ न थे?" लेकिन अगर विश्वास न करनेवालों के हाथ कुछ सफलता लगती है, तो उनसे (अहसान जताते हुए) कहते हैं, "क्या हम (लड़ाई में) तुम पर हावी न थे, फिर भी हम ने तुम्हें ईमानवालों से बचा लिया?" अल्लाह क़यामत के दिन तुम सब के बीच फ़ैसला कर देगा, और वह विश्वास न करनेवालों को ऐसा कोई रास्ता नहीं देगा कि वे ईमानवालों पर हावी हो सकें। (141)
पाखंडी लोग अल्लाह को (और ईमानवालों को) धोखा देने की कोशिश करते हैं, मगर यह तो अल्लाह है जो उन्हें धोखे में पड़ा रहने देता है। जब वे नमाज़ के लिए खड़े होते है तो कसमसाते हुए, लोगों को दिखाने के लिए खड़े होते हैं, और अल्लाह को बस नाम के लिए ही याद करते हैं, (142)
यह करें कि वह करें, इसी के बीच हर समय डाँवाडोल होते रहते हैं, न एक पक्ष [ईमानवालों] की तरफ़ हैं, न दूसरे पक्ष [इंकार करनेवालों] की तरफ़। हक़ीक़त यह है कि अगर अल्लाह किसी को भटकता छोड़ दे, तो (ऐ रसूल) आप उसके लिए कोई राह नहीं निकाल पाएंगे। (143)
ऐ ईमानवालो! तुम ऐसा न करो कि ईमानवालों के बदले विश्वास न करनेवालों को अपना सहयोगी और रखवाला बना लो : क्या तुम चाहते हो कि अपने ही ख़िलाफ़ अल्लाह को स्पष्ट प्रमाण दे दो ? (144)
इसमें शक नहीं कि ये पाखंडी लोग जहन्नम के सबसे निचले हिस्से में डाले जाएंगे, और तुम (उस दिन) किसी को भी उनका मददगार नहीं पाओगे। (145)
हाँ, जो लोग तौबा कर लेंगे, अपने आपको सुधार लेंगे, अल्लाह के सहारे को मज़बूती से थाम लेंगे, और अपने दीन [धर्म] के मामले में पूरी भक्ति से उसी के हो रहेंगे : तो ये लोग भी ईमानवालों के साथ शामिल हो जाएंगे, और अल्लाह ईमान रखनेवालों को ज़बरदस्त इनाम देगा। (146)
[लोगो!] अगर तुम (अल्लाह की नेमतों का) शुक्र अदा करते रहो, और उस पर पक्का ईमान रखो, तो अल्लाह को तुम्हें यातना देकर क्या करना है? अल्लाह शुक्र अदा करनेवाले को हमेशा अच्छा बदला देता है और वह सबके हालात जानता है। (147)
अल्लाह इस बात को पसंद नहीं करता कि किसी की बुराई सबके सामने की जाए, हाँ, अगर किसी पर ज़ुल्म किया गया हो तो अलग बात है : वह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ जाननेवाला है। (148)
अगर तुम अच्छा काम करो, चाहे वह सबके सामने किया गया हो या छिपाकर किया गया हो, या अगर तुम किसी के बुरे काम को माफ़ कर दो, तो (अच्छी बात होगी, क्योंकि) अल्लाह सबसे बढ़कर (गुनाहों को) माफ़ करनेवाला, और (हर चीज़ करने की) ताक़त रखता है। (149)
रहे वे लोग जो अल्लाह और उसके रसूलों की बातों पर ध्यान नहीं देते, और उसके रसूलों के बीच फ़र्क़ पैदा करना चाहते हैं, और कहते हैं, "हम कुछ को मानते हैं और कुछ को नहीं मानते," इस तरह वे (ईमान और कुफ़्र के) बीच का कोई रास्ता अपनाना चाहते हैं, (150)
वे सचमुच (सच्चाई से) इंकार करनेवाले हैं : और विश्वास करने से इंकार करनेवालों के लिए हम ने अपमानित कर देनेवाली यातना तैयार कर रखी है। (151)
मगर अल्लाह उन लोगों को पूरा पूरा इनाम देगा जो उस पर और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं, और उन रसूलों में से किसी के बीच (ईमान के लिहाज़ से) फ़र्क़ नहीं करते। अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (152)
[ऐ रसूल], ये किताबवाले [यहूदी] आप से माँग करते हैं कि आप उन पर आसमान से एक किताब उतरवा दें (तब वे आपको सच्चा मान लेंगे), मगर उन लोगों ने तो मूसा [Moses] से इससे भी बड़ी चीज़ की माँग की थी, जब उन्होंने कहा था, "हमें अल्लाह को आँख के सामने दिखाओ," तो उनके इस अपराध पर बिजली की कड़क ने उन्हें आ दबोचा था। हालाँकि उनके पास खुली व स्पष्ट निशानियाँ आ चुकी थीं, इसके बावजूद उन्होंने बछड़े को पूजने की चीज़ बना लिया, तब भी हमने उन्हें माफ़ कर दिया और हमने मूसा को खुला अधिकार दिया था; (153)
उनको (सच्चाई पर चलने की) शपथ दिलाते समय हम ने तूर के पहाड़ को उनके ऊपर उठा दिया था; और उनसे कहा था, "(शहर के) दरवाज़े में झुक कर प्रवेश करना," और "सब्त [Sabbath] के नियमों को तोड़ न देना," और हमने उनसे बड़ी भारी शपथ ली थी। (154)
और इस तरह, उनके वचन तोड़ने के चलते, अल्लाह की आयतों को ठुकराने के चलते, नबियों को नाहक़ क़त्ल करने के कारण, और यह कहने के लिए, "हमारे दिल व दिमाग़ बंद हैं" ---- नहीं! बल्कि उनके अविश्वास के कारण अल्लाह ने उनके दिलों को ठप्पा लगाकर बंद कर दिया है, सो वे बहुत थोड़ा सा विश्वास करते हैं----- (155)
और इसलिए भी कि उन लोगों ने विश्वास नहीं किया, और मरयम [Mary] के ख़िलाफ बड़ा भारी लांछन लगा दिया, (156)
और कहा, “हमने मरयम के बेटे ईसा,मसीह [Jesus, the Messiah], अल्लाह के रसूल, को (सूली पर चढ़ाकर) क़त्ल कर डाला है,” (मगर सच्चाई यह थी कि) उन लोगों ने न तो उन्हें क़त्ल किया और न ही उन्हें सूली पर चढाया था, हालांकि उनलोगों को देखने में ऐसा ही लगा था ; जो (ईसाई) लोग उसके (सूली दिए जाने और दोबारा ज़िंदा होने के) बारे में मतभेद रखते थे, वे संदेह से भरे हुए थे, अटकल पर चलने के अलावा उनके पास कोई जानकारी न थी : निश्चय ही उन (यहूदी) लोगों ने उसे [ईसा को] क़त्ल नहीं किया ---- (157)
अल्लाह ने उन्हें [ईसा को] अपनी तरफ़ उठा लिया था। अल्लाह बड़े प्रभुत्ववाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (158)
किताबवालों में से एक आदमी भी ऐसा न होगा, जो मरने से पहले (ईसा) पर विश्वास न कर ले, और क़यामत के दिन वह उन लोगों के ख़िलाफ़ गवाह होंगे। (159)
यहूदियों के अत्याचार की वजह से, हमने कुछ अच्छी चीज़ें उनके लिए हराम [forbidden] कर दीं, जो उनके लिए पहले हलाल थीं : इस कारण से भी कि वे अक्सर दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकते थे; (160)
और उनके द्वारा सूद लिए जाने के कारण, जबकि उन्हें ऐसा करने से मना किया गया था ; और दूसरों की संपत्ति अवैध रूप से हड़पने के कारण. (याद रखो!), उनमें से जो लोग सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं, उनके लिए हम ने दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है। (161)
लेकिन उनमें से जो लोग ज्ञान में पक्के हैं और ईमान रखते हैं, जो किताब आप [मुहम्मद] पर उतारी गयी उस पर भी विश्वास करते हैं, और उस पर भी जो (किताबें) आपसे पहले उतारी गयी थीं ----- और वे लोग जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं, निर्धारित ज़कात देते हैं, और अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते हैं ----- ऐसे लोगों को हम बड़ा ज़बरदस्त इनाम देंगे। (162)
[ऐ रसूल], हमने आपके पास 'वही' [revelation] भेजी है, जैसा कि हम ने नूह [Noah] और उनके बाद आने वाले नबियों के पास भी ('वही') भेजी थी, इबराहीम [Abraham] को, इसमाईल [Ishmael] को, इसहाक़ [Isaac] को, याक़ूब [Jacob] और उसकी सन्तान को, ईसा [Jesus] को, अय्यूब [Job] को, यूनुस [Jonah] को, हारून [Aaron] को, और सुलैमान [Solomen] को भी भेजी ----- दाउद [David] को हम ने किताब [ज़बूर / Psalm] दी ------ (163)
और बहुत से दूसरे रसूल हैं जिनके बारे में हम तुम्हें (क़ुरआन में) पहले बता चुके हैं, और कुछ ऐसे भी हैं जिनके बारे में हम ने तुम्हें नहीं बताया है। (इसी तरह) मूसा [Moses] के साथ अल्लाह की सीधी बातचीत होती थी। (164)
यह सब वे रसूल थे जो (अच्छे कर्मों की) ख़ुशख़बरी सुनाने और (सच्चाई से इंकार के नतीजे की) चेतावनी देनेवाले बनाकर भेजे गए थे, ताकि एक बार रसूलों को भेज देने के बाद, आदमी के पास अल्लाह के सामने कोई बहाना बाक़ी न रहे (कि हमें बतानेवाला कोई न था) : अल्लाह बड़े प्रभुत्ववाला, (और अपने हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है। (165)
लेकिन अल्लाह ख़ुद ही उस चीज़ की गवाही देता है जो उसने [ऐ रसूल], आप पर उतारी है ----- उसने यह (किताब) अपनी पूरी जानकारी के साथ उतारी है ---- फ़रिश्ते भी इसकी गवाही देते हैं, हालाँकि अल्लाह की गवाही काफ़ी है। (166)
जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया और दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोका, तो वे (सीधे रास्ते से भटक गए और) गुमराही में बहुत दूर जा पड़े हैं ; (167)
अल्लाह उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया और वे (बेझिझक) ज़ुल्म करते हैं, और न ही वह उन्हें कोई सही मार्ग दिखाएगा (168)
सिवाय जहन्नम के मार्ग के, जहाँ वे हमेशा पड़े रहेंगे --- ऐसा करना अल्लाह के लिए बहुत-ही आसान है। (169)
ऐ लोगो! तुम्हारे रब की तरफ़ से सच्चाई लेकर हमारा रसूल तुम (लोगों) के पास आ गया है, अतः उस पर विश्वास करो ----- यही तुम्हारे लिए सबसे अच्छा होगा ---- क्योंकि अगर तुम विश्वास न भी करो, तो वह सारी चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं, वह तो वैसे भी अल्लाह की ही हैं, और (याद रखो), अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, (और हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है। (170)
ऐ किताबवालो! अपने दीन में हद से आगे न बढ़ जाओ, और अल्लाह के बारे में सच के सिवा कोई बात न कहो : मरयम [Mary] का बेटा, ईसा मसीह [Jesus, the Messiah] इससे ज़्यादा कुछ न था कि अल्लाह का रसूल था, उसकी एक 'वाणी' था, जिसे उसने मरमय तक पहुँचाया था, और एक 'रूह' थी जो अल्लाह की ओर से भेजी गयी थी। अत: अल्लाह पर और उसके रसूलों पर ईमान रखो, और यह बात न कहो कि (अल्लाह) "तीन" [Trinity] है ------ बंद करो! (यह कहना!), यही तुम्हारे लिए अच्छा होगा ---- पूजने के लायक़ तो बस एक ही अल्लाह है, वह इस बात से कहीं ऊपर है कि उसके लिए कोई बेटा हो, आसमानों और ज़मीन की सारी चीज़ें उसी की हैं, और सबकी देखभाल के लिए अल्लाह ही काफ़ी है। (171)
मसीह कभी भी इस बात को बुरा नहीं समझ सकता कि उसे अल्लाह का बन्दा समझा जाए, और न ही फ़रिश्तों ने कभी इसे बुरा समझा, जो कि अल्लाह के बड़े नज़दीकी हैं. (क़यामत के दिन) अल्लाह अपने सामने उन सारे लोगों को इकट्ठा करेगा जो उसकी बन्दगी करने को बुरा समझते हैं और घमंड करते हैं : (172)
(उस दिन ऐसा होगा कि) जिन लोगों ने ईमान रखा और अच्छे कर्म किए, तो अल्लाह उनकी नेकियों का पूरा पूरा बदला उन्हें देगा और अपने फ़ज़ल [Bounty] से उन्हें और ज़्यादा देगा; और जिन लोगों ने (अल्लाह की) बन्दगी को बुरा समझा और घमंड किया, तो वह उन्हें दर्दनाक यातना देगा, और (उस दिन) वे अल्लाह के सिवा किसी को नहीं पाएंगे जो उनको बचा सके या उनकी मदद कर सके। (173)
ऐ लोगो, तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास 'ठोस प्रमाण' [बुरहान] आ चुका है और हमने तुम्हारे पास एक साफ़ चमकती हुई रौशनी उतार भेजी है। (174)
तो जो लोग अल्लाह पर ईमान रखते हैं और उसके सहारे को मज़बूती से थामे रहते हैं, उन्हें वह अपनी रहमत [mercy] की छाँव में दाख़िल कर देगा और उनपर अपना ख़ास करम [favour] करेगा; और उन्हें अपने तक पहुँचने का सीधा रास्ता दिखा देगा। (175)
[ऐ रसूल!] वे आपसे (विरासत के) नियम मालूम करना चाहते हैं, कह दें, "अल्लाह तुम्हें ऐसे आदमी की विरासत के बारे में नियम बताता है, जिसका कोई बाल-बच्चा न हो और उसके माँ-बाप भी ज़िंदा न हों. अगर ऐसा कोई मर्द मर जाए और उसकी एक बहन हो, तो जो कुछ उसने छोड़ा है उसका आधा हिस्सा उस बहन का होगा; अगर वह बहन मर जाए और उसका भी कोई बाल-बच्चा न हो, तो (उसके माल का) अकेला वारिस उसका भाई होगा; अगर केवल दो (या दो से ज़्यादा) बहनें ही हों, तो छोड़े गए माल का उनके लिए दो-तिहाई हिस्सा होगा, लेकिन अगर भाई बहनें दोनों हों, तो एक मर्द का हिस्सा दो औरतों के बराबर होगा।" अल्लाह तुम्हारे लिए इन नियमों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम ग़लतियाँ न कर बैठो : अल्लाह को हर चीज की पूरी जानकारी है। (176)
सूरह 99: अज़ ज़िलज़ाल
[अंतिम भूकंप, The Earthquake]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ (आख़िरी) भूकंप से झिंझोड़ दी जाएगी, (1)
जब धरती अपने अन्दर के (सब) बोझ [मुर्दे] निकाल बाहर कर डालेगी, (2)
जब आदमी पुकार उठेगा, “इस [धरती] को आख़िर क्या हो गया है”? (कि इतनी ज़ोर से काँप रही है); (3)
उस दिन, वह [धरती] अपने सब हालात ख़ुद बता देगी, (4)
क्योंकि तुम्हारा रब उसको (ऐसा ही करने का) हुक्म देगा। (5)
उस दिन, लोग अलग अलग टोली में (अपनी क़ब्रों से) निकल कर आएंगे, ताकि उन्हें उनके किये गये कर्मों को दिखाया जाए : (6)
जिस किसी ने कण भर भी अच्छाई की होगी, वह इसे देख लेगा, (7)
और जिस किसी ने कण भर भी बुराई की होगी, तो वह उसे (भी) देख लेगा। (8)
सूरह 57 : अल- हदीद [लोहा/ Iron]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती है---- वह बेहद ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (1)
आसमानों और ज़मीन का नियंत्रण [बादशाही] उसी के हाथ में है; वही ज़िंदगी भी देता है, और मौत भी; उसे हर चीज़ करने की ताक़त है। (2)
वही पहला भी है और आख़िर भी [जब कुछ न था तो वह था, जब कुछ नहीं रहेगा, तो वह रहेगा]; वही बाहर (फैली हुई निशानियों में) भी है और अंदर (छिपी चीज़ों में) भी; और उसे हर चीज़ की जानकारी है। (3)
वही तो है जिसने आसमानों और ज़मीन को छह दिनों में पैदा किया और फिर अपने आपको सिंहासन पर जमाया। जो कुछ ज़मीन में दाख़िल होता है, और जो कुछ उससे बाहर निकलता है, वह उसे जानता है; और उसे भी (जानता है) जो कुछ आसमान से नीचे उतरता है, और जो कुछ ऊपर को चढ़ता है। तुम जहाँ कहीं भी हो, वह तुम्हारे साथ होता है; और जो कुछ तुम करते हो, वह सब देखता है; (4)
आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण [बादशाही] उसी के पास है; और सारे मामले अल्लाह के पास ही वापस लाए जाते हैं। (5)
वह रात को दिन में मिला देता है और दिन को रात में मिला देता है। वह दिलों के अंदर की (छिपी) बात को भी जानता है। (6)
अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] रखो, और उस (माल) में से ख़र्च करो, जो अल्लाह की तरफ से तुम्हें (अमानत के रूप में) दिया गया है: तुममें से जो लोग विश्वास [ईमान] रखते हैं और (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च करते हैं, उनके लिए बड़ा इनाम होगा। (7)
तुम अल्लाह पर विश्वास क्यों नहीं करते, जबकि (हमारे) रसूल तुम्हें अपने रब पर विश्वास करने के लिए अपने पास बुलाते हैं---- और अल्लाह तो तुम्हारे साथ पहले ही पक्का वचन ले चुका हैं----- अगर तुम ईमान रखते हो? (8)
वही (अल्लाह) है जिसने अपने बन्दे पर साफ व स्पष्ट आयतें उतार भेजी हैं, ताकि वह तुम्हें गहरे अँधेरे से उजाले की तरफ़ ले आए। और सचमुच अल्लाह तुम पर बहुत नर्मी दिखानेवाला, बेहद दयावान है। (9)
और यह क्या हुआ कि तुम अल्लाह के रास्ते में ख़र्च नहीं करते, जबकि आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, उसका अकेला वारिस तो अल्लाह ही होगा? जिन लोगों ने (मक्का की) जीत से पहले (अल्लाह के रास्ते में) ख़र्च किया और लड़ाइयाँ लड़ीं, वे दूसरों के बराबर नहीं हैं : वे लोग दर्जे [Rank] में उन लोगों से बड़े हैं जिन्होंने बाद में (अपना माल) ख़र्च किया और लड़ाइयाँ लड़ीं। मगर अल्लाह ने उन सबसे अच्छे इनाम का वादा कर रखा है: जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (10)
कौन है जो अल्लाह को क़र्ज़ दे सके, अच्छा वाला क़र्ज़!? अल्लाह उस (क़र्ज़) को देनेवाले के लिए कई गुना बढ़ा देगा और उसे दिल खोलकर इनाम देगा। (11)
एक दिन आएगा [ऐ रसूल!] जब आप ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को देखेंगे कि उनकी रौशनी उनके आगे-आगे और उनके दाहिने तरफ़ फैल रही होगी। (उनसे कहा जाएगा), "आज तुम्हारे लिए बड़ी अच्छी ख़बर यह है कि तुम (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में हमेशा रहोगे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं, असल में यही सबसे बड़ी कामयाबी है!" (12)
उसी दिन कपट व ढोंग करनेवाले [Hypocrites] मर्द और औरतें, ईमान रखनेवालों से कहेंगे, "हमारा इंतेज़ार करो! थोड़ी सी अपनी रौशनी हमें भी लेने दो!" उनसे कहा जाएगा, "वापस चले जाओ और फिर रौशनी की तलाश करो!" फिर उनके बीच एक दीवार खड़ी कर दी जाएगी, जिसमें एक दरवाज़ा होगा : उसके भीतर रहमत [mercy] होगी और उसके बाहर यातना खड़ी होगी। (13)
ढोंगी लोग ईमानवालों को पुकार कर कहेंगे, "क्या हम तुम्हारे साथी नहीं थे?" वे जवाब देंगे, "हाँ, थे तो सही! मगर तुमने ख़ुद अपने आपको ग़लत रास्ते पर डाल लिया, और (ईमान वालों की हार या मुसीबत की) प्रतीक्षा करते रहे, सन्देह में पड़े रहे और झूठी आशाओं ने तुम्हें धोखे में डाले रखा, यहाँ तक कि अल्लाह का आदेश आ पहुँचा---- धोखा देनेवाले [शैतान] ने अल्लाह के बारे में तुम्हें धोखे में डाले रखा। (14)
"आज के दिन तुमसे या उन (काफ़िर) लोगों से जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, उनकी जानों के बदले कोई क़ीमत [फ़िदया/ ransom] स्वीकार नहीं की जाएगी : तुम्हारे रहने की जगह (जहन्नम की) आग है----- वही (तुम्हारी रक्षक है, और) तुम्हारे लिए सही जगह है---- किया ही बुरा ठिकाना है वह!" (15)
क्या ईमान रखने वालों के लिए अब भी वह समय नहीं आया कि उनके दिल अल्लाह की याद के लिए और जो सच्चाई [क़ुरआन] उतारी गयी है, उसके लिए पसीज जाएँ, वे उन लोगों की तरह न हो जाएँ, जिन्हें उनसे पहले किताब दी गई थी, फिर उनके समय-काल को भी बढ़ाया गया, मगर उनके दिल कठोर हो गए और अब उनमें से बहुत सारे लोग क़ानून तोड़नेवाले हैं? (16)
याद रहे कि अल्लाह मुर्दा पड़ी ज़मीन को फिर से (हरी भरी कर के) ज़िंदा कर देता है; हमने तुम्हारे लिए अपनी आयतें साफ़ और स्पष्ट तरीक़े से बयान कर दी हैं, ताकि तुम अपनी बुद्धि से काम ले सको। (17)
दान देने वाले मर्द और दान देने वाली औरतें, जो अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ देते हैं, उसे उनके लिए कई गुना कर दिया जाएगा, और उनको दिल खोलकर इनाम दिया जाएगा। (18)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं, वे सच्चे लोग हैं और वे अपने रब के सामने गवाह होंगे : उनके लिए उनका इनाम होगा और (साथ में) उनकी रौशनी होगी। मगर जिन लोगों ने विश्वास नहीं किया और हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, वे (जहन्नम की) आग में रहनेवालेे हैं। (19)
यह बात दिमाग़ में रहे कि सांसारिक जीवन तो बस एक खेल-तमाशा है, एक भटकाव है, एक आकर्षण है, तुम्हारा आपस में एक-दूसरे पर बड़ाई जताने का एक कारण है, और दौलत और सन्तान में परस्पर एक-दूसरे से बढ़ा हुआ दिखान की एक होड़ का नाम है। यह तो उन पौधों की तरह हैं जो बारिश के बाद (जगह जगह) उग आते हैं : पौधा लगाने वाला शुरू शुरू में ऐसे पौधों को बढ़ते हुए देख कर बहुत ख़ुश हो जाता है, मगर फिर तुम उन्हें देखते हो कि वे मुरझा जाते हैं, पीले पड़ जाते हैं, फिर वह चारा [Stubble] होकर रह जाते हैं। आगे आनेवाली (आख़िरत की) ज़िन्दगी में दर्दनाक यातना भी है और अल्लाह की तरफ़ से माफ़ी और मंजूरी भी; इस दुनिया की ज़िन्दगी तो केवल धोखे की खुशियां (देनेवाली) है। (20)
इसलिए तुम्हें चाहिए कि अल्लाह से माफ़ी मांगने में और जन्नत हासिल करने में तुम एक-दूसरे से बाज़ी ले जाने की कोशिश करो, वह जन्नत जो लम्बाई-चौड़ाई में आसमानों और ज़मीन के बराबर है, जो उन लोगों के लिए तैयार की गई है जो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते हों: यह अल्लाह का फ़ज़ल व करम (bounty) है, वह जिसे चाहता है, देता है। और अल्लाह के फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है। (21)
कोई भी दुर्घटना घट नहीं सकती, चाहे वह ज़मीन पर हो या ख़ुद तुम्हारी जानों पर हो, जबतक कि वह पहले ही से एक किताब [लौह-ए- महफ़ूज़/ Preserved Tablet] में लिखी हुई न हो, और (ये उस समय से लिखी हुई है) जब हम उसे अस्तित्व में लाए तक न थे ----और यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है----- (22)
अत: जो चीज़ तुम्हारे हाथ न आ सकी, उस चीज़ का अफ़सोस न करो, और जो चीज़ तुम्हें हासिल हो जाए, उस पर इतराते न फिरो। (23)
अल्लाह ऐसे आदमी को पसंद नहीं करता जो घमंड में चूर रहता हो, डींगें हाँकता हो, वे लोग जो कंजूस हों, और जो दूसरों को भी कंजूसी करने के लिए कहते हों। अगर कोई आदमी (दान करने से) मुँह मोड़ ले, तो याद रखो कि अल्लाह तो आत्मनिर्भर है (उसे किसी की ज़रूरत नहीं), और सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (24)
हमने अपने रसूलों को स्पष्ट निशानियों के साथ भेजा, और उनके साथ (आसमानी) किताब भी उतारी, और (सही-ग़लत को तोलने के लिए) पैमाना भी भेजा, ताकि लोग न्याय स्थापित कर सकें : हम ने लोहा भी उतारा, जो (लड़ने के सामान में) बेहद मज़बूत होता है, और बहुत सारी चीज़ों में लोगों के काम आता है, ताकि अल्लाह उन लोगों की पहचान कर सके जो अल्लाह (के दीन की) और उसके रसूलों की मदद करेंगे, हालाँकि वे उसे देख नहीं सकते। सचमुच अल्लाह बहुत ताक़तवाला, प्रभुत्वशाली है। (25)
हमने नूह [Noah] और इबराहीम [Abraham] को भेजा, और उनकी सन्तानों को पैग़म्बरी [Prophethood] दी और उन पर (आसमानी) किताब उतारी : उनमें से कुछ तो ऐसे थे जो सही रास्ते पर चलनेवाले थे, मगर बहुत सारे ऐसे थे जो नियमों को तोड़नेवाले थे। (26)
फिर हम ने (उन पैग़म्बरों के बाद) उनके क़दमों के निशान पर चलने के लिए दूसरे रसूलों को भेजा। उनके बाद हमने मरयम के बेटे ईसा को भेजा : हम ने उन्हें इंजील [Gospel] प्रदान की, और उनके मानने वालों के दिलों में करुणा [kindness] और दया रख दी। लेकिन (बाद में) जीवन से संन्यास लेकर अलग-थलग रहने की परम्परा [Monasticism] एक ऐसी चीज़ थी जो इन्होंने ख़ुद से शुरू कर दी------ हम ने उन्हें ऐसा करने का कोई हुक्म नहीं दिया था-----(ऐसा कर के) वे केवल अल्लाह की ख़ुशी चाहते थे, और अगर ऐसा था तब भी, वे उसको ठीक ढंग से निभा न सके। अतः उनमें से जिन लोगों ने विश्वास कर लिया था, हम ने उन्हें उसका इनाम दिया, मगर उनमें से ढेर सारे लोग नियमों को तोड़नेवाले थे। (27)
ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो, और उसके रसूल पर ईमान [विश्वास] रखो : अल्लाह तुम्हें अपनी रहमत [mercy] का दोहरा हिस्सा देगा ; वह तुम्हारे लिए रौशनी कर देगा ताकि तुम उसके सहारे (सही रास्ते पर) चल सको ; वह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा-----अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (28)
किताब रखनेवालों [यहूदी/ईसायी] को यह जानना चाहिए कि अल्लाह की किसी मेहरबानी [grace] पर उनका कोई ज़ोर नहीं चल सकता, और यह कि किसी पर मेहरबानी करना तो केवल अल्लाह के ही हाथ में है : वह जिसको (मेहरबान हो कर) देना चाहे, देता है। अल्लाह की मेहरबानियाँ बेहिसाब हैं। (29)
सूरह 47 : मुहम्मद [Muhammad/ अल्लाह के रसूल]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
जो लोग विश्वास नहीं रखते और (दूसरों को) अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं, अल्लाह ऐसे लोगों के (अच्छे) कर्मों को भी बर्बाद कर देगा, (1)
मगर जो लोग ईमान रखते हैं, अच्छे कर्म करते हैं, और उस चीज़ पर विश्वास रखते हैं जो मुहम्मद (सल.) पर उतारी गयी है--- यानी तुम्हारे रब की तरफ़ से भेजी गयी सच्चाई [क़ुरआन] पर, तो (याद रहे) अल्लाह ऐसे लोगों के बुरे कर्मों को भी अनदेखा कर देगा, और उनकी हालत सँवार देगा। (2)
ऐसा इसलिए है कि विश्वास न करने वाले झूठ के पीछे चलते हैं, जबकि ईमानवाले अपने रब की तरफ़ से आयी हुई सच्चाई के पीछे चलते हैं, इस तरह अल्लाह लोगों को उनका असली रूप दिखा देता है। (3)
जब जंग में विश्वास न करनेवालों से तुम्हारी मुठभेड़ हो, तो उनकी गरदनों पर वार करो, और जब वे पूरी तरह (जंग में) हरा दिए जाएं, तो उन्हें क़ैद करके मज़बूती से बाँध दो------ बाद में या तो उन्हें एहसान करते हुए छोड़ दो या फिर उनकी जान की क़ीमत वसूल करके छोड़ दो, यहाँ तक कि युद्ध के बचे-खुचे प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएं। यही सही तरीक़ा है। अगर अल्लाह चाहता, तो उसने ख़ुद ही उन्हें हरा दिया होता, मगर (इस जंग से) उसका मक़सद दूसरे लोगों के द्वारा तुम में से कुछ लोगों की परीक्षा लेना है। जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे जाते हैं, अल्लाह उनके कर्मों को कभी बेकार नहीं जाने देगा; (4)
वह उनको सही रास्ता दिखा देगा और उनको अच्छी हालत में डाल देगा; (5)
वह उन्हें जन्नत में दाख़िल कर देगा, जिसके बारे में वह उन्हें पहले ही बता चुका है। (6)
तुम (लोग) जो ईमान रखते हो! अगर तुम अल्लाह की मदद करोगे, तो वह तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हारे क़दम जमा देगा। (7)
रहे वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया, तो वे कितने दुख व निराशा की हालत में होंगे! अल्लाह ने उनके सब किए-धरे कर्मों को बेकार कर दिया है। (8)
अल्लाह के द्वारा उतारी गयी चीज़ [क़ुरआन] से नफ़रत करने की वजह से ऐसा हुआ कि अल्लाह ने उनके कर्मों को बेकार कर दिया है। (9)
क्या लोगों ने ज़मीन पर घूम-फिर कर देखा नहीं कि उन लोगों का क्या नतीजा हुआ जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं? अल्लाह ने उन्हें पूरी तरह तहस-नहस कर दिया : विश्वास करने से इंकार करनेवालों का नतीजा भी कुछ ऐसा ही होगा! (10)
यह इसलिए कि ईमान रखनेवालों की रक्षा तो अल्लाह करता है, जबकि विश्वास न करनेवालों का कोई नहीं जो उन्हें बचा सके : (11)
जो लोग ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें अल्लाह (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती हैं; जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, वे इस दुनिया में भरपूर मज़े उड़ा लें, और खा-पी लें, जैसे पालतू जानवर खाते हैं, मगर (जहन्नम की) आग उनका (आखिरी) ठिकाना होगी। (12)
कितने ही शहरों को हम तबाह-बर्बाद कर चुके हैं, जो [ऐ रसूल] आपके अपने शहर [मक्का] से भी ज़्यादा मज़बूत थे------ वह शहर जिससे आपको निकाल दिया गया----- और उनके पास कोई न था जो उनकी मदद कर पाता। (13)
जो लोग अपने रब की तरफ़ से आए हुए स्पष्ट प्रमाण (को मानते हुए उस) के पीछे चलने वाले हैं, क्या उनकी तुलना ऐसे लोगों के साथ की जा सकती है, जिनके कुकर्मों को उनके लिए लुभावना बना दिया गया हो, और वे लोग जो अपनी इच्छाओं के पीछे चलते हों? (14)
बुराइयों से बचनेवाले नेक लोगों से, जिस (जन्नत के) बाग़ का वादा किया गया है, उसकी तस्वीर कुछ ऐसी होगी: हमेशा साफ़ व शुद्ध रहनेवाली पानी की नहरें, हमेशा ताज़ा रहनेवाली दूध की नहरें, पीनेवालों के मज़े व मस्ती के लिए शराब की नहरें, साफ़ किए गए शुद्ध शहद की नहरें, सब उसके अंदर बह रही होंगी; उन्हें वहाँ हर तरह के फल मिलेंगे; और उन्हें अपने रब की तरफ़ से गुनाहों की माफ़ी मिल जाएगी. इनकी तुलना उन लोगों के अंजाम के साथ आख़िर किस तरह की जा सकती है, जो (जहन्नम की) आग में फँस के रह गए हों, और जिन्हें पीने के लिए ऐसा खौलता हुआ पानी मिलेगा, जो उनकी आँतों को फाड़ कर रख देगा? (15)
इनमें से कुछ लोग ऐसे हैं, जो [ऐ रसूल] आपकी बातें सुनते तो हैं, मगर जैसे ही वे आपके पास से उठ कर जाते हैं, तो उन लोगों से जिन्हें ज्ञान दिया गया है, मज़ाक़ उड़ाते हुए पूछ्ते हैं, "उस (रसूल) ने अभी-अभी क्या कहा था?" यही वे लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने ठप्पा लगा कर बंद कर दिया है (कि अब उनपर कोई असर होने वाला नहीं है), वे तो बस अपनी इच्छाओं के पीछे चलते हैं। (16)
जो लोग सीधे रास्ते पर चलते हैं, अल्लाह ने अपना मार्गदर्शन बढ़ाते हुए उनका (सही रास्ते पर) चलना और आसान कर दिया है, और उन्हें बुराइयों से बचने की तौफ़ीक़ दी है। (17)
विश्वास न करनेवाले लोग अब और किस चीज़ का इंतेज़ार कर रहे हैं, सिवाए (क़यामत की) घड़ी का, जो उनपर इस तरह (अचानक) आ जाएगी कि उन्हें पता तक न होगा? उस (क़यामत) की निशानियाँ तो आ चुकी हैं, मगर जब वह घड़ी सचमुच आ जाएगी, उस वक़्त नसीहत मान लेने का भला क्या फ़ायदा होगा? (18)
अतः [ऐ रसूल!] आप जान लें कि अल्लाह के सिवा कोई नहीं है जो पूजा के लायक़ हो, सो आप अपनी भूल-चूक की माफ़ी के लिए भी दुआ करें, और ईमान रखनेवाले मर्द और औरतों के गुनाहों की माफ़ी के लिए भी दुआ करें। अल्लाह सब जानता है---- तुम्हारे चलने-फिरने को भी और तुम्हारे एक जगह ठहरे रहने को भी। (19)
जो लोग ईमान रखते हैं, वे पूछते हैं कि (दुश्मनों से युद्ध के बारे में) कोई सूरह क्यों नहीं उतारी गयी है? मगर जब (युद्ध करने के बारे में) कोई स्पष्ट सूरह उतारी जाती है, तो [ऐ रसूल] आप देखते हैं कि जिनके दिलों में रोग है, वे आपकी तरफ़ इस तरह देखते हैं मानो मरने के डर से उन पर बेहोशी छा गई हो ----- उनके लिए बेहतर यही होगा (20)
कि (अल्लाह की) आज्ञा को मानें और (रसूल के लिए) उचित बात कहें; जब युद्ध करने का फ़ैसला हो चुका है, तो उनके लिए यह और भी बेहतर होगा अगर वे अल्लाह के प्रति सच्चे बने रहें। (21)
"अब अगर तुम (युद्ध करने से) मुँह मोड़ते हो, तो क्या ऐसा हो सकता है कि तुम सारी ज़मीन पर फ़साद [corruption] फैलाते फिरो और अपने रिश्ते-नातों को तोड़ डालो?" (22)
ये वे लोग हैं जिन्हें अल्लाह ने (अपनी रहमत से) ठुकरा दिया है, और उन्हें कानों से बहरा और आँखों से अन्धा कर दिया है। (23)
तो क्या वे क़ुरआन पर सोच-विचार नहीं करेंगे? क्या उनके दिलों पर ताले लगे हैं? (24)
सही मार्ग दिखाने के बाद भी जो लोग पीठ-फेरकर चल देते हैं, वे ऐसे ही लोग हैं जो शैतान के धोखे व बहकावे में आ जाते हैं, और उन्हें झूठी उम्मीदें दिलाते हैं। (25)
वे [पाखंडी] लोग, उन लोगों से जो अल्लाह की भेजी गयी (आयतों से) नफ़रत करते हैं, कहते हैं, "हम कुछ मामलों में तुम्हारी बात मान लेंगे।" अल्लाह उनकी ख़ुफ़िया चालों को अच्छी तरह जानता है। (26)
उस समय उन्हें कैसा लगेगा जब फ़रिश्ते उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारते हुए उनकी जान निकाल कर ले जाएंगे, (27)
यह इसलिए कि वे ऐसे तरीक़े के पीछे चले जिस पर अल्लाह सख़्त नाराज़ हुआ, और उन लोगों ने उसे ख़ुश करने की ज़रूरत भी नहीं समझी? सो उसने उनके सारे किए-धरे कर्मों को बेकार कर दिया। (28)
क्या भ्रष्ट दिल वाले लोग यह मान कर चल रहे हैं कि (रसूल के प्रति) उनके अंदर की नफ़रत व दुश्मनी [malice] को अल्लाह कभी सबके सामने ज़ाहिर नहीं करेगा? (29)
(ऐ रसूल!) अगर हम चाहते, तो आपको उन [पाखंडी/मुनाफ़िक़ लोगों] के बारे में बता देते, और फिर आप उन्हें उनके लक्षणों से पहचान सकते थे, मगर आप वैसे भी उनकी बातचीत के ढंग से उन्हें पहचान ही लेंगे। जो कुछ तुम (लोग) करते हो, अल्लाह सब जानता है। (30)
हम तुम्हारी जांच-परख ज़रूर करेंगे, यह देखने के लिए कि तुम में से कौन है जो सबसे जम के (अपनी जान-माल से) संघर्ष [जिहाद] करता है और अपने क़दम धैर्य से जमाए रखता है; हम यह भी परखेंगे कि तुम अपने दावे में कितने सच्चे थे। (31)
जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया, और दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोका, और रसूल का विरोध किया जबकि उन्हें सही मार्ग दिखाया जा चुका था, तो ऐसे लोग अल्लाह को किसी भी तरह का कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकते। वह उनके सब किए- कराए कर्मों को बेकार कर देगा------(32)
ऐ ईमान रखनेवालो! अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो : अपने कर्मों को यूँ बर्बाद न होने दो----- (33)
जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया, दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोका, और बिना विश्वास किए ही मर गए, तो अल्लाह ऐसे लोगों को कभी माफ़ नहीं करेगा। (34)
अतः (ऐ ईमानवालो!) हिम्मत न हार बैठो और तुरंत सुलह [संधि] करने में न लग जाओ। तुम तो उन पर भारी पड़ रहे हो : अल्लाह तुम्हारे साथ है। वह तुम्हारे (अच्छे) कर्मों के इनाम को कभी कम नहीं करेगा : (35)
इस दुनिया की ज़िन्दगी तो बस एक खेल-तमाशा है, लेकिन अगर तुम विश्वास [ईमान] रखो, और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, तो वह तुम्हें इसका पूरा-पूरा बदला देगा। वह तुम से अपनी (सारी) संपत्ति दे देने को नहीं कहता ----- (36)
अगर अल्लाह ने तुमसे ऐसा कहा होता, और तुम्हें (अपनी दौलत) दे देने पर ज़ोर दिया होता, तो तुम कंजूसी करने लगते, और वह तुम्हारे मन के खोट को उजागर कर देता ------ (37)
हालांकि अब तुम्हें अल्लाह की राह में (थोड़ा-बहुत) देने के लिए बुलाया जा रहा है, मगर तुम में से कुछ लोग हैं जो देने में कंजूसी कर रहे हैं। हालाँकि जो कोई भी कंजूसी करता है तो वह असल में अपने आप से ही कंजूसी करता है : अल्लाह ही तो सारे धन-दौलत का स्रोत [source] है, और तुम तो ज़रूरतमंदों में से हो। अगर तुम ने मुंह मोड़ा, तो वह तुम्हारी जगह दूसरे लोगों को ले आएगा, और वे तुम्हारे जैसे (कंजूस) न होंगे। (38)
सूरह 13 : अर-रा'द [बादल की गरज / Thunder]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ रा॰
ये (अल्लाह की) किताब [क़ुरआन] की आयतें है। [ऐ रसूल], जो कुछ (आयतें) आपके रब की ओर से आप पर उतारी गयी हैं, वह सब सच हैं, फिर भी अधिकतर लोग (इस पर) विश्वास नहीं कर रहे। (1)
यह अल्लाह ही है जिसने आसमानों को इतना ऊँचा बनाया, और तुम देखते हो कि वह बिना किसी पाये के टिका हुआ है, और फिर अल्लाह ने अपने आपको सिंहासन पर स्थापित कर लिया (और आदेश जारी हो गए); उसने सूरज और चाँद को (इस तरह से) काम पर लगा रखा है कि हर एक अपने नियत समय तक (अपनी कक्षा में) चला जा रहा है; वह सारी चीज़ों को नियमित करता है, और वह अपनी आयतें [निशानियाँ] साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से बयान करता है ताकि तुम्हें यक़ीन हो जाए कि (एक दिन हिसाब देने के लिए) अपने रब से मिलना है; (2)
वही है जिसने ज़मीन की सतह फैला दी, उसमें मज़बूत पहाड़ों को जमाया और नदियाँ बहा दीं, और उसमें हर तरह के फलों के दो-दो क़िस्म उगा दिए; वही है जो दिन की रौशनी पर रात की चादर ओढ़ा देता है। सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो सोच-विचार से काम लेते हैं। (3)
(और आसपास के इलाक़े को देखो!), धरती पर एक दूसरे से सटे हुए ज़मीन के टुकड़े हैं, उनमें अंगूरों के बाग़ हैं, (अनाज की) खेतियाँ हैं, खजूर के पेड़ हैं जिनमें कुछ तो झुंड में लगे होते हैं, कुछ अकेले खड़े होते हैं, सबको एक ही पानी से सींचा जाता है, फिर भी हम उनमें से कुछ फलों का मज़ा दूसरे फलों से बेहतर बना देते हैं : सचमुच इस बात में उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो बुद्धि से काम लेते हैं। (4)
[ऐ रसूल!], अगर कोई चीज़ आपको आश्चर्य में डालती हो, तो आपको इस बात पर ज़रूर आश्चर्य होना चाहिए जब वे [इंकार करनेवाले] पूछते हैं, "क्या? जब हम मर के (सड़-गल कर) मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या हम फिर नये सिरे से पैदा किए जाएंगे?" यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब (की शक्ति को मानने से) इंकार किया, जिनकी गर्दनों मे लोहे के तौक़ [collars] पड़े होंगे और वही हैं जो (जहन्नम की) आग में रहनेवाले हैं, जहाँ उन्हें हमेशा रहना है। (5)
[ऐ रसूल!], वे (दया या माफ़ी जैसे) अच्छे बदले की गुहार लगाने के बजाए आप से (व्यंग्य करते हुए) यातना को जल्दी ले आने के लिए कहते हैं, हालाँकि उनसे पहले गुज़र चुकी कई क़ौमों की (बर्बादी की) मिसालें उनके सामने रही हैं----- आपका रब लोगों को उनकी ग़लतियों व गुनाहों के बावजूद माफ़ कर देता है, मगर (याद रहे!) वह सज़ा देने में भी सचमुच बहुत कठोर है। (6)
विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] कहते हैं, "उस (रसूल) पर उसके रब की तरफ़ से कोई चमत्कार क्यों नहीं उतारा गया?" मगर आपका तो बस काम यही है कि आप लोगों को (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दें : (पहले ग़ुज़र चुकी) हर क़ौम के पास कोई रास्ता दिखानेवाला ज़रूर हुआ है। (7)
हर एक मादा की कोख में क्या (जन्म ले रहा) है, अल्लाह उसे जान रहा होता है, और यह भी कि उनके गर्भ कितने सिकुड़ते हैं या कितने फूल जाते हैं ---- उसके यहाँ हर चीज़ का एक अन्दाज़ा ठहराया हुआ है; (8)
वह उसे भी जानता है जो चीज़ दिखायी नहीं देती, और उसे भी जो दिखायी देती है; वह महान है, सबसे ऊँचा है। (9)
(अल्लाह को) इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुम में से कोई चुपके से कोई बात कहता हो या ज़ोर से, चाहे तुम रात के अंधेरे में छिपे हुए हो या दिन की रौशनी में चल-फिर रहे हो, उसके लिए सब (स्थितियाँ) बराबर है : (10)
हर आदमी के आगे और पीछे देखभाल करनेवाले फ़रिश्ते लगे होते हैं, जो अल्लाह के हुक्म से बारी-बारी उसकी निगरानी करते रहते हैं। अल्लाह किसी क़ौम के लोगों की हालत उस वक़्त तक नहीं बदलता, जब तक कि वे ख़ुद अपने हालात में बदलाव न ले आएं, लेकिन अगर वह किसी क़ौम को (उसके कुकर्मों के नतीजे में) नुक़सान पहुँचाना चाहे, तो कोई नहीं जो इसे टाल सकता हो ------ उसके सिवा कोई नहीं, जो उनकी रक्षा कर सके। (11)
वही है जो तुम्हें बिजली की चमक दिखाता है, जो दिलों में डर भी पैदा करती है और (बारिश की) आशा भी जगाती है; वह (पानी की बूंदों से) बोझिल बादलों को बनाता है; (12)
गरजते हुए बादल भी उसी का गुणगान करते हैं, और फ़रिश्ते भी जो उसके डर से सहमे रहते हैं; वही कड़कती हुई बिजलियाँ भेजता है, और जिस किसी पर चाहता है, गिरा देता है. इसके बावजूद इंकार करनेवाले [काफ़िर] अल्लाह (की क़ुदरत) के बारे में बहसें करते रहते हैं------ उसकी ताक़त बड़ी ज़बरदस्त और अटल है। (13)
सच्ची भक्ति से पुकारना हो, तो केवल वही है जिसे पुकारना चाहिए : अल्लाह को छोड़कर जिनको वे पुकारते हैं, वे उनकी पुकार का कोई जवाब नहीं देते। यह ऐसा ही है जैसे कोई (प्यासा) अपने दोनों हाथ पानी की ओर फैला भर दे और सोचे कि पानी उसके मुँह में (अपने आप) पहुँच जाएगा ------ ऐसा नहीं हो सकता : (सच्चाई से) इंकार करनेवालों की दुआ व पुकार इसके सिवा कुछ नहीं कि बेकार रास्तों में भटकती फिरे। (14)
वह तमाम चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं, केवल अल्लाह के ही आगे (सजदे में) झुकती हैं, चाहे अपनी मर्ज़ी से झुकें या मजबूरी से, और यही हाल उनकी परछाइयों का भी है, जो सुबह में और शाम में (सजदे में) झुक जाती हैं। (15)
(ऐ रसूल) आप (इंकार करनेवालों से) पूछें, "आसमानों और ज़मीन का रब कौन है?" आप कहें, "वह अल्लाह है", कह दें, "फिर उसे छोड़कर तुम ने दूसरों को क्यों अपना रखवाला बना रखा है, यहाँ तक कि जो न तो ख़ुद को कोई फ़ायदा पहुँचा सकता है और न ही कोई नुक़सान?" कह दें, "क्या आँख से अंधा उन लोगों के बराबर हो सकता है जो देख सकते हों? और क्या गहरा अँधेरा और उजाला बराबर हो सकता है?" वे जिन्हें अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराते हैं, क्या उन्होंने भी अल्लाह की तरह किसी चीज़ की रचना की है जिसे देख कर दोनों (रचनाओं) में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया है?" कह दें, "अल्लाह ही हर चीज़ को पैदा करनेवाला है: वह अकेला है, सब पर छाया हुआ है!" (16)
वह आसमान से पानी बरसाता है जिससे नदी-नाले अपनी-अपनी समाई के अनुसार भर कर बह निकलते हैं। पानी के बहाव के साथ नदी की सतह पर झाग की परतें जमा हो जाती हैं, ऐसा ही झाग तब भी उठता है जब ज़ेवर और औज़ार बनाने के लिए किसी धातु को आग में पिघलाया जाता है : अल्लाह इस तरीक़े से सच और झूठ की मिसाल बयान करता है ---- जो झाग है वह तो सूखकर ग़ायब हो जाता है, मगर जो कुछ आदमी के फ़ायदे की चीज़ है, वह बची रह जाती है ---- अल्लाह ऐसी ही मिसालें दिया करता है। (17)
जो लोग अपने रब की पुकार सुनकर उसके हुक्म मान लेते हैं, उनके लिए बेहतरीन इनाम होगा; मगर वे लोग जिन्होंने उसकी पुकार का कोई जवाब न दिया, तो (क़यामत के दिन) अगर उनके पास वह सब कुछ हो जो ज़मीन में है, बल्कि उसका दुगना भी हो, तब भी अपनी मुक्ति के बदले में वे ख़ुशी ख़ुशी सब दे डालें, क्योंकि उनसे जो हिसाब लिया जाएगा, वह बड़ा भयानक होगा। जहन्नम ही उनका घर होगा, और उनके आराम करने के लिए दुःख भरा बिछौना होगा। (18)
भला वह आदमी जो जानता है कि जो कुछ आप पर आपके रब की तरफ़ से उतरा है, वह सत्य है, कभी उस जैसा हो सकता है जो अंधा हो? परन्तु समझते तो वही हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं; (19)
जो लोग अल्लाह के नाम से किए गए क़रार (Agreement) को पूरा करते हैं, औऱ अपनी की गयी प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ते; (20)
जो ऐसे हैं कि अल्लाह नॆ जिन रिश्ते को जोड़ने का आदेश दिया, उन्हें जोड़े रखते हैं; जो अपनॆ रब से डरते रहते हैं और (होनेवाले) हिसाब की कठोरता के ख़्याल से घबराये रहते हैं; (21)
जो लोग अपने रब की ख़ुशी की चाहत में अपनी इच्छाओं को मारते हुए धैर्य से काम लेते हैं; जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं; जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है, उसमें से ढँके-छिपे भी और सबके सामने भी ख़र्च करते हैं; जो भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं। तो यही लोग हैं जिनके लिए (आख़िरत में असली) घर का इनाम मिलेगा : (22)
वे हमेशा रहने के बाग़ में ख़ुद भी दाख़िल होंगे और साथ में उनके बाप-दादा, उनके पति/पत्नियों और उनकी सन्तानों में से जो नेक होंगे, वे भी (वहाँ जगह पाएंगे); वहाँ हर दरवाज़े से फ़रिश्ते उनके पास आएंगे, (23)
(और कहेंगे) "चूँकि तुम ने (दुनिया में) धीरज व सब्र से काम लिया था, इसलिए (आज) तुम पर सलामती हो!" तुम्हारा घर तुम्हारे लिए क्या बेहतरीन इनाम है! (24)
मगर जो लोग अल्लाह के नाम से किए गए पक्के क़रार को तोड़ डालते हैं, अल्लाह ने जिन रिश्तों को जोड़ने का आदेश दिया, उसे काट डालते हैं और जो ज़मीन में फ़साद पैदा करते हैं : वही हैं जिनके लिए (आख़िरत में) बहुत बुरा घर होगा ---- (25)
अल्लाह जिसको चाहता है, भरपूर रोज़ी देता है, औऱ जिसकोे चाहता है बहुत थोड़ी देता है ---- और हालांकि वे इस दुनिया की ज़िन्दगी में मौज मस्ती कर सकते हैं, मगर आने वाली ज़िन्दगी के मुक़ाबले में यह तो बस बहुत थोड़े समय का आराम है। (26)
(सच्चाई से) इंकार करनेवाले कहते हैं, "इन (रसूल) पर उनके रब की तरफ़ से कोई (चमत्कारिक) निशानी क्यों नहीं उतारी गयी?" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "अल्लाह जिसे चाहता है उसे (सही रास्ते से दूर) भटकता छोड़ देता है, और जो उसकी तरफ़ भक्ति भाव से जाता है, उसे वह अपनी तरफ़ बढ़ने का रास्ता दिखा देता है, (27)
वे लोग जो ईमान रखते हैं, और जिनके दिलों को अल्लाह की याद से शांति मिलती है ----- सचमुच अल्लाह का ज़िक्र व उसकी याद ही ऐसी चीज़ है जिससे दिलों को सुकून व शांति मिलती है ----- (28)
जो लोग ईमान रखते हैं, और नेक व अच्छे कर्म करते हैं : वहां उनके लिए ख़ुशियाँ हैं जो उनके इंतज़ार में हैं, और उनका आख़िरी पड़ाव बेहद शानदार होगा।" (29)
अत: [ऐ रसूल!], हमने आपको एक ऐसी उम्मत [समुदाय] में भेजा है ----- जहाँ दूसरी उम्मतें उनसे बहुत पहले गुज़र चुकी हैं----- ताकि जो कुछ हमने आप पर (वही द्वारा) उतारा है, उसे आप उन्हें पढ़कर सुना दें। फिर भी वे दया करनेवाले रब [रहमान] पर विश्वास नहीं करते। कह दें, "वही मेरा रब है : उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ ख़ुदा नहीं। उसी पर मैंने भरोसा किया है और उसी के पास मुझे लौट कर जाना है।" (30)
अगर ऐसा होता कि किसी क़ुरआन से पहाड़ चलने लगते या उससे ज़मीन फट-फट जाती या उसके द्वारा मुर्दे बोल उठते [तो वह यही क़ुरआन होती!], मगर हर चीज़ सचमुच अल्लाह के ही अधिकार में है। फिर क्या ईमान रखनेवाले इस बात को नहीं समझते कि अगर अल्लाह ने ऐसा ही चाहा होता, तो सारे ही इंसानों को सीधे मार्ग पर लगा देता? और (याद रखो!) इंकार करनेवालों पर, उनकी करतूतों के बदले में, कोई न कोई मुसीबत निरंतर आती ही रहेगी, या उनके घर के नज़दीक ही कहीं उस वक़्त तक (बलाएं) उतरती रहेंगी, जब तक कि अल्लाह का वादा पूरा न हो जाए : अल्लाह कभी भी अपने वादे के विरुद्ध नहीं जाता।" (31)
[ऐ रसूल!], आपसे पहले भी कितने ही रसूलों की हँसी उड़ायी जा चुकी है, मगर मैंने विश्वास न करनेवालों को पहले मुहलत दी थी : अंत में, मैंने उन्हें अपनी पकड़ में ले लिया ----- तो (देखो!) मेरी सज़ा कितनी दर्दनाक थी! (32)
भला क्या वह हस्ती जो हर एक जान के हर अच्छे-बुरे कर्म पर नज़र रखती है (उसे अपनी ख़ुदायी में किसी साझेदार की ज़रूरत है)? फिर भी, वे लोग अल्लाह के साथ साझेदार [Partner] ठहराते हैं। आप कहें, "ज़रा उनके नाम तो बताओ", या क्या तुम उस (अल्लाह) को ज़मीन के बारे में कोई ऐसी बात बता सकते हो जिसके अस्तित्व की उसे ख़बर तक नहीं, या क्या यह बस शब्दों का दिखावा मात्र है?" मगर वे जो मक्कारी की बातें बनाते हैं, वह (सच्चाई से) इंकार करनेवालों के लिए बड़ी लुभावनी बना दी गयी हैं और उन्हें सही मार्ग पर चलने से रोक दिया गया है : जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, उसे कोई सही रास्ते पर नहीं ला सकता। (33)
उनके लिए इस दुनिया में भी सज़ा है, मगर आनेवाली दुनिया [आख़िरत/Hereafter] में उनकी सज़ा बहुत ही कठोर होगी ---- अल्लाह (की यातना) से उन्हें बचानेवाला कोई न होगा। (34)
वे लोग जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए जिस जन्नत का वादा किया गया है, उसकी तस्वीर कुछ ऐसी है : एक बाग़ है, उसके नीचे बहती हुई नहरें हैं, उसके फल हैं जो कभी ख़त्म नहीं होते, और पेड़ों की छाँव है जो हर समय बनी रहती है। यह इनाम उन लोगों के लिए है, जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं ; जबकि विश्वास न करनेवालों का बदला (जहन्नम की) आग है। (35)
[ऐ रसूल!], जिन (यहूदी व ईसाई) लोगों को हमने (आसमानी) किताब दी है, वे (क़ुरआन की) उन बातों से ख़ुश होते हैं जो आप पर उतारी गयी है; उनमें कुछ गिरोह के ऐसे लोग भी हैं जो उस (क़ुरआन) की कुछ बातों को मानने से इंकार करते हैं। आप कह दें, "मुझे तो बस यह हुक्म हुआ है कि मैं अल्लाह की बन्दगी करूँ, और किसी को भी उसकी ख़ुदायी में साझेदार [Partner] न ठहराऊँ : उसी की (बातों की) तरफ़ तुम्हें बुलाता हूँ और उसी की तरफ़ मुझे लौटकर जाना है।" (36)
इस तरह, हमने इस (क़ुरआन) को अरबी ज़बान में फ़ैसला कर देने के लिए उतार भेजा है। [ऐ रसूल!], अब वह ज्ञान जो आपके पास आ चुका है, इसके बाद भी, अगर आप उन लोगों की इच्छाओं के पीछे चले, तो कोई न होगा जो आपकी मदद कर सके या आपको अल्लाह से बचा सके। (37)
[ऐ रसूल!], हमने आप से पहले (अपने संदेश के साथ) कई रसूल भेजे और हमने उन्हें बीवियाँ और बच्चे भी दिए थे; किसी भी रसूल को यह शक्ति नहीं दी गयी थी कि वह बिना अल्लाह की अनुमति के, कोई चमत्कार (या एक आयत) लाकर दिखा सके। हर ज़माने (में रास्ता दिखाने) के लिए एक आसमानी किताब [Scripture] रही है : (38)
(अपने हुक्म में से) अल्लाह जो चाहता है मिटा देता है, और जो चाहता है, उसकी पुष्टि कर देता है, और मूल किताब तो उसी के पास है। (39)
हमने (विश्वास न करनेवालों को) जिस (बुरे) नतीजे की धमकी दे रखी है, हो सकता है कि उसमें से कुछ हिस्सा, [ऐ रसूल] आपको (आपकी ज़िंदगी में ही) दिखा दें, या (उससे पहले ही) आपको दुनिया से उठा लें, मगर आपका कर्तव्य तो बस (सच्चाई का) सन्देश पहुँचा देना है : हिसाब लेने का काम तो हमारा है। (40)
क्या वे [मक्का के इंकार करनेवाले] नहीं देखते कि हम (उनकी) सरज़मीन पर किस तरह चले आ रहे हैं, और कैसे उनकी सीमाएं सिकुड़ती जा रही हैं? और अल्लाह ही फ़ैसला करता है ---- कोई नहीं है जो उसके फ़ैसले टाल सके ---- और वह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (41)
जो लोग इनसे पहले गुज़र चुके हैं, वे भी (सच्चाई के ख़िलाफ़) चालें चला करते थे, मगर (याद रहे!) सारी चालें तो अल्लाह ही के क़ब्ज़े में हैं : हर एक आदमी जो कुछ भी करता है, अल्लाह सब जानता है। अंत में, (सच्चाई से) इंकार करनेवालों को मालूम हो जाएगा कि (परलोक में) किसके हिस्से में सबसे बेहतर घर आया। (42)
[ऐ रसूल!], (सच्चाई से) इंकार करनेवाले कहते हैं, "तुम अल्लाह की तरफ़ से भेजे हुए नहीं हो।" आप कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह की गवाही काफ़ी है : आसमानी किताबों [Scripture] का सारा ज्ञान उसी के पास से आता है।" (43)
सूरह 55 : अर रहमान [रहम करनेवाला रब, The Lord of Mercy]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
वह तो रहम करनेवाला रब [रहमान] है (1)
जिसने क़ुरआन को पढ़ना (और समझना) सिखाया। (2)
उसी ने आदमी को पैदा किया (3)
और उसे अपनी बात कहना और दूसरे की बात समझना सिखाया। (4)
सूरज और चाँद एक हिसाब के मुताबिक़ अपने-अपने रास्ते [courses] पर चलते हैं; (5)
पौधे और पेड़ उसके आगे झुके रहते हैं; (6)
उसने आसमान को ऊँचा किया। उसने संतुलन [balance] स्थापित किया (7)
ताकि तुम उस संतुलन में बिगाड़ न पैदा कर सको : (8)
न्याय के साथ वज़न करो और तौलने में कमी न करो। (9)
धरती को उसने सभी जीव जंतुओं [creatures] के लिए (रहने के अनुकूल) बनाया, (10)
उसी में तरह तरह के फल हैं, और खजूर के पेड़ हैं जिनके फलों के गुच्छे आवरणों में लिपटे होते है, (11)
और इसके भूंसे वाले अनाज और ख़ुशबूदार बेल-बूटे व फूल भी। (12)
तो फिर बताओ [ऐ जिन्न और इंसानो!], तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (13)
उसने आदमी को मिट्टी के बर्तन जैसी सूखी खनखनाती हुई मिट्टी से पैदा किया; (14)
और जिन्न को बिना धुएं की आग से पैदा किया। (15)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (16)
वह [उगते हुए सूरज और चाँद के] दो पूरब का रब है और [सूरज व चाँद के डूबते] दो पश्चिम का रब भी। (17)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (18)
उसने [मीठे और नमकीन] दो दरियाओं को प्रवाहित कर दिया, जो आपस में मिलते तो हैं, (19)
फिर भी, उन दोनों के बीच एक रोक लगी हुई है, जिसके पार वे नहीं जा सकते (और पूरी तरह घुलमिल नहीं सकते)। (20)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (21)
उन (समुद्रों) से मोतियाँ निकलती हैं: बड़ी-बड़ी, और छोटी चमकती हुईं मोतियाँ [मूँगा]। (22)
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे? (23)
उसी के वश में हैं वे जहाज़ जो समुद्रों में तैरते फिरते हैं, जो देखने में पहाड़ों की तरह ऊँचे लगते हैं। (24)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (25)
इस धरती पर बसने वाले हर एक का नाश होना है; (26)
कुछ अगर बाक़ी रहने वाला है तो बस तुम्हारे रब का चेहरा जो बड़े प्रतापवाला, और उदारता से देनेवाला है। (27)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (28)
आसमानों और ज़मीन में बसने वाला हर एक, उसी से (अपनी ज़रूरतें) माँगता है; हर दिन वह अपने काम में लगा रहता है। (29)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (30)
ऐ [आदमी व जिन्न के] दो भारी समूह! जल्द ही हम तुम्हारे (हिसाब-किताब के) निपटारे पर ध्यान देने वाले हैं। (31)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (32)
ऐ जिन्नों और इंसानों के गिरोह! अगर तुम में इतना दम है कि आसमान और ज़मीन की सीमाओं को पार कर सको, तो पार कर के दिखाओ : तुम कभी भी बिना हमारी इजाज़त [authority] के पार नहीं कर सकते। (33)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (34)
तुम दोनों पर आग के शोले और धुएँ वाला अंगारा छोड़ दिया जाएगा, फिर तुम्हारी मदद को कोई नहीं पहुँचेगा। (35)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (36)
फिर जब आसमान फट पड़ेगा और लाल चमड़े की तरह एकदम लाल सुर्ख़ हो जाएगा। (37)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (38)
फिर उस दिन न किसी इंसान से उसके गुनाह के बारे में पूछा जाएगा न किसी जिन्न से। (39)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (40)
अपराधी अपने चेहरों (की निशानियों) से पहचान लिए जाएँगे, फिर उन्हें माथे और टाँगों से पकड़ लिया जाएगा। (41)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (42)
यही वह जहन्नम है जिसे अपराधी लोग झूठ ठहराते थे! (43)
वे उस (जहन्नम की) लपटों के और खौलते हुए पानी के बीच चक्कर लगा रहें होंगे। (44)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (45)
(इस दुनिया में) जो आदमी अपने रब के सामने (हिसाब-किताब के लिए) खड़े होने से डरता था, उसके लिए दो बाग़ होंगे. (46)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (47)
(दोनों बाग़) छायादार डालियोंवाले होंगे। (48)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (49)
उन (दोनो बाग़ों) में पानी के दो बहते हुए सोते [flowing spring] होंगे। (50)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (51)
और साथ में हर तरह के फल की दो-दो क़िस्में होंगी। (52)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (53)
[जन्नती लोग] गाढे रेशम के बिस्तर पर तकिया लगाए हुए बैठे होंगे, और दोनों बाग़ों के फल झुके हुए नज़दीक ही होंगे। (54)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (55)
उन्हीं (बाग़ों) में नज़रें बचाकर रखनेवाली (जवान) हसीनाएँ होंगी, जिन्हें उन (जन्नतियों) से पहले न किसी आदमी ने छुआ होगा और न किसी जिन्न ने। (56)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (57)
वे ऐसी होंगी मानो लाल [याकूत, Rubies] और चमकती मोतियाँ [मूँगा] हों! (58)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (59)
अच्छाई का बदला अच्छाई के सिवा और क्या हो सकता है? (60)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (61)
इन दोनों बाग़ों के नीचे (कुछ कम दर्जे के जन्नतियों के लिए) दो और बाग़ होंगे। (62)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (63)
दोनों बहुत ज़्यादा हरे-भरे होंगे; (64)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (65)
उन (दोनों बाग़ो) में दो उबलते हुए पानी के सोते [gushing spring] होंगे। (66)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (67)
फलों से भरे हुए -— खजूर और अनार के पेड़ होंगे। (68)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (69)
उनमें अच्छी स्वभाववाली कुँवारी हसीनाएँ होंगी। (70)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (71)
काली-आँखोंवाली जवान हसीनाएं [हूरें] जो ख़ेमों [pavilions] में सँभाल कर रखी गयी हैं। (72)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (73)
जिन्हें उससे पहले न किसी आदमी ने हाथ लगाया होगा और न किसी जिन्न ने। (74)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (75)
वे सभी हरे रेशमी गद्दोंं और बेहतरीन क़िस्म की क़ालीनों पर तकिया लगाए (बैठे) होंगे; (76)
तो फिर, तुम दोनों अपने रब की किन किन नेमतों [Blessings] को मानने से इंकार करोगे? (77)
बहुत बरकतवाला [Blessed] नाम है तुम्हारे रब का, जो बड़े ही प्रतापवाला और उदारता से देनेवाला है। (78)
सूरह 76 : अल इंसान/अद दहर [Man]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क्या इंसान पर समयकाल का एक ऐसा वक़्त नहीं गुजर चुका है कि जब वह कोई उल्लेखनीय चीज़ ही न था? (1)
हमने इंसान को मिश्रित तरल पदार्थ [शुक्राणु और अंडाणु के मिश्रण, intermingling of sperm & ovum] की बूंदों से पैदा किया जिसे हम (बच्चा पैदा होने तक एक चरण से दूसरे चरण तक) पलटते और जाँचते रहते हैं, इसलिए हमने उसे (क्रम से) सुनने वाला (और फिर) देखने वाला बनाया है। (2)
हमने इसे (सही और ग़लत, सच और झूठ में फर्क़ करने की समझ-बूझ के लिए) रास्ता भी दिखा दिया, (अब) चाहे वह (अल्लाह का) आभार मानने वाला हो या आभार न मानने वाला [ungrateful] हो जाए। (3)
हमने विश्वास न रखने वालों के लिए (पैर की) ज़नजीरें और (गर्दन के) तौक़ [iron collars] और (जहन्नम की) दहकती आग तैयार कर रखी है। (4)
निष्ठावान और नेक बंदे (पाकीज़ा शराब के) ऐसे जाम पियेंगे जिसमें काफ़ूर [एक मीठा सुगंधित पौधा] की मिलावट होगी। (5)
(ये जाम वहाँ) के एक बहते हुए सोते [spring] के होंगे जिससे ख़ुदा के ख़ास बंदे पिया करेंगे (और) जहां चाहेंगे (दूसरों को पिलाने के लिए) इसे छोटी नहरों के रूप में बहाकर (भी) ले जाएंगे। (6)
(ये अल्लाह के वे ख़ास बंदे हैं) जो (अपनी) नज़रें [मन्नतें] (मान लेते हैं तो उसे) पूरी करते हैं, और उस दिन से डरते हैं जिसकी सख्ती बड़ी व्यापक होगी। (7)
और वे (अपना) खाना अल्लाह की मुहब्बत में (स्वयं खाने की चाहत रखने और भूखा होने के बावजूद) ग़रीबों,अनाथों और कैदियों को खिला देते हैं। (8)
(और कहते हैं कि): ”हम तो केवल अल्लाह की खुशी के लिए तुम्हें खिला रहे हैं, न तुम से बदले में कोई चीज़ हमें चाहिए और न (यह इच्छा है कि) तुम हमारा शुक्र अदा करो।" (9)
हमें तो अपने रब से उस दिन का डर रहता है जो (चेहरों को) बहुत काला (और) भद्दा कर देने वाला है। (10)
सो अल्लाह उन्हें (अपना डर रखने के कारण) उस दिन की सख्ती से बचा लेगा और उन्ही (चेहरों पर) रौनक और ताजगी और (दिलों में) मस्ती व खुशी भर देगा। (11)
और (हमेशा) सब्र व धीरज (से नेक कामों पर डटे रहने) के बदले उन्हें (इनाम के तौर पर रहने को) जन्नत और (पहनने को) रेशमी कपड़े प्रदान करेगा। (12)
वे उसमें तख़्तों पर तकिये लगाए बैठे होंगे, न वहाँ धूप की तेज़ गर्मी पाएंगे और न सर्दी की ठिठुरा देने वाली तेज़ी। (13)
और (जन्नत के पेड़ों के) साये उन पर झुक रहे होंगे और उनके (फलों के) गुच्छे झुककर लटक रहे होंगे। (14)
और (सेवक लोग) उनके आसपास चांदी के बर्तन और (साफ सुथरे) शीशे के गिलास लिए फिरते होंगे। (15)
(और) शीशे भी चांदी की तरह के (बने) होंगे जिन्हें सेवकों ने (हर एक की ख़्वाहिश के अनुसार) ठीक ठीक अनुपात में भरा होगा। (16)
और उन्हें वहां (पाकीज़ा शराब के) ऐसे जाम पिलाए जायेंगे जिनमें सोंठ/अदरक (जैसी महक) की मिलावट होगी। (17)
(वह शराब जन्नत) में “सलसबील” नाम के एक सोते [spring] से बनी होगी। (18)
और उनके आसपास ऐसे सदाबहार नौजवान लड़के (सेवा में) घूमते रहेंगे कि जब आप उन्हें देखेंगे तो ऐसा लगेगा मानो वे बिखरे हुए मोती हों। (19)
जब आप (जन्नत पर) नज़र डालेंगे तो वहां (बेशुमार) नेमतें और (हर तरफ) बड़े साम्राज्य के लक्षण दिखायी देंगे। (20)
उन (के शरीरों) पर महीन रेशम के हरे और गाढे ब्रोकेड के कपड़े होंगे, और उन्हें चांदी के कंगन पहनाए जाएंगे और उनका रब उन्हें पवित्र शराब पिलाएगा। (21)
(उनसे कहा जाएगा) : “यह तुम्हारा इनाम है और (संसार में नेक राह पर चलने में की गयी) तुम्हारी मेहनत की सराहना की जाती है।“ (22)
(ऐ रसूल), हमने आप पर कुरआन थोड़ा थोड़ा करके उतारा (नाज़िल किया) है। (23)
सो आप अपने रब के आदेश पाने के लिए धीरज (बनाए) रखें और किसी पापी या सच्चाई से इंकार करने वाले की बात पर कान न धरें। (24)
और सुबह और शाम अपने रब के नाम का स्मरण किया करें, (25)
और रात की कुछ घड़ियों में (अल्लाह) के समक्ष सजदे में सर झुकाया करें और रात के (शेष) लंबे हिस्से में उसकी बड़ाई बयान किया करें। (26)
यह (दुनिया की चाहत रखने वाले) जल्दी से हासिल हो जाने वाली चीज़ (संसार) से प्रेम रखते हैं और एक सख्त भारी दिन (की याद) को छोड़े बैठे हैं। (27)
(वे नहीं सोचते कि) हम ही ने उन्हें पैदा किया और उनके जोड़ जोड़ को मजबूत बनाया है और हम जब चाहें उनके बदले में उन्ही जैसे लोगों को पैदा कर दें। (28)
बेशक यह (कुरआन) एक नसीहत है (जो आदमी को सीधे रास्ते पर चलने के लिये याद दिलाती रहती है) , सो जो कोई चाहे अपने रब की तरफ (पहुंचने का) रास्ता अपनाले। (29)
और तुम खुद कुछ नहीं चाह सकते सिवाय इसके जो अल्लाह चाहे, बेशक अल्लाह ख़ूब जानने वाला व बड़ी हिकमत [wisdom, तत्वदर्शिता] वाला है। (30)
वह जिसे चाहता है अपनी रहमत (दयालुता के दायरे) में ले लेता है, और ज़ालिमों के लिए उसने दर्दनाक अज़ाब [यातना] तैयार कर रखा/ रखी है। (31)
सूरह 65 : अत-तलाक़ [तलाक़/ Divorce]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] जब तुम में से कोई भी अपनी बीवियों को तलाक़ देना चाहे, तो ऐसे समय पर दे, जब उनके लिए इद्दत का समय [waiting period] शुरू हो सके, और इस अवधि का हिसाब ध्यान से करो : और अल्लाह का डर रखो, जो तुम्हारा रब है। (इस दौरान) उन (बीवियों) को अपने घरों से न निकालो--- और न उन्हें ख़ुद से निकलना चाहिए----- सिवाए इसके कि वे कोई खुला हुआ अश्लील कर्म [indecency] कर बैठें। ये अल्लाह की तय की हुई सीमाएँ हैं ----जिसने अल्लाह की तय की हुई सीमाएं तोड़ी, तो उसने स्वयं अपने आप पर ही ज़ुल्म किया ---- क्योंकि तुम नहीं जानते कि शायद इस (तलाक़) के बाद अल्लाह (सुलह की) कोई नयी सूरत पैदा कर दे। (1)
फिर जब वे (औरतें) अपनी (इद्दत की) निर्धारित अवधि पूरी करने के नज़दीक पहुंच जाएं, तो या तो उन्हें इज़्ज़त के साथ (अपने वैवाहिक जीवन में) वापस ले लो, या (इद्दत पूरी होने के बाद) इज़्ज़त के साथ उनसे अलग हो जाओ। अपने लोगों में से दो न्याय पसंद करनेवाले गवाहों को बुला लो और अल्लाह के वास्ते गवाही को पक्का बनाओ। जो कोई अल्लाह पर और अंतिम दिन [क़यामत] पर ईमान रखता है, उसे इस बात पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए : अल्लाह उनके लिए (परेशानी से) निकलने का कोई न कोई रास्ता निकाल देगा, जो उससे डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, (2)
और उन्हें उस जगह से रोज़ी देगा जिसका उन्हें अंदाज़ा तक न होगा; जो कोई अल्लाह पर भरोसा करता है, तो उसके लिए अल्लाह काफ़ी है। अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है; अल्लाह ने हर चीज़ का एक सही अंदाज़ा तय कर रखा है। (3)
अगर तुम्हें (इद्दत के बारे में) कोई संदेह हो, (तो जान लो) कि उन औरतों के लिए इद्दत की अवधि तीन महीने है, जिनकी माहवारी आनी बंद हो चुकी है, और उनकी भी इतनी ही है जिनकी अभी तक माहवारी शुरू नहीं हुई; जो औरतें गर्भवती हों, उनके लिए इद्दत की अवधि उस समय तक होगी, जब तक कि वे बच्चा जन न लें: जो कोई अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचता है, अल्लाह उसके काम में आसानी पैदा कर देता है। (4)
यह अल्लाह का आदेश है जो उसने तुम पर उतार भेजा है। जो कोई अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचता है, अल्लाह उसके गुनाहों को मिटा देगा और उसके इनाम को बढ़ा देगा। (5)
अपनी हैसियत के अनुसार, जहाँ तुम स्वयं रहते हो, उन औरतों को भी वहीं रहने की जगह दो जिनको तलाक़ दे रहे हो, और उन्हें इतना परेशान न करो कि उनका जीना दूभर हो जाए। अगर वे गर्भवती हों, तो उनपर तब तक ख़र्च करते रहो जब तक कि वे बच्चा जन न दें; फिर अगर वे तुम्हारे बच्चे को दूध पिलाएँ तो तुम उन्हें उनका पारिश्रामिक [compensation] दो। भले तरीक़े से आपस में सलाह कर के (दूध पिलाने की) बात तय कर लो----- अगर तुम एक दूसरे के लिए मुश्किलें पैदा करोगे, तो फिर कोई दूसरी औरत उस [बाप] के लिए (पैसे के बदले) बच्चे को दूध पिला सकती है। (6)
और अमीर आदमी को अपनी हैसियत के मुताबिक़ (ऐसी औरतों को) ख़र्चा-पानी देना चाहिए। मगर जिसकी रोज़ी ज़रा कम हो, तो जो कुछ अल्लाह ने उसे दे रखा है, उसी में से वह ख़र्च करे: अल्लाह ने किसी को जितना (माल) दिया है, उससे बढ़कर वह किसी आदमी पर (ज़िम्मेदारी का) बोझ नहीं डालता----- (पैसे की) तंगी के बाद अल्लाह आसानी पैदा कर देगा। (7)
कितनी ही बस्तियाँ हैं जिन्होंने अपने रब और उसके रसूलों के आदेश का बड़ी ढिटाई से विरोध किया, तो हमने उनका पूरी कड़ाई से हिसाब लिया : और उन्हें बड़ी सख़्त सज़ा दी! (8)
ताकि उन्हें उनके कुकर्मों के बुरे नतीजे का मज़ा चखा सकें---- उनके (बुरे) कर्मों का अंजाम उनकी बर्बादी थी। (9)
अल्लाह ने उनके लिए (आख़िरत/परलोक में) कठोर यातना तैयार कर रखी है।
अतः तुम जो समझ-बूझ रखते हो, तुम जो ईमान रखते हो, अल्लाह से डरते रहो। उसने तुम्हारे पास नसीहत देनेवाली क़ुरआन भेजी है, (10)
और (साथ में) भेजा है एक रसूल ----- जो तुम्हें अल्लाह की आयतें पढ़कर सुनाते हैं, ये (आयतें) चीज़ों को साफ़ व स्पष्ट कर देती है---- ताकि वे जो ईमान रखते हैं और नेक व अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें अँधेरों से निकालकर रौशनी की तरफ़ ले जाए। जो कोई अल्लाह पर विश्वास रखे, और अच्छा कर्म करे, उसे वह ऐसे (जन्नत के) बाग़़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहां ऐसे लोग हमेशा के लिए रहेंगे --- अल्लाह ने उनके लिए बहुत अच्छी रोज़ी रखी है। (11)
वह अल्लाह है जिसने सात आसमानों को पैदा किया, और उन्हीं के जैसी (सात) ज़मीन भी। उसका आदेश [आयतें] उनके बीच उतरता रहता है। अतः तुम्हें जान लेना चाहिए कि हर चीज़ पूरी तरह से अल्लाह के क़ाबू में है, और यह कि उसने हर चीज़ को अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। (12)
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