Chronological Quran:
Medinan Period-4 [मदनी काल-4] : 626---629 AD
सूरह 98: अल बैय्यिनह
[स्पष्ट प्रमाण, Clear Evidence]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
किताबवालों [यहूदी व ईसाई] में और मुशरिकों [बहुदेववादियों] में से जो लोग सच्चाई से इंकार करने वाले [काफ़िर] थे, वे उस समय तक अपने तरीक़े छोड़ने वाले न थे जब तक कि उनके पास स्पष्ट प्रमाण न आ जाता, (1)
अल्लाह की तरफ से (संदेश पहुँचानेवाले) एक रसूल के रूप में, जो (उन्हें) पवित्र किताब के पन्नों को पढ़ कर सुनाए, (2)
जिनमें सीधी, सच्ची बातें लिखी हुई हों। (3)
(इस के बावजूद) जिन्हें आसमानी किताब दी गयी थी, उनके पास (रसूल और क़ुरआन के रूप में) इतने साफ प्रमाण आ जाने के बाद भी वे आपस में बँट गये, (4)
हालाँकि उन्हें तो बस यही हुक्म दिया गया था कि वे केवल अल्लाह की ही बंदगी करें, एक सच्चे ईमानवाले की तरह अपने दीन को पूरी भक्ति से केवल उसी के लिए समर्पित करें, और पाबन्दी से नमाज़ पढा करें और ज़कात दिया करें, कि यही सच्चा दीन है। (5)
किताबवालों में और मुशरिक लोगों [Idolaters] में से जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास न करने पर अड़े रहे, वे (सभी) जहन्नम की आग में डाले जाएंगे, जहाँ वे हमेशा पड़े रहेंगे. यही लोग पैदा किये गये सभी प्राणियो में सबसे बुरे हैं। (6)
बेशक जो लोग ईमान लाए हैं, और अच्छे कर्म करते रहे हैं, यही लोग पैदा किए गए सभी प्राणियों में सबसे बेहतर हैं। (7)
उनका इनाम उनके रब के यहाँ वह सदाबहार जन्नतें [बाग़] हैं जिनके नीचे से नहरें बहती हैं, और वह उनमें सदा के लिए रहेंगे. अल्लाह उनसे ख़ुश होगा और वे लोग उससे ख़ुश होंगे। ये (सब कुछ) उन लोगों के लिए खास है जो अपने दिल में अपने रब का डर रखते हों। (8)
सूरह 59 : अल हश्र [फ़ौजों का जमा होना/The Gathering (of forces)]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की तारीफ़ बयान करती है; और वह बेहद ताक़तवाला, समझ-बूझवाला [wise] है। (1)
वही है जिसने उन किताबवाले [यहूदी] लोगों में से जिन [बनू-नज़ीर के क़बीले के] लोगों ने विश्वास तोड़ा था, उनको उस समय घरों से निकाल बाहर किया, जब पहली बार (मुस्लिम फ़ौज) वहाँ (मदीने में) जमा हुई थी-----[ऐ ईमानवालो!] तुम ने कभी सोचा भी न था कि वे (वहाँ से) चले जाएंगे, और वे ख़ुद भी यही समझते थे कि उनके मज़बूत क़िले उन्हें अल्लाह (की पकड़) से बचा लेंगे। मगर अल्लाह (की यातना) ने उन्हें ऐसी जगह से आ लिया जिसके बारे में उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था और फिर उनके दिलों में डर बैठा दिया : (नतीजा यह हुआ कि) उनके घर ख़ुद उनके ही हाथों, और ईमानवालों के हाथों बर्बाद हो गए। अतः तुम सब जो नज़र रखते हो, सबक़ सीखो इस (घटना) से! (2)
अगर अल्लाह ने उनकी क़िस्मत में (पहले ही) देश निकाला न लिख दिया होता, तो उन्हें इस दुनिया में (और भी दर्दनाक) यातना देता. आख़िरत [परलोक] में उनके लिए आग की यातना होगी, (3)
यह इसलिए कि उन्होंने ख़ुद अपने आपको अल्लाह और उसके रसूल के विरोध में खड़ा कर लिया : जिस किसी ने अल्लाह का विरोध करने की ठान ली, तो निश्चय ही अल्लाह सज़ा देने में बहुत सख़्त है। (4)
[ईमानवालो! बनू नज़ीर के यहाँ घेरा डालने के दौरान] जो कुछ भी तुमने (उनके) खजूर के पेड़ों के साथ किया----चाहे उन्हें काट डाला या उन्हें जड़ों पर खड़ा रहने दिया-----यह सब तो अल्लाह की मर्ज़ी से ही हुआ, ताकि जिन लोगों ने उसकी आज्ञा मानने से इंकार किया, उन्हें बेइज़्ज़त कर सके। (5)
जो कुछ भी माल (बनू-नज़ीर के लोगों के वहाँ से चले जाने पर) हाथ आ गया, वह तो अल्लाह ने उनसे लेकर अपने रसूल को दिलवा दिया, उसको पाने के लिए [ऐ ईमानवालो!], न तो तुम्हें अपने घोड़े दौड़ाने पड़े और न अपने ऊँट। अल्लाह जिस किसी पर चाहता है, उस पर अपने रसूलों को अधिकार [Authority] प्रदान कर देता है : अल्लाह को सारी चीज़ों की सामर्थ्य प्राप्त है। (6)
जो कुछ माल बस्तीवालों (के वहाँ से चले जाने) से हाथ आ गया, जिसे अल्लाह ने अपने रसूल को दिलवाया, उस पर अधिकार है अल्लाह का, उसके रसूल का, (ग़रीब) नातेदारों का, अनाथों का, ज़रूरतमंदों का और ग़रीब मुसाफ़िरों का ----- यह इसलिए ताकि वह (माल) केवल उन्हीं लोगों में न घूमता रहे, जो तुम में से अमीर हैं ---- अत: तुम्हारे रसूल जो कुछ तुम्हें दे दें, उसे स्वीकार कर लो, और जिस चीज़ से तुम्हें मना कर दें, उससे रुक जाओ. और अल्लाह से डरते रहो : अल्लाह दंड देने में बहुत कठोर है। (7)
(इस माल के हक़दार) वे ग़रीब मुहाजिर [प्रवासी/emigrant] भी हैं, जो (मक्का से) अपने घरों और अपनी जायदादों से निकाल बाहर किए गए, जो अल्लाह की मेहरबानी और उसकी मंज़ूरी चाहते हैं, वे लोग जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल की मदद की---- यही लोग हैं जो सच्चे हैं। (8)
वे लोग [अंसार] (भी हक़दार हैं) जो पहले से ही (मदीना में) पक्के ईमान के साथ, अपने घरों में मज़बूती से जमे हुए थे, वे उन लोगों से मुहब्बत करते हैं जिन्होंने (मक्का से) हिजरत कर के वहाँ पनाह ले ली है, और जो कुछ भी उन (मुहाजिरों) को दिया जाता है, वे अपने दिलों में उसे (पाने की) कोई इच्छा नहीं रखते। (बल्कि) वे उन [मुहाजिरों] को अपने मुक़ाबले में वरीयता [Preference] देते हैं, हालाँकि वे ख़ुद ही बहुत ग़रीब हैं : जो लोग अपने मन के लोभ से बचे रहे, वही असल में कामयाब हैं। (9)
और (इस माल में उनका भी हिस्सा है) जो लोग उन [अंसार व मुहाजिर] के बाद आए, वे कहते हैं, "ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे और हमारे उन भाइयों के गुनाहों को भी माफ़ कर दे जिन्होंने हम से पहले (सच्चाई पर) विश्वास कर लिया था, और हमारे दिलों में विश्वास [ईमान] रखनेवालों के प्रति कोई विद्वेष [malice] न रख। ऐ रब! तू सचमुच बड़ा करुणामय, बेहद दया करनेवाला है।" (10)
[ऐ रसूल!] क्या आप ने उन पाखंड करनेवाले [मुनाफ़िक़/Hypocrites] लोगों को नहीं देखा, जो अपने उन किताबवाले साथियों से कहते हैं जो ईमान से ख़ाली हैं, कि "अगर तुम्हें यहाँ से निकाला गया, तो हम भी तुम्हारे साथ निकल जाएँगे----- हम ऐसे आदमी की कभी कोई बात नहीं सुनेंगे, जो तुम्हें नुक़सान पहुँचाना चाहेगा-----और अगर तुम पर हमला होता है, तो हम ज़रूर तुम्हारी मदद को आएंगे?" अल्लाह गवाही देता है कि वे बिलकुल झूठे हैं : (11)
अगर वे बाहर निकाले गए, तो ये (ढोंगी) लोग कभी उनके साथ नहीं निकलेंगे; अगर उन पर हमला हो, तो ये कभी उनकी मदद के लिए नहीं आएंगे। और अगर कभी ये उनकी मदद के लिए आए भी, तो जल्द ही दुम दबाकर भाग खड़े होंगे----- अंत में उन्हें कोई मदद नहीं मिलनेवाली। (12)
उनके दिलों में [ऐ ईमानवालो] अल्लाह से ज़्यादा, तुम्हारा डर समाया हुआ है क्योंकि ये ऐसे लोग हैं जिनमें समझदारी बिल्कुल नहीं है। (13)
यहाँ तक कि अगर वे एकजुट हों, तब भी वे तुमसे कभी जंग नहीं करेंगे, और अगर कभी लड़ें भी, तो मज़बूत क़िले के अंदर से या ऊँची दीवारों के पीछ से (लड़ेंगे)। उनकी आपस में सख़्त लड़ाई है : तुम सोचते होगे कि वे एकजुट हैं, मगर उनके दिल टुकड़ों में बँटे हुए हैं, और यह इसलिए है कि ये ऐसे लोग है जो बुद्धि से काम नहीं लेते। (14)
इनकी हालत उन्हीं लोगों [बनू क़ैनूक़ा] जैसी है, जो उनसे ठीक पहले (वहाँ से बाहर निकाले) गए थे, वे अपने कर्मों के वबाल का मज़ा चख चुके हैं, और (आख़िरत में) एक दर्दनाक सज़ा उनके इंतज़ार में है। (15)
इन (पाखंडियों) की मिसाल शैतान जैसी है जो आदमी से कहता है, "(सच्चाई पर) ईमान [विश्वास] मत रखो!" मगर फिर, जब आदमी कुफ़्र [विश्वास करने से इंकार] कर देता है, तो शैतान कह देता है, "मैं तुम से अलग होता हूँ; मैं अल्लाह से डरता हूँ, जो सारे संसार का रब है।" (16)
उन दोनों को अंत में (जहन्नम की) आग में जाना है, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। शैतानियाँ करनेवालों का यही बदला है। (17)
ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरते रहो, और हर आदमी को यह बात ध्यान से सोचना चाहिए कि उसने कल (क़यामत के दिन] के लिए क्या (पुण्य) आगे भेजा है; अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो, क्योंकि वह सारी चीज़ें जो तुम करते हो, अल्लाह उन्हें अच्छी तरह जानता है। (18)
और (देखो!) उन लोगों की तरह न हो जाना जो अल्लाह को भूल जाते हैं, अत: अल्लाह उन्हें ऐसा कर देता कि वे स्वयं अपनी जानों को भुला बैठते हैं : यही वे लोग हैं जो आज्ञा न मानने वाले, बाग़ी [rebellious] हैं-----(19)
(जहन्नम की) आग में रहनेवालों और (जन्नत के) बाग़ में रहने वालों के बीच कोई तुलना हो ही नहीं सकती है----- और बाग़ [जन्नत] में रहनेवाले ही कामयाब लोग हैं। (20)
अगर हम ने इस क़ुरआन को किसी पहाड़ पर उतारा होता, तो [ऐ रसूल] आप देखते कि वह अल्लाह के दबदबे व डर से झुक जाता और टूट-फूट जाता : हम ये मिसालें लोगों के सामने इसलिए पेश करते हैं ताकि वे इस पर सोच-विचार कर सकें। (21)
वही अल्लाह है : उसके सिवा (पूजने के लायक़) कोई ख़ुदा नहीं. वही है जो छिपी हुई चीज़ों को भी जानता है, और सामने दिखाई देनेवाली चीज़ों को भी जानता है, वह सब पर मेहरबान है, बेहद दया करनेवाला है। (22)
वही अल्लाह है : उसके सिवा (पूजने के लायक़) कोई ख़ुदा नहीं, वह बादशाह [नियंत्रक] है, बेहद पवित्र है, शांति (सुकून) देनेवाला, सुरक्षा देनेवाला, सबकी देखरेख करनेवाला, बेहद ताक़तवाला, गड़बड़ी को ठीक करनेवाला, सचमुच बहुत महान है; अल्लाह उन चीज़ों से कहीं महान और ऊँचा है जिन्हें वे (अल्लाह का) साझेदार [Partner] ठहराते हैं। (23)
वही अल्लाह है : (हर चीज़ का) पैदा करनेवाला, अस्तित्व देनेवाला, रूप देनेवाला। सब अच्छे नाम उसी के हैं। आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ उसकी बड़ाई बयान करती है: वह बेहद ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझवाला है। (24)
सूरह 24 : अन-नूर [रौशनी/ Light]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है।
यह एक सूरह है, जो हमने उतारी है और इस पर अमल करना ज़रूरी ठहरा दिया है : इसमें हमने साफ़ व स्पष्ट (आदेशों के साथ) आयतें उतारी हैं, ताकि तुम इस पर ध्यान दो और इससे शिक्षा ले सको। (1)
अगर औरत और मर्द बिना शादी किए, एक दूसरे के साथ सेक्स [ज़िना/ extra-marital sexual intercourse] करते हैं, तो ऐसे में दोनों को (सज़ा के तौर पर) सौ-सौ कोड़े मारो। अगर तुम अल्लाह और आनेवाले अंतिम दिन [क़यामत] पर विश्वास रखते हो, तो (देखो) कहीं ऐसा न हो कि अल्लाह के क़ानून पर अमल करते समय उन पर तरस खा कर तुम्हारा हाथ रुक जाए------ और (यह भी ध्यान रहे कि) उन्हें दंड देते समय ईमानवालों का एक समूह वहाँ देखने के लिए मौजूद होना चाहिए। (2)
बिना शादी के, सेक्स [ज़िना] करनेवाला मर्द [Adulterer] इसी लायक़ है कि वह ज़िना (पसंद) करनेवाली औरत [Adulteress] या बहुदेववादी औरत [Idolatress] से ही (शादी के लिए) रिश्ता जोड़े, (इसी तरह) अवैध सेक्स [ज़िना] करनेवाली औरत [Adulteress] के लिए भी उपयुक्त यही है कि वह ज़िना (पसंद) करनेवाले मर्द [Adulterer] या बहुदेववादी मर्द [Idolater] से ही रिश्ता जोड़े : ऐसे आचरण ईमानवालों के लिए बिल्कुल मना कर दिए गए हैं। (3)
और जो लोग शरीफ़ (और विवाहित) औरतों पर (अवैध सेक्स करने का) आरोप लगाएँ, फिर (सबूत में) चार गवाह न ला सकें, तो उन्हें (दंड के रूप में) अस्सी कोड़े मारो और आगे कभी उनकी गवाही क़बूल न करो : ऐसे ही लोग हैं जो क़ानून तोड़नेवाले हैं, (4)
हाँ, जिन लोगों ने इस बुरे कर्म के बाद तौबा कर ली और अपने आपको सुधार लिया, तो निश्चय ही अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (5)
जो लोग अपनी बीवियों पर ज़िना [Adultery] करने का इल्ज़ाम लगाएं, मगर उनके पास अपने सिवा कोई दूसरा गवाह मौजूद न हो, तो ऐसे हर आदमी की गवाही इस तरह होगी कि पहले चार बार अल्लाह की क़सम खाकर यह बयान दे कि (इल्ज़ाम के बारे में) वह सच बोल रहा है, (6)
और, पाँचवी बार, यह गवाही दे कि अगर मैं झूठ बोल रहा हूँ, तो मुझ पर अल्लाह की फिटकार हो"; (7)
(मर्द की गवाही के बाद) उसकी बीवी से (ज़िना की) सज़ा टल सकती है, अगर वह भी चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि उसका पति झूठ बोल रहा है (8)
और, पाँचवी बार, यह गवाही दे कि "अगर उसके पति का बयान सच्चा है, तो मुझ पर अल्लाह की फिटकार हो!" (9)
अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल [bounty] और उसकी रहमत [mercy] साथ न होती, और अगर अल्लाह (गुनाहों की) तौबा [repentance] क़बूल करनेवाला, और बेहद समझ-बूझ रखनेवाला न होता,.....(तो सोचो, क्या हुआ होता)! (10)
[मुसलमानो!] तुम्हारे ही लोगों के बीच एक समूह था जिसने (रसूल की बीवी हज़रत आयशा के बारे में) झूठी बातें गढ़ ली थीं--------तुम (लोग) यह न समझना कि यह तुम्हारे लिए बुरा हुआ; नहीं, बल्कि यह तुम्हारे लिए अच्छा ही हुआ------ उन झूठी बातें बनाने वालों में से हर एक के हिस्से में अपने किए का गुनाह आया है. और उनमें से वह जिसने इस (घटना) में सबसे बड़ी भूमिका निभायी, उसे दर्दनाक सज़ा होगी। (11)
जब तुम ने यह झूठी बात सुनी, तो ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों को चाहिए था कि अपने लोगों के बारे में अच्छा विचार रखते, और कह देते कि "यह तो बिल्कुल गढ़ी हुई झूठी बात है?" (12)
(अगर इस बात में दम था तो) वे इल्ज़ाम लगानेवाले क्यों इस पर चार गवाह नहीं लाए? अगर वे ऐसे गवाह नहीं पेश कर सकते, तो अल्लाह की नज़र में वही लोग झूठे हैं। (13)
[मुसलमानो!] अगर इस दुनिया और आनेवाली दुनिया में तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल [bounty] और उसकी रहमत [mercy] साथ न होती, तो जिस बात के पीछे तुम पड़ गए थे, उसके कारण तुम पर अब तक एक बड़ी सख़्त यातना आ चुकी होती। (14)
जब तुम (बिना सोचे-समझे) एक-दूसरे से उस (झूठ) को अपनी ज़बानों से कहने लगे, और तुम अपने मुँह से वह बातें कहने लगे जिसके (सच होने के) बारे में तुम्हें कोई जानकारी न थी, तुम ने उसे एक मामूली व हल्की बात समझा, मगर अल्लाह के नज़दीक तो वह बहुत गंभीर बात थी। (15)
जब तुम ने झूठी बात सुनी, तो तुम ने ऐसा क्यों न कहा, "अल्लाह की पनाह!---हमें ऐसी बात दोबारा अपनी ज़बान पर नहीं लाना चाहिए---- यह तो बहुत बड़ा लांछन है?"(16)
अल्लाह तुम्हें चेतावनी देता है कि अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो फिर कभी ऐसा काम न करना। (17)
अल्लाह अपने संदेशों को तुम्हारे लिए स्पष्ट कर देता है : अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (18)
वे लोग जो चाहते हैं कि ईमान रखनेवालों के बीच शर्मनाक बुराइयाँ [अश्लीलता/ Indecency] फैल जाएं, उनके लिए दुनिया और आख़िरत [परलोक] में दर्दनाक यातना होगी। (याद रखो!) अल्लाह सब कुछ जानता है, और तुम कुछ नहीं जानते! (19)
अगर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत तुम्हारे साथ न होती, और यह बात न होती कि वह बड़ा नर्म दिल, और बेहद दयालु है ---------! (तॊ तुम भी नहीं बचते!) मगर अल्लाह बड़ा करुणा रखनेवाला, बेहद दयावान है। (20)
ऐ ईमानवालो! तुम शैतान के बताए हुए रास्ते पर मत चलो--------अगर उस रास्ते पर चले, तो शैतान तुम पर ज़ोर डालेगा कि तुम अश्लीलता औऱ बुराई को अपना लो। अगर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत तुम्हारे साथ न होती, तो तुम में से कोई भी कभी पवित्रता [Purity] हासिल न कर पाता। अल्लाह जिसे चाहता है, उसे पवित्र कर के निखार देता है : अल्लाह सब कुछ सुनता है, हर चीज़ जानता है। (21)
तुम में से जिन्हें (अल्लाह की तरफ़ से) भरपूर धन-दौलत मिली है, उन्हें ऐसी क़सम नहीं खानी चाहिए कि वे आगे से नातेदारों, ग़रीबों, और अल्लाह के रास्ते में घर-बार छोड़ कर आनेवालों को अपने माल से कभी कोई मदद नहीं करेंगे : उन्हें चाहिए कि ऐसे लोगों की ग़लतियों को भूल जाएं, और उन्हें माफ़ कर दें. क्या तुम नहीं चाहते कि अल्लाह भी तुम्हारी गलतियों को माफ़ कर दे : अल्लाह (गुनाहों का) बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (22)
जो लोग इज़्ज़तदार और भोली-भाली ईमानवाली औरतों पर लांछन लगाते हैं, तो (याद रखो!) वे लोग इस दुनिया और आनेवाली दुनिया में अल्लाह के द्वारा ठुकरा दिए जाएंगें। एक दर्दनाक सज़ा उनके इंतज़ार में होगी, (23)
जो कुछ वे करते रहे थे, उसके बारे में उस दिन ख़ुद उनकी ज़बानें, उनके हाथ और उनके पाँव उनके ही विरुद्ध गवाही देंगे---- (24)
उस दिन, अल्लाह उन्हें उनके कर्मों के मुताबिक जो उचित बदला होगा, पूरा पूरा अदा कर देगा----और वे जान लेंगे कि अल्लाह ही वह सच्चाई है जो हर चीज़ को स्पष्ट कर देती है। (25)
भ्रष्ट औरतें भ्रष्ट मर्दों के लिए हैं, और भ्रष्ट मर्द भ्रष्ट औरतों के लिए हैं; अच्छी औरतें, अच्छे मर्दों के लिए हैं, और अच्छे मर्द अच्छी औरतों के लिए हैं। अच्छे (व शरीफ़) मर्द और औरतों के ख़िलाफ़ जो कुछ कहा जाता रहा है, उसके बारे में उनका कोई दोष नहीं है; उनके लिए वहां माफ़ी भी होगी और (दुनिया में) इज़्ज़त की रोज़ी भी। (26)
ऐ ईमानवालो! दूसरे लोगों के घऱों में तब तक न घुसा करो, जब तक कि अंदर जाने की इजाज़त न मांग लो और उन घरवालों को सलाम न कर लो---- यही तुम्हारे लिए सबसे अच्छा तरीक़ा होगा : शायद कि तुम इस बात का ध्यान रखो। (27)
अगर ऐसा लगे कि घर के अंदर कोई नहीं, तब भी अंदर तब तक न जाओ, जब तक कि अनुमति न ले लो। अगर तुमसे कहा जाए, “वापस चले जाओ”, तो लौट जाओ----- यही तुम्हारे लिए उचित होगा। (याद रखो) अल्लाह अच्छी तरह जानता है जो कुछ तुम करते हो। (28)
ऐसे घरों के अंदर जाने में कोई दोष नहीं है, जहां कोई न रहता हो, और जिनमें तुम्हारे फ़ायदे की कोई चीज़ मिल सके। (याद रखो!) हर वह चीज़ जो तुम सबके सामने करते हो और हर वह चीज़ जो तुम छिपाते हो, सब कुछ अल्लाह जानता है। (29)
(ऐ रसूल), ईमान रखनेवाले मर्दों से कह दें कि (परायी औरतों के सामने) अपनी नजरें नीची रखा करें, और अपने गुप्त अंगों (private parts) को क़ाबू में रखें : यह उनके लिए ज़्यादा शुद्ध तरीक़ा होगा। अल्लाह अच्छी तरह से जानता है, हर वो चीज़ जो वे किया करते हैं। (30)
और ईमानवाली औरतों से कह दें कि वे भी (पराए मर्दों के सामने) अपनी नजरें नीची रखें और अपने गुप्त अंगों को क़ाबू में रखें, और अपने बनाव-श्रृंगार न दिखाया करें, सिवाए (चेहरे और हाथों के) वे हिस्से जो देखने में आ जाते हैं; और उन्हें चाहिए कि अपनी ओढ़नियों के आंचल अपने सीनों पर डाल लिया करें, और अपने बनाव-श्रृंगार किसी पर ज़ाहिर न करें सिवाए अपने पतियों के या अपने बाप के या अपने ससुर के या अपने बेटों के या अपने पतियों के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजों के या मेल-जोल की औरतों के या जो उनकी अपनी लौंडी/ग़ुलाम होे, या उन नौकरों के जिनमें सेक्स की इच्छा बाक़ी न रही हो, या उन कमसिन लड़कों के जो अभी औरतों के छिपे हुए अंगों से परिचित न हों; और वे अपने पाँव ज़मीन पर पटक-पटक कर न चलें कि अपना जो श्रृंगार उन्होंने छिपा रखा हो, वह सबको मालूम हो जाए। ऐ ईमानवालो! तुम सब मिलकर अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम्हें कामयाबी मिल सके। (31)
तुममें से जिनकी अभी तक शादी नहीं हुई, और तुम्हारे दास व दासियों मे भी जो (शादी के) योग्य हों, उनकी शादी करा दो। अगर वे ग़रीब हैं, तो अल्लाह अपने फ़ज़ल से उनकी रोज़ी की व्यवस्था कर देगा : अल्लाह के फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है और वह सब कुछ जाननेवाला है। (32)
जो लोग (ग़रीबी के कारण) शादी नहीं कर पा रहे हों, उन्हें चाहिए कि संयम से काम लेते हुए अपनी इज़्ज़त बचाए रखें, यहाँ तक कि अल्लाह अपने फ़ज़ल से उन्हें काफ़ी कुछ दे दे। अगर तुम्हारे गुलामों में से कोई अपनी क़ीमत चुका कर आज़ाद होना चाहता है, तो उनके साथ लिखित समझौता कर लो, अगर तुम जानते हो कि उसके अंदर योग्यता है। और जो धन-दौलत अल्लाह ने तुम्हें दे रखा है, उसमें से कुछ उन्हें दे कर मदद करो। और दुनिया के अल्प समय के फ़ायदे के लिए अपनी दासियों को वैश्या बनने पर मजबूर न करो, अगर वे ख़ुद इज़्ज़त की ज़िन्दगी जीना चाहती हों। हालांकि, अगर उन्हें (वैश्यावृत्ति पर) मजबूर किया जाता है, तो (वे दुखी न हों) अल्लाह माफ़ कर देनेवाला और दयावान है। (33)
हमने तुम लोगों की तरफ़ ऐसी आयतें उतार भेजी हैं जो सही रास्ते को स्पष्ट कर देती है, जो उन लोगों की मिसालें देती है जो तुम से पहले गुज़र चुके हैं, और जो उन लोगों को नसीहत देती है जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचते हैं। (34)
अल्लाह आसमानों और ज़मीन की रौशनी है। (मोमिनों के दिल में) उसकी रौशनी की मिसाल ऐसी है जैसे : एक ताक़ (Niche) है, जिसमें एक चिराग़ है - वह चिराग़ एक शीशे के झूमर (फ़ानूस) में है, वह झूमर ऐसा (साफ़) है मानो चमकता हुआ कोई तारा है। वह चिराग़ ज़ैतून के एक बरकतवाले पेड़ के तेल से जलाया गया है, (उसकी रौशनी) न पूरब की तरफ़ है न पश्चिम की तरफ़, उसका तेल (इतना साफ है कि) चाहे आग उसे छुए तक नहीं, तब भी क़रीब क़रीब हर दम रौशनी देता है, --- मतलब रौशनी के ऊपर रौशनी! ---- अल्लाह जिसे चाहता है, उसे अपनी रौशनी को हासिल करने का रास्ता दिखा देता है; अल्लाह लोगों के समझने के लिए ऐसी मिसालें देता है; अल्लाह हर चीज़ की पूरी जानकारी रखता है----- (35)
(उसकी रौशनी) उन इबादत करने की जगहों में चमकती रहती है। अल्लाह ने हुक्म दिया है कि उन (इबादतगाहों) को ऊँचा बनाया जाए और यह कि उनमें उसके नाम का ज़िक्र किया जाए, साथ में उनमें ऐसे लोग हैं जो सुबह-शाम उसकी महानता का गुणगान करते रहते हैं : (36)
ऐसे लोग जिनका मन (अल्लाह से) कभी नहीं भटकता---- न सामान की ख़रीद बिक्री से, न मुनाफ़े से, न अल्लाह की याद से, और न पाबंदी से नमाज पढ़ने से, और न ही तयशुदा ज़कात देने से। वे (आने वाले) उस दिन से डरते रहते हैं जिस दिन (लोगों के) दिल (डर से) उलट जाएंगे और आँखें पत्थरा जाएँगी! (37)
अल्लाह उनके कामों के मुताबिक़ ऐसे लोगों को अच्छे से अच्छा इनाम देगा, और वह अपने फ़ज़ल से उन्हें और ज़्यादा देगा : अल्लाह जिसे देना चाहता है, बेहिसाब देता है। (38)
मगर जो लोग विश्वास नहीं करते, उनके कर्म ऐसे हैं जैसे रेगिस्तान में मरीचिका (mirage) हो : प्यासा आदमी यह सोचता है कि वहां पानी होगा, मगर जब वहां पहुंचता है तो कुछ नहीं पाता, केवल अल्लाह को पाता है, जो उसे (इस बेकार कोशिश का) पूरा-पूरा हिसाब चुका देता है---- और अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (39)
या फिर ऐसा समझो कि जैसे एक गहरे समुद्र में परछाइयां हों जो लहरों के ऊपर लहर से घिरी हुई हों, और ऊपर बादल छाए हुए हों-----एक के ऊपर एक अंधेरे की परतें---- अगर वह अपना हाथ निकाले, तो उसे वह भी सुझाई न दे। और जिसे अल्लाह ही रौशनी न दे, फिर उसके लिए कौन सी रौशनी हो सकती है? (40)
(ऐ रसूल) क्या आप नहीं देखते कि हर चीज़ जो आसमानों और ज़मीन में है, अल्लाह का गुणगान कर रही है, जैसा कि (उड़ते हुए) पंख फैलाए हुए पक्षी भी करते हैं? हर एक को अपनी इबादत करने़ और गुणगान करने का तरीक़ा मालूम है: जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह को उसकी पूरी जानकारी है। (41)
आसमानों और ज़मीन का पूरा नियंत्रण (control) अल्लाह के ही पास है : और अल्लाह ही के पास आख़िर में लौटकर जाना है। (42)
क्या तुम नहीं देखते कि अल्लाह बादलों को चलाता है, फिर उनको एक साथ मिला देता है और उसकी तहें एक दूसरे पर चढ़ जाती हैं, फिर तुम देखते हो कि उसके बीच से पानी की बूंदें टपकने लगती हैं? और वह आसमान में बादल के पहाड़ों से जिस पर चाहता है ओले बरसाता है, और जिस पर चाहता है, उस पर से हटा देता है---- इस समय बिजली की चमक ऐसी होती है कि मानो निगाहों को उचक ले जाएगी। (43)
(मगर) अल्लाह रात और दिन को बारी बारी से लाता रहता है (इसलिए कोई हालत एक जैसी नहीं होती)----- सचमुच आँखें रखनेवालों के लिए इन सब चीज़ों में सीखने के लिए एक सबक़ है------(44)
और (देखो), अल्लाह ने हर जानवर को (उसके अपने) तरल पदार्थ से पैदा किया : उनमें से कोई अपने पेट के बल चलता है और कोई उनमें दो टाँगों पर चलता है और कोई चार (टाँगों) पर चलता है। अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है ; अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (45)
हमने वो आयतें उतार भेजी हैं जो सीधे मार्ग को साफ़ व स्पष्ट कर देनेवाली हैं : अल्लाह जिसे चाहता है, सीधा रास्ता दिखा देता है। (46)
वे (पाखंडी लोग) कहते हैं, "हम अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास करते हैं, और हम उनकी आज्ञा मानते हैं," मगर इसके बाद उनमें से कुछ लोग (अल्लाह और रसूल के हुक्म से) मुँह मोड़ लेते हैं : ऐसे लोग सच्चे ईमानवाले नहीं हैं. (47)
और जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल के सामने हाज़िर होने के लिए बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला कर सकें, तो (देखो) उनमें से कुछ लोग मुंह मोड़ लेते हैं। (48)
लेकिन अगर उन्हें अपना हक़ मिलने वाला हो, तो (ख़ुशी ख़ुशी) वे उस (रसूल) के पास आज्ञाकारी बने चले आएंगे। (49)
क्या उनके दिलों में कोई रोग है? क्या वे संदेह में पड़े हुए हैं? क्या उन्हें इस बात का डर है कि अल्लाह औऱ उसके रसूल उनके साथ न्याय नहीं करेंगे? नहीं, बल्कि असल में वही लोग अन्याय करनेवाले हैं। (50)
जब सच्चे ईमानवाले को अल्लाह और उसके रसूल के सामने हाज़िर होने के लिए बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला कर सकें, तो वे कहते हैं, "हमने (हुक्म) सुना और मान लिया।" यही वे लोग हैं जो कामयाबी पाने वाले हैं : (51)
जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानता है, अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता है, और उसके प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करता है, तो ऐसे ही लोग कामयाब होंगे। (52)
ये (पाखंडी लोग) अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाते हैं कि अगर आप (रसूल) उन्हें हुक्म दें, तो वे (युद्ध के लिए घर बार छोड़कर) ज़रूर निकल खड़े होंगे। उनसे कह दें, "क़समें न खाओ : असल चीज़ तो आज्ञा मानना है, और तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है।" (53)
कहें, "अल्लाह की आज्ञा मानो; उसके रसूल का कहना मानो। अगर तुम मुँह मोड़ते हो तो (याद रखो) जो काम रसूल को सौंपा गया है, उसकी ज़िम्मेदारी उनके सर होगी, और तुम उस काम के लिए ज़िम्मेदार हो जिसका बोझ तुम पर डाला गया है। अगर तुम उन (रसूल) का कहना मानोगे, तो सही मार्ग पा लोगे, मगर रसूल के ज़िम्मे तो इस ज़्यादा कुछ नहीं कि (सच्चाई का) संदेश साफ़ साफ़ पहुँचा दे। (54)
तुम में से वे लोग जो ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, अल्लाह ने उनसे वादा कर रखा है : वह उन्हें ज़मीन का ख़लीफ़ा (Successors) बनाएगा, जिस तरह उसने उनसे पहले के लोगों को बनाया था; उनके लिए अल्लाह उस दीन [religion] को मज़बूती से जमा देगा जिसे उसने उनके लिए चुना है; और वह उनके डर के बदले उन्हें सुरक्षा प्रदान करेगा। “वे मेरी इबादत करेंगे, और किसी भी चीज़ को मेरी ख़ुदायी के साथ नहीं जोड़ेंगे।” जो लोग इसके बाद भी हुक्म नहीं मानते, वैसे ही लोग (बाग़ी (rebels) होंगे---- (55)
(लोगो), पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो, (सही-सही) ज़कात दिया करो, और रसूल की आज्ञा माना करो, ताकि तुम पर दया की जाए। (56)
(ऐ रसूल!) आप ऐसा न समझें कि विश्वास न करनेवाले ज़मीन पर अल्लाह की पकड़ से बच सकते हैं; उनका अंतिम ठिकाना तो (जहन्नम की) आग है, और वह कितना बुरा अंत है! (57)
ऐ ईमानवालो, तुम्हारे ग़ुलामों और तुम में जो अभी युवावस्था को नहीं पहुँचे हैं, उनको चाहिए कि दिन के तीन समयों में तुम्हारे पास आएं तो अनुमति ले कर आया करेंँ : सुबह की नमाज़ से पहले; जब दोपहर की गर्मी के वक़्त तुम (आराम के लिए) अपने कपड़े उतार कर रखते हो; और रात की नमाज़ के बाद। ये तीन समय तुम्हारे लिए (पर्दे में) अकेले रहने के हैं; इसके अलावा दूसरे वक़्तों में तुम पर या उन पर कोई गुनाह नहीं है अगर तुम एक दूसरे के यहां बिना किसी रोक-टोक के आते जाते हो। तो (देखो), अल्लाह इस तरीक़े से अपने संदेशों को स्पष्ट करता है : अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, (और अपने काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (58)
जब तुम्हारे बच्चे युवावस्था को पहुँच जाएँ, तो उन्हें भी चाहिए कि अंदर आने से पहले (हमेशा) अनुमति लिया करें, जैसा कि उनसे बड़े लेते हैं। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, (और अपने काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (59)
बड़ी बूढ़ी औरतें जिन्हें अब निकाह करने की उम्मीद बाक़ी नहीं रही, अगर वे बिना अपना बनाव-श्रृंगार दिखाए हुए अपने ओढ़ने के कपड़े (चादरें) उतारकर रख देंं, तो उनके लिए इसमें गुनाह की कोई बात नहीं, फिर भी अगर वे (चादर उतारने से) बचें, तो उनके लिए ज़्यादा अच्छा होगा : अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (60)
न अंधे आदमी पर कोई दोष होगा, न लँगड़े आदमी पर, न किसी बीमार पर। और ख़ुद तुम्हारे लिए भी कोई दोष की बात नहीं चाहे तुम अपने घरों में खाओ या ऐसे घरों में खाओ जो तुम्हारे बाप, मां, भाई, बहन, चाचा, फूफी (बुआ), मामूं, ख़ाला [मौसी] के घर हों या उन घरों में जिनकी कुंजियां तुम्हारे क़ब्जे में हों या अपने दोस्तों के यहाँ, इसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं होगा : चाहे तुम मिलकर खाओ या अलग-अलग, तुम्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा। हाँ, जब किसी के घरों में जाया करो, तो एक दूसरे को सलाम किया करो, कि यह अल्लाह की तरफ़ से तय की हुई बड़ी बरकतवाली और भलाई की दुआ है। अल्लाह इसी तरीक़े से तुम्हारे लिए अपने संदेशों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम समझ सको। (61)
असली ईमानवाले तो वही लोग हैं जो अल्लाह और उसके रसूल पर (सच्चे दिल से) विश्वास रखते हैं, और वे, जब किसी सामुदायिक मामले के लिए अपने रसूल के साथ इकट्ठा होते हैं, तो वे तब तक वहां से नहीं जाते जब तक कि (अपने रसूल से) इसकी अनुमति न ले लें---- (ऐ रसूल!) जो लोग (ज़रूरत पड़ने पर) आप से इजाज़त मांगते हैं, वही लोग हैं जो सचमुच अल्लाह और रसूल पर ईमान रखते हैं। जब वे किसी निजी काम के लिए (जाने की) अनुमति मांगें, तो उनमें से आप जिस किसी को सही समझें, जाने की अनुमति दे दिया करें, और उन लोगों के लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ किया करें। अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (62)
(ऐ लोगो!) अल्लाह के रसूल जब तुम्हें हाज़िर होने के लिए बुलाएं, तो उनके बुलाने को तुम आपस में एक-दूसरे को बुलाने जैसा मत समझ बैठना ---- अल्लाह तुम में से उन लोगों को अच्छी तरह से जानता है जो (भीड़ में) छिप कर चुपके से खिसक लेते हैं---- और वे लोग जो उनके हुक्म के ख़िलाफ़ काम करते हैं, उनको डरना चाहिए कि कहीं ऐसा न हो कि वे किसी सख़्त आफ़त में पड़ जाएं या उनपर कोई दर्दनाक यातना आ पड़े। (63)
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की है : वह अच्छी तरह जानता है तुम जिस हालत [state] में भी हो----- उस दिन जब सब लोग लौट कर उसके पास लाए जाएंगे, तो जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें हर चीज़ बता देगा----- अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (64)
सूरह 22 : अल-हज्ज [हज / The Pilgrimage]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है
ऐ लोगो! अपने रब की यातना से डरो, क्योंकि (क़यामत की) अंतिम घड़ी में जो भूंचाल होगा वह बड़ी ज़बरदस्त घटना होगी : (1)
(जिस दिन वह घड़ी आ जाएगी) उस दिन तुम देखोगे : हर एक दूध पिलानेवाली माँ अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाएगी, हर एक गर्भवती औरत अपना गर्भ (समय से पहले) गिरा देगी। लोगों को देखकर तुम्हें लगेगा कि वे नशे में मदहोश हैं जबकि वे नशे में न होंगे, अल्लाह की यातना इतनी दिल दहला देनेवाली होगी। (2)
इसके बावजूद कुछ ऐसे भी हैंं जो बिना जाने-बूझे अल्लाह के बारे मेंं झगड़ा करते हैं, और हर बाग़ी शैतान के पीछे चल पड़ते हैं, (3)
जबकि शैतान के लिए यह बात लिख दी गयी है कि जो कोई उसका दोस्त हुआ, उसे वह ज़रूर सीधे रास्ते से भटका देगा, और उसे (जहन्नम की) भड़कती आग तक पहुँचा कर रहेगा। (4)
लोगो! अगर तुम्हें (मर के) दोबारा जी उठने के बारे में कोई सन्देह हो तो (याद रखो!), कि हमने तुम्हें (पहले) मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य [sperm] की बूंद से, जो फिर जोंक की तरह सटी हुई चीज़ बन जाती है, फिर गोश्त का लोथड़ा बन जाता है जिसमें (कभी) पूरी शक्ल बन जाती है और (कभी) पूरी नहीं बनती : यह इसलिए कि हम चाहते हैं कि हमारी शक्ति व क़ुदरत (के करिश्मे) तुम्हारी समझ में ठीक से आ जाएं। फिर जिस वीर्य को हम चाहते हैं, उसे (औरत के) गर्भ में एक नियत समय तक ठहराए रखते हैं, फिर तुम्हें एक बच्चे के रूप में बाहर लाते हैं और फिर तुम बड़े होते हुए अपनी जवानी की अवस्था को पहुँच जाते हो। तुम में से कुछ लोग तो (बुढ़ापे से) पहले ही मर जाते हैं, और कुछ लोग (बुढ़ापे की) इतनी उम्र तक ज़िंदा बचे रहते हैं कि जो कुछ वे जानते थे, सब भुला बैठते हैं। कभी कभी तुम देखते हो कि ज़मीन सूखी-बेजान पड़ी है, फिर जब हम उसपर पानी बरसा देते हैं, तो अचानक लहलहाने और उभरने लगती है और उसमें हर क़िस्म की ख़ुशनुमा चीज़े उग आती हैं : (5)
ऐसा इसलिए है कि अल्लाह ही सच्चाई है; वह मुर्दों को फिर से ज़िंदा करता है; उसे हर चीज़ करने की ताक़त है। (6)
इस बात में कोई संदेह नहीं कि क़यामत की घड़ी आकर रहेगी, और न इसमें कोई शक है कि अल्लाह मुर्दों को उनकी क़ब्रों से उठा खड़ा करेगा, (7)
कुछ लोग ऐसे हैं कि न तो उनके पास ज्ञान है, न किसी तरह का मार्गदर्शन है, और न ही ज्ञान की रौशनी देनेवाली किताब है, तब भी वे अल्लाह के बारे में झग़ड़ा करते हैं, (8)
घमंड से अपने पहलू मोड़ लेते हैं, ताकि दूसरों को अल्लाह के मार्ग से भटका दें। ऐसे आदमी के लिए दुनिया में भी बेइज़्ज़ती है, और क़यामत के दिन हम उसे आग में जलने का मज़ा चखाएँगे। (9)
(उनसे कहा जाएगा), "यह सब तेरे उन करतूतों का नतीजा है जो ख़ुद तेरे हाथों ने जमा कर रखा है : अल्लाह अपने बंदों पर कभी ज़ुल्म करनेवाला नहीं है। (10)
और (देखो!), कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह की बंदगी तो करते हैं, मगर उनके ईमान में स्थिरता नहीं होती : अगर उन्हें (दुनिया में) कोई फ़ायदा पहुँच गया, तो वे उससे सन्तुष्ट हो गए, लेकिन अगर उनकी परीक्षा ली गयी, तो उल्टे पाँव (इंकार करने की) हालत पर लौट आएं, (इस तरह) दुनिया भी हार बैठे और आनेवाली दुनिया भी हाथ से निकल गयी---- यह बात साफ़ है कि यही बहुत बड़ा घाटा है। (11)
वे अल्लाह को छोड़कर (ज़रूरत के समय) उसे पुकारते हैं, जो न उन्हें नुक़सान पहुँचा सके और न उनकी मदद कर सके------ सही रास्ते से बहुत दूर भटक जाना यही है----- (12)
या वे ऐसे (झूठे ख़ुदा) को पुकारते हैं जिससे फ़ायदा होने के बजाए कहीं अधिक नुक़सान होना तय है। कितना बुरा मददगार है और कितना बुरा साथी है वह! (13)
मगर जिन लोगों ने विश्वास रखा और अच्छे कर्म किए, उन्हें अल्लाह ऐसे बाग़ों में दाखिल करेगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। अल्लाह जो चाहता है, करता है। (14)
जो कोई (निराश होकर) ऐसा सोचता है कि अल्लाह दुनिया औऱ आख़िरत [परलोक] में उसकी कोई मदद करनेवाला नहीं, तो उसे चाहिए कि वह छत से एक रस्सी तान ले और (अपने आपको फाँसी लगा कर) ज़मीन से अपना रिश्ता काट दे, फिर देखे कि उस उपाय से उसका ग़ुस्सा दूर होता है कि नहीं। (15)
(देखो), इस तरह हम इस (क़ुरआन) को स्पष्ट संदेशों के रूप में उतार भेजते हैं, और अल्लाह जिसे चाहता है, सही रास्ते पर लगा देता है। (16)
रहे वे लोग जो ईमान रखते हैं, जो यहूदी मत के माननेवाले हैं, जो साबी [Sabians] हैं, जो ईसाई हैं, जो मजूसी [Magians] हैं, और जो मुशरिक [बहुदेववादी /Idolaters] हैं, अल्लाह क़यामत के दिन इन सबके बीच फ़ैसला कर देगा; अल्लाह सब कुछ देखता है। (17)
[ऐ रसूल] क्या आप नहीं समझते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह के सामने झुकी रहती है : सूरज, चाँद, तारे, पहाड़, पेड़, और जानवर? और बहुत सारे आदमी भी (सज्दे में झुके रहते हैं), मगर हाँ, बहुत-से आदमी ऐसे भी हैं जो इसी लायक़ हैं कि उन्हें सज़ा मिलनी ही चाहिए। और जिसे अल्लाह बेइज़्ज़त कर दे, तो उसे इज़्ज़त देनेवाला कोई नहीं : अल्लाह जो चाहता है, करता है। (18)
ये (ईमानवाले और काफ़िर) दो तरह के आदमी हैं जो अपने रब के बारे में मतभेद रखते हैं. जो लोग विश्वास नहीं करते, उनके पहनने के लिए आग का कपड़ा होगा; उनके सिरों पर खौलता हुआ पानी डाला जाएगा, (19)
इससे उनके पेट के अंदर की चीज़ें भी गल उठेंगी और उनके बदन के चमड़े भी; (20)
उन्हें क़ाबू में रखने के लिए लोहे की छड़ियाँ होंगी; (21)
जब कभी वे परेशान होकर उससे निकल भागना चाहेंगे, तो वे उसी में वापस धकिया दिये जाएंगे और कहा जाएगा, "अब आग में जलने का मज़ा चखो!" (22)
मगर जो लोग ईमान रखते हैं और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो अल्लाह उन लोगों को ऐसे बाग़ों में दाखिल करेगा जिनके नीचें नहरें बह रही होंगी; वहाँ वे सोने के कंगनों और मोतियों से सजाए जाएँगे; उनके पहनने के लिए वहाँ रेशमी कपड़ा होगा। (23)
उन्हें ऐसी बात की तरफ़ ले जाया गया था जो अच्छी व पाकीज़ा बात थी, और उन्हें ऐसे रास्ते पर चलाया गया था जो उस (ख़ुदा) का रास्ता है जो सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (24)
रहे वे लोग जिन्होंने विश्वास करने से इंकार किया, जो दूसरों को अल्लाह के मार्ग से और पवित्र मस्जिद [काबा] से रोकते हैं---- जिसे हमने सारे लोगों के लिए एक समान (इबादत की जगह) बनाया है, चाहे वहाँ का निवासी हो या बाहर से आया हो ---- और (याद रहे कि) जो कोई ज़ुल्म कर के इन (नियमों) को तोड़ने की कोशिश करेगा, उसे हम दर्दनाक सज़ा का मज़ा चखाएँगे। (25)
(याद करो!) जब हमने इबराहीम को उस (पवित्र) घर [काबा] की जगह दिखायी और कहा था, "मेरे साथ किसी चीज़ को (मेरी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] न ठहराना. मेरे घर को उन लोगों के लिए पाक-साफ़ रखना जो इसके गिर्द फेरा [तवाफ़] लगाते हैं, जो इबादत के लिए खड़े होते हैं, और जो रुकू [bow] और सज्दे [prostrate] में झुकते हैं। (26)
(और हुक्म दिया था कि) लोगों के बीच हज करने की घोषणा कर दो. वे (दूर दूर से) गहरे पहाड़ी दर्रों से होते हुए तेरे पास आया करेंगे, पैदल भी और हर तरह की तेज़ सवारियों पर भी, (27)
ताकि वे यहाँ आने का फ़ायदा उठा सकें, और निर्धारित दिनों में, जो चौपाए अल्लाह ने उन्हें दे रखे हैं, उनपर अल्लाह का नाम लें (और उनकी क़ुर्बानी कर) सकें ------- फिर उस (क़ुर्बानी के गोश्त) में से ख़ुद भी खाओ और ग़रीब- बदहाल लोगों को भी खिलाओ---- (28)
फिर (हज में आये हुए) लोगों को चाहिए कि साफ़-सुथरे हो जाएं, अपनी मन्नतें पूरी करें और इस पुराने घर [काबा] का (सात बार) चक्कर [तवाफ़] लगाएं।" (29)
ये सारी चीज़ें [अल्लाह ने आदेश की हैं] : जो कोई अल्लाह द्वारा तय की गयी मर्यादाओं का आदर करेगा, तो वह अपने रब से इसका बहुत अच्छा बदला पायेगा।
तुम्हारे लिए सारे चौपाए हलाल [lawful] कर दिए गए हैं, सिवाए उनके जिनके बारे में ख़ास तौर से मना किया गया है। मूर्तिपूजा से जुड़ी धारणाओं और रीतियों (जैसे चौपाया जानवरों को मूर्तियों पर बलि चढ़ाए जाने) की गन्दगी से बच कर रहो, और झूठी बातों से भी बचते रहो। (30)
पूरी भक्ति से अल्लाह के ही सामने झुको और उसके साथ किसी को (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] न ठहराओ, क्योंकि जिस किसी ने ऐसा किया, तो उसका हाल ऐसा होगा जैसे उसे आसमानों से नीचे फेंक दिया गया हो और उसे (हवा में) कोई पक्षी उचक ले जाए, या हवा का झोंका उसे किसी दूर-दराज़ इलाक़े में ले जाकर फेंक दे। (31)
ये सारी चीज़ें (अल्लाह के हुक्म से होती हैं) : जो लोग अल्लाह की रीतियों को मानते हुए उसका आदर करते हैं, तो ये (चीज़ें) उनके दिलों में बुराइयों से बचने की भावना को दिखाती हैं। (32)
एक नियत समय तक चौपाये तुम्हारे लिए बहुत फ़ायदे के हैं। उसके बाद उन्हें पुराने घर [काबा] के पास क़ुर्बानी के लिए ले जाना है : (33)
(और देखो!) हर समुदाय के लिए हमने भक्ति का तरीक़ा तय कर दिया कि जब वे हमारे दिए हुए पालतू चौपायों (को काटकर खाना चाहें, तो उन) पर अल्लाह का नाम ले लें : तुम्हारा अल्लाह तो एक ही है, अत: पूरी भक्ति से उसी के हो रहो, (ऐ रसूल!), आप विनम्र लोगों को (कामयाबी की) अच्छी ख़बर दे दें, (34)
जब कभी ऐसे (नेक) लोगों के सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है, तो उनके दिल दहल उठते हैं, जो भी मुसीबत उन पर आती है, उस पर धीरज से काम लेते हैं, जो नमाज़ को पूरी पाबंदी से पढ़ने में लगे रहते हैं, और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दे रखी है उसे (सही रास्ते में) ख़र्च करते रहते हैं। (35)
(और देखो, क़ुर्बानी के) ऊँटों को हमने तुम्हारे लिए अल्लाह की पवित्र निशानियों में से बनाया है। तुम्हारे लिए उनमें बहुत सी अच्छाइयाँ हैं। अतः जब वे कुर्बानी के लिए क़तार में खड़े किए जाएं, तो उनपर अल्लाह का नाम लो, फिर जब वे (ज़बह होकर) गिर पड़ें, तो उनके गोश्त में से ख़ुद भी खाओ औऱ साथ में उनको भी खिलाओ, जो चाहे मांगते हों या न मांगते हों। इस तरह हमने इन (जानवरों) को तुम्हारे वश में कर दिया है, ताकि तुम शुक्र अदा करनेवाले बन जाओ। (36)
(याद रहे! क़ुर्बानी के जानवर का) न तो गोश्त और न ही ख़ून अल्लाह तक पहुँचता है, वहां अगर कुछ पहुंचता है तो वह तुम्हारे दिल की नेकी [तक़वा /paiety] है! उसने इन (जानवरों) को इस तरह तुम्हारे वश में कर दिया है कि जो सही रास्ता अल्लाह ने तुम्हें दिखाया है, उस पर शुक्र अदा करो, और अल्लाह की बड़ाई बयान करो,
जो लोग अच्छा काम करते हैं, उन्हें (सच्चाई क़बूल करने की) ख़ुशख़बरी सुना दो : (37)
ईमान रखनेवालों को अल्लाह (ज़ालिमों से) बचा लेगा; अल्लाह ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता जो न विश्वास करने योग्य हों और न ही (नेमतों के लिए) शुक्र अदा करते हों। (38)
जिन (ईमानवाले) लोगों पर हमला किया गया है, उन्हें हथियार उठाने की अनुमति दी जाती है, क्योंकि उन पर साफ़ तौर से ज़ुल्म किया गया है ----- अल्लाह उनकी मदद करने की पूरी ताक़त रखता है। (39)
वे लोग जो अपने घरों से बिना किसी हक़ के, केवल इसलिए भगा दिए गए कि वे कहते थे, "हमारा रब अल्लाह है।" अगर अल्लाह एक-दूसरे के द्वारा कुछ लोगों को हटाता न रहता तो बहुत सारी मठें [Monasteries], गिरजा घर [churches], यहूदियों की इबादतगाहें [Synagogues] और मस्जिदें, जिनमें अल्लाह के नाम का ज़िक्र बार-बार किया जाता है, सब बर्बाद कर दी जातीं। अल्लाह ऐसे लोगों की मदद ज़रूर करेगा, जो उसकी (सच्चाई के पक्ष में) मदद करते हैं ---- अल्लाह बड़ा मज़बूत, बेहद ताक़तवाला है ---- (40)
ये वह लोग हैं, जिनके क़दम जब हम ज़मीन पर मज़बूती से जमा (कर हुकूमत दे) देते हैं, तो वे नमाज़ का आयोजन करते हैं, तयशुदा ज़कात [alms] देते हैं, भलाई के कामों का हुक्म देते हैं, बुराई से रोकते हैं : सारे मामलों का नतीजा अल्लाह के ही हाथ में है। (41)
[ऐ रसूल], अगर वे आपको झूठा कह कर ठुकराते हैं, तो आपसे पहले नूह [Noah] की क़ौम के लोगों ने भी ऐसा किया था, और ऐसा ही आद [Aad], समूद [Thamud], (42)
इबराहीम [Abraham], लूत [Lot], मदयन [Midian] की क़ौम के लोग भी कर चुके हैं। (43)
मूसा [Mose] को भी झूठा कहा गया था। मैंने विश्वास न करनेवालों को थोड़े समय के लिए ढील दी, मगर अंत में मैंने उन्हें सज़ा दी। तो (देखो) मेरी पकड़ उनके लिए कैसी थी कि बेकार होकर रह गए! (44)
कितनी ही बस्तियाँ हम बर्बाद कर चुके हैं जो ज़ुल्म करने वाली थीं, हम ने उन्हें पूरी तरह खंडहर बना के छोड़ दिया; कितने ही वीरान पड़े हुए कुएँ; कितने ही ऊँचे-ऊँचे महल! (45)
क्या ये (मक्का के) लोग ज़मीन पर एक जगह से दूसरी जगह चले फिरे नहीं कि सीख ले पाते? उनके पास दिल होते और समझते-बूझते, कान होते और कुछ सुन पाते? असल में लोगों की आँखें अंधी नहीं हुई हैं, बल्कि उनके सीनों में जो दिल हैं, वे अंधे हो गए हैं। (46)
(ऐ रसूल), वे आपसे यातना जल्दी ले आने की चुनौती दे रहे हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि अल्लाह अपना वादा पूरा न करे ----- मगर आपके रब के यहाँ एक दिन, तुम लोगों की गिनती में एक हजार साल जैसा है। ( 47)
कितनी ही बस्तियाँ थीं जो ग़लत कामों में डूबी हुई थी जिनको मैंने कुछ और मुहलत दी, फिर उन्हें (पकड़ लिया और) मिटा कर रख दिया : अंत में उन सबको मेरी ही पास लौट कर आना है। (48)
[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ लोगो! मैं केवल इसीलिए भेजा गया हूँ कि तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) साफ़ व स्पष्ट ढंग से सावधान कर दूँ।" (49)
फिर जिन लोगों ने विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, उनकी ग़लतियों को माफ़ कर दिया जाएगा और उनके लिए इज़्ज़त की रोज़ी होगी। (50)
लेकिन जो लोग हमारे संदेशों का विरोध करने में लगे रहे और उन्होंने हमें हरा देने की बेकार कोशिश की, उनके भाग्य में (जहन्नम की) आग में जाना लिखा है। (51)
[ऐ रसूल], हम ने आपसे पहले कभी कोई रसूल और नबी [Prophet] ऐसा नहीं भेजा कि जब भी उसने (सुधार करने की) कामना की हो, और शैतान ने उसमें कोई फ़ितना डालने की कोशिश न की हो. मगर अल्लाह शैतान के फ़ितनों [insinuations] को दूर कर देता है, और फिर अल्लाह अपने संदेशों [निशानियों] को और मज़बूत बना देता है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है। (52)
शैतान के फितनों को अल्लाह केवल उन लोगों के लिए आज़माइश बना देता है, जिनके दिलों में रोग है और जिनके दिल (सच्चाई के विरोध में) कठोर हो गये हैं--- ज़ुल्म करनेवाले (सच्चाई के) ज़बरदस्त विरोधी हैं----- (53)
और जिन्हें ज्ञान मिला है, अल्लाह चाहता है कि वे जान लें कि जो आयतें उतरी हैं, ये सच्चाई हैं जो तुम्हारे रब की तरफ़ से आयी हैं, ताकि वे इस पर विश्वास कर सकें और उसके सामने उनके दिल झुक जाएँ : अल्लाह ईमान रखनेवालों को सीधा मार्ग दिखा देता है। (54)
विश्वास न करनेवाले उस वक्त तक संदेह मे ही डूबे रहेंगे, जब तक कि क़यामत की घड़ी अचानक उनपर न आ जाए या एक ऐसे दिन की यातना उनपर न आ पहुँचे जिस दिन सारी आस टूट जाए। (55)
उस दिन सारा नियंत्रण व बादशाही अल्लाह ही की होगी : वह उन सब के बीच फ़ैसला कर देगा। जिन लोगों ने विश्वास किया और अच्छे कर्म किए, वे ख़ुशियों भरे बाग़ों (जन्नतों) में दाख़िल किए जाएंगे, (56)
और जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया और हमारी आयतों कोे झूठ समझते हुए ठुकरा दिया, उनके लिए अपमानित कर देनेवाली यातना होगी। (57)
अल्लाह उन लोगों को (परलोक में) दिल खोलकर रोज़ी देगा, जो अल्लाह के रास्ते में घर-बार छोड़कर (मदीना) चले आए, फिर मारे गए या जिनकी मौत हो गयी। और अल्लाह ही सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है। (58)
वह उन्हें ऐसी जगह पहुँचा देगा जिससे वे ख़ुश हो जाएँगे : अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बेहद सहनशील है। (59)
ये बात तय है कि अगर एक आदमी किसी (दुश्मन) के आक्रामक रवैये का ठीक वैसा ही बदला ले जैसा उसके साथ किया गया हो, और उसके बाद (उसका दुश्मन) उस पर फिर ज़ुल्म करने लग जाए, तो अल्लाह उस (निर्दोष) की ज़रूर मदद करेगा : अल्लाह (बुराइयों को) अनदेखा करनेवाला, बहुत माफ़ करनेवाला है। (60)
ऐसा इसलिए है कि अल्लाह ही है जो रात को दिन से मिला देता है और दिन को रात से मिला देता है, और यह कि अल्लाह सब कुछ सुनता, सब कुछ देखता है। (61)
ऐसा इसलिए भी है कि अकेला अल्लाह ही है जो सच्चाई है, और उसके सिवा वे जिस किसी को पुकारते हैं, निरा झूठ व मिथ्या हैं : वह अल्लाह है जो सबसे ऊँचा, सबसे महान है। (62)
(ऐ रसूल!), क्या आपने ध्यान नहीं दिया कि कैसे हम आसमान से पानी बरसाते हैं और अगले दिन (सूखी) ज़मीन हरी-भरी हो कर लहलहाने लगती है? अल्लाह सचमुच बहुत बारीक नज़र रखनेवाला, हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है; (63 )
आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ उसी की है; केवल अल्लाह ही है जो किसी पर निर्भर नहीं, हर तरह की तारीफ़ों के लायक़ है। (64)
क्या तुमने ध्यान नहीं दिया कि कैसे अल्लाह ने ज़मीन की हर एक चीज़ को तुम्हारे काम में लगा रखा है? कि उसी के हुक्म से समंदर में जहाज़ चलते हैं? उसने आसमानों को इस तरह रोक रखा है कि बिना उसकी अनुमति के वे ज़मीन पर नहीं गिर सकते। अल्लाह इंसानों के लिए बड़ा तरस खानेवाला, बेहद दयावान है----- (65)
वही है जिसने तुम (लोगों) को ज़िन्दगी दी, वही तुम्हें मौत देगा, और फिर वही तुम्हें दोबारा ज़िंदा करनेवाला है---- मगर आदमी सचमुच शुक अदा करनेवाला नहीं है। (66)
हर समुदाय के लिए हमने इबादत (पूजा-पाठ) करने का तरीक़ा तय कर रखा है, जिसका पालन उसके लोग करते है, अतः इस मामले में उन्हें (ऐ रसूल) आपसे झगड़ने की ज़रूरत नहीं है। आप उन्हें अपने रब की ओर बुलाएं---- आप बिल्कुल सीधे मार्ग पर हैं---- (67)
और अगर (इस पर भी) वे आपसे झगड़ा करें तो कह दें, "तुम जो कुछ कर रहे हो अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है।” (68)
तुम जिन बातों में आपस में एक दूसरे से झगड़ा करते रहते हो, क़यामत के दिन अल्लाह तुम्हारे बीच फ़ैसला कर के हक़ीक़त साफ़ कर देगा। (69)
(ऐ रसूल), क्या आपको मालूम नहीं कि वे सारी चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं, उन्हें अल्लाह जानता है? ये सारी चीज़ें एक किताब में लिखी हुई हैं; यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है। (70)
तब भी ये लोग अल्लाह को छोड़कर उन चीज़ों की बंदगी करते हैं जिनके लिए न तो उसने कोई प्रमाण [authority] भेजा, और न तो उनके पास (आसमानी) ज्ञान की कोई रौशनी है: (याद रहे) कोई न होगा जो शैतानी करनेवालों की मदद कर सके। (71)
[ऐ रसूल!], जब हमारे संदेश उनके सामने साफ़-साफ़ पढ़ कर सुनाए जाते हैं, तो विश्वास न करनेवालों के चेहरों पर आप दुश्मनी के भाव साफ़ देख सकते हैं : ऐसा लगता है मानो हमारी आयतों को सुनानेवालों पर ये हमला कर बैठेंगे। कह दें, "क्या मैं तुम्हें बता दूँ कि तुम जैसा अभी महसूस कर रहे हो, इससे कहीं बुरी चीज़ क्या है? 'आग' है वह! जिसका वादा अल्लाह ने विश्वास न करनेवालों के लिए कर रखा है! क्या दुख भरा अंत है यह!" (72)
ऐ लोगों! एक मिसाल पेश की जाती है, उसे ध्यान से सुनो : अल्लाह को छोड़कर तुम (ज़रुरत के समय) जिन्हें पुकारते हो, वे एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते चाहे वे अपनी सारी ताक़तें एक साथ जोड़ भी लें, और अगर मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाए तो वे उसके चंगुल से उसको छुड़ा भी नहीं सकते। कितने बेबस और असहाय हैं मदद मांगनेवाले और कितने कमज़ोर हैं ये जिनसे मदद माँगी जाती है! (73)
उन्होंने असल में अल्लाह के सही मक़ाम [True measure] को पहचाना ही नहीं : अल्लाह सचमुच बहुत मज़बूत, बेहद प्रभुत्वशाली है। (74)
अल्लाह फ़रिश्तों में से भी संदेश पहुँचानेवाले को चुनता है और इंसानों में से भी। अल्लाह हर बात सुनता है, हर चीज़ देखता है : (75)
वह जानता है जो कुछ उनके आगे होने वाला है और जो कुछ उनके पीछे हो चुका है। और सारे मामले अल्लाह ही की ओर लौट कर आते हैं। (76)
ऐ ईमानवालो! (अल्लाह के सामने) रुकू में झुको, (माथा टेकते हुए) सज्दे में झुको, और अपने रब की बंदगी करो, और अच्छा व नेक काम करो ताकि तुम कामयाब हो सको। (77)
अल्लाह के रास्ते में जान लड़ा दो, (उसके रास्ते में) जान लड़ाने का जो हक़ है, उसे पूरा करो : उसने तुम्हें चुन लिया है और उसने तुम्हारे दीन [धर्म] में कोई तंगी और कठिनाई नहीं रखी, वह तरीक़ा तुम्हारा हुआ जो तुम्हारे बाप इबराहीम का तरीक़ा था। अल्लाह ने तुम्हें मुस्लिम [आज्ञाकारी] के नाम से पुकारा है----- पहले भी और इस (क़ुरआन) में भी------ ताकि रसूल तुम पर (सच्चाई का) गवाह रहे और तुम दूसरे लोगों पर गवाह रहो। अतः नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो, तय किया हुआ ज़कात [alms] दिया करो, और अल्लाह का सहारा मज़बूती से पकड़े रहो : वही तुम्हारा रखवाला है---- तो क्या ही अच्छा रखवाला है वह और कितना अच्छा मददगार! (78)
सूरह 63 : अल मुनाफ़िक़ून [(मदीना के) पाखंडी लोग/ The Hypocrites]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] जब (मदीना के) पाखंडी लोग [मुनाफ़िक/ Hypocrites] आपके पास आते हैं, तो कहते हैं, "हम इस बात की गवाही देते हैं कि आप अल्लाह के रसूल हैं।" वैसे अल्लाह जानता है कि आप सचमुच उसके रसूल हैं, और अल्लाह (यह भी) गवाही देता है कि ये पाखंडी लोग बिलकुल झूठे हैं----(1)
वे अपनी क़समों को ढाल [Shield] के रूप में उपयोग करते हैं, और इस तरह वे दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं : वे जो कुछ भी करते रहे हैं, वह सचमुच ही शैतानी काम हैं----- (2)
यह इस कारण से है कि पहले तो उन लोगों ने (सच्चाई पर ज़बान से) विश्वास कर लिया था, मगर फिर बाद में (दिल से) उसे मानने से इंकार कर दिया, अतः उनके दिलों को बंद कर के उस पर ठप्पा लगा दिया गया है, और अब वे (सच्चाई की बातें) नहीं समझ सकते हैं। (3)
(ऐ रसूल!) जब आप उन्हें देखें, तो उनके बाहरी रूप को पसंद करेंगे; फिर जब वे बातें करें, तो आप उनकी बात सुनते ही रह जाएं। मगर वे किसी सहारे से खड़ी की गयी लकड़ियों की तरह हैं (जो देखने में मज़बूत लगें, मगर बिना जड़ के हों) ---- वे सुनायी देनेवाली हर ज़ोर की आवाज़ को अपने ही विरुद्ध समझते हैं---- और वे (आपके) दुश्मन हैं। अतः उनसे बचकर रहें। अल्लाह की मार हो उनपर! वे कितने शातिर व कुटिल हैं! (4)
जब उनसे कहा जाता है कि, "आओ, ताकि अल्लाह के रसूल तुम्हारे लिए माफ़ी की प्रार्थना कर दें", तो वे तिरस्कार से अपने सिर झटक कर फेर लेते हैं, और आप देखते हैं कि वे अकड़ते हुए चल देते हैं। (5)
इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, चाहे (ऐ रसूल) आप उनके लिए माफ़ी की प्रार्थना करें या न करें, अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा : ऐसे विश्वासघातियों को अल्लाह सीधा रास्ता नहीं दिखाता। (6)
ये वही लोग हैं जो (मदीना के अंसार [Helpers] से) कहते हैं, “जो लोग अल्लाह के रसूल के साथ हैं, उन लोगों पर कुछ भी ख़र्च न करो, जब तक कि वे उनका साथ न छोड़ दें", लेकिन आसमानों और ज़मीन के ख़जाने तो अल्लाह ही के हैं, हालांकि पाखंडी लोग इस बात को नहीं समझते हैं। (7)
वे कहते हैं, "एक बार हम मदीना वापस पहुंच जाएं, तो फिर (वहां) जो ताक़तवर (और इज़्ज़तदार) लोग हैं, वे कमज़ोरों [मुहाजिरों/Emigrants] को निकाल बाहर करेंगे," मगर असल ताक़त तो अल्लाह की है, उसके रसूल की है, और ईमान रखनेवालों की है, हालांकि पाखंडी लोग [मुनाफ़िक़] इस बात को नहीं जानते। (8)
ऐ ईमान रखनेवालो! (देखो), कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी दौलत और तुम्हारी औलाद, तुम्हारा ध्यान अल्लाह की याद (और उसके ज़िक्र) से भटका दे : (याद रहे) जो लोग ऐसा करेंगे, वही हैं जो घाटे में रहेंगे। (9)
जो कुछ हमने तुम्हें दे रखा है, उसमें से ख़र्च कर लो, इससे पहले कि तुममें से किसी की मौत आ जाए और उस समय वह कहने लगे, "ऐ मेरे रब! काश तूने मुझे कुछ थोड़े समय की और मुहलत दी होती, तो मैंने ख़ूब दान-दक्षिणा [ज़कात] दिया होता, और अच्छे व नेक लोगों में शामिल हो जाता!" (10)
मगर अल्लाह, किसी आदमी को उस वक़्त कोई मुहलत नहीं देता, जब उसकी तय की हुई बारी आ जाती है : जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (11)
सूरह 58 : अल- मुजादिला [बहस करनेवाली / She Who Disputes]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
[ऐ रसूल!] अल्लाह ने उस औरत की बात सुन ली है जो अपने पति के बारे में आपसे बहस कर रही थी और अल्लाह से शिकायत कर रही थी : अल्लाह ने (इस बारे में) आप दोनों का कहना सुना। अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ देखनेवाला है। (1)
तुम में से कोई अगर अपनी बीवियों से यह कह भी देता है कि, "तुम मेरे लिए मेरी माँ की पीठ जैसी हो" [ज़िहार], तो वे उनकी माएँ तो नहीं हो जाएंगी; उनकी माएँ तो वही हैं जिन्होंने उनको जन्म दिया है। जो कुछ वे कहते हैं, वह सचमुच अनुचित और झूठ है, मगर अल्लाह (ग़लतियों को) टाल जानेवाला और (गुनाहों को) माफ़ करनेवाला है। (2)
तुम में से जो लोग अपनी बीवियों से ऐसी बात कह देते हैं, फिर कह कर अगर अपनी बात से टल जाते हैं, तो इससे पहले कि दोनों [मियाँ-बीवी] एक-दूसरे को फिर से हाथ लगाएँ, उन्हें एक ग़ुलाम को आज़ाद करना चाहिए---- यह है वह बात जिसका तुम्हें हुक्म दिया जाता है, और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है------ (3)
लेकिन जिस किसी के पास (ग़ुलाम आज़ाद करने का) साधन न हो, तो इससे पहले कि वे दोनों एक-दूसरे को हाथ लगाएँ, उसे लगातार दो महीने रोज़ा रखना चाहिए, और अगर कोई यह भी न कर सके, तो उसको चाहिए कि साठ ज़रूरतमंद लोगों को खाना खिलाए। ऐसा इसलिए है ताकि तुम सचमुच अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रख सको। ये अल्लाह की तय की हुई सीमाएँ है: जो कोई इन्हें नज़रअंदाज़ करेगा, दर्दनाक यातना उसके इंतज़ार में रहेगी। (4)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे बेइज़्ज़त होकर रहेंगे, जैसा कि उनसे पहले के लोग हुए थे : हमने साफ़ व स्पष्ट आयतें [संदेश] उतार भेजी हैं, और उन्हें मानने से इंकार करनेवालों के लिए अपमानित कर देनेवाली यातना होगी, (5)
उस दिन अल्लाह सबको (दोबारा) उठा खड़ा करेगा और जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। वे भले ही भूल गए हों, मगर अल्लाह ने (अपने खाते में) हर काम का हिसाब कर रखा है: अल्लाह हर चीज़ का गवाह है। (6)
[ऐ रसूल!] क्या आप नहीं देखते कि आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ को अल्लाह जानता है? तीन आदमियों के बीच कोई ख़ुफ़िया बातचीत नहीं हो सकती, क्योंकि वहाँ चौथा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, न पाँच आदमियों के बीच गुप्त बातचीत हो सकती है, क्योंकि वहाँ भी छठा वह [अल्लाह] मौजूद होता है, बिना उस [अल्लाह] की मौजूदगी के, चाहे वे कहीं भी हों (कोई ख़ुफ़िया बात नहीं हो सकती),---- न इससे कम आदमियों के बीच और न इससे ज़्यादा के बीच. क़यामत के दिन वह उन्हें दिखा देगा, जो भी उन लोगों ने किया होगा : सचमुच अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (7)
क्या आपने नहीं देखा कि जिन लोगों को ख़ुफ़िया बैठक करने से रोका गया था, वे लोग वहाँ से जाने के बाद ऐसी बैठकें करते हैं, और एक दूसरे के साथ मिलकर साज़िशें रचते हैं, जो कि गुनाह है, शत्रुतापूर्ण है, और रसूल की आज्ञा को मानने से इंकार करना है? जब वे आपके पास आते हैं तो आपके अभिवादन [Greet] में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिन्हें अल्लाह ने आपके अभिवादन के लिए कभी भी प्रयोग नहीं किया, और अपने मन में कहते हैं, "जो कुछ हम कहते हैं, उसके लिए अल्लाह हमें सज़ा क्यों नहीं देता?" सज़ा के तौर पर उनके लिए जहन्नम ही काफ़ी होगी : वे उसी में जलेंगे--- अंतिम पड़ाव की बड़ी बुरी जगह है! (8)
ऐ ईमानवालो! जब तुम आपस में चुपके-चुपके बातें करो, तो वह (गुप्त बातें) ऐसी न की जाएं जिसमें गुनाह, ज़्यादती और रसूल की आज्ञा न मानने की बातें शामिल हों, बल्कि बातें इस तरीक़े से की जाएं जो नेकी और (अल्लाह का डर रखते हुए) बुराइयों से बचने की बातें हों। अल्लाह से डरो, जिसके पास तुम सबको इकट्ठा किया जाएगा। (9)
(किसी भी दूसरे तरह की) ख़ुफिया बातचीत शैतानी काम है, जिसका मक़सद ईमानवालों को परेशानी में डालना है, हालाँकि अल्लाह की अनुमति के बिना वे उन्हें ज़रा भी नुक़सान नहीं पहुँचा सकते। ईमान रखनेवालों को अल्लाह ही पर भरोसा रखना चाहिए। (10)
ऐ ईमानवालो! मजलिसों में अगर तुमसे कहा जाए कि एक दूसरे (के बैठने) के लिए थोड़ी जगह बनाओ, तो जगह बना दिया करो, अल्लाह तुम्हारे लिए जगह बना देगा, और अगर तुम (बैठे हो, और तुम) से कहा जाए कि उठ जाओ, तो उठ जाया करो : अल्लाह उन लोगों के दर्जों को ऊँचा उठा देगा, जो लोग तुम में से ईमान रखते हैं, और जिन लोगों को ज्ञान दिया गया है : (याद रखो!) जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (11)
ऐ ईमानवालो! जब तुम अपने रसूल से अकेले में बात करने के लिए आओ, तो बातचीत से पहले, (ग़रीबों को) कुछ दान दे दिया करो: यह तुम्हारे लिए अच्छा और अधिक पवित्र तरीक़ा होगा। हाँ, अगर तुम्हारे पास (देने के लिए) कुछ न हो, तो अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (12)
क्या तुम इस बात से डर गए कि (रसूल के साथ) अकेले में बातचीत से पहले दान देना होगा? चूँकि तुम ने दान नहीं दिया, और (फिर भी) अल्लाह ने तुम्हारे प्रति नरम रुख़ अपनाया है, इसलिए (कम से कम) नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो, निर्धारित ज़कात [Prescribed alms] दिया करो, और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो : जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (13)
[ऐ रसूल] क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जिनका मेलजोल ऐसे लोगों के साथ है जिन पर अल्लाह का ग़ुस्सा उतरा? वे न तुम्हारे साथ हैं, और न उनके साथ हैं, और वे जानते-बूझते झूठी बात पर क़समें खाते हैं। (14)
अल्लाह ने उनके लिए कठोर यातना तैयार कर रखी है: जो कुछ वे करते हैं, वह सचमुच बहुत बुरा है। (15)
उन्होंने अपनी क़समों का इस्तेमाल (अपने काले कारनामों को) छिपाने के लिए कर रखा है, और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोका है। एक बेइज़्ज़त कर देनेवाली यातना उनके घात में है-----(16)
अल्लाह के ख़िलाफ़ न उनकी धन-दौलत किसी काम आएगी, और न उनके बाल-बच्चे----- वे जहन्नम (की आग) में रहनेवाले हैं, उसी में हमेशा रहेंगे। (17)
उस (क़यामत के) दिन, जब अल्लाह सबको (मुर्दे से) ज़िंदा कर के उठाएगा, तो वे अल्लाह के सामने भी क़समें खाने लगेंगे, जिस तरह वे आपके सामने आज क़समें खाते हैं, और समझेंगे कि इससे उन्हें कुछ सहारा मिल जाएगा. कितने बड़े झूठे हैं वे! (18)
शैतान ने उन पर पूरी तरह से अपना क़ब्ज़ा जमा लिया है, और उन्हें ऐसा बना दिया है कि वे अल्लाह की याद को भुला बैठे हैं। वे शैतान के पक्ष [side] में हैं, और शैतान के पक्षवालों की ही हार होगी : (19)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हैं, वे उन लोगों में होंगे जिनकी भारी बेइज़्ज़ती होगी। (20)
अल्लाह ने लिख दिया है, "मैं अवश्य जीत कर रहूंगा, मैं और मेरे रसूल!" निस्संदेह अल्लाह बेहद ताक़तवाला, बड़ा प्रभुत्वशाली है। (21)
जो लोग अल्लाह और अंतिम दिन [क़यामत] पर सचमुच विश्वास रखते हैं, [ऐ रसूल!] आप उन्हें ऐसा नहीं पाएंगे कि उन लोगों की निष्ठा [Loyalty] ऐसे लोगों के साथ हो, जो अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करते हों, भले ही वे उनके अपने बाप हों, बेटे हों, भाई हों, या उनके रिश्तेदार हों : ये वह लोग हैं जिनके दिलों पर अल्लाह ने ईमान अंकित कर दिया है, और अपनी रूह से उन्हें मज़बूती दी है। वह उन्हें (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर देगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ वे हमेशा रहेंगे : अल्लाह उनसे बहुत ख़ुश होगा, और वे अल्लाह से। वे अल्लाह के पक्ष [side] वाले हैं, और अल्लाह के पक्षवाले ही कामयाब होंगे। (22)
सूरह 49 : अल-हुजुरात [रहने के कमरे / The Private Rooms]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ऐ ईमानवालो! अल्लाह और उसके रसूल की मौजूदगी में (अपनी बात पर लोगों का ध्यान खींचने के लिए) आगे बढ़ बढ़ कर बातें न किया करो----- और अल्लाह से डरते रहो : अल्लाह सब सुनता है, सब कुछ जानता है------ (1)
ऐ ईमानवालो!, अपनी आवाज़ों को नबी की आवाज़ से ऊँची न किया करो, और जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे से (ऊँची आवाज़ में) बातें करते हो, उस तरह उनसे ऊँची आवाज़ में बात न किया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे (अच्छे) कर्म बर्बाद हो जाएँ और तुम्हें पता भी न चले। (2)
जो लोग अल्लाह के रसूल के सामने अपनी आवाज़ नीची रखते हैं, वही लोग हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने (बुराइयों से) बचकर रहने के लिए परख कर चुन लिया है-----उन्हें (गुनाहों की) माफ़ी भी मिलेगी, और ज़बरदस्त इनाम भी ------ (3)
मगर [ऐ रसूल!], आपको जो लोग आपके कमरों [हुजरे] के बाहर से पुकारते हैं, उनमें से ज़्यादातर समझ-बूझ से काम नहीं लेते। (4)
(बजाए बाहर से पुकारने के) अगर वे धीरज रखते हुए उस समय तक इंतज़ार करते, जब तक कि आप ख़ुद ही बाहर निकल कर उनके पास आ जाते, तो यह उनके लिए बेहतर होता, वैसे अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (5)
ऐ ईमान रखनेवालो!, अगर (सही रास्ते से भटका हुआ) कोई बदमाश, तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए, तो पहले उसकी छानबीन कर लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम दूसरों को अनजाने में नुक़सान पहुँचा बैठो, और फिर अपने किए पर पछताते रहो, (6)
और यह बात जान लो कि तुम्हारे बीच अल्लाह के रसूल मौजूद हैं : बहुत-से मामलों में अगर सचमुच वह तुम्हारी इच्छाओं को मान लें, तो तुम कठिनाई में पड़ जाओ। मगर अल्लाह ने तुम्हारे अंदर ईमान की मुहब्बत डाल दी है, और उसे तुम्हारे दिलों के लिए आकर्षक बनाया है; और (सच्चाई से) इंकार [कुफ़्र], गुनाह के काम, और आज्ञा न मानने जैसी चीज़ों को तुम्हारे लिए बहुत अप्रिय बनाया है। ऐसे ही लोग हैं जो अल्लाह के दिखाए गए सही रास्ते पर हैं, (7)
जो अल्लाह के फ़ज़ल [favours] और नेमत [blessing] का नतीजा है: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है। (8)
अगर ईमानवालों के दो गिरोह आपस में लड़ पड़ें, तो (ऐ ईमानवालो) तुम्हें उनके बीच सुलह कराने की कोशिश करनी चाहिए; अगर उनमें से एक गिरोह दूसरे पर (साफ़ तौर पर) ज़ुल्म कर रहा हो, तो ज़ुल्म करनेवाले (गिरोह) के ख़िलाफ़ उस समय तक लड़ो, जब तक कि वे अल्लाह के हुक्म के सामने झुक न जाएं। फिर उनके बीच न्याय और बराबरी का ध्यान रखते हुए सुलह करा दो : अल्लाह बराबरी का इंसाफ़ करनेवालों को पसन्द करता है। (9)
ईमानवाले भाई-भाई होते हैं, अतः अपने दो भाईयो के बीच सुलह करा दो और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुम पर दया की जा सके। (10)
ऐ ईमान रखनेवालो!, मर्दों के एक गिरोह को दूसरे (गिरोह के) मर्दों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ा रहे हैं), वे उनसे बेहतर हों, और औरतों के गिरोह को भी दूसरे (गिरोह की) औरतों की हँसी नहीं उड़ानी चाहिए, हो सकता है कि (जिनकी हँसी उड़ायी जा रही हो) वे उनसे बेहतर हों; एक दूसरे को बुरी बातें न कहो; और न आपस में एक-दूसरे को चिढ़ाने वाले पुकारू नामों [nicknames] से बुलाओ। यह कितनी बुरी बात है कि कोई ईमान लाने के बाद भी "बदमाश" के नाम से जाना जाए! जो लोग अपने इस आचरण पर नहीं पछताते हैं, ऐसे लोग बहुत बुरा काम करते हैं। (11)
ऐ ईमानवालो! किसी चीज़ के बारे में पहले से ही बहुत सारी धारणाएं [assumptions] बनाने से बचा करो----- कुछ पूर्व-धारणाएं गुनाह होती हैं---- और एक दूसरे की जासूसी मत किया करो या लोगों की पीठ पीछे बुराई न किया करो : क्या तुम में से कोई अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसंद करेगा? नहीं, बल्कि तुम उससे नफ़रत करोगे। अत: अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचो : अल्लाह हमेशा (मन से की गयी) तौबा क़बूल करनेवाला, बेहद दयावान है। (12)
लोगो! हमनें तुम सबको अकेले मर्द और अकेली औरत से पैदा किया, और तुम्हें नस्लों [क़ौमों] और क़बीलों में बाँट दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। अल्लाह की नज़र में तुम में सबसे ज़्यादा इज़्ज़तवाला वह है, जो सबसे ज़्यादा अल्लाह से (डरते हुए) बुराइयों से बचने वाला है। अल्लाह सब कुछ जानने वाला, हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (13)
रेगिस्तान में रहनेवाले अरबी (बद्दू) कहते हैं, "हम ईमान रखते हैं।" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "तुम्हें (पक्का) ईमान नहीं है। सो तुम्हें अभी इतना ही कहना चाहिए, 'हम ने इस्लाम [अल्लाह के सामने समर्पण] को मान लिया है”, क्योंकि ईमान तो अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल ही नहीं हुआ है।’ अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानोगे, तो वह तुम्हारे किसी भी कर्म को कम कर के नहीं आँकेगा : अल्लाह गुनाहों को बहुत माफ़ करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।" (14)
असल ईमानवाले वे हैं जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल पर (दिल से) ईमान रखा, फिर किसी सन्देह में नहीं पड़े, और अपनी जान-माल और अपने लोगों के साथ अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] किया : वही लोग हैं जो (अपने दावे में) सच्चे हैं। (15)
आप (बद्दुओं से) कहें, "क्या तुम ऐसा मानते हो कि तुम अल्लाह को अपने दीन [धर्म] के बारे में बताओगे, जबकि अल्लाह आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ जानता है, और उसे सारी चीज़ों की पूरी जानकारी है?”(16)
वे सोचते हैं कि इस्लाम क़ुबूल कर के उन्होंने [ऐ रसूल[ आप पर बड़ा एहसान किया है, आप कह दें, "ऐसा मत समझो कि इस्लाम क़ुबूल कर के तुम ने मुझ पर कोई एहसान कर दिया है; अगर तुम अपनी बात में पक्के हो, तो असल में तो अल्लाह है, जिसने तुम्हें ईमान वाला रास्ता दिखा कर तुम पर एहसान किया है।" (17)
"अल्लाह आसमानों और ज़मीन के सारे छिपे हुए राज़ जानता है : जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह हर चीज़ देखता है।" (18)
सूरह 66: अत-तहरीम [अवैध करना/रोक लगाना/Prohibition]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ऐ रसूल! आप अपनी बीवियों को ख़ुश करने की इच्छा से, ऐसी चीज़ को क्यों अपने लिए हराम (Prohibit) करते हैं, जिसे अल्लाह ने आपके लिए हलाल [वैध/Lawful] ठहराया है? फिर भी, अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है: (1)
(ऐ ईमानवालो!) अल्लाह ने अपने आदेश से तुम लोगों को (ऐसी) क़समों को तोड़ने का रास्ता बता दिया है------ (असल में) अल्लाह ही तुम्हारा मददगार है : वह सब कुछ जानता है, बहुत ज्ञानी है। (2)
(एक बार ऐसा हुआ कि) रसूल ने अपनी एक बीवी [हफ़्सा] से कोई राज़ की बात कही, फिर जब उस (बीवी) ने वह बात [दूसरी बीवी, आयशा को] बता दी और अल्लाह ने उस (रसूल) को इसकी जानकारी दे दी, तो रसूल ने (हफ़्सा पर) उस (राज़ की) बात का कुछ हिस्सा ज़ाहिर कर दिया (जो उसने आयशा को बता दिया था), और बाक़ी बातें टाल गए। फिर जब रसूल ने अपनी उस बीवी [हफ़्सा] से राज़ खोलने के बारे में पूछताछ की, तो वह बोली, "आपको इसकी ख़बर किसने दी?" रसूल ने कहा, "मुझे उसी ने ख़बर दी जो सब कुछ जाननेवाला, और हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है।" (3)
अगर तुम दोनों (बीवियाँ) अल्लाह के सामने तौबा कर लो---- क्योंकि तुम्हारे दिल सही जगह से हट गए हैं-----(तो यह बहुत अच्छा होगा); किन्तु अगर तुम उन (रसूल) के विरुद्ध एक-दूसरे की मदद करोगी, तो फिर (याद रखना कि) अल्लाह उनकी मदद करेगा, और जिबरील [Gabriel] और नेक ईमानवाले भी, और सारे फ़रिश्ते भी उनकी तरफ़ हो जाएंगे। (4)
अगर रसूल तुम में से किसी को तलाक़ देने का फ़ैसला करें, तो उनका रब बड़ी आसानी से, (तुम्हारे बदले) तुम से अच्छी बीवियाँ, उन्हें दे सकता है: बीवियाँ जो पूरी तरह अल्लाह पर समर्पित हों, पक्की ईमानवाली, आज्ञा मानने वाली, तौबा करनेवाली, इबादत करनेवाली और अल्लाह के रास्ते में सफ़र करनेवाली (या रोज़ा रखनेवाली) हों, चाहे उनकी पहले शादी हो चुकी हो या कुँवारी हों। (5)
ऐ ईमान रखनेवालो! अपने आपको और अपने घरवालों को उस आग से बचाओ जिसका ईधन आदमी और पत्थर होंगे, जिस पर कठोर स्वभाव के मज़बूत फ़रिश्ते नियुक्त होते हैं जो अल्लाह के हुक्म को मानने से कभी इंकार नहीं करते, और वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश दिया जाता है : (6)
“तुम (लोग) जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, आज [क़यामत के दिन] कोई बहाने न बनाओ : तुम्हें तो उन्हीं कर्मों का बदला दिया जा रहा है जो कुछ तुम किया करते थे।“ (7)
ऐ ईमानवालो! अल्लाह के सामने सच्चे मन से (अपनी ग़लतियों की) तौबा करो, बहुत सम्भव है कि तुम्हारा रब तुम्हारी बुराइयों को तुम से दूर हटा दे और तुम्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल कर दे, जहां बहती हुई नहरें हों------- उस दिन अल्लाह अपने रसूल को और उनको जिन्होंने (रसूल की) बातों पर विश्वास किया, उन्हें अपमानित नहीं करेगा। और उनकी रौशनी उनके आगे-आगे और उनके दाहिने तरफ़ फैल रही होगी, और वे कह रहे होंगे, "ऐ हमारे रब! हमारी रौशनियों को हमारे लिए पूरा कर दे और हमें माफ़ कर दें : तुझे तो हर चीज़ करने की ताक़त है।" (8)
ऐ रसूल! (सच्चाई से) इंकार करनेवालों और (मदीना के) पाखंडियों [Hypocrites] के ख़िलाफ़ जम कर संघर्ष करें, और उनके साथ सख़्ती से पेश आएं। उनका घर जहन्नम होगा, और वह कितना बुरा ठिकाना है! (9)
अल्लाह ने (सच्चाई से) इंकार करनेवालों का उदाहरण पेश किया है : नूह [Noah] और लूत [Lot] की बीवियों ने हमारे दो बहुत ही नेक बंदों से शादी की थी, फिर उनके साथ विश्वासघात किया। मगर अल्लाह के मुक़ाबले में उनके पति उनकी कोई मदद नहीं कर सके : (उन बीवियों से) कह दिया गया, "दूसरों के साथ तुम दोनों भी (जहन्नम की) आग में दाख़िल हो जाओ।" (10)
और ईमान रखनेवालों के लिए अल्लाह ने फ़िरऔन [Pharaoh] की बीवी की मिसाल पेश की है, जबकि उसने कहा, "ऐ मेरे रब! तू मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना दे, और मुझे फ़िरऔन और उसके कर्मों से छुटकारा दे दे, और मुझे शैतानियाँ करने वालों से बचा ले।" (11)
और इमरान की बेटी मरयम [Mary] का उदाहरण भी है, जिसने अपनी इज़्ज़त बचा कर रखी थी, तो फिर हमने उसके अंदर अपनी रूह [Spirit] फूँक दी, उसने अपने रब की बातों और उसकी किताबों की (सच्चाई की) पुष्टि की : वह सचमुच पूरी भक्ति से (अल्लाह की) आज्ञा माननेवालों में शामिल थी। (12)
सूरह 64 : अत तग़ाबुन [एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करना/ Mutual Neglect]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
हर चीज़ जो आसमानों और ज़मीन में है, अल्लाह की बड़ाई बयान करती है; सारा नियंत्रण [बादशाही], और सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं; उसके पास हर चीज़ की ताक़त है। (1)
वही है जिसने तुम्हें पैदा किया, फिर भी तुममें से कुछ (लोग) विश्वास नहीं करते [काफ़िर] हैं, और कुछ (लोग) विश्वास करनेवाले [मोमिन] हैं : जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह हर चीज़ को देख रहा होता है। (2)
उसने आसमानों और ज़मीन को सही मक़सद के साथ पैदा किया; उसने तुम्हारा रूप बनाया, और (देखो) कितना अच्छा रूप बनाया : तुम सबको (अंत में) उसी के पास लौट कर जाना होगा। (3)
जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, वह उसे जानता है; वह उसे भी जानता है जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ तुम सामने बता देते हो; अल्लाह तो हर दिल के अंदर छिपे हुए राज़ तक को अच्छी तरह जानता है! (4)
[विश्वास न करनेवाले, काफ़िरो!] क्या तुम ने उन लोगों के बारे में नहीं सुना, जिन्होंने तुम से पहले (सच्चाई को मानने से) इंकार किया था? उन्होंने (दुनिया में) अपने काम के बुरे नतीजे का मज़ा चखा, और (आख़िरत में) एक दर्दनाक यातना उनके इंतज़ार में है। (5)
वह इसलिए हुआ कि उनके रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाण लेकर आते रहे, मगर इसके बावजूद, वे कहते थे, "क्या (मर-खप जानेवाले मामूली) आदमी हमें मार्ग दिखाएँगे?", उन्होंने (हमारे संदेश को) मानने से इंकार किया, और मुँह फेर लिया। मगर अल्लाह को तो उनकी कोई ज़रूरत नहीं थी : वह तो हर तरह से आत्मनिर्भर है, सारी तारीफों के लायक़ है। (6)
विश्वास न करनेवाले यह दावा करते थे कि मरने के बाद वे दोबारा नहीं उठाए जाएँगे। (ऐ रसूल) आप कह दें, "हां, क़सम है मेरे रब की! तुम ज़रूर उठाए जाओगे, और तब तुम्हें वे सारी चीज़ें बता दी जाएंगी, जो कुछ तुमने किया होगा : अल्लाह के लिए यह बहुत आसान काम है।" (7)
अतः ईमान रखो अल्लाह पर, उसके रसूल पर, और (रास्ता दिखानेवाली) उस रौशनी [क़ुरआन] पर जिसे हमने भेजा है: तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है। (8)
(एक दिन) जब वह तुम (सब) को जमा करेगा, उस ‘इकट्ठा किए जानेवाले दिन' [क़यामत] पर, जो "एक दूसरे को नज़रअंदाज़ करने का दिन" [तग़ाबुन] होगा, तो जिसने अल्लाह पर ईमान रखा होगा, और अच्छे कर्म किए होंगे, उनके गुनाहों को वह मिटा देगा : वह उन्हें ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वहाँ वे हमेशा के लिए रहेंगे---- यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (9)
मगर वे लोग जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया, और हमारी निशानियों को ठुकरा दिया, वे (जहन्नम की) आग में रहनेवाले हैं, उसी में वे (हमेशा) रहेंगे---- वह कितना बुरा ठिकाना है! (10)
मुसीबतें बिना अल्लाह की अनुमति के नहीं आ सकती हैं ---- जो कोई अल्लाह पर ईमान रखता है, तो अल्लाह उसके दिल को सही रास्ता दिखा देगा : अल्लाह हर चीज जानता है----(11)
अतः अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करो। अगर तुम उससे मुँह मोड़ते हो, तो याद रखो, हमारे रसूल की ज़िम्मेदारी बस हमारे संदेशों को साफ़ साफ़ पहुँचा देने की है। (12)
अल्लाह! कि उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं है, अतः ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए। (13)
ऐ ईमानवालो, यहाँ तक कि तुम्हारे पति/ पत्नियों और तुम्हारे बच्चों में से कुछ ऐसे हैं जो तुम्हारे दुश्मन हैं ----- उनसे होशियार रहो----- लेकिन अगर तुम उनकी ग़लतियों को अनदेखा करो, उन पर ग़ुस्सा न करो, और उन्हें माफ़ कर दो, तो फिर अल्लाह तो बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (14)
तुम्हारी धन-दौलत और तुम्हारे बाल-बच्चे, तुम्हारे लिए केवल एक आज़माइश हैं. और वह अल्लाह है जिसके पास बड़ा इनाम है : (15)
जहाँ तक तुम से हो सके, अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो; सुनो और आज्ञा का पालन करो; और (जरूरतमंदों पर) ख़र्च करो---- यह तुम्हारे ख़ुद के लिए अच्छा होगा। जो अपने मन के लोभ से बचा रहा, वही कामयाब लोगों में से होगा: (16)
अगर तुम साफ़ दिल से अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दो, तो वह उसे तुम्हारे लिए कई गुना बढ़ा देगा और तुम्हें माफ़ कर देगा। अल्लाह हमेशा अच्छाई की क़द्र करनेवाला, और सहनशील है, (17)
अल्लाह उसे भी जानता है, जो चीज़ दिखायी नहीं देती, और उसे भी जो चीज़ दिखायी देती है; वह बहुत ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (18)
सूरह 61 : अस सफ़ [मज़बूत क़तारें, Solid Lines]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है--- वह बेहद ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (1)
ऐ ईमानवालो! तुम ऐसी बातें क्यों कहते हो, जिन्हें बाद में करते नहीं हो? (2)
यह बात अल्लाह को सख़्त नापसंद है कि तुम जो बात कहते हो, उन्हें करते नहीं हो; (3)
अल्लाह उन लोगों को सचमुच बहुत पसंद करता है जो उसकी राह में मज़बूत क़तारों में खड़े होकर लड़ते हैं, मानो वे सीसा पिलाई हुए (ठोस) दीवार हों। (4)
और (देखो) जब मूसा [Moses] ने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम मुझे क्यों दुख देते हो, हालांकि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से (रसूल बनाकर) भेजा गया हूँ?" फिर जब वे सच्चाई के रास्ते से भटक गए, तो अल्लाह ने भी उनके दिलों को भटकता छोड़ दिया : अल्लाह बग़ावत करनेवालों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता। (5)
और (देखो) जब मरयम [Mary] के बेटे ईसा [Jesus] ने कहा, "ऐ इसराईल की संतानों! मैं अल्लाह की तरफ़ से तुम्हारे पास (रसूल बनाकर) भेजा गया हूँ, ताकि मैं तौरात [Torah] की (सच्चाई की) पुष्टि कर दूं, जो मुझसे पहले आयी थी, और मेरे बाद एक रसूल के आने की ख़ुशख़बरी भी दे दूं, जिसका नाम 'अहमद' होगा।" इसके बावजूद, जब वह [ईसा] उनके पास स्पष्ट निशानियों के साथ आए, तो वे लोग कहने लगे, "यह तो साफ़ तौर से जादूगरी है।" (6)
उस आदमी से ज़्यादा ग़लती पर कौन होगा, जो (लोगों को बहकाने के लिए) अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, जबकि उसे अल्लाह के आगे झुक जाने के लिए बुलाया जाए? ग़लत काम करने वालों को अल्लाह सीधा रास्ता नहीं दिखाता है: (7)
वे चाहते हैं कि अल्लाह की रौशनी [मार्गदर्शन/क़ुरआन] को अपने मुँह से फूँक मारकर बुझा दें। लेकिन अल्लाह अपनी रौशनी को पूरी (तरह फैला) कर रहेगा, भले ही (सच्चाई में) विश्वास न करनेवाले इससे कितनी ही नफ़रत करते हों; (8)
वही है जिसने अपने रसूल को सही मार्गदर्शन [क़ुरआन] और सच्चाई के दीन [धर्म] के साथ भेजा, ताकि यह दिखाया जा सके कि यह दूसरे सभी (झूठे) धर्मों से बढ़ कर है, चाहे बहुदेववादियों [मूर्तिपूजा करनेवालों] को ये बात कितनी ही बुरी लगे। (9)
ऐ ईमान वालो! क्या मैं तुम्हें (एक चीज़ के बदले में) एक ऐसे फ़ायदे का काम [व्यापार] बताऊँ, जो तुम्हें दर्दनाक यातना से बचा ले? (10)
(वह यह है कि) अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास [ईमान] रखो, और अपनी जान व माल से अल्लाह के रास्ते में संघर्ष [जिहाद] करो----ये (ईमान व जिहाद) तुम्हारे लिए (जान व माल से) बेहतर है, अगर तुम समझ पाओ----- (11)
और वह तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, तुम्हें [जन्नत के] ऐसे बाग़ों में ले जाएगा जहाँ नहरें बह रही होंगी, और उन ख़ुशनुमा घरों में बसा देगा जो सदाबहार बाग़ों [Garden of Eternity] में होंगे। यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (12)
और (इसके अलावा इस दुनिया में) वह तुम्हें कुछ और भी देगा जिससे तुम सचमुच ख़ुश हो जाओगे : अल्लाह की ओर से मदद और जल्द ही मिलनेवाली जीत! [ऐ रसूल] ईमानवालों को (इस बात की) ख़ुशख़बरी सुना दें! (13)
ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह के (दीन के) मददगार बन जाओ. जैसा कि मरयम के बेटे ईसा [Jesus] ने अपने ख़ास शिष्यों [Disciples] से कहा था, "कौन है जो अल्लाह के काम में मेरी मदद करेगा?" उनके शिष्यों ने कहा, "अल्लाह के काम में हम मददगार होंगे।" फिर इसराईल की संतान में से कुछ ने तो विश्वास कर लिया जबकि कुछ ने विश्वास नहीं किया : जो विश्वास [ईमान] रखनेवालों के दुश्मन थे, हमने उनके ख़िलाफ़ विश्वास रखनेवालों का साथ दिया, सो वही लोग थे जिनकी जीत हुई। (14)
सूरह 62 : अल जुमा'अ [जुमे' की नमाज़/ The Congregation Prayer]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ अल्लाह की बड़ाई बयान करती रहती है, जो हर चीज़ को अपने नियंत्रण में रखनेवाला [बादशाह] है, बेहद पवित्र है, ज़बरदस्त ताक़तवाला, और बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (1)
वही है जिसने उन्हीं लोगों में से एक रसूल को उठाया जिनके पास कोई आसमानी किताब नहीं थी, ताकि वह उन्हें उसकी आयतें पढ़कर सुनाए, (मूर्तिपूजा से हटा कर) उनके मन को पवित्र करे, और उन्हें किताब और सही समझ-बूझ [हिकमत] की शिक्षा दे---- इससे पहले तो वे सचमुच खुली गुमराही में थे -----(2)
और उन्हीं में से (भविष्य में आनेवाले) कुछ दूसरे लोगों को भी (किताब और हिकमत की शिक्षा दे) जो अभी उनसे आकर नहीं मिले हैं। वह बेहद ताक़तवाला, बहुत ज्ञानी है: (3)
यह अल्लाह का ऐसा फ़ज़ल (favour) है कि वह जिसे चाहे, उसे [रसूल बना] देता है; और अल्लाह बड़े फ़ज़लवाला है। (4)
जिन लोगों पर तोरात [Torah] (की शिक्षाओं) को मानने का बोझ डाला गया था, वे उन (शिक्षाओं पर अमल करने की ज़िम्मेदारी) को निभा न सके, उनकी मिसाल उस गधे की-सी है जो बहुत सी किताबें लादे हुए हो (मगर उससे अज्ञान ही रहे)। कितनी बुरी मिसाल है उन लोगों की, जो अल्लाह की आयतों [निशानियों] को मानने से इंकार करते हैं! अल्लाह ऐसे लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता, जो ग़लत काम करने पर तुले रहते हैं। (5)
[ऐ रसूल!] आप कह दें, "ऐ यहूदी मत के माननेवालो! अगर तुम्हारा यह दावा सच्चा है कि दूसरे सारे लोगों को छोड़कर केवल तुम ही अल्लाह के दोस्त हो, तो फिर अपनी मौत की कामना करो।" (6)
मगर उन्होंने अपने हाथों अपने लिए जो (बुरे कर्मों का ढेर) जमा कर रखा है, इस कारण वे कभी भी अपनी मौत की कामना नहीं करेंगे----- और अल्लाह ज़ालिमों को अच्छी तरह जानता है---- (7)
अत: आप कह दें, “जिस मौत से तुम भागते हो, वह तो तुम से मिलने ज़रूर आएगी, फिर तुम्हें उसकी ओर लौट कर जाना होगा, जो हर छिपी चीज़ भी जानता है और खुली चीज़ भी : वह तुम्हें हर चीज़ बता देगा जो कुछ तुम किया करते थे।" (8)
ऐ ईमानवालो, जब जुमे के दिन [Friday] नमाज़ के लिए पुकारा जाए, तो ख़रीदने-बेचने का काम बंद कर दो, और अल्लाह के ज़िक्र [नमाज़] की तरफ़ तेज़ी से चल पड़ो--- यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानो”---- (9)
फिर जब नमाज़ पूरी हो जाए, तो ज़मीन में फैल जाओ और अल्लाह की दी हुई रोज़ी [फ़ज़ल] तलाश करो। अल्लाह को बराबर याद करते रहो, ताकि तुम (दोनों जहान में) कामयाब हो सको। (10)
(इसके बावजूद, कुछ लोग) जब ख़रीदने-बेचने के सामान या खेल-तमाशे की ख़बर पाते हैं, तो (ज़रूरत के चलते मस्जिद से भागकर) उसकी ओर टूट पड़ते हैं, और (ऐ रसूल) आपको (ख़ुत्बे में बोलते हुए) खड़ा छोड़ जाते हैं। आप कह दें, "अल्लाह के पास जो (इसका इनाम) है, वह किसी भी खेल-तमाशे या व्यापार से कहीं अच्छा है : (याद रहे!), अल्लाह सबसे बेहतर रोज़ी देनेवाला है।" (11)
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