Saturday, July 27, 2019

Chronological Quran: Medinan Period-2 [मदनी काल] : 624---625 AD

Chronological Quran: 
Medinan Period-2 [मदनी काल] : 624---625 AD


सूरह 3 : आल- इमरान [इमरान का ख़ानदान/The Family of Imran]


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1)

अल्लाह के सिवा कोई पूजने के लायक़ (ख़ुदा)  नहीं : हमेशा ज़िंदा रहनेवाला, पूरी कायनात को सम्भाले रखनेवाला और हर चीज़ पर नज़र रखनेवाला है। (2)

(ऐ रसूल), उसने आप पर सच्चाई के साथ (थोड़ा थोड़ा करके) किताब उतार भेजी हैजो पहले आयी हुई (किताबों) की सच्चाई की पुष्टि करती है : उसने (इससे) पहले तौरात [Torah] और इंजील [Gospel] उतारी थी (3)

और उसी ने (अब) लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और (सही और ग़लत के बीच) अंतर को स्पष्ट कर देनेवाली "फ़ुरक़ान" [क़ुरआन] भी उतार भेजी है। जो लोग अल्लाह की आयतों (की सच्चाई) को मानने से इंकार करते हैं, तो वे (सही को छोड़कर ग़लत का साथ देने के नतीजे में) कठोर यातना झेलेंगे : अल्लाह बहुत ताक़तवाला, और (अपराधियों को) कड़ी सज़ा देनेवाला है। (4)

आसमान या ज़मीन की कोई चीज़ भी ऐसी नहीं जो अल्लाह से छिपी हुई हो : (5)

वही है जो माँ की कोख में, जिस तरह चाहता है, तुम सब की शक्ल-सूरत बना देता है। उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं, वह बहुत ताक़तवाला, बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला है : (6)

वही है जिसने [ऐ रसूल], आप पर किताब उतारी है. इस (किताब) की कुछ आयतें तो ऐसी हैं जिनके मतलब साफ़ व स्पष्ट हैं और वही इस किताब की असली बुनियाद हैं। कुछ  दूसरी आयतें ऐसी हैं जिनके मतलब स्पष्ट और अटल नहीं हैं। तो जिन लोगों के दिलों में टेढ़ेपन का रोग है, वे ऐसी ही आयतों के पीछे पडे रहते हैं जिनके मतलब सीधे व स्पष्ट नहीं हैं, ताकि वे गड़बड़ी फैला सकें, और लोगों को उन (आयतों) के मन-मर्ज़ी के मतलब मान लेने पर ज़ोर दे सकें : सही मतलब तो केवल अल्लाह ही जानता है. मगर जो लोग पक्का ज्ञान रखते हैं, वे (उन आयतों के पीछे नहीं पड़ते जिनके अर्थ स्पष्ट नहीं, बल्कि) कहते हैं, "हम उन पर ईमान रखते हैं; ये सब कुछ हमारे रब की ओर से है" ----- सच्चाई की बातों से तो केवल वही लोग शिक्षा लेते हैं जो सचमुच समझ-बूझ रखते हैं -----  (7)

(ऐसे लोगों की यही दुआ होती है),  "हमारे रब! हमें सीधे व सही रास्ते पर लगा देने के बाद हमारे दिलों को डांवाडोल न कर, और हम पर अपनी ख़ास दया कर : सचमुच तू हमेशा देनेवाला है, कि देने में तुझ से बढ़कर कोई नहीं!  (8)

हमारे रब! इस बात में कोई शक नहीं कि तू ने उस (क़यामत के) दिन सब लोगों को अपने सामने (हिसाब-किताब के लिए) इकट्ठा करने का वादा कर रखा है : अल्लाह अपना वादा कभी नहीं तोड़ता।"  (9)

(सच्चाई से) इंकार करनेवालों को अल्लाह के मुकाबले में न तो उनकी धन-दौलत किसी काम आयेगी और न ही उनकी औलाद। ये वह लोग हैं जो (जहन्नम की) आग का ईंधन बनकर रहेंगे,  (10)

ठीक वैसे ही जैसे फ़िरऔन [Pharaoh] के लोगों और उनसे पहले के लोगों ने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, और अल्लाह ने उन्हें उनके गुनाहों की सज़ा दी : (याद रहे!) अल्लाह सज़ा देने में बहुत सख़्त है।  (11)

[ऐ रसूल!], विश्वास न करनेवालों से कह दें, "तुम (सच्चाई की ताक़त से) जल्द ही हरा दिए जाओगे और जहन्नम की तरफ़ एक साथ हँकाए जाओगे, और जहन्नम क्या ही बुरा ठिकाना है!" (12)

तुम तो पहले ही एक निशानी देख चुके हो जब (बद्र की) लड़ाई में दो सेनाएं एक दूसरे के आमने सामने हुई थीं, उनमें एक दल तो अल्लाह के रास्ते में लड़ रहा था, जबकि दूसरा दल विश्वास न करनेवालों का था। [ईमानवालों ने] अपनी आँखों से देखा कि विश्वास न करनेवालों की संख्या दोगुनी है (फिर भी वे जंग में हार गए), मगर अल्लाह जिसे चाहता है, उसकी मदद कर देता है। जो देखने की नज़र रखते हैं, उन सभी लोगों के लिए इस (घटना) में सीखने का सचमुच एक बड़ा सबक़ है। (13)

(इस दुनिया में) मनपसंद चीज़ों से होनेवाले लगाव को आदमी के लिए बड़ा लुभावना बनाया गया है ----- औरतें, बच्चे, सोने-चाँदी के ढेर, निशान लगे (चुने हुए) घोड़े, चौपाए और खेती-बाड़ी---- ये चीज़ें इस दुनिया के मज़े उठाने के लिए हो सकती हैं, मगर लौट कर जाने की सबसे अच्छी जगह तो अल्लाह के पास ही है। (14)

[ऐ रसूल], उनसे कह दें, "क्या मैं तुम्हें ज़िंदगी के उन (फ़ायदे की) सारी चीज़ों से भी बेहतर चीज़ बता दूँ?" जो लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनका रब उन्हें (जन्नत के ऐसे) बाग़ अता करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। पाक-साफ़ (मियाँ/बीवी के) जोड़े उनके साथ होंगे, और (सबसे बढ़कर) अल्लाह की ख़ुशी उन्हें प्राप्त होगी ----- अल्लाह अपने बन्दों का पूरा हाल जानता है---- (15)

ये वह बंदे हैं जो कहते हैं, "हमारे रब, हम ईमान रखते हैं, अतः तू हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे और हमें (जहन्नम की) आग की यातना से बचा ले," (16)

ये वह लोग हैं जो (मुसीबत में) धैर्य से काम लेनेवाले, सच बोलनेवाले, और भक्ति में सचमुच डूबे हुए हैं, जो (अल्लाह के रास्ते में) दूसरों को देते हैं और रात की अंतिम घड़ियों में (सोने के बजाए) अल्लाह के सामने (नमाज़ के लिए) खड़े होकर माफ़ी की दुआ करते हैं।"  (17)

अल्लाह ख़ुद इस बात की गवाही देता है कि उसके सिवा कोई (पूजने के लायक़) ख़ुदा नहीं, फ़रिश्ते भी इसी की गवाही देते हैं, और वे लोग भी जो ज्ञान रखते हैं। उसी ने (पूरी कायनात को) इंसाफ़ के साथ सम्भाल रखा है। उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है, वह ताक़तवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।   (18)

अल्लाह की नज़र में सच्चा दीन (धर्म) तो "इस्लाम" ही है:  (यानी केवल अकेले अल्लाह की भक्ति). जिन लोगों को किताब दी गई थी, उन्होंने दुश्मनी के चलते अपनी असहमति जताई, और वह भी तब, जबकि उन्हें इसके बारे मेें ज्ञान दिया जा चुका था ----- अगर कोई भी अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार करेगा, तो (याद रखो), अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।  (19)

(ऐ रसूल), अगर वे आपसे बहस करें, तो आप कह दें, "मैंने तो अपने आपको केवल एक अल्लाह की भक्ति में समर्पित कर दिया है, और ऐसा ही मेरे पीछे चलनेवालों ने भी किया है।" उन लोगों से पूछें जिन्हें किताब दी गयी थी, और उनसे भी जिन्हें किताब नहीं दी गयी है कि "क्या तुम भी अपने आपको केवल एक अल्लाह की भक्ति में समर्पित करते हो?" अगर वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें सीधा मार्ग दिखा दिया जाएगा, लेकिन अगर वे  मुँह मोड़ें, तो आपका काम तो केवल संदेश पहुँचा देना है। अल्लाह अपने बन्दों को जानता है। (20)

उन लोगों को दर्दनाक यातना की ख़बर सुना दें, जो लोग अल्लाह की आयतों पर ध्यान नहीं देते, जो नबियों को अन्यायपूर्ण तरीक़े से क़त्ल करते हैं, और उनकी भी हत्या  करते हैं जो (लोगों के साथ) न्याय करने का हुक्म देते हैं : (21)

ऐसे लोगों का सब किया-धरा, इस दुनिया में भी और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में भी, अकारथ गया, और उनकी मदद करनेवाला कोई न होगा। (22)

[ऐ रसूल], क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा जिन्हें (अल्लाह की) किताब का एक हिस्सा दिया गया था? जब उनसे कहा जाता है कि वे अल्लाह की किताब से होनेवाले फ़ैसले को स्वीकार कर लें, तो उनमें से कुछ लोग पीठ फेर कर वहाँ से चल देते हैं,  (23)

यह सब इसलिए कि वे कहते थे, "(जहन्नम की) आग हमें गिनती के कुछ दिनों के सिवा, छू ही नहीं सकती।" जो झूठ उन्होंने गढ़ रखा है, उसने दीन के मामले में उन्हें धोखे में डाल रखा है। (24)

उस वक़्त उनका क्या हाल होगा, जब उस (क़यामत के) दिन, जिसके आने में कोई शक नहीं, हम उन्हें अपने सामने इकट्ठा करेंगे और जब हर एक जान ने अपने कर्मों से जो कुछ कमाया होगा, उसका पूरा-पूरा बदला मिल जाएगा, और किसी के साथ कोई अन्याय नहीं होगा। (25)

[ऐ रसूल!] आप कहें, "ऐ अल्लाह! ऐ हर चीज़ पर नियंत्रण रखनेवाले बादशाह! तू जिसे चाहे राज-पाट दे दे और जिससे चाहे राज-पाट छीन ले; जिसे चाहे उसका दर्जा बढ़ा कर इज़्ज़त दे दे और जिसको चाहे उसकी इज़्ज़त गिरा दे। सारी भलाई तेरे ही हाथ में है : तुझे हर चीज़ करने की ताक़त है।  (26)

"तू ने रात ऐसी बनायी कि दिन से लिपटती जाती है, और दिन रात से लिपटता जाता है; तू बेजान चीज़ से जीवित चीज़ को निकाल लाता है और जानदार चीज़ से बेजान चीज़ को निकाल लाता है; तू जिसे चाहता है, बेहिसाब देता है।" (27)

ईमानवालों को चाहिए कि वे दूसरे ईमानवालों को छोड़कर विश्वास न करनेवालों को अपना साथी व मददगार न बनाएँ ---- जो कोई ऐसा करेगा, वह अपने आपको अल्लाह से पूरी तरह अलग-थलग कर लेगा ----- सिवाय इसके कि जब तुम्हें उन (के ज़ुल्म) से अपने आपको बचाने की नौबत आ जाए (तो ऐसा कर सकते हो)। अल्लाह तुम्हें चेतावनी देता है कि उससे डर कर रहो : अंत में (सबको) लौटकर उसी के पास जाना है।  (28)

(ऐ रसूल) आप कह दें, "जो कुछ तुम्हारे दिलों के अंदर है, उसे अल्लाह जानता है, चाहे तुम उसे छिपाओ या सबके सामने ज़ाहिर कर दो; वह आसमानों और ज़मीन की हर एक चीज़ जानता है; अल्लाह की ताक़त हर चीज़ पर छायी हुई है।" (29)

एक दिन आएगा जिस दिन किसी आदमी ने भलाई का जो भी काम (दुनिया में) किया होगा, (उसका बदला) वह अपने सामने मौजूद पाएगा, और बुराई का भी जो काम किया होगा (उसे भी सामने देखकर) वह कामना करेगा कि काश! उसके और उसके बुरे कर्मों के बीच बहुत दूर का फ़ासला होता (कि ऐसा दर्दनाक नतीजा उसके सामने न आता!)  अल्लाह तुम्हें चेतावनी देता है कि तुम उससे डर कर (बुराई से बचते) रहो, मगर अल्लाह अपने बंदों के लिए बड़ी मेहरबानी रखनेवाला है। (30)

आप उन लोगों से कह दें, "अगर तुम सचमुच अल्लाह से प्यार करते हो, तो तुम्हें चाहिए कि मेरे बताए हुए तरीक़े पर चलो, (अगर तुम ने ऐसा किया) तो अल्लाह भी तुमसे प्यार करने लगेगा और तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा; अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (31)

कह दें, "अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो,"  लेकिन अगर वे मुँह मोड़ लें तो (जान लो), अल्लाह उन लोगों से प्यार नहीं करता, जो (उसके हुक्म को) मानने से इंकार करते हैं। (32)

अल्लाह ने आदम [Adam], नूह [Noah], इबराहीम [Abraham] के ख़ानदान, और इमरान के ख़ानदान को तमाम दूसरे लोगों के मुक़ाबले में चुन लिया था,  (33)

एक नस्ल के रूप में, जिसमें से एक पीढ़ी, दूसरी पीढ़ी से पैदा हुई ----- अल्लाह सब (दुआएं) सुननेवाला, सब जाननेवाला है। (34)

(जब ऐसा हुआ था कि) इमरान की बीवी ने दुआ की, "मेरे रब! जो बच्चा मेरे पेट में पल रहा है उसे मैं (दुनिया के कामों से अलग कर के) पूरी तरह से तुझे अर्पित करती हूं; अतः तू उसे मेरी तरफ़ से स्वीकार कर। तू ही है जो सब कुछ सुननेवाला, जाननेवाला है।" (35)

मगर जब उसके यहाँ बच्ची ने जन्म लिया, तो कहने लगीं, "मेरे रब! मैंने तो एक लड़की को जन्म दिया है" ----- अल्लाह तो जानता ही था कि उसके यहाँ क्या पैदा हुआ था : और लड़का लडकी के जैसा नहीं होता ---- "मैंने उसका नाम मरयम [Mary] रखा है और मैं उसे और उसकी नस्ल को तेरी शरण में देती हूँ, ताकि ठुकराए हुए शैतान से सुरक्षित रहे।" (36)

उसके रब ने बड़ी ख़ुशी से उसे स्वीकार कर लिया और बड़े अच्छे माहौल में उसे परवान चढ़ाया; और ज़करिया [Zachariah] को उसके देखभाल की ज़िम्मेदारी दे दी। जब कभी ज़करिया उससे मिलने के लिए उसके हुजरे में जाता (जहाँ वह इबादत करती थी), तो उसके पास खाने-पीने की चीज़ें पाता। उसने पूछा, "ऐ मरयम! ये चीज़ें तुझे कहाँ से मिलती हैं?" उसने जवाब दिया, "यह अल्लाह की तरफ़ से है : अल्लाह जिसे चाहता है, बेहिसाब देता है।” (37)

उसी वक़्त ज़करिया ने अपने रब से यह कहते हुए दुआ की,  "ऐ मेरे रब! तू अपने फ़ज़ल से मुझे नेक व अच्छी औलाद प्रदान कर : बेशक, तू हर दुआ का सुननेवाला है।" (38)

फिर फ़रिश्तों ने ज़करिया को आवाज़ दी, जबकि वह इबादत की जगह [मेहराब] में खड़ा नमाज़ पढ़ रहा था, "अल्लाह, तुझे यह्या [John] (के पैदा होने) की ख़ुशख़बरी देता है, जो अल्लाह के कलमे [Words] (यानी ईसा) की पुष्टि करनेवाला होगा। वह लोगों का सरदार होगा और पवित्र होगानबी होगा, और नेक व अच्छे लोगो में से एक होगा।" (39)

उसने पूछा, "मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे पैदा हो सकता है जबकि मैं बूढ़ा हो चुका हूँऔर मेरी बीवी बाँझ है?" (एक फ़रिश्ते ने) कहा, "ऐसा ही होगा : अल्लाह जो चाहता है, करता है।" (40)

उसने कहा, "मेरे रब, इस बारे में मुझे कोई निशानी बता दे।"  (फ़रिश्ते ने) कहा, "तुम्हारे लिए निशानी यह होगी कि तुम तीन दिन तक किसी से भी कोई बातचीत नहीं करोगे, सिवाय इशारों से बात बताने के। (इस दौरान) अपने रब को ज़्यादा से ज़्यादा याद करो; और उसकी बड़ाई शाम के समय और सुबह सवेरे भी बयान करते रहो।" (41)

(उस समय का हाल सुनें) जब फ़रिश्तों ने मरयम से कहा, "ऐ मरयम! अल्लाह ने तुम्हें चुन लिया है और तुम्हें  (बुराइयों से) पवित्र कर दिया है : उसने सचमुच तुम्हें दुनिया की सारी औरतों के मुक़ाबले में चुनकर तुम्हारा दर्जा बढ़ाया है।  (42)

 "ऐ मरयम! पूरी निष्ठा के साथ अपने रब की भक्ति में लगी रहो, इबादत में अपने आपको (रुकू में) झुकाओ, और नमाज़ में झुकनेवालों के साथ तुम भी (सजदे में)  झुकती रहो।" (43)

[ऐ रसूल], हम ने आपको जो यह हाल सुनाया, वह आपकी जानकारी में नहीं था जिसे  हम ने 'वही' [Revelation] द्वारा आपको बताया : आप उस वक़्त उन लोगों के बीच मौजूद न थे जब उन (पुजारियों) ने इस बात को तय करने के लिए कि कौन मरयम की देखभाल करेगा, पाँसे [lots] फेंके थे, और आप उस वक़्त भी नहीं थे जब वे (मरयम के बारे में) आपस में झगड़ रहे थे।  (44)

(और फिर) जब ऐसा हुआ कि फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ मरयम! अल्लाह तुझे अपने 'कलाम'[Word] के द्वारा (एक लड़के की) ख़ुशख़बरी  देता है, जिसका नाम मसीह [Messiah], ईसा [Jesus] होगा और वह 'मरयम का बेटा' कहलायेगा, जिसकी इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में भी बड़ी इज़्ज़त होगी, और वह अल्लाह के यहाँ बड़ा पहुँचा हुआ और उसके नज़दीकी बंदों में से होगा। (45)

वह लोगों से उस वक़्त भी बात करेगा जब वह छोटा बच्चा होगा, और तब भी जब जवान होगा। वह नेक व अच्छे लोगों में से होगा।  (46)

(मरयम यह सुनकर) कहने लगी, "ऐ मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे हो सकता है, जबकि मुझे किसी मर्द ने छुआ तक नहीं?" (फ़रिश्ते ने) कहा, "अल्लाह जो चाहता है, इसी तरह पैदा कर देता है : वह जब किसी काम को करने का फ़ैसला कर लेता है, तो बस इतना ही कहता है, 'हो जा', और वह हो जाता है।”   (47)

और अल्लाह उस (होनेवाले बच्चे) को किताब और समझ-बूझ की शिक्षा देगा, और तौरात [Torah] और इंजील Gospel] का भी ज्ञान देगा,  (48)

 "वह उसे रसूल बनाकर इसराईल की संतान की ओर भेजेगा : (वह कहेगा),  "मैं तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास एक निशानी लेकर आया हूँ : मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से चिड़िये जैसी आकृति बनाउंंगा, फिर उसमें फूँक मारुंगा और, अल्लाह के हुक्म से वह सचमुच की चिड़िया बन जाएगी; मैं अंधे और कोढ़ी को भला-चंगा कर दूँगा, और मुर्दे को अल्लाह की इजाज़त से फिर से ज़िंदा कर दूँगा; और मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुम खाते हो और जो कुछ अपने घरों में इकट्ठा करके रखते हो। अगर तुम सचमुच ईमानवाले हो, तो इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है।  (49)

"मैं तौरात, जो मुझ से पहले आयी है, की सच्चाई की पुष्टि करता हूँ और इसलिए आया हूँ कि तुम्हारे लिए (आसानी पैदा करते हुए खाने की) कुछ उन चीज़ों को हलाल [lawful] कर दूँ जो हराम हुआ करती थीं। मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से एक निशानी लेकर आया हूँ। तो अल्लाह से डरो, और मेरी आज्ञा मानो :  (50)

"अल्लाह मेरी भी रब है और तुम्हारा भी रब है, अतः तुम उसी की बन्दगी करो ----- यही सीधा मार्ग है।" (51)

फिर जब ईसा ने महसूस किया कि (उनकी बातों पर अभी तक) वे विश्वास नहीं करतेतो उसने कहा, "कौन है जो अल्लाह के रास्ते में मेरी मदद करेगा?" इस पर उनके शिष्यों [हवारियों] ने कहा, "हम अल्लाह के (काम में) मददगार होंगे; हम अल्लाह पर ईमान रखते हैं ----- और आप गवाह रहें कि उसकी भक्ति में हमारा सिर झुक गया है।   (52)

ऐ रब! तूने जो कुछ उतारा है, हम उसपर विश्वास करते हैं और तेरे रसूल के बताए हुए रास्ते पर चलते हैं : अत: हमारी भी गिनती उन लोगों में हो जो (सच्चाई की) गवाही देनेवाले हैं।" (53)

फिर ऐसा हुआ कि उन यहूदियों ने (मसीह के ख़िलाफ़) अपनी चालें चलीं, तो अल्लाह ने भी अपनी चालों से उसका तोड़ किया, और अल्लाह (अगर चाल चलने पर आए, तो उस) से अच्छी चाल कोई नहीं चल सकता।  (54)

(और फिर) जब अल्लाह ने कहा, "ऐ ईसा! मैं तुझे (दुनिया से) वापस ले लूँगा और तुझे अपनी ओर उठा लूँगा : मैं तुझे विश्वास न करनेवालों (द्वारा दिए जाने वाले दर्द) से तुझे पाक-साफ़  कर दूँगा। तेरे मानने वालों को क़यामत के दिन तक उन लोगों से ऊंचा रखूँगा, जिन्होंने विश्वास नहीं किया। फिर तुम सबको लौटकर मेरे ही पास आना है और फिर मैं तुम्हारे बीच उन बातों का फ़ैसला कर दूँगा, जिनके बारे में तुम मतभेद रखते हो।  (55)

"तो जिन लोगों ने (सच्चाई को मानने से) इंकार किया, उन्हें इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में भी कड़ी यातना झेलनी पड़ेगी; (इस यातना से बचाने में) उनकी मदद कोई नहीं करेगा।" (56)

जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, अल्लाह उनके कर्मों का उन्हें पूरा-पूरा बदला देगा ; अल्लाह अत्याचार करनेवालों को पसन्द नहीं करता। (57)

(ऐ मुहम्मद), ये अल्लाह की आयतें हैं, और समझ-बूझ की और फ़ैसला कर देनेवाली बातें हैं, जो हम आपको सुना रहे हैं।   (58)

अल्लाह की नज़रों में ईसा [Jesus] की मिसाल ठीक आदम [Adam] जैसी है : अल्लाह ने आदम को मिट्टी से बनाया, फिर उससे कहा, "हो जा", और वह हो गया। (59)

यह तुम्हारे रब की तरफ़ से सच्चाई है, अत: तुम उनमें से न हो जाना जो संदेह में पड़े रहते हैं।  (60)

[ऐ रसूल], अब जबकि आपको (ईसा के इंसान होने की) बात की जानकारी दे दी गई, अगर इस बात पर (कि वह ख़ुदा थे) कोई आप से बहस करता है, तो कह दें, "आओ, हम अपने बेटों को बुला लें और तुम भी अपने बेटों को बुला लो, हम अपनी औरतों को बुला लें और तुम भी अपनी औरतों को बुला लो, हम अपने लोगों को और तुम अपने लोगों को ले आओ, फिर (सब मिलकर) सच्चे मन से दुआ करें और हम में से जो झूठ बोल रहा हो, उस पर अल्लाह की फिटकार [rejection] हो!" (61)

(ऊपर जो बताया गया) यही है इस मामले की सच्चाई : अल्लाह के अलावा कोई पूजने के लायक़ नहीं; अल्लाह महान, और फ़ैसला करनवाला है। (62)

अगर वे (सबको जमा करने के तरीक़े से) मुँह मोड़ते हैं, तो (जान रखो) कि जो कोई भी बिगाड़ पैदा करता है, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (63)

आप कहें, "ऐ किताबवालो [यहूदी और ईसाई] आओ हम मिलकर एक ऐसी विचारधारा बनाएं, जो हम सबके लिए एक समान और मान्य हो : हम केवल अल्लाह की बन्दगी करें, हम अल्लाह के साथ किसी को साझेदार [Partner] न ठहराएँ और हम में से कोई भी अल्लाह को छोड़कर किसी और को अपना रब न बनाएं।" फिर अगर वे (इस बात से) मुँह मोड़ें, तो कह दें, "गवाह रहना, हम तो अल्लाह के सामने पूरी भक्ति से झुकनेवाले हैं।" (64)

"ऐ किताबवालो! तुम इबराहीम के बारे में क्यों बहस करते हो (कि वह यहूदी था कि ईसाई)? जबकि तौरात और इंजील तो उसके समय के बहुत बाद तक भी नहीं उतरी थी? क्या तुम (इतनी मोटी सी बात) नहीं समझते? (65)

"जिन चीज़ों के बारे में तुम कुछ जानकारी रखते हो, उन चीज़ों पर तो तुम बहस करते ही हो, मगर जिन चीज़ों के बारे में तुम कुछ भी नहीं जानते, उन पर क्यों झग़ड़ते हो? अल्लाह (सब कुछ) जानता है, तुम कुछ नहीं जानते।" (66)

इबराहीम न तो यहूदी था और न ईसाई। वह तो एक सीधा और सच्चा आदमी था, जिसने अल्लाह की भक्ति में अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था, और वह कभी किसी और को अल्लाह के साथ जोड़ने वाला (मुशरिक) न था,   (67)

और इबराहीम से सबसे ज़्यादा नज़दीक तो वे लोग हैं जो उनके बताए हुए रास्ते पर सचमुच चलते हैं, यह नबी हैं, और (सच्चे) ईमानवाले लोग हैं------ अल्लाह (सच्चे) ईमानवालों के नज़दीक होता है। (68)

किताबवालों में से कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी दिली तमन्ना है कि तुम्हें [ईमानवाले] किसी तरह सही रास्ते से भटका दें, मगर वे ऐसा कर के केवल अपने-आपको  ही गुमराह कर रहे हैं, हालाँकि उन्हें इसका एहसास नहीं है।  (69)

ऐ किताबवालो! तुम अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार क्यों करते हो, जबकि तुम देख सकते हो कि ये सच हैं? (70)

ऐ किताबवालो, तुम सच और झूठ को आपस में मिला क्यों देते हो? तुम सच्चाई को छिपाते क्यों हो, जबकि तुम जानते हो (कि असलियत क्या है)? (71)

किताबवालों में से कुछ लोग कहते हैं, "इन ईमानवालों [मुसलमानों] पर जो कुछ (संदेश) उतरा है, उस पर सुबह सवेरे के समय विश्वास कर लो, और फिर शाम ढले उसे ठुकरा दो, ताकि ईमानवाले भी (अपने दीन से) पीठ फेर लें,  (72)

[वे आगे कहते हैं], मगर मन से किसी पर भी उस वक़्त तक विश्वास न कर लेना, जब तक कि वह तुम्हारे अपने दीन के रास्ते पर न चलने लगें" ----- [ऐ रसूल], उनसे कह दें, "सच्चा मार्गदर्शन तो वही है जो अल्लाह का दिया हुआ मार्गदर्शन है"-------[वे कहते हैं], " इस चीज़ पर विश्वास मत कर लेना कि किसी और को भी (अल्लाह की तरफ़ से) वैसी ही किताब दी जा सकती है जैसी किताब तुम्हें दी गयी थी, या यह कि वे तुम्हारे रब के सामने इस (किताब) का इस्तेमाल तुम्हारे ख़िलाफ़ बहस करने में कर सकें।" [ऐ रसूल], कह दें, "(किसी पर) अपना फ़ज़ल व करम [grace] करना, पूरा का पूरा अल्लाह के हाथ में है : वह जिसे चाहता है उसे मालामाल  कर देता है------ वह बड़े फैलाववाला, सब कुछ जाननेवाला है---- (73)

और वह जिसे चाहता है अपनी रहमत (दयालुता) के लिए चुन लेता है। उसके फ़ज़ल की कोई सीमा नहीं है।" (74)

किताबवाले लोगों में कुछ तो ऐसे हैं कि अगर [ऐ रसूल], आप उनके पास अमानत के तौर पर सोने का ढेर भी रख दें, तो वे आपको पूरा का पूरा लौटा देंगे, मगर उनमें से कुछ दूसरे ऐसे भी हैं जिनके पास अगर एक दीनार भी अमानत में रख दें, तो जब तक कि आप उसके सिर पर सवार न हों, वह उसे आपको नहीं लौटाएगा, यह इसलिए कि वे कहते हैं, "जो (अरब के) लोग किताबवाले नहीं हैं, उनके साथ लेन-देन में हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।" इस तरह, वे अल्लाह के नाम से झूठ बोलते हैं, और वे ऐसा जान बूझकर करते हैं। (75)

(ज़िम्मेदारी कैसे) नहीं? अल्लाह तो उन्हें  पसंद करता है, जो (किसी के साथ भी लेन-देन में) अपना वचन निभाते हैं और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं,  (76)

मगर वे लोग जो अल्लाह से की गयी प्रतिज्ञा और अपनी क़समों को मामूली दाम में बेच देते हैं, उनका आनेवाली दुनिया में कोई हिस्सा नहीं होगा। क़यामत के दिन अल्लाह न तो उनसे बात करेगा और न उनकी तरफ़ देखेगा----- न वे (गुनाहों से) पाक-साफ़ किए जाएंगे ----- दर्दनाक यातना उनके इंतिज़ार में है.  (77)

उन [किताबवालों] में कुछ लोग ऐसे हैं जो किताब [तोरैत] पढ़ते हुए अपनी ज़बानों को इस तरह से तोड़ते-मरोड़ते हैं, ताकि तुम (लोग) यह समझो कि वे जो कुछ कह रहे हैं, वह किताब का हिस्सा होगा, जबकि असल में वह किताब में से नहीं होता; वे कहते हैं, "यह अल्लाह की तरफ़ से है, जबकि असल में वह (अल्लाह की तरफ़ से) नहीं है; वे अल्लाह का नाम लेकर झूठी बातें थोपते हैं और वे ऐसा जान-बूझ कर करते हैं.  (78)

कोई भी आदमी जिसे अल्लाह ने किताब, समझ-बूझ, और पैग़म्बरी दी हो, वह कभी भी लोगों से भला ऐसा कहेगा कि,  "तुम अल्लाह के नहीं, मेरे बन्दे बनो?" [बल्कि वह तो यही कहेगा कि], "तुम्हारी भक्ति तो केवल अल्लाह के लिए होनी चाहिए, इसलिए कि तुम जो किताब पढ़ाते रहे हो और तुम ने ख़ुद से जो पढ़ा और समझा है, उसका नतीजा तो यही होना चाहिए।" (79)

वह कभी भी तुम्हें इस बात का हुक्म नहीं दे सकता कि तुम फ़रिश्तों और नबियों को अपना रब बना लो। वह ऐसा हुक्म कैसे दे सकता है कि तुम विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] बन जाओ, जबकि तुम ख़ुद अपना सिर एक अल्लाह के सामने झुका चुके हो? (80)

याद करो जब अल्लाह ने नबियों से वचन लिया था और कहा था, "मेरी तरफ़ से तुम पर किताब और समझ-बूझ [हिकमत] उतारने के बाद, अगर ऐसा हो कि कोई (दूसरा) रसूल उस किताब की पुष्टि करता हुआ आ जाए जो किताब तुम्हारे पास है, तो तुम्हें उस पर विश्वास करना चाहिए और उसकी सहायता करनी चाहिए। क्या तुम मेरी कही गई बात को स्वीकार करते हुए मुझसे पक्की प्रतिज्ञा लेते हो?” उन्होंने कहा, "हां, हम लेते हैं।" अल्लाह ने कहा, "अच्छा तो गवाह रहना और मैं भी गवाह रहूँगा।" (81)

अब इसके बाद जो मुंह मोड़ ले, तो ऐसे ही लोग हैं जो प्रतिज्ञा तोड़नेवाले हैं।  (82)

क्या वे एक अल्लाह के सामने झुकने के बजाए किसी और दीन को पाना चाहते हैं? आसमानों और ज़मीन में हर एक उसी के आगे झुकता है, चाहे अपनी मर्ज़ी से झुके या मजबूर होकर; वे सब उसी के पास लौटकर जाएंगे। (83)

(ऐ रसूल) आप कहें, "हम [मुस्लिम] अल्लाह पर ईमान रखते हैं और उस (किताब) पर जो हम पर उतारी गई है, और उस पर भी जो इबराहीम [Abraham], इसमाईल [Ishmael], इसहाक़ [Isaac], याकूब़ [Jacob] और उनकी सन्तान पर उतारी गयी। हम उस पर भी ईमान रखते हैं जो मूसा [Moses], ईसा Jesus], और दूसरे नबियों को उनके रब की तरफ़ से दिया गया। हम उन (नबियों) के बीच (दर्जे के हिसाब से) कोई अंतर नहीं करते। वह अल्लाह है, जिसके आगे हम ख़ुद को पूरी भक्ति से झुकाते हैं।" (84)

और (देखो!) अगर कोई पूरी भक्ति से अपना सिर (एक) अल्लाह के सामने झुकाने [इस्लाम] के बजाए किसी दूसरे दीन (धर्म) को पाना चाहता है, तो वह कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा : वह आनेवाली दुनिया [आख़िरत] में उन लोगों में से होगा जो सख़्त नुक़सान उठानेवाले होंगे.  (85)

अल्लाह क्यों ऐसे लोगों को सही रास्ता दिखाएगा, जो सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं, हालाँकि वे पहले विश्वास कर चुके थे और उन्होंने यह मान लिया था कि यह रसूल सच्चा है, और जबकि उन्हें स्पष्ट प्रमाण दिखा दिया गया था? अल्लाह शैतानी करनेवालोंं को सही रास्ता नहीं दिखाता :  (86)

ऐसे लोगों (के ज़ुल्म) का बदला यही है कि उन्हें अल्लाह, फ़रिश्तों और सारे लोगों द्वारा ठुकरा दिया जाएगा, (87)

और वे इसी हालत में रहेंगे, उनकी यातना न तो हल्की होगी और न ही उन्हें कोई मुहलत दी जाएगी।  (88)

हाँ, जो लोग इसके बाद तौबा कर लें और अपने आपको सुधार लें ---- तो अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है -----  (89)

जो लोग विश्वास कर लेने के बाद, ऐसे हो गए कि फिर अपने अविश्वास [कुफ़्र] में बढ़ते चले गए, उनकी तौबा स्वीकार नहीं की जाएगी। यही वे लोग हैं जो सीधे रास्ते से बहुत दूर जा पड़े हैं :  (90)

जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया और फिर इंकार की हालत में ही मर गए, तो वे किसी हालत में भी बच नहीं पाएंगे चाहे वे अपनी जान के बदले में पूरी धरती के बराबर सोना ही क्यों न दे दें। ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक यातना रखी हुई है, और उनकी मदद करनेवाला कोई न होगा। (91)

(ईमानवालो), तुम में से कोई भी उस वक़्त तक सही मायने में नेकी [piety] का दर्जा हासिल नहीं कर सकता, जब तक कि तुम उस चीज़ को (अल्लाह के रास्ते में) न दे दो, जो तुम्हें बहुत पसंद हो : जो कुछ भी तुम देते हो, उसके बारे में अल्लाह अच्छी तरह जानता है.  (92)

तौरात [Torah] के उतारे जाने के पहले इसराईल की संतान के लिए खाने की सारी चीज़ें हलाल [lawful] थीं, सिवाय उन चीज़ों के जिन्हें इसराईल [याक़ूब अलै.] ने ख़ुद अपने लिए हराम [forbidden] कर लिया था। आप (यहूदियों से) कह दें, "अगर तुम सच बोल रहे हो, तो तौरात ले आओ और (उसकी प्रासंगिक बातें) पढ़कर सुनाओ। (93)

जो कोई इसके बाद भी झूठी बातें बनाने में लगा रहे और उन्हें अल्लाह के नाम से जोड़ दे, तो ऐसे ही लोग ज़ालिम हैं."  (94)

[ऐ रसूल], कह दें, "अल्लाह सच कहता है; अतः इबराहीम के बताए हुए तरीक़े पर चलो : वह ईमान का पक्का था और वह कभी भी अल्लाह के साथ किसी और को उसका साझेदार [Partner] माननेवाला नहीं था."  (95)

"लोगों (की इबादत) के लिए जो सबसे पहला घर स्थापित किया गया, वह "मक्का" में था. यह बड़ी बरकतवाली [blessed] जगह है; और सारे लोगों के लिए सही रास्ता दिखाने का ज़रिया है;  (96)

"इसमें स्पष्ट निशानियाँ हैं; यह वह जगह है जहाँ इबराहीम नमाज़ के लिए खड़ा होता था; जो कोई इसके अंदर चला जाता है, वह सुरक्षित हो जाता है। जो लोग वहाँ तक जाने में समर्थ हैं, अल्लाह के प्रति उनका कर्त्तव्य है कि वह इस घर का हज करें. जो (इस जगह का महत्व नहीं समझते और) वहाँ जाने से इंकार करते हैं (उन्हें मालूम होना चाहिए कि) अल्लाह को किसी की ज़रूरत नहीं है।" (97)

आप कहें, "ऐ किताबवालो! तुम अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार क्यों करते होजो कुछ तुम करते हो, उसे अल्लाह देखता है." (98)

कह दें, "ऐ किताबवालो! तुम ईमान रखनेवालों को अल्लाह के रास्ते से क्यों हटा देना चाहते हो और तुम उसके रास्ते में क्यों टेढ़ापन पैदा करना चाहते हो, जबकि तुम्हें ख़ुद ही सच्चाई की गवाही देनी चाहिए? और (याद रखो!) जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।" (99)

ऐ ईमानवालो! अगर तुम किताबवालों में से कुछ लोगों की बात मानने लगे, तो (याद रखो!) वे तुम्हें (सच्चाई के रास्ते से भटका देंगे और ईमान रखने के बाद इंकार करनेवाला बना कर छोड़ेंगे।  (100)

तुम (अब फिर) विश्वास करने से इंकार कैसे कर सकते हो, जबकि तुम्हें अल्लाह की आयतें पढ़कर सुनाई जा रही हैं और उसका रसूल तुम्हारे बीच मौजूद है? (याद रखो), जिस किसी ने अल्लाह को मज़बूती से थाम लिया, उसे सीधा रास्ता दिखा दिया जाएगा। (101)

ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह का डर रखो, जैसा कि उससे डरने का हक़ है, और मरते दम तक, (एक) अल्लाह के आगे अपना सिर झुकाने वाले बनकर रहो।  (102)

और (देखो!) सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो; आपस में (मतभेद कर के) टुकड़ों में न बंट जाओ। याद करो उन मेहरबानियों को जो अल्लाह ने तुम पर कीं : तुम तो एक-दूसरे के दुश्मन थे और फिर उसने तुम्हारे दिलों को आपस में जोड़ दिया और तुम उसकी कृपा से भाई-भाई बन गए; तुम आग के एक गड्ढे में गिरने ही वाले थे, और उसने तुम्हें इसमें गिरने से बचा लिया----- अल्लाह इसी तरह तुम्हें अपनी आयतों के मतलब समझाता है, ताकि तुम सही रास्ता पा सको।  (103)

(देखो!) तुम एक ऐसे समुदाय का हिस्सा बनो जो (लोगों को) अच्छाई की तरफ़ बुलाए, जो चीज़ सही है उसे करने का हुक्म दे, और जो ग़लत है उसे करने से रोके : जो लोग ऐसा करते हैं, वही लोग कामयाबी पाने वाले हैं।  (104)

और (देखो!) तुम उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्हें (अल्लाह की किताब जैसी) खुली निशानियाँ दी गयी थीं, इसके बावजूद वे (दीन के मामलों में) टुकड़ों में बँट गए और आपस में झगड़ने लगे : ऐसे लोगों को बड़ी दर्दनाक सज़ा होगी।  (105)

एक दिन आएगा जब कुछ चेहरे चमक रहे होंगे और कुछ चेहरे काले पड़ जाएँगे, तो जिनके चेहरे काले पड़ गए होंगे, उनसे कहा जाएगा,  "एक बार (सच्चाई पर) विश्वास कर लेने के बाद तुम कैसे ईमान को ठुकरा सकते हो? तो ऐसा करने के नतीजे में अब यातना का मज़ा चखो," (106)

मगर वे लोग जिनके चेहरे चमकते होंगे, वे अल्लाह की रहमत की छाया में होंगे, वे उसी में हमेशा के लिए रहेंगे।  (107)

ये अल्लाह की आयतें हैं : [ऐ रसूल], हम इसे सच्चाई के साथ आपको सुना रहे हैं। अल्लाह संसारवालों पर किसी तरह का अन्याय करना नहीं चाहता।  (108)

(याद रखो!) आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की है; और सारी चीज़ें अंत में अल्लाह की तरफ़ ही लौटने वाली हैं। (109)

[ईमानवालो], तुम एक बेहतरीन उम्मत [समुदाय] हो, जिसे लोगों (की भलाई) के लिए चुन लिया गया है : तुम उस काम का हुक्म देते हो जो सही है, और उस काम से रोकते हो जो ग़लत है, और अल्लाह पर (सच्चा) ईमान रखते हो। अगर किताबवाले लोगों ने भी विश्वास किया होता, तो यह उनके लिए बहुत बेहतर  होता। हालांकि उनमें से कुछ लोग तो (सच्चाई पर) ईमान रखते हैं, मगर ज़्यादातर लोग (अल्लाह का) क़ानून तोड़नेवाले हैं  ------- (110)

वे तुम्हारा ज़्यादा कुछ बिगाड़ नहीं सकते : अगर वे तुमसे लड़ने के लिए आएं भी, तो जल्द ही तुम्हें पीठ दिखा कर भाग जाएँगे; उन्हें कोई मदद नहीं मिलेगी -----  (111)

और, वे [यहूदी] जहाँ कहीं भी पाए जाएं, उन्हें अपमानित होने का ख़तरा मंडराता रहेगा, हाँ, अगर उन्हें अल्लाह की तरफ़ से या दूसरे इंसानों की तरफ़ से कोई  सहारा मिल जाए जिसे वे मज़बूती से थाम लें तो और बात है। उन लोगों ने ख़ुद ही अपने ऊपर अल्लाह को ग़ुस्सा होने का मौक़ा दिया है। उनकी कमज़ोरियों ने भी उन्हें बदतर हाल में पहुँचाया है, यह इसलिए हुआ कि वे अल्लाह की आयतों को मानने से लगातार इंकार करते रहे, और नबियों को बिना किसी अधिकार के क़त्ल करते रहे, और यह जो कुछ हुआ, सब इस कारण से कि वे आज्ञा नहीं मानते थे, और उन्होंने (मर्यादा की) सारी हदें तोड़ रखी थीं। (112)

मगर वे सब एक जैसे नहीं हैं। किताबवालों में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सीधे मार्ग पर हैंवे रात की घड़ियों में अल्लाह की आयतें पढ़ते हैं, और वे अल्लाह के सामने सिर झुकाए रहते हैं, (113)

वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं, भलाई के काम करने का हुक्म देते हैं और बुराई के काम से रोकते हैं, और जो अच्छाई के कामों में तेज़ी दिखाते हैं. यही हैं जो अच्छे व नेक लोगों में से हैं  (114)

और जो कुछ वे नेकी के काम करते हैं, उसके इनाम से उन्हें वंचित नहीं किया जाएगा : अल्लाह को ठीक ठीक मालूम है कि कौन उससे डरते हुए बुराइयों से बचनेवाला है। (115)

रहे वे लोग जो (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते, तो अल्लाह के मुक़ाबले में न तो उनके माल कुछ काम आ सकेंगे और न उनकी सन्तान कोई मदद कर सकेगी ‌‌‌‌ ---- वे तो (जहन्नम की) आग में जानेवाले लोग हैं, उसी में वे हमेशा रहेंगे----  (116)

जो कुछ वे इस सांसारिक जीवन में ख़र्च करते हैं, वह सब बेकार हो जाएगा : उसकी मिसाल ऐसी है जैसे एक तेज़ बर्फ़ीली हवा वाली आँधी आए और वह उन लोगों की खेती को बर्बाद कर जाए. (याद रहे!), अल्लाह ने उन पर ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि ख़ुद यही लोग अपनी जानों पर ज़ुल्म करते रहे हैं। (117)

ऐ ईमानवालो! तुम बाहर के ऐसे लोगों को अपना घना दोस्त (और हमराज़) न बना लो, जो तुम्हें बर्बाद करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते और वे तुम्हें तकलीफ़ में फँसा देखना चाहते हैं : उनकी नफ़रत उनके मुँह से ज़ाहिर हो जाती है, मगर जो कुछ उनके दिलों में छिपा होता है, वह तो इससे कहीं ज़्यादा बुरा है। हम ने अपनी आयतें तुम्हारे सामने स्पष्ट कर दी हैं; तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लोगे?  (118)

ये मामला ऐसा ही है : देखो, तुम तो उन्हें पसंद करते हो, मगर वे तुम्हें पसंद नहीं करतेतुम सभी (आसमानी) किताबों पर ईमान रखते हो और वे जब तुम से मिलते हैं, तो कहने को तो कहते हैं कि "हम विश्वास करते हैं,"  मगर जब वे अकेले होते हैं, तो तुम पर क्रोध के मारे दाँतों से उँगलियाँ काटने लगते हैं। [ऐ रसूल], आप कह दें, "(अगर तुम ऐसा ही चाहते हो, तो) तुम अपने क्रोध में ही मर जाओ!" (याद रखो!) हर एक के दिलों में क्या है, अल्लाह को इसकी सटीक जानकारी है।" (119)

[ईमानवालो], अगर तुम्हारे साथ कुछ अच्छा हो जाए, तो वे दुखी हो जाते हैं और अगर कुछ बुरा हो जाए, तो वे बड़े ख़ुश हो जाते हैं। लेकिन (याद रखो!) अगर तुम ने (मुसीबत में) धीरज से काम लिया और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहे, तो उनकी कोई चाल तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकेगी : जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह ने उसे अपने धेरे में ले रखा है। (120)

[ऐ रसूल!] याद करें जब आप सुबह-सवेरे अपने घर से निकलकर (उहुद के मैदान में) लड़ाई  के लिए ईमानवालों को युद्ध के मोर्चों पर लगा रहे थे : अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है।  (121)

(फिर जब ऐसा हुआ था कि) तुम्हारे [ईमानवालों के] दो गिरोह बस हिम्मत हारने ही वाले थे (कि मैदान छोड़ दें) और अल्लाह ने उन्हें बचा लिया था ----- ईमान रखनेवालों को (हर हाल में) अल्लाह पर ही भरोसा करना चाहिए---- (122)

और (देखो!) बद्र (की जंग) में अल्लाह ने तुम्हारी मदद की थी, जबकि तुम्हारी हालत बहुत कमज़ोर थी। अतः (केवल) अल्लाह से डरो, ताकि तुम (उसकी नेमतों का) शुक्र अदा करनेवाले बन सको। (123)

याद करें जब आप ने (बद्र की जंग में) ईमानवालों से कहा था, "अगर तुम्हारा रब तीन हज़ार फ़रिश्ते उतारकर तुम्हारी सेना को मज़बूत कर दे, तो क्या तुम्हें संतोष हो जाएगा?" (124)

हाँ, देखो! अगर तुम धीरज के साथ अपने क़दम जमाए रखो और अल्लाह से डरते रहो, तो अगर दुश्मन अचानक भी तुम पर चढ़ आएँ, तो तुम्हारा रब (तीन हज़ार के बजाए) पाँच हज़ार झपट्टा मारनेवाले फ़रिश्तों से तुम्हारी मदद कर देगा!" (125)

और अल्लाह ने यह व्यवस्था (इसलिए) की, जिसमें तुम्हारे लिए आशा का एक संदेश हो, ताकि तुम्हारे दिलों को चैन मिल जाए ------ मदद (और जीत) तो बस अल्लाह की ही तरफ़ से आती है, जिसकी ताक़त हर चीज़ पर छायी हुई है, और वह (हर काम में) बेहद समझ-बूझ रखनेवाला है -----  (126)

(और बद्र की लड़ाई में ऐसा इसलिए हुआ) ताकि विश्वास न करनेवालों की फ़ौज के एक हिस्से को बेकार कर दें और वे तंग हो जाएं, उन्हें ऐसी बुरी तरह हार हो कि वे मैदान छोड़कर लौट जाएं।  (127)

अब अल्लाह चाहे उनके साथ नर्मी बरते या उन्हें सज़ा दे, [ऐ रसूल!] इसका फ़ैसला आपके अधिकार में नहीं है : वे ज़ालिम हैं।  (128)

आसमानों और ज़मीन में जो कुछ भी है, सब अल्लाह का है। वह जिसे चाहे माफ़ कर दे और जिसे चाहे सज़ा दे : (याद रहे), अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (129)

ऐ ईमानवालो! क़र्ज़ के साथ ब्याज [interest] की कमाई से अपना पेट न भरो, जो (मूलधन से) दो गुना, चौगुना हो जाता है। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, ताकि तुम (अपने मक़सद में) कामयाब हो सको -----  (130)

और (देखो!) उस आग की यातना से बचो जो (सच्चाई से) इंकार करनेवालों के लिए तैयार की गयी है ----- (131)

और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो, ताकि तुम पर दया की जाए। (132)

अपने रब की तरफ़ (गुनाहों की) माफ़ी के लिए जल्दी से बढ़ो, और उस जन्नत [बाग़] की तरफ़ भी बढ़ो जिसका फैलाव इतना है कि उसमें सारे आसमान और ज़मीन समा जाएं, और वह उन लोगों के लिए तैयार की गयी है जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं,   (133)

जो ख़ुशहाली में हों या तंगी में, दोनों हालतों में लोगों को देते रहते हैं, जो अपने ग़ुस्से  को क़ाबू में रखते हैं, और लोगों की ग़लतियों को माफ़ कर देते हैं ------  अल्लाह ऐसे लोगों को पसंद करता है, जो अच्छे काम करते हैं ----- (134)

ये वे लोग हैं जो कभी ग़लती से अगर कोई शर्मनाक गुनाह कर बैठते हैं, या अपनी जानों को मुसीबत में डाल लेते हैं, तो तुरंत ही उन्हें अल्लाह याद आ जाता है और वे अपने गुनाहों की माफ़ी मांगने लगते हैं ---- और अल्लाह के सिवा कौन है, जो गुनाहों को माफ़ कर सके? ---- और वे कभी भी जानते-बूझते अपनी ग़लती पर अड़े नहीं रहते।  (135)

ऐसे लोगों का इनाम उनके रब की तरफ़ से (उनके) गुनाहों की माफ़ी है, और ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी, उसी में वे हमेशा रहेंगे। और क्या ही अच्छा बदला है जो (नेक) कर्म करनेवालों को मिलेगा!  (136)

तुमसे पहले के ज़माने में भी अल्लाह की तरफ़ से लोगों के लिए नियम-क़ायदे रहे हैं : ज़मीन पर घूमो-फिरो और देखो कि (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवालों का अंजाम क्या हुआ।  (137)

यह लोगों की सीख के लिए साफ़ व स्पष्ट सबक़ है, और अल्लाह का डर रखनेवालों के लिए मार्गदर्शन और शिक्षा लेने की चीज़ है। (138)

और (देखो!) हिम्मत न हारो और न दुखी हो ----- अगर तुम पक्के ईमानवाले हो, तो (अंत में) तुम्हीं हावी रहोगे ------ (139)

अगर तुम ने (उहुद की लड़ाई में) ज़ख्म खाया है, तो दुश्मनों को भी वैसा ही ज़ख्म (बद्र की लड़ाई में) लग चुका है। यह तो (हार-जीत के) आते जाते दिन हैं, जिन्हें हम लोगों के बीच बारी-बारी बदलते रहते हैं, ताकि अल्लाह को पता लग जाए कि कौन है जो सच्चा ईमान रखता है, और ताकि वह तुम्हारे बीच से शहीदों को चुन सके (जो सच्चाई की गवाही दे सकें) ----- और अल्लाह ज़ुल्म करनेवालों को पसंद नहीं करता -------  (140)

और ताकि अल्लाह ईमान रखनेवालों को (उनकी कमज़ोरियों और भूल-चूक से) निखार दे और (सच्चाई से) इंकार करनेवालों को बर्बाद कर दे। (141)

[ईमानवालो], क्या तुमने यह समझ रखा था कि (केवल ईमान का दावा कर के) तुम यूँ ही जन्नत में चले जाओगे, बिना अल्लाह द्वारा जाँचे-परखे हुए कि तुम में से कौन लोग हैं जो उसके रास्ते में जी-तोड़ संघर्ष [जिहाद] करनेवाले हैं और कितने हैं जो (सख़्त मुश्किल में) अपने क़दम मज़बूती से जमाए रखनेवाले हैं?  (142)

जब तक तुम्हारा सामना मौत से नहीं हुआ था, तुम (सच्चाई के रास्ते में) अपनी जान देने की कामना करते थे. लो, अब तो तुमने उसे अपनी आँखों से देख लिया है। (143)

मुहम्मद (सल.) तो बस अल्लाह के एक रसूल हैं जिनके पहले भी बहुत से रसूल (अपने-अपने वक़्तों में) आए और गुज़र गए। अगर उनकी मौत हो जाए या उनकी हत्या कर दी जाए (जैसा कि उहुद की लड़ाई में अफ़वाहें फैली थीं), तो क्या तुम (सच्चाई का रास्ता छोड़कर) अपने पुराने तरीक़े पर फिर से लौट जाओगे? अगर किसी ने ऐसा किया, तो वह (अपना ही नुक़सान करेगा) अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा। जो लोग (नेमतों का) शुक्र अदा करनेवाले हैं, अल्लाह उन्हें जल्द ही इनाम देगा।  (144)

और (याद रखो!) अल्लाह की अनुमति के बिना कोई जान मर नहीं सकती, और हर जान के मरने का समय पहले से निर्धारित है। अगर कोई इस दुनिया के फ़ायदे को पाने की कोशिश में लगा रहता है, तो हम उसे इस दुनिया में से कुछ दे देंगे। अगर कोई आनेवाली दुनिया [आख़िरत] के फ़ायदे पर नज़र रखता है, तो हम उसे आख़िरत में से कुछ देंगे : हम (नेमतों का) शुक्र अदा करनेवालों को ज़रूर इनाम देंगे। (145)

कितने नबियों ने बहुत सारे अल्लाहवाले बंदों के साथ मिलकर (सच्चाई के रास्ते में) युद्ध किया है, मगर ऐसा कभी नहीं हुआ कि अल्लाह के मार्ग में जो कुछ भी मुसीबत उन्हें झेलनी पड़ी, उससे उन्होंने हिम्मत हारी हो, कभी कमज़ोर पड़े हों या समर्पण किया हो : अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो (मुसीबत में) मज़बूती से जमे रहते हैं।  (146)

(कितनी मुसीबतें झेलीं, मगर) उन्होंने ज़बान से बस इतना ही कहा कि "ऐ हमारे रब! हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे, हम से हमारे काम में जो ज़्यादतियाँ हो गई हों, उन्हें भी माफ़ कर दे। हमारे क़दम (सच्चाई की राह में) जमा दे, और (सच्चाई से) इंकार करनेवाले लोगों के मुक़ाबले में हमारी मदद कर," (147)

और इस तरह अल्लाह ने (उनके कर्मों को देखते हुए) इस दुनिया में और आनेवाली दुनिया में भी उन्हें बेहतरीन बदला दिया : अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो नेक काम करते हैं।  (148)

ऐ ईमानवालो! अगर तुम उन लोगों के कहने पर चलोगे जिन्होंने (सच्चाई से) इंकार करने का रास्ता अपनाया है, तो वे तुम्हें (सही रास्ते से हटाकर) तुम्हारे पुराने तरीक़े पर लौट जाने के लिए मजबूर कर देंगे और (नतीजे में) तुम बड़े घाटे में पड़ने वाले हो जाओगे। (149)

हरगिज़ (ये सच्चाई के दुश्मन तुम्हारे दोस्त) नहीं! यह तो अल्लाह है जो तुम्हारा रखवाला है : वह मदद करनेवालों में सबसे अच्छा है। (150)

वह दिन दूर नहीं जब हम विश्वास न करनेवालों के दिलों मैं डर बैठा देंगे, इसलिए कि वे अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) दूसरों को भी साझेदार [Partner] ठहराते हैं, जिनके लिए अल्लाह ने कोई सनद नहीं उतारी : उनका ठिकाना (जहन्नम की) आग होगा---- जो ज़ालिम हैं, उनका ठिकाना क्या ही बुरा ठिकाना है!  (151)

और (देखो!) अल्लाह ने [उहुद की जंग के लिए] तुम से (जीत का) जो वादा किया, उसे पूरा कर दिखाया था : तुम अल्लाह की अनुमति से, उन (दुश्मनों) का सफ़ाया करने में लगे थे, और अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी पसंद की मंज़िल के इतने नज़दीक पहुँचा दिया था कि जीत दिखायी देने लगी थी, मगर उसके बाद तुम ढीले पड़ गए, (मोर्चे पर डटे रहने के) दिए गए निर्देश पर आपस में झगड़ने लगे, और तुम ने (अपने सरदार का) हुक्म नहीं माना ------ तुम में कुछ लोग ऐसे थे जो (युद्ध में लूट के सामान के रूप में) इस दुनिया का फ़ायदा चाहते थे और कुछ ऐसे थे जो (युद्ध में डटे रहे और शहीद हुए, कि वे) आनेवाली दुनिया के फ़ायदे चाहते थे ------और फिर अल्लाह ने तुम्हें सज़ा देने के लिए तुम को उन पर (जीत हासिल करने से) रोक दिया। (बहरहाल), अब उसने तुम्हें माफ़ कर दिया है : सचमुच अल्लाह ईमानवालों पर बहुत ही मेहरबान है। (152)

(उहुद की जंग याद करो) जब तुम लोग (जंग के मैदान से) भागे चले जा रहे थे और कोई पीछे मुड़कर देखता तक न था जबकि अल्लाह के रसूल तुम्हें पीछे से पुकार रहे थे, सो अल्लाह ने भी बदले में तुम्हें (पराजय देकर) दुख पर दुख दिया। [उसने अब तुम्हें माफ़ कर दिया है]  ताकि तुम उस चीज़ के लिए दुखी न हो, जो तुम्हारे हाथ से निकल जाए और न उस  मुसीबत पर दुखी हो जो तुम्हारे सिर पर आ पड़े। और (याद रखो!), तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (153)

फिर इस दुख के बाद, (बेचैनी व डर दूर करने के लिए) अल्लाह ने तुम पर 'सुकून'[Calm] उतारा, एक नींद जो तुम में से कुछ लोगों पर छा गयी थी।  

तुम में कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें अपनी जानों की ही पड़ी थी। वे अल्लाह के बारे में झूठे व ग़लत विचार रखते थे, जो जाहिलियत [Ignorance] के समय के अधर्मियों [Pagans] के विचार से मिलता-जुलता था, वे कहते थे, "जो कुछ हुआ, इन मामलों में हमारा कुछ भी अधिकार है क्या?" [ऐ रसूल], कह दें, "मामले तो सब के सब अल्लाह के (हाथ में) हैं।" असल में, जो कुछ उनके दिलों में होता है, वह आप पर ज़ाहिर नहीं करते। वे कहते हैं, "इस मामले में अगर हमारा कुछ अधिकार होता, तो हम में से कोई भी वहाँ मारा न जाता।" आप कह दें, "अगर तुम अपने घरों में भी बैठे होते, तब भी जिन लोगों का क़त्ल होना भाग्य में तय था, वे घर से निकलकर अपने मारे जाने की जगह पहुँच ही जाते।" और यह सब इसलिए हुआ ताकि जो कुछ तुम्हारे भीतर है, अल्लाह उसे जाँच- परख ले और तुम्हारे दिलों में क्या कुछ है, वह साबित हो जाए। अल्लाह दिलों के अंदर छिपी हुई बात को भी अच्छी तरह जानता है।  (154)

तुम में से जिन लोगों ने उस दिन युद्ध से मुँह मोड़ लिया था जब दोनों सेनाएं युद्ध में टकरायी थीं, तो असल में उनके कर्मों में कुछ ऐसी कमज़ोरी पैदा हो गयी थी जिसके चलते शैतान ने उनके क़दम डगमगा दिए थे। अल्लाह ने अब उन्हें माफ़ कर दिया है : अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला और (ग़लतियों के प्रति) सहनशील है।  (155)

ऐ ईमानवालो! तुम उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने (सच्चाई पर) विश्वास करने से इंकार किया और अपने उन भाइयों के बारे में, जो सफ़र में बाहर गए हुए हों या युद्ध में लगे हों (और उनकी वहाँ मौत हो जाए), तो कहते हैं, "अगर वे घर से न निकलते और हमारे पास ही ठहरे रहते, तो वे न तो मरे होते और न ही मारे गए होते," नतीजा यह कि अल्लाह उनके ऐसे विचारों को उनके दिलों में पीड़ा का स्रोत बना देता है। यह तो अल्लाह है जो ज़िंदगी और मौत देता है; तुम जो कुछ भी करते हो, वह अल्लाह की नज़र से छिपा नहीं है।  (156)

और (देखो!) चाहे तुम अल्लाह के रास्ते में मारे गए या अपनी मौत मर गए, तो अल्लाह की तरफ़ से जो माफ़ी और उसकी दयालुता [रहमत] तुम्हारे हिस्से में आएगी, वह उस पूँजी से कहीं बेहतर है, जिसे लोग बटोरने में लगे रहते हैं। (157)

अब चाहे तुम अपनी मौत मरो या मारे जाओ, तो हर हाल में होना यही है कि तुम अल्लाह के पास ही इकट्ठा किए जाओगे। (158)

(इन घटनाओं के बाद भी) यह अल्लाह की बड़ी रहमत हुई, कि [ऐ रसूल] आप उनके साथ नर्मी से पेश आते हैं ----- अगर आप उनके साथ सख़्ती से पेश आते, और कठोर दिल के होते, तो ये सब आपके पास से खिसक लेते और आपको छोड़ कर चले गए होते ------ अतः आप उनकी ग़लतियाँ माफ़ कर दें, और उनके लिए माफ़ी की दुआ करें। इनके साथ इस तरह के (युद्ध व शांति के) मामलों में सलाह-मशविरा किया करें, फिर जब आप कोई क़दम उठाने का फ़ैसला कर लें, तो अल्लाह पर भरोसा करें : अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो उसी पर अपना भरोसा करते हैं।  (159)

[ईमानवालो], अगर अल्लाह तुम्हारी मदद करे, तो तुम पर कोई हावी नहीं हो सकता; और अगर वह तुम्हें छोड़ दे, तो फिर कौन हो जो तुम्हारी मदद कर सकता है? अतः ईमानवालों को अल्लाह पर ही भरोसा रखना चाहिए।  (160)

और (देखो!) ऐसी बात सोचना भी मुश्किल है कि कोई नबी कभी भी युद्ध में हाथ आए लूट के माल में से बईमानी कर के कुछ ले लेगा। जो कोई ऐसा करता है, तो वह क़यामत के दिन अपने साथ उस चीज़ को लेकर हाज़िर होगा (जो उसने ग़लत तरीक़े से लिया होगा), फिर हर जान को उसके कर्मों के मुताबिक़ पूरा-पूरा बदला दे दिया जाएगा : किसी के साथ कोई ज़ुल्म न होगा। (161)

क्या वह आदमी जो अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने में लगा रहता है, उस आदमी जैसा हो सकता है जो (अपने कुकर्मों से) अल्लाह को नाराज़ कर के आया हो और जिसका ठिकाना जहन्नम हो ----  क्या ही बुरा ठिकाना है वह!? (162)

अल्लाह की नज़र में वे एक अलग ही दर्जे [class] में हैं; जो भी वे करते हैं, अल्लाह उसे देखता है।  (163)

अल्लाह का ईमानवालों पर सचमुच बड़ा एहसान रहा है कि उसने एक ऐसा रसूल उनके पास भेज दिया जो ख़ुद उन्हीं में से है, जो उन्हें (अल्लाह की) आयतें सुनाता है, हर तरह की बुराइयों से उन्हें निखारता है, और उन्हें किताब और सही समझ-बूझ की शिक्षा देता है ------- इससे पहले सचमुच वे लोग सही रास्ते से भटके हुए थे।  (164)

[ऐ ईमानवालो!], जब (उहुद की लड़ाई में) तुम पर एक बड़ी मुसीबत आ पड़ी, तो इसके बावजूद कि तुम (अपने दुश्मनों को बद्र की लड़ाई में) दोगुनी क्षति पहुँचा चुके हो, फिर भी तुम कहने लगे कि, "यह मुसीबत कहाँ से आ गई?" [ऐ रसूल], उनसे कह दें, "यह तो ख़ुद तुम्हारे ही हाथों आयी है." (याद रहे), अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त हासिल है : (165)

और (देखो!) [उहुद की जंग में] दोनों फ़ौजों की मुठभेड़ के दिन जो कुछ मुसीबत तुम्हारे सामने आयी, वह अल्लाह की आज्ञा से ही आयी थी, ताकि यह पता चल जाए कि सच्चे ईमानवाले कौन हैं  (166)

और ईमान का ढोंग करनेवाले [मुनाफ़िक़/ Hypocrites] कौन लोग हैं?, जब उन (मुनाफ़िक़ों) से कहा गया था कि "आओ, अल्लाह के रास्ते में (बाहर निकल कर) युद्ध करो या कम से कम अपनी रक्षा में लड़ो", तो (दुश्मनों की बड़ी सेना को देख कर) कहने लगे, "अगर हम देखते कि (बराबरी की) लड़ाई होनेवाली है, तो हम ज़रूर तुम्हारे साथ हो लेते।" उस दिन वे ईमान के मुक़ाबले (सच्चाई से) इंकार करने [कुफ़्र] के ज़्यादा निकट थे। वे अपने मुँह से ऐसी बातें कहते हैं, जो उनके दिलों में नहीं होती : जो कुछ वे छिपाते है, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है। (167)

वे लोग जो (युद्ध के समय) स्वयं तो (घर) बैठे रहे, और अपने भाइयों के बारे में कहने लगे, "अगर उन लोगों ने हमारी बात मान ली होती, तो वे कभी (युद्ध में) मारे न जाते।" [ऐ रसूल], आप उनसे कह दें, "अच्छा, तुम जो कह रहे हो अगर वह सच है, तो जब तुम्हारी मौत आएगी, तो तुम उसे अपने ऊपर से टाल कर दिखाना।" (168)

[ऐ रसूल!], जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे गए हैं, आप उन्हें मुर्दा न समझें, वे अपने रब के पास ज़िंदा हैं, अपनी रोज़ी पा रहे हैं,  (169)

अल्लाह ने अपने फ़ज़ल से जो कुछ उन्हें दे रखा है, वे उस पर बहुत ख़ुश हैं; और उन लोगों के लिए भी ख़ुश हो रहे हैं जिन्हें वे (दुनिया में) पीछे छोड़ आए हैं जो अभी उनके साथ (शहीदों में) शामिल नहीं हुए हैं, कि न तो उनके लिए कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे; (170)

वे अल्लाह के फ़ज़ल [Favour] और उसकी नेमतों [Blessings] से भी (ख़ुश हो रहे हैं), और इस बात से कि (उन्होंने देख लिया) अल्लाह ईमान रखनेवालों का बदला कभी बेकार नहीं जाने देता।  (171)

(उहुद में) हार झेलने के बाद भी जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल की पुकार का जवाब दिया (और फिर जंग के लिए तैयार हो गए), इसी तरह, जो अच्छा व नेक काम करते हैं, और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए बड़ा भारी इनाम होगा। (172)

उन ईमानवालों का ईमान और ज़्यादा बढ़ गया, जब (उन्हें डराने के लिए) लोगों ने कहा, "अपने दुश्मनों से डरो : तुम्हारे ख़िलाफ़ उन लोगों ने एक बड़ी सेना इकट्ठा कर ली है", (मगर डरने के बजाए) ईमानवालों ने जवाब दिया, "हमारे लिए तो बस अल्लाह ही काफ़ी है : वह सबसे अच्छा रखवाला है," (173)

वे (बिना किसी भय के निकले और) अल्लाह के फ़ज़ल और उसकी नेमतों के साथ वहाँ से लौट आएउन्हें कोई नुक़सान न हुआ. वे लोग अल्लाह को ख़ुश करने की चाहत में लगे रहे. अल्लाह का करम होना सचमुच बहुत बड़ी बात है।  (174)

यह तो शैतान है जो तुम पर ज़ोर डालता है कि तुम उसके पीछे चलनेवालों से डरोअगर तुम सच्चे ईमानवाले हो, तुम उनसे न डरो, बल्कि मुझ से डरो। (175)

[ऐ रसूल], उन लोगों के लिए आप दुखी न हों जो लोग (सच्चाई से) इंकार करने में जल्दी दिखाते हैं। वे अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते; अल्लाह चाहता है कि उनके लिए आख़िरत (की नेमतों) में कोई हिस्सा न रखे ---- एक बड़ी दर्दनाक यातना उनके लिए तैयार है।  (176)

जिन लोगों ने इंकार की राह चलने के लिए अपना ईमान बेच दिया, वे अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते; उनके लिए दर्दनाक यातना तैयार है। (177)

विश्वास न करनेवाले यह न समझ बैठें कि हम जो (उनके कामों में) उन्हें ढील दिए जाते हैंयह उनके लिए बड़ा अच्छा है : हम जब उन्हें ज़्यादा समय देते हैं, तो वे अपने गुनाहों में और अधिक बढ़ जाते हैं ----  उनके लिए तो बेहद अपमानित कर देनेवाली यातना होगी।  (178)

अल्लाह ऐसा नहीं कर सकता कि बिना सही [मोमिन] और ग़लत [मुनाफ़िक़/ढोंगी] को अलग-अलग किए, तुम जिस हालत में थे, उसी हालत में तुम्हें छोड़ दे। (दूसरी तरफ़), अल्लाह तुम (लोगों) को वह चीज़ भी नहीं बता सकता जो नज़र से छिपी हुई हैअल्लाह जिस किसी को चाहता है, अपने रसूल के रूप में चुन लेता है (और उसे ही छिपी चीज़ें बताता है)। अतः अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखो : अगर तुम विश्वास रखो और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, तो तुम्हें बहुत बड़ा इनाम मिलेगा।  (179)

अल्लाह ने अपने फ़ज़ल से जिन लोगों को (माल) दे रखा है, उन्हें इसे ख़र्च करने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए, वे यह न समझें कि ऐसा करना उनके लिए कोई भलाई की बात है; उल्टा यह उनके लिए बहुत बुरा है। जो कुछ (माल) वे कंजूसी से बचा-बचा के रखते हैं उसे क़यामत के दिन उनकी गर्दनों के गिर्द लटका दिया जाएगा। (याद रहे!), वह अल्लाह ही है जो (अंत में) आसमानों और ज़मीन का अकेला वारिस होगा : हर चीज़ जो तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (180)

अल्लाह ने उन लोगों की बात निश्चय ही सुन ली है जो (अल्लाह के नाम से चंदा लिए जाने के बारे में) हँसी उड़ाते हुए कहते हैं, "तो अल्लाह ग़रीब है जबकि हम धनवान हैं।" हम उनकी कही हुई हर बात (उनके कर्मों के खाते में) लिख लेंगेऔर साथ में उसे भी लिखेंगे जबकि सारी मर्यादाओं को तोड़ते हुए उन लोगों ने नबियों को मार डाला--- और हम उनसे कहेंगे, "लो, (अब) भड़कती हुई आग की यातना का मज़ा चखो। (181)

यह उसका बदला है जो ख़ुद तुम ने अपने हाथों से अपने लिए जमा कर रखा था : अल्लाह अपने बन्दों के साथ कभी भी अन्याय नहीं करता।” (182)

लोग यह कहते हैं, "अल्लाह ने हमें हुक्म दिया है कि हम किसी रसूल पर विश्वास न करें, जब तक कि वह हमारे सामने ऐसी कु़र्बानी न चढ़ाए जिसे (आसमान से आकर) आग खा लेती हो।" (ऐ रसूल), कह दें, "तुम्हारे पास मुझ से पहले कितने ही रसूल खुली निशानियाँ लेकर आ चुके हैं, और साथ में उन्होंने वह चीज़ भी दिखायी थी जिसके लिए तुम कह रहे हो। फिर अगर तुम सच्चे थे, तो तुमने उन्हें क़त्ल क्यों किया?" (183)

अगर वे आपको मानने से इंकार करते हैं, तो आप से पहले भी दूसरे रसूलों को वे झुठा मानते हुए ठुकरा चुके हैंहालांकि वे स्पष्ट प्रमाण लेकर आए थे, साथ में गहरी समझ-बूझ की (लिखी हुई) किताबें, और सच्चाई को रौशन कर देनेवाली (आसमानी) किताब भी लेकर आए थे।  (184)

हर जीव को मौत का मज़ा चखना होगा, और जो कुछ तुम्हारे कर्मों का बदला मिलना है, वह क़यामत के दिन ही पूरा-पूरा मिलेगा। जिस किसी को (जहन्नम की) आग से दूर रखा गया और बाग़ों [जन्नत] में दाख़िल कर दिया गयावह कामयाब हो गया। इस दुनिया में तो केवल धोखे की खुशियां हैं : (185)

आपके माल और आपके लोगों के ज़रिए आपकी परीक्षा ज़रूर ली जाएगीऔर यह बात पक्की है कि जिन्हें आपसे पहले किताब दी गई थी और जो (अरब के) लोग अल्लाह के साथ दूसरों को जोड़ते हैंउनसे आपको बहुत-सी ऐसी बातें सुननी पड़ेंगी जो दिल को चोट पहुंचाने वाली होंगी। अगर आप सब्र के साथ जमे रहें और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहेंतो वह बड़ी हिम्मत व पक्के इरादे की बात होगी। (186)

जिन लोगों को (आसमानी) किताब दी गयी थी, उनसे अल्लाह ने वचन लिया था कि ----- "लोगों को इसके बारे में साफ़ साफ़ बताओ; इसकी बातों को छिपाना नहीं" ----- मगर उन लोगों ने अपनी ली हुई प्रतिज्ञा तोड़ डालीऔर (दुनिया के फ़ायदे के लिए) मामूली दाम पर उसका सौदा कर बैठे : कितना बुरा सौदा उन्होंने कर डाला! (187)

जो लोग अपने किए पर ख़ुशी में मगन हैं, और चाहते हैं कि जो काम उन्होंने नहीं किए, उन पर भी उनकी प्रशंसा की जाए, तो ऐसे लोगों के बारे में [ऐ रसूल], आप यह न सोचें कि वे (आनेवाली) यातना से बच जाएँगे; दर्दनाक यातना उनके इंतज़ार में है।  (188)

और (देखो!) आसमानों और ज़मीन का सारा नियंत्रण [बादशाही] अल्लाह के ही पास है; अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त हासिल है।  (189)

जो लोग समझ-बूझ रखते हैं, उनके लिए  सचमुच आसमानों और ज़मीन को पैदा करने मेंऔर दिन रात के बारी-बारी आने-जाने में बड़ी निशानियाँ हैं, (190)

जो खड़े, बैठे और लेटे हुए अल्लाह को याद करते रहते हैंऔर आसमानों और ज़मीन की रचना के बारे में सोच-विचार करते हैं : (फिर वे पुकार उठते हैं,) "हमारे रब! तूने यह सब बिना किसी मक़सद के नहीं पैदा किया है---- तू इन चीज़ों से कहीं ऊँचा है! ---- अतः हमें आग की यातना से बचा ले।  (191)

"हमारे रब, तू जिन्हें आग में डालने का इरादा कर लेगाउन्हें अपमानित कर देगा।  ऐसे ज़ालिमों का कोई मददगार न होगा। (192)

"हमारे रब! हमने एक पुकारनेवाले को ईमान की ओर बुलाते सुना, ---- “लोगो! अपने रब पर विश्वास करो”---- और हम ने विश्वास कर लिया है। हमारे रब! हमारे गुनाहों को माफ़ कर दे, हमारी बुराइयों को मिटा दे, और जब हम दुनिया से जाएं, तो हमें नेक और अच्छे लोगों के साथ शामिल कर दे। (193)

"हमारे रब! वह सारी चीज़ जिनका वादा तूने अपने रसूलों के द्वारा किया हैहमें प्रदान कर और क़यामत के दिन हमें बेइज़्ज़त होने से बचा ---- बेशक, तू अपना वादा कभी नहीं तोड़ता।" (194)

उनके रब ने उनकी पुकार सुनकर जवाब दिया : "मैं तुममें से किसी के भी कर्मों को बेकार जाने नहीं दूँगा, चाहे मर्द हो या औरत, (कर्मों का बदला पाने में) तुम सब एक दूसरे के बराबर हो। मैं उन लोगों के बुरे कर्मों को ज़रूर मिटा दूँगा, जो लोग घर-बार छोड़ कर (मदीना) चले गएअपने घरों से निकाले गए, जिसने मेरे रास्ते में नुक़सान उठाया, जो (दुश्मनों से) लड़े और मारे गए।  मैं उन्हें अवश्य ही ऐसे बाग़ों में दाख़िल करूँगा, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, यह उनके कर्मों का बदला होगा : सबसे अच्छा बदला अल्लाह के ही पास है।" (195)

(ऐ रसूल), विश्वास न करने पर अड़े लोगों का अपने (लाभप्रद) व्यापार के लिए शहरों में  जो आना-जाना लगा रहता है, वह आपको किसी धोखे में न डाल दे : (196)

यह तो बहुत थोड़ी देर की सुख-सामग्री है, फिर तो जहन्नम ही उनका ठिकाना होगा ----वह रहने की कितनी बुरी जगह है! (197)

मगर जो लोग अपने रब से डरते हुए बुराइयों से बचते रहेतो उनके रब की तरफ़ से इनाम के तौर पर, उन्हें ऐसे बाग़ दिए जाएंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी और वे उसी में (हमेशा) रहेंगे। जो कुछ अल्लाह के पास है वह नेक और अच्छे  लोगों के लिए सबसे बेहतर है।  (198)

किताबवालों में से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अल्लाह पर सच्चा ईमान रखते हैं, और उस किताब पर भी (ईमान रखते हैं) जो तुम पर उतारी गई है, और उन किताबों पर भी जो उन पर उतारी गयी थी : उनके दिल अल्लाह के आगे झुके रहते हैं, वे कभी भी अल्लाह की आयतों को मामूली दामों में नहीं बेचेंगे। इन लोगों को उनके रब के पास से अच्छा इनाम मिलेगा : (याद रहे), अल्लाह (कर्मों का) हिसाब लेने में बहुत तेज़ है। (199)

ऐ ईमान रखनेवालो! धीरज [सब्र]] से काम लोधीरज रखने में दूसरों से आगे बढ़ जाओ; (नमाज़ के लिए और हमले को बेकार करने के लिए) तैयार रहा करो; (हर हाल में) अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहोताकि तुम (अपने मक़सद में) कामयाब हो सको। (200)






सूरह 33 : अल-अहज़ाब [(मक्का और दूसरे क़बीलों की) मिली-जुली सेना / The Joint Forces]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ नबी! अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहें, और विश्वास न करनेवालों और पाखंडियों [मुनाफ़िक़/Hypocrites] का कहना न मान लें : अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बेहद समझ-बूझवाला है। (1)
आपके रब ने आप पर जो कुछ उतारा है, (उसे सही मानते हुए) उसके पीछे चलें : जो कुछ भी आप करते हैं, अल्लाह उन्हें अच्छी तरह से जानता है। (2)
अल्लाह पर भरोसा रखें : काम बनाने के लिए अल्लाह ही काफ़ी है।  (3)
अल्लाह ने किसी आदमी के सीने में दो दिल पैदा नहीं किए। तुम जो [ज़िहार करते हुए] अपनी बीवियों को यह कह कर ठुकरा देते हो कि अब तुम्हारी पीठ मेरी माँ जैसी हो गयी, तो अल्लाह उन (बीवियों) को तुम्हारी असली माँ तो नहीं बना देता; और न उसने तुम्हारे मुँह बोले बेटों को तुम्हारा असली बेटा बनाया है। ये तो तुम्हारे मुँह की (कहीं हुई) बातें है, जबकि अल्लाह सच्ची बात कहता है और लोगों को सही मार्ग दिखाता है। (4)
अपने (गोद लिए या) मुँह बोले बेटों को उनके असली बापों के नाम से पुकारा करो : अल्लाह के नज़दीक यह अधिक न्यायसंगत बात है------ अगर तुम नहीं जानते कि उनके असल बाप कौन हैं, तो फिर वे (एक ही धर्म के होने के कारण) तुम्हारे 'दीनी भाई' हैं, और तुम्हारे साथी हैं। तुम से अगर कोई भूल-चूक हो जाए तो इसके लिए तुम्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा, (गुनाह तभी होगा) जब तुम दिल से जान बूझ कर कुछ (ग़लत काम) करते हो; अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (5)
यह जो नबी हैं, वह ईमानवालों के ज़्यादा नज़दीक (और उनका ख़्याल रखनेवाले) हैं, इतनी नज़दीकी तो उनकी आपस में भी नहीं है, और नबी की बीवियाँ सभी ईमानवालों की माँएं [mothers] हैं। अल्लाह की किताब के अनुसार, (संपत्ति के बँटवारे में) ख़ूनी रिश्तेदारों का हक़, दूसरे ईमानवालों और बाहर से आकर बसे (मुहाजिरों) से कहीं ज़्यादा है, हालाँकि तुम तब भी अगर चाहो, तो अपने साथियों को कुछ तोहफ़े (वसीयत कर के) दे सकते हो। यह सारी बातें किताब में लिखी हुई हैं। (6)

और [ऐ रसूल!], याद करें जब हमने नबियों से वचन लिया था------ आप से, नूह से, इबराहीम से, मूसा से, मरयम के बेटे ईसा से------ हम ने सभी से पक्का वचन लिया था : (7)
अल्लाह सच्चे लोगों से (भी) उनकी सच्चाई व ईमानदारी के बारे में पूछताछ करेगा, और सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए उसने दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है। (8)

ऐ ईमानवालो! याद करो अल्लाह ने तुम पर उस वक़्त कैसा करम किया था, जब तुम्हारे ख़िलाफ़ बहुत बड़ी व मज़बूत सेना चढ़ आयी थी : हम ने उनके ख़िलाफ़ भयानक आँधी भेजी और साथ में ऐसे लश्कर भेजे जो दिखायी नहीं देते थे। जो भी तुम करते हो, अल्लाह सब कुछ देखता है। (9)
('अहज़ाब की जंग' का समय याद करो) जब वे (इकट्ठा होकर) तुम्हारे ख़िलाफ़ ऊपर से भी और तुम्हारे नीचे से भी (यानी चारो ओर से) चढ़ आए थे; जब आँखें (डर से) पत्थरा गयी थीं, और कलेजे मुँह को आ लगे थे, और तुम अल्लाह के बारे में तरह-तरह की (ग़लत) बातें सोचने लगे थे।  (10)
उस समय ईमानवालों को बड़ी कड़ी परीक्षा में डाला गया था और वे अंदर तक हिला दिए गए थे : (11)
पाखंडियों [Hypocrites] ने और उनलोगों ने जिनके दिलों में रोग था, कहने लगे, "अल्लाह और उसके रसूल ने हम से जो वादा किया था, वह धोखे के सिवा कुछ न था!" (12)
उनमें से कुछ लोगों ने कहा, "ऐ यसरिब [मदीना] के लोगो!, तुम इस (हमले) के सामने टिक नहीं पाओगे, अतः लौट जाओ!" और उन्हीं में से कुछ लोग नबी से यह कहकर (मैदान छोड़ कर जाने की) अनुमति माँगने लगे कि "हमारे घर असुरक्षित हैं।" हालाँकि वे असुरक्षित न थे----- वे तो बस चाहते थे कि वहाँ से भाग खड़े हों।  (13)
अगर उस शहर पर चारों तरफ़ से हमला हुआ होता, और दुश्मनों ने उन (पाखंडियों) से विद्रोह कर देने का न्यौता दिया होता, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसा ज़रूर कर डालते! (14)
हालाँकि वे इससे पहले ही अल्लाह को वचन दे चुके थे कि वे (जंग की हालत में) पीठ फेर कर नहीं भागेंगे, और (याद रहे) अल्लाह से किए गए वादे के बारे में तो उन्हें जवाब देना होगा। (15)
[ऐ रसूल!] आप कह दें, "भागने से तुम्हें कोई फ़ायदा नहीं होगा। अगर तुम मौत से या क़त्ल हो जाने से बच भी जाओ, तो भी तुम्हें थोड़ी ही देर के लिए (ज़िंदगी के) मज़े उठाने का मौक़ा दिया जाएगा।" (16)
कह दें, "अगर अल्लाह तुम्हें नुक़सान पहुँचाना चाहे, तो कौन है जो तुम्हें बचा सकता है? और अगर अल्लाह तुम पर अपनी दयालुता [रहमत] दिखाना चाहे, तो उसे कौन रोक सकता है?" उन्हें कोई ऐसा नहीं मिलेगा सिवाए अल्लाह के, जो उन्हें बचा सके, या उनकी मदद कर सके।  (17)

अल्लाह अच्छी तरह जानता है कि तुम में से कौन है जो दूसरों को (युद्ध में जाने से) रोकता है, जो अपने भाइयों से (अकेले में) कहता है, "आओ, हमारे साथ शामिल हो जाओ", जो शायद ही कभी युद्ध में लड़ने के लिए आता है,  (18)
जो तुम्हारी [ईमानवालों की] शायद ही कभी कोई मदद करता है। जब (युद्ध में) कोई ख़तरा दिखायी पड़ता है, तो [ऐ रसूल] आप देखेंगे कि वे (मारे डर के) आपकी तरफ़ चकरायी हुई आँखों से ताक रहे हैं मानो उनपर मौत की बेहोशी छा रही हो; फिर जब ख़तरे की घड़ी गुज़र जाती है, तो वे (माल की लालच में) आप पर अपनी तेज़ धार ज़बान से हमले करने लगते हैं और शायद ही कभी कोई भलाई करते हों। ऐसे लोग ईमान नहीं रखते, और अल्लाह ने उनके सब किए धरे कर्म बर्बाद कर दिए हैं ------  और यह अल्लाह के लिए बहुत ही आसान है। (19)
वे समझते हैं कि (शत्रुओं की) मिली-जुली सेना अभी तक गयी नहीं है, और अगर वह संयुक्त सेना [Joint force] सचमुच फिर से आ जाए, तो वे चाहेंगे कि काश वे (यहाँ से दूर) रेगिस्तान में हों, और बद्दुओं [Bedouin] के साथ यहाँ-वहाँ मारे फिरें, और (दूर से ही) तुम्हारे बारे में ख़बर लेते रहें। [ईमानवालो], अगर वे तुम्हारे साथ होते भी, तब भी उन लोगों ने लड़ाई में शायद ही हिस्सा लिया होता। (20)
निस्संदेह अल्लाह के रसूल एक बेहतरीन आदर्श [Model] हैं, हर उस आदमी के लिए, जो अल्लाह और अन्तिम दिन [क़यामत] पर अपनी उम्मीद रखता हो, और अल्लाह को बराबर याद करता हो।  (21)

(दूसरी तरफ़) जब ईमान रखनेवालों ने (दुश्मनों की) मिली-जुली सेना को देखा, तो वे कहने लगे, "यह तो वही चीज़ है, जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वादा किया था : अल्लाह और उसके रसूल का वादा सच्चा होता है," इस घटना ने उनके ईमान और उनकी भक्ति को और बढ़ा दिया। (22)
ईमान रखनेवालों में ऐसे लोग मौजूद हैं जिन्होंने अल्लाह से की गयी प्रतिज्ञा को पूरी तरह से निभाया : उनमें से कुछ ने अपनी प्रतिज्ञा अपनी जान दे कर पूरी कर दी, और कुछ लोग अभी भी इंतज़ार में हैं। उनके (इरादों में) ज़रा भी बदलाव नहीं आया। (23)
(वे ऐसी परीक्षाओं में इसलिए डाले गए) ताकि अल्लाह सच्चे व अच्छे लोगों को उनकी सच्चाई का इनाम दे सके और अगर अल्लाह चाहे, तो पाखंडियों को सज़ा दे सके, या उनकी तौबा क़बूल कर ले, कि अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (24)
अल्लाह ने (तेज़ आँधी के द्वारा) विश्वास करने से इंकार करनेवालों को उनके सारे ग़ुस्से के साथ वापस भेज दिया----- उन्हें कोई फ़ायदा हासिल न हुआ----और ईमानवालों को युद्ध करने से बचा लिया। अल्लाह बहुत मज़बूत, प्रभुत्वशाली है। (25)
किताबवालों [बनू क़ुरैज़ा नामक यहूदी क़बीले] में से जिन लोगों ने उन (दुश्मनों) की मदद की थी, अल्लाह ने उन्हें अपने मज़बूत क़िलों (की लम्बी घेराबंदी के बाद वहाँ) से नीचे आने पर मजबूर कर दिया और उनके दिलों में घबराहट डाल दी। उनमें से कुछ को तुम ने क़त्ल कर दिया और कुछ को बन्दी बना लिया। (26)
अल्लाह ने तुम्हें उनकी ज़मीनें दे दीं, उनके घर दे दिए, उनके माल-असबाब दे दिए, और वह (ख़ैबर का) इलाक़ा भी दे दिया जहाँ अभी तक तुम ने अपना क़दम नहीं रखा था : अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है।  (27)

ऐ नबी! आप अपनी बीवियों से कह दें, "अगर इस दुनिया की ज़िन्दगी और उसकी सजधज ही तुम्हारी आरज़ू है, तो आओ, मैं तुम्हें कुछ दे-दिलाकर भले तरीक़े से विदा कर दूँ, (28)
"लेकिन अगर तुम अल्लाह, उसके रसूल और आख़िरत के घर को पाना चाहती हो, तो याद रखो, कि अल्लाह ने तुम में से अच्छा कर्म करने वालों के लिए बड़ा इनाम तैयार रखा है।" (29)
ऐ नबी की बीवियो! तुम में से कोई भी अगर खुले तौर पर कोई अनुचित कर्म [indecency] कर बैठे, तो (याद रखो) उसे दोहरी सज़ा होगी---- और यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है--- (30)
लेकिन तुम में से कोई भी अगर अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा माननेवाली हुई, और उसने अच्छे कर्म किए, तो यह जान लो कि हम उसे दोहरा इनाम देंगे, और उसके लिए हमने दिल खोलकर रोज़ी तैयार कर रखी है।  (31)

ऐ नबी की बीवियो! तुम किसी भी दूसरी सामान्य औरत की तरह नहीं हो. अगर तुम अल्लाह का डर रखते हुए सचमुच बुराइयों से बचना चाहती हो, तो इतनी नर्मी और प्यार से बातें न किया करो, कहीं ऐसा न हो कि कोई दिल से बीमार आदमी तुम्हें पाने की लालच में पड़ जाए, सो लोगों से उचित तरीक़े से बात किया करो; (32)
अपने घरों के अंदर रहो, और अपनी सजधज (दूसरों के सामने) दिखाती न फिरो जैसा कि (अरब में) जाहिलियत के ज़माने में औरतें किया करती थीं; नमाज़ पाबंदी से पढा करो, उचित मात्रा में ज़कात दो, और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो। अल्लाह तो चाहता है कि ऐ नबी के घरवालो, तुम से (हर तरह की) गंदगी को दूर रखें, और तुम्हें पूरी तरह शुद्ध व साफ़ रखें। (33)
तुम्हारे घरों में अल्लाह की जो आयतें और समझ-बूझ की बातें पढ़कर सुनाई जाती हैं, उन्हें याद करती रहो, कि अल्लाह छोटी से छोटी चीज़ देखनेवाला, हर चीज़ की ख़बर रखनेवाला है। (34)

वैसे मर्द और औरतें जो अल्लाह की भक्ति में डूबे हुए हैं-------ईमान रखनेवाले मर्द और ईमानवाली औरतें, आज्ञा माननेवाले मर्द और आज्ञाकारी औरतें, सच्चे मर्द और सच्ची औरतें, धीरज रखनेवाले मर्द और सब्र करनेवाली औरतें, दिल से झुके हुए विनम्र मर्द और विनम्र औरतें, दान करनेवाले मर्द और दान करनेवाली औरतें, उपवास (रोज़ा) रखनेवाले मर्द और रोज़ा रखनेवाली औरतें, (अवैद्ध लोगों के साथ संबंध बनाने से) संयम रखनेवाले मर्द और संयमी औरतें,  वेसे मर्द और औरतें जो अल्लाह को अक्सर याद करते हैं-------- इन सब के लिए अल्लाह ने माफ़ी और बहुत शानदार इनाम तैयार कर रखा है। (35)

जब अल्लाह और उसके रसूल ने उनलोगों से जुड़े किसी मामले में फ़ैसला कर दिया हो, तो ईमान रखनेवाले किसी मर्द या औरत के लिए यह उचित नहीं होगा कि उस मामले में वे अपनी मनमानी करने का दावा करें : जिस किसी ने अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा नहीं मानी, तो वह बड़ी गुमराही में पड़ गया। (36)
[ऐ रसूल! याद करें] उस (ज़ैद नाम के) आदमी को, जिस पर अल्लाह ने और आप ने भी ख़ास मेहरबानी की थी, जिससे आपने कहा था, "अपनी बीवी को (छोड़ न दो, बल्कि) अपनी बनाए रखो और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचो," आपने अपने दिल में वह बात छिपायी, जिसे अल्लाह बाद में उजागर करने वाला था : आप लोगों से डरे हुए थे (कि वे बातें बनाएंगे), मगर ज़्यादा उचित यह है कि आप अल्लाह से डरें। जब (आपके गोद लिए बेटे) ज़ैद ने अपनी बीवी से रिश्ता तोड़ लिया, तो हमने उसकी बीवी की शादी आप से कर दी, ताकि ईमानवालों को अपने मुँह बोले बेटों की बीवियों से शादी करने में दोषी न समझा जाए, जबकि वे (मुँह बोले बेटे) अपनी बीवियों को छोड़ चुके हों। अल्लाह का आदेश पूरा करना ही था : (37)
अल्लाह ने अपने नबी के लिए जो बात तय कर दी है, उस काम में नबी का कोई दोष नहीं है। यही अल्लाह का दस्तूर था जो उन (नबियों) के मामले में भी रहा है जो पहले गुज़र चुके हैं ---- अल्लाह के आदेश का पालन करना ज़रूरी है------ (38)
(और ऐसा ही मामला सभी रसूलों के साथ भी रहा है) जो अल्लाह का सन्देश लोगों तक पहुँचाते हैं, और केवल अल्लाह से डरते हैं और उसके सिवा किसी से नहीं डरते : हिसाब लेने के लिए अल्लाह ही काफ़ी है। (39)
मुहम्मद तो तुम लोगों में से किसी के बाप नहीं हैं; वह अल्लाह के रसूल हैं और नबियों के सिलसिले के सबसे आख़िरी नबी [Prophet] हैं : अल्लाह हर चीज़ जानता है। (40)
ईमान रखनेवालो! अल्लाह को अक्सर याद किया करो  (41)
और उसकी बड़ाई का बखान सुबह और शाम किया करो :  (42)
वही है जो तुम पर ख़ुद भी रहमत भेजता रहता है, और उसके फ़रिश्ते भी (दुआएँ करते हैं), ताकि वह तुम्हें गहरे अँधरों से निकाल कर रौशनी में ले आए। वह ईमानवालों पर हमेशा ही बहुत मेहरबान है---- (43)
जिस दिन वे अल्लाह से मिलेंगे, उनका स्वागत "सलाम" से होगा---- और अल्लाह ने उनके लिए बड़ा इनाम तैयार कर रखा है। (44)

ऐ नबी! हमने आपको गवाह बनाकर भेजा है, साथ में, (ईमान व अच्छे कर्म की) ख़ुशख़बरी देनेवाला और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान करनेवाला,  (45)
और अल्लाह के हुक्म से लोगों को उसकी ओर बुलानेवाला, और एक रौशनी फैलानेवाले चिराग़ की तरह बनाकर भेजा है।  (46)
आप ईमानवालों को इस बात की ख़ुशख़बरी दे दें कि उनपर अल्लाह की तरफ़ से एक बहुत बड़ा फ़ज़ल [bounty] होनेवाला है। (47)
विश्वास न करनेवालों और पाखंडियों की बातें (तंग आकर) मान न लें : जो तकलीफ़ वे आपको पहुँचाते हैं, उनपर ध्यान न दें और अल्लाह पर भरोसा रखें। भरोसा करने के लिए अल्लाह काफ़ी है। (48)

ऐ ईमानवालो! जब तुम ईमान रखनेवाली औरतों से शादी के बाद उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो, तो तुम्हें कोई हक़ नहीं है कि उनके लिए इद्दत की अवधि [waiting period] गुज़रने का इंतजार करो : उन्हें तोहफ़े में कुछ सामान दे दो और इज़्ज़त से विदा कर दो। (49)
ऐ नबी! हमने आपके लिए ऐसी बीवियाँ वैध कर दी हैं----- जिनकी मेहर [marriage gifts] आपने अदा कर दी हो, और अल्लाह ने (युद्ध के बाद) जो दासियाँ आपके हाथ लगा दी हों, और आपके चाचा की बेटियाँ और आपकी फूफियों की बेटियाँ और आपके मामुओं की बेटियाँ और आपकी ख़ालाओं की बेटियाँ जिन्होंने आपके साथ (मदीना में) हिजरत की है, और (इसके अलावा) वह ईमानवाली औरत जिसने ख़ुद नबी से (बिना मेहर के) शादी करने का प्रस्ताव दिया हो, और अगर नबी उससे शादी करना चाहें------- ये सब (हुक्म) केवल आपके लिए है, बाक़ी ईमानवालों के लिए नहीं है : हम ठीक-ठीक जानते हैं, कि हम ने उन (ईमानवालों) की बीवियों और दासियों के मामले में उनके लिए क्या क्या ज़रूरी ठहरा दिया है ---- अत: आपको दोष नहीं देना चाहिए : अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (50)
उन (बीवियों) में से जिसे चाहें, (पारी के हिसाब से) अपने से अलग रखें, और जिसे चाहें, अपने पास बुलाएं, मगर जिनको आपने (पारी के हिसाब से) अलग रखा हुआ था, उनमें से अगर किसी को (पहले) बुलाना चाहते हों, तो इसमें भी आप पर कोई गुनाह नहीं है : इस तरीक़े से इस बात की अधिक सम्भावना है कि वे [बीवियाँ] संतुष्ट रहेंगी और दुखी नहीं होंगी, और जो कुछ आप उन्हें देंगे, उस पर वे राज़ी- ख़ुशी से रहेंगी। अल्लाह जानता है जो कुछ तुम्हारे दिलों में है : अल्लाह हर चीज़ का जाननेवाला, बहुत सहनशील है। (51)
इसके बाद (ऐ रसूल), आपको अब और किसी दूसरी औरत (से शादी) की इजाज़त नहीं, और न अपनी बीवियों के बदले किसी और से शादी की इजाज़त है, भले ही उनकी ख़ूबसूरती आपको कितनी ही भा जाए। हां, मगर यह नियम आपकी दासियों पर लागू नहीं होते : अल्लाह हर चीज़ पर नज़र रखनेवाला है। (52)

ऐ ईमानवालो! नबी के घरों में खाने के लिए यूँ ही न चले जाओ, जब तक कि तुम्हें ऐसा करने की इजाज़त न दी जाए; (अगर जाओ भी, तो) बहुत पहले ही से (खाना पकने तक) न बैठे रहो। जब तुम्हें (खाने पर) बुलाया जाए, तो अन्दर जाओ; और जब तुम खाना खा चुको, तो फिर उठकर चले जाओ. देर तक बैठकर बातें न करते रहो, क्योंकि इससे नबी को तकलीफ़ होती है, हालाँकि वह संकोच के कारण तुम से चले जाने को नहीं कहते हैं. मगर अल्लाह को सच्चाई कहने में कोई संकोच नहीं है। जब तुम्हें नबी की बीवियों से कुछ माँगना हो, तो उनसे परदे के पीछे से माँगो : यह ज़्यादा पाकीज़ा तरीक़ा है, तुम्हारे दिलों के लिए भी और उनके दिलों के लिए भी। तुम्हारे लिए यह सही नहीं होगा कि तुम अल्लाह के रसूल को तकलीफ़ पहुँचाओ, और उसी तरह यह भी सही नहीं होगा कि उनके बाद कभी भी उनकी बीवियों से शादी करो : यह अल्लाह की नज़र में बड़ी गम्भीर बात है। (53)
तुम चाहे किसी चीज़ को ज़ाहिर करो या उसे छिपाओ, अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है।  (54)
नबी की बीवियों को परदे में न होने पर कोई दोष न होगा, अगर वे अपने बापों के सामने होती हों, या अपने बेटों, अपने भाइयों, अपने भतीजों, अपने भांजो, अपने जैसी औरतों, और अपनी दासियों के सामने होती हों। (नबी की बीवियों!), अल्लाह का डर रखो, अल्लाह हर चीज़ पर नज़र रखता है। (55)
अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत [दुरूद] भेजते रहते हैं---- तो, ऐ ईमानवालो, तुम भी उन पर रहमत भेजा करो, और उन्हें ख़ूब सलाम भेजा करो। (56)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल की बेइज़्ज़ती करते हैं, वे इस दुनिया में और आने वाली दुनिया में भी अल्लाह द्वारा ठुकरा दिए जाएंगे। अल्लाह ने उनके लिए अपमानित करने वाली यातना तैयार कर रखी है------ (57)
जो लोग ईमानवाले मर्दों और औरतों को, बिना किसी सही कारण के, अपमानित करते हैं, उन्हें झूठा इल्ज़ाम लगाने और साफ़ गुनाह करने के जुर्म की सज़ा भुगतनी होगी। (58)

ऐ नबी! आप अपनी बीवियों, अपनी बेटियों और ईमानवाली औरतों से कह दें, कि वे (घर से बाहर निकलते वक़्त) ऊपर से पहने जानेवाले कपड़े [Outer garments] को इस तरह ओढ़ लें कि वह नीचे तक लटकता रहे, ताकि वे (शरीफ़ औरतों के रूप में) पहचान ली जाएं और कोई उनके साथ छेड़-छाड़ न करे : अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (59)
पाखंडी लोग, और ऐसे लोग जिन्होंने दिल में बीमारी पाल रखी है, और वे लोग जो मदीना शहर में झूठी अफ़वाहें फैलाते रहते हैं, अगर वे अपनी हरकतों से बाज़ न आए, तो (ऐ रसूल), हम आपको उनके ख़िलाफ़ खड़ा कर देंगे, और तब वे इस शहर में आपके पड़ोसी बनकर बहुत कम ही समय के लिए रह पाएंगे। (60)
उन्हें ठुकरा दिया जाएगा। जहाँ कहीं भी वे मिलेंगे, पकड़ लिए जाएँगे और (शांति स्थापित करने के लिए) एक-एक करके जान से मार दिए जाएँगे। (61)
जो पहले गुज़र चुके, उनके साथ भी अल्लाह की यही रीति रही है। अल्लाह की रीतियों में तुम कोई बदलाव नहीं पाओगे। (62)

[ऐ रसूल], लोग आपसे (क़यामत की) घड़ी के बारे में पूछते हैं। कह दें, "इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह के ही पास है।" आप कैसे जान सकते हैं? शायद वह घड़ी नज़दीक ही हो। (63)
विश्वास करने से इंकार करनेवालों को अल्लाह ने ठुकरा दिया है और उनके लिए भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है।  (64)
उसी में वे हमेशा रहेंगे। न कोई वहाँ होगा जिसे वे दोस्त बना सकें, और न कोई उन्हें सहारा देनेवाला होगा।  (65)
उस दिन जब (जहन्नम की) आग में उनके चहरे उलट-पलट किए जाएँगे, तो वे कहेंगे, "काश! हम ने अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानी होती!" (66)
और वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमने अपने बड़ों और सरदारों की बात मानी, और उन्होंने हमें मार्ग से भटका दिया। (67)
"ऐ हमारे रब! तू उन्हें दोहरी सज़ा दे और उन्हें पूरी तरह से ठुकरा दे !" (68)

ऐ ईमानवालो! उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने मूसा [Moses] को अपमानित किया था---- अल्लाह ने उन लोगों द्वारा लगाए गए इल्ज़ाम से उन्हें  बरी कर दिया, और अल्लाह की नज़र में मूसा ऊंचे रुतबे वाले थे। (69)
ऐ ईमानवालो! अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, सीधी व साफ़ बात कहो, जिसका मक़सद भी अच्छा हो, (70)
और अल्लाह तुम्हारे भले के लिए तुम्हारे कर्मों को सँवार देगा और तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा। जिस किसी ने अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मान ली, तो उसने सचमुच बहुत बड़ी कामयाबी हासिल कर ली।  (71)
हमने आसमानों, ज़मीन और पहाड़ों के सामने (समझ-बूझ और नैतिक ज़िम्मेदारी की) 'अमानत '[Trust] उठाने का प्रस्ताव रखा, मगर वे इस ज़िम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार न हुए, और इससे डर गए; आदमी इस (अमानत) को उठाने के लिए तैयार हो गया ------सचमुच वह हमेशा से ही अयोग्य और बेवक़ूफ़ रहा है।  (72)
अल्लाह पाखंडी [Hypocrites] और मूर्तिपूजक [Idolators] मर्दों और औरतों (दोनों) को दंड देगा, और ईमान रखनेवाले मर्दों और औरतों (दोनों) पर अपनी ख़ास रहमत [Mercy] की नज़र डालेगा : अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (73)



सूरह 60 : अल मुमतहिना [जाँच-परख की गयी औरतें/ The Women Tested]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ ईमान वालो! मेरे दुश्मनों और अपने दुश्मनों को अपना सहयोगी [Allies] न बना लो, कि उनके साथ दोस्ती का रिश्ता निभाने लग जाओ, जबकि जो सच्चाई तुम्हारे पास (रब की तरफ़ से) आयी है, उसे तो वे मानने से इंकार कर चुके हैं। उन्होंने तुम्हें और (तुम्हारे) रसूल को केवल इसलिए (मक्का से) बाहर निकाल दिया कि तुम ने अपने रब, अल्लाह पर विश्वास [ईमान] कर लिया? अगर तुम सचमुच मेरे रास्ते में संघर्ष [जिहाद] के लिए और मेरी ख़ुशी की तलाश में (घर से दूसरी जगह के लिए) निकले हो, तो फिर (अब) तुम चोरी-छिपे उनसे दोस्ती की बातें (क्यों) करते हो?-------(याद रहे) जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ सामने ज़ाहिर करते हो, मैं सब कुछ जानता हूँ-----तुम में से कोई भी अगर ऐसा करता है, तो सचमुच वह सीधे रास्ते से भटक गया है।  (1)

अगर वे तुम पर हावी हो जाएँ, तो (देखना) वे फिर से तुम्हारे दुश्मन बन जाएँगे और तुम्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए अपने हाथ और ज़बान फैलाने लगेंगे; उनकी तो यह दिली ख़्वाहिश है कि तुम (एक अल्लाह में) ईमान [विश्वास] रखना छोड़ दो। (2)

क़यामत के दिन न तो तुम्हारी रिश्तेदारियाँ तुम्हारे कोई काम आएंगी और न तुम्हारी औलाद : वह [अल्लाह] तुम्हें [ईमानवाले और काफ़िरों में) अलग-अलग कर देगा। जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा होता है। (3)

तुम लोगों (की सीख) के लिए इबराहीम और उनके साथियों में एक अच्छा उदाहरण है, जब उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा था,  "हम तुम (लोगों) का और जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, उन (सब) का त्याग करते हैं! हम तुम्हें मानने से साफ़ इंकार करते हैं! हमारे और तुम्हारे बीच हमेशा के लिए दुश्मनी और नफ़रत पैदा हो चुकी है, और यह उस समय तक रहेगी जब तक कि तुम एक अल्लाह पर विश्वास न कर लो" -----हाँ, मगर इूबराहीम ने अपने बाप से यह ज़रूर कहा था कि "मैं आपके लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ करूँगा, हालाँकि मैं आपको अल्लाह से बचा नहीं सकता"------[ईमानवालों ने  दुआएं की], "ऐ रब! हमने तुझ पर ही भरोसा किया; तौबा के लिए हम तेरी ही सामने झुकते हैं; और तेरी ही पास अन्त में लौट कर हमें जाना है। (4)

ऐ हमारे रब! हमें विश्वास न करनेवालों के हाथों होनेवाले दुर्व्यवहार का सामना करने से बचा. ऐ रब! हमें माफ़ कर दे, सचमुच तू ही बेहद ताक़तवाला, और समझ-बूझवाला है।" (5)

सचमुच [ऐ ईमानवालो!], तुम्हारे लिए वे अच्छा उदाहरण हैं जिनके रास्ते पर तुम्हें चलना चाहिए, और हर उस आदमी के लिए भी वे अच्छा उदाहरण हैं जो अल्लाह और अंतिम दिन का डर रखता हो। अगर कोई उससे मुँह मोड़ता है, तो (याद रखो) अल्लाह (को किसी की ज़रूरत नहीं, वह) तो आत्मनिर्भर [Self-sufficing], और सारी तारीफ़ों के लायक़ है। (6)

हो सकता है कि अल्लाह अब भी तुम और तुम्हारे मौजूदा दुश्मनों के बीच (कुछ समय बाद) प्रेम का भाव पैदा कर दे----- अल्लाह बहुत ज़्यादा ताक़तवाला, बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है------ (7)

और अल्लाह तुम्हें इस बात से नहीं रोकता कि तुम किसी के साथ अच्छा व्यवहार करो, और उसके साथ इंसाफ़ करो जिसने तुम से धर्म [Faith] के नाम पर युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया : अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है। (8)

मगर अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों को अपना दोस्त बनाने से रोकता है जिन्होंने धर्म के नाम पर तुम से युद्ध किया, तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया, और तुम्हें निकलवाने में दूसरों की मदद की : तुम में से कोई भी अगर इन्हें अपना सहयोगी बनाता है, तो वह सचमुच ही ज़ालिमों में होगा। (9)

ऐ ईमानवालो! जब तुम्हारे पास (मक्का से) हिजरत [migration] कर के ऐसी औरतें (मदीना में) आ जाएं जो यह दावा करती हों कि वे ईमानवाली हैं, तो तुम उन्हें जाँच-परख लिया करो---- यूँ तो अल्लाह उनके ईमान के बारे में अच्छी तरह जानता है---- और अगर तुम्हें उनके ईमान पर यक़ीन हो जाए, तो उन्हें विश्वास न करनेवालों [Disbelievers/ काफ़िरों] के पास वापस मत भेजो : ये औरतें (अब) उनके लिए जायज़ [lawful] बीवियां नहीं रह गयीं, और न ही अब वे काफ़िर [Disbelievers], उनके जायज़ [lawful] पति होंगे। जो कुछ उन काफ़िर (पतियों) ने मेहर [bride-gift] के तौर पर (अपनी बीवी पर) ख़र्च किया हो, तुम उनके पतियों को उतना वापस कर दो-------अगर तुम उन (औरतों) से शादी करना चाहते हो, तो इसमें तुम्हारे लिए कोई बुराई की बात नहीं है, अगर तुम एक बार उन्हें मेहर अदा कर दो----और काफ़िर औरतों के साथ अब तुम ख़ुद भी शादी के बंधन को बनाए मत रखो। इनके लिए जो कुछ मेहर [bride-gift] तुमने अदा की थी, उसे काफ़िरों से मांग लो। और उन्हें भी चाहिए कि जो कुछ उन्होंने (अपनी बीवियों पर) ख़र्च किया हो, वह (तुम लोगों से) माँग लें। यह अल्लाह का आदेश है : वह तुम्हारे बीच फ़ैसला करता है, और अल्लाह सब जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (10)

अगर तुम्हारी बीवियों में से कोई तुम्हें छोड़ कर काफ़िरों [Disbelievers] के पास चली गयी हो (और उनसे मेहर की रक़म वापस मिलने की उम्मीद न हो), और फिर अगर तुम्हारे समुदाय के लोगों को (काफिरों से) जंग के बाद कुछ माल हाथ आ गया हो, तो उस (माल में) से उन (पतियों) को उतनी रक़म दे दो जितनी उन्होंने अपनी (छोड़कर गयी) बीवियों पर मेहर के तौर पर ख़र्च किया होगा। और (देखो!) अल्लाह का डर रखो, जिसपर तुम ईमान रखते हो। (11)

ऐ रसूल! जब ईमान रखनेवाली औरतें आपके पास आकर इस बात की क़सम खाएं कि वे अल्लाह के साथ किसी चीज़ को (उसकी ख़ुदाये में) साझेदार [Partner] नहीं ठहराएँगी, न चोरी करेंगी, न किसी ग़ैर-मर्द के साथ मुँह काला [adultery] करेंगी, न अपने बच्चों की हत्या करेंगी, और न अपने हाथ और पैरों के बीच झूठी बातें गढ़ेंगी, (अर्थात, इस बात में झूठ नहीं कहेंगी कि उनके बच्चों का बाप कौन है), और न किसी सही चीज़ में आपके हुक्म को मानने से इंकार करेंगी, तो फिर आपको उनके द्वारा ली गयी निष्ठा की क़सम [बै'त] को स्वीकार कर लेना चाहिए, और उनके लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ करनी चाहिए : सचमुच अल्लाह बेहद माफ़ करनेवाला, बहुत दयावान है।  (12)

ऐ ईमानवालो! तुम ऐसे लोगों को अपना सहयोगी [Allies] न बनाओ, जिनसे अल्लाह ग़ुस्सा है : वे आनेवाली ज़िंदगी [आख़िरत/ Hereafter] से कोई आशा नहीं रखते, यहाँ तक कि विश्वास न करनेवाले [काफ़िरों] को उन लोगों (के दोबारा उठाए जाने) की भी कोई उम्मीद नहीं है, जो अपनी क़ब्रों में दफ़न हैं। (13)





सूरह 92 : अल लैल [रात, The Night]

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

रात की क़सम जब वह छा जाए (और हर चीज़ को अपने अंधेरे में छुपा ले), (1)

दिन की क़सम जब उसका उजाला फैल जाए,  (2)

          और उस हस्ती (की) क़सम जिसने (हर चीज में) नर और मादे को पैदा किया!  (3)

          (अपने मक़सद को पाने के लिए) तुम्हारे रास्ते [कर्म व प्रयास] काफ़ी अलग अलग तरह के हैं।  (4)

          अब जिस किसी ने (अल्लाह की राह में) अपना माल दिया, जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचता रहा,  (5)

          जिसने अच्छाई की बात को दिल से माना ---  (6)

           तो हम उसे आराम की मंज़िल [जन्नत] तक पहँचने के लिए रास्ता आसान कर देंगे।  (7)

          और जिस किसी ने (अपने माल को अल्लाह की राह में ख़र्च करने में) कंजूसी  की, और (अल्लाह से) अलग हो कर अपने आप में मगन रहा, (8)

 जिसने अच्छाई की बात को मानने से इंकार किया----  (9)

           तो हम उसे तकलीफ़ की मंज़िल [जहन्नम] तक पहुँचने के लिए रास्ता आसान  कर देंगे, (10)

           और जब वह तबाही (के गड्ढे) में गिरेगा तो उसका माल उसके किसी काम नहीं  आएगा। (11)

 यह सच है कि (सच्ची और सही) राह दिखाना हमारे ज़िम्मे है---- (12)

           (याद रहे!), कि हम इस दुनिया और आनेवाली दुनिया, दोनों के ही मालिक हैं-------  (13)

अत: मैं तुम्हें (जहन्नम की) भड़कती हुई आग से सावधान करता हूँ,  (14)

जिसमें कोई और नहीं, वही अत्यंत दुष्ट व अभागा जलेगा,  (15)

          जिसने (सच्चाई) को मानने से इंकार किया और (रसूल की बातों से) मुँह फेर लिया।  (16)

          उस (आग) से ऐसे बेहद परहेज़गार [Pious] आदमी को दूर रखा जाएगा------ (17) 

          जो अपने मन के मैल को दूर करने के लिए अपना माल (अल्लाह की राह में) देता है, (18)

           हालाँकि किसी का उस पर कोई उपकार नहीं था जिसका वह बदला चुकाता है,  (19)

           बल्कि (वह) तो केवल अपने महान रब की खुशी के लिए (माल खर्च करता है)  ----- (20)

           और वह (अल्लाह के इनाम से) बहुत ख़ुश हो जाएगा। (21)






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