Tuesday, July 8, 2014

सूरह 80 : अबसा [उनकी भौहें तन गयीं/ He Frowned]


सूरह 80: अबसा
[उनकी भौहें तन गयीं/ He Frowned]


01-10: रसूल को उनके बर्ताव पर चेताना 

11-16: लिखी हुई किताब की शक्ति 

17-32: लोग एहसान नहीं मानते 

33-42: अंतिम दिन 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

(रसूल सल. नाराज़ हुए तो) उनकी भौहें तन गयीं, और (उन्होंने) मुँह फेर लिया  (1)

 जब उनके पास एक अंधा (आदमी) आया (जिसने दूसरों के साथ चल रही चर्चा के बीच में आपको टोक दिया) ----  (2)

 और आपको [ऐ रसूल] क्या मालूम, कि शायद (आपके ध्यान देने से) उसकी सोच में और निखार आ जाता,  (3)

या वह (आपकी) नसीहत की बातों पर विचार करता जो उसके लिए लाभकारी होती।  (4)
वह जो अपने आपसे संतुष्ट आदमी है (जिसे लगता है कि उसे किसी की ज़रूरत नहीं!),  (5)
उसे (रास्ते पर लाने के लिए) तो आप उसके पीछे पड़े रहते हैं-------   (6)
हालाँकि अगर उसकी सोच में अच्छाई की भावना की कमी रहती है, तो इसके लिए [ऐ रसूल], आप दोषी नहीं होंगे ------ (7)
मगर वह जो आपके पास (स्वयं अच्छाई की तलाश में) पूरी लगन से आया,  (8)
और (अपने रब से) डरा हुआ (आया),  (9)
तो आपने उस पर ध्यान नहीं दिया।  (10)
(ऐ रसूल! जो सीखना न चाहे उसके पीछे पड़ने की ज़रूरत नहीं), हरगिज़ नहीं! बेशक यह (क़ुरआनी आयतें) तो नसीहत हैं,  (11)
जिसे उन लोगों को सीखना चाहिए, जो सचमुच यह चाहते हैं कि उन्हें सिखाया जाए,  (12)
(यह) प्रतिष्ठित और बहुत बाइज़्ज़त पन्नों में (लिखी हुई) है,  (13)
जिनका स्थान बहुत बुलंद है (और ये) बेहद पवित्र हैं,  (14)
ऐसे लिखनेवालों के हाथों से (आगे पहुंची) हैं,  (15)
जो बड़े इज़्ज़तदार बुज़ुर्ग (और) नेकी करनेवाले (फ़रिश्ते) हैं।  (16)

नष्ट हो जायें (वे सभी इंकार करने वाले)! इंसान कैसा एहसान-फ़रामोश है! (जो इतनी महान नेमत पाकर भी उसका मान नहीं रखता)  (17)
(वह ज़रा सोचे कि) अल्लाह उसे किस चीज़ से पैदा करता है?,  (18)
छोटी सी बूँद (वीर्य, sperm droplet) से पैदा किया, फिर साथ ही उसकी बनावट को ठीक-ठीक अनुपात में (जींस/genes और लिंग के अनुसार) निर्धारित कर दिया,  (19)
फिर (ज़िंदगी जीने और अल्लाह तक पहुँचने का) रास्ता उसके लिए आसान कर दिया।  (20)
फिर उसे मौत दी, फिर उसे क़ब्र में (दफ़न) कर दिया,  (21)
फिर जब वह चाहेगा उसे (दोबारा ज़िंदा करके) उठा खड़ा करेगा।  (22)
सचमुच इस (नाफ़रमान आदमी) ने अपना वह (कर्तव्य) पूरा नहीं किया जिसका उसे (अल्लाह ने) आदेश दिया था।  (23)
आदमी जो कुछ खाता है, उस पर ही विचार कर ले!  (24)
हम काफ़ी मात्रा में पानी बरसाते हैं  (25)
और फिर हम ज़मीन को चीर डालते हैं।  (26)
फिर हम इसमें अनाज उगाते हैं,  (27)
और अंगूर और तरकारी,  (28)
और ज़ैतून और खजूर,  (29)
और घने-घने बाग़,  (30)
और (तरह-तरह के) फल-मेवे और (जानवरों का) चारा: (31)
ये सारी चीज़ें तुम और तुम्हारे पालतू जानवरों के लिए ज़िंदगी के मज़े लेने के हैं।  (32)
 
फिर जब कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ [क़यामत] आ जाएगी ---- (33)
उस दिन आदमी भाग खड़ा होगा अपने भाई से,  (34)
अपनी माँ और अपने बाप से,  (35)
अपनी पत्नी और अपने बच्चों से (भी): (36)
उस दिन हर एक को अपनी-अपनी ही पड़ी होगी:   (37)
उस दिन कई चेहरे (ऐसे भी होंगे जो नूर से) चमक रहे होंगे,  (38)
(वह) मुस्कुराते, हँसते (और) खुशियाँ मनाते होंगे,  (39)
मगर कई चेहरे ऐसे होंगे जिन पर उस दिन धूल पड़ी होगी,  (40)
(और) उन (चेहरों) पर कालिख छायी होगी:  (41)
यही लोग काफ़िर [सच्चाई का इंकार करनेवाले], मनमानी करनेवाले (और) दुराचारी होंगे। (42)
 
 
 
नोट: 

1: यह आयत एक ख़ास घटना के बारे में उतरी थी। हुआ यह कि एक दिन मुहम्मद साहब (सल्ल) क़ुरैश कबीले के कुछ बड़े सरदारों को अल्लाह का संदेश पहुँचाने के लिए उनके साथ बातें कर रहे थे कि इतने में आपके पास एक साहब आ गए जो आँख से देख नहीं सकते थे,  उन्होंने आते ही मुहम्मद साहब से कुछ सिखाने का अनुरोध शुरू कर दिया जो आपको पसंद नहीं आया क्योंकि दूसरों के साथ चल रही बातचीत में उन्होंने व्यवधान डाला था। मुहम्मद साहब की भौवें तन गयीं और आपने उनकी बात का जवाब नहीं दिया और मक्का के सरदारों के साथ अपनी बातचीत जारी रखी। जब वे लोग चले गए तो यह सूरह उतरी जिसमें अल्लाह ने मुहम्मद साहब के इस बर्ताव को नापसंद किया जो उन्होंने एक अंधे आदमी के साथ किया था, जबकि वह आपके पास सच्चाई की तलाश में कुछ सीखने के लिए आया था। दूसरी तरफ़ आप जिन मक्का के सरदारों से बातचीत करके उन्हें समझाना चाहते थे, उनमें सच्चाई को पहचानने और मानने की कोई तलब नहीं थी।

 

13: यानी यह पन्ने "सुरक्षित पट्टिका " [लौह ए महफ़ूज़/ Preserved Tablet"] में लिखी हुई है, जो क़ुरआन समेत सभी आसमानी किताबों का स्रोत है। या इसका मतलब ख़ुद क़ुरआन हो सकता है जो कि पन्नों [leaves/ sheet,सुहुफ़] में जमा की जा रही थी। 'सुहुफ़' कई बार इबराहीम और मूसा (अलै) पर उतरी किताबों के बारे में आया है ( 53:36-37; 87:18-19; 20:133), और साथ में यह आदमी के कर्मों का लेखा-जोखा के लिए भी आया है (74:52; 81:10). 

 

 


 


















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