Wednesday, July 9, 2014

सूरह 81 : अत-तकवीर [अँधेरों में लिपटा हुआ/ Shrouded in Darkness]

सूरह 81: अत-तकवीर 

[अँधेरों में लिपटा हुआ/ Shrouded in Darkness]


01-14: क़यामत का दिन 

15-29: रसूल का फ़रिश्ते को देखना




अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

जब सूरज लपेटकर अँधेरा कर दिया जाएगा,  (1)

जब सितारे मद्धिम पड़ जाएंगे (और टूट-टूटकर गिर पड़ेंगे),  (2)

जब पहाड़ (धूल बनाकर वातावरण में) चला दिए जाएंगे, (3)

जब (दस महीने की) गर्भवती ऊँटनियाँ बेकार मारी फिरेंगी (क़ीमती होते हुए भी कोई उनको पूछनेवाला न होगा),  (4)

जब जंगली जानवर (डरके मारे बदहवास हो जाएंगे और फिर अल्लाह के सामने) इकट्ठा कर दिए जाएंगे,  (5)

जब समंदर उबल पड़ेंगे (और अपनी हदें तोड़ देंगे),  (6)

जब आत्माओं को (बुरे और अच्छे लोगों के) जोड़े में अलग-अलग छाँटकर रखा जाएगा,  (7)

जब ज़िंदा गाड़ दी गयी लड़की से पूछा जाएगा  (8)

कि वह किस गुनाह के कारण मार दी गई थी,  (9)

जब कर्मों के बही-खाते (record of deeds) खोल दिए जाएंगे,  (10)

जब आसमान से पर्दा हटा दिया जाएगा,  (11)

और जब जहन्नम (की आग) भड़कायी जाएगी  (12)

और जब जन्नत नज़दीक कर दी जाएगी:  (13)

(लोगो! तुम में से) हर आदमी जान लेगा जो कुछ (कर्मों का लेखा जोखा) वह लेकर आया है।  (14)

 

तो मैं कसम खाता हूँ उन [ग्रहों/Planets] की, जो (अपने नियत पथ पर चलते हुए) दूर चले जाते हैं,  (15)

जो (एक ख़ास गति से) चलते रहते हैं, और (फिर कभी इतने दूर चले जाते हैं कि नज़रों से) ओझल हो जाते हैं,  (16)

और रात की क़सम जब उसका अंधेरापन जाने लगे,  (17)

और सुबह की क़सम जब (हल्की सी रौशनी में) वह साँस ले:  (18)

यह [कुरआन] संदेश लानेवाले बड़े सम्मानीय फरिश्ते [जिबरईल/ Gabriel] द्वारा (पढ़ी हुई) वाणी [speech] है,  (19)

जो बड़ी ताक़त रखता है, और सिंहासन के मालिक [अल्लाह] के यहाँ उसका बड़ा सम्मान और रूतबा है ------ (20)

(साथी फरिश्तों में) उसका आदेश माना जाता हैऔर वह (अल्लाह के नज़दीक) बहुत भरोसे के लायक़ [trustworthy] है। (21)

और (ऐ मक्का के लोगो!) तुम्हारे साथी [मुहम्मद], कोई दीवाने नहीं हैं:  (22)

उन्होंने सचमुच उस (जिबरईल नामी) फरिश्ते को साफ-खुले हुए आसमान के किनारे (क्षितिज/ horizon) पर देखा था। (23)

और (जो भी संदेश 'वही' [Revelation] के द्वारा भेजा जाता है)वह [मुहम्मद] उन चीज़ों को बताने में कोई कमी नहीं करते हैं (और न किसी बात को अपने तक छुपाकर रखते हैं)।  (24)

(याद रहे), यह [कुरआन] किसी दुत्कारे हुए शैतान की लायी हुई बात (वाणी) नहीं है।  (25)

 

फिर तुम (लोग इतनी बड़ी चीज़ को छोड़कर) कहाँ चले जा रहे हो?  (26)

यह [कुरआन] तो सारे लोगों के लिए एक संदेश है;  (27)

हर उस आदमी के लिए जो सीधी राह चलना चाहता हो। (28)

मगर तुम ऐसा तभी चाहोगे, जब अल्लाह की मर्ज़ी होजो सारे जहाँनों का रब है।  (29)

 

 

नोट:


1: आयत 1 से लेकर 14 तक क़यामत और परलोक [आख़िरत/ Hereafter] के हालात का बयान है।

 

4: ऊंंटनी उस समय के अरब के लोगों के लिए सबसे बड़ी दौलत समझी जाती थी, और अगर दस महीने की गर्भवती हो, तो उसे और भी क़ीमती समझा जाता था। 

 

7: यानी एक प्रकार के लोग एक जगह जमा कर दिए जाएंगे, जैसे ईमान रखनेवाले एक जगह और काफ़िर एक जगह, अच्छे लोग एक जगह और बुरे लोग एक जगह। 

 

9: इस्लाम आने से पहले अरब में कुछ कबीले ऐसे थे जिसमें बेटी पैदा होती तो उसे शर्म के मारे लोग जिंदा जमीन में गाड़ देते थे (देखें 16:58-59; 6: 137, 140, 151; 17:31; 60:12). क़यामत में उस बच्ची को लाकर पूछा जाएगा कि तुम्हें किस जुर्म में मार दिया गया था? इसका मकसद उन ज़ालिमों को सज़ा देना है जिन्होंने उस बच्ची के साथ ऐसा किया था।


15: यहाँ अल्लाह ने कई चीज़ों की क़सम खाई है। ऐसी क़समों के लिए देखें 56:75; 69:38-39; 75:1-2; 84:16-18; 90:1,3) 

 

18: सुबह सवेरे आमतौर से हल्की हल्की हवा चलती है, जिसके चलने को "सुबह के सांस लेने" से उपमा दी गई है।


20: फ़रिश्ता "जिबरील" के बारे में  है कि वह बहुत ताक़त रखता है। देखें 53:6 

 

23: कहा जाता है एक बार मुहम्मद साहब ने जिबरील फरिश्ते को क्षितिज पर अपने असली रूप में देखा था, शायद इस आयत में उसी की तरफ इशारा है। इसका वर्णन सूरह नजम (53: 7) में भी आया है।


22: तुम्हारे "साथी" यानी मुहम्मद (सल्ल) कोई "मजनूँ" नहीं हैं। अरबी में 'मजनूँ' उसको कहते हैं जिस पर जिन्न सवार हो जाता है। (देखें 7:184) 

 

24: इस्लाम आने से पहले (जाहिलियत के) ज़माने में जो लोग "काहिन" कहलाते थे, वे भी आसमानी बातें बताने का दावा करते थे, और शैतानों से दोस्ती करके उनसे कुछ झूठी-सच्ची बातें सुन लिया करते थे, लेकिन जब लोग उनसे पूछते तो वे बिना फ़ीस लिए कुछ भी बताने से मना कर देते थे। यहाँ काफ़िरों से कहा जा रहा है कि तुम मुहम्मद साहब को "काहिन" कहते हो, मगर वह तो सारी सच्ची आसमानी बातें बिना किसी पैसे के बताने में कभी कंजूसी नहीं करते हैं।

 



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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