Sunday, July 12, 2015

सूरह 114 : अन-नास [आदमी लोग, People]

सूरह 114: अन-नास

[आदमी लोग, People]

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल] आप कह दें कि “मैं (सब) इंसानों के रब की पनाह [शरण] माँगता हूं,  (1)

जो (सब) लोगों का मालिक [Controller] है,  (2)

सब लोगों का ख़ुदा है (जिसकी बंदगी की जाती है),  (3)  

(पनाह माँगता हूँ) चुपके-चुपके मन में बुराई की सोच डालने वाले (शैतान) की बुराई से, जो (अल्लाह को याद करने से) पीछे को छुप जाता है ------ (4)

जो लोगों के दिलों में बुराई की सोच बैठा देता है -------  (5)

चाहे वह (बुराई पर उकसाने वाला शैतान) जिन्नों में से हो (जो दिखायी न देता हो) या आदमियों में से।”  (6)

 

 

नोट:

1: इस सूरह के अलावा चार और ऐसी सूरह हैं जो इसी तरह से शुरु हुई हैं कि "आप कह दें", देखें 72, 109, 112 और 113.

4: मन में बुराई की सोच डालने वाले शैतान के बारे में देखें 7:20; 20:120; 22:52; 50:16.

6: सूरह अनाम (6: 112) में बताया गया है कि शैतान जिन्नों में से भी होते हैं और इंसानों में से भी। हाँ, जो शैतान जिन्नों में से होता है, वह दिखायी नहीं देता और वह दिलों में बुराइयाँ बैठा देता है, लेकिन इंसानों में से जो शैतान होते हैं, वह नज़र आते हैं और उनकी बातें ऐसी होती हैं कि उनकी बातें सुनकर इंसान के दिल में तरह-तरह के बुरे विचार आ जाते हैं, इसलिए इस आयत में मन के अंदर दोनों प्रकार की बुराई डालने वालों से पनाह माँगी गई है। शैतान की चालें कमज़ोर होती हैं और उसमें इतनी ताक़त नहीं है कि वह इंसान को गुनाह करने पर मजबूर कर सके। यह तो इंसान की आज़माइश है कि वह इंसान को बहकाने की कोशिश करता है, लेकिन जो बंदा उसके बहकावे में आने से इंकार करके अल्लाह की पनाह माँग ले, तो शैतान उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता।

क़ुरआन की शुरुआत सूरह फातिहा से हुई थी जिसमें अल्लाह की तारीफ़ के बाद अल्लाह से ही सीधे रास्ते के मार्गदर्शन की दुआ की गई है, और इसका अंत सूरह नास पर हुआ है जिसमें शैतान की बुराइयों से पनाह माँगी गई है, क्योंकि सीधे रास्ते पर चलने में उसकी बुराई से जो रुकावट पैदा हो सकती थी, उसे दूर करने का तरीक़ा बता दिया गया है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सूरह 113 : अल-ख़लक़ [सुबह-सवेरे, Daybreak]

सूरह 113: अल-फ़लक़

[सुबह-सवेरे, Daybreak]

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल], आप कह दें कि “मैं सुबह-सवेरे के रब की पनाह [शरण] माँगता हूँ  (1)

हर उस चीज़ की बुराई (और नुक़्सान) से जो उसने पैदा की है,  (2)

और (ख़ास करके) अंधेरी रात की बुराई से जब उसका अंधेरा छा जाए,  (3)

और गाँठों [गिरहों, Knots] में फूँक मारने वाली जादूगरनियों (और जादूगरों) की बुराई से,  (4)

और हर हसद-जलन [ईर्ष्या] करने वाले की बुराई से जब वह ईर्ष्या करे।”  (5)

 

 

नोट: 

1: यह आख़िरी दो सूरह उस समय उतरी थीं जब कुछ यहूदियों ने मुहम्मद (सल्ल) पर जादू करने की कोशिश की थी, और उसके कुछ प्रभाव आप पर ज़ाहिर भी हुए थे। इन दोनों सूरह में आपको जादू-टोने से बचने के लिए अल्लाह से पनाह माँगने को कहा गया है। कई हदीसों से पता चलता है कि इन दो सूरह को पढ़कर फूँकने से जादू का असर ख़त्म हो जाता है।

3: आम तौर पर जादूगरों की कार्रवाइयाँ रात के अंधेरों में हुआ करती हैं, इसीलिए अँधेरी रात की बुराइयों से भी पनाह माँगी गई है।

4: ऐस मर्द या औरत, जो धागे के गंडे बनाकर उसमें गाँठें लगाते जाते थे और उन पर कुछ पढ़-पढ़कर फूँकते रहते थे और इस तरह जादू कर देते थे, उनकी बुराइयों से भी पनाह माँगी गई है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...