Wednesday, July 1, 2015

सूरह 97 : अल क़द्र [क़द्र की रात, The Night of Glory or Power]

सूरह 97: अल-क़द्र
[क़द्र की रात, The Night of Glory or Power]



01-05: क़द्र [Decree] की रात 

 
 
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


बेशक हमने (पहली बार इस क़ुरआन) को क़द्र की रात में उतारा।  [1]


और तुम्हें क्या मालूम (कि) क़द्र की रात क्या है?  [2]


क़द्र की रात (में की गयी इबादत) एक हज़ार महीनों से भी बेहतर है;  [3]


इस (रात) में फ़रिश्ते और रूह [जिबरील] अपने रब की आज्ञा से (अगले साल होने वाले) हर काम के लिए (हुक्म लेकर) बार-बार उतरते हैं;  [4]


सुबह पौ फटने तक, वह रात पूरी तरह से शांति व सलामती [Peace] वाली है।  [5]





नोट:

1: एक मतलब तो यह है कि क़द्र की रात में पूरी क़ुरआन लौह-ए-महफ़ूज़ [सुरक्षित स्लेट/Preserved Tablet] से सबसे नीचे वाले आसमान में उतारी गई, फिर (फ़रिश्ता) हज़रत जिबरील इसे थोड़ा-थोड़ा करके 23 साल तक मुहम्मद (सल्ल.) पर उतारते रहे (2:97), दूसरा मतलब यह हो सकता है कि मुहम्मद साहब पर क़ुरआन के उतरने की शुरुआत सबसे पहले इसी रात में हुई। यह रात रमज़ान के महीने की आख़िरी 10 विषम [Odd] रातों यानी 21, 23, 25, 27, या 29वीं तारीख़ में से कोई रात थी।

4: इस रात में फ़रिश्तों के उतरने के दो मक़सद होते हैं। एक यह कि जो लोग इस रात इबादत में लगे रहते हैं, फ़रिश्ते उनके लिए दुआ करते हैं, और दूसरा हर काम के लिए उतरने का मक़सद यह है कि अल्लाह इस रात में साल भर के फ़ैसले फ़रिश्तों के हवाले कर देता है, ताकि वे अपने-अपने समय पर उन पर अमल करते रहें (देखें 44:4).







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