सूरह 106: क़ुरैश
[क़ुरैश का क़बीला, The Tribe
of Quraysh]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
(अल्लाह ने ऐसा किया कि) क़ुरैश [क़बीले के लोग] ख़ुद को सुरक्षित महसूस करने लगे, (1)
सुरक्षित कर दिया उन [क़ुरैश] के जाड़े (में यमन) और गर्मी (में सीरिया) को जाने वाले (व्यापारिक) कारवाँ को (जो उनकी ख़ुशहाली का ज़रिया थे)। (2)
अत: (इस करम के बदले) उन्हें चाहिए कि उस घर [का’बा] के रब की इबादत करें: (3)
जिसने उनको भूख (की हालत) में खाना दिया, और (दुश्मनों के) डर से अमन-शांति दी। (4)
नोट:
1 : या, [अल्लाह ने ऐसा करम किया] ताकि वे अपनी परम्परा के अनुसार व्यापारिक कारवाँ में जाते रहें, और उसे बंद न करें।
2: इस्लाम से पहले जाहिलियत के ज़माने मेंं अरब मेंं क़त्ल और लूटमार का बाज़ार गर्म था, और कोई आदमी शांति के साथ सफ़र नहीं कर पाता था, क्योंकि रास्ते में चोर-डाकू या दुश्मन क़बीले के लोग उसे मारने या लूटने के लिए घात लगाए रहते थे। लेकिन क़ुरैश का क़बीला चूँकि अल्लाह के घर [काबा] के पास रहता था और इसी क़बीले के लोग काबा की सेवा करते थे, इसलिए सारे अरब के लोग इनकी इज़्ज़त करते थे, और जब वे सफ़र करते थे, तो कोई उन्हें लूटता नहींं था। इस कारण उनका व्यापारिक कारवाँ सुरक्षित आता जाता था, वे व्यापार के लिए सर्दियों में यमन जाते और गर्मियों में सीरिया का सफ़र करते थे, इसी व्यापार से उनकी रोज़ी-रोटी जुड़ी हुई थी, और हालाँकि मक्का में न खेत थे, न बाग़, लेकिन इसी व्यापार के चलते वे खुशहाल थे। अल्लाह ने इस सूरह में उन्हेंं याद दिलाया है कि उनको सारे अरब मेंं जो इज़्ज़त हासिल है और जिस की वजह से उनकी व्यापारिक यात्रा आराम से होती है, यह सब कुछ अल्लाह के घर, काबा की बरकत से है। अत: उन्हें चाहिए कि इस घर के मालिक यानी अल्लाह की ही इबादत करें और मूर्तियों को पूजना छोड़ दें।
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