सूरह 103: अल-अस्र
[ढलता हुआ दिन, The Declining Day]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ढलते हुए दिन की क़सम (या ढलती उम्र की क़सम) (1)
बेशक इन्सान (बड़े) घाटे में है (कि वह अपनी क़ीमती उम्र गँवा रहा है), (2)
सिवाए उन लोगों के जो ईमान रखते हैं, अच्छे काम करते हैं, (समाज में) एक दूसरे को सच्चाई की नसीहत करते रहते हैं, और (बुराइयों से बचने में, अच्छे कर्म करने में और आनेवाली मुसीबतों में) एक दूसरे को सब्र [धैर्य] के साथ जमे रहने पर ज़ोर देते हैं। (3)
नोट:
1: कि जब दिन का हिस्सा या ज़िंदगी कम ही बची रहती है,
या ज़माने की क़सम! ज़माने का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जो लोग सच्चाई पर विश्वास नहीं रखते और नेक कर्मों से दूर रहते हैं, वे बड़े घाटे में हैं, इसलिए कि बहुत सी क़ौमों को दुनिया में ही आसमानी यातना झेलनी पड़ी, और हर ज़माने में अल्लाह की उतारी हुई किताबें और उसके भेजे हुए पैग़म्बर लोगों को बुरे कर्मों के नतीजे से सावधान करते रहे हैं।
2: और अच्छे कर्म करने का समय घटता जा रहा है।
3: ख़ुद नेक बन जाना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि अपने प्रभाव में आए हुए लोगों को भी सच्ची बात और धीरज
से अच्छाई पर जमे रहने पर ज़ोर देना भी ज़रूरी है। “सब्र या धीरज” एक क़ुरआन का term है जिसका मतलब यह है कि जब
इंसान के दिल की इच्छाएं उसे किसी सही काम को करने से रोक रही हों या कोई गुनाह करने
पर उकसा रही हों, उस समय
उन इच्छाओं को कुचला जाए, और जब आपके साथ कोई बुरी चीज़ घट जाए, तो अल्लाह के फ़ैसले पर अंगुली
उठाने से बचा जाए।
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