सूरह 100: अल-आदियात
[हाँफते-दौड़ते घोड़े, The Charging Steeds]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
(युद्ध के मैदान में) सरपट दौड़ते हुए और हाँफते हुए घोड़ों की क़सम, (1)
फिर जो पत्थरों पर ठोकर मारकर चिंगारियाँ उड़ाते हैं, (2)
फिर जो सुबह होते ही (दुश्मन पर) अचानक छापा मारते हैं, (3)
फिर (हमले वाली) जगह के चारों ओर धूल-गर्द उड़ाते हैं, (4)
फिर उसी समय (दुश्मन के) लश्कर में जा घुसते हैं। (5)
बेशक इंसान अपने रब का शुक्र अदा नहीं करता [Ungrateful] है (जबकि एक घोड़ा भी अपनी जान की परवाह किए बिना आदमी से वफ़ादारी निभाता है) --- (6)
और वह (इस नाशुक्री) पर ख़ुद ही गवाह है----- (7)
और सच्चाई यह है कि वह [इंसान] धन के मोह में बहुत पक्का है। (8)
तो क्या उसे पता नहीं, जब क़ब्रों के भीतर जो कुछ (मरे-पड़े लोग] हैं, उन्हें फाड़कर बाहर निकाल दिया जाएगा, (9)
और जो (राज़) सीनों में छुपे होंगे, वह सामने आ जाएंगे, (10)
उनका रब उस दिन, उन सबके (कर्मों) से अच्छी तरह परिचित होगा। (11)
नोट:
5: यहाँ उन घोड़ों का ज़िक्र जिनपर बैठकर युद्ध लड़ा जाता था, उनकी क़समें खाने में यह इशारा है कि ये घोड़े अपने मालिकों के इतने वफ़ादार होते थे कि अपनी जान को ख़तरे में डालकर अपने मालिकों का हुक्म भी मानते थे, और उनकी जान की रक्षा भी। अल्लाह ने इतने मज़बूत जानवर को इंसान के वश में कर दिया है, यहाँ इंसानों को याद दिलाया जा रहा है कि अपने मालिक और पैदा करनेवाले के इस एहसान का शुक्र अदा करने के बजाए वह उसके हुक्म को नहीं मानता और अपने पालनहार का इतना भी वफ़ादार नहीं जितने उसके घोड़े उसके वफ़ादार हैं।
8: धन का मोह ऐसा होता है कि आदमी अच्छाई के कामों से दूर हो जाता है, या गुनाह करने में लग जाता
है।
9: क़यामत के दिन सारे लोग क़ब्र फाड़कर बाहर निकल आएंगे (देखें 82:4).
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