सूरह 111: अल-लहब/ अल-मसद
[आग में जलनेवाला, Flame Man / खजूर की छाल, Palm-fibre]
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
अबु लहब के दोनों हाथ बर्बाद हो जाएँ! और वह ख़ुद भी बर्बाद हो जाए! (1)
न तो (विरासत में मिली हुई) दौलत ही उसके काम आएगी और न वह धन जो उसने कमाया: (2)
वह जल्द ही (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में जा पड़ेगा---- (3)
और साथ में उसकी (बदमाश) पत्नी (भी), जो (काँटेदार) लकड़ियों का बोझा उठाए फिरती है, (और हमारे रसूल को सताने के लिए रास्तों में बिछा देती है) (4)
(क़यामत के दिन) उसकी गर्दन में खजूर की छाल का (वही) रस्सा होगा (जिससे वह काँटों का गट्ठर बाँधती है)। (5)
नोट:
1: अबु लहब, यानी "अब्दुल उज़्ज़ा" मुहम्मद (सल्ल) का चचा था, वह आपका उस समय से घोर विरोधी हो गया था जब से आपने लोगों के बीच अल्लाह का संदेश पहुँचाना शुरू किया, और फिर वह आपको तरह-तरह से तकलीफ़ें पहुँचाता था। जब मुहम्मद (सल्ल) ने पहली बार अपने ख़ानदान के लोगों को “सफ़ा” पहाड़ पर जमा करके उनको अल्लाह का संदेश सुनाया, तो अबु लहब ने कहा था: “बर्बादी हो तुम्हारी! क्या इसी काम के लिए तुमने हमें जमा किया था?” इसके जवाब में यह सूरह उतरी, और इसमें पहले तो अबु लहब को बद-दुआ दी गई है कि वह बर्बाद हो जाए! उसके बाद आगे कहा गया है कि उसकी बर्बादी हो ही गई! चुनांचे बद्र की जंग के सात दिन बाद वह महामारी का शिकार हो गया, अरब के लोग छूत-छात मानते थे और जिसे यह बीमारी होती थी, उसे हाथ भी नहीं लगाते थे, फिर वह इसी हाल में मर गया और उसकी लाश सड़कर महकने लगी, यहाँ तक कि लोगों ने किसी लकड़ी के सहारे से उसे एक गड्ढे में गाड़ दिया।
3: भड़कते शोले को अरबी में “लहब” कहते हैं, अबु लहब उसको इसीलिए कहते थे कि उसका चेहरा शोले की तरह लाल था। क़ुरआन ने यहाँ जहन्नम के शोलों के लिए भी यही शब्द प्रयोग किया है। इसी से इस सूरह का नाम भी सूरह अल-लहब है।
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