सूरह 109: अल-काफ़िरून
[काफ़िर
लोग, The
Disbelievers]
और न (ही) मैं (आगे
कभी) उनकी इबादत करने वाला हूँ जिन (बुतों) की तुम पूजा करते हो, (4)
और न तुम कभी उसकी पूजा करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ: (5)
नोट:
6: यह सूरह उस समय उतरी थी जब मक्का के कुछ सरदारों ने जिनमें वलीद बिन मुग़ीरा, आस बिन वायल आदि शामिल थे, मुहम्मद (सल्ल) के सामने यह सुझाव रखा कि बढ़ते हुए झमेले को सुलझाने के लिए ऐसा हो कि एक साल आप हमारे देवताओं की पूजा करें, तो दूसरे साल हम आपके ख़ुदा की पूजा कर लेंगे। इससे मिलते-जुलते कुछ और भी सुझाव दिए गए थे जिसमें मुख्य रूप से यही बात थी कि आप किसी न किसी तरह उन मक्का के काफ़िरों के तरीक़े पर इबादत के लिए तैयार हो जाएं, तो आपस में सुलह हो सकती है।
मगर इस सूरह ने दो-टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि “तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और हमारे लिए हमारा दीन है” (देखें 2:139-141; 28:55; 42:15) यानी कुफ़्र और ईमान के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं हो सकता। हाँ जो लोग सच्चाई को क़बूल नहीं करते, वे अपने दीन-धर्म पर अमल करें जिसके नतीजे के लिए वे ख़ुद ही ज़िम्मेदार होंगे।
No comments:
Post a Comment