Friday, July 10, 2015

सूरह 109 : अल काफ़िरून [काफ़िर लोग, The Disbelievers]

सूरह 109: अल-काफ़िरून

[काफ़िर लोग, The Disbelievers]

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

[ऐ रसूल!] आप कह दें, “ऐ सच्चाई से इंकार करनेवाले (काफ़िरो): (1)

मैं उन (बुतों) की इबादत [worship] नहीं करता जिन्हें तुम पूजते  हो,  (2)

और न तुम उस (ख़ुदा) की पूजा करने वाले हो जिसकी मैं इबादत करता हूँ, (3)

और न (ही) मैं (आगे कभी) उनकी इबादत करने वाला हूँ जिन (बुतों) की तुम पूजा करते हो,  (4)

और न तुम कभी उसकी पूजा करने वाले होजिसकी मैं इबादत करता हूँ:  (5)

 तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म हैऔर मेरे लिए मेरा दीन।"  (6)

 

 

नोट: 

6: यह सूरह उस समय उतरी थी जब मक्का के कुछ सरदारों ने जिनमें वलीद बिन मुग़ीरा, आस बिन वायल आदि शामिल थे, मुहम्मद (सल्ल) के सामने यह सुझाव रखा कि बढ़ते हुए झमेले को सुलझाने के लिए ऐसा हो कि एक साल आप हमारे देवताओं की पूजा करें, तो दूसरे साल हम आपके ख़ुदा की पूजा कर लेंगे। इससे मिलते-जुलते कुछ और भी सुझाव दिए गए थे जिसमें मुख्य रूप से यही बात थी कि आप किसी न किसी तरह उन मक्का के  काफ़िरों के तरीक़े पर इबादत के लिए तैयार हो जाएं, तो आपस में सुलह हो सकती है। 

मगर इस सूरह ने दो-टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि “तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है और हमारे लिए हमारा दीन है” (देखें 2:139-141; 28:55; 42:15) यानी कुफ़्र और ईमान के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं हो सकता। हाँ जो लोग सच्चाई को क़बूल नहीं करते, वे अपने दीन-धर्म पर अमल करें जिसके नतीजे के लिए वे ख़ुद ही ज़िम्मेदार होंगे।  

 








 

No comments:

Post a Comment

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...