Sunday, June 21, 2015

सूरह 90: अल-बलद [मक्का शहर / The City]

सूरह 90: अल-बलद
[मक्का शहर / The City]



01-11: अच्छाई और बुराई के दो रास्ते

12-17: कठिन रास्तों वाली घाटी का वर्णन 

18-20: दाहिने और बायीं तरफ़वाले 

 
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
मैं इस शहर ٌٌ[मक्का] की क़सम खाता हूँ---  (1)

और आप [ऐ रसूल!] इसी शहर के रहने वाले हैं --- (2)

(और क़सम खाता हूँ) बाप की और उनके बच्चों की,  (3)
कि हमने इंसान को कष्ट में (फंसा रहने वाला) बनाया है।  (4)

क्या वह यह समझता है कि उस पर किसी का बस नहीं चलेगा?  (5)
वह (बड़े गर्व से) कहता है, “मैंने ढेरों माल उड़ा डाला है”,  (6)

क्या वह सोचता है कि उसे (बेकार चीज़ों में ख़र्च करते हुए) कोई नहीं देखता?   (7)

क्या हमने उसे दो आंखें नहीं दीं? (8)
और (उसे) एक ज़बान और दो होंठ (नहीं दिए)? (9)

और हमने उसे (अच्छाई और बुराई के) दोनों रास्ते साफ़-साफ़ दिखा दिए।  (10)

इसके बावजूद, वह तो (अच्छे कर्मों को करने के लिए) खड़ी चढ़ायी वाली घाटी से गुज़रा ही नहीं,  (11)

और आप क्या जानें कि वह खड़ी चढ़ायी वाली घाटी [steep pass] क्या है?  (12)

किसी को ग़ुलामी से आज़ाद करा देना, (13)
या भूखवाले दिनों में (यानी अकाल और ग़रीबी के दौर में) खाना खिला देना,  (14)
 
किसी अनाथ [यतीम] को जो नज़दीकी रिश्तेदार हो,   (15)

या सख़्त ग़रीबी के मारे हुए आदमी को जो धूल में पड़े होते हैं (और बेघर हैं),  (16)
और वह उन लोगों में से एक हो जो ईमान रखता हो, और एक दूसरे को धीरज से क़दम जमाए रखने पर ज़ोर देता हो, और आपस में दया-भाव रखने [compassion] की नसीहत करता हो।  (17)

तो जो लोग ऐसा करते हैं, वे दाहिने तरफ़वाले [अच्छी क़िस्मतवाले और माफ़ किये गये] हैं,  (18)
मगर जिन लोगों ने हमारी आयतों पर विश्वास करने से इंकार किया, वे बायीं तरफ़वाले [बदक़िस्मत और पापी] हैं,  (19)

और आग उनको चारों तरफ़ से घेर लेगी और उन्हें (उसी में) बंद कर दिया जाएगा!  (20)
 
 
 
 
नोट:

2: अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्ल.) की मक्का में मौजूदगी के कारण अल्लाह ने इस शहर की क़सम खाकर इसकी इज़्ज़त और बढ़ा दी। एक मतलब यह भी बताया गया है कि अल्लाह के रसूल अपने मन के मुताबिक़ यहाँ कोई भी कार्रवाई करने के लिए आज़ाद थे। 

3: बाप का मतलब यहाँ पर हज़रत आदम (अलै) हैं, और चूँकि सारे इंसान उन्हीं की औलाद हैं, इसलिए यहाँ सारे इंसानों की क़सम खायी गई है। एक मतलब बाप का हज़रत इस्माईल (अलै) भी बताया जाता है, क्योंकि अरब के लोग इन्हीं की औलाद माने जाते हैं। 

4: चाहे बड़ा आदमी हो या छोटा, सभी इंसान किसी न किसी कष्ट में हमेशा फँसा रहता है। पूर्ण राहत तो जन्नत की ज़िंदगी में ही हो सकती है, जिसे पाने के लिए दुनिया में कष्ट झेलना ज़रूरी है। मुहम्मद (सल्ल) और उनके साथियों को इस आयत में तसल्ली दी गई है। मक्का जिसे अल्लाह ने सबसे पवित्र जगह बनाया, और उसमें मुहम्मद (सल्ल) जैसी हस्ती रहती थी, इसके बावजूद उन्हें और उनके साथियों को कितनी तकलीफ़ें झेलनी पड़ रही थी।

6: मक्का में सच्चाई पर विश्वास न करने पर अड़े कई ऐसे (काफ़िर) लोग थे जिन्हें अपनी शारीरिक ताक़त पर बड़ा घमंड था। साथ ही वे बेकार चीज़ों पर ख़र्च करते थे और आपस में दिखावे के लिए बड़े घमंड से कहते थे कि उन्होंने ढेरों माल उड़ा डाले हैं। 

11: अच्छे व नेक काम करने के लिए जो अपने मन की इच्छाओं से संघर्ष करना पड़ता है, और जो कठिनाई झेलनी पड़ती है, उसे यहाँ पर 'खड़ी चढ़ायी वाली घाटी से गुज़रना' कहा गया है।

18: दायीं तरफ़वाले: देखें 56:8; 27:40, 90-91 ..... बायीं तरफ़वाले : देखें 56:9, 41-56, 92-94 


 

 

सूरह 89 : अल-फ़ज्र [सुबह-सवेरे, Daybreak]

 

सूरह 89: अल-फ़ज्र 

[सुबह-सवेरे, Daybreak]



01-05: क़सम 

06-14: पिछली पीढ़ियों को मिलने वाली सज़ा: चेतावनी 

15-20: इंसानों को धन-दौलत की लालच 

21-30: जन्नत और जहन्नम का फ़ैसला 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान हैअत्यंत दयावान है

 क़सम है सुबह-सवेरे के समय की,  (1)

 और क़सम है दस (मुबारक) रातों की,  (2)

 और क़सम है जोड़ेवाली [Even] (चीज़) की और बिना-जोड़ेवाली [Odd] चीज़ों की,   (3)

 और गुज़रती हुई रात की क़सम! (कि इंकार करने वालों को ज़रूर दंड दिया जाएगा) ------  (4)

 क्या एक समझदार (को विश्वास दिलाने) के लिए ये क़समें काफ़ी नहीं हैं? (5)

 

क्या आपने [ऐ रसूल] नहीं देखा कि आपके रब ने “आद” (की क़ौम) के साथ क्या सलूक किया?  (6)

(जो) ऊँचे-ऊँचे स्तंभोंवाले शहर, “इरम” (में बसते) थे, (7)

उनके जैसे (डील-डौल वाले) लोग इस धरती पर कहीं भी कभी पैदा नहीं किए गए, (8)

और "समूद" (के लोगों के साथ क्या सलूक हुआ) जिन्होंने (क़ुरा नाम की) घाटी में चट्टानों को काट (कर पत्थरों से घरों का निर्माण कर) डाला था, (9)

और फ़िरऔन [Pharaoh] (का क्या हश्र हुआ) जो बड़े ताक़तवर और मज़बूत लशकरोंवाला (या लोगों को खूंटों (Stakes) से दंड देनेवाला) था?  (10)

यह वे लोग थे जिन्होंने (अपने-अपने) इलाक़ों में ज़्यादतियाँ [सरकशी] कर रखी थीं,  (11)

और उनमें बड़े फ़साद मचा रखे थे:  (12)

तो आपके रब ने उन पर यातना का कोड़ा बरसा दिया।  (13)

बेशक आपका रब सब (ज़्यादती करनेवालों और आदेश न माननेवालों) पर हमेशा कड़ी नज़र रखता है।  (14)

 

मगर इंसान (ऐसा है) कि जब उसका रब उसे (आराम व ठाठ देकर) आज़माता है और इज़्ज़त और नेमतें [blessings] प्रदान करता है, तो वह (घमंडी हो जाता है) कहता है, “मेरे रब ने मुझे इज़्ज़त दी है,” (15)

लेकिन जब वह उसे (तकलीफ़ और मुसीबत देकर) आज़माता है और उसकी रोज़ी को सीमित कर देता है, तो वह कहता है, “मेरे रब ने मुझे अपमानित कर दिया।” (16)

हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! मगर (सच्चाई यह है कि सम्मान और धन-दौलत मिलने पर) तुम लोग अनाथों को मान नहीं देते, (17)

और न ही तुम (लोग) ग़रीबों को खाना खिलाने के लिए (समाज में) एक दूसरे को उभारते हो,  (18)

और विरासत का सारा माल (inherited wealth) समेटकर (स्वयं) खा जाते हो (और इसमें से अनाथों और ग़रीब लोगों का हिस्सा नहीं निकालते),  (19)

और तुम धन-दौलत से हद से ज़्यादा लगाव रखते हो।  (20)

 

हरगिज़ ऐसा नहीं चाहिए! जब धरती कूट-कूटकर चूर-चूर कर दी जाएगी,  (21)

जब आपका रब और साथ में फरिश्ते क़तार-दर-क़तार लगाये हुए (हश्र के मैदान में) आएंगे,  (22)

और उस दिन जहन्नम [नरक] को सामने लाया जाएगा‌--- उस दिन इंसान को समझ आएगीमगर तब उसके चेतने से क्या (फ़ायदा) होगा?  (23)

वह कहेगा “ऐ काश! मैंने अपने (इस आने वाले) जीवन के लिए (कुछ नेकी) पहले भेज दी होती (जो आज मेरे काम आती!)” (24)

सो उस दिन वह [अल्लाह] ऐसा दंड देगा कि वैसा दंड दूसरा कोई नहीं दे सकता, (25)

और न उसके जकड़ने की तरह कोई दूसरा जकड़नेवाला होगा।  (26)

(मगर अल्लाह की याद में सुकून पाने वाले लोगों से कहा जाएगा कि) “ऐ संतुष्ट आत्मा:  (27)

तू अपने रब की तरफ इस हाल में लौट आ कि तू उससे खुश हो और वह तुझ से राज़ी हो;  (28)

और तू शामिल हो जा, मेरे (नेक) बन्दों में;  (29)

और दाख़िल हो जा मेरी जन्नत [Garden] में।"  (30) 

 

 


नोट:

1: सुबह-सवेरे की क़सम इसलिए खायी गई है कि हर सुबह सारी चीज़ों में एक

नई ऊर्जा लेकर आती है। दूसरा मतलब शायद बक़रीद (के महीने की दसवीं तारीख की) सुबह से है

2मतलब शायद  बक़रीद के महीने की पहली 10 रातें हैं जो बड़ी बरकतवाली मानी जाती हैं, जिनका संबंध हज से है। 

3. जफ़्त [सम या जोड़ा] का अर्थ शायद कुल प्राणी है जो जोड़ों के रूप में पैदा किये गये हैंऔर ताक़ [विषम या अकेले] का अर्थ शायद अल्लाह की ज़ात है जिसने कायनात बनायी। इस सम और विषम का मतलब बक़रीद की 10वीं और 9वीं तारीख भी बतायी गयी है जिनकी बड़ी अहमियत मानी जाती है। 

4: यहाँ ख़ास दिन और रात का हवाला शायद इसलिए दिया गया है कि अरब के वैसे लोग भी इन ख़ास दिन-रात को पवित्र व आदरणीय मानते थे, जो सच्चाई पर विश्वास नहीं रखते थे। तो जैसे इतने दिन-रात में कुछ ही दिन बड़े आदरणीय होते हैं, उसी तरह सारे लोगों के साथ अल्लाह एक समान सलूक नहीं करेगा, बल्कि अच्छे कर्म करनेवालों को इनाम देगा और बुरे कर्म करनेवालों को सज़ा देगा।

7: कुछ लोगों का मानना है कि "इरम" आद के दादा का नाम था, और उस क़ौम के लोग बड़े लम्बे डील-डौल वाले होते थे। अरब की प्रचलित क़िस्सों में है कि "इरम" 'आद' की क़ौम का एक मशहूर शहर था जिसे आद के बेटे शद्दाद ने सोने-चांदी और जवाहिरात से बनवाया था। कुछ लोग कहते हैं कि 'इरम' बाइबिल के "अरम" से मिलता है जो कि दक्षिणी सीरिया के आरमियाई साम्राज्य (11वीं --8वीं सदी ई.पूर्व) का हिस्सा था, जिसकी राजधानी दमश्क़ थी जिसको असीरियन फौज ने 732 ई.पूर्व में बर्बाद कर दिया था। इस क़ौम के पास हज़रत हूद (अलै) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था। देखें सूरह अ'राफ़ (7: 65-72) और सूरह हूद (11: 50)

9: समूद के लोगों के पास हज़रत सालिह (अलै) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था। देखें सूरह अ'राफ़ (7: 73-79) 

10: फ़िरऔन को "खूंटोंवाला" इसलिए कहा गया है कि वह लोगों को सज़ा देने के लिए उनके हाथ-पांव में खूंटें गाड़ दिया करता था। 

17: अल्लाह ने रोज़ी का बंटवारा अपनी गहरी समझ-बूझ के अनुसार किया है, अत: अगर रोज़ी में कमी हो, तो उसे अपनी तौहीन समझना भी ग़लत है, और रोज़ी में अगर बढ़ोत्तरी हो, तो उसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लेना भी ग़लत है, क्योंकि इस दुनिया में अल्लाह ने बहुत से ऐसे लोगों को धन-दौलत दी है जो अच्छे व नेक नहीं हैं। 

23: मरने से पहले ही या क़यामत से पहले तक अगर किसी ने (असल) सच्चाई पर विश्वास कर लिया, तब तो उसका ईमान रखना लाभदायक होगा, क्योंकि क़यामत हो जाने के बाद विश्वास करने का कोई फ़ायदा नहीं है।









 

 

 

 

 

 

 

 

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

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