Sunday, April 3, 2022

Surah/सूरह 37: As-Saaffaat/अस-साफ़्फ़ात [क़तारों में लाइन से खड़े होनेवाले / Those ranged in rows]

 सूरह 37: अस-साफ़्फ़ात 

[क़तारों में लाइन से खड़े होनेवाले / Those ranged in rows]

इस मक्की सूरह का केंद्रीय विषय है केवल एक अल्लाह का होना (आयत 4, 180-182),  और बहुदेववादियों की इस मान्यता को रद्द करना कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं और वे इबादत के योग्य हैं। फ़रिश्तों की बातें भी नक़ल की गई हैं जिसमें ख़ुद फ़रिश्तों ने इस मान्यता को रद्द किया है (164-166). मुहम्मद सल्ल. के पैग़म्बर होने और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की पुष्टि भी की गई है। इसमें दो और खंड हैं: आख़िरत का दृश्य (19-68), जहाँ विश्वास करने से इंकार करने वालों को मिलने वाली सज़ा और ईमानवालों को मिलने वाले इनाम के बारे में बताया गया है, और पिछले नबियों की कहानियाँ (75-148), जिनमें पिछली क़ौमों की तबाही के क़िस्से भी सुनाए गए हैं जिन्हें नाफ़रमानी करने के चलते बर्बाद कर दिया गया। 



विषय:

01-05: अल्लाह एक है

06-11: अल्लाह की पैदा करने की ताक़त 

12-34: फ़ैसले का दिन: कर्मों के हिसाब-किताब का दृश्य 

35-39: रसूल की कही बात सही साबित होगी 

40-61: जन्नत की ख़ुशियाँ 

62-68: जहन्नम की पीड़ा 

69-74: पिछले रसूलों की कहानियों का परिचय 

75-82: नूह (अलै) 

83-98: इबराहीम (अलै) की कहानी 

99-111: इबराहीम अपने बेटे को क़ुर्बान करने के लिए तैयार हो गए 

112-113: इबराहीम और इसहाक़ (अलै)

114-122: मूसा और हारून (अलै) 

123-132: इदरीस [Elijah] (अलै) 

133-138: लूत (अलै)

139-148: यूनुस [Jonah] (अलै) 

149-166: अल्लाह की न कोई औलाद है, और न कोई साझेदार [Partner] 

169-179: कुछ समय के लिए विश्वास न करने वालों से मुँह मोड़ लें 

180-182: आख़िर में अल्लाह की बड़ाई का बयान 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है उन [फरिश्तों] की जो क़तारों में सीधी लाइन बनाकर खड़े होते हैं,  (1)

जो (बुराइयों पर) सख़्ती से डाँटते-फटकारते हैं (2)
और अल्लाह की वाणी [कलाम] को पढ़ते रहते हैं,  (3)
सचमुच तुम्हारा अल्लाह तो एक ही है,  (4)
जो आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनके बीच है, उन सबका रब है, और (अलग-अलग मौसमों में) सूरज के निकलने की हर एक जगह का भी रब है।  (5)
 
हमने सबसे नीचे वाले आसमान को तारों से सजा रखा है, (6)
और उन्हें हर बाग़ी शैतान से सुरक्षा के लिए बनाया है: (7)
वे [शैतान] ऊपर (फ़रिश्तों) की दुनिया की बातें चोरी-छिपे नहीं सुन सकते ---  हर ओर से उनपर (अंगारे) फेंके जाते हैं, (8)
और उन्हें निकाल बाहर किया जाता है ---- उनके लिए (परलोक) में कभी न समाप्त होने वाली यातना होगी ----  (9)
हाँ, अगर (शैतानों में से) कोई चोरी-छिपे (फ़रिश्तों की बात का) कोई टुकड़ा किसी तरह उचक (कर सुन) भी ले, तो एक तेज़ दहकता अंगारा उसके पीछे लग जाता है।  (10)
[ऐ रसूल] आप उन (विश्वास न करनेवाले काफ़िरों) से पूछें: कि उन्हें पैदा करने का काम ज़्यादा कठिन है या हमारे द्वारा अन्य सारी चीज़ों का पैदा किया जाना? निस्संदेह हमने उनको लसलसी व चिपचिपी मिट्टी से पैदा किया है। (11)
आपको (उनकी बातों पर) आश्चर्य होता है कि वे (सच बात की) हँसी उड़ाते हैं,  (12)

जब उन्हें सावधान किया जाता है, तो वे (उन बातों पर) कोई ध्यान नहीं देते,  (13)
 
और जब (हमारी) कोई निशानी देखते हैं तो उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं,  (14)

और कहते हैं, "यह और कुछ नहीं, बस एक खुला जादू है।”  (15)

“क्या! जब हम मर जाएंगे और मरकर मिट्टी और हड्डियों में बदल जाएंगे, तो क्या सचमुच हम दोबारा उठाए जाएँगे?, (16)

अपने बाप-दादों के साथ?" (17)

कह दें, "हाँ, बिल्कुल! और तुम्हें वहाँ बे-इज़्ज़त किया जाएगा।" (18)

बस एक ज़ोर का धमाका होगा ---- और अचानक! ---  वे देखेंगे (19)

और कहेंगे, "ऐ अफ़सोस हम पर! यह तो (कर्मों के) हिसाब-किताब [फ़ैसले] का दिन है।" (20)
[उनसे कहा जाएगा], “यह वही फ़ैसले का दिन है जिसे तुम मानने से इंकार किया करते थे।  (21)

(कहा जाएगा, फरिश्तों!) "एक साथ इकट्ठा करो उन लोगों को जिन्होंने ग़लत काम किए, और उन्हीं जैसे (काम करने वाले) दूसरे पति/पत्नियों को, और साथ में उनको भी जिनकी वे पूजा करते थे,  (22)
अल्लाह को छोड़कर; फिर उन सबको जहन्नम की तरफ़ जाने वाले रास्ते पर लेकर चलो, (23)

और उन्हें ज़रा रोको, उनसे सवाल-जवाब होगा:   (24)

"तुम्हें क्या हो गया कि तुम अब एक-दूसरे की सहायता नहीं कर रहे हो?"--- (25)

नहीं! बल्कि उस दिन वे पूरी तरह सिर झुकाए खड़े होंगे--- (26)

उनमें से कुछ लोग आपस में मिलकर एक-दूसरे पर दोष लगा रहे होंगे, (27)

वे कहेंगे, "तुम हमारे पास जब आते थे, उस समय तो तुम्हारी स्थिति मज़बूत व असरदार आदमी की थी।  (28)

वे (जवाब में) कहेंगे, "नहीं! वह तो तुम थे जो (अल्लाह पर) विश्वास नहीं करते थे----  (29)

तुम्हारे ऊपर तो हमारा कोई ज़ोर नहीं चलता था --- और  तुम तो पहले से ही तमाम सीमाएं पार कर चुके थे। (30)

इस तरह, हमारे रब ने हम पर जो दंड का हुक्म सुनाया था, वह बिल्कुल सही साबित हुआ, और निस्संदेह हम सभी को अपनी सज़ा का मजा़ चखना ही होगा। (31)

हमने तुम्हें सही रास्ते से भटका दिया, क्योंकि हम स्वयं ही भटके हुए थे।" (32)

अतः वे सब उस दिन यातना में एक-दूसरे के भागीदार होंगे: (33)

अपराधियों के साथ हम ऐसा ही किया करते हैं।  (34)

उनका हाल यह था कि जब उनसे कहा जाता था कि "अल्लाह के सिवा कोई भी पूजा के लायक़ नहीं है," तो वे घमंड में अकड़ जाते,  (35)

और कहने लगते, "क्या हम एक दीवाने कवि [मोहम्मद] के लिए अपने देवताओं को छोड़ दें?" (36)

"नहीं: बल्कि वह सत्य लेकर आए थे और वह (पिछले) रसूलों को भी सच्चा बताते थे;  (37)

निश्चय ही तुम सब दर्दनाक यातना का मज़ा चखोगे,  (38)

तुम बदला वैसा ही तो पाओगे, जैसे तुम कर्म करते रहे हो।" (39)
हाँ, मगर अल्लाह के सच्चे व अच्छे बंदों की बात अलग है, (40)

उनके लिए जानी-पहचानी रोज़ी होगी ----  (41)

तरह-तरह के फल--- और उनको सम्मानित किया जाएगा,  (42)

आनंद से भरे बाग़ों [जन्नत] में;  (43)

वे तख़्तों पर आमने-सामने बैठे होंगे; (44)

एक बहते हुए सोते से भरी गयी शराब उनके बीच में घुमायी जाएगी: (45)

बिल्कुल सफ़ेद, पीनेवालों के लिए बहुत ही मज़ेदार होगी, (46)

न उससे सर में कोई भारीपन होगा और न मदहोशी में बहकना। (47)

और इनके साथ वहाँ औरतें होंगी-----शर्मीली व निगाहें नीची रखनेवाली, सुन्दर आँखोंवाली [हूरें] ---(48)

(उनका बेदाग़ हुस्न ऐसा होगा) मानो वे (धूल-गर्द से बचाए हुए शुतुर्मुर्ग़ के) साफ़ अंडे हों।  (49)
फिर वे [जन्नती लोग] एक-दूसरे की तरफ़ मुड़कर बातचीत करते हुए पूछेंगे: (50)
उनमें से एक कहेगा, "ज़मीन पर मेरा एक बड़ा नज़दीकी साथी था,  (51)

वह मुझसे पूछा करता था कि “क्या तुम सचमुच यह विश्वास करते हो कि  (52)
 
मरने के बाद जब हम मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें वास्तव में (कर्मों के) हिसाब-किताब के लिए लाया जाएगा?" (53)

फिर वह कहेगा, "क्या हम उसे खोजकर देखें?" (54)

फिर वह नीचे झाँकेगा तो उसे भड़कती हुई आग के बीच में उसका साथी दिख जाएगा  (55)

वह उससे कहेगा, "क़सम है अल्लाह की! तुम तो मुझे बर्बादी के बहुत नज़दीक ले आए थे!  (56)

अगर मेरे रब ने मुझ पर एहसान न किया होता, तो अवश्य ही मैं भी उन लोगों में शामिल होता जिन्हें (दंड के लिए) जहन्नम ले जाया जाता।”  (57)

फिर वह (अपने जन्नत के साथियों से) कहेगा, “हमारी पहली मौत के बाद क्या अब हमें कभी भी फिर से नहीं मरना है? (58)

क्या हमें अब कभी कोई तकलीफ़ भी नहीं दी जाएगी?" (59)

सही मायने में यही असली कामयाबी है!” (60)

ऐसी ही कामयाबी हासिल करने के लिए हर एक को अपने कर्मों द्वारा कोशिश करनी चाहिए।  (61)

क्या (जन्नत में) मेहमानों की तरह स्वागत अच्छा है या 'ज़क़्क़ूम' का पेड़, (62)
 
जिस (पेड़) को हमने शैतानी करनेवालों की कड़ी परीक्षा लेने के लिए बनाया है?  (63)

असल में यह ऐसा पेड़ है जो नरक की भड़कती हुई आग की तह से निकलता है (64)

उसके फल ऐसे होते हैं जैसे कि शैतानों के सिर हों। (65)

वे [जहन्नमी लोग] उसी को खाकर अपना पेट भरेंगे;  (66)

फिर उसके ऊपर से (पीप मिला हुआ) खौलता हुआ पानी पिया करेंगे;   (67)
 
(खाने-पीने के बाद) फिर उन्हें उसी (जहन्नम की) भड़कती हुई आग में लौटना होगा। (68)
 
उन्होंने अपने बाप-दादों को मार्ग से भटका हुआ पाया,  (69)

और वे भी उन्हीं के (ग़लत) रास्ते पर चलने के लिए दौड़ पड़े---   (70)

(मक्का के) इन विश्वास न करने वालों से पहले गुज़र चुके लोगों में भी ज़्यादातर लोग सही रास्ते से भटके हुए थे, (71)

हालाँकि हमने उन्हें सावधान करने के लिए कई रसूल [messengers] भेजे थे:  (72)
 
तो आप देख लें कि जिन्हें सावधान किया गया था, उन लोगों का अंजाम कैसा हुआ! (73)

हाँ, अल्लाह के नेक व समर्पित बंदों की बात अलग है (वे सुरक्षित रहे)।  (74)
नूह [Noah] ने (जब मुसीबत में) हमें पुकारा था, तो कितनी ज़बरदस्त रही हमारी जवाबी कार्रवाई!  (75)

हमने उन्हें और उनके परिवारवालों को बड़े दुख-दर्द और बेचैनी से छुटकारा दिया,  (76)

और हमने उनकी ही नस्ल को धरती पर बाक़ी बचाए रखा, (77)

और हमने ऐसा किया कि बाद में आने वाली पीढ़ियों में भी उन्हें हमेशा अच्छे नामों से याद किया जाता रहा:  (78)

"सलाम हो नूह पर सारे संसार वालों में!" (79)

अच्छे काम करने वालों को हम ऐसा ही इनाम देते हैं:   (80)

निश्चय ही वह हमारे ईमानवाले बंदों में से था।  (81)

फिर बाक़ी बचे लोगों को हमने डूबो दिया। (82)
और इबराहीम [Abraham] भी उसी (नूह के) रास्ते पर चलने में विश्वास रखते थे: (83)

वह अपने रब के पास एक साफ़ व समर्पित हृदय लेकर आए थे; (84)

उन्होंने अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किसकी पूजा करते हो? (85)

तुम असली अल्लाह को छोड़कर दूसरे झूठे देवताओं को कैसे मान सकते हो? (86)

अच्छा, सारे संसार के पालने वाले [रब] के बारे में तुम्हारा क्या ख़्याल है?" (87)

फिर उन्होंने एक नज़र ऊपर तारों पर डाली,  (88)

और कहा, "मेरी तबियत ख़राब है।" (सो मैं मेले में नहीं जा सकता!)  (89)

सो (उनकी क़ौम के लोगों ने) पीठ फेरी और वे उन्हें छोड़कर चले गए। (90)

फिर वह [इबराहीम] उनके देवताओं की तरफ़ गए और कहा, "क्या तुम खाते नहीं? (91)

तुम्हें क्या हुआ कि तुम बोलते भी नहीं?" (92)

फिर वह मुड़े और उन्होंने अपने दाहिने हाथ से (उन देवताओं की मूर्तियों पर) भरपूर वार करके उन्हें तोड़ डाला।  (93)

फिर (पता चलते ही) उनकी क़ौम के लोग उनके पास दौड़े हुए आए,  (94)

(इबराहीम ने) कहा, "तुम उनको कैसे पूज सकते हो, जिन्हें स्वयं अपने हाथों से तराशते हो, (95)

जबकि वह अल्लाह है जिसने तुम्हें भी पैदा किया है और जो कुछ तुम बनाते हो, उनको भी?" (96)

वे बोले, "उनके लिए एक चिता तैयार करो और उन्हें भड़कती आग में फेंक दो!" (97)

इस तरह, वे लोग उन्हें नुक़सान पहुँचाना चाहते थे, मगर (आग का उन पर कोई असर न हुआ और) हमने उन लोगों को पूरी तरह से नीचा दिखा दिया।  (98)
उस [इबराहीम] ने कहा, "मैं अपने रब की ओर जा रहा हूँ: वह ज़रूर मेरा मार्गदर्शन करेगा (99)

ऐ मेरे रब! मुझे ऐसी संतान दे जो नेक लोगों मे से हो।" (100)

तो हमने उन्हें एक सहनशील बेटे [इस्माईल, Ishmael] के होने की ख़ुशख़बरी सुना दी।  (101)

फिर जब वह लड़का इतना बड़ा हो गया कि बाप के काम में हाथ बँटाने लगा (और उनके साथ दौड़-धूप करने लगा), तब इबराहीम ने उससे कहा, "ऐ मेरे बेटे! मैंने सपने में देखा है कि मैं तुझे क़ुरबान कर रहा हूँ। तो अब बताओ, कि तुम्हारा क्या विचार है?" उसने कहा, "ऐ मेरे बाबा! आप वही करें जिसका आपको आदेश दिया जा रहा है, और अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे धैर्य [सब्र] करने वालों में से पाएँगे।" (102)

फिर जब दोनों ने अपने आपको अल्लाह (की मर्ज़ी) के आगे झुका दिया, और फिर उन्होंने अपने बेटे को माथे के बल लिटा दिया,  (103)

और... फिर हमने उसे  पुकारा, "ऐ इबराहीम! (104)

तूने सपने को सच कर दिखाया। निस्संदेह जो लोग अच्छा काम करते हैं, हम उनको इसी प्रकार इनाम देते हैं"--- (105)

यह तो असल में एक परीक्षा थी ताकि (उनके असल चरित्र) सामने आ जाएं  --- (106)
 
और हमने उसके बेटे (की जान) को एक ज़बरदस्त (जानवर की) क़ुरबानी के बदले में छुड़ा लिया,  (107)
और हमने ऐसी परम्परा बनायी कि बाद में आने वाली पीढ़ियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा: (108)

"सलाम हो इबराहीम पर! " (109)

हम नेकी करने वालों को बदले में ऐसा ही इनाम दिया करते हैं।  (110)

सचमुच ही वह हमारे आज्ञाकारी बंदों में से था। (111)
और हमने इबराहीम को (इस्माईल के बाद दूसरे बेटे) इसहाक़ की ख़ुशख़बरी  दी--- एक नबी और सच्चे व अच्छे आदमी की --- (112)

और हमने उसपर और इसहाक़ [Isaac] पर भी बरकतें [blessings] भेजीं: उनकी संतानों में से कुछ तो बहुत अच्छे थे, मगर कुछ खुलकर अपने आप पर बुराइयाँ करने वाले थे।  (113)

हमने मूसा और हारून [Moses & Aaron] पर भी ख़ास उपकार किया था:  (114)
 
हमने उन्हें और उनकी क़ौम के लोगों को बड़ी घुटन व बेचैनी से छुटकारा दिया था,  (115)

हमने उनकी मदद की, जिसके नतीजे में वे ही कामयाब रहे;  (116)

हमने उनको ऐसी किताब [तोरात, Torah] दी थी जो चीज़ों को बिल्कुल स्पष्ट करने वाली थी;   (117)

और हमने उन्हें सीधा मार्ग दिखाया;  (118)

और ऐसी परम्परा बनाई कि बाद में आने वाली पीढ़ियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा,  (119)

"सलाम हो मूसा और हारून पर!" (120)

निस्संदेह जो अच्छा काम करते हैं, हम उन्हें बदले में ऐसा ही इनाम दिया करते हैं:  (121)

सचमुच ही वे दोनों हमारे आज्ञाकारी बंदों में से थे।  (122)

और इसमें शक नहीं कि इल्यास [Elijah] भी रसूलों में से था। (123)

उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "क्या तुम अल्लाह से नहीं डरते? (124)
 
तुम ऐसा कैसे कर सकते हो कि 'बाल' (नामक देवता) की पूजा करते हो और उसे छोड़ बैठे हो जो सबसे महान रचना करनेवाला है, (125)
अर्थात अल्लाह, जो तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप-दादाओं का भी रब है?" (126)

मगर उन लोगों ने उसे मानने से इंकार कर दिया। इसके नतीजे में वे लोग (दंड के लिए) पकड़कर हाज़िर किए जाएँगे;  (127)

मगर अल्लाह के सच्चे बंदों की बात अलग होगी।  (128)

और हमने ऐसी परम्परा बनायी कि बाद में आने वाली पीढ़ियों में उन्हें अच्छे नामों से याद किया जाता रहा।  (129)

"सलाम हो इल्यास पर!" (130)

निस्संदेह जो अच्छा काम करते हैं, हम उन्हें बदले में ऐसा ही इनाम दिया करते हैं:  (131)

सचमुच वह हमारे आज्ञाकारी बंदों में से एक था।  (132)
और निश्चय ही लूत [Lot] भी रसूलों में से एक था (133)

हमने उसे और उसके परिवार के लोगों को बचा लिया था --- (134)

सिवाय एक बुढ़िया [उनकी पत्नी] के, जो पीछे रह जाने वाले (काफ़िरों) में से थी --- (135)

बाक़ी बचे लोगों को हमने तहस-नहस कर दिया।  (136)


तो (ऐ मक्का के लोगो!) तुम (लोग सीरिया) आते-जाते उन बस्तियों (के खंडहरों) के पास से गुज़रते हो, कभी सुबह में,  (137)

और रात में भी: तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते? (138)


और निस्संदेह यूनुस [Jonah] भी रसूलो में से एक था।  (139)

जब वह भागकर पहले से भरी हुई नौका में पहुँचा, (140)

और फिर (भँवर में फंसी नौका को बचाने के लिए उसमें से एक आदमी को उतारना था), वह अपने नाम की पर्ची डालने में शामिल हुआ और उसमें उसकी हार हुई (कि पर्ची में उसका ही नाम निकला) (141)

(सो उसे नौका से फेंक दिया गया) और फिर उसे एक बड़ी मछली ने निगल लिया, जबकि उसके द्वारा कुछ दोषपूर्ण काम हो गए थे। (142)

अगर वह उन लोगों में से न होता जो अल्लाह की बड़ाई बयान करते रहते हैं,  (143)
 
तो वह उसी (मछली) के पेट में उस (क़यामत के) दिन तक पड़ा रहता, जब सारे लोग (क़ब्रों से) उठाए जाएँगे। (144)

मगर हमने उसे एक खुले व उजाड़ तट पर (मछली के पेट से) बाहर निकाल दिया, जबकि वह (अभी) बीमार था। (145)

और हमने उस पर (कद्दू का) बेलदार पेड़ उगा दिया था, (146)

फिर हमने उसे एक लाख बल्कि उससे अधिक (लोगों) की ओर [नैनवा, Nineveh नामी शहर में] रसूल बनाकर भेजा, (147)

उन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास किया, तो हमने उन्हें एक ज़माने तक ज़िंदगी के सुख भोगने का मौक़ा दे दिया। (148)

[ऐ रसूल] अब उन (मक्का के काफ़िरों] से पूछें, "क्या यह सही है कि तुम्हारे रब के पास तो बेटियाँ हैं, और उन लोगों ने अपने लिए बेटे चुने हैं (क्योंकि उन्हें तो बेटियाँ पसंद नहीं)? (149)

या क्या हमने फ़रिश्तों को औरतों के रूप में बनाया और इन्हें बनाते समय वे यह सब देख रहे थे?" (150)

बिल्कुल नहीं!, यह झूठी व मनघड़ंत बातें हैं, जब वे कहते हैं, (151)

कि "अल्लाह के यहाँ औलाद हुई है!" निश्चय ही वे झूठे हैं ।(152)

क्या सचमुच अल्लाह ने बेटों की अपेक्षा बेटियाँ चुन ली हैं? (153)

तुम्हें क्या हो गया है? आख़िर तुम अपने फ़ैसले किस तरह करते हो? (154)

तो क्या तुम सोच-विचार नहीं करते? (155)

या शायद तुम्हारे पास कोई पक्का सुबूत है? (156)

अगर तुम सच बोल रहे हो, तो ले आओ अपनी किताबें।  (157)

वे झूठा दावा करते हैं कि जिन्नों के साथ उनकी रिश्तेदारी है, हालाँकि उन (जिन्नों) को अच्छी तरह से मालूम है कि वे पकड़कर (अल्लाह के सामने) हाज़िर किए जाएँगे ----  (158)

अल्लाह उन चीज़ों से कहीं ऊँचा है, जो कुछ वे उसके बारे में बातें बनाते रहते हैं----- (159)

अल्लाह के जो सच्चे बंदे होते हैं, वे ऐसे काम नहीं करते ---- (160)

तुम और जिनकी पूजा तुम करते हो, (161)

तुम किसी को भी अल्लाह के विरुद्ध (बग़ावत के लिए) बहका नहीं सकते, (162)

सिवाय उनके जिनकी (क़िस्मत में) जहन्नम की आग में जलना लिखा हुआ है।  (163)

और (फ़रिश्ते तो कहते हैं कि), “हममें से हर एक के लिए ख़ास जगह पहले से तय की हुई है: (164)

और हम (हुक्म मानने के लिए) क़तारों में खड़े रहते हैं। (165)

और सचमुच हम अल्लाह की बड़ाई का गुणगान करते रहते हैं।”  (166)

और वे [काफ़िर] लोग तो यह कहा करते थे कि (167)

"अगर हमारे पास भी पीछे गुज़रे हुए लोगों की तरह नसीहत की कोई किताब होती,  (168)

तो हम ज़रूर अल्लाह के सच्चे बंदों में शामिल होते",  (169)

इसके बावजूद वे अब (क़ुरआन को) मानने से इंकार करते हैं। तो अब जल्द ही उन्हें पता चल जाएगा। (170)

और हम अपने उन बंदों में से जो रसूल बनाकर भेजे गए, पहले ही वादा कर चुके हैं:  (171)

यही वे लोग हैं जिनकी मदद की जाएगी, (172)

और जो कोई भी इसके समर्थन में खड़ा होगा, जीत उन्हीं लोगों की होगी।  (173)
 
अतः [ऐ रसूल] कुछ समय के लिए आप उनसे मुँह मोड़ लें।  (174)

उन्हें देखते रहें: वे जल्द ही (अपना परिणाम) देख लेंगे!  (175)

क्या वे सचमुच हमारी यातना के जल्दी आ जाने की कामना करते हैं?  (176)

तो जब सचमुच वह [यातना] उनके आँगन में आ उतरेगी, तो वह सुबह उनके लिए बड़ी ही दर्दनाक होगी, जिन्हें सावधान किया जा चुका था! (177)

[ऐ रसूल!] आप कुछ समय के लिए उन विश्वास न करनेवालों से मुँह मोड़ लें।  (178)

उन्हें देखते रहें: वे बहुत जल्द (इसका परिणाम) देख लेंगे!   (179)

तुम्हारा रब बहुत इज़्ज़तवाला व महान रब है, और वह इन चीज़ों से कहीं ऊँचा है, जिसके बारे में लोग बातें बनाते हैं! (180)

सलाम है रसूलों पर; (181)
और सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का रब है। (182)
 
 
 
 
नोट: 
 

1-5: यहाँ फ़रिश्तों की क़सम खायी गई है, जो क़तारों में खड़े होते हैं (देखें 78: 38); फ़रिश्ते उन लोगों को फटकारते रहते हैं जो उनके बारे में झूठे दावे करते हैं, साथ में शैतानों को भी डाँटते-फटकारते हैं जब वे ऊपर आसमान से कुछ ख़बर पता लगाने की कोशिश करते हैं।

10: इस बात का वर्णन सूरह हिज्र (15: 17-18) में भी आया है।

11: बिना किसी चीज़ के [Out of nothing] पूरी सृष्टि, यानी सूरज, तारे, चाँद, पहाड़ आदि की रचना कर देने वाले अल्लाह के लिए मिट्टी से बने इंसान को उसकी मौत के बाद दोबारा पैदा करने में क्या मुश्किल हो सकती है!

19: यह तब होगा जब दूसरी बार नरसिंघा बजाया जाएगा।

28: यानी तुमने दबाव डाला, सच्चाई के नाम पर झाँसा दिया, भलाई करने से रोका, झूठी क़समों के साथ धोखे में डाला इत्यादि।

65: कुछ लोगों ने इसका अनुवाद साँपों का सिर भी किया है, और इसीलिए ज़क़्क़ूम के पेड़ को नागफनी का पेड़ समझा है।

82: नूह (अलै) और उनकी क़ौम का पूरा विवरण सूरह हूद (11: 36) में आया है।

98: इस घटना का वर्णन सूरह अंबिया (21: 68-70) में आया है।

99: हज़रत इबराहीम इराक़ के रहने वाले थे, इस घटना के बाद वह सीरिया की तरफ़ चले गए थे।

102: यह तो एक सपना था, मगर नबियों का सपना सच होता है जिसमें अल्लाह का संदेश छिपा होता है।

107: हज़रत इबराहीम की छुरी हज़रत इस्माईल के बजाय एक मेंढे पर चली, जिसे अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से उसे वहाँ भेज दिया, और इस्माइल (अलै.) ज़िंदा बच गए।

123: सुलैमान (अलै.) के बाद जब इसराईल की संतानों में एक ख़ुदा को छोड़कर धीरे-धीरे बहुदेववाद शुरू हुआ, तो अल्लाह ने इल्यास (अलै.) को वहाँ पैग़म्बर बनाकर भेजा। बाइबल में है कि राजा अख़िअब की बीवी अज़ाबील ने बाल नामक देवता की पूजा शुरू की थी, जब इल्यास (अलै.) ने उन्हें रोका, तो उनको क़त्ल कर देने की योजनाएं बनने लगीं। अल्लाह ने उनकी योजना असफल कर दी और उन लोगों को मुसीबतों में डाल दिया और हज़रत इल्यास को अपने पास बुला लिया।

139: हज़रत यूनुस (अलै.) का वर्णन सूरह यूनुस (10: 98) और सूरह अंबिया (21: 87) में भी है। वह इराक़ के शहर नैनवा में भेजे गए थे, वहाँ काफ़ी समय तक वह अल्लाह का संदेश देते रहे। जब उन्होंने देखा कि उनकी क़ौम के लोग एक अल्लाह पर विश्वास नहीं करते और ग़लत कामों से नहीं रुक रहे हैं, तो उन्होंने लोगों को कड़ी चेतावनी दी कि अब तुम पर तीन दिन के अंदर भयानक यातना आकर रहेगी। वहाँ के लोगों ने यह तय किया कि अगर हज़रत यूनुस बस्ती छोड़कर चले जाते हैं, तो यह इशारा होगा कि वह ठीक कह रहे हैं। इस बीच अल्लाह के हुक्म से हज़रत यूनुस (अलै,) बस्ती छोड़कर चले गए। इधर बस्ती के लोगों ने देखा कि हज़रत यूनुस बस्ती में नहीं हैं, उन्हें यातना के आने का यक़ीन हो गया। उन लोगों ने अल्लाह के सामने झुकते हुए तौबा की जिसके नतीजे में उनसे यातना टल गई। इधर तीन दिन गुज़र जाने के बाद हज़रत यूनुस ने देखा कि जब कोई यातना नहीं आयी, तो उन्हें डर हुआ कि अगर बस्ती वालों ने उन्हें देख लिया तो उन्हें झूठा कहेंगे और हो सकता है कि क़त्ल कर दें। सो वह बस्ती में जाने के बजाय समंदर की तरफ़ निकल गए। अल्लाह को यह बात पसंद नहीं आयी कि बिना इजाज़त उन्होंने बस्ती छोड़ने का फ़ैसला क्यों कर लिया। इधर वह एक नौका में सवार हो गए जो आदमियों से भरी हुई थी, ज़्यादा वज़न हो जाने के कारण नौका डूबने को आई, ऐसे में नौका से एक आदमी को कम करने के लिए उनके नामों की लाटरी लगाई गई जिसमें हज़रत यूनुस का ही नाम निकला, अत: उन्हें पानी में फेंक दिया गया, उन्हें एक बड़ी मछली ने निगल लिया, कुछ अवधि आप पेट में ही रहे, फिर अल्लाह के हुक्म से मछली ने आपको किनारे पर उगल दिया। 

149: मक्का के बहुदेववादी लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ कहा करते थे, हालाँकि अल्लाह को औलाद की ज़रूरत नहीं। मज़े की बात यह कि ख़ुद ये लोग बेटियों को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे, बल्कि कुछ लोग बेटियों को ज़िंदा दफ़न कर देते थे।

158: एक और मान्यता थी जिसके अनुसार जिन्नों के सरदारों की बेटियाँ फ़रिश्तों की माताएं मानी जाती थी। 


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