Tuesday, April 5, 2022

Surah/सूरह 7: Al-Aa'raf/अल-अ'राफ़ [ऊँची जगह/ The Heights]

सूरह 7: अल-अ'राफ़ 
[ऊँची जगह/ The Heights]

इस सूरह की आयत 46 में बताया गया है कि क़यामत के दिन अच्छे व नेक लोगों और गुनाहगार लोगों के बीच रोक के तौर पर एक "ऊँची सी जगह" होगी जो दोनों तरह के लोगों को अलग-अलग कर देगी, इसी "ऊँची जगह"[अराफ़] पर इस सूरह का नाम पड़ा है। सूरह के शुरू में पैग़म्बर साहब को संबोधित करके उन्हें फिर से आश्वस्त किया गया है कि ये आयतें अल्लाह द्वारा उतारी जा रही हैं और अगर लोग आपकी बात नहीं मान रहे हैं तो इससे ज़्यादा बेचैन होने की ज़रूरत नहीं है, और सूरह के अंत में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि जो भी आयतें उतरती हैं, आपका काम केवल उन्हें वैसे ही दुहरा [repeat] देना है। विश्वास न करनेवालों को पुरानी पीढ़ियों की बर्बादी के क़िस्से सुनाये गए हैं और उनके होने वाले अंजाम की चेतावनी दी गई है, ताकि वे ध्यान दें और अपने आप में सुधार लाते हुए गुनाहों की माफ़ी माँगें इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। इन दोनों विषयों की मदद से पैग़म्बर साहब और ईमानवालों का हौसला भी बढ़ाया गया है। शैतान की अकड़ और आदम अलै. के बहकावे में आ जाने और उसके नतीजे में जन्नत से निकाले जाने की कहानी विस्तार से यहाँ बतायी गई है, साथ में ईमानवालों को शैतान के बहकावे से बचकर रहने का सबक़ भी दिया गया है। जन्नत और जहन्नम के बारे में भी बड़े अच्छे अंदाज़ में ज़िक्र (आयत 36-53) आया है। 



विषय:

02-03: यह किताब है 

04-09: अंतिम फ़ैसला 

10-25: आदम (अलै), इबलीस और जन्नत से बाहर निकलना 

26-37: आदम की संतानों से संबोधन 

38-51: अंतिम फ़ैसले का दृश्य 

52-53: किताब और उसमें कही हुई बात पूरी होना 

54-58: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ 

59-64: नूह (अलै) और उसकी क़ौम की कहानी 

65-72: हूद (अलै) और आद के लोगों की कहानी 

73-79: सालेह (अलै) और समूद के लोगों की कहानी 

80-84: लूत (अलै) और उनकी क़ौम के लोगों की कहानी 

85-93: शुएब (अलै) और मदयन के लोगों की कहानी

94-102 : पिछले रसूलों की कहानियों का निष्कर्ष 

103-137: मूसा (अलै) और फिरऔन की कहानी 

138-157: मूसा (अलै) और इसराईल की संतान 

158    : अल्लाह के रसूल पर विश्वास करने पर ज़ोर 

159-171: मूसा (अलै) और इसराईल की संतान (जारी)

172-174: आदम की संतानों से अल्लाह का लिया हुआ वचन 

175-176: एक रसूल की कहानी जो अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा सके 

177-179: जिन लोगों ने अल्लाह की निशानियों को ठुकरा दिया 

180    : सारे अच्छे नाम अल्लाह के 

181-186: जिन लोगों ने अल्लाह की निशानियों को ठुकरा दिया

187-188: (क़यामत की) घड़ी कब आयेगी?

189-198: इंसानों की पैदाइश और मूर्तिपूजा की शुरुआत 

199-206: पैग़म्बर को सलाह  

 
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰ साद॰ (1)

[ऐ रसूल!] यह एक किताब [क़ुरआन] है, जो आप पर उतारी गयी है, ताकि इसकी मदद से आप (लोगों को) चेतावनी दे सकें और ईमानवालों को (नसीहत की बातें) याद दिला सकें। तो देखें! ऐसा नहीं होना चाहिए कि इसके चलते आपका दिल बेचैन रहा करे। (2)

"(लोगो!) जो किताब तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजी गयी है, उसी के पीछे चलो; अपने रब को छोड़कर (अपने बनाए हुए) दूसरे मालिकों के पीछे मत चलो। मगर (अफ़सोस!) तुम नसीहत पर बहुत कम ही ध्यान देते हो! (3)

 
कितनी ही बस्तियों को हमने (उनके कर्मों के चलते) बर्बाद कर दिया! उन पर हमारी यातना (अचानक ही) आ पहुँची, सोयी रात में, या दोपहर के वक़्त जबकि वे आराम कर रहे थे: (4)

फिर जब उनपर (सचमुच) यातना आ गयी, तो उनके पास कहने को कुछ न रहा, सिवाय इसके कि वे पुकार उठे, "हम सचमुच मुजरिम थे!" (5)

हम उन लोगों से अवश्य पूछताछ करेंगे जिनके पास रसूलों को भेजा गया था (कि उन्होंने रसूलों की बात मानी या नहीं)------ और हम उन रसूलों से भी ज़रूर पूछताछ करेंगे (कि उन्होंने हमारे संदेशों को ठीक-ठीक पहुँचाया या नहीं)- ----- (6)

फिर जो कुछ भी उन लोगों ने किया होगा, वे सारी बातें हम उनके सामने बता देंगे, क्योंकि हमें तो इनकी पूरी जानकारी है, और (इन घटनाओं के समय) हम कहीं ग़ायब तो न थे। (7)

और उस दिन कर्मों के वज़न को सही-सही और इंसाफ के साथ तौला जाएगा: जिनके अच्छे कर्मों का पलड़ा भारी निकला, तो वही हैं जो कामयाब हो गए, (8)

और जिनके अच्छे कर्मों का पलड़ा हल्का निकला, तो ये वही लोग होंगे जो हमारे संदेशों को मानने से इंकार करते रहे, और नतीजे में अपने आपको घाटे में डाल बैठे। (9)

 
हमने तुम (लोगों) को ज़मीन में बसा दिया, और साथ में ज़िंदगी गुज़ारने के सारे सामान भी दे दिए-----(मगर) शायद ही कभी तुम शुक्र अदा करते हो! (10)

[ऐ इंसानो!], हमने तुम्हें पैदा किया; तुम्हारी शक्ल-सूरत बनायी, उसके बाद, हमने फ़रिश्तों से कहा, "(पहले इंसान) आदम [Adam] के आगे झुक जाओ", और सब (फरिश्ते) झुक गए। मगर इबलीस न झुका: वह झुकने वालों में शामिल न था। (11)

अल्लाह ने कहा, "तुझे किस बात ने (आदम के सामने) झुकने से रोक दिया, जबकि मैंने तुझे आदेश दिया था?", (इबलीस ने) कहा, "मैं उससे बेहतर हूँ: तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से।" (12)

अल्लाह ने कहा, "उतर जा यहाँ से! यह [जन्नत] तुम्हारे घमंड करने की जगह नहीं है। निकल जा, दूर हो यहाँ से!, तू उनमें से हो गया जो अपमानित हुए!" (13)

मगर इबलीस ने कहा, "मुझे उस दिन तक (ज़िंदा रहने की) छूट दे दे, जिस दिन मरे हुए लोगों को ज़िंदा करके दोबारा उठाया जाएगा।" (14

और अल्लाह ने जवाब दिया, "तुझे छूट दी गयी।" (15)

और फिर इबलीस ने कहा, "चूँकि तूने मुझे ग़लत राह पर लगा दिया है, इसलिए अब मैं भी तेरे सीधे मार्ग पर उन सब लोगों की ताक में बैठूँगा:  (16)

मैं उन पर (चारों तरफ़ से) हमले करूँगा---- "उनके सामने से और उनके पीछे से भी, उनके दाएँ से और उनके बाएँ से भी----- और तू उनमें से अधिकतर को शुक्र अदा करने वाला न पाएगा।" (17)

अल्लाह ने कहा, "निकल जा यहाँ से! बेइज़्ज़त और ठुकराया हुआ! मुझे क़सम है, कि मैं जहन्नम को तुझसे और उन सबसे भर दूँगा जो तेरे पीछे चलेंगे।" (18

मगर "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी बीवी, दोनों (जन्नत के) बागों में रहो, और जहाँ से जो चीज़ चाहो, खाओ-पियो, लेकिन इस पेड़ के नज़दीक मत जाना, नहीं तो (याद रखो!) तुम भी ग़लती करने वालों में से हो जाओगे।" (19)

 
फिर ऐसा हुआ कि शैतान ने उन दोनों के दिल में एक ऐसी बात डाल दी, जिससे उनकी नग्नता [Nakedness], जो उनसे छिपी हुई थीं, उनके सामने खुल जाए: उसने कहा, "तुम्हारे रब ने तुम दोनों को जो इस पेड़ से रोका है, तो केवल इसलिए, कि कहीं ऐसा न हो कि तुम फ़रिश्ते बन जाओ या कहीं हमेशा की ज़िंदगी न हासिल हो जाए।" (20)

और उसने उनके सामने क़समें खायीं, "मैं तुम को पूरी ईमानदारी से सलाह दे रहा हूँ"---- (21)

उसने झूठी बातें बोलकर उन्हें धोखे में डाल दिया। अन्ततः जब उन्होंने उस पेड़ का फल खा लिया, तो उनकी नग्नता उनके सामने खुल गयी, और वे अपने आपको ढकने के लिए बाग़ के पत्ते जोड़-जोड़कर अपने बदन पर रखने लगे। तब उनके रब ने उन्हें पुकारा, "क्या मैंने तुम को उस पेड़ के पास जाने से नहीं रोका था?, क्या मैंने तुम्हें बताया नहीं था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है?" (22)

उन दोनों ने जवाब दिया, "हमारे रब! हम अपने ही हाथों अपना नुक़सान कर बैठे हैं: अगर तूने हमें माफ़ न किया और हम पर दया न की, तो फिर हम बर्बाद हो जाएंगे।" (23)

अल्लाह ने कहा, "निकल जाओ यहाँ से तुम सब! तुम [शैतान और आदमी] एक-दूसरे के दुश्मन हो! अब तुम्हारे लिए ज़मीन पर रहने की जगह होगी और जीवन-यापन के सामान होंगे----  मगर एक ख़ास अवधि तक।" (24)

और कहा, "वहीं (ज़मीन पर) तुम्हें जीना है, वहीं तुम्हें मरना होगा, और उसी से (मरने के बाद) तुम्हें दोबारा निकाला जाएगा।" (25)

 
ऐ आदम की सन्तान! हमने तुम्हें कपड़ा दिया है ताकि तुम अपने नंगेपन को छिपा सको और यह तुम्हारे सजने-संवरने का साधन भी है; (मगर अपने भीतर की बुराई छिपाने के लिए) परहेज़ का कपड़ा सब कपड़ों में बेहतर है: यह अल्लाह की निशानियों में से है ताकि वे ध्यान दे सकें। (26)

ऐ आदम की सन्तान! देखो! कहीं शैतान तुम्हें बहकावे में न डाल दे, जिस तरह उसने तुम्हारे माँ-बाप को जन्नत से निकलवा दिया था; उनके कपड़े उतरवा दिए थे, ताकि उनकी नग्नता उनके सामने खोल दे: वह और उसका गिरोह उस जगह से तुम्हें देखता है, जहाँ से तुम उन्हें नहीं देख सकते: हमने शैतानी करने वालों को उन लोगों का साथी व मददगार बना दिया है, जो ईमान नहीं रखते। (27)

 
इसके बावजूद, जब ये लोग कोई अश्लील (और बेशर्मी के) कर्म [Indecency] करते हैं, तो कहते हैं कि "हमने अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते हुए देखा है", और, "अल्लाह ने हमें ऐसा करने का आदेश दिया है।" [ऐ रसूल!] आप कह दें, "अल्लाह कभी अश्लील बातों का आदेश नहीं दिया करता। तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कैसे कह सकते हो, जिसके (सच होने की) तुम्हें कोई जानकारी नहीं है?" (28)

कह दें, "मेरे रब ने नैतिक रूप से सही काम करने का आदेश दिया है। तुम जहाँ कहीं भी इबादत [पूजा] करो, तो इबादत में तुम्हारा पूरा ध्यान उसी (रब) की तरफ़ होना चाहिए; अपने दीन [आस्था] को पूरी भक्ति के साथ उसी पर समर्पित करते हुए, उसे पुकारो। ठीक जैसे उसने तुम्हें शुरू में पैदा किया, वैसे ही तुम फिर से ज़िंदा करके उठाए जाओगे।" (29)

(तुममें से) कुछ को उसने (सीधा) मार्ग दिखा दिया और कुछ की क़िस्मत में (इंकार व बुरे कर्मों के चलते) भटकना लिख दिया: उन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर शैतानों को अपना रखवाला बना लिया, और यह समझते रहे कि वे सीधे मार्ग पर हैं। (30)

ऐ आदम की सन्तान! जब कभी तुम इबादत किया करो, तो अच्छी तरह कपड़े पहना करो, और (हलाल चीज़ें) खाओ पियो, मगर (ख़र्च करने में) हद से आगे न बढ़ो: बिना सोचे-समझे, बेकार की चीज़ों में पैसे उड़ाने वालों को अल्लाह पसन्द नहीं करता। (31)

[ऐ रसूल!] आप कहें, "अल्लाह ने अपने बंदों के लिए जो सजने-सँवरने और खाने-पीने की चीज़ें दी हैं, उन्हें इस्तेमाल करने से किसने रोका है?" कह दें, "ईमान रखनेवालों के लिए भी इस दुनिया की ज़िंदगी में ये सब चीज़ें (जायज़) हैं: (मगर) क़यामत के दिन ये चीज़ें केवल ईमानवालों के लिए ही होंगी।" तो (देखो!) किस तरह हम उन लोगों के लिए अपनी आयतों को साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से बताते हैं, जो बातों को समझते हैं। (32)

 
[ऐ रसूल!] आप कहें, "मेरा रब तो केवल अश्लील व बेशर्मी के कामों को करने से रोकता है------ चाहे वह खुले-आम की जाएं या ढँके-छिपे की जाएं---- और गुनाह करने से, और बेवजह ज़्यादती करने से, और यह कि तुम किसी को अल्लाह का साझेदार [Partner] ठहराओ जिसके लिए उसने कोई प्रमाण नहीं उतारा, और यह कि तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहो जिसकी तुम्हें कोई जानकारी न हो।" (33)

हर एक क़ौम के लोगों के लिए एक नियत समय तय किया हुआ है: वे न तो इसे समय से पहले ही ला सकते हैं, और न ही समय आ जाने पर वे इसे घड़ी भर के लिए भी टाल सकेंगे।  (34)

 
ऐ आदम की सन्तान! अगर तुम्हारे पास तुम्हीं में से कोई रसूल बनकर आता है, और मेरी आयतें पढ़कर सुनाता है, तो जिसने अल्लाह का डर रखते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाए रखा, और नेकी की ज़िन्दगी गुज़ारी, तो ऐसे लोगों को न कोई डर होगा और न वे दुखी होंगे। (35

मगर जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया, और अकड़ दिखाते हुए उनसे नफ़रत की, तो ऐसे ही लोग हैं जिनका घर (जहन्नम की) आग होगा, जिसमें वे हमेशा रहेंगे। (36

उस आदमी से बड़ा ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह के ख़िलाफ़ झूठी बातें गढ़ता हो, और उसकी आयतों को मानने से इंकार करता हो? ऐसे लोगों की क़िस्मत में जितनी रोज़ी लिखी हुई है, उतनी (इस दुनिया में) उन्हें मिलती रहेगी, मगर उसके बाद, जब हमारे फ़रिश्ते उनकी जान वापस ले जाने के लिए आएँगे, तो कहेंगे, "कहाँ हैं वे [ख़ुदा] जिन्हें तुम अल्लाह के बजाय पुकारा करते थे?" वे लोग कहेंगे, "वे तो हमें छोड़कर गुम हो गए हैं।" वे (अपने ही ख़िलाफ़ गवाही देते हुए) इस बात को मान लेंगे कि वे (सच्चाई में) विश्वास नहीं करते थे। (37)

अल्लाह कहेगा, "जाओ! तुम भी जिन्नों और इंसानों की उस भीड़ में शामिल हो जाओ जो तुमसे पहले (जहन्नम की) आग में जा चुकी हैं।" हर समूह, (जहन्नम में) घुसते समय अपने साथ के दूसरे समूहों को बुरा-भला कहते हुए घुसेगा, उसके बाद, जब अंदर में वे सब एक साथ जमा हो जाएंगे, तो उनमें से सबसे बाद में आने वाला समूह, अपने पहले आने वालों के बारे में कहेगा, "हमारे रब! इन्हीं लोगों ने हमें गुमराह कर दिया था: तू इन्हें आग की दुगनी सज़ा दे"----- अल्लाह कहेगा, "तुममें से हर एक के लिए दुगनी सज़ा है, हालाँकि तुम इसे नहीं जानते"---- (38)

उनमें से पहले आने वाले, आख़िर में आने वालों से कहेंगे, "तुम भी हमसे किसी मामले में अच्छे तो नहीं थे: (अपने कर्मों से) जो सज़ा तुमने कमायी है, अब उसका मज़ा चखो!" (39)

 
यक़ीन रखो कि ऐसे लोगों के लिए आसमान के दरवाज़े कभी नहीं खोले जाएंगे, जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया और अपनी अकड़ में उन्हें ठुकरा दिया; उनका जन्नत में दाख़िल होना ऐसा ही है जैसे, ऊँट (या मोटी रस्सी) का सूई के नाके में से गुज़र जाना। मुजरिमों को हम इसी तरह उनके जुर्म की सज़ा देते हैं---- (40)

जहन्नम उनके लिए आराम करने की जगह होगी (जहाँ आग का बिस्तर होगा) और उनके ऊपर परत-दर-परत, आग ही की चादर होगी-----शैतानी करने वालों को हम ऐसी ही यातना देते हैं। (41)

मगर जो लोग ईमान रखते हैं और उन्होंने अच्छे कर्म किए --- और (याद रहे कि) हम किसी जान पर उतना ही बोझ डालते हैं जितना वह सह सके---- तो बस ऐसे ही लोग जन्नतवाले हैं और वे हमेशा वहीं रहेंगे। (42

हम उनके दिलों के अंदर पलने वाली सारी बुरी भावनाओं को निकाल देंगे; उनके पैरों तले नहरें बह रही होंगी। वे कहेंगे, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें इस (ज़िंदगी का) रास्ता दिखाया: अगर अल्लाह ने हमें रास्ता न दिखाया होता, तो हम कभी भी सही रास्ता न खोज पाते। हमारे रब के रसूल सच्चाई का संदेश लेकर आए थे।" और फिर उन्हें एक आवाज़ सुनायी देगी, "यह है जन्नत, जो अब तुम्हारा अपना हो चुका है, उन अच्छे कर्मों के नतीजे में जो तुम करते रहे थे।" (43)

जन्नत के लोग (जहन्नम के) आगवालों को पुकारकर कहेंगे, "हमसे हमारे रब ने जो वादा किया था, उसे हमने सच पाया। तो क्या तुम्हारे रब ने जो तुमसे वादा कर रखा था, तुमने भी उसे सच पाया?" वे कहेंगे, "हाँ।" इतने में एक पुकारनेवाला उनके बीच पुकारेगा, "अल्लाह की फिटकार है शैतानियाँ करने वालों पर: (44)

जो अल्लाह के मार्ग से रोकते थे और उसे टेढ़ा करना चाहते थे और जो आख़िरत [Hereafter] का इंकार करते थे।" (45)

 
इन दोनों समूहों के बीच एक ओट [Barrier] होगी जो इनको अलग-अलग कर देगी, और (दोनों के बीच) ऊँचाई पर कुछ लोग होंगे जो हर एक समूह को उनके निशानों से पहचानते होंगे: वे जन्नतवालों से पुकारकर कहेंगे, "तुम पर सलामती हो!"--- वे अभी जन्नत में दाख़िल नहीं हुए होंगे, मगर वे उसके लिए आस लगाए होंगे, (46) 

और जब उनकी नज़रें आगवाले लोगों पर पड़ेंगी, तो वे कहेंगे, "हमारे रब, हमें शैतानियाँ करने वालों में शामिल न कर दीजियो!"---- (47)

और ऊँचाई पर ठहरे लोग कुछ ख़ास (बुरे) लोगों को जिन्हें ये उनके निशानियों से पहचानते होंगे, पुकारकर कहेंगे, "बताओ! क्या फ़ायदा हुआ तुम्हारी (जमा-पूँजी और) इतनी बड़ी संख्या में होने का, और तुम्हारी झूठी शान का? (48) 

(फिर जन्नतियों की तरफ़ इशारा करके कहेंगे) "और क्या ये वही लोग हैं ना, जिनके बारे में तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह उनपर कभी अपनी दया-दृष्टि न डालेगा?" (मगर उन लोगों से तो कह दिया गया है कि), "जन्नत में दाख़िल हो जाओ, तुम्हारे लिए न कोई डर है और न तुम दुखी होगे।" (49) 

 
आगवाले लोग जन्नत में रहने वालों को पुकारकर कहेंगे ,"थोड़ा पानी हमें भी दे दो, या उन चीज़ों में से ही कुछ दे दो जो अल्लाह ने तुम्हें दी हैं!" और वे कहेंगे, "अल्लाह ने ये दोनों चीज़ें इंकार करनेवालों के लिए मना कर दी हैं"----- (50

जिन लोगों ने दीन [धर्म] को बस एक ध्यान भटकाने, व खेल-तमाशे की चीज़ बना दिया था, और इस दुनिया की ज़िन्दगी ने उन्हें धोखे में डाल रखा था।” आज हम उन पर कोई ध्यान नहीं देंगे, जिस तरह उन्होंने उस (क़यामत के) दिन की होने वाली मुलाक़ात को नज़रअंदाज़ [ignore] कर दिया और हमारी आयतों को मानने से इंकार करते रहे। (51)

 
लोगों के लिए हम एक (आसमानी) किताब लाए हैं---- हमने सच्चे ज्ञान के आधार पर इसमें चीज़ों को विस्तार से बता दिया है----यह रास्ता दिखानेवाली और रहमत [mercy] है, उन लोगों के लिए जो (सच्चाई में) विश्वास करते हैं। (52

वे किसी और चीज़ के नहीं, बल्कि इसी इंतज़ार में हैं कि कब उस (आख़िरी अंजाम) के बारे में कही हुई बात [Prophecy] पूरी होती है? जिस दिन वह (क़यामत के बारे में) कही हुई बात पूरी हो जाएगी, तो जिन लोगों ने इसे नज़रअंदाज़ किया था, वे बोल उठेंगे, "हमारे रब के रसूल ने सच्ची बात कही थी। तो क्या कोई है जो अब हमारे लिए थोड़ी सिफ़ारिश कर सके? या क्या हमें वापस (उसी दुनिया में) भेजा जा सकता है ताकि जैसा हम पहले व्यवहार करते थे, उससे (इस बार) कुछ अलग व्यवहार कर सकें?" सचमुच वे अपनी जानें गँवा बैठेंगे, और वे सारी [मूर्तियाँ] जो उन्होंने गढ़ रखी थीं, वे उन्हें छोड़कर गुम हो चुकी होंगी।  (53)

 
अल्लाह ही तुम्हारा रब है, जिसने आसमानों और ज़मीन को छह दिनों में पैदा किया, फिर (काम-काज की व्यवस्था के लिए) अपने आपको सिंहासन पर स्थापित किया; उसने रात ऐसी बनायी है कि वह तेज़ी से पीछा करते हुए दिन को ढँक लेती है; उसने सूरज, चाँद और तारे भी पैदा किए, जो उसके आदेश से काम में लगे रहते हैं; सारी सृष्टि, और सारे आदेश, सब उसी के हैं। महिमा हो उसकी! वह सारे संसारों का रब है! (54)

अपने रब को विनम्रता से और चुपके-चुपके पुकारा करो---वह उन्हें पसंद नहीं करता जो मर्यादा की सीमाएं तोड़ने वाले हैं: (55)

और (देखो!) ज़मीन पर फैली बुराइयों को ठीक कर देने के बाद इसमें बिगाड़ न पैदा करो---- उसे (अपनी ग़लतियों से) डरते हुए और (उसकी रहमत की) उम्मीद के साथ पुकारा करो। अल्लाह की रहमत [mercy] उन लोगों के नज़दीक होती है जो अच्छा व नेक कर्म करते हैं।  (56)

यह अल्लाह है जो हवाएं भेजता है, जो उसकी आनेवाली बरकत [बारिश] की ख़ुशख़बरी लेकर आती है, और जब वे ऊपर उठकर बोझल बादलों को इकट्ठा कर लेती है, तो हम उसे किसी मुर्दा ज़मीन की तरफ उड़ा ले जाते हैं, जहाँ उससे पानी बरसाते हैं, फिर उससे हर तरह की फ़सलें उग जाती हैं, ठीक इसी तरह, हम मुर्दा लोगों को (धरती से) निकाल खड़ा करेंगे. तो क्या तुम इस पर विचार नहीं करोगे? (57)

अगर ज़मीन अच्छी हो, तो अपने रब की मर्ज़ी से, पेड़-पौधे काफी मात्रा में निकल आते हैं, लेकिन अगर ज़मीन ख़राब हुई, तो पैदावार होगी भी, तो बहुत ही कम: हम अपनी आयतों [निशानियों] को उन लोगों के लिए तरह-तरह से बयान करते हैं, जो अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं। (58)

 
हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास भेजा, तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो: उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। मैं डरता हूँ कि एक बड़े भयानक दिन की यातना कहीं तुम्हें न आ पकड़े!" (59)

मगर उसकी क़ौम के सरदारों ने कहा, "हमें तो ऐसा लगता है कि तुम गुमराही में काफ़ी दूर जा पड़े हो।" (60)

उन्होंने जवाब दिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! मेरे बारे में किसी गुमराही का कोई सवाल नहीं है! उल्टा मैं तो सारे संसारों के रब का भेजा हुआ एक रसूल हूँ। (61)

मैं तो अपने रब के संदेशों को तुम तक पहुँचा रहा हूँ और तुम्हारे हित में सलाह दे रहा हूँ। मैं अल्लाह की तरफ़ से उन चीज़ों को जानता हूँ, जो तुम नहीं जानते। (62)

क्या तुम्हें यह बड़ा अजीब लगता है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है--- एक ऐसे आदमी के द्वारा जो तुम्हीं में से एक हो----जो तुम्हें चेतावनी दे सके और तुम अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बच सको, ताकि तुम पर दया की जा सके?"  (63)

मगर उन लोगों ने नूह को झूठा घोषित कर दिया। हमने उसे बचा लिया, और उन लोगों को भी जो उसके साथ नौका में सवार थे, और उन लोगों को डुबा दिया जिन्होंने हमारी आयतों को मानने से इंकार किया था-----वे जानते-बूझते अन्धे बने हुए थे। (64)

 
आद की क़ौम के पास हमने उनके भाई हूद को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो: उस अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। तो क्या तुम इस बात पर ध्यान नहीं दोगे?" (65)

मगर उसकी क़ौम के विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "हमारा ऐसा मानना है कि तुम एक बेवक़ूफ़ आदमी हो" और "हमारी समझ से तुम एक झूठे आदमी भी हो।" (66)

हूद ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझमें बेवक़ूफ़ी की कोई बात नहीं है! उल्टा, मैं सारे संसारों के रब की तरफ़ से भेजा हुआ एक रसूल हूँ : (67)

"मैं तो अपने रब का संदेश तुम तक पहुँचा रहा हूँ। मैं तुम्हारा हित देखते हुए ईमानदारी से सलाह देता हूँ। (68)

"क्या तुम्हें यह बात इतनी अनोखी लगती है कि तुम्हारे रब की तरफ़ से संदेश आया है, वह भी एक ऐसे आदमी के द्वारा जो तुम्हीं में से एक हो, ताकि तुम्हें (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) चेतावनी दे सके? याद करो, किस तरह उसने नूह की क़ौम के बाद तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया, और क़द-काठी में तुम्हें (दूसरों से) लम्बा-चौड़ा बनाया: अल्लाह की नेमतों [bounties] को याद करो, ताकि तुम कामयाबी पा सको।" (69)

वे कहने लगे, "क्या तुम हमारे पास सचमुच यही बताने के लिए आए हो कि हम केवल अल्लाह की बन्दगी करें और जिनको हमारे बाप-दादा पूजते रहे हैं, उन्हें (पूजना) छोड़ दें? ठीक है, अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो जिस यातना (के आने) की धमकी तुम देते रहते हो, उसे हम पर ले आओ।" (70)

हूद ने कहा, "तुम पर तो तुम्हारे रब की नफ़रत और ग़ुस्से का क़हर टूट पड़ना तय हो चुका है। क्या तुम मुझसे उन (देवताओं के) नामों के लिए झगड़ रहे हो जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख छोड़े हैं, जिन नामों के लिए अल्लाह ने कोई मन्ज़ूरी नहीं दी? अच्छा, तो बस अब (आने वाले समय का) इंतजार करो; मैं भी इंतज़ार कर रहा हूँ।" (71)

फिर हमने अपनी दया दिखाते हुए हूद को, और जो लोग उसके साथ थे उन्हें बचा लिया; और उन लोगों को बर्बाद कर दिया जिन्होंने हमारी आयतों [निशानियों] को मानने से इंकार कर दिया था, और वे विश्वास करने वाले न थे।  (72)

 
(इसी तरह) समूद के लोगों की तरफ़ हमने उनके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो: उसके अलावा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। तुम्हारे रब की तरफ़ से अब एक स्पष्ट प्रमाण आ चुका है: यह अल्लाह के नाम पर छोड़ी हुई ऊँटनी है----यह तुम्हारे लिए एक निशानी है---- सो इसे अल्लाह की धरती पर खाने-चरने के लिए खुला छोड़ दो और देखो! उसे किसी तरह का कोई नुक़सान मत पहुँचाना, वरना एक दर्दनाक यातना तुम्हें आ लगेगी। (73)

याद करो कि किस तरह अल्लाह ने आद के बाद तुम्हें उनका उत्तराधिकारी बनाया और उस ज़मीन पर तुम्हें बसा दिया, जिस ज़मीन पर तुम अपने लिए महल बनाते हो और पहाड़ो को काट-काटकर मकान बना लेते हो: अल्लाह की बरकतों (blessings) को याद करो और धरती पर फ़साद फैलाते न फिरो।" (74

मगर उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने ईमान रखनेवाले लोगों को, जिसे वे बिल्कुल ही गया-गुज़रा समझते थे, कहा, "क्या तुम सचमुच ऐसा सोचते हो कि सालेह अपने रब का भेजा हुआ पैग़म्बर [Messenger] है?" उन लोगों ने कहा, "हाँ, हम उस संदेश पर विश्वास करते हैं, जो उनके माध्यम से भेजा जाता है।" (75)

मगर उन घमंडी सरदारों ने कहा, "जिस चीज़ पर तुम विश्वास करते हो, उसे हम तो मानने से इंकार करते हैं", (76)

उसके बाद, उन लोगों ने उस ऊँटनी के (अगले) पाँव को काटकर [hamstrung] मार डाला। फिर अपने रब के आदेश को मानने से साफ़ इंकार कर दिया और बोले, "ऐ सालेह! अगर तुम सचमुच के रसूल हो, तो हमें जिस यातना की धमकी देते रहते हो, उसे हम पर अब ले आओ!" (77

अन्त में, एक ज़बरदस्त भूचाल ने उन्हें दबोच लिया: सुबह होने तक वे अपने घरों में मरे पड़े रह गए। (78

फिर सालेह ने यह कहते हुए उन लोगों से मुँह फेर लिया, "ऐ मेरे लोगो! मैंने तुम्हें अपने रब का संदेश पहुँचा दिया और हमेशा तुम्हारी भलाई के लिए सलाह देता रहा, मगर (अफ़सोस!) तुम नेक सलाह देने वालों को पसंद नहीं करते।" (79)

 
हमने लूत [Lot] को भेजा और उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुमने क्यों इस अश्लील काम को अपना लिया है? दुनिया में कोई नहीं है जो इस गंदे काम में तुमसे आगे हो। (80)

सेक्स के लिए तुम औरतों के बजाय मर्दों के पीछे जाते हो! तुमने (अपनी हवस में) मर्यादा की सभी सीमाएं तोड़ डाली हैं!" (81)

उसके लोगों की तरफ़ से बस इतना ही जवाब मिला कि (वे आपस में) कहने लगे, "अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो इन (ईमानवाले) लोगों को! ये लोग अपने आपको बहुत पाक-साफ़ बनते हैं!" (82)

फिर ऐसा हुआ कि हमने लूत और उसके लोगों को (तबाह होने से) बचा लिया----- सिवाय उसकी बीवी के जो (शैतानी करने वालों के साथ) पीछे रह गयी---- (83)

और हमने उन बाक़ी बचे लोगों पर तबाह कर देनेवाली (पत्थरों की) बारिश की। तो देखो! शैतानियाँ करने वालों का कैसा अंजाम हुआ। (84)


मदयन [Midian] के लोगों के पास हमने उनके भाई, शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो: उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं। तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास एक स्पष्ट निशानी आ चुकी है। (जब सामान दो) तो नाप और तौल में पूरा-पूरा दिया करो, और लोगों की चीज़ों को कम करके मत आँका करो; और ज़मीन में सारी व्यवस्था ठीक कर देने के बाद उसमें गड़बड़ी पैदा न करो: यह तुम्हारे लिए ज़्यादा अच्छा है, अगर तुम ईमानवाले हो। (85)

"(देखो!) हर एक रास्ते पर न बैठ जाओ, कि (आते-जाते) लोगों को धमकियाँ देने लगो, और उन लोगों को अल्लाह के मार्ग (पर चलने) से रोकने लगो, जो उसपर ईमान रखते हों, और न उस मार्ग को टेढ़ा करने में लग जाओ। याद करो, तुम गिनती में कितने थोड़े हुआ करते थे, फिर उसने तुम्हें बढ़ाकर कई गुना कर दिया। ज़रा उनके अंजाम के बारे में सोचो, जो फ़साद फैलाया करते थे। (86

"अगर तुममें से कुछ लोग (अल्लाह के) उस संदेश में विश्वास रखते हों जो मैं लेकर आया हूँ, और कुछ दूसरे लोग (इस पर) विश्वास नहीं करते, तो उस समय तक धीरज से काम लो, जब तक कि अल्लाह हमारे बीच फ़ैसला न कर दे। और वह फ़ैसला करने वालों में सबसे अच्छा फ़ैसला करता है।" (87)

 
उसकी क़ौम के घमंडी सरदारों ने कहा, "ऐ शुऐब! अगर तुम हमारे दीन [Religion] में नहीं लौटे, तो हम तुम्हें और तुम्हारे साथ सारे ईमान रखने वालों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर करेंगे।" शुऐब ने कहा, "क्या! अगर यह (तुम्हारा धर्म) हमें बिल्कुल भी पसंद न हो, तब भी? (88

"अगर हमें तुम्हारे दीन में वापस जाना पड़े, जबकि अल्लाह हमें उससे बचा चुका है, तो यह अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ने जैसा होगा: उस (दीन) में अब वापस जाने का तो कोई सवाल ही नहीं है---- हाँ, अगर हमारे रब, अल्लाह की मर्ज़ी कुछ और हो तो बात अलग है। हर चीज़ को उसने अपने ज्ञान के घेरे में ले रखा है। हम तो अल्लाह पर भरोसा करते हैं। हमारे रब, तू हमारे और हमारी क़ौम के बीच सच्चाई को उजागर कर दे (और हमारे बीच) फ़ैसला कर दे, कि सचमुच तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।" (89)

उनकी क़ौम के विश्वास न करनेवाले सरदारों ने कहा, "अगर तुम शुऐब के बताए हुए रास्ते पर चले, तो सचमुच तुम घाटे में पड़ जाओगे"----  (90)

एक ज़बदस्त भूचाल ने उन्हें धर दबोचा: अगली सुबह होने तक वे अपने घरों में मरे पड़े थे; (91)

शुऐब की बातों को झूठ मानने वालों का ऐसा हाल हुआ, मानो वे कभी वहाँ बसे ही नहीं थे; जिन लोगों ने शुऐब को मानने से इंकार किया था, असल में वही लोग घाटे में रहे---- (92)

तब शुऐब ने उन लोगों से यह कहते हुए मुँह मोड़ लिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैंने अपने रब के सन्देशों को तुम तक पहुँचा दिया और तुम्हारा हित देखते हुए मैंने तुम्हें सही सलाह दी, तो जिन लोगों ने इस पर विश्वास करने से इंकार कर दिया, ऐसे लोगों (की तबाही) पर दुखी होने का क्या फ़ायदा है?" (93)
 

जब कभी हमने किसी बस्ती में कोई रसूल भेजा, तो वहाँ के (विश्वास न करनेवाले) लोगों को दु:ख-दर्द और तंगी में डाला, ताकि वे अपने आपको (अल्लाह के सामने) झुका दें, (94)

फिर उसके बाद हमने उनकी बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहाँ तक कि वे ख़ूब फले-फूले। लेकिन वे कहने लगे, "ये तंगहाली और ख़ुशहाली तो हमारे बाप-दादा ने भी झेली थीं", और नतीजे में हमने अचानक उन्हें धर-दबोचा, जबकि उन्हें इसकी भनक तक न थी। (95)

अगर उन बस्तियों के लोगों ने विश्वास किया होता, और अपने आपको बुराइयों से बचाया होता, तो हमने उनपर आसमानों और ज़मीन से बरकतों [blessings] की बारिश की होती, मगर उन लोगों ने सच्चाई को ठुकरा दिया, नतीजा यह हुआ कि हमने उन्हें उनके बुरे कर्मों के चलते दंड दिया। (96)


क्या (मक्का की) इन बस्तियों के लोगों ने अपने आपको सुरक्षित महसूस कर लिया है और वे सोचते ही नहीं हैं कि रात के समय जबकि वे सो रहे हों, उस वक़्त भी हमारी यातना आ सकती है? (97

और यातना दिन चढ़े भी आ सकती है, जबकि वे खेल-कूद में मगन हों? (98)

क्या अल्लाह की (ढील देने की) योजना के ख़िलाफ़ वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हैं? अल्लाह की योजना से तो केवल घाटे में पड़ने वाला ही सुरक्षित महसूस कर सकता है। (99

क्या उन लोगों को यह बात स्पष्ट नहीं है कि जिन्हें पिछली पीढ़ियों से धरती विरासत में मिल गयी है, अगर हम चाहें तो उनके गुनाहों पर उन्हें भी सज़ा दे सकते हैं? और हम उनके दिलों को बंद करके उस पर मुहर [Seal] लगा सकते हैं, ताकि वे कुछ भी सुन ही न सकें। (100)

(ऐ रसूल) हमने आपको उन बस्तियों की कहानियाँ सुना दी हैं: उनके पास कितने रसूल आए, साफ़ व स्पष्ट निशानियाँ आयीं, मगर जिस चीज़ को वे पहले ही मानने से इंकार कर चुके थे, वे उसमें विश्वास करने वाले न थे। इसी तरह, अल्लाह (हठधर्मी से) विश्वास न करने वालों के दिलों को बंद करके उसपर मुहर लगा देता है। (101)

हमने उनमें ज़्यादातर लोगों को वचन देने के बाद उसको निभाते हुए नहीं पाया; हमने उनमें अधिकतर लोगों को खुले-आम नियमों को तोड़ते हुए पाया। (102)


फिर इनके बाद हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसका समर्थन करने वाले बड़े सरदारों के पास भेजा, मगर उन लोगों ने उसे मानने से इंकार कर दिया, और देखो! उनका अंजाम क्या हुआ जो फ़साद फैलाया करते थे! (103

मूसा ने कहा, "ऐ फ़िरऔन! मैं सारे संसारों के रब का (भेजा हुआ) रसूल हूँ, (104)

"मेरा यह फ़र्ज़ बनता है कि मैं अल्लाह के बारे में सिवाय सच कहने के और कुछ न कहूँ, और मैं तुम्हारे रब की तरफ़ से (सच्चाई की) स्पष्ट निशानी लेकर आया हूँ। अतः तुम इसराईल की सन्तानों को मेरे साथ जाने दो।" (105)

फ़िरऔन ने कहा, "अगर तुम सच बोल रहे हो, तो उस निशानी को पेश करो, जो तुम लेकर आए हो।" (106

अत: मूसा ने अपनी लाठी नीचे फेंकी, देखते ही देखते वह, नज़र के सामने अजगर बन गयी, (107)

और फिर उसने अपना हाथ (अपनी बग़ल से) निकाला, तो अचानक सबके सामने वह सफ़ेद होकर चमकने लगा। (108

फ़िरऔन की क़ौम के सरदार (आपस में) कहने लगे, "अरे, यह तो बड़ा माहिर जादूगर लगता है! (109)

"वह तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल बाहर करना चाहता है!" फ़िरऔन ने कहा, "तो अब तुम्हारी क्या सलाह है?" (110)

उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को थोड़े समय के लिए टाल दो और इस बीच सभी शहरों में हरकारे [messengers] भेज दो, (111

"कि वे हर माहिर जादूगर को तुम्हारे पास ले आएँ।" (112)


सो जादूगर फ़िरऔन के पास पहुँच गए, और कहने लगे, "अगर हम जीत गए तो क्या हमें इनाम मिलेगा?" (113

उसने जवाब दिया, "हाँ, ज़रूर मिलेगा, और तुम (मेरे) ख़ास नज़दीकी लोगों में शामिल हो जाओगे।" (114

फिर जादूगरों ने कहा, "ऐ मूसा! तुम पहले (दांव) फेंकोगे या फिर हम फेंकें?" (115

मूसा ने कहा, "तुम ही पहले फेंको।" फिर उन्होंने (लाठी व रस्सियाँ) फेंकी, बस देखनेवालों की आँखों पर जादू कर दिया, (करतब से) उनमें डर पैदा कर दिया, और (सचमुच) उन्होंने ज़बरदस्त जादूगरी दिखायी। (116

फिर हमने मूसा को 'वही' [Inspiration] भेजी, "तुम भी अपनी लाठी (नीचे) फेंक दो!"-- फिर देखते ही देखते-- वह लाठी उनके रचे हुए स्वांग को निगल गयी।  (117)

इस तरह, सच्चाई साबित हो गयी और जो कुछ उन्होंने (जादू के असर से) पैदा किया था, वह बेकार होकर रह गए थे: (118

(फ़िरऔन के) जादूगरों की हार हो गयी, और वे बुरी तरह अपमानित हो गए।  (119)

फिर ऐसा हुआ कि सभी जादूगर घुटनों के बल गिर पड़े (120)

और बोले, "हम सारे संसारों के रब पर ईमान लाते हैं,  (121)

"मूसा और हारून के रब पर!" (122)

मगर फ़िरऔन बोला, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि बिना मेरी अनुमति के, तुमने उस (रब) पर विश्वास कर लिया! यह तो एक बड़ी साज़िश है, जो तुम लोगों ने रची है, ताकि इस शहर से लोगों को निकाल बाहर कर दो! अच्छा, तो तुम्हें जल्द ही (इसका नतीजा) मालूम हो जाएगा : (123

"मैं (तुम लोगों का) एक तरफ़ का हाथ और दूसरी तरफ़ का पाँव कटवा दूँगा; फिर तुम सबको सूली पर चढ़ा दूँगा!" (124)

जादूगरों ने (बिना डरे) कहा, "और इस तरह हम अपने रब के पास लौट जाएंगे----- (125)

"हमारे ख़िलाफ़ तेरी शिकायत बस यही तो है कि जब हमारे रब की निशानियाँ हमारे पास आ गयीं, तो हमने उनपर विश्वास कर लिया। हमारे रब! हम पर धीरज के साथ जमे रहने की ताक़त डाल दे, और हमें इस हालत में मौत दे कि हम पूरी भक्ति के साथ तेरी आज्ञा माननेवाले रहें।" (126)


फ़िरऔन की क़ौम के सरदारों ने उससे कहा, "मगर क्या तुम मूसा और उसके लोगों को ऐसे ही छोड़ दोगे कि वे ज़मीन में फ़साद फैलाते रहें और वे तुम्हें और तुम्हारे देवताओं को छोड़ बैठें?" फिरऔन ने कहा, "हम उनके (बच्चों में से) लड़कों को मार डालेंगे, और केवल औरतों को (दासियाँ बनाकर ज़िंदा) छोड़ देंगे: वे हमारी ताक़त से दबे हुए और बेबस हैं।" (127)

मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "मदद माँगना हो तो अल्लाह के सामने झुकते हुए माँगो और धीरज से काम लो: सारी धरती तो अल्लाह की है---- वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसे उस (संपत्ति) का वारिस बना देता है----और आने वाला अच्छा समय तो उन लोगों का ही है जो अपने आपको बुराइयों से बचाते हैं।" (128)

उन लोगों ने जवाब दिया, "तुम्हारे यहाँ आने के बहुत पहले से ही हम पर ज़ुल्म किया जा रहा था, और तुम्हारे आने के बाद भी यह (सिलसिला) चल रहा है।" मूसा ने कहा, "हो सकता है कि तुम्हारा रब तुम्हारे दुश्मनों को पूरी तरह से मिटा दे, और तुम्हें इस धरती पर उनका उत्तराधिकारी बना दे, ताकि वह यह देख सके कि तुम कैसा आचरण करते हो।" (129)


हमने फ़िरऔन के लोगों को वर्षों तक अकाल और फ़सल की ख़राबी जैसी मुसीबतों में डाला, ताकि शायद वे चेत जाएं व ध्यान दें, (130)

(मगर) फिर, जब उन पर कभी ख़ुशहाली आ जाती, तो वे कहते, "इस पर तो हमारा हक़ बनता था!" और जब उन्हें कोई बुरी हालत पेश आती, तो वे उसे मूसा और उसके साथियों का 'अपशगुन' [evil omen] बताते थे, मगर असल में, उनका 'अपशगुन' अल्लाह की तरफ़ से था, हालाँकि उनमें से अधिकतर लोग इस बात को समझ नहीं पाए।  (131)

और वे (मूसा से) बोले, "हम पर अपना जादू चलाने के लिए चाहे तू कैसी भी निशानियाँ हमारे सामने ले आए, हम तुझ पर विश्वास करने वाले नहीं हैं," (132)

और इसलिए, हमने उन पर (एक के बाद एक मुसीबतें) छोड़ दीं---- बाढ़, टिड्डियों (के दल), छोटे (घुन के) कीड़े [जुएं], मेंढक और ख़ून-----ये सभी साफ़-साफ़ निशानियाँ थीं। (मगर) वे बड़े घमंडी, और मुजरिम लोग थे। (133)

जब कभी उनपर (प्लेग के रूप में) यातना आ पड़ती, तो वे कहते थे, "ऐ मूसा, जो वादा तेरे रब ने तेरे साथ कर रखा है, उस आधार पर तू अपने रब से हमारे लिए दुआ कर दे: अगर तूने हमें इस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दिला दिया, तो हम तुझ पर विश्वास कर लेंगे, और इसराईल की सन्तान को तेरे साथ जाने देंगे," (134)

मगर जब हमने उन्हें उस (प्लेग की) यातना से छुटकारा दे दिया और उन्हें एक तय किया हुआ समय भी दिया (ताकि वे विश्वास करने का वादा पूरा कर सकें)-----तो क्या देखते हैं कि उन्होंने अपना वादा तोड़ डाला। (135

और इस तरह, चूँकि उन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया, और उन्हें पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया, तो फिर हमने उनसे बदला लिया: हमने उन्हें समंदर [लाल सागर] में डुबा दिया,  (136

और जिन (इसराइली) लोगों पर (बरसों से) ज़ुल्म हुआ था, हमने उन्हें उस भू-भाग के पूरब और पश्चिम के हिस्सों [सीरिया व फ़िलिस्तीन] का वारिस बना दिया, जिसे हमने बरकत [blessing] दी थी। (इस तरह) तुम्हारे रब ने इसराईल की सन्तान के साथ जो भलाई का वादा कर रखा था, वह पूरा हुआ, क्योंकि उन्होंने धीरज [सब्र] से काम लिया, और हमने फ़िरऔन और उसकी क़ौम का वह सब कुछ तहस-नहस कर दिया, जिसे वे (ख़ूबसूरती से) बनाते थे और जिन (ऊँचे भवनों) का निर्माण किया करते थे। (137)


और इसराईल की सन्तान को हम (सुरक्षित) समंदर पार करा लाए, फिर जब वे ऐसे लोगों के पास से गुज़रे जो मूर्तियों की पूजा करते थे, तो वे बोले, "ऐ मूसा! उन लोगों के देवताओं जैसा हमारे लिए भी एक देवता बना दो।" मूसा ने कहा, "तुम सचमुच बड़े ही बेवक़ूफ़ [व जाहिल] लोग हो: (138)

ये लोग जिन (देवताओं) की पूजा में लगे हुए हैं, वह तो बर्बाद होकर रहेगा, और जो कुछ ये करते आ रहे हैं, वह व्यर्थ व किसी काम का नहीं है। (139)

मैं तुम्हारे लिए अल्लाह को छोड़कर किसी और देवता को क्यों ढूढूँ, जबकि उसने दूसरे तमाम लोगों पर तुम्हें श्रेष्ठता दी है?" (140)

[ऐ इसराईल की संतानों!] याद करो कि हमने किस तरह तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से बचाया था, जिन्होंने तुम्हें बुरी से बुरी तकलीफ़ों में डाल रखा था, वे तुम्हारे बेटों को मार डालते और केवल तुम्हारी औरतों को (ज़िंदा) छोड़ देते थे---- इसमें तुम्हारे रब की तरफ़ से बड़ी कठिन परीक्षा थी। (141)

 
हमने मूसा के लिए (सीना/Sinai के पहाड़ पर इबादत करने को) तीस रातों की अवधि तय की थी, फिर उसमें दस और बढ़ा दिया: उसके रब की ठहराई हुई अवधि चालीस रातों में पूरी हुई। मूसा ने (जाने से पहले) अपने भाई हारून [Aaron] से कहा था, "मेरी (जगह पर) तुम मेरी क़ौम के लोगों को संभाल लेना: हर मामले में सही तरीक़े से काम करना, और उन लोगों के पीछे न चल पड़ना जो फ़साद फैलाते हैं।" (142)

जब मूसा तय किए हुए समय पर (सीना के पहाड़ पर) पहुँचा, और उसके रब ने उससे बातें की, तो वह कहने लगा, "मेरे रब! मैं तुझे देखना चाहता हूँ: मुझे देख लेने दे!" अल्लाह ने कहा, "तुम मुझे कभी नहीं देख सकोगे, मगर उस पहाड़ [तूर] को ध्यान से देखो: अगर वह पहाड़ अपनी जगह मज़बूती से खड़ा रह गया, तो फिर तुम मुझे देख लोगे", और जब उसके रब ने अपने आपको उस पहाड़ पर प्रकट किया, तो उसे चकनाचूर कर दिया: मूसा बेहोश होकर गिर पड़ा। फिर जब होश में आया, तो कहा, "महिमावान है तू! मैं (गुनाहों की) तौबा के लिए तेरी ही ओर झुकता हूँ! और इस बात पर (कि दुनिया में अल्लाह को कोई नहीं देख सकता है) मैंं सबसे पहले विश्वास करता हूँ!" (143)

अल्लाह ने कहा, "ऐ मूसा! मैंने तुम्हें अपने संदेश [तोरात/Torah] देकर, और तुमसे सीधे बात करके (तुम्हें चुन लिया है, और) तुम्हारा दर्जा दूसरे लोगों के मुक़ाबले में ऊँचा कर दिया है: जो कुछ मैंने तुम्हें दिया है, उसे सँभालकर रखो; और शुक्र अदा करने वालों में से हो जाओ।" (144)


हमने उनके लिए तख़्तियों [Tablets] पर (उपदेश की) हर चीज़ लिख दी थी, जो हर चीज़ को सिखाती और विस्तार से समझाती भी थी, और कहा, "उनको मज़बूती से थामे रहो, और अपने लोगों को आज्ञा दो कि वे उनकी बेहतरीन शिक्षाओं को अपनाएँ। मैं तुम्हें ऐसे लोगों का (आख़िरत में) अंत दिखा दूँगा, जो लोग आज्ञा नहीं मानते और उसके ख़िलाफ़ काम करते हैं। (145)

मैं अपनी निशानियों से उन लोगों को दूर रखूँगा, जो ज़मीन पर बिना अधिकार के घमंड में चूर रहते हैं, और वे ऐसे हैं कि अगर वे हर एक निशानी भी देख लें, तब भी वे उस पर विश्वास नहीं करेंगे; अगर वे सही मार्गदर्शन का रास्ता देख लें, तो वे उस रास्ते को नहीं अपनायेंगे, लेकिन अगर वे गुमराही का मार्ग देख लें, तो उसी रास्ते पर चल पड़ेंगे। यह इसलिए है क्योंकि उन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार किया और उन पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया:   (146)

जिन लोगों ने हमारी निशानियों को और आख़िरत में (हिसाब-किताब के लिए) होने वाली मुलाक़ात को झूठ समझकर ठुकरा दिया, तो उनके सारे कर्म बेकार जाएंगे------ उन्हें जो बदला दिया जाएगा, वह इसके सिवा कुछ न होगा कि उन्हीं के कर्मों का फल होगा। (147)

 
और जबकि मूसा वहाँ मौजूद नहीं था, उसकी क़ौम के लोगों ने एक बछड़े के आकार की चीज़ की पूजा करना शुरू कर दिया जिसमें से गाय की-सी आवाज़ निकलती थी-----यह बछड़ा उनके ज़ेवरों (को गलाने) से बनाया गया था। क्या वे इतना भी नहीं देख पाए कि वह न तो उनसे बातें करता है और न उन्हें कोई रास्ता ही दिखाता है? तब भी वे उसकी पूजा करने लगे: वे शैतानी करने वाले लोग थे। (148)

फिर जब ऐसा हुआ कि वे (शर्म से) हाथ मलने लगे, और उन्हें अपने किए पर पछ्तावा हुआ और उन्हें इस बात का एहसास हो गया कि वे ग़लत काम कर रहे थे, तो कहने लगे, "अगर हमारे रब ने हम पर दया न की और उसने हमें माफ़ न किया, तो हम बर्बाद हो जाएँगे!" (149)

जब मूसा ग़ुस्से और दुख से भरा हुआ अपनी क़ौम के पास वापस आया, तो उसने कहा, "मेरे यहाँ नहीं होने पर तुम लोगों ने कितना बुरा और शैतानी काम किया है! क्या तुम अपने रब के फ़ैसले को समय से पहले ले आने के लिए इतने उतावले हो गए?" फिर उसने (तोरात की) तख़्तियाँ नीचे फेंक दीं और अपने भाई [हारून] का बाल पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। हारून बोला, "ऐ मेरी माँ के बेटे! इन लोगों ने मुझ पर क़ाबू पा लिया था! और क़रीब-क़रीब मुझे मार ही डाला था! अतः मेरे शत्रुओं को मुझ पर हँसने का मौक़ा न दे और मुझे इन शैतानियाँ करनेवालों का साथी न ठहरा।" (150)

मूसा ने कहा, "मेरे रब! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे; और हमें अपनी रहमत की छाया में ले ले: तू तो दया करने वालों में सबसे बड़ा दयावान है।" (151

जिन लोगों ने बछड़े की पूजा शुरू कर दी, उनपर उनके रब का क़हर टूटेगा, और इस जीवन में वे बेइज़्ज़त होकर रहेंगे।" उन लोगों को हम ऐसा ही बदला देते हैं जो ऐसा झूठ गढ़ते रहते हैं, (152)

मगर तुम्हारा रब तो उन लोगों के प्रति बेहद माफ़ करनेवाला और अत्यंत दयावान है, जो अगर ग़लती कर बैठते हैं, तो फिर उसके बाद (अपनी ग़लती सुधारते हुए) तौबा करते हैं, और सचमुच ईमान रखते हैं। (153)
                                                                                                              जब मूसा का ग़ुस्सा ठंढा हुआ, तो उसने तख़्तियों को उठाया, जिसमें लोगों के मार्गदर्शन की बातें लिखी हुई थीं, और यह उन लोगों के लिए रहमत थीं जो अपने रब का डर रखते हैं। (154)

मूसा ने अपने लोगों में से सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय (पर तूर पहाड़ जाने) के लिए चुना, फिर जब उन लोगों को एक थरथराहट ने आ पकड़ा, तो उसने दुआ की, "मेरे रब! अगर तूने यही करने के लिए इन्हें चुना था, तो तू बहुत पहले ही इनको, और मुझको भी मिटा चुका होता। तो क्या अब तू हमें इसलिए बर्बाद कर देगा कि हममें से कुछ बेवक़ूफ़ आदमियों ने ऐसा किया था? यह तो तेरी ओर से एक परीक्षा मात्र है---- इसके द्वारा तू जिसको चाहे भटकता छोड़ दे और जिसे चाहे सही रास्ता दिखा दे----- और तू ही हमारी रक्षा करनेवाला है, सो हमें माफ़ कर दे और हम पर दया कर, और तू ही माफ़ करने वालों में सबसे बेहतर है।" (155)

"[या ख़ुदा!] हमारे लिए इस संसार में भी अच्छाई लिख दे, और आने वाली दुनिया में भी। हम सच्चे दिल से तेरी ही तरफ़ लौटते हैं।" अल्लाह ने कहा, "मैं जिस किसी पर चाहता हूं, अपनी यातना ले आता हूं, लेकिन मेरी दयालुता व रहमत का हाल यह है कि उसने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है।


“मैं अपनी रहमत उन लोगों के हक़ में लिखूँगा जो बुराइयों से बचते हैं, और उचित ज़कात देते है; और जो हमारी आयतों में विश्वास रखते हैं; (156)

और उस रसूल [Messenger] के पीछे चलते हैं, जो ऐसा नबी [Prophet] है कि (न तो यहूदी नस्ल का है, और) न पढ़ा-लिखा है, जिसका ज़िक्र वे अपने यहाँ तौरात [Torah] में लिखा पाते हैं, और इंजील [Bible] में भी---- जो उन्हें अच्छा व सही काम करने का हुक्म देता है और बुराई व ग़लत काम करने से रोकता है, जो उनके लिए अच्छी चीज़ों को हलाल [वैध/ Lawful] और बुरी चीज़ों को हराम [अवैध/ Unlawful] ठहराता है, और उन्हें उनके बोझ से और गले में पड़े हुए उन लोहे के बन्धनों से मुक्ति देता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः ऐसे ही लोग हैं जो उस पर ईमान रखते हैं, उसकी इज़्ज़त करते हैं और उसकी मदद करते हैं, और वह उस रौशनी के पीछे चलते हैं, जो उसके साथ भेजी गयी है, तो ऐसे ही लोग कामयाब होंगे।" (157)

[ऐ मुहम्मद!] कह दें, "ऐ लोगो! मैं तुम सब लोगों के लिए अल्लाह का रसूल हूँ, यह उसकी तरफ़ से है जिसके नियंत्रण में आसमानों और ज़मीन की सल्तनत है; उसके सिवा कोई ख़ुदा नहीं है, वही ज़िंदगी और मौत देता है, अतः विश्वास करो अल्लाह पर और उसके रसूल पर, जो ऐसा पैग़म्बर [Prophet] है कि पढ़ा-लिखा नहीं है, जो अल्लाह पर और उसकी बातों पर विश्वास रखता है। तो उसके बताए हुए रास्ते पर चलो, ताकि तुम्हें शायद मार्गदर्शन मिल जाए।" (158)

 
मूसा की क़ौम में से एक गिरोह ऐसे लोगों का भी हुआ जो सच्चाई का रास्ता दिखाते थे, और उसी के मुताबिक़ इंसाफ़ के साथ काम करते थे। (159)

हमने उन्हें बारह क़बीलों में, अलग-अलग समुदाय के रूप में बाँट दिया था, और, जब मूसा के लोगों ने उससे पीने का पानी माँगा, तो हमने मूसा को 'वही' [Revelation] द्वारा बता दिया कि अपनी लाठी से (एक ख़ास) चट्टान पर मारो, ताकि उससे पानी के बारह सोते फूट निकले। हर गिरोह को अपने पीने के घाट मालूम थे; हमने उनपर बादलों से छाया कर दी थी, और उनके (खाने के) लिए 'मन्न' और 'सलवा' [बटेर] उतारा था, [और कहा,] "हमनें तुम्हें जो चीज़े दे रखी हैं, उनमें से अच्छी चीज़ें खाओ।" उन्होंने (हुक्म न मानकर) हमारा तो कुछ नहीं बिगाड़ा, ख़ुद अपने हाथों अपना ही नुक़सान करते रहे। (160)

जब उनसे कहा गया था, "इस बस्ती में जाकर बस जाओ और इसमें जहाँ चाहो, आराम से खाओ-पियो, मगर यह कहते हुए अंदर जाना, “[हित्ता] यानी हमारा बोझ उतार दे!”, और दरवाज़े से सिर झुकाकर दाख़िल होना: हम तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देंगे, और जो अच्छा काम करते हैं, उनके इनाम और ज़्यादा बढ़ा देंगे।" (161)

लेकिन जैसा कहने के लिए उनसे कहा गया था, उनमें से शैतानियाँ करने वालों ने उसके शब्दों में कुछ फेर-बदलकर (अनर्थ कर) दिया, अत: उनके गुनाहों के चलते हमने आसमान से उनके लिए यातना भेजी। (162)

 
[ऐ रसूल!] आप इन (इसराईल की संतानों) से उस बस्ती के बारे में पूछें जो समंदर के किनारे थी; किस तरह उनके लोगों ने 'सब्त' [Sabbath] के दिन (मछली का शिकार नहीं करने) के मामले में अपना वचन तोड़ दिया, होता यह था कि मछलियाँ केवल उसी (सब्त के) दिन उनके पास पानी के ऊपर आ जाती थीं, मगर सप्ताह के दूसरे दिन कभी नहीं आतीं-----इस तरीक़े से हमने उनकी परीक्षा ली: क्योंकि वे आज्ञा नहीं मानते थे----- (163)

इस बस्ती में से कुछ लोगों ने (नसीहत करने वालों से) पूछा, "तुम ऐसे लोगों को नसीहत देने के लिए क्यों बेकार में परेशान होते हो, जिन्हें अल्लाह (उनकी बुराइयों के कारण) बर्बाद कर देगा या कम से कम कठोर यातना तो देगा ही?" [नसीहत करने वालों ने] जवाब दिया, "यह इसलिए कि तुम्हारे रब की तरफ़ से हम पर कोई इल्ज़ाम न रहे (कि हमने अपना काम न किया), और इसलिए भी कि शायद वे (नसीहत की) बातों पर ध्यान दें।" (164)

फिर जब उन लोगों ने (उन नसीहतों) को भुला डाला, जो उन्हें दी गई थीं, तब हमने उन लोगों को तो बचा लिया जो बुराई करने से रोकते थे, मगर ग़लत काम करने वालों को, लगातार आज्ञा न मानने के कारण, कठोर सज़ा में जकड़ लिया। (165)

फिर जब वे अपने घमंड में (हदें पार करने लगे, और) वही कुछ करने लगे, जिससे उन्हें रोका गया था, तो हमने उनसे कहा, "बन्दर जैसे हो जाओ! ज़ात बाहर हो जाओ!" (166)

और उसके बाद, तुम्हारे रब ने घोषणा कर दी थी, कि वह क़यामत के दिन तक, उन पर ऐसे लोगों को बैठाता रहेगा, जो उनको दर्दनाक तकलीफ़ें पहुँचाते रहेंगे। तुम्हारा रब (बुरे कर्मों की) सज़ा देने में बहुत तेज़ है, मगर साथ में वह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयालू भी है। (167)


हमने उन्हें अलग-अलग समुदायों में बाँटकर ज़मीन पर फैला दिया----- कुछ उनमें से अच्छे व नेक थे, और कुछ उनमें इन जैसे नहीं थे: हमने उन्हें अच्छी और बुरी परिस्थितियों में डालकर उनको जाँचा-परखा, ताकि शायद वे सभी (अच्छाई की तरफ़) लौट आएँ। (168)

और, उनके बाद जो पीढ़ियाँ आयीं, हालाँकि उन्हें आसमानी किताब [तोरात] विरासत में मिली थीं, तब भी, वे इसी तुच्छ संसार के थोड़े (समय टिकनेवाले) फ़ायदे को लेने में ही लगे रहे, और कहते थे, "हमें ज़रूर माफ़ कर दिया जाएगा", और अगर इसी तरह के दूसरे (भ्रष्ट) फ़ायदे भी उनके हाथ आ जाते, तो (बिना ग़लती पर पछताए) ज़रूर उसे भी ले लेते। क्या उनसे यह क़सम नहीं ली गयी थी, जो कि किताब में लिखी हुई थी, कि वे अल्लाह के बारे में सिवाय सच के और कुछ न कहेंगे? और उन लोगों ने (किताब के) विषयों को अच्छी तरह से पढ़ा था। जिन लोगों ने अल्लाह को अपने ध्यान में रखते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाया है, उनके लिए आख़िरत का घर कहीं अच्छा है। "तो तुम अपनी बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते?"  (169)

मगर (इसराईल की संतान में से) जो लोग किताब को मज़बूती से थामे रहे, और पूरी पाबंदी से नमाज़ को क़ायम रखा, तो अच्छे व नेक लोगों के कर्मों का बदला देने से हम कभी मना नहीं करते हैं। (170)

जब हमने पहाड़ को ऊँचा उठाकर परछाईं की तरह उन लोगों के ऊपर कर दिया, और उन्हें लगने लगा कि वह उनके दम पर गिरनेवाला है, तो हमने कहा, "जो कुछ हमने तुम्हें दे रखा है, उसे मज़बूती से थामे रहो, और जो कुछ उसमें लिखा हुआ है, उसे याद रखो ताकि तुम बुराइयों से बचते रहो।" (171)

 
[ऐ रसूल! यह याद दिलाएं], जब आपके रब ने आदम की सन्तान की पीठों से उनके बच्चों को बाहर निकाला, और उन्हें स्वयं अपना गवाह बनाया, तो अल्लाह ने कहा, "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" और वे जवाब में बोले, "हाँ, हम गवाही देते हैं।" और ऐसा इसलिए किया कि तुम क़यामत के दिन कहीं यह न कहने लगो कि "हमें तो इसकी ख़बर ही न थी", (172)

या, यह कहने लगो कि "असल में, हमसे पहले तो, हमारे बाप-दादा थे जिन्होंने अल्लाह के साथ साझेदार [Partners] ठहरा लिए थे, हम तो बस उनके बाद आने वाली पीढ़ियों में से हैं: क्या तू हमें बर्बाद कर देगा, इस कारण से उन्होंने झूठी बातें गढ़ीं?" (173)

इस तरह, हम अपने संदेशों को अलग-अलग करके समझाते हैं, ताकि शायद वे सच्चाई के रास्ते की ओर लौट आएं। (174)

 
[ऐ रसूल!], आप उन्हें उस आदमी की कहानी सुना दें जिसे हमने अपने संदेश [आयतें] दिए थे: किन्तु वह उनसे जान छुड़ाकर भाग निकला, इस तरह, शैतान ने उसे अपने पीछे चलने वाला बना लिया और वह सीधे मार्ग से भटककर रह गया---- (175)

अगर हमारी यह इच्छा रही होती, तो इन निशानियों का उपयोग करके हम उसका दर्जा ऊँचा कर सकते थे, मगर इसके बजाय वह तो धरती के साथ चिमट गया और अपनी इच्छा के पीछे चल पड़ा----उसकी मिसाल एक कुत्ते की तरह थी, अब चाहे तुम उसे दौड़ाकर भगाओ या उसे चुपचाप छोड़ दो, वह ज़बान बाहर निकालकर हाँफता रहेगा। ऐसी ही है उनकी छवि जो हमारी निशानियों को मानने से इंकार करते हैं। तो [ऐ रसूल], आप उन्हें यह कहानी सुना दें, ताकि वे सोच-विचार कर सकें। (176)

कितनी बुरी मिसाल है उन लोगों की जिन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया! वे ख़ुद अपने हाथों अपना ही नुक़सान करते रहे: (177)

जिस किसी को अल्लाह ने मार्ग दिखा दिया, तो वही असल में सीधा व सही मार्ग पानेवाला है, और जिस किसी को वह भटकता छोड़ दे, तो ऐसे ही लोग नुक़सान उठाने वाले हैं। (178)

हमने बहुत-से जिन्नों और आदमियों को पैदा किया है, जिनकी क़िस्मत में जहन्नम जाना लिखा हुआ है। उनके पास दिल है मगर वे इसका उपयोग समझने-बूझने में नहीं करते हैं, उनके पास आँखें है, मगर वे देखने के काम नहीं आतीं, उनके पास कान हैं, मगर उसका उपयोग सुनने में नहीं करते। वे चौपायों की तरह हैं, नहीं, बल्कि वे उनसे भी अधिक भटके हुए हैं: यही लोग हैं जो पूरी तरह से (नसीहतों को) भुलाए बैठे हैं। (179)

 
सारे अच्छे (गुणोंवाले) नाम अल्लाह के ही हैं: तो जब उसको पुकारना हो, तो तुम इन्हीं (नामों से) उसे पुकारो, और उन लोगों से दूर रहो, जो (मतलब बदलने के लिए) इन नामों के साथ छेड़-छाड़ करते हैं----- जो कुछ वे करते हैं, उसका पूरा-पूरा बदला उन्हें दिया जाएगा। (180)

हमने जिन्हें पैदा किया, उनमें से कुछ समूह ऐसे लोगों का है जो सच्चाई का रास्ता दिखाता है और उसी के अनुसार न्याय से काम लेता है। (181)

मगर जिन लोगों ने हमारे संदेशों को झुठा बताते हुए ठुकरा दिया, हम उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके, इस तरह उनके अंत की ओर ले जाएँगे कि उन्हें पता तक न चलेगा: (182)

मैं उन्हें बीच-बीच में ढील दूँगा, मगर मेरी योजना बिल्कुल पक्की है। (183

क्या उनके दिमाग़ में यह बात नहीं आती कि उनके साथ (वर्षों) रहनेवाला आदमी [मुहम्मद], कोई पागल नहीं है, बल्कि वह तो साफ़-साफ़ चेतावनी दे रहा है? (184)

क्या उन लोगों ने आसमानों और ज़मीन की सल्तनत और वह तमाम चीज़ें जो अल्लाह ने पैदा की हैं, उन पर कभी विचार नहीं किया, और यह कि इन चीज़ों के समाप्त हो जाने की घड़ी शायद नज़दीक आ लगी हो? आख़िर इस (क़ुरआन के संदेश) के बाद अब कौन सी (दूसरी निशानियाँ) हो सकती हैं, जिस पर ये विश्वास करेंगे? (185)

जिन्हें अल्लाह भटकता छोड़ दे, तो कोई नहीं है जो उन्हें सही रास्ता दिखा सकता है: अल्लाह उन्हें अपनी अकड़ में भारी ग़लतियाँ करने के लिए छोड़ देता है। (186)

 
[ऐ रसूल!], वे आपसे उस घड़ी [क़यामत] के बारे में पूछते हैं कि "वह घटना कब होगी?", कह दें, "इस बात की जानकारी तो केवल मेरे रब के पास है: केवल वही है जो इस राज़ से पर्दा उठाएगा कि वह समय कब आएगा, आसमानों और ज़मीन दोनों के लिए वह बड़ा भारी समय होगा, जब वह (समय) आएगा, तो तुम पर बस अचानक ही आ जाएगा।" वे आपसे इस बारे में इस तरह पूछते हैं, मानो आप इसे जानने के लिए बहुत उत्सुक हैं। कह दें, "(क़यामत कब आएगी), इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह ही को है, हालाँकि ज़्यादातर लोग इस बात को नहीं समझते हैं।" (187)

[ऐ रसूल!], आप कह दें, "किसी चीज़ से फ़ायदा या नुक़सान होना, मेरे नियंत्रण में नहीं है, (यहाँ तक कि) ख़ुद मुझे अपने आप पर भी क़ाबू नहीं, जब तक कि अल्लाह न चाहे: जो चीज़ छिपी हुई है, अगर मुझे उसकी जानकारी होती, तो मेरे पास ढेर सारी अच्छी चीज़ें होतीं और मुझे कोई नुक़सान न पहुँचता। मैं इसके सिवा क्या हूँ कि बस (इंकार व बुरे कर्मों के लिए) चेतावनी देनेवाला, और उन लोगों को ख़ुशख़बरी सुनानेवाला जो ईमान रखते हैं।" (188)


वही [अल्लाह] है, जिसने तुम सबको एक अकेली जान [Soul] से पैदा किया, और उसी से फिर उसका (मादा) जोड़ा बनाया, ताकि वह उसके पास जाकर सुकून पा सके: फिर जब कोई मर्द अपनी बीवी के साथ सोता है और उसकी बीवी को हल्का-सा बोझ [बच्चा] ठहर जाता है, फिर वह उसे लिए हुए यहाँ-वहाँ फिरती रहती है, फिर जब (गर्भ बढ़ा) तो वह भारी हो जाती है, तब (मर्द और औरत) दोनों अपने रब, अल्लाह को पुकारते हैं, "हम ज़रूर तेरा शुक्र अदा करनेवाले बनकर रहेंगे, अगर तू हमें भला-चंगा बच्चा दे दे।" (189)

लेकिन जब हमने उन्हें भला-चंगा बच्चा प्रदान कर दिया, तो (बजाय केवल अल्लाह का शुक्र मानने के) दूसरों को उस (अल्लाह) का साझेदार [Partner] ठहराने लगे। (190)

अल्लाह के साथ वे जिन्हें उसका साझेदार ठहराते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊँचा व महान है! अल्लाह के साथ आख़िर कैसे वे (ख़ुदायी में) दूसरों को साझेदार ठहरा लेते हैं, जबकि वे कोई चीज़ भी पैदा नहीं कर सकते, बल्कि वे तो ख़ुद ही पैदा किए गए हैं,  (191)

और यह कि वे उनकी कुछ भी मदद नहीं कर सकते, यहाँ तक कि वे ख़ुद अपनी ही मदद नहीं कर सकते हैं? (192

 
अगर तुम [ईमानवाले], ऐसे लोगों को सही मार्ग दिखाने के लिए बुलाओ, तो वे तुम्हारे पीछे नहीं आएँगे: अब चाहे तुम उन्हें बुलाओ या चुप-चाप रहो, इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। (193)

अल्लाह को छोड़कर जिन्हें तुम पुकारते हो, वे भी तुम्हारे ही जैसे (पैदा किए हुए) बन्दे हैं। अतः उन्हें (परेशानी में) पुकारकर देखो, फिर अगर तुम (अपनी मान्यताओं में) सच्चे हो, तो उन्हें (तुम्हारी पुकार का) जवाब देना चाहिए! (194

क्या इन (पत्थर की मूर्तियों) के पास चलने के लिए पाँव हैं, किसी चीज़ को पकड़ने के लिए हाथ हैं, देखने के लिए आँखें हैं, या उनके पास सुनने के लिए कान हैं? [ऐ रसूल!] आप कह दें, "बुला लाओ उन सब (देवताओं) को, जिन्हें तुमने अल्लाह का साझेदार [Partners] ठहरा रखा है! फिर मेरे ख़िलाफ़ कोई साज़िश रचो! और मुझे बिल्कुल भी मत छोड़ो! (फिर देखो क्या होता है!) (195)

मेरा रखवाला तो बस अल्लाह है: उसी ने यह किताब [क़ुरआन] उतारी है, और वही है जो अच्छे व सच्चे लोगों की रक्षा करता है, (196)

मगर उसे छोड़कर जिन्हें तुम पुकारते हो, वे तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकते, अरे वे तो ख़ुद अपनी भी मदद नहीं कर सकते।" (197)

अगर तुम [ईमानवाले] ऐसे लोगों को सही मार्ग की ओर बुलाओ, तो वे कभी तुम्हारी पुकार नहीं सुनते हैं। [ऐ रसूल!] अगर आप उनको देखें, तो ऐसा लगेगा कि वे आपकी तरफ़ ताक रहे हैं, मगर असल में वे आपको नहीं देखते। (198)

(फिर भी) उदारता व क्षमा [Tolerance] से काम लें, और जो सही काम है उसका हुक्म देते रहें: जाहिलों की तरफ़ ध्यान न दें। (199)

अगर शैतान तुम्हें कुछ (ग़लत) करने पर उकसाए, तो अल्लाह की शरण माँगो---- वह सब कुछ सुनता, सब कुछ जानता है---- (200)

जो लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उन्हें जब शैतान कुछ (ग़लत) करने पर उकसाता है, तो उन्हें तुरंत अल्लाह का ध्यान हो आता है, और उनकी आँखें खुल जाती हैं; (201)

शैतानों के पीछे चलने वाले लोगों को, शैतान और अधिक गुमराही में लगातार घसीटता हुआ लिए जाता है, और फिर वे रुक नहीं सकते।  (202


[ऐ रसूल], जब आप उनके समने (उनकी मुंह मांगी) निशानी [चमत्कार] पेश नहीं करते, तो वे कहते हैं, "क्या तुम (अपने रब से) कोई एक निशानी की माँग नहीं कर सकते?" कह दें, "मेरे रब की तरफ़ से जो 'वही' [Revelation] मुझ पर उतारी जाती है, मैं तो बस उसी को दोहरा देता हूँ: आपके रब की तरफ़ से उतरी हुई ये आयतें [क़ुरआन], (लोगों में) गहरी समझ बढ़ाती हैं, और ईमान रखनेवालों के लिए यह रास्ता दिखाने वाली और रहमत हैं," (203)

तो [मुसलमानो], जब क़ुरआन पढ़ी जाए तो उसे ध्यान से और ख़ामोशी से सुना करो, ताकि तुम पर दया की जा सके। (204)

[ऐ रसूल!], अपने रब को मन ही मन में याद किया करें, सुबह के वक़्त भी और शाम के वक़्त भी, पूरी विनम्रता और (रब से) डरते हुए, और ज़बान से भी पुकारें, बिना ऊँची आवाज़ किए हुए ----- और उन लोगों में से न हो जाएं जो इन बातों को बिल्कुल भुलाए बैठे हैं------ (205)

यहाँ तक कि जो [फ़रिश्ते] आपके रब के सामने मौजूद रहते हैं, वे कभी अपनी अकड़ दिखाते हुए उसकी बंदगी न करें, ऐसा कभी नहीं होता: वे उसकी महिमा का बखान (हमेशा) करते रहते हैं और उसके सामने सिर झुकाए रहते हैं।  (206)




नोट:
2: दिल बेचैन रहने के बारे में देखें 6: 33-36; 20:2

15: शैतान ने अल्लाह से उस वक़्त तक ज़िंदा रहने की इजाज़त मांगी थी जब तक इंसानों को दोबारा ज़िंदा करके उठाया जाएगा। मगर उससे कहा गया कि वह अल्लाह द्वारा तय किए वक़्त तक ही ज़िंदा रहेगा।

23: अल्लाह ने आदम (अलै) को अपनी ग़लतियों की माफ़ी माँगने के लिए यही कलमे सिखाए थे, देखें सूरह बक़रा (2: 37). अगर एक तरफ़ अल्लाह ने शैतान को मुहलत देकर उसे इंसान को बहकाने की सलाहियत दी, तो दूसरी तरफ़ इंसान को तौबा करने और माफ़ी माँगने के तरीक़े भी सिखा दिए। अब अगर आदमी शैतान के बहकावे में आकर कोई गुनाह कर भी बैठे तो उसे तुरंत अपने किए पर शर्मिंदा होना चाहिए और दोबारा ऐसा न करने का पक्का इरादा करते हुए अपने गुनाहों की माफी माँगनी चाहिए। 


26: जिस तरह कपड़ा बदन के नंगेपन को बाहर से छिपाता है, उसी तरह अपने अंदर की बुराई को छिपाने के लिए बुराइयों से बचते रहने वाला "परहेज़ का कपड़ा" सबसे अच्छा होता है। 


28: इस आयत में अरब की एक अजीब रस्म की तरफ़ शायद इशारा है। क़ुरैश क़बीले के लोग चूँकि काबा की देखरेख करते थे, इसलिए पूरे अरब में उनकी बड़ी इज़्ज़त थी, जब दूसरे क़बीले के बुतपरस्त लोग काबा की तीर्थयात्रा के लिए आते, तो उसके गिर्द 7 बार चक्कर लगाने [तवाफ़] के लिए क़ुरैश क़बीले से पवित्र कपड़े माँगते थे, अगर कपड़े न मिलते, तो नंगे ही तवाफ़ करते थे क्योंकि उनका मानना था कि जिन कपड़ों में हमने गुनाह किए हुए हैं, उन कपड़ों में कैसे तवाफ़ करें। उन लोगों का कहना था कि उनके बाप-दादा भी ऐसा ही करते आए हैं। मज़े की बात यह थी कि केवल क़ुरैश के लोग ही कपड़े पहनकर तवाफ़ कर सकते थे जबकि गुनाह तो वे भी करते थे! यहाँ इस रस्म की निंदा की गई है। 


32: "सजने-सँवरने" से यहाँ मतलब कपड़ा पहनने से है, न कि ज़ेवर से है, देखें 7:26. जिस तरह लोगों ने अपने मन-मर्ज़ी से कपड़े पहनकर तवाफ़ करने को मना कर रखा था, उसी तरह खाने की कुछ चीज़ें भी हराम [अवैध] कर दी थी जिसका ज़िक्र सूरह अनाम (6: 136, 145,147) में है। .....इस दुनिया की ज़िंदगी के मज़े ईमान रखने वाले और ईमान न रखने वाले दोनों ही उठाते हैं, जबकि आख़िरत की ज़िंदगी के मज़े केवल ईमानवालों के लिए हैं।


33: यहाँ "गुनाह की चीज़ों" से मतलब नशीले पदार्थ से समझा गया है, जिसका संबंध खाने-पीने की चीज़ों से है और जो अक्सर गुनाह करने पर उभारता है, देखें 2:219.


37: यहाँ साफ़ कर दिया गया है कि दुनिया में अल्लाह रोज़ी देने के मामले में ईमानवालों और सच्चाई से इंकार करनेवाले [काफ़िरों] में कोई भेदभाव नहीं करता है। लेकिन अगर किसी बुरे आदमी की रोज़ी बहुत ज़्यादा हो, तो इससे यह नहीं समझना चाहिए कि उसे अल्लाह बहुत पसंद करता है जैसा कि मक्का के लोग समझा करते थे। 


42: जिस आदमी में जितनी सलाहियत और ताक़त है, उसी के अनुसार ही उसे अच्छे काम करने हैं।  


46: जन्नत वाले और जहन्नम वाले दो समूहों के बीच की ऊँचाई वाली जगह को ही "अ'राफ़" कहा गया है। जन्नतवाले लोगों के चेहरे चमकते हुए होंगे, जबकि जहन्नमवाले लोगों के चेहरे मुरझाए हुए होंगे।


53: यानी वे लोग क़यामत के आने का ही इंतज़ार कर रहे हैं, मगर क़यामत आ जाने के बाद विश्वास कर लेने से तो कोई फायदा नहीं होगा। 


54: ज़मीन और आसमानों को छ: दिनों में  बनाया गया, मगर शायद वह एक दिन हमारे एक दिन के बराबर नहीं होगा, देखें 22: 47; और 32: 5, जहाँ एक दिन हमारे 1000 साल के बराबर बताया गया है। इसी तरह, फ़ैसले का दिन हमारे समय के 50,000 साल के बराबर हो सकता है (देखें 70:4).

इसके साथ ही अल्लाह ने सिंहासन सँभालते हुए काम-काज की व्यवस्था जारी कर दी, मगर चूँकि अल्लाह का कोई शारीरिक रूप नहीं होता, इसलिए उसके सिंहासन सँभालने को इस दुनिया में समझा जाने वाला सिंहासन नहीं समझना चाहिए। 


55: ऊँची आवाज़ में दिखावा करते हुए दुआ माँगना या ऐसी चीज़ माँगना जो जायज़ न  हो या मुमकिन न हो, ये सब मर्यादा तोड़ने वाली चीज़ें हैं। 


58: जिन लोगों में सच्चाई को पाने की चाहत होती है, वे तो अल्लाह की बातों से फ़ायदा उठाते हैं, लेकिन अगर दिलों में ज़िद्द और नफ़रत हुई तो वे अच्छी बातों से कोई लाभ नहीं उठा सकते। 


59: नूह (अलै) ने अपनी क़ौम को क़रीब 950 साल तक सच्चाई की शिक्षा दी (29: 14), मगर कुछ निचले तबक़े के लोगों को छोड़कर ज़्यादातर लोग सच्चाई को मानने से इंकार करने की ज़िद्द पर अड़े रहे। इस बीच वहाँ मूर्तिपूजा बहुत बढ़ गई थी, नूह (अलै) ने अपने लोगों को आने वाली यातना से भी डराया, मगर वे न माने, अंत में ज़बरदस्त बाढ़ में ईमानवालों को छोड़कर सब कुछ बह गया जिसका वर्णन बहुत से सूरह में आया है। देखें 11: 25-49; 23: 23; 26: 105; 54: 9 आदि। 


65: आद की क़ौम अरब की शुरुआती नस्ल की एक क़ौम थी जो कि ईसा (अलै) से दो हज़ार साल पहले यमन के हज़रमौत के पास आबाद थी। ये लोग अपने शारीरिक डील-डौल और पत्थरों को काटने के हुनर के लिए जाने जाते थे। धीरे-धीरे वे लोग बुत बनाने और उनकी पूजा में लग गए और अपनी ताक़त के घमंड में डूब गए। 


72: पहले हूद (अलै) ने अपनी क़ौम के लोगों को बहुत समझाया, मगर कुछ नेक लोगों को छोड़कर किसी ने उन पर विश्वास नहीं किया। उसके बाद अकाल पड़ गया, हूद (अलै) ने बताया कि यह अल्लाह की तरफ़ से चेतावनी है, फिर भी लोग नहीं माने। अंत में अल्लाह ने एक तेज़ आंधी भेजी जो लगातार 8 दिनों तक चलती, और उसी के नतीजे में पूरी क़ौम तबाह-बर्बाद हो गयी। देखें 11: 50-89; 23: 32; 26: 124; 41: 15; 46: 21; 54: 18; 69: 6; और 89: 6


73: हज़रत हूद (अलै) की क़ौम आद को जब उनके गुनाहों के चलते तहस-नहस कर दिया गया, तो जो ईमानवाले बचा लिए गए थे, उन्हीं की नस्ल से ही समूद के लोग पैदा हुए थे, ये लोग अरब और सीरिया [शाम] के इलाक़े के बीच हिज्र नाम की जगह में आबाद थे, जिसे आजकल "मदायन सालेह" कहते हैं, और आज भी इनके घरों और महलों के खंडहर मौजूद हैं और पहाड़ों को काटकर बनाई गई इमारतों के निशान देखे जा सकते हैं। अरब के व्यापारियों का कारवाँ जब सीरिया जाया करता था तो ये खंडहर रास्ते में पड़ते थे, और इसी लिए क़ुरआन में कई जगहों पर उन खंडहरों से सबक़ सीखने के लिए कहा गया है। इस क़ौम के लोग भी धीरे-धीरे मूर्तियों की पूजा में लग गए और एक ख़ुदा को भूल बैठे। तब उन्हीं की क़ौम के हज़रत सालेह (अलै) को (पहली सदी ई.पू.) अल्लाह ने उनके सुधार के लिए पैग़म्बर बनाया, उन्होंने बरसों लोगों के बीच अल्लाह का संदेश पहुँचाने का काम किया, मगर कुछ लोगों को छोड़कर ज़्यादातर लोगों ने उनकी बात को मानने से इंकार कर दिया, अंत में उन लोगों ने यह माँग की कि अगर आप पहाड़ से एक ऊँटनी को निकालकर दिखा दें तो वे उन पर ज़रूर विश्वास कर लेंगे। फिर जब सचमुच ऊँटनी प्रकट हो गई, तब भी कुछ लोगों को छोड़कर उनके बड़े-बड़े सरदार अपने वादे से फिर गए और सच्चाई को मानने से इंकार कर दिया और दूसरे लोगों को भी विश्वास करने से रोक दिया। हज़रत सालेह ने अपने लोगों को बता दिया था कि यह एक ख़ास ऊँटनी है जिसे एक दिन पूरे कुएं का पानी चाहिए, सो उन्होंने पानी पीने की बारी बना दी थी, एक दिन सब लोग कुंएं से पानी लेते, और एक दिन केवल ऊँटनी पानी पीती थी। साथ में उन्होंने लोगों को सावधान कर दिया था कि अगर अल्लाह की इस ऊँटनी को मार दिया तो एक ज़बरद्स्त यातना आ सकती है। मगर कुछ दिन बाद लोगों ने उस ऊँटनी को मार डाला। सालेह (अलै) ने बता दिया कि अब भयानक यातना आने में मात्र तीन दिन रह गए हैं, लोगों ने तब भी अल्लाह से माफ़ी माँगने के बजाय इसे मज़ाक़ ही समझा और हज़रत सालेह को भी मार देने की योजना बनाने लगे। फिर तीन दिन गुज़रते ही बड़े ज़ोर का भूचाल आया और आसमान से एक भयानक आवाज़ ने सब लोगों को मार डाला। देखें 11: 61; 26: 41; 27: 45; 54: 23 आदि। 


80:  हज़रत लूत, इबराहीम (अलै) के भतीजे थे। जब इबराहीम (अलै) अपने मुल्क इराक़ को छोड़कर फिलिस्तीन में बसने के लिए निकल खड़े हुए, तो लूत (अलै) भी उनके साथ शामिल हो गए थे। बाद में, अल्लाह ने लूत (अलै) को जार्डन के शहर सुदोम [Sodom] के लोगों के बीच पैग़म्बर बनाकर भेजा। सुदोम एक मुख्य शहर था और उसके आसपास अमूरा और दूसरी कई बस्तियाँ आबाद थीं। यहाँ के लोग भी एक अल्लाह को छोड़कर देवी-देवताओं की पूजा करने में लगे थे, मगर इसके अलावा सबसे बड़ी ख़राबी जो इनमें हो गई थी, वह थी Homosexuality की आदत, यानी मर्द सेक्स करने के लिए मर्दों के पास ही जाते थे। हज़रत लूत के बहुत समझाने और डराने पर भी जब ये लोग नहीं माने, तो अल्लाह की तरफ़ से उन पर पत्थरों की बारिश हुई और उनकी सारी बस्तियों को तल्ले-ऊपर उलट दिया गया। आज मृत सागर [Dead Sea] के नाम से जो समंदर है, कहा जाता है कि ये बस्तियाँ उन्हीं के आसपास थीं या उसी सागर में डूब गईं। इस घटना का वर्णन कई जगह आया है, देखें 11: 69-83; 15: 52-76; 26: 160-174; 26: 28-35; 51: 31-37 आदि। 


85: मदयन [Midian] एक क़बीले का नाम था और इसी नाम की एक बस्ती भी थी जिसमें हज़रत शुऐब [Jethro] को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था (1391-1271 ई.पू.)। उनका ज़माना मूसा (अलै) से कुछ पहले का है, और कुछ लोगों का मानना है कि वह मूसा (अलै) के ससुर थे। यह एक हरा-भरा इलाक़ा था, लोग ख़ुशहाल थे, धीरे-धीरे उनमें बहुत सी बुराइयाँ पैदा हो गई थी, उनमें बहुत से लोग नाप-तौल में धोखा देते थे, कुछ दबंग लोगों ने रास्तों पर चौकियाँ बना रखी थीं जो हर गुज़रने वालों से टैक्स वसूल करते थे, कुछ लोग डाके भी डालते थे, कुछ थे जो लोगों को शुऐब (अलै) के पास जाने से रोकते और उन्हें तंग करते थे। हज़रत शुऐब (अलै) बहुत अच्छा भाषण देते थे, उन्होंने अपनी क़ौम को बहुत सुलझे हुए तरीक़े से समझाने की कोशिश की, मगर कुछ लोगों को छोड़कर ज़्यादातर आदमियों पर कोई असर नहीं हुआ। फिर उनकी क़ौम पर भी अल्लाह की यातना आ पहुँची और वे मारे गए। क़ुरआन में इनके बारे में और जानने के लिए देखें 11: 84-95; और 15: 78. 


87: लोग अक्सर ऐसा सोचते थे जो लोग विश्वास नहीं रखते, वह भी बड़ी ख़ुशहाली की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं, अगर उनका तरीक़ा अल्लाह को पसंद नहीं, तो उन्हें ख़ुशहाल क्यों बनाया? यह इसलिए कि दुनिया में  रोज़ी देने के मामले में ईमानवाले और काफ़िरों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया है। लेकिन परलोक में जब अंतिम फ़ैसला होगा, वहाँ ऐसा नहीं होगा।  

91: भूचाल के साथ बड़े ज़ोर के धमाके की आवाज़ भी हुई थी (सूरह हूद)। सूरह शुअरा से पता चलता है कि पहले घने बादल शहर की तरफ़ से आते दिखाई दिए थे, जिससे आग भी बरसायी गई थी। 


95: उनका मानना था कि ज़िंदगी में अच्छे-बुरे दिन आते रहते हैं, इसलिए वे तंगहाली को सज़ा के रूप में या ख़ुशहाली को परीक्षा में रूप में नहीं देखते थे--- क्योंकि उनका मत था कि ऐसे हालात उनके बाप-दादा के साथ भी गुज़रे हैं।  


 103: हज़रत याक़ूब (अलै) [Jacob] को इसराईल नाम से भी जाना जाता है, और उन्हीं की पुश्तों को इसराईल की संतान [बनी इसराईल] कहते हैं। उनके बेटे यूसुफ़ (अलै) के ज़माने में इसराईल की संतानें फ़िलिस्तीन के इलाक़े से मिस्र में जाकर बस गयी थी। मूसा (अलै) याक़ूब (अलै) की चौथी पुश्त में आते हैं। धीरे-धीरे मिस्र में इसराइलियों के साथ बुरा बर्ताव होने लगा था, और उन्हें वहाँ के समाज में अलग-थलग कर दिया गया था। वहाँ का बादशाह जिसे "फ़िरऔन" कहते थे, उसने अपने को ख़ुदा होने का दावा किया, तब मूसा (अलै) को वहाँ नबी बनाकर भेजा गया। 


133: पहले बाढ़ आने से सब खेतियाँ बह गयीं, फिर उन लोगों ने मूसा (अलै) से दुआ करायी, खेत बहाल होते ही फिर वे विश्वास करने से इंकार करने लगे, तो फिर टिड्डी दल ने सारी फ़सल बर्बाद कर दी, उसके कुछ समय के बाद जब फ़सल ठीक हुई तो फिर ईमान को ठुकराने लगे, तो फ़सल में घुन के कीड़े लग गए, इसी तरह फिर न माने तो मेंढक इतनी संख्या में पैदा हो गए कि खाने के बर्तनों तक में आ जाते और खाना ख़राब कर देते, दूसरी तरफ़ पीने के पानी में ख़ून निकलने लगा जिससे पानी पीना मुश्किल हो गया।


137: इसराईल की संतानों की उन बरकत वाली जगहों पर बहुत लम्बी अवधि के बाद हुकूमत क़ायम हुई थी, इस तरह, अल्लाह का किया गया वादा पूरा हुआ, देखें सूरह बक़रा (2: 246-251)


142: फ़िरऔन से छुटकारा मिलने का वर्णन सूरह मायदा (5: 20-26) में है। जब इसराईल की संतानें सीना के रेगिस्तान में ठहरी हुई थीं, तब उन लोगों ने मूसा (अलै) से मांग की कि उन्हें कोई आसमानी किताब अगर अल्लाह की तरफ़ से मिल जाती, तो वे उसके मुताबिक़ अपनी ज़िंदगी गुज़ारते। सो अल्लाह ने सीना के पवित्र पहाड़ पर मूसा (अलै) को चालीस रातों तक इबादत और अल्लाह में ध्यान लगाने के लिए बुलाया, और फिर अंत में "तोरात" [Torah] प्रदान की जो तख़्तियों में लिखी हुई थी। 


147: यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि अल्लाह ने ऐसे लोगों को अपनी निशानियों से इसलिए दूर कर दिया क्योंकि उन लोगों ने उन निशानियों को झूठ समझकर ठुकरा दिया और ग़लत रास्ते पर अपनी मर्ज़ी से चलते रहे। तो फिर अल्लाह ने भी उनकी क़िस्मत में उसी रास्ते पर चलना लिख दिया। अंत में जो उन्हें सज़ा मिलेगी, वह उन्हीं के कर्मों का फल होगा। 


148: इस बछड़े का ज़िक्र सूरह बक़रा (2: 51) और सूरह ताहा (20: 88) में है कि कैसे सामरी नाम के जादूगर ने इसे बनाया था जिसको इसराईल की संतानें पूजने लगी थीं। 


155: जब मूसा (अलै) तोरात लेकर अपने लोगों के पास पहुँचे, तो उनमें से कुछ लोग कहने लगे कि उन्हें कैसे यक़ीन आए कि यह (किताब) अल्लाह की तरफ़ से उतरी है। फिर अल्लाह के हुक्म से मूसा (अलै) अपने लोगों में से 70 बड़े-बूढ़े लोगों को लेकर तूर पहाड़ पहुँचे जहाँ उन्हें अल्लाह का कलाम सुनाया गया, सूरह बक़रा (2: 55-56) और सूरह निसा (4: 153) से पता चलता है कि उन लोगों ने यह माँग कर दी कि उन्हें अल्लाह को सामने से देखना है, तभी वे मानेंगे। इस पर ज़ोर से बिजली की कड़क हुई जिससे भूचाल सा आ गया और वे सब थरथराहट के साथ बेहोश हो गए। मूसा (अलै) समझ गए कि यह लोगों के लिए एक परीक्षा थी, सो उन्होंने अल्लाह से इन लोगों को फिर से ज़िंदा करने और उनके गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ माँगी। 


156: अल्लाह की रहमत [दयालुता] हर चीज़ पर छाई हुई है, और इस दुनिया में अच्छे-बुरे हर आदमी को उसकी नेमतें व रोज़ी मिलती रहती है, और वह हर बुरे कर्म की सज़ा नहीं देता, बल्कि अपने हिसाब से जिसे उचित समझता है, सज़ाएं देता रहता है और बहुत से गुनाह माफ़ भी करता रहता है। 


157: यहाँ रसूल से मतलब मुहम्मद (सल्ल) से है, जिन्हें "उम्मी" कहा गया है जिसका मतलब "पढ़ा-लिखा न होना" या 'जो यहूदी न हो'[Gentile]. कुछ मुस्लिम विद्वान बाइबल में मुहम्मद (सल्ल) के ज़िक्र का उदाहरण देते हैं, जैसे Deuteronomy में 18: 15-18 और 33: 2; Isaiah 42; और John 14-16. हालाँकि बाइबल के विद्वान इन आयतों का अलग ढंग से मतलब निकालते हैं। मुहम्मद (सल्ल) का नाम Gospel of Barnabas में कई बार आया है, मगर ईसाई विद्वान इसे संदेह की दृष्टि से देखते हैं।

........ यहूदियों पर पहले से चले आ रहे "बोझ" और "लोहे के बंधनों" से आज़ाद करने से मतलब यह है कि तोरात के मुताबिक़ कुछ तो कड़े हुक्म उनकी नाफ़रमानी की सज़ा के तौर पर दिए गए थे, और बहुत से नियम ख़ुद उनके उलेमा ने गढ़ लिए थे। बताया जा रहा है कि मुहम्मद (सल्ल) इन कड़े हुक्मों को अपने माननेवालों के लिए ख़त्म कर देंगे।


160: मिस्र से निकलने के बाद जब इसराईल की संतानें लगातार भटकती रहीं, इस दौरान उनके खाने के लिए अल्लाह ने "मन्ना (आसमान से उतरी रोटी या पत्तों पर गिरकर जमा हो जानेवाली ओस जैसी मीठी चीज़), और "सलवा" (मुर्ग़ की तरह की चिड़िया--बटेर का गोश्त) उतारा।


163: लाल सागर के किनारे "एला" [Aylah] नामक एक पुराना शहर था, जिसके लोगों को "सब्त"[शनिवार] के दिन मछली पकड़ने से मना किया गया था। अजीब बात यह थी कि सब्त [Sabbath] के दिन चारों तरफ ख़ूब सारी मछलियाँ दिखायी देती थीं जबकि सप्ताह के बाक़ी दिन कोई मछली नहीं दिखती थी। कुछ लोगों ने इसका उपाय यह किया कि वे शुक्र्वार को पानी में जाल बिछा देते, और रविवार को जाल में फँसी मछलियों को निकालकर जमा कर लेते थे। जो लोग इस तरह के काम के विरोधी थे, वे दो समूह में बंटे हुए थे: पहले समूह ने सब्त के दिन मछली पकड़ने वालों को समझाना-बुझाना शुरू किया मगर जब देखा कि उन पर कोई असर न हुआ तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। दूसरा समूह सब्त के दिन मछली पकड़ने के ख़िलाफ लगातार सलाह-मशविरा देता रहा। अंत मेंं,सब्त का नियम तोड़ने वालों को सज़ा दी गई, जबकि बाक़ी दो समूह को बचा लिया गया।


166: या तो सचमुच बंदर जैसे हो गए या उन्हें बंदरों से उपमा दी गई है। देखें 2:65


176: कुत्ते की मिसाल देने का मतलब यह है कि आप चाहे उन्हें सावधान करें या न करें, वे सच्चाई पर विश्वास करने वाले नहीं हैं।


180: वे लोग जो अल्लाह के नाम बिगाड़कर अपने झूठे ख़ुदाओं को पुकारते हैं, जैसे "अल्लात" उनके एक बुत का नाम है जो 'अल्लाह' शब्द से निकला है, "अल-उज़्ज़ा" भी 'अल-अज़ीज़' (बहुत शक्तिवाला) से निकला है, और "मनात" भी 'अल-मन्नान' (यानी देनेवाला) से निकला था।


186: याद रहे कि जो आदमी अल्लाह के संदेश को मानने से इंकार करने पर लंबे समय से अड़ा रहता है, उसके लिए अल्लाह की हिदायत और रहमत का दरवाज़ा बंद हो जाता है, इसे ही अल्लाह द्वारा "भटकता हुआ छोड़ देना" कहते हैं।


188: रसूल ने कहा कि अगर उन्हें छिपी हुई सारी चीज़ों का पता होता, तो वह ढेर सारी ऐसी चीज़ें जमा कर लेते जिनके दाम बढ़ने वाले होते और इस तरह, उन्हें धंधे में किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं पहुँचता, क्योंकि सारी बातें उन्हें पहले ही से पता होतीं। मगर उन्हें तो असल में उतना ही मालूम होता है जितना अल्लाह उन्हें "वही" के द्वारा बताता है। 


189: एक अकेली जान यानी 'आदम' (अलै), और उससे उनका जोड़ा यानी 'हव्वा' (अलै) को पैदा किया।

 

195: असल में मक्का के इंकार करने वाले लोग यह कहकर मोहम्मद साहब को डराया करते थे कि आप जो यह कहते हैं कि हमारे देवताओं में कोई ताक़त नहीं है, तो वे देवता आपको सज़ा देंगे। यह आयत इसी के जवाब में है। 


201: नेक और बुराइयों से बचने वाले लोग भी शैतान के बहकावे में कभी-कभी आ जाते हैं, लेकिन उन्हें  गुनाह करते ही अपनी ग़लती का एहसास हो जाता है, और वे अल्लाह से तुरंत माफ़ी माँग लेते हैं और गुनाह से तौबा करते हैं। 


203: जो आयत अल्लाह की तरफ़ से उतरती है, "मैं तो इसे केवल दोहरा देता हूँ", इसके लिए देखें 75:18


204: क़ुरआन जब पढ़ी जा रही हो, तो उसे चुपचाप ध्यान से सुनना चाहिए, हाँ मगर पढ़ने वाले को भी ऐसी जगह पर इसे ज़ोर से नहीं पढ़ना चाहिए जहाँ लोग अपने काम में लगे हों। 


 



 

No comments:

Post a Comment

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...