इस सूरह की आयत 46 में बताया गया है कि क़यामत के दिन अच्छे व नेक लोगों और गुनाहगार लोगों के बीच रोक के तौर पर एक "ऊँची सी जगह" होगी जो दोनों तरह के लोगों को अलग-अलग कर देगी, इसी "ऊँची जगह"[अराफ़] पर इस सूरह का नाम पड़ा है। सूरह के शुरू में पैग़म्बर साहब को संबोधित करके उन्हें फिर से आश्वस्त किया गया है कि ये आयतें अल्लाह द्वारा उतारी जा रही हैं और अगर लोग आपकी बात नहीं मान रहे हैं तो इससे ज़्यादा बेचैन होने की ज़रूरत नहीं है, और सूरह के अंत में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि जो भी आयतें उतरती हैं, आपका काम केवल उन्हें वैसे ही दुहरा [repeat] देना है। विश्वास न करनेवालों को पुरानी पीढ़ियों की बर्बादी के क़िस्से सुनाये गए हैं और उनके होने वाले अंजाम की चेतावनी दी गई है, ताकि वे ध्यान दें और अपने आप में सुधार लाते हुए गुनाहों की माफ़ी माँगें इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। इन दोनों विषयों की मदद से पैग़म्बर साहब और ईमानवालों का हौसला भी बढ़ाया गया है। शैतान की अकड़ और आदम अलै. के बहकावे में आ जाने और उसके नतीजे में जन्नत से निकाले जाने की कहानी विस्तार से यहाँ बतायी गई है, साथ में ईमानवालों को शैतान के बहकावे से बचकर रहने का सबक़ भी दिया गया है। जन्नत और जहन्नम के बारे में भी बड़े अच्छे अंदाज़ में ज़िक्र (आयत 36-53) आया है।
04-09: अंतिम फ़ैसला
10-25: आदम (अलै), इबलीस और जन्नत से बाहर निकलना
26-37: आदम की संतानों से संबोधन
38-51: अंतिम फ़ैसले का दृश्य
52-53: किताब और उसमें कही हुई बात पूरी होना
54-58: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
59-64: नूह (अलै) और उसकी क़ौम की कहानी
65-72: हूद (अलै) और आद के लोगों की कहानी
73-79: सालेह (अलै) और समूद के लोगों की कहानी
80-84: लूत (अलै) और उनकी क़ौम के लोगों की कहानी
85-93: शुएब (अलै) और मदयन के लोगों की कहानी
94-102 : पिछले रसूलों की कहानियों का निष्कर्ष
103-137: मूसा (अलै) और फिरऔन की कहानी
138-157: मूसा (अलै) और इसराईल की संतान
158 : अल्लाह के रसूल पर विश्वास करने पर ज़ोर
159-171: मूसा (अलै) और इसराईल की संतान (जारी)
172-174: आदम की संतानों से अल्लाह का लिया हुआ वचन
175-176: एक रसूल की कहानी जो अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा सके
177-179: जिन लोगों ने अल्लाह की निशानियों को ठुकरा दिया
180 : सारे अच्छे नाम अल्लाह के
181-186: जिन लोगों ने अल्लाह की निशानियों को ठुकरा दिया
187-188: (क़यामत की) घड़ी कब आयेगी?
189-198: इंसानों की पैदाइश और मूर्तिपूजा की शुरुआत
199-206: पैग़म्बर को सलाह
23: अल्लाह ने आदम (अलै) को अपनी ग़लतियों की माफ़ी माँगने के लिए यही कलमे सिखाए थे, देखें सूरह बक़रा (2: 37). अगर एक तरफ़ अल्लाह ने शैतान को मुहलत देकर उसे इंसान को बहकाने की सलाहियत दी, तो दूसरी तरफ़ इंसान को तौबा करने और माफ़ी माँगने के तरीक़े भी सिखा दिए। अब अगर आदमी शैतान के बहकावे में आकर कोई गुनाह कर भी बैठे तो उसे तुरंत अपने किए पर शर्मिंदा होना चाहिए और दोबारा ऐसा न करने का पक्का इरादा करते हुए अपने गुनाहों की माफी माँगनी चाहिए।
26: जिस तरह कपड़ा बदन के नंगेपन को बाहर से छिपाता है, उसी तरह अपने अंदर की बुराई को छिपाने के लिए बुराइयों से बचते रहने वाला "परहेज़ का कपड़ा" सबसे अच्छा होता है।
28: इस आयत में अरब की एक अजीब रस्म की तरफ़ शायद इशारा है। क़ुरैश क़बीले के लोग चूँकि काबा की देखरेख करते थे, इसलिए पूरे अरब में उनकी बड़ी इज़्ज़त थी, जब दूसरे क़बीले के बुतपरस्त लोग काबा की तीर्थयात्रा के लिए आते, तो उसके गिर्द 7 बार चक्कर लगाने [तवाफ़] के लिए क़ुरैश क़बीले से पवित्र कपड़े माँगते थे, अगर कपड़े न मिलते, तो नंगे ही तवाफ़ करते थे क्योंकि उनका मानना था कि जिन कपड़ों में हमने गुनाह किए हुए हैं, उन कपड़ों में कैसे तवाफ़ करें। उन लोगों का कहना था कि उनके बाप-दादा भी ऐसा ही करते आए हैं। मज़े की बात यह थी कि केवल क़ुरैश के लोग ही कपड़े पहनकर तवाफ़ कर सकते थे जबकि गुनाह तो वे भी करते थे! यहाँ इस रस्म की निंदा की गई है।
32: "सजने-सँवरने" से यहाँ मतलब कपड़ा पहनने से है, न कि ज़ेवर से है, देखें 7:26. जिस तरह लोगों ने अपने मन-मर्ज़ी से कपड़े पहनकर तवाफ़ करने को मना कर रखा था, उसी तरह खाने की कुछ चीज़ें भी हराम [अवैध] कर दी थी जिसका ज़िक्र सूरह अनाम (6: 136, 145,147) में है। .....इस दुनिया की ज़िंदगी के मज़े ईमान रखने वाले और ईमान न रखने वाले दोनों ही उठाते हैं, जबकि आख़िरत की ज़िंदगी के मज़े केवल ईमानवालों के लिए हैं।
33: यहाँ "गुनाह की चीज़ों" से मतलब नशीले पदार्थ से समझा गया है, जिसका संबंध खाने-पीने की चीज़ों से है और जो अक्सर गुनाह करने पर उभारता है, देखें 2:219.
37: यहाँ साफ़ कर दिया गया है कि दुनिया में अल्लाह रोज़ी देने के मामले में ईमानवालों और सच्चाई से इंकार करनेवाले [काफ़िरों] में कोई भेदभाव नहीं करता है। लेकिन अगर किसी बुरे आदमी की रोज़ी बहुत ज़्यादा हो, तो इससे यह नहीं समझना चाहिए कि उसे अल्लाह बहुत पसंद करता है जैसा कि मक्का के लोग समझा करते थे।
42: जिस आदमी में जितनी सलाहियत और ताक़त है, उसी के अनुसार ही उसे अच्छे काम करने हैं।
46: जन्नत वाले और जहन्नम वाले दो समूहों के बीच की ऊँचाई वाली जगह को ही "अ'राफ़" कहा गया है। जन्नतवाले लोगों के चेहरे चमकते हुए होंगे, जबकि जहन्नमवाले लोगों के चेहरे मुरझाए हुए होंगे।
53: यानी वे लोग क़यामत के आने का ही इंतज़ार कर रहे हैं, मगर क़यामत आ जाने के बाद विश्वास कर लेने से तो कोई फायदा नहीं होगा।
54: ज़मीन और आसमानों को छ: दिनों में बनाया गया, मगर शायद वह एक दिन हमारे एक दिन के बराबर नहीं होगा, देखें 22: 47; और 32: 5, जहाँ एक दिन हमारे 1000 साल के बराबर बताया गया है। इसी तरह, फ़ैसले का दिन हमारे समय के 50,000 साल के बराबर हो सकता है (देखें 70:4).
इसके साथ ही अल्लाह ने सिंहासन सँभालते हुए काम-काज की व्यवस्था जारी कर दी, मगर चूँकि अल्लाह का कोई शारीरिक रूप नहीं होता, इसलिए उसके सिंहासन सँभालने को इस दुनिया में समझा जाने वाला सिंहासन नहीं समझना चाहिए।
55: ऊँची आवाज़ में दिखावा करते हुए दुआ माँगना या ऐसी चीज़ माँगना जो जायज़ न हो या मुमकिन न हो, ये सब मर्यादा तोड़ने वाली चीज़ें हैं।
58: जिन लोगों में सच्चाई को पाने की चाहत होती है, वे तो अल्लाह की बातों से फ़ायदा उठाते हैं, लेकिन अगर दिलों में ज़िद्द और नफ़रत हुई तो वे अच्छी बातों से कोई लाभ नहीं उठा सकते।
59: नूह (अलै) ने अपनी क़ौम को क़रीब 950 साल तक सच्चाई की शिक्षा दी (29: 14), मगर कुछ निचले तबक़े के लोगों को छोड़कर ज़्यादातर लोग सच्चाई को मानने से इंकार करने की ज़िद्द पर अड़े रहे। इस बीच वहाँ मूर्तिपूजा बहुत बढ़ गई थी, नूह (अलै) ने अपने लोगों को आने वाली यातना से भी डराया, मगर वे न माने, अंत में ज़बरदस्त बाढ़ में ईमानवालों को छोड़कर सब कुछ बह गया जिसका वर्णन बहुत से सूरह में आया है। देखें 11: 25-49; 23: 23; 26: 105; 54: 9 आदि।
65: आद की क़ौम अरब की शुरुआती नस्ल की एक क़ौम थी जो कि ईसा (अलै) से दो हज़ार साल पहले यमन के हज़रमौत के पास आबाद थी। ये लोग अपने शारीरिक डील-डौल और पत्थरों को काटने के हुनर के लिए जाने जाते थे। धीरे-धीरे वे लोग बुत बनाने और उनकी पूजा में लग गए और अपनी ताक़त के घमंड में डूब गए।
72: पहले हूद (अलै) ने अपनी क़ौम के लोगों को बहुत समझाया, मगर कुछ नेक लोगों को छोड़कर किसी ने उन पर विश्वास नहीं किया। उसके बाद अकाल पड़ गया, हूद (अलै) ने बताया कि यह अल्लाह की तरफ़ से चेतावनी है, फिर भी लोग नहीं माने। अंत में अल्लाह ने एक तेज़ आंधी भेजी जो लगातार 8 दिनों तक चलती, और उसी के नतीजे में पूरी क़ौम तबाह-बर्बाद हो गयी। देखें 11: 50-89; 23: 32; 26: 124; 41: 15; 46: 21; 54: 18; 69: 6; और 89: 6
73: हज़रत हूद (अलै) की क़ौम आद को जब उनके गुनाहों के चलते तहस-नहस कर दिया गया, तो जो ईमानवाले बचा लिए गए थे, उन्हीं की नस्ल से ही समूद के लोग पैदा हुए थे, ये लोग अरब और सीरिया [शाम] के इलाक़े के बीच हिज्र नाम की जगह में आबाद थे, जिसे आजकल "मदायन सालेह" कहते हैं, और आज भी इनके घरों और महलों के खंडहर मौजूद हैं और पहाड़ों को काटकर बनाई गई इमारतों के निशान देखे जा सकते हैं। अरब के व्यापारियों का कारवाँ जब सीरिया जाया करता था तो ये खंडहर रास्ते में पड़ते थे, और इसी लिए क़ुरआन में कई जगहों पर उन खंडहरों से सबक़ सीखने के लिए कहा गया है। इस क़ौम के लोग भी धीरे-धीरे मूर्तियों की पूजा में लग गए और एक ख़ुदा को भूल बैठे। तब उन्हीं की क़ौम के हज़रत सालेह (अलै) को (पहली सदी ई.पू.) अल्लाह ने उनके सुधार के लिए पैग़म्बर बनाया, उन्होंने बरसों लोगों के बीच अल्लाह का संदेश पहुँचाने का काम किया, मगर कुछ लोगों को छोड़कर ज़्यादातर लोगों ने उनकी बात को मानने से इंकार कर दिया, अंत में उन लोगों ने यह माँग की कि अगर आप पहाड़ से एक ऊँटनी को निकालकर दिखा दें तो वे उन पर ज़रूर विश्वास कर लेंगे। फिर जब सचमुच ऊँटनी प्रकट हो गई, तब भी कुछ लोगों को छोड़कर उनके बड़े-बड़े सरदार अपने वादे से फिर गए और सच्चाई को मानने से इंकार कर दिया और दूसरे लोगों को भी विश्वास करने से रोक दिया। हज़रत सालेह ने अपने लोगों को बता दिया था कि यह एक ख़ास ऊँटनी है जिसे एक दिन पूरे कुएं का पानी चाहिए, सो उन्होंने पानी पीने की बारी बना दी थी, एक दिन सब लोग कुंएं से पानी लेते, और एक दिन केवल ऊँटनी पानी पीती थी। साथ में उन्होंने लोगों को सावधान कर दिया था कि अगर अल्लाह की इस ऊँटनी को मार दिया तो एक ज़बरद्स्त यातना आ सकती है। मगर कुछ दिन बाद लोगों ने उस ऊँटनी को मार डाला। सालेह (अलै) ने बता दिया कि अब भयानक यातना आने में मात्र तीन दिन रह गए हैं, लोगों ने तब भी अल्लाह से माफ़ी माँगने के बजाय इसे मज़ाक़ ही समझा और हज़रत सालेह को भी मार देने की योजना बनाने लगे। फिर तीन दिन गुज़रते ही बड़े ज़ोर का भूचाल आया और आसमान से एक भयानक आवाज़ ने सब लोगों को मार डाला। देखें 11: 61; 26: 41; 27: 45; 54: 23 आदि।
80: हज़रत लूत, इबराहीम (अलै) के भतीजे थे। जब इबराहीम (अलै) अपने मुल्क इराक़ को छोड़कर फिलिस्तीन में बसने के लिए निकल खड़े हुए, तो लूत (अलै) भी उनके साथ शामिल हो गए थे। बाद में, अल्लाह ने लूत (अलै) को जार्डन के शहर सुदोम [Sodom] के लोगों के बीच पैग़म्बर बनाकर भेजा। सुदोम एक मुख्य शहर था और उसके आसपास अमूरा और दूसरी कई बस्तियाँ आबाद थीं। यहाँ के लोग भी एक अल्लाह को छोड़कर देवी-देवताओं की पूजा करने में लगे थे, मगर इसके अलावा सबसे बड़ी ख़राबी जो इनमें हो गई थी, वह थी Homosexuality की आदत, यानी मर्द सेक्स करने के लिए मर्दों के पास ही जाते थे। हज़रत लूत के बहुत समझाने और डराने पर भी जब ये लोग नहीं माने, तो अल्लाह की तरफ़ से उन पर पत्थरों की बारिश हुई और उनकी सारी बस्तियों को तल्ले-ऊपर उलट दिया गया। आज मृत सागर [Dead Sea] के नाम से जो समंदर है, कहा जाता है कि ये बस्तियाँ उन्हीं के आसपास थीं या उसी सागर में डूब गईं। इस घटना का वर्णन कई जगह आया है, देखें 11: 69-83; 15: 52-76; 26: 160-174; 26: 28-35; 51: 31-37 आदि।
85: मदयन [Midian] एक क़बीले का नाम था और इसी नाम की एक बस्ती भी थी जिसमें हज़रत शुऐब [Jethro] को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था (1391-1271 ई.पू.)। उनका ज़माना मूसा (अलै) से कुछ पहले का है, और कुछ लोगों का मानना है कि वह मूसा (अलै) के ससुर थे। यह एक हरा-भरा इलाक़ा था, लोग ख़ुशहाल थे, धीरे-धीरे उनमें बहुत सी बुराइयाँ पैदा हो गई थी, उनमें बहुत से लोग नाप-तौल में धोखा देते थे, कुछ दबंग लोगों ने रास्तों पर चौकियाँ बना रखी थीं जो हर गुज़रने वालों से टैक्स वसूल करते थे, कुछ लोग डाके भी डालते थे, कुछ थे जो लोगों को शुऐब (अलै) के पास जाने से रोकते और उन्हें तंग करते थे। हज़रत शुऐब (अलै) बहुत अच्छा भाषण देते थे, उन्होंने अपनी क़ौम को बहुत सुलझे हुए तरीक़े से समझाने की कोशिश की, मगर कुछ लोगों को छोड़कर ज़्यादातर आदमियों पर कोई असर नहीं हुआ। फिर उनकी क़ौम पर भी अल्लाह की यातना आ पहुँची और वे मारे गए। क़ुरआन में इनके बारे में और जानने के लिए देखें 11: 84-95; और 15: 78.
87: लोग अक्सर ऐसा सोचते थे जो लोग विश्वास नहीं रखते, वह भी बड़ी ख़ुशहाली की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं, अगर उनका तरीक़ा अल्लाह को पसंद नहीं, तो उन्हें ख़ुशहाल क्यों बनाया? यह इसलिए कि दुनिया में रोज़ी देने के मामले में ईमानवाले और काफ़िरों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया है। लेकिन परलोक में जब अंतिम फ़ैसला होगा, वहाँ ऐसा नहीं होगा।
91: भूचाल के साथ बड़े ज़ोर के धमाके की आवाज़ भी हुई थी (सूरह हूद)। सूरह शुअरा से पता चलता है कि पहले घने बादल शहर की तरफ़ से आते दिखाई दिए थे, जिससे आग भी बरसायी गई थी।
95: उनका मानना था कि ज़िंदगी में अच्छे-बुरे दिन आते रहते हैं, इसलिए वे तंगहाली को सज़ा के रूप में या ख़ुशहाली को परीक्षा में रूप में नहीं देखते थे--- क्योंकि उनका मत था कि ऐसे हालात उनके बाप-दादा के साथ भी गुज़रे हैं।
103: हज़रत याक़ूब (अलै) [Jacob] को इसराईल नाम से भी जाना जाता है, और उन्हीं की पुश्तों को इसराईल की संतान [बनी इसराईल] कहते हैं। उनके बेटे यूसुफ़ (अलै) के ज़माने में इसराईल की संतानें फ़िलिस्तीन के इलाक़े से मिस्र में जाकर बस गयी थी। मूसा (अलै) याक़ूब (अलै) की चौथी पुश्त में आते हैं। धीरे-धीरे मिस्र में इसराइलियों के साथ बुरा बर्ताव होने लगा था, और उन्हें वहाँ के समाज में अलग-थलग कर दिया गया था। वहाँ का बादशाह जिसे "फ़िरऔन" कहते थे, उसने अपने को ख़ुदा होने का दावा किया, तब मूसा (अलै) को वहाँ नबी बनाकर भेजा गया।
133: पहले बाढ़ आने से सब खेतियाँ बह गयीं, फिर उन लोगों ने मूसा (अलै) से दुआ करायी, खेत बहाल होते ही फिर वे विश्वास करने से इंकार करने लगे, तो फिर टिड्डी दल ने सारी फ़सल बर्बाद कर दी, उसके कुछ समय के बाद जब फ़सल ठीक हुई तो फिर ईमान को ठुकराने लगे, तो फ़सल में घुन के कीड़े लग गए, इसी तरह फिर न माने तो मेंढक इतनी संख्या में पैदा हो गए कि खाने के बर्तनों तक में आ जाते और खाना ख़राब कर देते, दूसरी तरफ़ पीने के पानी में ख़ून निकलने लगा जिससे पानी पीना मुश्किल हो गया।
137: इसराईल की संतानों की उन बरकत वाली जगहों पर बहुत लम्बी अवधि के बाद हुकूमत क़ायम हुई थी, इस तरह, अल्लाह का किया गया वादा पूरा हुआ, देखें सूरह बक़रा (2: 246-251)
142: फ़िरऔन से छुटकारा मिलने का वर्णन सूरह मायदा (5: 20-26) में है। जब इसराईल की संतानें सीना के रेगिस्तान में ठहरी हुई थीं, तब उन लोगों ने मूसा (अलै) से मांग की कि उन्हें कोई आसमानी किताब अगर अल्लाह की तरफ़ से मिल जाती, तो वे उसके मुताबिक़ अपनी ज़िंदगी गुज़ारते। सो अल्लाह ने सीना के पवित्र पहाड़ पर मूसा (अलै) को चालीस रातों तक इबादत और अल्लाह में ध्यान लगाने के लिए बुलाया, और फिर अंत में "तोरात" [Torah] प्रदान की जो तख़्तियों में लिखी हुई थी।
147: यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि अल्लाह ने ऐसे लोगों को अपनी निशानियों से इसलिए दूर कर दिया क्योंकि उन लोगों ने उन निशानियों को झूठ समझकर ठुकरा दिया और ग़लत रास्ते पर अपनी मर्ज़ी से चलते रहे। तो फिर अल्लाह ने भी उनकी क़िस्मत में उसी रास्ते पर चलना लिख दिया। अंत में जो उन्हें सज़ा मिलेगी, वह उन्हीं के कर्मों का फल होगा।
148: इस बछड़े का ज़िक्र सूरह बक़रा (2: 51) और सूरह ताहा (20: 88) में है कि कैसे सामरी नाम के जादूगर ने इसे बनाया था जिसको इसराईल की संतानें पूजने लगी थीं।
155: जब मूसा (अलै) तोरात लेकर अपने लोगों के पास पहुँचे, तो उनमें से कुछ लोग कहने लगे कि उन्हें कैसे यक़ीन आए कि यह (किताब) अल्लाह की तरफ़ से उतरी है। फिर अल्लाह के हुक्म से मूसा (अलै) अपने लोगों में से 70 बड़े-बूढ़े लोगों को लेकर तूर पहाड़ पहुँचे जहाँ उन्हें अल्लाह का कलाम सुनाया गया, सूरह बक़रा (2: 55-56) और सूरह निसा (4: 153) से पता चलता है कि उन लोगों ने यह माँग कर दी कि उन्हें अल्लाह को सामने से देखना है, तभी वे मानेंगे। इस पर ज़ोर से बिजली की कड़क हुई जिससे भूचाल सा आ गया और वे सब थरथराहट के साथ बेहोश हो गए। मूसा (अलै) समझ गए कि यह लोगों के लिए एक परीक्षा थी, सो उन्होंने अल्लाह से इन लोगों को फिर से ज़िंदा करने और उनके गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ माँगी।
156: अल्लाह की रहमत [दयालुता] हर चीज़ पर छाई हुई है, और इस दुनिया में अच्छे-बुरे हर आदमी को उसकी नेमतें व रोज़ी मिलती रहती है, और वह हर बुरे कर्म की सज़ा नहीं देता, बल्कि अपने हिसाब से जिसे उचित समझता है, सज़ाएं देता रहता है और बहुत से गुनाह माफ़ भी करता रहता है।
157: यहाँ रसूल से मतलब मुहम्मद (सल्ल) से है, जिन्हें "उम्मी" कहा गया है जिसका मतलब "पढ़ा-लिखा न होना" या 'जो यहूदी न हो'[Gentile]. कुछ मुस्लिम विद्वान बाइबल में मुहम्मद (सल्ल) के ज़िक्र का उदाहरण देते हैं, जैसे Deuteronomy में 18: 15-18 और 33: 2; Isaiah 42; और John 14-16. हालाँकि बाइबल के विद्वान इन आयतों का अलग ढंग से मतलब निकालते हैं। मुहम्मद (सल्ल) का नाम Gospel of Barnabas में कई बार आया है, मगर ईसाई विद्वान इसे संदेह की दृष्टि से देखते हैं।
........ यहूदियों पर पहले से चले आ रहे "बोझ" और "लोहे के बंधनों" से आज़ाद करने से मतलब यह है कि तोरात के मुताबिक़ कुछ तो कड़े हुक्म उनकी नाफ़रमानी की सज़ा के तौर पर दिए गए थे, और बहुत से नियम ख़ुद उनके उलेमा ने गढ़ लिए थे। बताया जा रहा है कि मुहम्मद (सल्ल) इन कड़े हुक्मों को अपने माननेवालों के लिए ख़त्म कर देंगे।
160: मिस्र से निकलने के बाद जब इसराईल की संतानें लगातार भटकती रहीं, इस दौरान उनके खाने के लिए अल्लाह ने "मन्ना (आसमान से उतरी रोटी या पत्तों पर गिरकर जमा हो जानेवाली ओस जैसी मीठी चीज़), और "सलवा" (मुर्ग़ की तरह की चिड़िया--बटेर का गोश्त) उतारा।
163: लाल सागर के किनारे "एला" [Aylah] नामक एक पुराना शहर था, जिसके लोगों को "सब्त"[शनिवार] के दिन मछली पकड़ने से मना किया गया था। अजीब बात यह थी कि सब्त [Sabbath] के दिन चारों तरफ ख़ूब सारी मछलियाँ दिखायी देती थीं जबकि सप्ताह के बाक़ी दिन कोई मछली नहीं दिखती थी। कुछ लोगों ने इसका उपाय यह किया कि वे शुक्र्वार को पानी में जाल बिछा देते, और रविवार को जाल में फँसी मछलियों को निकालकर जमा कर लेते थे। जो लोग इस तरह के काम के विरोधी थे, वे दो समूह में बंटे हुए थे: पहले समूह ने सब्त के दिन मछली पकड़ने वालों को समझाना-बुझाना शुरू किया मगर जब देखा कि उन पर कोई असर न हुआ तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। दूसरा समूह सब्त के दिन मछली पकड़ने के ख़िलाफ लगातार सलाह-मशविरा देता रहा। अंत मेंं,सब्त का नियम तोड़ने वालों को सज़ा दी गई, जबकि बाक़ी दो समूह को बचा लिया गया।
166: या तो सचमुच बंदर जैसे हो गए या उन्हें बंदरों से उपमा दी गई है। देखें 2:65
176: कुत्ते की मिसाल देने का मतलब यह है कि आप चाहे उन्हें सावधान करें या न करें, वे सच्चाई पर विश्वास करने वाले नहीं हैं।
180: वे लोग जो अल्लाह के नाम बिगाड़कर अपने झूठे ख़ुदाओं को पुकारते हैं, जैसे "अल्लात" उनके एक बुत का नाम है जो 'अल्लाह' शब्द से निकला है, "अल-उज़्ज़ा" भी 'अल-अज़ीज़' (बहुत शक्तिवाला) से निकला है, और "मनात" भी 'अल-मन्नान' (यानी देनेवाला) से निकला था।
186: याद रहे कि जो आदमी अल्लाह के संदेश को मानने से इंकार करने पर लंबे समय से अड़ा रहता है, उसके लिए अल्लाह की हिदायत और रहमत का दरवाज़ा बंद हो जाता है, इसे ही अल्लाह द्वारा "भटकता हुआ छोड़ देना" कहते हैं।
188: रसूल ने कहा कि अगर उन्हें छिपी हुई सारी चीज़ों का पता होता, तो वह ढेर सारी ऐसी चीज़ें जमा कर लेते जिनके दाम बढ़ने वाले होते और इस तरह, उन्हें धंधे में किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं पहुँचता, क्योंकि सारी बातें उन्हें पहले ही से पता होतीं। मगर उन्हें तो असल में उतना ही मालूम होता है जितना अल्लाह उन्हें "वही" के द्वारा बताता है।
189: एक अकेली जान यानी 'आदम' (अलै), और उससे उनका जोड़ा यानी 'हव्वा' (अलै) को पैदा किया।
195: असल में मक्का के इंकार करने वाले लोग यह कहकर मोहम्मद साहब को डराया करते थे कि आप जो यह कहते हैं कि हमारे देवताओं में कोई ताक़त नहीं है, तो वे देवता आपको सज़ा देंगे। यह आयत इसी के जवाब में है।
201: नेक और बुराइयों से बचने वाले लोग भी शैतान के बहकावे में कभी-कभी आ जाते हैं, लेकिन उन्हें गुनाह करते ही अपनी ग़लती का एहसास हो जाता है, और वे अल्लाह से तुरंत माफ़ी माँग लेते हैं और गुनाह से तौबा करते हैं।
203: जो आयत अल्लाह की तरफ़ से उतरती है, "मैं तो इसे केवल दोहरा देता हूँ", इसके लिए देखें 75:18
204: क़ुरआन जब पढ़ी जा रही हो, तो उसे चुपचाप ध्यान से सुनना चाहिए, हाँ मगर पढ़ने वाले को भी ऐसी जगह पर इसे ज़ोर से नहीं पढ़ना चाहिए जहाँ लोग अपने काम में लगे हों।
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