सूरह 5: अल-माइदा [Al-Ma’ida]
इस सूरह का शीर्षक "खाने के थाल" से जुड़ा हुआ है जिसका ज़िक्र आयत 112-115 में आया है। इस मदनी सूरह का केंद्रीय विषय वैध [हलाल] और अवैध [हराम] खाने के नियम-क़ायदे के बारे में है, जिसके लिए अल्लाह ने ईमान रखनेवालों से हुक्म मानने का वचन लिया था (1--5; 87--108). इस सूरह के एक हिस्से में हज की रीति-रिवाजों का सम्मान करने और हज के सफ़र के दौरान खाने के लिए शिकार न करने, और सफ़र के दौरान वसीयत करने के बारे में है। अल्लाह ने यहूदियों और ईसाइयों से भी वचन लिए थे, इन दोनों समुदायों ने इन वचनों के साथ क्या किया, इसका ज़िक्र आयत 13 से 86 के बीच आया है, और इसके साथ इनका मुसलमानों के साथ जो संबंध है, उसका भी ज़िक्र आया है। आयत 109 से लेकर 120 तक आख़िरत [परलोक] की ज़िंदगी के बारे में बताया गया है और अपने-अपने समुदायों के लोगों के आचरण के बारे में उनके रसूलों का फ़ैसला क्या होगा, यह भी बताया गया है, ईसा अलै. को ख़ास करके अहमियत दी गई है: यहाँ आसमान से उतरने वाले खाने के एक थाल का ज़िक्र आया है जिसके लिए उनके शिष्यों ने उन्हें अल्लाह से दुआ करने की माँग की थी, और साथ में ख़ुदा के बेटे होने का जो दावा किया गया था, उसको भी रद्द किया गया है।
विषय:
06-07: नमाज़ पढ़ने से पहले की तैयारी
08-10: बिना किसी का पक्ष लिए सच्ची गवाही देना
11 : अल्लाह ने ख़तरा टाल दिया
12-19: किताबवाले लोगों की कड़ी निंदा
20-26: इसराईल की संतानों ने पवित्र भूमि में दाख़िल होने से इंकार कर दिया
27-31: आदम (अलै) के दो बेटों की कहानी
32 : क़त्ल करने की सज़ा
33-34: अल्लाह और उसके रसूल के ख़िलाफ़ लड़ने की सज़ा
35-37: अल्लाह के रास्ते में लड़ना
38-40: चोरी की सज़ा
41-43: अविश्वास के माहौल में रसूल का उत्साह बढ़ाना
44-47: तौरात और इंजील
48-50: रसूल की किताब
51-53: यहूदियों और ईसाइयों के गठ-जोड़ के ख़िलाफ़ ख़तरा
54-56: अपने दीन को छोड़ने पर चेतावनी
57-66: दीन का मज़ाक़ उड़ाने वालों के ख़िलाफ़ चेतावनी
67-69: किताबवाले लोगों से अपील
70-71: इसराईल की संतानों की कड़ी निंदा
72-77: ईसाई ट्राइनिटी के सिद्धांत के ख़िलाफ़ कड़ी निंदा
78-81: इसराईल के संतानों में से कुछ को दाऊद और ईसा (अलै) ने ठुकरा दिया
82-86: यहूदियों और बहुदेववादियों से ज़्यादा ईसाई, मुसलमानों के प्रति नरम हैं
87-96: खाना-पीना, क़समें, शराब और जुए के बारे में नियम-क़ायदे
97-99: अल्लाह ने काबा को स्थापित किया
100 : बुराई और अच्छाई कभी बराबर नहीं होती
101-102: ज़्यादा खोद-खोदकर सवाल पूछने से मना किया गया
103-105: बहुदेववादियों की कड़ी निंदा
106-108: वसीयत बनाते समय गवाह रखने का आदेश
109 : रसूलों से पूछताछ होगी
110 : ईसा (अलै) के चमत्कार
111-115: खाने से भरा थाल भेजने का चमत्कार
116-120: ईसा (अलै) ने अपनी और अपनी माँ की पूजा करने को कभी नहीं कहा था
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है
1: मवेशी यानी चरने वाले [Grazing] चौपाये, जैसे गाय, ऊँट, बकरी, भेड़ आदि या उनसे मिलते-जुलते चौपाये जैसे हिरन, नील गाय आदि।
3: इस्लाम से पहले अरब के बहुदेववादियों में एक रिवाज यह था कि कुछ लोग मिलकर ऊँट को ज़बह करते और फिर उसके मांस के बंटवारे के लिए जुए की तीरों का सहारा लेते, हर तीर पर मांस का हिस्सा लिखकर थैले में डाल दिया जाता था और फिर जिसके नाम की तीर निकलती, उसके मुताबिक़ उतना हिस्सा दे दिया जाता था। इसी तरह, अगर किसी काम के बारे में फ़ैसला करना होता कि किया जाए या नहीं, तो इसके लिए भी तीन तरह की बात यानी "करना है", "नहीं करना" और एक को ख़ाली रखकर तीरों को थैले में डाल दिया जाता, और फिर जिस विकल्प की तीर निकल जाती, उसे क़िस्मत का फ़ैसला मान लिया जाता था।
4: शिकारी कुत्ता या बाज़ आदि अगर सधा हुआ [trained] हो, जो शिकार करके हलाल जानवर ख़ुद न खाए बल्कि अपने मालिक के लिए बचा रखे, तो ऐसा मांस हलाल [वैध] होगा अगर उसे शिकार के लिए छोड़ने से पहले अल्लाह का नाम लिया गया हो।
5: किताबवाले यानी यहूदियों और ईसाइयों के यहाँ का ज़बह [slaughter] किया हुआ मांस खाना जायज़ [वैध] है, शर्त यह है कि वह जानवर हलाल हो; उसी तरह उनसे शादी-ब्याह भी जायज़ है।
6: नमाज़ से पहले पाक होने को "वुज़ू" कहते हैं। वुज़ू के लिए आम तौर से हाथ, मुँह के साथ पाँव को टख़नों तक धोना होता है, मगर शिया विद्वानों के अनुसार पाँव को धोने के बजाय उस पर गीला हाथ फेर देना [मसह] काफ़ी होता है। इसी तरह, पानी नहीं मिलने पर साफ़ मिट्टी से चेहरे और हाथ पर मलने को "तयम्मुम"[सूखा वुज़ू] कहते हैं।
8: आयत 1-2 में जो हुक्म दिया गया है, वह यहाँ फिर से शुरू हो रहा है।
11: मक्का में मुसलमानों पर होनेवाले ज़ुल्म और उसके बाद बहुदेववादियों के हमलों के बावजूद अल्लाह ने मुसलमानों को बड़ी तबाही से बचा लिया और फिर उन्हें मज़बूत हालत में ला खड़ा किया। इसके साथ-साथ ख़ुद मुहम्मद (सल्ल) को कई बार मार डालने की साज़िश बहुदेववादियों ने भी की और यहूदियों ने भी, मगर अल्लाह ने हर बार उन्हें बचा लिया।
12: अल्लाह को "अच्छा क़र्ज़" देने का मतलब बिना दिखावा किए हुए किसी ग़रीब की मदद करना या कोई भलाई के काम में ख़र्च करना जिसका बदला अल्लाह कई गुना बढ़ाकर देगा। दूसरी जगह भी इसका ज़िक्र देखें 57:18; 64:17
13 : इसराइलियों द्वारा अल्लाह से किए गए पक्के वचन [Covenant] तोड़ देने की बात बाइबल में और क़ुरआन में कई जगहों पर आयी है, देखें 2: 63,83,93; 4:155; 7:169. यहूदियों को वचन तोड़ने की यह सज़ा मिली कि अल्लाह ने उन्हें अपने से दूर कर दिया।
14: वचन तोड़ने की सज़ा ईसाइयों को यह मिली कि उनके यहाँ ज़बरदस्त धार्मिक मतभेद के चलते कई गुट बन गए जिनमें आपस में काफ़ी ख़ून-ख़राबा और मारपीट हुई।
15: बताया जाता है कि मुहम्मद (सल्ल) के पास फ़ैसले के लिए एक यहूदी मर्द और औरत के बीच ज़िना [Adultery] का मामला आया था, तोरात और बाइबल के हुक्म के मुताबिक़ यहूदियों को पता था कि पत्थर मारने की सज़ा होगी, मगर वे इस निर्धारित दंड को छुपा रहे थे, लेकिन आप (सल्ल) ने भी तोरात के मुताबिक़ यही सज़ा सुनायी और इस तरह यह बात सबके सामने आ गई। ऐसी और भी कई मिसालें हैं।
20: इसराइलियों पर अल्लाह ने बहुत से एहसान किए थे, जैसे फ़िरऔन की गुलामी से निजात, समंदर में रास्ता बनाना, पत्थरों से चश्मों का फूटना, रेगिस्तान में उनके खाने के लिए "मन्ना" व "सलवा" उतारना, उनके ऊपर बादल से छाया करना इत्यादि।
21: फ़िलिस्तीन, सीरिया और जार्डन के इलाक़े को पवित्र सरज़मीन [Holy Land] इसलिए कहते हैं कि इस इलाक़े में बहुत सारे नबियों को अल्लाह ने समय-समय पर भेजा था। यहाँ उस घटना की तरफ़ इशारा है जब मूसा (अलै) इसराइल की संतानों को मिस्र से निकालकर इस पवित्र भूमि यानी फ़िलिस्तीन के नज़दीक बसाने के लिए लाए थे। उस समय शहर पर काफिरों की हुकूमत थी जिन्हें "अमालक़ा" [Amalekites] कहते थे, वे बड़े लम्बे-चौड़े डील-डौल के लोग थे जो शायद "आद" की क़ौम के वंशज थे। अल्लाह ने वादा किया था कि अमालक़ा से युद्ध में इसराइलियों की जीत होगी, मगर इसराइली अपने ख़तरनाक दिखनेवाले दुश्मन के डील-डौल से डरकर मुक़ाबले के लिए किसी तरह तैयार न हुए।
23: मूसा (अलै) ने इसराईल की संतानों को 12 क़बीले में बाँटा था, बताया जाता है कि हर क़बीले के सरदार को शहर में घुसने से पहले वहाँ का निरीक्षण करने के लिए भेजा गया था, उन्हीं में से दो सरदारों ने अपने लोगों की हिम्मत बढ़ायी थी जिनका नाम हज़रत यूशा’ [Joshua] और हज़रत कालिब [Caleb] बताया जाता है।
26: अल्लाह का हुक्म नहीं मानने के नतीजे में उन्हें दंड मिला, वे फ़िलिस्तीन में बसने के बजाय 40 साल तक सीना के रेगिस्तानों में मारे-मारे फिरे, उन्हें पीछे मिस्र जाने का भी रास्ता नहीं मिल सका। इस सज़ा के बावजूद उनके साथ चूंकि हज़रत मूसा, हारून, यूशा' और कालिब (अलै) थे, इसलिए अल्लाह ने उनपर बहुत सी मेहरबानियाँ की थीं, जैसे बादल से उनपर छाया करना, खाने के लिए "मन और सलवा" उतारना, पीने के लिए 12 चश्मों का फूटना आदि (2: 57-60). इसी रेगिस्तान में हज़रत हारून और मूसा (अलै) की मौत हुई, फिर हज़रत यूशा' नबी बने जिनके ज़माने में सीरिया के इलाक़े पर क़ब्ज़ा हुआ, फिर बाद में हज़रत सैमुएल के ज़माने में कुछ और इलाक़ों में जीत हुई, देखें 2: 142-152. इस तरह, वह पवित्र सरज़मीन इसराइलियों के क़ब्ज़े में अल्लाह के वादे के मुताबिक़ आ गयी।
27: ऊपर की आयतों में अल्लाह ने इसराईल की संतानों से अमालीक़ की क़ौम से युद्ध करने का हुक्म दिया था जिसे उन लोगों ने नहीं माना, जबकि बाद में उन लोगों ने कई बार बिना किसी हिचकिचाहट के बेगुनाहों का क़त्ल किया। इस तरह, एक अच्छे मक़सद के लिए अल्लाह के हुक्म के बावजूद युद्ध नहीं करना और दुनिया के थोड़े से फ़ायदे के लिए किसी बेगुनाह का क़त्ल करना बिल्कुल ग़लत है। इस आयत में दुनिया के पहले क़त्ल का ज़िक्र है जबकि हज़रत आदम (अलै) के बेटे क़ाबील ने अपने बेगुनाह भाई हाबील को इस जलन की वजह से मार डाला था कि क्यों उसकी क़ुर्बानी क़बूल नहीं हुई जबकि उसके भाई की क़बूल हो गई।
32: हालाँकि यह बात इसराईल की संतानों को संबोधित करके कही गई है, लेकिन यह बात हर दौर के हर आदमी पर लागू होती है।
33: जब कोई हथियारबंद आदमी या ऐसा कोई डाकू-लुटेरा दल आम लोगों (चाहे मुस्लिम हो या ग़ैर-मुस्लिम) पर हमला करता है और चारों तरफ फ़साद मचाता फिरता है, तो उनके लिए अपराध की संगीनी के मुताबिक़ यहाँ चार तरह की सज़ाएं बतायी गई हैं। विद्वानों ने हदीसों के हवाले से बताया है कि (i) अगर किसी डाकू ने बिना माल लूटे हुए किसी का क़त्ल कर दिया या बलात्कार किया, तो उसे भी क़त्ल किया जाए, (ii) अगर डाकू ने माल भी लूटा हो और क़त्ल भी किया हो, तो उसे सूली चढ़ाया जाए, (iii) अगर केवल माल लूटा हो, तो उसका दायाँ हाथ और बायाँ पाँव काट दिया जाए, और (iv) अगर किसी डाकू ने केवल डराया-घमकाया हो मगर लूटपाट न की हो, तो उसे या तो क़ैद किया जाए या देश-निकाला दिया जाए।
34: अगर डाकू-लुटेरे पकड़े जाने से पहले अपने जुर्म से तौबा करते हुए हाकिम के सामने समर्पण [surrender] कर दें, तो उनकी सज़ा माफ़ हो जाएगी, मगर जिसका माल लूटा है, उसे वापस करना होगा। इसी तरह, जिसका क़त्ल किया हो, उसके वारिसों को जान के बदले हरजाना देना होगा।
35: अल्लाह के नज़दीक पहुँचने का ज़रिया [वसीला] वह नेक और अच्छे कर्म हैं जो अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए किए जाएं। अल्लाह के रास्ते में जी-तोड़ संघर्ष करने को "जिहाद" कहते हैं, वह चाहे दुश्मनों से अपने बचाव में लड़कर हो या अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने के लिए हो।
39: चोरी की सज़ा हाथ काटना बताया गया है, मगर इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ इस सज़ा के लिए कुछ कड़ी शर्तें हैं: जैसे कि चोर बालिग़ और होशमंद आदमी हो जो जानता हो कि चोरी करना मना है, जुर्म को साबित करना होगा, चाहे मुजरिम अपना जुर्म स्वीकार कर ले या कम से कम दो भरोसेमंद आदमियों की चश्मदीद गवाही हो, जब एक 'सुरक्षित जगह' में रखी हुई बड़ी रक़म या कोई क़ीमती सामान चोरी हो जाए, क़ानून के हिसाब से कम से कम 10 दिरहम (क़रीब 30 ग्राम चांदी) या आम तौर से 1/4 दिनार (क़रीब 1 ग्राम सोना) के बराबर क़ीमत का सामान चोरी हुआ हो, और सामान का मालिक उसका दावा करे। इस तरह, जुर्म साबित हो जाने पर सज़ा के तौर पर उसका दाहिना हाथ काटा जा सकता है। अगर चोर सच्चे दिल से अपनी बुराई की तौबा कर ले और फिर कभी चोरी न करने की ठान ले, तो अल्लाह आख़िरत में उसके गुनाह माफ़ कर देगा। मगर याद रहे, दुनिया में मिलने वाली सज़ा उसे ज़रूर मिलेगी।
यह भी ध्यान देने की बात है कि यह सज़ा ऐसे देश में लागू नहीं हो सकती है जहाँ मुसलमानों की हुकूमत नहीं है और न ही ऐसे मुस्लिम देश में जहाँ शरीअत के नियम पूरी तरह लागू नहीं हैं। इसके अलावा यह सज़ा उसी समाज में लागू होगी जहाँ ग़रीबों की ज़रूरतें ज़कात और दान आदि से पूरी की जाती हैं और जहाँ चोरी मजबूरी में नहीं बल्कि इच्छा से की गयी हो। यहाँ यह बताना उचित होगा कि इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर ने यह सज़ा एक साल तक तब स्थगित कर दी थी जब देश में अकाल पड़ा हुआ था।
41: यहाँ से आयत 50 तक कही गयी बातों के पीछे वे घटनाएं हैं जो मदीना के कुछ यहूदियों से जुड़ी हुई हैं। उनमें से एक घटना (आयत 41-44) यह थी कि ख़ैबर के आसपास रहनेवाले दो शादी-शुदा यहूदी मर्द और औरत ने एक-दूसरे से "ज़िना" [नाजायज़ सेक्स] किया और मदीना के कुछ यहूदी इस मामले को मुहम्मद (सल्ल) के पास फ़ैसला कराने के लिए इस उम्मीद पर लाए कि आप (सल्ल) कुछ हल्की सज़ा देंगे, क्योंकि पत्थर मारने की सज़ा क़ुरआन में नहीं थी जबकि तौरात के मुताबिक़ इस जुर्म की सज़ा यही थी। उन्हें यह सिखाकर भेजा गया था कि अगर हल्की सज़ा दें तो मान लेना और अगर पत्थर मारने वाली सज़ा दें तो मत मानना। जब आप (सल्ल) ने इस जुर्म के लिए यहूदी विद्वानों से तौरात के आदेश के बारे में पूछताछ की, तो उन लोगों ने टाल-मटोल करना शुरू किया, फिर आपने एक जवान यहूदी स्कालर से पूछा जिसे यहूदी अपना मध्यस्थ [Arbiter] मानते थे, उसने यह बात स्वीकार कर ली कि तौरात में ऐसे जुर्म की सज़ा पत्थर से मारने की ही है जब तक कि मौत न हो जाए, तब मुहम्मद (सल्ल) ने इस मामले में उन्हें वही सज़ा सुनायी जो तौरात के मुताबिक़ थी।
चूँकि 'सूरह मायदा' मदीना काल के अंत में उतरी थी, इससे यह बात साफ़ लगती है कि उस समय तक भी शायद मुसलमानों के लिए इस जुर्म की सज़ा पत्थर से मारना नहीं था, यही कारण था कि यहूदी इस उम्मीद पर मुहम्मद (सल्ल) के पास इस मामले का फ़ैसला कराने आए थे कि शायद वह क़ुरआन के अनुसार 100-100 कोड़े मारने की हल्की सज़ा देंगे।
45: मदीना में यहूदियों के दो क़बीले थे: बनु नज़ीर और बनु क़ुरैज़ा। बनु नज़ीर क़बीला ज़्यादार मालदार और ताक़तवर था, इसलिए उन लोगों ने क़त्ल से जुड़े हुए मामले में अपने मन-मर्ज़ी के नियम बना लिए थे, उस नियम के अनुसार, अगर बनु नज़ीर के क़बीले के किसी आदमी ने बनु क़ुरैज़ा के आदमी को क़त्ल किया, तो जान के बदले जान [क़सास] नहीं देनी होगी, केवल "ख़ून-बहा" [हरजाना] देना होगा। लेकिन अगर बनु क़ुरैज़ा के किसी आदमी ने बनु नज़ीर के किसी आदमी को क़त्ल किया तो ‘जान के बदले जान’ भी ली जाएगी और ‘ख़ून-बहा’ भी लिया जाएगा और वह भी दुगना!
48: हर ज़माने में मूल धर्म एक ही रहा है जिसमें हमेशा एक अल्लाह को मानने और अच्छा व नेक काम करने की शिक्षा दी जाती रही है, मगर हर युग की ज़रूरत और परिस्थिति के मुताबिक़ क़ानून [शरीअत] और ज़िंदगी जीने का तरीक़ा अलग-अलग रहा है। ज़्यादातर विद्वान तो यह मानते हैं कि क़ुरआन में जो क़ानून और तरीक़ा बताया गया है, वह चूँकि इस ज़माने की परिस्थिति के अनुसार है, इसलिए किताबवालों यानी यहूदियों और ईसाइयों के मामलों का फ़ैसला क़ुरआन के आदेशों के अनुसार ही होना चाहिए, हाँ कुछ निजी मामले जैसे शादी, तलाक़, इबादत आदि के तरीक़े उनके अपने नियमों के मुताबिक़ होने चाहिए।
मगर कई विद्वान इसका मतलब यह बताते हैं कि किताबवालों के मामलों का फ़ैसला उनकी किताबों यानी तोरात [Torah] और इंजील [Gospel] के मुताबिक़ होना चाहिए, जैसा कि मुहम्मद (सल्ल) ने फ़ैसला किया था जिसका ज़िक्र आयत 41-43 में आया है। इस तरह अल्लाह ने भी नहीं चाहा कि दुनिया में एक ही समुदाय हो, बल्कि सभी अपने-अपने नियम-क़ायदे पर चल सकते हैं, मगर ध्यान देने की असल बात यहाँ यह है कि सभी समुदाय को आपस में इस बात पर मुक़ाबला करना चाहिए कि कौन है जो भलाई के कामों में आगे निकलता है।
51: यहाँ मदीना के उन मुसलमानों से कहा गया है कि वे ऐसे यहूदियों और ईसाइयों को अपना साथी या संरक्षक न बनाएं जो उस समय मुसलमानों के खिलाफ़ दुश्मनी में लगे हुए थे, ख़ासकर यहूदियों ने तो मक्का के बुतपरस्तों [Pagans] के साथ भी सांठ-गांठ कर ली थी जबकि दूसरी तरफ़ उन लोगों ने मुसलमानों के साथ शांति-समझौता भी कर रखा था। ध्यान रहे कि इस आयत का मतलब यह नहीं है कि हर दौर के मुसलमानों को यहूदियों व ईसाइयों (या किसी और) से दोस्ती करने से मना किया गया है। बल्कि जब तक कोई ग़ैर-मुस्लिम मुसलमानों के साथ युद्ध नहीं करता हो या उन पर कोई अत्याचार नहीं कर रहा हो, तब तक मुसलमानों को भी उनके साथ नर्मी के साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिए (60:8).
52: यहाँ मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] के बारे में कहा गया है जो उहुद की जंग में मुसलमानों को नुक़सान उठाने के बाद यह सोचकर कि अब मुसलमान तबाह हो जाएंगे, मदद के लिए यहूदियों-ईसाइयों की तरफ़ लपके थे। ....यहाँ मक्का की जीत (8 हिजरी/ 630 ई) की तरफ़ इशारा है।
60: कुछ विद्वान मानते हैं कि वे सचमुच बंदर और सुअर की तरह बना दिए गए, और कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ बंदर और सुअर रूपक [metaphor] की तरह प्रयोग हुआ है। देखें 2:65
64: जब मदीना के यहूदियों ने मुहम्मद सल्ल के संदेश को मानने से इंकार कर दिया तो अल्लाह ने उनकी आंखें खोलने के लिए कुछ दिन उनकी रोज़ी में तंगी कर दी, उस पर यहूदियों ने कहा कि लगता है कि अल्लाह देने में कंजूसी कर रहा है, जबकि ख़ुद कंजूसी करने में यहूदी लोग मशहूर थे।
69: क़रीब-क़रीब यही बात 2: 62 में भी कही गई है, इसकी तुलना 22: 17 से भी करें, जहाँ कहा गया है कि क़यामत के दिन अल्लाह ईमान रखनेवालों, ईसाइयों, यहूदियों, साबई और मजूसियों के बीच फ़ैसला कर देगा।
73: ईसाइयों में जो लोग Trinity के सिद्धांत में विश्वास रखते थे, उनकी यहाँ निंदा की गई है। इस सिद्धांत के अनुसार ख़ुदा में तीन अलग-अलग वजूद यानी ‘बाप (ख़ुदा), बेटा (ईसा) और ‘पवित्र आत्मा’ मिला हुआ है, और यह भी कहा जाता है कि तीनों मिलकर एक हैं।
78: यानी इसराईल की संतानों में से जिन लोगों ने सच्चाई को मानने से इंकार किया था, उनकी हरकतों पर "ज़बूर [Psalms] और "बाइबल" [Gospel] में भी कड़े शब्दों में निंदा की गई है।
82: यहाँ अरब के उस ज़माने में रहनेवाले ईसाइयों का ज़िक्र है जिनमें काफ़ी लोग ज्ञान की खोज में लगे रहते थे, घमंड नहीं करते थे और उनमें से काफ़ी लोग दुनिया की चमक-दमक से दूर होकर संयासी थे। जब मुसलमानों पर मक्का में वहाँ के मुश्रिकों ने बहुत ज़ुल्म किए थे, उस वक़्त भी मुसलमानों के एक दल नें इथोपिया में जाकर ईसाई बादशाह "नजाशी" के यहाँ शरण ली थी। कुल मिलाकर ईसाइयों का रवैया मुसलमानों के प्रति यहूदियों की तुलना में कहीं अच्छा था।
83: मदीना में एक बार हब्शा [इथोपिया] से ईसाइयों का एक प्रतिनिधिमंडल आया था, उनके सामने जब क़ुरआन पढ़कर सुनायी गई, तो उन लोगों ने सच्चाई को पहचान लिया और उनकी आँखों में आँसू आ गए थे।
90: शराब को हराम किए जाने के क्रम की यह चौथी और आख़िरी आयत है, पहले 16: 67 में यह ज़िक्र है कि अल्लाह ने ऐसे फल पैदा किए हैं जिनके रस से तुम अपने लिए पीने की चीज़ें बनाते हो, फिर 2: 219 में कहा गया कि शराब और जुए में थोड़ा फ़ायदा तो है मगर इससे नुक़सान कहीं ज़्यादा है, उसके बाद 4:43 में लोगों को नशे की हालत में नमाज़ से दूर रहने को कहा गया, और अब यहाँ शराब, जुए और मूर्तिपूजा से जुड़ी जानवरों की बलि चढ़ाने और तीरों से उसके मांस बांटने की रीतियों से पूरी तरह से बचने को कहा गया है।
94: हज की यात्रा में जब इहराम [बिना सिला हुआ सफ़ेद कपड़े का दो टुकड़ा] पहन लिया हो, तो थल पर हर तरह के शिकार करना हराम है, चाहे आसानी से हाथ आ जाने वाली चिड़ियों का शिकार हो या भाले या किसी हथियार से बड़े जानवर का शिकार, मगर पानी के जानवर का शिकार किया जा सकता है।
95: अगर जान बचाने के लिए किसी जानवर का शिकर करना पड़े तो वह किया जा सकता है। अगर हज के यात्री ने जान-बूझकर शिकार कर लिया, तो फिर उसे भरपाई में मरे हुए जानवर की क़ीमत के बराबर का एक जानवर क़ुर्बान करना होगा, या उतनी क़ीमत के बराबर ग़रीबों को खिलाना होगा, और अगर यह न हो सके, तो फिर रोज़े रखने होंगे। रोज़े की गिनती का हिसाब हनफ़िया के अनुसार यह है कि "पौने दो सेर गेंहू की क़ीमत" (1.150 कि.ग्रा) के बराबर एक रोज़ा माना जाएगा।
100: बुरी या हराम चीज़ का चलन चाहे कितना ही हो जाए, मगर उसे आँख बंद करके नहीं अपना लेना चाहिए, क्योंकि बुरी चीज़ और अच्छी चीज़ कभी बराबर नहीं हो सकती।
102: कभी-कभी कोई बात साफ़-साफ़ जान-बूझकर नहीं बतायी जाती ताकि उन पर अमल करते वक़्त आसानी हो, मगर जब उसके बारे में खोद-खोदकर पूछा जाए, तो फिर उस पर अमल करते समय मुश्किल होती है। क़ुरआन में कई जगह पर पुरानी क़ौमों के क़िस्से आए हैं जहाँ उन लोगों ने किसी चीज़ के बारे में बहुत सारे सवाल पूछे और फिर उस पर अमल नहीं कर सके। देखें 2: 246-247 जब इसराइलियों ने अपने लिए एक राजा की माँग की और जब Saul को राजा बनाने का हुक्म हुआ तो लोग उसकी क्षमता पर सवाल उठाने लगे। इसी तरह, देखें 2: 67-71 जहाँ गाय को मारने की घटना का ज़िक्र है कि किस तरह इसराइलियों ने मूसा (अलै) से लगातार सवाल पूछे थे।
103: अरब के बहुदेववादियों के बीच ऐसी मान्यताएं काफ़ी ज़माने से रही थीं, जहाँ कुछ ख़ास तरह के ऊँटों को वे लोग पवित्र समझकर उसे बुतों के लिए समर्पित कर देते थे और फिर न उसे खाते, न दूध निकालते और न ही उस पर सवारी करते, बल्कि उसे आज़ाद चरने के लिए छोड़ देते थे। "बहीरा" उस जानवर को कहते थे जिसके कान चीरकर उसका दूध किसी बुत के नाम समर्पित कर दिया जाता था। "सायबा" वैसा जानवर था जिसे किसी बुत के नाम करके आज़ाद छोड़ दिया जाता और फिर उससे किसी तरह का फ़ायदा उठाना हराम था। "वसीला" उस ऊँटनी को कहते थे जो लगातार मादा बच्चे जनती और बीच में कोई नर न होता। "हाम" उस नर ऊँट को कहते थे जिसके बच्चों के बच्चे हो चुके हों, उससे भी कोई काम न लेते हुए आज़ाद छोड़ दिया जाता था।
105: समाज में अगर ढेर सारे लोग सही रास्ते से भटक जाएं, तो दूसरों को सुधारने से ज़्यादा पहले हर आदमी को अपनी फ़िक्र करनी चाहिए क्योंकि वह अपने कामों के लिए ही जवाबदेह होगा। जब लोगों में अपने आपको सुधारने की सोच पैदा होगी, तो समाज में ख़ुद ही सुधार आ जाएगा।
106: इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ कोई आदमी मरने से पहले किसी को अपनी संपत्ति में से ज़्यादा से ज़्यादा एक तिहाई हिस्सा वसीयत में दे सकता है। चूँकि 4:11-12 में सभी वारिसों का हिस्सा बता दिया गया है, इसलिए विद्वानों की राय यह है कि वसीयत में केवल उन्हें ही दिया जा सकता है जो 4:11-12 में बताए गए वारिसों में नहीं हों।
इस आयत के पीछे एक कहानी बतायी जाती है। एक मुसलमान आदमी अपने दो ईसाई दोस्तों के साथ सीरिया व्यापार के लिए गया, वहाँ उसकी तबियत बिगड़ गई तो उसने अपने दोनों दोस्तों को वसीयत की कि मदीना जाकर मेरा सामान मेरे घरवालों को दे देना, उसके दोस्तों ने वापस आकर उसका सामान उसके वारिसों को दे दिया, मगर एक चांदी का प्याला जो काफ़ी क़ीमती था, ख़ुद अपने पास रख लिया। जब मरे हुए आदमी के वारिसों ने उस प्याले को उसके दोस्तों के पास देखा, तो उसे पहचानते हुए पूछताछ की, उनलोगों ने बताया कि यह प्याला उसने अपने दोस्त से ख़रीद लिया था, मगर वे इस पर कोई गवाह नहीं पेश कर पाए। फिर वारिसों की तरफ़ से दो आदमियों की गवाही पर वह प्याला उन ईसाई दोस्तों से लेकर सही वारिसों को दे दिया गया।
109: हर रसूल अपनी-अपनी क़ौम के लोगों के लिए गवाही देंगे [4:41; 16: 89], मगर जब अल्लाह उनकी क़ौमों के अमल के बारे में पूछेंगे तो वे ख़ामोश रहेंगे क्योंकि अल्लाह को आदमी का ज़ाहिरी और छिपा हुआ हर अमल अच्छी तरह मालूम होगा।
110: यहाँ अल्लाह ने ईसा (अलै) को उन चमत्कारों [miracles] के बारे में याद दिलाया है जो वह अपनी क़ौम के सामने अल्लाह के हुक्म से दिखाया करते थे। उनके चमत्कारों का ज़िक्र बाइबल में भी है, उनमें से एक था "बच्चे की हालत में उनका बोलना" जिसका ज़िक्र 3: 46 और 19: 29-30 में भी आया है, मगर यह बात बाइबल में नहीं मिलती।
116: हालाँकि ईसाइयों के "Trinity" यानी "तीन में से एक ख़ुदा" के सिद्धांत में हज़रत मरयम [Mary] को ट्रिनिटी का हिस्सा नहीं माना जाता है, मगर जिस तरह से हर एक चर्च में उनके पुतले और तस्वीरों को हज़रत ईसा (अलै) के साथ रखा जाता है और उन्हें इबादतों में प्रमुखता से शामिल किया जाता है, इसीलिए यह सवाल उठाया गया है।
117: यहाँ ईसा (अलै) को अल्लाह द्वारा उठाए जाने की तरफ़ इशारा है, देखें 3:54 का नोट।
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