सूरह 28: अल-क़सस
[कहानी / The Story]
यह एक मक्की सूरह है, इसके केंद्र में मूसा (अलै.) के बचपन की कहानी (आयत 25) बतायी गई है, साथ में उनके हाथ से एक इसराइली की मौत हो जाना और फिर भागकर उनका मदयन चले जाना, इसी संदर्भ से इस सूरह का नाम "क़सस यानी क़िस्सा" रखा गया है। इस सूरह का केंद्रीय विषय यह है कि जो लोग बहुत घमंडी होते हैं, और समाज में बिगाड़ पैदा करते हैं, जैसे फ़िरऔन और क़ारून, तो उनका अंत बड़ा ख़राब होता है। पूरी सूरह में जगह-जगह बहुदेववाद की आलोचना की गई है (45-75) --- और इनका संबंध मक्का के विश्वास न करने वालों से जोड़ा गया है। पैग़म्बर साहब को याद दिलाया गया है कि वह हर एक आदमी को विश्वास करने पर मजबूर नहीं कर सकते हैं (आयत् 56), अंत में मुहम्मद सल्ल. से कहा गया है कि उन्हें अपना क़दम मज़बूती से जमाए रखना चाहिए (आयत 87).
विषय: 01-02: किताब की आयतें (निशानियाँ)
03-06: मूसा (अलै) की कहानी: परिचय
07-14: मूसा का बचपन और उनकी शुरुआती ज़िंदगी
15-28: मूसा की जवानी के दिन
29-35: मूसा को पुकारा गया
36-42: मूसा का फिरऔन के साथ संघर्ष
43-51: मूसा की कहानी की (सच्चाई की) पुष्टि [confirmation]
52-55: जिन्हें पहले किताब दी गई थी, वे क़ुरआन पर विश्वास करते हैं
56-59: मक्कावालों को मुहम्मद (सल्ल) का रास्ता अपनाने से नुक़सान का डर
60-61: इस सांसारिक जीवन से आने वाली (आख़िरत की) ज़िंदगी कहीं बेहतर होगी
62-67: फ़ैसले के दिन के दो दृश्य
68-73: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
74-75: फ़ैसले का एक दृश्य
76-82: क़ारून की कहानी
83-84: आख़िरत [परलोक] का घर
85-88: रसूल का उत्साह बढ़ाना
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
यह (आसमानी) किताब की आयतें हैं जो चीज़ों को बिल्कुल स्पष्ट कर देती हैं: (2) [ऐ रसूल] हम आपको सच्चाई से जुड़ी हुई, मूसा [Moses] और फ़िरऔन [Pharaoh] की कहानी का कुछ हिस्सा सुनाते हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान रखते हैं। (3) सचमुच फ़िरऔन ने धरती पर अपने आपको बहुत ही ऊँचा और ताक़तवर बना लिया था और वहाँ के लोगों को अलग अलग गिरोहों में बाँट रखा था: उनमें से एक गिरोह [इसराईल की संतानों] को उसने एकदम दबाकर रखा था, उनके बेटों को मार डालता और उनकी औरतों को ज़िंदा रहने देता--- सचमुच ही वह (समाज में) फ़साद व बिगाड़ [corruption] पैदा करने वालों में से था ----(4) मगर हम यह चाहते थे कि उन लोगों पर उपकार करें जिन्हें ज़मीन पर इतना दबाकर रखा गया था, उन्हें नायक बनाएँ, और उन्हें (उस धरती का) वारिस बनाएं, (5) और ज़मीन पर उनके क़दम मज़बूती से जमा दें, और उनके द्वारा फ़िरऔन और हामान और उनकी सेनाओं को वही चीज़ दिखा दें, जिसका उन्हें डर था। (6)
हमने यह कहते हुए मूसा की माँ के दिल में यह बात डाल दी कि, "इस (बच्चे) को दूध पिलाओ, फिर जब तुम्हें उसकी सुरक्षा ख़तरे में लगे, तो उसे (बक्से में रखकर) दरिया में डाल देना: डरो नहीं, और न ही दुखी हो, कि हम उसे ज़रूर तुम्हारे पास वापस भेज देंगे और उसे (एक दिन अपने) रसूलों में से एक बनाएँगे।" (7) इस तरह, फ़िरऔन के लोगों ने उस बच्चे को (दरिया से) उठा लिया---- जो बाद में, उनका दुश्मन, और उनके लिए दुख व परेशानी का कारण बनने वाला था: सचमुच फ़िरऔन, हामान और उनकी सेनाओं में जो लोग थे वे ग़लती पर थे---- (8) फ़िरऔन की पत्नी ने कहा, "इस (बच्चे को) देखकर मेरे और तुम्हारे मन में कितनी ख़ुशी हो रही है! (सचमुच यह हमारी आँखों की ठंढक है), इसकी हत्या न करो, शायद हमें इससे कुछ फ़ायदा पहुँचे, या हम इसे अपना बेटा ही बना लें।" (मगर उस समय) उन्हें मालूम न था कि वे क्या (भूल) कर बैठे थे! (9) अगले दिन, मूसा की माँ ने अपने दिल में एक अजीब ख़ालीपन व बेक़रारी महसूस की---- अगर हमने (उस वक़्त) उनके दिल को मज़बूत करके उन्हें हमारी बातों में विश्वास रखने वाला न बनाया होता, तो मुमकिन था कि वह (बच्चे के बारे में) सब राज़ की बातें उगल देतीं---- (10) मूसा की माँ ने उसकी बहन से कहा, "तू उसके पीछे-पीछे जा।" सो वह उसे दूर ही दूर से देखती रही, इस तरह कि उन्हें पता न चले (11) और हम यह तय कर चुके थे कि वह [मूसा] किसी भी दूध पिलानेवालियों का दूध पीने को तैयार नहीं होंगे। फिर मूसा की बहन ने उनके पास जाकर कहा कि "क्या मैं तुम्हें ऐसे घरवालों का पता बताऊँ, जो तुम्हारे लिए इस (बच्चे) की परवरिश करें और इसकी ख़ूब अच्छी तरह देखभाल करें?" (12) इस तरह हमने बच्चे को उसकी माँ के पास वापस पहुँचा दिया, ताकि उसका मन शांत हो सके, वह दुखी न रहे और ताकि वह जान ले कि अल्लाह का वादा सच्चा होता है, किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते। (13)
और जब मूसा अपनी जवानी को पहुँचे और पूरी तरह परिपक्व [mature] हो गए, तो हमने उन्हें (सही फ़ैसला करने की) गहरी समझ-बूझ [wisdom] प्रदान कर दी: और हम अच्छा कर्म करने वालों को ऐसा ही इनाम देते हैं। (14) (एक दिन) मूसा जब शहर [मिस्र] में दाख़िल हुए, उस समय किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया, उन्होंने वहाँ दो आदमियों को लड़ते हुए पाया: एक तो उनकी बिरादरी के लोगों में से था और दूसरा उनके दुश्मन क़ौम का था। जो उनकी बिरादरी में से था, उसने अपने दुश्मन के मुक़ाबले में, उन्हें मदद के लिए पुकारा। इस पर मूसा ने उस (दुश्मन) को ऐसा घूँसा मारा कि वह मर ही गया। (मूसा अपने किए पर पछताने लगे) उन्होंने कहा, "यह ज़रूर किसी शैतान का काम है: सचमुच ही वह ऐसा दुश्मन है जो (आदमी को) बहका देता है।" (15) उन्होंने कहा, "ऐ मेरे रब, मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गयी। तू मुझे क्षमा कर दे,” सो अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया; सचमुच वह बेहद क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है। (16) मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! जिस तरह तूने मुझ पर अपनी ख़ास मेहरबानी [blessings] की है, अब मैं भी कभी शैतानी करने वालों का मददगार नहीं बनूँगा।" (17)
अगले दिन, वह डरते हुए और चौकन्ना होकर शहर में चले जा रहे थे, कि अचानक क्या देखते हैं कि कल जिसकी मदद की थी, वही आदमी फिर उन्हें मदद के लिए पुकार रहा है। मूसा ने उससे कहा, "अरे तुम तो सचमुच बड़े बदमाश आदमी हो।” (18) फिर जैसे ही मूसा ने इरादा किया कि वह उस आदमी को पकड़ ले, जो उन दोनों का शत्रु था, तो वह आदमी कहने लगा, "ऐ मूसा, क्या तू चाहता है कि मुझे भी मार डाले, जिस तरह तूने कल एक आदमी को मार डाला? धरती में सचमुच तू एक निर्दयी अत्याचारी बनकर रहना चाहता है; तू उन लोगों जैसा नहीं जो चीज़ों में सुधार लाते हैं।" (19) फिर ऐसा हुआ कि शहर के दूरवाले इलाक़े से एक आदमी दौड़ता हुआ आया, और उसने कहा, "ऐ मूसा, कुछ सरदार तेरे बारे में परामर्श कर रहे हैं कि तुझे मार डालें, अतः तू यहाँ से निकल जा--- मेरी सलाह मान कि मैं तेरा भला चाहता हूँ।" (20) सो मूसा डरते हुए और ख़तरा भाँपते हुए वहाँ से निकल खड़े हुए, और दुआ की, "ऐ मेरे रब! मुझे शैतान लोगों से बचा ले।" (21)
जब मूसा मदयन [Midian] जाने वाले रास्ते पर चल पड़े, तो उन्होंने कहा था, "आशा है, मेरा रब मार्गदर्शन करते हुए मुझे सही रास्ते पर डाल देगा।" (22) और जब वह मदयन के कुंएँ पर पहुँचे, तो वहाँ उन्होंने लोगों के एक गिरोह को देखा कि वे अपने जानवरों को पानी पिला रहे थे, और उनके अलावा वहाँ दो औरतों को भी देखा, जो अपने जानवरों को रोके खड़ी थीं। मूसा ने उनसे कहा, "तुम दोनों का क्या मामला है?" उन्होंने कहा, "हम उस समय तक (अपने जानवरों को) पानी नहीं पिला सकते, जब तक ये चरवाहे अपने भेड़ों को लेकर चले नहीं जाते: हमारे बाप बहुत ही बूढ़े हैं।" (23) तब मूसा ने उनकी ख़ातिर उनके जानवरों को पानी पिला दिया, और वहाँ से छायादार जगह के पास चले गए और दुआ की, "ऐ मेरे रब, जो कुछ भी अच्छी चीज़ हो सके, तू मेरी तरफ़ भेज दे, मैं उसका बहुत ज़रूरतमंद हूँ।" (24)
थोड़ी देर बाद, उन दो औरतों में से एक ज़रा शर्मायी हुई चाल से चलती हुई उनके पास आयी, और कहने लगी, "मेरे बाबा आपको बुला रहे हैं: आपने हमारे लिए जानवरों को जो पानी पिलाया है, उसके लिए वह आपको कुछ इनाम देना चाहते हैं।"
फिर जब मूसा उनके (बाबा के) पास पहुँचे और उन्हें अपनी सारी कहानी सुनायी, तो उस बूढ़े आदमी ने कहा, "अब डरो नहीं, ग़लत काम करने वालों से बचकर तुम सुरक्षित जगह आ गए हो।" (25) उनमें से एक औरत ने कहा, "बाबा! इनको मज़दूरी पर रख लीजिए: मज़दूरी पर रखने के लिए सबसे सही आदमी वही होता है, जो मज़बूत और भरोसेमंद हो।" (26) उसके बाप ने कहा, "मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक का विवाह तुम्हारे साथ इस शर्त पर कर दूँ कि तुम आठ वर्ष तक मेरे यहाँ नौकरी करो: और यदि तुम दस वर्ष पूरे कर दो, तो यह तुम्हारी अपनी इच्छा होगी। मैं तुम्हें कठिनाई में डालना नहीं चाहता: अगर अल्लाह ने चाहा तो तुम मुझे सही व नेक आदमी पाओगे।" (27) मूसा ने कहा, "तो मेरे और आपके बीच यह बात तय रही --- इन दोनों अवधियों में से जो भी मैं पूरी कर दूँ, तो मेरे साथ कोई अन्याय नहीं होगा ---- और जो कुछ हम कह रहे हैं, उसपर अल्लाह गवाह है।" (28)
एक बार जब मूसा तय की हुई अवधि पूरी कर चुके थे और अपने परिवारवालों को लेकर जा रहे थे, कि अचानक उन्हें तूर नामक पहाड़ के किनारे एक आग-सी दिखायी दी। उन्होंने अपने घरवालों से कहा, "ठहरो (यहाँ), मैंने एक आग देखी है। शायद मैं वहाँ से तुम्हारे पास (रास्ते की) कोई ख़बर ले आऊँ या तुम्हारे लिए एक जलती हुई लकड़ी मिल जाए जिससे तुम अपने आपको गर्मा सको।" (29) मगर जब वह वहाँ पहुँचे, तो घाटी के दाहिनी तरफ़, एक पवित्र ज़मीन पर (लगे हुए) पेड़ से उन्हें पुकारती हुई आवाज़ आयी: "मूसा! मैं अल्लाह हूँ, सारे जहाँनों का पालनेवाला (रब!)। (30) अपनी लाठी नीचे फेंक दो।" फिर जब मूसा ने देखा कि उनकी लाठी किसी साँप की तरह हिल-डुल रही है, तो वह मारे डर के पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर भी न देखा। फिर (से उन्हें पुकारा गया), "ऐ मूसा! सामने आओ और डरो नहीं! निस्संदेह तुम उनमें से हो जो पूरी तरह सुरक्षित हैं। (31) अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो और फिर बाहर निकालो तो वह सफ़ेद चमकता हुआ हो जाएगा, और वह भी बिना किसी ख़राबी (या नुक़सान) के--- और डर भगाना हो तो अपने बाज़ू को अपने बदन से सटा लेना। ये फ़िरऔन और उसके दरबारियों के लिए तेरे रब की ओर से दो निशानियाँ [लाठी व चमकता हाथ] होंगी; सचमुच वे बड़े शैतान लोग हैं।" (32) मूसा ने कहा, "ऐ मेरे रब! मैंने उनके एक आदमी को मार डाला था, और मुझे डर है कि वे कहीं मुझे मार न डालें। (33) मेरे भाई हारून [Aaron] मुझसे कहीं अधिक साफ़ व प्रभावशाली भाषा बोलते हैं: उन्हें भी मेरी मदद के लिए मेरे साथ भेजें ताकि वह मेरी बातों का समर्थन करें--- मुझे डर है कि वे (लोग) मुझे झुठा कहेंगे।" (34) अल्लाह ने कहा, "हम तुम्हारे भाई के द्वारा तुम्हारा हाथ मज़बूत कर देंगे; और हमारी निशानियों के साथ, तुम दोनों को इस तरह ताक़त व अधिकार देंगे कि वे तुम्हारे नज़दीक भी नहीं पहुँच सकेंगे। (अंत में) तुम और तुम्हारे माननेवालों की ही जीत होगी।" (35)
फिर जब मूसा उनके पास हमारी साफ़ व स्पष्ट निशानियाँ लेकर पहुँचे, तो उन्होंने कहा, "यह तो बस बनावटी जादू के करतब हैं; हमने तो यह बात अपने बाप-दादा से कभी नहीं सुनी।" (36) मूसा ने कहा, "मेरा रब अच्छी तरह जानता है कि कौन उसके यहाँ से मार्गदर्शन लेकर आता है, और किसके पास (परलोक में) रहने का अंतिम ठिकाना [Final Home] होगा: ग़लत काम करने वाले कभी कामयाब नहीं होंगे।" (37) फ़िरऔन ने (व्यंग्य से) कहा, "दरबारियो, अपने अलावा तो मैं तुम्हारे किसी देवता को नहीं जानता। ऐ हामान! तू मेरे लिए मिट्टी की ईंटों को आग में पकवाकर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना कि मैं उसपर चढ़कर मूसा के ख़ुदा तक पहुँच सकूँ: मैं यक़ीन से कह सकता हूँ कि यह झूठ बोल रहा है।" (38)
फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने बिना किसी अधिकार के धरती पर घमंड भरा व्यवहार किया---- और समझा कि उन्हें हमारे पास वापस नहीं लाया जाएगा----- (39) अन्त में हमने उसे और उसकी सेनाओं को अपनी पकड़ में ले लिया और उन्हें समंदर में फेंक दिया। अब देख लो कि ग़लत काम करने वालों का क्या नतीजा हुआ! (40) और हमने उन्हें (दूसरों को जहन्नम की) आग की ओर बुलानेवालों का नेता बना दिया: क़यामत के दिन उनकी कोई मदद नहीं की जाएगी। (41) और हमने इस दुनिया में उनके पीछे लानत [श्राप] लगा दी और क़यामत के दिन वे घृणित लोगों में शामिल होंगे। (42) पिछली नस्लों को बर्बाद कर देने के बाद हमने मूसा को एक किताब [तोरात/ Torah] दी थी, जिसमें लोगों के लिए समझदारी की बातें, मार्गदर्शन और दयालुता [रहमत/Mercy] थी, ताकि वे उस पर ध्यान दें और इससे नसीहत ले सकें। (43)
[ऐ रसूल] आप तो (तूर) पहाड़ के पश्चिमी किनारे पर मौजूद नहीं थे, जब हमने मूसा को अपने धर्म आदेश [commandments] दिए थे: आप वहाँ इस घटना को देखने वालों में भी नहीं थे--- 44) बल्कि हमने बहुत-सी नस्लें पैदा कीं, जिन्होंने इस दुनिया में बहुत लम्बी ज़िंदगियाँ गुज़ारीं --- आप तो मदयन [Midian] के लोगों के बीच (भी) नहीं रहते थे, और न ही आपने हमारे संदेश [आयतें] उन लोगों को सुनाए----हमने लोगों के पास अपने रसूलों को (अपने संदेश के साथ) हमेशा ही भेजा है---- (45) और न ही आप सीना की पहाड़ी [Mount Sinai] के किनारे ही मौजूद थे, जब हमने मूसा को पुकारा था। मगर आपको रब की तरफ़ से रहमत [grace] के रूप में भेजा गया है, ऐसे लोगों को सावधान करने के लिए जिनके पास आपसे पहले कोई सावधान करने वाला नहीं आया, ताकि वे ध्यान दें व नसीहत ले सकें। (46) और उनके हाथों द्वारा किए गए करतूतों के नतीजे में अगर कोई बड़ी आफ़त उन पर आ जाए, तो वे यह न कह सकें कि, "ऐ हमारे रब, अगर तूने हमारे पास कोई रसूल भेजा होता तो शायद हमने तेरी आयतों का अनुसरण किया होता और हम भी विश्वास करनेवालों में [मोमिन] शामिल हो जाते?" (47) मगर अब, जबकि हमारी तरफ़ से सच्चाई उनके पास आ चुकी है, तब भी वे कहते हैं, "उनको [मोहम्मद] क्यों नहीं वैसी निशानियाँ दी गयीं, जैसी कि मूसा को मिली थीं?" मगर जो (निशानियाँ) इससे पहले मूसा को दी गयी थीं, क्या उन लोगों ने उस सच्चाई को भी मानने से इंकार नहीं कर दिया था? वे कहते हैं, "दोनों [क़ुरआन व तोरात] दो क़िस्म के जादू हैं, जो एक-दूसरे की (सच्चाई की) पुष्टि करते हैं", और "हम तो दोनों में किसी एक को भी मानने से इंकार करते हैं।" (48) [ऐ रसूल] आप कहें, "ठीक है, अगर तुम सच कहते हो, तो ले आओ अल्लाह के यहाँ से कोई ऐसी किताब, जो इन दोनों से ज़्यादा सही रास्ता दिखानेवाली हो, ताकि मैं भी उसका अनुसरण करूँ?" (49) अब अगर वे आपकी बात का जवाब न दे पाएं, तो जान लें कि वे केवल अपनी इच्छाओं के पीछे चलने वाले हैं। उस आदमी से बढ़कर भटका हुआ कौन होगा जो अल्लाह के मार्गदर्शन के बिना, केवल अपनी इच्छाओं के पीछे चलता हो? सचमुच अल्लाह ग़लत काम करनेवालों को सही मार्ग नहीं दिखाता। (50)
हम उनके पास अपनी वाणी [क़ुरआन] पहुँचाते रहते हैं, ताकि वे ध्यान से सोच-विचार करें। (51) जिन लोगों को हमने इससे पहले (आसमानी) किताब दी थीं, वे इस [क़ुरआन] में विश्वास कर लेते हैं। (52) और जब यह उनके सामने पढ़कर सुनायी जाती है, तो कहते हैं, "हम इस पर विश्वास [ईमान] रखते हैं, सचमुच हमारे रब की ओर से यह सत्य है। हम तो इसके आने के पहले से ही उस [अल्लाह] पर पूरी भक्ति से समर्पित [मुस्लिम] थे।" (53) ऐसे लोगों को दुगना इनाम दिया जाएगा, क्योंकि वे सब्र के साथ जमे रहते हैं, भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते हैं, और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दी है, उसमें से दूसरों को भी देते हैं, (54) और जब कभी वे बेकार की फ़ालतू बातें सुनते हैं, तो यह कहते हुए वहाँ से किनारे हट जाते हैं कि "हमारे लिए हमारे कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। तुम पर सलामती हो! हम जाहिल लोगों के साथ (उलझना) नहीं चाहते।" (55)
[ऐ रसूल] आप जिसे चाहें, हर एक को सच्चाई की राह पर नहीं ला सकते; यह तो अल्लाह है कि जिसे चाहता है राह दिखा देता है: वह अच्छी तरह जानता है कि वे कौन लोग हैं जो बताए गए सही रास्ते पर चलेंगे। (56) वे कहते हैं, "अगर हम आप [मोहम्मद] के साथ आपके बताए हुए रास्ते पर चलेंगे, तो हमें अपनी ज़मीन से उखाड़कर फेंक दिया जाएगा।" क्या हमने उनके लिए (मक्का के रूप में) एक सुरक्षित जगह [sanctuary] की स्थापना नहीं की, जहाँ हमारी ओर से रोज़ी के रूप में हर क़िस्म की पैदावार (और फल) लाए जाते हैं? मगर ज़्यादातर लोग समझते नहीं हैं। (57) हम कितनी ही बस्तियों को बर्बाद कर चुके हैं, जो कभी अपने बेहिसाब धन-दौलत और आराम की ज़िंदगी के लिए जानी जाती थीं: उस वक़्त से लेकर आज तक, कुछ एक को छोड़कर, वे बस्तियाँ शायद ही फिर कभी दोबारा आबाद हो पायीं--- अन्ततः हम ही इसके वारिस हुए! (58) आपका रब कभी भी बस्तियों को उस वक़्त तक तबाह-बर्बाद नहीं करता जब तक कि पहले उनकी बस्ती में से कोई रसूल [Messenger] न ख़ड़ा कर दे, जो हमारे संदेशों [आयतों] को उनके सामने सुनाए। और न ही हम बस्तियों को उस वक़्त तक बर्बाद करते हैं, जब तक कि वहाँ के रहनेवाले शैतानी न करने लग जाएं। (59) जो भी चीज़ें तुम्हें इस संसार में दी गई हैं, वह तो बस (कुछ ही दिनों के लिए) इसी जीवन की ख़ुशियाँ हैं और उनकी सजावट के सामान हैं: और जो कुछ अल्लाह के पास है वह कहीं बेहतर और कहीं अधिक समय तक रहने वाला है--- तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लोगे? (60)
भला वह आदमी जो उस अच्छे वादे को पूरा होता हुआ देखेगा जो हमने उसके साथ कर रखा था, क्या उसकी तुलना एक ऐसे आदमी से हो सकती है जिसे हमने इस सांसारिक जीवन में थोड़ी सी ख़ुशियाँ दे रखी हों, और फिर वह क़यामत के दिन पकड़कर (सज़ा के लिए) पेश किया जाने वाला हो? (61) एक दिन आएगा जिस दिन अल्लाह उन्हें पुकारेगा और कहेगा, "कहाँ हैं मेरे वे (ख़ुदायी में) साझेदार [Partners], जिनके (देवता होने का) तुम दावा करते थे?" (62) और वे [बड़े सरदार] जिनके ख़िलाफ़ फ़ैसला सुना दिया जाएगा, वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! ये वे लोग हैं जिन्हें हमने बहका दिया था। चूँकि हम स्वयं बहके हुए थे, सो हमने इन्हें भी बहका दिया, लेकिन अब हम तेरे सामने इनसे अपना सम्बन्ध तोड़ते हैं: सच बात तो यह है कि ये हमारी बन्दगी करते ही नहीं थे।" (63) उसके बाद उन (काफिरों) से कहा जाएगा, "पुकारो उन सबको, जिन्हें तुम (अल्लाह के) साझेदार [Partners] के रूप में पूजते थे," तो वे उन्हें पुकारेंगे, मगर उन्हें कोई जवाब नहीं मिलेगा। वे अपनी आँखों से उस दी जा रही यातना को देखेंगे, और सोचेंगे कि काश उन्होंने सही मार्गदर्शन को मान लिया होता! (64) और उस दिन अल्लाह उन्हें अपने सामने बुलाकर पूछेगा, "तुमने हमारे रसूलों को क्या जवाब दिया था?" (65) उस दिन सारी दलीलें उन्हें बेमानी लगेंगी; वे एक दूसरे से सलाह मशविरा भी नहीं कर पाएंगे। (66) मगर हाँ, जिस किसी ने (गुनाहों से) तौबा कर ली, (अल्लाह में) विश्वास [ईमान] रखा, और अच्छे कर्म किए, तो वह सफल होने वालों में अपने आपको शामिल करने की आशा रख सकता है। (67) तेरा रब जो चाहता है पैदा करता है, और जिसे चाहता है चुन लेता है--- चुनने का उन्हें कोई अधिकार नहीं--- सो अल्लाह महान है, और उनके ठहराए हुए अल्लाह (के झूठे) साझेदारों [Partners] से कहीं ऊँचा व बड़ा है! (68) तेरा रब वह भी जानता है जो कुछ उनके सीनों के अंदर छिपा होता है, और वह भी जो वे सामने बता देते हैं। (69) वह अल्लाह है; उसको छोड़कर कोई भी बंदगी के लायक़ नहीं; सारी तारीफ़ें उसी के लिए हैं —--- इस जीवन में भी और आनेवाले जीवन [परलोक] में भी; अंतिम फ़ैसले का अधिकार उसी के हाथ में है और उसी के पास तुम को लौटकर जाना होगा। (70)
[ऐ रसूल] आप कहें, "ज़रा सोचो, अगर अल्लाह क़यामत के दिन तक तुम्हारे ऊपर लगातार रात कर दे, तो अल्लाह को छोड़कर कौन सा देवता है जो तुम्हारे लिए रौशनी ला सके? तो क्या तब भी, तुम सुनते नहीं?" (71) कह दें, "ज़रा सोचो, अगर अल्लाह क़यामत तक तुम्हारे ऊपर लगातार दिन कर दे, तो अल्लाह को छोड़कर कौन सा देवता है जो तुम्हारे आराम के लिए रात ला सके? तो क्या तब भी, तुम देखते नहीं? (72) यह तो उसकी रहमत है कि उसने तुम्हें रात और दिन दिए हैं, ताकि तुम रात में आराम पा सको, और दिन के समय रोज़ी तलाश कर सको, और ताकि तुम शुक्र अदा कर सको।" (73) एक दिन आएगा जिस दिन वह उन्हें बुलाएगा और कहेगा, "कहाँ है मेरी (ख़ुदायी में) गढ़े हुए साझेदार [partners], जिनके (देवता होने का) तुम दावा करते थे ?"(74) और हम हर एक समुदाय में से एक गवाह को बुलाएंगे और कहेंगे, "पेश करो अपना सबूत।" और तब वे जान लेंगे कि सच्चाई तो केवल अल्लाह के पास है; और उनके द्वारा गढ़े हुए ख़ुदा उन्हें छोड़ देंगे। (75)
क़ारून [Korah] मूसा की क़ौम में से था, मगर वह उनपर बड़े ज़ुल्म करता था। हमने उसे इतने ख़ज़ाने दे रखे थे कि उनकी कुंजियों को रखना मज़बूत लोगों के दल के लिए भी बड़ा भारी काम था। (याद करो जब) उसकी क़ौम के लोगों ने उससे कहा, "इतराओ मत! क्योंकि सचमुच अल्लाह इतरानेवालों को पसन्द नहीं करता। (76) और जो कुछ अल्लाह ने तुझे दे रखा है, उसकी मदद से आने वाली दुनिया [आख़िरत] में भी अपने लिए अच्छा ठिकाना माँगो, और इस दुनिया में भी तुम्हारी क़िस्मत से जो हिस्सा मिला है, उसे भी नज़रअंदाज़ न करो। दूसरों के साथ भलाई करो, जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ भलाई की है। और धरती पर गड़बड़ी पैदा करने की कोशिश मत करो, निश्चय ही अल्लाह गड़बड़ी [corruption] पैदा करने वालों को पसन्द नहीं करता", (77) लेकिन उसने जवाब दिया, "मुझे तो यह दौलत मेरे अपने ज्ञान के कारण मिली है।" क्या वह नहीं जानता था कि अल्लाह ने उससे पहले कितनी ही नस्लों को तबाह कर दिया, जो ताक़त में उससे बढ़-चढ़कर थीं और धन-दौलत भी उन्होंने ज़्यादा जमा कर रखा था? अपराधियों से तो उनके गुनाहों के विषय में पूछा भी नहीं जाएगा (बल्कि उन्हें बताया जाएगा)। (78) फिर (एक दिन) वह अपनी क़ौम के सामने पूरी आन-बान से निकला, और जिन लोगों का मक़सद इसी सांसारिक जीवन को पाना था, उन्होंने कहा, "काश हमें भी कुछ ऐसी चीज़ें दी गयी होतीं, जैसी कि क़ारून को मिली हैं: सचमुच वह बड़ा ही भाग्यशाली आदमी है।" (79) मगर जिनको ज्ञान दिया गया था, उन्होंने कहा, "अफ़सोस तुम पर! अल्लाह का इनाम उन लोगों के लिए कहीं अच्छा है जो विश्वास [ईमान] रखते हैं और अच्छा कर्म करते हैं: मगर यह केवल उन्हीं को हासिल होगा जो धीरज व सब्र से जमे रहते हैं।" (80) अन्ततः हमने उसको और उसके घर को धरती में धँसा दिया: उसके पास कोई न था जो अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी सहायता करता, और न ही ख़ुद वह अपना बचाव कर सका। (81) अगले दिन, वही लोग, जिन्होंने एक दिन पहले यह कामना की थी कि काश वे उसकी जगह होते, कहने लगे, "अफ़सोस [तुम पर, क़ारून!], यह तो अल्लाह ही है कि जो चाहता है देता है, किसी को ज़्यादा तो किसी को कम, और अपने बंदों में जिसे चाहता है, उसे देता है: अगर अल्लाह ने हम पर उपकार न किया होता तो हमें भी धरती में धँसा देता। अफ़सोस उस पर! सच्चाई को मानने से इंकार करने वाले कभी कामयाब नहीं होंगे।" (82)
यह वो आख़िरत [परलोक, Hereafter] का घर है जिसे हम उन लोगों को देना मंज़ूर करेंगे, जो ज़मीन पर अपनी बड़ाई नहीं चाहते, और न ही गड़बड़ी [corruption] फैलाते हैं: अच्छा अंत तो उन्हें ही मिलेगा, जो अपने दिल में अल्लाह का डर रखता हो और बुराइयों से बचता हो। (83) जो कोई भी अल्लाह के सामने अच्छे कर्म लेकर आया, तो उसे बदले में उससे कहीं अच्छा इनाम मिलेगा; और जो कोई बुरे कर्मों को लेकर आएगा, तो उस कुकर्मी को वैसी ही सज़ा दी जाएगी जैसा कि उसने कर्म किया होगा। (84) जिसने इस क़ुरआन की ज़िम्मेदारी [ऐ रसूल] आप पर डाली है, वह आपको वापस (आपके) असली घर तक ज़रूर पहुँचा देगा। अत: कह दें, "मेरा रब उसे अच्छी तरह से जानता है कि कौन मार्गदर्शन लेकर आया, और कौन है जो खुली गुमराही में पड़ा है।" (85) आपको ख़ुद ही यह उम्मीद नहीं थी कि आप पर किताब उतारी जाएगी; ऐसा तो केवल आपके रब की रहमत [दयालुता, mercy] के कारण हआ। अतः आप (सच्चाई से) इंकार करने वालों के मददगार न बनें। (86) अब जबकि आप पर (अल्लाह की) आयतें [revelations] उतारी जा चुकी हैं, तो देखना ऐसा न हो कि वे आपको अल्लाह की आयतों से मुँह मोड़ने पर मजबूर करें। आप लोगों को अपने रब की ओर बुलाएं। और कभी भी उनमें से न हो जाएं जो हमारी ख़ुदायी में साझेदार [Partner] बना लेते हैं। (87) अल्लाह के साथ किसी दूसरे देवता को न पुकारो, क्योंकि उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं। हर चीज़ एक दिन ख़त्म हो जाएगी सिवाय उस (अल्लाह) के स्वरूप के। आख़िरी फ़ैसला उसी के हाथ में है, और उसी के पास तुम सबको वापस ले जाया जाएगा। (88)
नोट:
4: फ़िरऔन के एक भविष्यवक्ता ने उसे बताया था कि इसराईल की संतानों में से एक आदमी तुम्हारी सल्तनत समाप्त करेगा, इसीलिए उसने हुक्म दिया था कि उनके यहाँ जो भी बेटा पैदा हो, उसे मार दिया जाए।
6: ऐसा माना जाता है कि फिरऔन के दरबार में भवन बनाने का मुख्य अधिकारी हामान था। फिरऔन को अपने पुराने ख़्वाब के पूरे हो जाने का डर लगा रहता था कि कोई इसराइलियों का बच्चा उसकी हुकूमत को ख़त्म कर देगा।
7: दरिया यानी नील नदी।
12: फ़िरऔन की बीवी का नाम ‘आसिया’ बताया जाता है, जब उन्होंने तय कर लिया कि बच्चे को पालना है, तो दूध पिलाने वालियों की खोज शुरू हुई। इतने में वहाँ मूसा (अल.) की बहन पहुँच गईं।
17: फ़िरऔन की हुकूमत में मिस्र के लोग इसराइलियों पर ख़ूब अत्याचार किया करते थे, इस घटना के बाद मूसा (अलै.) ने फ़ैसला किया कि अब वे फिरऔन और उनके कारिंदों से अलग-थलग हो जाएंगे और उनकी कोई मदद नहीं करेंगे।
19: मूसा (अलै) ने शायद अपना हाथ उस मिस्री की तरफ़ उठाया था ताकि उसे एक इसराइली को मारने से रोक सकें।
22: फ़िरऔन की सल्तनत के बाहर मदयन नाम की एक बस्ती थी जहाँ की क़ौम के बीच हज़रत शोऐब (अलै.) को पैग़म्बर बनाकर भेजा गया था।
24: मूसा (अलै) को अचानक ही मिस्र छोड़ना पड़ा था, वे बड़े बुरे हाल में मदयन पहुँचे, न उनके पास खाने-पीने की चीज़ थी और न धन। फिर उन्होंने दुआ कि और अल्लाह ने उन्हें उसी दिन घर भी दिया, काम भी दिया और एक बीवी भी दे दी।
26: “मज़दूरी” यानी जानवरों को चराने और उनको पानी पिलाने का काम।
29: मूसा (अलै) और उनके परिवार के लोग मदयन से मिस्र जाने के रास्ते में जब अंधेरे में रास्ता भूल गए थे।
34: जैसा कि सूरह ताहा (20: 27) में आया है कि मूसा (अलै.) की ज़बान थोड़ी सी लड़खड़ाती थी, इसकी वजह यह बतायी जाती है कि बचपन में ग़लती से उन्होंने एक अंगारा ज़बान पर रख लिया था।
44: मक्का के बुतपरस्तों को क़ुरआन में बार-बार याद दिलाया गया है कि ये घटनाएं सदियों पहले हुई थीं जिन्हें मुहम्मद (सल्ल) ने होते हुए नहीं देखा था। मिसाल के तौर पर यूसुफ़ के साथ कैसे षडयंत्र हुआ (12:102), कौन मरियम की देखरेख करेगा (3:44), और बाढ़ में नूह के बेटे का बह जाना (11:49). क़ुरआन के उतरने से पहले अरब के लोगों को इन चीज़ों के बारे में इतना नहीं पता था। इससे पता चलता है कि यह बातें अल्लाह की तरफ से उतारी गई हैं।
48: मूसा (अलै.) को पूरी तोरात एक ही बार में दी गयी थी, कुछ लोग यह कहते थे कि क़ुरआन भी उसी तरह एक ही बार में क्यों नहीं उतरी? कुछ लोग यह भी कहते थे कि मूसा की लाठी की तरह मुहम्मद (सल्ल) को कोई पक्की निशानी क्यों नहीं दी गई? कुछ मक्का के बुतपरस्त लोग यहूदियों के जानकार लोगों के पास गए और उनसे रसूल के संदेश के बारे में पूछा, जवाब में उन लोगों ने बताया कि तौरात में मुहम्मद साहब का हवाला मिलता है। नतीजा यह हुआ कि बुतपरस्तों ने तौरात और क़ुरआन दोनों को रद्द कर दिया और इन्हें जादू क़रार दिया।
51: क़ुरआन के हिस्से ज़रूरत के हिसाब से थोड़ा-थोड़ा करके उतरते थे।
52: यानी यहूदी और ईसाई जिनको आसमानी किताबें दी गयी थीं, उनमें से कुछ लोग क़ुरआन पर विश्वास कर लेते थे।
57: मक्का के बहुदेववादियों को लगता था कि काबा में जो इतने बुत हैं उन्हीं की वजह से पूरे अरब में उनकी इज़्ज़त है, और अगर उन लोगों ने इस्लाम अपना लिया तो उनकी इज़्ज़त, व्यापार आदि सब ख़त्म हो जाएगा और उन्हें वहाँ से निकाल बाहर किया जाएगा।
68: यहाँ रसूल या पैग़म्बर चुनने की बात हो रही है, मक्का के लोग यह भी कहते थे कि अल्लाह ने अगर चुना भी तो मुहम्मद को ही क्यों चुना, मक्का या तायफ़ के बड़े सरदारों को क्यों नहीं!
80: क़ुरआन में “सब्र” का मतलब यह है कि इंसान को चाहिए कि अपने मन की बुरी इच्छाओं को नियंत्रण में रखते हुए अपने आपको अल्लाह की आज्ञाओं को मानने वाला और उसपर जमे रहना वाला बनाना चाहिए।
85: कुछ विद्वानों ने "लौटने की जगह" का मतलब जन्नत से लिया है जहाँ आपको अंत में पहुँचा दिया जाएगा। कुछ विद्वानों ने असली घर या “लौटने की जगह” से मतलब मक्का बताया है, और कहा है कि यह आयत उस समय उतरी जब मुहम्मद (सल्ल) मक्का से (हिजरत करके) मदीना जा रहे थे।
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