सूरह 23: अल-मो’मिनून
[ईमानवाले, The Believers]
यह एक मक्की सूरह है, जो इस बात पर ज़ोर देती है कि ईमानवाले ही अंत में जीतेंगे
(आयत 1), जबकि विश्वास न करनेवालों को घमंड करने और सच्चाई का मज़ाक़ उड़ाने के लिए दंड मिलेगा (आयत 117). अल्लाह के एक होने और किसी चीज़ को पैदा करने की उसकी बेपनाह ताक़त के कई सारे प्रमाण दिए गए हैं, और इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि क़यामत में कर्मों का हिसाब देने के लिए दोबारा उठाया जाना निश्चित है।
01-11: ईमानवालों की विशेषताएं
12-16: अल्लाह की क़ुदरत: ज़िंदगी की निशानियाँ
17-22: अल्लाह की क़ुदरत: प्रकृति की निशानियाँ
23-30: नूह (अलै) की कहानी
31-41: एक रसूल जिनका नाम नहीं लिया गया
42-44: एक के बाद एक कई रसूल भेजे गए
45-48: मूसा और हारून (अलै)
49-56: ईसा और मरियम (अलै)
57-61: ईमानवाले भलाई के काम में तेज़ी दिखाते हैं
62-77: विश्वास न करने वालों के साथ अल्लाह निपटेगा
78-83: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
84-92: अल्लाह एक है
93-98: अल्लाह के रसूल की दुआ
99-100: मरते समय की तौबा
101-115: अंतिम दिन, दोबारा ज़िंदा उठाया जाना, और फ़ैसला
116-118: अल्लाह ही अकेला बादशाह है
2: नमाज़ पढ़ते समय पूरा ध्यान उसी की तरफ़ होना चाहिए।
4: 'ज़कात' का शाब्दिक अर्थ है किसी चीज़ को पाक-साफ़ करना। अपने माल में से कुछ हिस्सा ग़रीबों के लिए निकालने से उनका बाक़ी माल पाक-साफ हो जाता है। इसका एक मतलब अपने आपको बुरे कर्मों और बुरे आचरण से पाक-साफ़ करना भी होता है।
6: उस ज़माने में सारी दुनिया की तरह अरब में भी ग़ुलामी की प्रथा थी, मगर शारीरिक संबंध ऐसी ही लौंडियाँ के साथ जायज़ था जो ग़ुलामी की हालत में पड़ी हुई हों और जिनसे निकाह कर लिया गया हो।
12: एक गीली मिट्टी जो काफ़ी समय तक सड़ी-गली हालत में रही, उसी के सत से पहली बार ज़िंदगी की नींव पड़ी और आदम (अलै.) के रूप में पहला इंसान बना।
14: आख़िर में भ्रूण [embryo] में जब रूह फूँक दी जाती है, तो वह इंसान की शक्ल में आ जाता है।
20: ज़ैतून के दाने में बहुत चिकनाई होती है और इसका तेल शरीर के लिए बहुत फ़ायदामंद होता है।
25: प्रतीक्षा करने को इसलिए कहा गया है ताकि हो सकता है कि कुछ समय के बाद उनका पागलपन दूर हो जाए या मौत हो जाए।
27: इस घटना का वर्णन सूरह हूद (11: 25-48) में कुछ विस्तार से है। ........ हज़रत नूह (अलै.) का बेटा ईमान नहीं लाया था, जिसका ज़िक्र सूरह हूद में है।
32: शायद यहाँ रसूल का मतलब हज़रत सालेह (अलै.) हैं, जिन्हें समूद की क़ौम की तरफ़ भेजा गया था, देखें सूरह अ'राफ़ (7:65-73)
45: नौ निशानियाँ दी गयी थीं: लाठी, हाथ का चमकना (20: 17-22), अकाल, पैदावार की कमी, बाढ़, टिड्डी दल, जुएं, मेढ़क और ख़ून (7: 130-133)
50: जहाँ मरयम ने बच्चे को जन्म दिया; देखें सूरह मरयम (19: 22-26).
कुछ विद्वान कहते हैं कि यहाँ जिस इलाक़े का ज़िक्र है वह शायद मिस्र में नील नदी का ऊपरी इलाक़ा था जो पानी से भरपूर था। ईसा (अलै) के पैदा होने के बाद उनके घरवाले फ़िलिस्तीन से यहाँ आकर बस गए थे।
55: कुछ लोगों को यह ग़लतफ़हमी थी कि जिनको काफ़ी दौलत और संतान मिली हुई है, इसका मतलब यह है कि अल्लाह उनसे बहुत ख़ुश है।
69: मुहम्मद साहब रसूल बनने से पहले उन्हीं लोगों के बीच 40 साल रहे थे, तो वहाँ के लोग तो उन्हें अच्छी तरह से जानते थे कि वह एक सच्चे, ईमानदार और भरोसेमंद आदमी थे।
71: उनके मन की इच्छा तो यही थी कि ब्रहमांड में एक से अधिक ख़ुदा होते, देखें 21:22
75: अल्लाह ने मक्का के लोगों को झिंझोड़ने के लिए उन्हें अकाल और आर्थिक बदहाली में डाला था, यह आयत ऐसे ही मौक़े पर उतरी थी।
84: अरब के इंकार करने वाले लोग भी यह मानते थे कि सारी ज़मीन व आसमान का मालिक अल्लाह है, इसके बावजूद वह उसके साथ कई ख़ुदाओं को भी मानते थे।
101: फ़ैसले के दिन एक फ़रिश्ता नरसिंघा बजाएगा और सब लोग मर जाएंगे। फिर जब दूसरी बार नरसिंघा बजाया जाएगा, तो सारे मुर्दे हिसाब के लिए उठ खड़े होंगे (39:68).
113: परलोक [आख़िरत] की यातना इतनी भयानक होगी कि जहन्नम में रहने वालों को दुनिया की सारी ज़िंदगी में बितायी गयी अवधि एक दिन या उससे भी कम लगेगी।
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