Sunday, April 3, 2022

Surah/सूरह 33: Al-Ahzab/अल-अहज़ाब [(मक्का और दूसरे क़बीलों की) मिली-जुली सेना / The Joint Forces]

 सूरह 33: अल-अहज़ाब

[(मक्का और दूसरे क़बीलों की) मिली-जुली सेना / The Joint Forces]

यह एक मदनी सूरह है, सन 627 ई./ 5 हिजरी में एक लड़ाई हुई थी जिसे "खायीवाली लड़ाई" कहते हैं, जब विश्वास न करनेवालों के बहुत से क़बीलों की "गठबंधन सेना" ने मदीना की घेराबंदी की थी (आयत 9-27), इसी हवाले से इस सूरह का नाम पड़ा है। ईमानवालों ने शहर के चारों ओर एक खायी खोदी थी जिसे दुश्मन सेना पार करके मदीना में नहीं घुस पाई और फिर लम्बे समय तक शहर के बाहर घेरा डाले रहने के बावजूद उन्हें अंत में बुरी अवस्था में वापस जाना पड़ा। इस घटना का ज़िक्र करके अल्लाह ने ईमानवालों को याद दिलाया है कि अल्लाह उन पर कितना मेहरबान है, ताकि वे उसका शुक्र अदा करें और उसके द्वारा दिए गए आदेशों का पालन करें, उन नियमों में बच्चा गोद लेना, तलाक़, पर्दा, और रसूल और उनकी बीवियों से आचरण का उचित तरीक़ा भी बताया गया है। मदीना के पाखंडियों को फिर से चेतावनी दी गई है कि वे अपना गंदा आचरण सुधारें।



विषय:
01-03: रसूल को अल्लाह पर ही भरोसा रखना चाहिए

04-06: ख़ूनी रिश्तेदारों का हक़ मुँह-बोले रिश्ते से ज़्यादा होता है

07-08: नबियों से लिया गया वचन 

09-27: यसरिब [मदीना] की घेराबंदी

28-34: रसूल की बीवियाँ 

35:      ईमानवालों के लिए इनाम होगा

36:      अल्लाह और रसूल की आज्ञा मानो 

37-39: रसूल की शादी

40:      मुहम्मद (सल्ल) नबियों के सिलसिले में से आख़िरी नबी हैं 

41-48: ईमानवालों और रसूल का उत्साह बढ़ाना 

49:      शादी के बाद हाथ लगाने से पहले ही तलाक़ 

50-52: शादी के लिए अल्लाह के रसूल का ख़ास अधिकार 

53-54: रसूल और उनकी बीवियों को मान-सम्मान देना 

55:       रसूल की बीवियों को अपने नज़दीकी रिश्तेदारों से पर्दा न करने की छूट

56-58: रसूल पर रहमत भेजना चाहिए 

59:      औरतों के लिए सावधानियाँ ताकि वे  छेड़-छाड़ से बच सकें 

60-62:  पाखंडियों के लिए सज़ा 

63-68: विश्वास न करने वालों की सज़ा 

69-71: विश्वास रखनेवालों को रसूल की बे-इज़्ज़ती नहीं करनी चाहिए

72-73: इंसानों ने समझ-बूझ और नैतिक मूल्यों की ज़िम्मेदारी उठाने की बात मानली        

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

ऐ नबी! अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहें, और विश्वास न करने वालों और पाखंडियों [मुनाफ़िक़/Hypocrites] का कहना न मान लें: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बेहद समझ-बूझवाला है। (1)
आपके रब ने आप पर जो कुछ उतारा है, (उसे सही मानते हुए) उसके पीछे चलें: जो कुछ भी आप करते हैं, अल्लाह उन्हें अच्छी तरह से जानता है। (2)
अल्लाह पर भरोसा रखें: काम बनाने के लिए अल्लाह ही काफ़ी है।  (3)
अल्लाह ने किसी आदमी के सीने में दो दिल पैदा नहीं किए। तुम जो [ज़िहार करते हुए] अपनी बीवियों को यह कहकर ठुकरा देते हो कि अब तुम्हारी पीठ मेरी माँ जैसी हो गयी, तो अल्लाह उन (बीवियों) को तुम्हारी असली माँ तो नहीं बना देता; और न उसने तुम्हारे मुँह बोले बेटों को तुम्हारा असली बेटा बनाया है। ये तो तुम्हारे मुँह की (कहीं हुई) बातें है, जबकि अल्लाह सच्ची बात कहता है और लोगों को सही मार्ग दिखाता है। (4)

अपने (गोद लिए या) मुँह बोले बेटों को उनके असली बापों के नाम से पुकारा करो: अल्लाह के नज़दीक यह अधिक न्यायसंगत बात है------ अगर तुम नहीं जानते कि उनके असल बाप कौन हैं, तो फिर वे (एक ही धर्म के होने के कारण) तुम्हारे 'दीनी भाई' हैं, और तुम्हारे साथी हैं। तुम से अगर कोई भूल-चूक हो जाए तो इसके लिए तुम्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा, (गुनाह तभी होगा) जब तुम दिल से जान बूझकर कुछ (ग़लत काम) करते हो; अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, बेहद दयावान है। (5)
यह जो नबी हैं, वह ईमानवालों के ज़्यादा नज़दीक (और उनका ख़्याल रखने वाले) हैं, इतनी नज़दीकी तो उनकी आपस में भी नहीं है, और नबी की बीवियाँ सभी ईमानवालों की माँएं [mothers] हैं। अल्लाह की किताब के अनुसार, (संपत्ति के बँटवारे में) ख़ूनी रिश्तेदारों का हक़, दूसरे ईमानवालों और बाहर से आकर बसे (मुहाजिरों) से कहीं ज़्यादा है, हालाँकि तुम तब भी अगर चाहो, तो अपने साथियों को कुछ तोहफ़े (वसीयत करके) दे सकते हो। यह सारी बातें किताब में लिखी हुई हैं। (6)

और [ऐ रसूल!], याद करें जब हमने नबियों से वचन लिया था------ आप से, नूह से, इबराहीम से, मूसा से, मरयम के बेटे ईसा से------ हमने सभी से पक्का वचन लिया था: (7)
अल्लाह सच्चे लोगों से (भी) उनकी सच्चाई व ईमानदारी के बारे में पूछताछ करेगा, और सच्चाई से इंकार करने वालों के लिए उसने दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है। (8)

ऐ ईमानवालो! याद करो अल्लाह ने तुम पर उस वक़्त कैसा करम किया था, जब तुम्हारे ख़िलाफ़ बहुत बड़ी व मज़बूत सेना चढ़ आयी थी: हमने उनके ख़िलाफ़ भयानक आँधी भेजी और साथ में ऐसे लश्कर भेजे जो दिखायी नहीं देते थे। जो भी तुम करते हो, अल्लाह सब कुछ देखता है। (9)
('अहज़ाब की जंग' का समय याद करो) जब वे (इकट्ठा होकर) तुम्हारे ख़िलाफ़ ऊपर से भी और तुम्हारे नीचे से भी (यानी चारो ओर से) चढ़ आए थे; जब आँखें (डर से) पत्थरा गयी थीं, और कलेजे मुँह को आ लगे थे, और तुम अल्लाह के बारे में तरह-तरह की (ग़लत) बातें सोचने लगे थे।  (10)
उस समय ईमानवालों को बड़ी कड़ी परीक्षा में डाला गया था और वे अंदर तक हिला दिए गए थे: (11)
पाखंडियों [Hypocrites] ने और उन लोगों ने जिनके दिलों में रोग था, कहने लगे, "अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे जो वादा किया था, वह धोखे के सिवा कुछ न था!" (12)
उनमें से कुछ लोगों ने कहा, "ऐ यसरिब [मदीना] के लोगो!, तुम इस (हमले) के सामने टिक नहीं पाओगे, अतः लौट जाओ!" और उन्हीं में से कुछ लोग नबी से यह कहकर (मैदान छोड़कर जाने की) अनुमति माँगने लगे कि "हमारे घर असुरक्षित हैं।" हालाँकि वे असुरक्षित न थे----- वे तो बस चाहते थे कि वहाँ से भाग खड़े हों।  (13)
अगर उस शहर पर चारों तरफ़ से हमला हुआ होता, और दुश्मनों ने उन (पाखंडियों) से विद्रोह कर देने का न्यौता दिया होता, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसा ज़रूर कर डालते! (14)
हालाँकि वे इससे पहले ही अल्लाह को वचन दे चुके थे कि वे (जंग की हालत में) पीठ फेरकर नहीं भागेंगे, और (याद रहे) अल्लाह से किए गए वादे के बारे में तो उन्हें जवाब देना होगा। (15)
[ऐ रसूल!] आप कह दें, "भागने से तुम्हें कोई फ़ायदा नहीं होगा। अगर तुम मौत से या क़त्ल हो जाने से बच भी जाओ, तो भी तुम्हें थोड़ी ही देर के लिए (ज़िंदगी के) मज़े उठाने का मौक़ा दिया जाएगा।" (16)
कह दें, "अगर अल्लाह तुम्हें नुक़सान पहुँचाना चाहे, तो कौन है जो तुम्हें बचा सकता है? और अगर अल्लाह तुम पर अपनी दयालुता [रहमत] दिखाना चाहे, तो उसे कौन रोक सकता है?" उन्हें कोई ऐसा नहीं मिलेगा सिवाय अल्लाह के, जो उन्हें बचा सके, या उनकी मदद कर सके।  (17)

अल्लाह अच्छी तरह जानता है कि तुममें से कौन है जो दूसरों को (युद्ध में जाने से) रोकता है, जो अपने भाइयों से (अकेले में) कहता है, "आओ, हमारे साथ शामिल हो जाओ", जो शायद ही कभी युद्ध में लड़ने के लिए आता है,  (18)
जो तुम्हारी [ईमानवालों की] शायद ही कभी कोई मदद करता है। जब (युद्ध में) कोई ख़तरा दिखायी पड़ता है, तो [ऐ रसूल] आप देखेंगे कि वे (मारे डर के) आपकी तरफ़ चकरायी हुई आँखों से ताक रहे हैं मानो उनपर मौत की बेहोशी छा रही हो; फिर जब ख़तरे की घड़ी गुज़र जाती है, तो वे (माल की लालच में) आप पर अपनी तेज़ धार ज़बान से हमले करने लगते हैं और शायद ही कभी कोई भलाई करते हों। ऐसे लोग ईमान नहीं रखते, और अल्लाह ने उनके सब किए-धरे कर्म बर्बाद कर दिए हैं ------  और यह अल्लाह के लिए बहुत ही आसान है। (19)
वे समझते हैं कि (शत्रुओं की) मिली-जुली सेना अभी तक गयी नहीं है, और अगर वह संयुक्त सेना [Joint force] सचमुच फिर से आ जाए, तो वे चाहेंगे कि काश वे (यहाँ से दूर) रेगिस्तान में हों, और बद्दुओं [Bedouin] के साथ यहाँ-वहाँ मारे फिरें, और (दूर से ही) तुम्हारे बारे में ख़बर लेते रहें। [ईमानवालो], अगर वे तुम्हारे साथ होते भी, तब भी उन लोगों ने लड़ाई में शायद ही हिस्सा लिया होता। (20)
निस्संदेह अल्लाह के रसूल एक बेहतरीन आदर्श [Model] हैं, हर उस आदमी के लिए, जो अल्लाह और अन्तिम दिन [क़यामत] पर अपनी उम्मीद रखता हो, और अल्लाह को बराबर याद करता हो।  (21)

(दूसरी तरफ़) जब ईमान रखने वालों ने (दुश्मनों की) मिली-जुली सेना को देखा, तो वे कहने लगे, "यह तो वही चीज़ है, जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वादा किया था: अल्लाह और उसके रसूल का वादा सच्चा होता है," इस घटना ने उनके ईमान और उनकी भक्ति को और बढ़ा दिया। (22)
ईमान रखने वालों में ऐसे लोग मौजूद हैं जिन्होंने अल्लाह से की गयी प्रतिज्ञा को पूरी तरह से निभाया: उनमें से कुछ ने अपनी प्रतिज्ञा अपनी जान देकर पूरी कर दी, और कुछ लोग अभी भी इंतज़ार में हैं। उनके (इरादों में) ज़रा भी बदलाव नहीं आया। (23)
(वे ऐसी परीक्षाओं में इसलिए डाले गए) ताकि अल्लाह सच्चे व अच्छे लोगों को उनकी सच्चाई का इनाम दे सके और अगर अल्लाह चाहे, तो पाखंडियों को सज़ा दे सके, या उनकी तौबा क़बूल कर ले, कि अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला, बेहद दयावान है। (24)
अल्लाह ने (तेज़ आँधी के द्वारा) विश्वास करने से इंकार करने वालों को उनके सारे ग़ुस्से के साथ वापस भेज दिया----- उन्हें कोई फ़ायदा हासिल न हुआ----और ईमानवालों को युद्ध करने से बचा लिया। अल्लाह बहुत मज़बूत, प्रभुत्वशाली है। (25)
किताबवालों [बनू क़ुरैज़ा नामक यहूदी क़बीले] में से जिन लोगों ने उन (दुश्मनों) की मदद की थी, अल्लाह ने उन्हें अपने मज़बूत क़िलों (की लम्बी घेराबंदी के बाद वहाँ) से नीचे आने पर मजबूर कर दिया और उनके दिलों में घबराहट डाल दी। उनमें से कुछ को तुमने क़त्ल कर दिया और कुछ को बन्दी बना लिया। (26)
अल्लाह ने तुम्हें उनकी ज़मीनें दे दीं, उनके घर दे दिए, उनके माल-असबाब दे दिए, और वह (ख़ैबर का) इलाक़ा भी दे दिया जहाँ अभी तक तुमने अपना क़दम नहीं रखा था: अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है।  (27)

ऐ नबी! आप अपनी बीवियों से कह दें, "अगर इस दुनिया की ज़िन्दगी और उसकी सजधज ही तुम्हारी आरज़ू है, तो आओ, मैं तुम्हें कुछ दे-दिलाकर भले तरीक़े से विदा कर दूँ, (28)
"लेकिन अगर तुम अल्लाह, उसके रसूल और आख़िरत के घर को पाना चाहती हो, तो याद रखो, कि अल्लाह ने तुममें से अच्छा कर्म करने वालों के लिए बड़ा इनाम तैयार कर रखा है।" (29)
ऐ नबी की बीवियो! तुममें से कोई भी अगर खुले तौर पर कोई अनुचित कर्म [indecency] कर बैठे, तो (याद रखो) उसे दोहरी सज़ा होगी---- और यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है--- (30)
लेकिन तुममें से कोई भी अगर अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा माननेवाली हुई, और उसने अच्छे कर्म किए, तो यह जान लो कि हम उसे दोहरा इनाम देंगे, और उसके लिए हमने दिल खोलकर रोज़ी तैयार कर रखी है।  (31)

ऐ नबी की बीवियो! तुम किसी भी दूसरी सामान्य औरत की तरह नहीं हो। अगर तुम अल्लाह का डर रखते हुए सचमुच बुराइयों से बचना चाहती हो, तो इतनी नर्मी और प्यार से बातें न किया करो, कहीं ऐसा न हो कि कोई दिल से बीमार आदमी तुम्हें पाने की लालच में पड़ जाए, सो लोगों से उचित तरीक़े से बात किया करो; (32)
अपने घरों के अंदर रहो, और अपनी सजधज (दूसरों के सामने) दिखाती न फिरो जैसा कि (अरब में) जाहिलियत के ज़माने में औरतें किया करती थीं; नमाज़ पाबंदी से पढ़ा करो, उचित मात्रा में ज़कात दो, और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो। अल्लाह तो चाहता है कि ऐ नबी के घरवालो, तुमसे (हर तरह की) गंदगी को दूर रखें, और तुम्हें पूरी तरह शुद्ध व साफ़ रखें। (33)
तुम्हारे घरों में अल्लाह की जो आयतें और समझ-बूझ की बातें पढ़कर सुनाई जाती हैं, उन्हें याद करती रहो, कि अल्लाह छोटी से छोटी चीज़ देखने वाला, हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है। (34)

वैसे मर्द और औरतें जो अल्लाह की भक्ति में डूबे हुए हैं-------ईमान रखने वाले मर्द और ईमानवाली औरतें, आज्ञा मानने वाले मर्द और आज्ञाकारी औरतें, सच्चे मर्द और सच्ची औरतें, धीरज रखने वाले मर्द और सब्र करने वाली औरतें, दिल से झुके हुए विनम्र मर्द और विनम्र औरतें, दान करने वाले मर्द और दान करने वाली औरतें, उपवास (रोज़ा) रखने वाले मर्द और रोज़ा रखने वाली औरतें, (अवैद्ध लोगों के साथ संबंध बनाने से) संयम रखने वाले मर्द और संयमी औरतें, वैसे मर्द और औरतें जो अल्लाह को अक्सर याद करते हैं-------- इन सब के लिए अल्लाह ने माफ़ी और बहुत शानदार इनाम तैयार कर रखा है। (35)

जब अल्लाह और उसके रसूल ने उन लोगों से जुड़े किसी मामले में फ़ैसला कर दिया हो, तो ईमान रखने वाले किसी मर्द या औरत के लिए यह उचित नहीं होगा कि उस मामले में वे अपनी मनमानी करने का दावा करें: जिस किसी ने अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा नहीं मानी, तो वह बड़ी गुमराही में पड़ गया। (36)
[ऐ रसूल! याद करें] उस (ज़ैद नाम के) आदमी को, जिस पर अल्लाह ने और आपने भी ख़ास मेहरबानी की थी, जिससे आपने कहा था, "अपनी बीवी को (छोड़ न दो, बल्कि) अपनी बनाए रखो और अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचो," आपने अपने दिल में वह बात छिपायी, जिसे अल्लाह बाद में उजागर करने वाला था: आप लोगों से डरे हुए थे (कि वे बातें बनाएंगे), मगर ज़्यादा उचित यह है कि आप अल्लाह से डरें। जब (आपके गोद लिए बेटे) ज़ैद ने अपनी बीवी से रिश्ता तोड़ लिया, तो हमने उसकी बीवी की शादी आपसे कर दी, ताकि ईमानवालों को अपने मुँह बोले बेटों की बीवियों से शादी करने में दोषी न समझा जाए, जबकि वे (मुँह बोले बेटे) अपनी बीवियों को छोड़ चुके हों। अल्लाह का आदेश पूरा करना ही था: (37)
अल्लाह ने अपने नबी के लिए जो बात तय कर दी है, उस काम में नबी का कोई दोष नहीं है। यही अल्लाह का दस्तूर था जो उन (नबियों) के मामले में भी रहा है जो पहले गुज़र चुके हैं ---- अल्लाह के आदेश का पालन करना ज़रूरी है------ (38)
(और ऐसा ही मामला सभी रसूलों के साथ भी रहा है) जो अल्लाह का सन्देश लोगों तक पहुँचाते हैं, और केवल अल्लाह से डरते हैं और उसके सिवा किसी से नहीं डरते: हिसाब लेने के लिए अल्लाह ही काफ़ी है। (39)
मुहम्मद तो तुम मर्दों में से किसी के बाप नहीं हैं; वह अल्लाह के रसूल हैं और नबियों के सिलसिले के सबसे आख़िरी नबी [Prophet] हैं: अल्लाह हर चीज़ जानता है। (40)
ईमान रखने वालो! अल्लाह को अक्सर याद किया करो  (41)
और उसकी बड़ाई का बखान सुबह और शाम किया करो:  (42)
वही है जो तुम पर ख़ुद भी रहमत भेजता रहता है, और उसके फ़रिश्ते भी (दुआएँ करते हैं), ताकि वह तुम्हें गहरे अँधरों से निकालकर रौशनी में ले आए। वह ईमानवालों पर हमेशा ही बहुत मेहरबान है---- (43)
जिस दिन वे अल्लाह से मिलेंगे, उनका स्वागत "सलाम" से होगा---- और अल्लाह ने उनके लिए बड़ा इनाम तैयार कर रखा है। (44)

ऐ नबी! हमने आपको गवाह बनाकर भेजा है, साथ में, (ईमान व अच्छे कर्म की) ख़ुशख़बरी देने वाला और (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान करने वाला,  (45)
और अल्लाह के हुक्म से लोगों को उसकी ओर बुलाने वाला, और एक रौशनी फैलाने वाले चिराग़ की तरह बनाकर भेजा है।  (46)
आप ईमानवालों को इस बात की ख़ुशख़बरी दे दें कि उनपर अल्लाह की तरफ़ से एक बहुत बड़ा फ़ज़ल [bounty] होने वाला है। (47)
विश्वास न करने वालों और पाखंडियों की बातें (तंग आकर) मान न लें: जो तकलीफ़ वे आपको पहुँचाते हैं, उनपर ध्यान न दें और अल्लाह पर भरोसा रखें। भरोसा करने के लिए अल्लाह काफ़ी है। (48)

ऐ ईमानवालो! जब तुम ईमान रखने वाली औरतों से शादी के बाद उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो, तो तुम्हें कोई हक़ नहीं है कि उनके लिए इद्दत की अवधि [waiting period] गुज़ारने का इंतज़ार करो: उन्हें तोहफ़े में कुछ सामान दे दो और इज़्ज़त से विदा कर दो। (49)
ऐ नबी! हमने आपके लिए ऐसी बीवियाँ वैध कर दी हैं----- जिनकी मेहर [marriage gifts] आपने अदा कर दी हो, और अल्लाह ने (युद्ध के बाद) जो दासियाँ आपके हाथ लगा दी हों, और आपके चाचा की बेटियाँ और आपकी फूफियों की बेटियाँ और आपके मामुओं की बेटियाँ और आपकी ख़ालाओं की बेटियाँ जिन्होंने आपके साथ (मदीना में) हिजरत की है, और (इसके अलावा) वह ईमानवाली औरत जिसने ख़ुद नबी से (बिना मेहर के) शादी करने का प्रस्ताव दिया हो, और अगर नबी उससे शादी करना चाहें------- ये सब (हुक्म) केवल आपके लिए है, बाक़ी ईमानवालों के लिए नहीं है: हम ठीक-ठीक जानते हैं, कि हमने उन (ईमानवालों) की बीवियों और दासियों के मामले में उनके लिए क्या क्या ज़रूरी ठहरा दिया है ---- अत: आपको दोष नहीं देना चाहिए: अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, बेहद दयावान है।  (50)
उन (बीवियों) में से जिसे चाहें, (पारी के हिसाब से) अपने से अलग रखें, और जिसे चाहें, अपने पास बुलाएं, मगर जिनको आपने (पारी के हिसाब से) अलग रखा हुआ था, उनमें से अगर किसी को (पहले) बुलाना चाहते हों, तो इसमें भी आप पर कोई गुनाह नहीं है: इस तरीक़े से इस बात की अधिक सम्भावना है कि वे [बीवियाँ] संतुष्ट रहेंगी और दुखी नहीं होंगी, और जो कुछ आप उन्हें देंगे, उस पर वे राज़ी-ख़ुशी से रहेंगी। अल्लाह जानता है जो कुछ तुम्हारे दिलों में है: अल्लाह हर चीज़ का जाननेवाला, बहुत सहनशील है। (51)
इसके बाद (ऐ रसूल), आपको अब और किसी दूसरी औरत (से शादी) की इजाज़त नहीं, और न अपनी बीवियों के बदले किसी और से शादी की इजाज़त है, भले ही उनकी ख़ूबसूरती आपको कितनी ही भा जाए। हां, मगर यह नियम आपकी दासियों पर लागू नहीं होते: अल्लाह हर चीज़ पर नज़र रखने वाला है। (52)

ऐ ईमानवालो! नबी के घरों में खाने के लिए यूँ ही न चले जाओ, जब तक कि तुम्हें ऐसा करने की इजाज़त न दी जाए; (अगर जाओ भी, तो) बहुत पहले ही से (खाना पकने तक) न बैठे रहो। जब तुम्हें (खाने पर) बुलाया जाए, तो अन्दर जाओ; और जब तुम खाना खा चुको, तो फिर उठकर चले जाओ। देर तक बैठकर बातें न करते रहो, क्योंकि इससे नबी को तकलीफ़ होती है, हालाँकि वह संकोच के कारण तुमसे चले जाने को नहीं कहते हैं। मगर अल्लाह को सच्चाई कहने में कोई संकोच नहीं है। जब तुम्हें नबी की बीवियों से कुछ माँगना हो, तो उनसे परदे के पीछे से माँगो: यह ज़्यादा पाकीज़ा तरीक़ा है, तुम्हारे दिलों के लिए भी और उनके दिलों के लिए भी। तुम्हारे लिए यह सही नहीं होगा कि तुम अल्लाह के रसूल को तकलीफ़ पहुँचाओ, और उसी तरह यह भी सही नहीं होगा कि उनके बाद कभी भी उनकी बीवियों से शादी करो: यह अल्लाह की नज़र में बड़ी गम्भीर बात है। (53)
तुम चाहे किसी चीज़ को ज़ाहिर करो या उसे छिपाओ, अल्लाह को हर चीज़ की पूरी जानकारी है।  (54)
नबी की बीवियों को परदे में न होने पर कोई दोष न होगा, अगर वे अपने बापों के सामने होती हों, या अपने बेटों, अपने भाइयों, अपने भतीजों, अपने भांजो, अपने जैसी औरतों, और अपनी दासियों के सामने होती हों। (नबी की बीवियों!), अल्लाह का डर रखो, अल्लाह हर चीज़ पर नज़र रखता है। (55)
अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत [दुरूद] भेजते रहते हैं---- तो, ऐ ईमानवालो, तुम भी उन पर रहमत भेजा करो, और उन्हें ख़ूब सलाम भेजा करो। (56)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल की बेइज़्ज़ती करते हैं, वे इस दुनिया में और आने वाली दुनिया में भी अल्लाह द्वारा ठुकरा दिए जाएंगे। अल्लाह ने उनके लिए अपमानित करने वाली यातना तैयार कर रखी है------ (57)
जो लोग ईमानवाले मर्दों और औरतों को, बिना किसी सही कारण के, अपमानित करते हैं, उन्हें झूठा इल्ज़ाम लगाने और साफ़ गुनाह करने के जुर्म की सज़ा भुगतनी होगी। (58)

ऐ नबी! आप अपनी बीवियों, अपनी बेटियों और ईमानवाली औरतों से कह दें, कि वे (घर से बाहर निकलते वक़्त) ऊपर से चादरों [Outer garments] को इस तरह ओढ़ लिया करें कि वह नीचे तक लटकती रहे, ताकि वे (शरीफ़ औरतों के रूप में) पहचान ली जाएं और कोई उनके साथ छेड़-छाड़ न करे: अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, बेहद दयावान है।  (59)
पाखंडी लोग, और ऐसे लोग जिन्होंने दिल में बीमारी पाल रखी है, और वे लोग जो मदीना शहर में झूठी अफ़वाहें फैलाते रहते हैं, अगर वे अपनी हरकतों से बाज़ न आए, तो (ऐ रसूल), हम आपको उनके ख़िलाफ़ खड़ा कर देंगे, और तब वे इस शहर में आपके पड़ोसी बनकर बहुत कम ही समय के लिए रह पाएंगे। (60)
उन्हें ठुकरा दिया जाएगा। जहाँ कहीं भी वे मिलेंगे, पकड़ लिए जाएँगे और (शांति स्थापित करने के लिए) एक-एक करके जान से मार दिए जाएँगे। (61)
जो पहले गुज़र चुके, उनके साथ भी अल्लाह की यही रीति रही है। अल्लाह की रीतियों में तुम कोई बदलाव नहीं पाओगे। (62)

[ऐ रसूल], लोग आपसे (क़यामत की) घड़ी के बारे में पूछते हैं। कह दें, "इस बात की जानकारी तो बस अल्लाह के ही पास है।" आप कैसे जान सकते हैं? शायद वह घड़ी नज़दीक ही हो। (63)
विश्वास करने से इंकार करनेवालों को अल्लाह ने ठुकरा दिया है और उनके लिए भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है।  (64)
उसी में वे हमेशा रहेंगे। न कोई वहाँ होगा जिसे वे दोस्त बना सकें, और न कोई उन्हें सहारा देने वाला होगा।  (65)
उस दिन जब (जहन्नम की) आग में उनके चहरे उलट-पलट किए जाएँगे, तो वे कहेंगे, "काश! हमने अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानी होती!" (66)
और वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमने अपने बड़ों और सरदारों की बात मानी, और उन्होंने हमें मार्ग से भटका दिया। (67)
"ऐ हमारे रब! तू उन्हें दोहरी सज़ा दे और उन्हें पूरी तरह से ठुकरा दे !" (68)

ऐ ईमानवालो! उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने मूसा [Moses] को अपमानित किया था---- अल्लाह ने उन लोगों द्वारा लगाए गए इल्ज़ाम से उन्हें बरी कर दिया, और अल्लाह की नज़र में मूसा ऊंचे रुतबेवाले थे। (69)
ऐ ईमानवालो! अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो, सीधी व साफ़ बात कहो, जिसका मक़सद भी अच्छा हो, (70)
और अल्लाह तुम्हारे भले के लिए तुम्हारे कर्मों को सँवार देगा और तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा। जिस किसी ने अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मान ली, तो उसने सचमुच बहुत बड़ी कामयाबी हासिल कर ली।  (71)
हमने आसमानों, ज़मीन और पहाड़ों के सामने (समझ-बूझ और नैतिक ज़िम्मेदारी की) 'अमानत' [Trust] उठाने का प्रस्ताव रखा, मगर वे इस ज़िम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार न हुए, और इससे डर गए; आदमी इस (अमानत) को उठाने के लिए तैयार हो गया ------सचमुच वह हमेशा से ही अयोग्य और बेवक़ूफ़ रहा है।  (72)
अल्लाह पाखंडी [Hypocrites] और मूर्तिपूजक [Idolators] मर्दों और औरतों (दोनों) को दंड देगा, और ईमान रखने वाले मर्दों और औरतों (दोनों) पर अपनी ख़ास रहमत [Mercy] की नज़र डालेगा: अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला, बेहद दयावान है। (73)


नोट:

1: कभी-कभी विश्वास न करने वाले लोग मुहम्मद (सल्ल) को कुछ सुझाव दिया करते थे कि आप यह बात अगर मान लें तो हम आपकी बात मान लेंगे, कभी पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोग भी ऐसे सुझावों को मान लेने की हिमायत करते थे कि ऐसा करने से बहुत सारे लोग आपके साथ हो जाएंगे, मगर ऐसी चीज़ें अक्सर ईमान की मर्यादा से बाहर होती थीं, इसलिए अल्लाह ने भी आप से कहा कि आप ऐसी बातों पर ध्यान न दें। 

4: जो आदमी एक बार पूरे दिल से अल्लाह का हो रहा, वह उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ किसी दूसरे को ख़ुश करने की कोशिश कैसे कर सकता है? उसके पास दो दिल तो है नहीं! ..........इस्लाम से पहले अरब में तलाक़ का एक तरीक़ा "ज़िहार" प्रचलित था, जिसमें पति अपनी बीवी को केवल यह कह देता था कि तुम्हारी पीठ मेरी माँ जैसी हो गई, तो तलाक़ हो जाती थी। इस्लाम ने इस प्रथा को बंद किया।

मुँह बोले बच्चोंं के बारे में एक अंतर समझने की ज़रूरत है:

(i) "किफ़ालत [sponsorship]: यह जायज़ है, जिसमें बच्चे को अपने किफ़ालत में लेना, घर में रखकर अपने बच्चे की तरह पालना-पोसना शामिल है, वह बच्चा उसका आख़िरी नाम भी इस्तेमाल कर सकता है, मगर उसका क़ानूनी हक़ नहीं होगा। वह घर के दूसरे सदस्यों के साथ बड़ा होकर शादी-ब्याह भी कर सकता है, मगर ऐसे बच्चे का संपत्ति में हिस्सा नहीं होता, हाँ उसे वसीयत [bequest] में कुछ अलग से दिया जा सकता है जो कुल संपत्ति का एक तिहाई से ज़्यादा नहीं हो सकता।

(ii) गोद लेना [Adoption]: किसी यतीम को गोद लेकर अपना नाम देना, उसे अपनी संपत्ति में अपने बच्चों जैसा हक़ देना वैध नहीं है।

6: जब मक्का से मुसलमान हिजरत करके [मुहाजिर] मदीना आए, तो वे मदीना के लोगों [अंसार] के साथ भाइयों की तरह रहने लगे और वे एक-दूसरे की संपत्तियों में भी हिस्सेदार हो गए (देखें 8:75), मगर इस नियम को बदल दिया गया। संपत्ति के बंटवारे में ख़ून का संबंध रखनेवाले नज़दीकी रिश्तेदारों का हक़ ज़्यादा होता है, चाहे आपका संबंध किसी के साथ कितना ही अच्छा हो, लेकिन अगर वह आपका ख़ूनी रिश्तेदार नहीं है, तो उसे संपत्ति विरासत [inheritance] में नहीं दी जा सकती। इसी कारण मुँह बोले बेटे को भी संपत्ति में विरासत का हिस्सा नहीं दिया जा सकता। हाँ, उसे वसीयत करके कुछ संपत्ति ज़रूर दी जा सकती है जिसकी सीमा ज़्यादा से ज़्यादा एक तिहाई होगी। देखें 4: 7,11-13, 32-33, और 176

7: अल्लाह ने नबियों से पक्का वचन लिया था कि वे उसके संदेश को लोगों तक ठीक-ठीक पहुँचा देंगे और उन्हें सीधा रास्ता दिखाएंगे। यही वजह है कि नबियों की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी होती है। 

8: नबियों से यह वचन इसलिए लिया गया था ताकि लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुँच जाए, और जब हिसाब के समय लोगों से पूछताछ हो, तो वे यह न कह सकें कि हमें तो ये बातें मालूम न थीं। 

9: यहाँ से आयत 27 तक "अहज़ाब की जंग" के बारे में बताया गया है। यह जंग 5 हिजरी/ 627 ई. में हुई थी। हुआ यह था कि मदीना से निकाले गए यहूदियों के एक क़बीले "बनु नज़ीर" (जो ख़ैबर व सीरिया में बस गए थे) ने मक्का के विश्वास न करनेवालों [काफ़िरों] के साथ मिलकर एक साज़िश रची थी जिसमें तय हुआ था कि मक्का वाले अरब के कई सारे क़बीलों के साथ मिलकर मदीना पर हमला बोल दें। इस तरह, मक्का के बहुदेववादी अरब के कई क़बीलों की मिली-जुली सेना के साथ क़रीब 12 हज़ार से 15 हज़ार का लश्कर लेकर मक्का से रवाना हुए। जब मुहम्मद (सल्ल) को पता चला, तो उन्होंने सलमान फ़ारसी (रज़ि) के सुझाव पर मदीना के उत्तरी हिस्से में अपने बचाव के लिए एक साढ़े तीन मील लम्बी और पाँच गज़ गहरी खाई खुदवायी। हमला करने वाले दुश्मनों की संख्या क़रीब 4 गुना ज़्यादा थी और एक बात और पता लगी कि मदीना शहर से लगकर रहनेवाला यहूदियों का एक क़बीला बनु क़ुरैज़ा भी दुश्मनों से ख़ुफ़िया तौर से जा मिला है, जबकि उसने मुसलमानों के साथ शांति का समझौता कर रखा था। तेज़ जाड़े का मौसम था, दुश्मनों ने क़रीब एक महीने से खाई के बाहर घेरा डाल रखा था, खाने-पीने के सामान में कमी आ रही थी, हर समय पहरा दे देकर लोग थक गए थे, साथ में तीरों और पत्थरों का आदान-प्रदान होता रहता था। कड़ी परीक्षा की घड़ी इस तरह ख़त्म हुई कि अल्लाह ने दुश्मनों के लश्कर पर एक तेज़ बर्फ़ीली आँधी चला दी जिससे उनके ख़ेमे उखड़ गए, खाने की देगें उलट गईं, चूल्हे बर्बाद हो गए, और सवारी के जानवर बिदककर भागने लगे। ऐसे में उन्हें अपनी घेराबंदी छोड़नी पड़ी, साथ में अल्लाह ने फ़रिश्तों का लश्कर भी भेजा जिससे दुश्मनों में डर बैठ गया और वे वापस जाने के लिए मजबूर हो गए। 

10: दुश्मन चारों ओर से जमा होकर आए थे, जैसे क़बीला क़ुरैज़ा, नज़ीर और ग़तफ़ान पूरब की तरफ से, और मक्का के क़ुरैश और छोटे क़बीले पश्चिम की तरफ़ से। 

13: मुहम्मद (सल्ल) और उनके साथी मुहाजिरों के आने से पहले मदीना शहर का नाम "यसरिब" था।

26: मदीना के मुसलमानों के साथ शांति का समझौता होने के बावजूद, यहूदियों के एक क़बीला 'बनु क़ुरैज़ा' ने दुश्मनों के साथ मिलकर ख़ुफ़िया साँठ-गाँठ की और दुश्मनों की मदद की, और एक तरह से मुसलमानों के पीठ में छूरा घोंपा। इसीलिए अहज़ाब की लड़ाई ख़त्म होते ही मुहम्मद (सल्ल) ने बनु क़ुरैज़ा की घेराबंदी कर दी जो वहाँ से पूरब की तरफ़ कुछ मील की दूरी पर रहते थे, क़रीब 25 दिनों तक वे अपने मज़बूत क़िले में बंद रहे, अंत में वे क़िले से नीचे उतरने और हथियार डालने पर मजबूर हो गए। इस क़बीले के धोखा देने के मामले के निपटारे के लिए नबी (सल्ल) ने जब उन लोगों से पूछा तो जवाब में उन लोगों ने यह कहा कि वे अपना फ़ैसला "तौरात" के मुताबिक़ चाहते हैं, मगर तौरात में राजद्रोह की सज़ा मौत थी। फिर अंत में दोनों पक्ष फ़ैसले के लिए साद बिन मआज़ (रज़ि) के नाम पर तैयार हो गए, जो कि मदीना के औस क़बीले के सरदार थे और जिनके संबंध बनु क़ुरैज़ा के साथ काफ़ी दोस्ताना रहे थे। इब्ने इसहाक़ के अनुसार उन्होंने यह फ़ैसला दिया कि बनु क़ुरैज़ा के लड़ने वाले मर्दों को क़त्ल किया जाए, और औरतों व नाबालिग़ बच्चों को क़ैदी बनाया जाए। अत: इसी फ़ैसले पर अमल हुआ और कहा जाता है कि क़रीब 600-900 के बीच यहूदी मर्दों को मस्जिद नब्वी के सामने के बाज़ार में क़त्ल किया गया। जबकि इतनी बड़ी घटना का ज़िक्र क़ुरआन में सिर्फ़ इतना है कि "उनमें से कुछ को तुमने क़त्ल किया और कुछ को बंदी बना लिया", और ख़ासकर इस सच्चाई को देखते हुए कि बाद में असल दुश्मन मक्का के मुश्रिकों को तो पूरी तरह से माफ़ कर दिया गया और यहाँ सभी यहूदी मर्दों को मार दिया गया जबकि धोखा देने में सभी शामिल नहीं होंगे, इससे लगता है कि यह बात झूठी है। इब्ने इसहाक़ के समय के कई उलमा/ इतिहासकारों जैसे इमाम अल-औज़ाई, इमाम मालिक ने और बाद में इब्ने हजर अस्क़लानी, अल-तबरी इत्यादि ने इस घटना को झूठी व मनगढंत बताया है। इस घटना के 22 साल बाद, 649 ई में जब मस्जिद नब्वी को बड़ा करने के लिए आसपास के इलाक़े में खुदायी की गई तो वहाँ से इतनी बड़ी संख्या में आदमियों की हड्डियाँ निकलने की कोई ख़बर नहीं मिलती। इसी तरह, आख़िरी 20 वर्षों में तो मस्जिद के आसपास के इलाक़ों में काफ़ी बड़े पैमाने पर खुदायी हुई है, लेकिन कहीं कोई आदमी की हड्डी नहीं मिली। कई सारे ऐतिहासिक दस्तावेज़ों से पता चलता है कि तीन सौ साल के बाद तक बहुत सारे यहूदी इस इलाक़े में आराम से रह रहे थे और 922 ई में उन लोगों ने टैक्स में छूट दिए जाने की गुहार लगाई थी। बुख़ारी की हदीस से पता चलता है कि मुहम्मद (सल्ल) की मौत के समय भी यहूदी उनके पड़ोस में रहते थे और एक यहूदी व्यापारी के पास उनकी युद्ध में काम आने वाली कवच गिरवी रखी थी।

27: यहूदियों की बड़ी आबादी मदीना के उत्तर में स्थित ख़ैबर में आबाद थी, जो कि अंतत: 7 हिजरी/ 629 ई. में मुसलमानों के क़ब्ज़े में आ गया। इस तरह, उनकी ज़मीनें, उनके घर और उनके माल-असबाब मुसलमानों के हाथ आ गए। 

28: अहज़ाब की जंग और बनु क़ुरैज़ा की घेराबंदी के बाद मुसलमानों की आर्थिक हालत में थोड़ा सुधार हुआ था, इसी को देखते हुए मुहम्मद (सल्ल) की बीवियों ने भी इच्छा ज़ाहिर की थी कि उनके खाने-ख़र्चे और रखरखाव में भी कुछ बढ़ोत्तरी होनी चाहिए, और इस सिलसिले में उन लोगों ने बादशाहों की बेगमों की मिसालें दी थीं जो बड़ी सजधज के साथ और कनीज़ों से घिरी रहती थीं। मुहम्मद (सल्ल) इसके लिए तैयार नहीं थे और इसीलिए वह अपनी बीवियों से एक महीने के लिए अलग हो गए थे। उसके बाद इन आयतों में साफ़ कर दिया गया कि पैग़म्बर की बीवियों को अपने सोचने का अंदाज़ बदलना होगा, उन्हें रसूल की आज्ञा मानते हुए सादा ज़िंदगी गुज़ारनी होगी जिसके नतीजे में उन्हें आख़िरत में अच्छा इनाम मिलेगा, लेकिन अगर उन्हें दुनिया की सज-धज चाहिए तो उन्हें रसूल से अलग होना होगा। जब मुहम्मद (सल्ल) ने अपनी नौ (9) बीवियों के सामने यह बात रखी, तो सभी बीवियों ने तंगी बर्दाश्त करते हुए उनके साथ रहने को ही पसंद किया। 

32: रसूल की बीवियाँ आम औरतों से कहीं ऊँचा मक़ाम रखती हैं, अत: अगर वे बुराइयों से बचती रहें, तो उन्हें दोगुना पुण्य मिलेगा, लेकिन गुनाह करने पर सज़ा भी दोगुनी होगी। रसूल की बीवियों को मुसलमानों की माताएं क़रार दिया गया, और उनसे किसी और मर्द की शादी नाजायज़ कर दी गयी। 

33: रसूल की बीवियों को जो घरों के अंदर रहने के लिए कहा गया है, इसका यह मतलब नहीं है कि ज़रूरत पड़ने पर भी घर से न निकलें, बल्कि जब निकलें, तो दूसरों के सामने अपनी सजधज और बनाव-शृंगार दिखाती न फिरें।

36: इस आयत में एक सामान्य बात कही गई है, लेकिन असल बात यह बतायी जाती है कि शादी-ब्याह के मामले में मदीना के मुसलमानों के बीच अभी भी "अमीरी-ग़रीबी और बड़ा ख़ानदान-छोटा ख़ानदान" जैसी सोच पायी जाती थी। मुहम्मद (सल्ल) चाहते थे कि लोग शादी के लिए केवल इन चीज़ों के चलते इंकार न करें। अत: उन्होंने अपने कई सहाबियों [companions] के लिए अच्छे रिश्ते तय किए, मगर वे रिश्ते बराबरी के न होने के कारण उन लोगों को पसंद नहीं आए। लेकिन जब यह आयत उतरी, तो फिर उन लोगों ने इन रिश्तों को मान लिया।  

इनमें सबसे अहम घटना हज़रत ज़ैद बिन हारिसा से जुड़ी हुई है। ज़ैद मुहम्मद (सल्ल) के ग़ुलाम थे, जिन्हें आपने आज़ाद करके अपना मुँह बोला बेटा बना लिया था। मुहम्मद (सल्ल) ने ज़ैद की शादी का पैग़ाम अपनी फूफी की बेटी 'ज़ैनब बिंत जहश' के पास भेजा, लड़कीवालों और ख़ुद लड़की को भी यह रिश्ता पसंद नहीं आया, क्योंकि लड़की ऊँचे ख़ानदान से थीं और लड़का एक आज़ाद किया हुआ ग़ुलाम! बाद में उन लोगों ने मुहम्मद (सल्ल) की इच्छानुसार इस रिश्ते को मंज़ूरी दे दी। 

37: यह 'ज़ैद बिन हारिसा' के बारे में है जिसके ऊपर एहसान करते हुए मुहम्मद (सल्ल) ने उसे अपना मुँह बोला बेटा बना लिया था। उस ज़माने में अरब के रिवाज के मुताबिक़ मुँह बोले बेटे को वे सारे अधिकार दिए जाते थे जो असली बेटे का हक़ होता था। बाद में इस्लाम ने गोद लेने की प्रथा को अवैध कर दिया क्योंकि मुँह से बोल देने से कोई किसी का बेटा नहीं हो जाता। 

ज़ैद की शादी 4 हिजरी में ज़ैनब से हो गई थी जो ऊँचे ख़ानदान से थीं और दोनों की सामाजिक हैसियत अलग होने के कारण मियाँ-बीवी के संबंध अच्छे नहीं थे, ज़ैद इस बात से दुखी रहते थे कि उनकी बीवी बातचीत में अक्सर अपने ऊँचे ख़ानदान की धौँस जमाया करती थीं। फिर जब ज़ैद ने अपनी बीवी को तलाक़ देने के सिलसिले में मुहम्मद (सल्ल) से सलाह-मशविरा किया, तब भी मुहम्मद (सल्ल) ने उसे रिश्ता न तोड़ने की सलाह दी थी। मगर इसके बावजूद अंतत: 5 हिजरी में ज़ैद ने अपनी बीवी को तलाक़ दे ही दिया। चूँकि इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ मुँह बोले बेटे की हैसियत अब असली बेटे की नहीं रह गई थी, इसलिए मुँह बोले बेटे की तलाक़ दी हुई बीवी से शादी की जा सकती थी। उसके बाद मुहम्मद (सल्ल) को ज़ैनब से शादी की इजाज़त मिल गई जो कि क़ानूनी रूप से वैध थी, और इस तरह अरब की पुरानी प्रथा ख़त्म हुई।  

40: मुहम्मद (सल्ल) ज़ैद या किसी और मर्द के बाप नहीं थे, उनके अपने तीन बेटे हुए थे, मगर सभी बचपन में ही मर गए थे। ज़ैद को उन्होंने अपना बेटा माना था, इसलिए उसे लोग "ज़ैद बिन मुहम्मद" कहते थे, लेकिन अब यह साफ़ हो गया कि मुँह बोले बेटे को अपना बेटा नहीं कहना है। चूँकि क़यामत तक आपके बाद अब कोई नबी नहीं होगा, इसलिए जाहिलियत के ज़माने की रस्मों को मिटाने की ज़िम्मेदारी भी आपकी ही थी। 

49: हाथ लगाने से पहले ही तलाक़ का मतलब यह है कि शादी के बाद अभी मियाँ-बीवी के बीच शारीरिक संबंध न बना हो, और अगर उससे पहले ही तलाक़ हो जाए, तो औरत को दूसरी शादी करने के लिए कोई "इद्दत" [waiting period] गुज़ारने की ज़रूरत नहीं है। अगर लड़के द्वारा मेहर की रक़म [bride-wealth] दे दी गई थी, तो ऐसी हालत में लड़की आधी मेहर रख लेगी।

बीवी को उसके पति द्वारा तलाक़ दिए जाने के बाद उसे एक अवधि तक इंतज़ार करना होता है, उसके बाद ही उसका तलाक़ पूरा होता है और तब वह आज़ाद होती है कि किसी और से फिर से शादी कर सके, इसी अवधि को 'इद्दत' कहते हैं। असल में, यह अवधि यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि उस तलाक़शुदा औरत की कोख में उसके पुराने पति का बच्चे न ठहर गया हो। तलाक़ देने के बाद भी अगर पति चाहे तो इद्दत पूरी होने के पहले तक अपनी बीवी से मेल-मिलाप कर सकता है, ऐसी स्थिति में तलाक़ रद्द हो जाएगा। इद्दत की अवधि निम्न होती है:

(i) माहवारी वाली औरत: तलाक़ के बाद तीसरी माहवारी के समाप्त होने तक

(ii) जिसकी माहवारी बंद हो गई हो: तलाक़ के बाद तीन महीने तक

(iii) विधवा औरत: पति के मरने से चार महीने और दस दिन तक

(iv) गर्भवती औरत: बच्चा पैदा होने तक

बहरहाल, तलाक़ की सूरत में लड़की को कुछ तोहफ़ा [एक जोड़ा कपड़ा आदि] देकर भले तरीक़े से विदा करना चाहिए।

50: इस आयत में यह बताया गया है कि किस किस क़िस्म की औरतें मुहम्मद (सल्ल) की बीवी बन सकती थीं। यहाँ जो हुक्म दिए गए हैं, वे केवल नबी (सल्ल) के लिए ख़ास हैं। ऐसी औरतें जिन्हें मौक़ा मिलने पर भी वे हिजरत करके मदीना नहीं गईं, उनके साथ शादी वैध नहीं होगी। इसके साथ जो औरतें बिना मेहर लिए हुए ख़ुद शादी करना चाहें, तो उनके साथ बिना मेहर दिए भी शादी वैध होगी, यह हुक्म भी केवल नबी (सल्ल) के लिए ही है। 

आम मुसलमान को एक समय में ज़्यादा से ज़्यादा चार शादी करने की इजाज़त है, लेकिन मुहम्मद (सल्ल) के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं रखी गई थी। हज़रत ज़ैनब (रज़ि) से आप (सल्ल) की शादी के समय आपकी चार बीवियाँ मौजूद थीं, इसीलिए लोग बातें बना रहे थे, उसी के जवाब में यह आयत है। यहाँ एक बात ध्यान देने की है कि धार्मिक मामलों के साथ-साथ मुहम्मद (सल्ल) एक शासक भी थे और कई बार कूटनीति को ध्यान में रखकर भी शादियाँ होती थीं, जिस क़बीले और ख़ानदान की बेटियों से शादी के रिश्ते बँध जाते थे, उनकी तरफ़ से दुश्मनी का रास्ता भी आम तौर पर बंद हो जाता था और वे आगे के लिए दोस्त बन जाते थे।

यह बात भी याद रखनी चाहिए कि मुहम्मद (सल्ल) जब 25 वर्ष के थे तो उन्होंने एक 40 साल की विधवा ख़दीजा (रज़ि) से शादी की थी और पूरे 25 साल तक वही आपकी पत्नी थी, उनके मरने के बाद दो साल तक आप अकेले रहे, फिर उन्होंने एक और बड़े उम्र की विधवा, सौदा (रज़ि) से शादी की, और अगले चार साल तक केवल वही आपकी बीवी रहीं। इस तरह, अपने जीवन के 53 साल तक उनकी एक ही बीवी रही थीं। 53 से 63 साल के बीच उनकी कुल 10 बीवियाँ रहीं जिनमें दो लौंडियाँ भी थीं जिन्हें आज़ाद करके आपने निकाह किया था। उनमें ज़्यादातर ऐसी विधवाएं थीं जो बेसहारा थीं और जिनके बच्चे भी थे। कुछ शादियाँ कूटनीति के चलते अपने साथियों और पड़ोसी क़बीलों से मज़बूत रिश्ता बनाने के लिए हुईं। उनकी बीवियों में केवल आयशा (रज़ि) ही कुँवारी थीं। इसलिए ऐसा सोचना कि इतनी उम्र गुज़र जाने के बाद अचानक उन्हें ज़्यादा बीवियों की इच्छा जाग गई थी, बिल्कुल ही ग़लत है। 

51: जिन मुसलमानों के पास एक से ज़्यादा बीवियाँ हैं, उनके लिए ज़रूरी है कि पारी के हिसाब से हर बीवी के साथ वह बराबर रातें गुज़ारे, मगर इस मामले में भी मुहम्मद (सल्ल) को छूट दी गई थी कि वह चाहें तो किसी बीवी की पारी को आगे-पीछे कर सकते हैं, हालाँकि बताया जाता है कि उन्होंने इस छूट का कभी भी फ़ायदा नहीं उठाया।

52: जब पैग़म्बर साहब की बीवियों ने आपके साथ हर हाल में रहना स्वीकार कर लिया, उसके बाद यह हुक्म आया कि अब इसके बाद उन्हें और शादी करने की इजाज़त नहीं है। उस समय उनकी कुल नौ(9) बीवियाँ थीं।

55: "बापों" में चचा और मामूँ दोनों शामिल हैं, जो बाप जैसे होते हैं।

57: अल्लाह के साथ उसकी औलाद को जोड़ना या इबादत के लिए अल्लाह के साथ दूसरे ख़ुदाओं को जोड़ना या इसी तरह रसूल को झूठा कहना या उन्हें और उनके परिवार को बुरा-भला कहना, अल्लाह और उसके रसूल को बेइज़्ज़त करने जैसा है।

59: यहाँ सभी मुसलमान औरतों को घर से बाहर निकलते समय चादर ओढ़कर निकलने को कहा गया है। यहाँ "युदनीना अलैहिन्ना" कहा गया है यानी चादर इतनी लम्बी हो जिससे नीचे पाँव तक जिस्म ढक सकेकुछ विद्वानों का मानना है कि यह आयत एक ख़ास हालत में उतरी थी जो कि उस समय मदीना में पायी जाती थी, और जिसका आम हालत में पर्दा करने से कोई संबंध नहीं है। उस समय घरों में शौचालय नहीं थे और औरतें भोर या रात में ज़रूरत के लिए शहर से किनारे जाया करती थीं। वहाँ कुछ आवारा और बदचलन लोग थे जो आती-जाती मुसलमान औरतों के साथ छेड़खानी करते, उनके बारे में तरह-तरह की झूठी अफ़वाहें उड़ाते, और स्कैंडल खड़ा करने की कोशिश में लगे थे। जब उन्हें एकाध बार पकड़ा गया तो उन्होंने यह बहाना किया कि वह उन्हें किसी की लौंडी समझकर उनसे मज़ाक़ कर रहे थे। इसी बुराई को रोकने के लिए इस आयत में सभी मुसलमान औरतों को चादर ओढ़कर बाहर निकलने को कहा गया है ताकि शरीफ़ औरत के रूप में उनकी पहचान की जा सके और वे छेड़खानी से बच सकें, अगर इस पर भी बदमाशों ने अपनी हरकत नहीं छोड़ी तो आगे उन्हें सख़्त सज़ा देने के लिए कहा गया है। जब हालात ठीक हो गए तो सभी औरतों को इस तरह चादर ओढ़कर बाहर निकलने की ज़रूरत नहीं रही।

61: यहाँ मदीना के पाखंडी [मुनाफ़िक़] लोगों को कड़ी चेतावनी दी गई है कि वे जो बुरे और ग़लत काम में लगे हुए हैं जिनमें ख़ास तौर से शरीफ़ औरतों को छेड़ने और बेबुनियाद अफवाहें फैलाने से अगर वे नहीं रुके, तो उनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होगी। हालाँकि पैग़म्बर (सल्ल) ने कभी भी किसी पाखंडी को क़त्ल करने का हुक्म नहीं दिया जब तक कि वे किसी दुश्मन सेना में शामिल होकर मुसलमानों का क़त्ल न करने लग जाएं।  

69: मुहम्मद (सल्ल) की हज़रत ज़ैनब (रज़ि) से शादी के बाद (33: 37) जो लोग आपके बारे में तरह-तरह की दिल दुखाने वाली बातें कह रहे थे, उन्हें यहाँ मना किया गया है, और बताया गया है कि वे इसराईल की संतानों की तरह न हो जाएं जिन लोगों ने हज़रत मूसा (अलै) पर अपने भाई हारून के क़त्ल का या एक वैश्या के साथ संबंध होने का झूठा इल्ज़ाम लगाकर तरह-तरह से सताया था। यहाँ तक कि मूसा (अलै) जो कि एक शर्मीले आदमी थे और अपना जिस्म कभी नहीं दिखाते थे, इससे कुछ लोगों ने यह अफ़वाह उड़ाई कि उनके शरीर में ज़रूर कोई बीमारी है, फिर एक दिन ऐसा हुआ कि जब वह नहा रहे थे तो उनके कुछ माननेवालों की अचानक उन पर नज़र पड़ गई और तब जाकर लोगों का शक दूर हुआ। 

72: यहाँ अमानत [Trust] का मतलब है "बिना किसी दबाव के अपनी मर्ज़ी से अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करने की नैतिक ज़िम्मेदारी लेना।" अल्लाह ने जब अपनी सृष्टि के सामने यह प्रस्ताव रखा कि हमारे बहुत से आदेश ऐसे होंगे जिन्हें कोई चाहे तो अपनी मर्ज़ी से मानते हुए उन पर अमल करे और चाहे तो उन आदेशों को न माने, पहली सूरत में जो आदेशों को मानते हुए अमल करेगा, उसे जन्नत में हमेशा रहने का इनाम मिलेगा, और जो आदेशों को नहीं मानेगा, उसे जहन्नम मिलेगी। इस प्रस्ताव को सुनकर आसमान, ज़मीन और पहाड़ों ने इस अमानत की ज़िम्मेदारी लेने से मना कर दिया क्योंकि आदेश न मानने पर उन्हें जहन्नम की यातना का डर था। 

आदमी ने यह ज़िम्मेदारी उठाने का प्रस्ताव मान तो लिया, मगर असल में अल्लाह के हुक्मों को मानते हुए उस पर पूरी तरह से अमल न कर सका, ख़ासकर वे लोग जो विश्वास नहीं रखते [काफिर] और जो विश्वास करने का पाखंड करते हैं [मुनाफ़िक़] 

 

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Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

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