सूरह 27: अन-नम्ल
[चीटियाँ, The Ants]
यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम सुलैमान (अलै) की कहानी (आयत 18-19) में आयी चींटियों के ज़िक्र पर पड़ा है, साथ में एक परिंदे "हुदहुद" और सबा की रानी का भी ज़िक्र आया है। इसके शुरुआत और अंत दोनों जगहों पर क़ुरआन को ईमान रखनेवालों के लिए ख़ुशख़बरी और इंकार करने वालों के लिए चेतावनी के तौर पर पेश किया गया है। इसमें पहले गुज़र चुके नबियों की कहानियाँ सुनायी गई हैं, और साथ में विश्वास न करने वाले समुदायों की बर्बादी की दास्तानें भी बयान हुई हैं। अल्लाह की शक्ति किस प्रकृति की होती है, इसके कुछ उदाहरण दिए गए हैं, और इसका मुक़ाबला ऐसे ख़ुदाओं से किया गया है जिन्हें विश्वास न करने वालों ने अल्लाह का 'साझेदार' [Partner] ठहरा रखा है, जिनके पास कोई ताक़त नहीं है। सच्चाई से इंकार करनेवालों के लिए फ़ैसले के दिन का दृश्य (82-90) भी दिखाया गया है। पैग़म्बर साहब को फिर से आश्वस्त किया गया है कि क़ुरआन को सच्चाई के साथ उतारा जा रहा है और उनकी ज़िम्मेदारी बस लोगों तक संदेश पहुँचा देने की है, फ़ैसला करने का काम सिर्फ़ अल्लाह का है।
विषय:
01-06: क़ुरआन, ईमानवाले और (सच्चाई से) इंकार करने वाले
07-14: मूसा (अलै) को पुकारा गया
15-44: सुलैमान (अलै) और सबा की रानी की कहानी
45-53: सालेह (अलै) और समूद के लोगों की कहानी
54-58: लूत (अलै) और उनके लोगों की कहानी
59-64: अल्लाह जैसा कोई नहीं
65-66: सिर्फ़ अल्लाह जानता है कि भविष्य में क्या होगा
67-75: विश्वास न करने वाले दोबारा ज़िंदा उठाए जाने की बात को नहीं मानते
76-81: इसराईल की संतानों [यहूदी व ईसाई] के आपसी मतभेद को क़ुरआन स्पष्ट कर देती है
82-90: फ़ैसले के दिन का दृश्य
91-93: रसूल का मिशन
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
ता॰ सीन॰।
ये आयतें हैं क़ुरआन की ---- एक ऐसी किताब की, जो चीज़ों को स्पष्ट कर देती है; (1) ईमान रखने वालों को सही रास्ता दिखानेवाली और खुशख़बरी सुनानेवाली, (2) (ईमानवाले वे हैं) जो नमाज़ को पाबंदी से अदा करते हैं, और (ज़रूरतमंदों को) ज़कात [alms] देते हैं, और आने वाले जीवन [आख़िरत/ परलोक] में पक्का विश्वास रखते हैं। (3) रहे वे लोग जो आने वाले जीवन [Hereafter] में विश्वास नहीं रखते, उनकी नज़रों में हमने उनके कर्मों को बड़ा लुभावना बना दिया है, अतः वे (अंधों की तरह) भटकते फिरते हैं: (4) यही वे लोग हैं, जिनके लिए बहुत बुरी यातना होगी, और वे आने वाले जीवन में सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाने वालों में रहेंगे। (5) [ऐ रसूल] आप इस क़ुरआन को उस (अल्लाह) की तरफ़ से पा रहे हैं, जो (अपने हर काम में) बड़ी समझ-बूझ रखनेवाला, और सब कुछ जाननेवाला है। (6)
याद करो जब मूसा [Moses] ने अपने घरवालों से कहा, "मैंने एक आग-सी देखी है। मैं वहाँ से (रास्ते की) कोई ख़बर लेकर आता हूँ, या तुम्हारे लिए कोई जलती हुई लकड़ी लेकर आता हूँ, ताकि तुम अपने आपको गर्मा सको।" (7) फिर जब वह आग के नज़दीक पहुँचे, तो एक आवाज़ ने उन्हें पुकारा, "बरकतवाला [Blessed] है वह, जो इस आग के नज़दीक है, और वह भी [फ़रिश्ते] जो इसको घेरे हुए हैं; महान है अल्लाह, सारे संसार का रब! (8) ऐ मूसा! मैं अल्लाह हूँ, बेहद प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझवाला! (9) अपनी लाठी नीचे फेंक दो।" जब मूसा ने देखा कि वह (लाठी) हिल-डुल रही है जैसे कोई साँप हो, तो वह पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर न देखा। (फिर आवाज़ आयी) "ऐ मूसा, डरो नहीं! मेरी मौजूदगी में रसूलों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं, (10) मैं सचमुच बड़ा माफ़ करनेवाला, और उन लोगों पर बहुत दया करनेवाला हूँ, जो ग़लती करते हैं, और फिर की गयी बुराई को अच्छाई में बदल देते हैं। (11) अपना हाथ गिरेबान में डालो, और फिर (बाहर निकालो) तो वह बिना किसी ख़राबी के सफ़ेद चमकता हुआ बाहर निकलेगा। यह (दो निशानियाँ) उन नौ (9) निशानियों में से हैं जिन्हें फ़िरऔन और उसकी क़ौम के सामने जाकर तुम्हें दिखाना होगा; वे सचमुच (मर्यादा की) हद से आगे बढ़ हुए हैं।" (12)
मगर जब आँखें खोल देने वाली हमारी निशानियाँ उनके पास आयीं, तो उन्होंने कहा, "यह तो साफ़ तौर से जादू मात्र है!" (13) हालाँकि उन्होंने दिल में इन (निशानियों) को सच जाना था, मगर उन लोगों ने शैतानी और घमंड के कारण उसे मानने से इंकार कर दिया। अब देख लो इन गड़बड़ी [corruption] फैलाने वालों का परिणाम क्या हुआ? (14)
हमने दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को बहुत ज्ञान दिया था, (उन्होंने उसके महत्व को समझा) और उन दोनों ने कहा था, "सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने अपने बहुत-से ईमानवाले बंदों में हम पर ख़ास तौर से मेहरबानी [favour] की।" (15) दाऊद के बाद सुलैमान उनका वारिस हुआ। उसने कहा, "ऐ लोगो! हमें चिड़ियों की बोली सिखायी गई है, और हमें हर चीज़ में हिस्सा दिया गया है: यह सचमुच (अल्लाह की) ख़ास मेहरबानी है।" (16) (एक बार) सुलैमान के सामने जिन्नों, आदमियों और चिड़ियों से तैयार की हुई सेना एक ख़ास वरीयता के अनुसार क़तारों में खड़ी [marshalled] की गई, (17) और सेना जब चींटियों की घाटी में पहुँची, तो एक चींटी ने कहा, "ऐ चींटियों! अपने अपने घरों में घुस जाओ। कहीं सुलैमान और उसकी सेना तुम्हें अनजाने में कुचल ही न डाले।" (18) सुलैमान उसकी बात सुनकर ज़ोर से मुस्कराए और कहा, "मेरे रब! मुझ में ऐसा गुण दे दे कि जो नेमतें [blessings] तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को दी हैं, मैं उनका शुक्र अदा करता रहूँ, और यह कि अच्छे कर्म करूँ जिससे तू ख़ुश हो जाए; और अपने करम से मुझे अपने नेक व अच्छे बंदों के दर्जे में शामिल कर ले।" (19)
(एक बार) सुलैमान ने चिड़ियों की उपस्थिति की जाँच की और कहा, "क्या बात है कि मैं हुदहुद [Hoopoe] को नहीं देख रहा हूँ? क्या वह यहाँ हाज़िर नहीं? (20) अगर उसने अपने यहाँ मौजूद न होने का कोई सही कारण न बताया, तो मैं उसे कठोर दंड दूँगा या उसे मार ही डालूँगा।" (21) लेकिन हुदहुद ने बाहर में ज़्यादा देर नहीं लगायी: उसने (आकर) कहा, "मुझे कुछ ऐसी बात पता चली है जो आपको मालूम नहीं है: मैं सबा [Sheba] से आपके पास एक पक्की ख़बर लेकर आया हूँ। (22) मैंने वहाँ एक औरत को उन लोगों पर शासन करते हुए पाया, जिसे हर चीज़ का एक हिस्सा दिया गया है---- उसका एक ज़बरदस्त सिंहासन है--- (23) (मगर) मैंने उसे और उसकी क़ौम के लोगों को अल्लाह के बजाए सूरज की पूजा करते हुए पाया। शैतान ने उन पर कुछ ऐसा (जादू) किया है कि उन लोगों को अपने (बुरे) कर्म बहुत भले मालूम होते हैं, और उन्हें सही मार्ग से भटका रखा है: वे सही मार्ग पर नहीं चल सकते। (24) क्या उन्हें उस अल्लाह की इबादत नहीं करनी चाहिए, जो आसमानों और ज़मीन में कहीं भी दबी-छिपी चीज़ें बाहर निकाल लाता है, और वह जानता है —-- उसे भी जो कुछ तुम छिपाते हो और उसे भी जो कुछ तुम सामने बता देते हो? (25) वह अल्लाह है, उसके सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं, ज़बरदस्त सिंहासन का मालिक है।" (26) सुलैमान ने कहा, "हम देखेंगे कि तू सच कह रहा है या झूठ बोल रहा है। (27) मेरा यह ख़त लेकर जा, और इसे उन लोगों तक पहुँचा दे, फिर उनके पास से अलग हट जाना, और देखना कि वे क्या जवाब भेजते हैं।" (28)
सबा की मल्लिका ने कहा, "ऐ सरदारो! एक बड़ा ही शानदार ख़त मेरे पास भेजा गया है। (29) वह सुलैमान की तरफ़ से है और उसमें यूँ लिखा है, “अल्लाह के नाम से शुरू जो बड़ा मेहरबान, अत्यन्त दयावान है, (30) अपने आपको मुझ से ऊपर न समझो, और मेरे पास चली आओ (अल्लाह के सामने) झुकते हुए।" (31) सबा की रानी ने कहा, "ऐ सरदारो! मेरे सामने जो मामला आया है, इस पर आप मुझे सही सलाह दें: (आप तो जानते हैं कि) मैं सारे मामलों का फ़ैसला हमेशा आप लोगों की मौजूदगी में ही करती हूँ।" (32) उन्होंने जवाब दिया, "हमारी सेना बहुत तगड़ी है और हम पूरी ताक़त से युद्ध लड़ते हैं, मगर कमान तो आपके हाथ में है, अतः आप सोच लें कि आपको क्या आदेश देना है।" (33) सबा की रानी ने कहा, "जब भी कभी राजा किसी शहर में (सेना के साथ) घुसते हैं, तो उसे खंडहर बना देते हैं और वहाँ के सरदारों को अपमानित करते हैं ---- वे भी ऐसा ही करेंगे। (34) मगर मैं उनके पास एक तोहफ़ा भेजने जा रही हूँ; फिर देखती हूँ कि मेरे दूत क्या जवाब लेकर लौटते हैं।" (35)
फिर जब वह दूत सुलैमान के पास पहुँचा, तो सुलैमान ने उससे कहा, "क्या! तुम क्या मुझे धन-दौलत देना चाहते हो? जो कुछ अल्लाह ने मुझे दे रखा है, वह उससे कहीं उत्तम है जो उसने तुम्हें दिया है, मगर तब भी तुम लोग अपने इस तोहफ़े से बड़े ख़ुश मालूम होते हो! (36) अपने लोगों के पास वापस चले जाओ: अब हम उन पर ज़रूर अपनी सेना के साथ चढ़ायी करेंगे जिसे रोक पाना उनके बस का नहीं, उन्हें अपमानित करके व नीचा दिखाते हुए हम उन्हें उस ज़मीन से खदेड़ देंगे।" (37) फिर सुलैमान ने कहा, "ऐ सरदारो! इससे पहले कि वे लोग हमारे पास झुके हुए आएँ, तुममें से कौन है जो उस (रानी) का सिंहासन लेकर मेरे पास आ सकता है?" (38) एक ताक़तवर और चालाक जिन्न ने जवाब दिया, "इससे पहले कि आप अपने स्थान से उठें, मैं उस (सिंहासन) को आपके पास ले आऊँगा। मैं मज़बूत भी हूँ, और भरोसे के लायक़ भी।" (39) मगर उनमें से एक आदमी जिसे आसमानी किताब का ज्ञान था, कहने लगा, "मैं पलक झपकते ही उसे आपके पास ले आऊँगा।"
फिर जब सुलैमान ने उस सिंहासन को अपने पास रखा हुआ देखा तो कहा, "यह मेरे रब का मुझ पर एहसान है, ताकि वह मेरी परीक्षा करे कि मैं उसका शुक्र अदा करता हूँ या नहीं: अगर कोई शुक्र अदा करता है तो वह अपने ही फ़ायदे के लिए करता है, और अगर कोई उसका शुक्र अदा नहीं करता, तो मेरा रब किसी पर निर्भर तो नहीं, बल्कि देने में वह बड़ा उदार [generous] है।" (40) फिर उसने कहा, "उसके सिंहासन का रूप बदल दो, फिर देखेंगे कि वह उसे पहचान पाती है या नहीं।" (41) जब सबा की रानी वहाँ पहुँचीं तो उनसे पूछा गया, "क्या आपका सिंहासन ऐसा ही है?" उसने कहा, "हाँ, देखकर लगता तो है”, (सुलैमान ने कहा), “हमें तो इस रानी से पहले ही (सही) ज्ञान दे दिया गया था, और हम अल्लाह के सामने भक्ति-भाव से अपने आपको झुकाते थे"; (42) मगर चूँकि अल्लाह के बजाए वह किसी और को [सूरज को] पूजती थी, इसलिए (अल्लाह में) विश्वास कर लेने [ईमान] से रानी अब तक रुकी रही थी, असल में वह एक इंकार करनेवाली [काफ़िर] क़ौम में से थी। (43) फिर सबा की रानी से कहा गया, "महल में दाख़िल हों।" मगर जब उसने वहाँ देखा, तो उसे ऐसा लगा कि पानी का एक गहरा हौज़ है और इसीलिए (उसने पाँव के कपड़े चढ़ा लिए तो) उसकी टांगें दिखने लगीं। सुलैमान ने समझाया, "यह तो बस शीशे से बना हुआ हाल है।" रानी बोल उठी, "ऐ मेरे रब! निश्चय ही मैंने (अब तक ग़लती करके) अपने आप पर ज़ुल्म किया: अब मैं, सुलैमान के साथ पूरी भक्ति से अल्लाह के सामने झुकती हूँ, जो सारे संसार का रब है।" (44)
समूद के लोगों की ओर हमने उनके भाई, सालेह, को (पैग़म्बर बनाया, और) यह कहते हुए भेजा कि "केवल अल्लाह की बन्दगी करो, "मगर वे लोग दो विरोधी गुटों में बँट गए। (45) सालेह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, तुम अच्छाई के बदले बुराई को ले आने की जल्दी क्यों मचा रहे हो? तुम अल्लाह से (अपनी ग़लतियों की) माफ़ी क्यों नहीं मांगते, ताकि तुम पर दया की जा सके।" (46) वे कहने लगे, "हम तुम्हें और तुम्हारे माननेवालों को ‘बुरा शगुन’ [evil omen] समझते हैं।" सालेह ने जवाब दिया, "कोई भी शगुन जो तुम देखते हो, उसका फ़ैसला तो अल्लाह ही करेगा: असल में तुम लोगों की परीक्षा ली जा रही है।" (47) उस शहर में नौ (9) लोग ऐसे थे जो ज़मीन पर गड़बड़ी [corruption] फैलाते रहते थे, और ग़लत चीज़ों को सुधारते न थे। (48) वे बोले, “क़सम अल्लाह की: हम सालेह और उसके घरवालों पर रात के समय हमला करेंगे, फिर उसके वारिस (परिजन) से कह देंगे कि हम उसके घरवालों के विनाश के समय वहाँ मौजूद ही नहीं थे, और यह कि हम सच बोल रहे हैं।" (49) इस तरह उन्होंने एक शैतानी योजना बनायी थी, मगर एक योजना तो हमने भी बनायी थी जिसकी उन्हें कोई ख़बर तक न थी। (50) अब देखो कि उनकी चालों का कैसा अंजाम हुआ: हमने उन्हें और उनके सभी लोगों को पूरी तरह से तबाह-बर्बाद करके रख दिया। (51) यह उनके कुकर्मों का नतीजा है कि आज भी उनके घर उजाड़ खंडहर के रूप में पड़े हुए हैं--- सचमुच इसमें उन लोगों के लिए एक बड़ी निशानी है, जो जानते हैं---- (52) मगर हमने उन लोगों को बचा लिया जो ईमान रखते थे और हर तरह की बुराइयों से बचते थे। (53)
हमने लूत [Lot] को भी उनकी क़ौम के लोगों के पास (पैग़म्बर बनाकर) भेजा, उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "कैसे खुली आँखों देखते हुए भी तुम ऐसे अश्लील कर्म करते हो? (54) कैसे तुम (सेक्स के लिए) औरतों को छोड़कर मर्दों के पीछे जाते हो? कैसे जाहिल लोग हो तुम!" (55) उनके लोगों ने इस बात का एक ही जवाब दिया, और कहा, "अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो लूत के माननेवालों को! ये लोग (सेक्स के मामले में) बहुत पवित्र बनते हैं!" (56) फिर हमने उन्हें और उनके परिवारवालों को तो बचा लिया---- केवल उनकी पत्नी को छोड़कर जिसे हमने तय कर रखा था कि वह पीछे रह जाने वालों में से होगी--- (57) और हमने उन पर एक ज़बरदस्त बारिश बरसाई। और कैसी भयानक बारिश थी वह, जो उन लोगों पर बरस पड़ी जिन्हें सावधान किया जा चुका था! (58)
[ऐ रसूल] कह दें, "प्रशंसा तो सारी अल्लाह के लिए है, और सलामती हो उसके उन बंदों पर जिन्हें उसने (पैग़म्बर के रूप में) चुन लिया। तो बताओ कौन बेहतर है: अल्लाह बेहतर है या वे जिनको उन लोगों ने अल्लाह की ख़ुदायी में साझेदार [Partners] ठहरा रखा है? (59) आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया? आसमान से तुम्हारे लिए पानी कौन बरसाता है--- जिसकी मदद से हमने ख़ुशनुमा बाग़ उगा दिए: तुम्हारे बस का नहीं था कि तुम उनमें पेड़ों को उगा पाते--- क्या अल्लाह के अलावा कोई और भी ख़ुदा है? नहीं, मगर कुछ लोग हैं जो दूसरों को अल्लाह के बराबर का ठहराते हैं! (60) कौन है जिसने धरती को रहने की एक स्थायी जगह बनायी, और किसने उसके बीच से नदियाँ बहा दीं? किसने इस पर ऐसे पहाड़ जमा दिए जो हिल नहीं सकते और किसने दो समंदरों के बीच एक आड़ बना दी? क्या अल्लाह के अलावा कोई और भी ख़ुदा है? नहीं, मगर अधिकतर लोग जानते ही नहीं! (61) कौन है वह जो परेशानी में घिरे हुए लोगों की पुकार सुनकर जवाब देता है? कौन उनकी तकलीफ़ों को दूर करता है? कौन तुम्हें धरती पर उत्तराधिकारी [ख़लीफ़ा/successors] बनाता है? क्या अल्लाह के अलावा कोई और ख़ुदा है? तुम कोई ध्यान ही नहीं देते! (62) कौन है जो थल और जल के अँधेरों में भी (तारों और राशियों द्वारा) तुम्हें रास्ता दिखाता है? कौन है जो अपनी रहमत [बारिश] भेजने से पहले हवाओं को (बारिश की) ख़ुशख़बरी लेकर भेजता है? क्या अल्लाह के अलावा कोई और ख़ुदा है? अल्लाह के अलावा वे जिनको उसका साझेदार [Partners] ठहराते हैं, अल्लाह उनसे कहीं ऊँचा व महान है! (63) कौन है जो (हर चीज़ को पैदा करके) जीवन देता है, और फिर उसको दोबारा पैदा करता है? कौन है जो तुम्हें आसमानों और ज़मीन से रोज़ी देता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और भी ख़ुदा है? (फिर भी अगर नहीं मानते, तो) कहें, "अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो, तो इसका कोई प्रमाण ले आओ।" (64)
कहें, "अल्लाह को छोड़कर, आसमानों और ज़मीन में कोई नहीं जिसे (सामान्य बुद्धि से परे) अनदेखी [ग़ैब] चीज़ों की जानकारी हो।” वे नहीं जानते कि मुर्दा पड़े हुए लोग कब दोबारा उठाए जाएँगे: (65) वे अपने ज्ञान से आख़िरत [परलोक] के बारे में नहीं समझ सकते; वे इसके बारे में संदेह में पड़े हैं, बल्कि वे (शक में) अंधे हो चुके हैं। (66) सो जिन लोगों ने इंकार किया [काफ़िर], वे कहते हैं, "क्या! जब हम और हमारे बाप-दादा (मर के) धूल-मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या वास्तव में हमें (ज़िंदा करके) उठाया जाएगा? (67) ऐसे वादों के बारे में हमलोगों ने पहले भी सुन रखा है, और हमारे बाप-दादाओं ने भी। ये तो बस पुराने ज़माने की कहानियाँ हैं।" (68) [ऐ रसूल] आप कहें "ज़मीन पर यहाँ वहाँ घूमो-फिरो और देखो कि शैतानियाँ करने वालों का कैसा अंजाम हुआ।" (69) [ऐ रसूल] आप उन लोगों के लिए दुखी न हों; और न उनकी मक्कारी की चालों से परेशान हों। (70) वे यह भी कहते हैं, "अगर तुम्हारी बात सच है, तो यह बताओ कि यह वादा कब पूरा होगा?" (71) कह दें, "जिस चीज़ के आने की तुम जल्दी मचा रहे हो, बहुत सम्भव है कि उसका कोई हिस्सा तुम्हारे बिल्कुल पास आ लगा हो।" (72) निश्चय ही तुम्हारा रब तो लोगों पर बहुत उदार है, मगर सच यह है कि उनमें से अधिकतर लोग शुक्र अदा नहीं करते। (73) वह हर उस चीज़ को जानता है जो लोगों के सीनों में छिपी होती हैं, और हर वह चीज़ भी जानता है जो वे सामने बता देते हैं: (74) आसमानों या ज़मीन पर छिपी हुई कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जो एक स्पष्ट किताब में लिखी हुई न हो। (75)
सच्चाई यह है कि यह क़ुरआन इसराईल की सन्तानों को ऐसी अधिकतर बातें स्पष्ट कर देती है जिनके विषय में वे [यहूदी व ईसाई] मतभेद रखते हैं। (76) और इसमें शक नहीं कि यह ईमानवालों के लिए सही रास्ता दिखानेवाली है, और रहमत है। (77) निश्चय ही तुम्हारा रब उनके बीच अपने ज्ञान से फ़ैसला कर देगा---- वह बड़ी ताक़तवाला, सब कुछ जाननेवाला है--- (78) अतः [ऐ रसूल], आप अल्लाह पर भरोसा रखें, आप बिल्कुल सच्चे व सही रास्ते पर हैं। (79) आप मरे हुए आदमी को अपनी बात नहीं सुना सकते, और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हैं, जबकि वे पीठ फेरकर चले जा रहे हों, (80) और न आप अंधों को उनकी गुमराही से बचाकर राह पर ला सकते हैं: आप किसी को भी अपनी बात नहीं सुना सकते सिवाए उसके, जो हमारी आयतों [निशानियों] में विश्वास रखता हो, और हमारे सामने पूरी भक्ति से झुकता हो। (81) जब उन लोगों के ख़िलाफ़ फ़ैसला हो जाएगा, तब हम धरती में से एक जानवर सामने लाएँगे जो उन्हें बता देगा कि वे लोग हमारी आयतों पर विश्वास नहीं करते थे। (82) एक दिन आएगा जब हम प्रत्येक समुदाय में से ऐसे लोगों का एक गिरोह जमा करेंगे, जिन लोगों ने हमारी आयतों को झूठ जानकर विश्वास नहीं किया, फिर उन्हें अलग-अलग समूहों में ले जाया जाएगा, (83) यहाँ तक कि वे (अल्लाह के) सामने पहुँच जाएँगे, तो फिर अल्लाह कहेगा, "क्या तुमने मेरी आयतों [संदेशों] को बिना ठीक से समझे-बूझे ही मानने से इंकार कर दिया? या फिर तुम कर क्या रहे थे?" (84) फिर उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला कर दिया जाएगा, क्योंकि उन लोगों ने सख़्त ग़लतियाँ की थीं: वे कुछ बोल नहीं पाएंगे। (85)
क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनके आराम करने लिए (अँधेरी) रात बनायी है, और दिन को उजालेवाला बनाया (ताकि काम-काज हो सके)? सचमुच इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं, जो ईमान रखते हैं? (86) और जिस दिन नरसिंघे [Trumpet] को फूँक मारकर बजा दिया जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन पर बसने वाला हर एक बुरी तरह डर जाएगा---- सिवाय उनके जिन्हें अल्लाह चाहे --- और सब अपनी गर्दन झुकाए हुए उसके सामने हाज़िर होंगे। (87) तुम पहाड़ों को देखोगे, तो तुम्हें लगेगा कि वे मज़बूती से जमे हुए हैं, मगर वे (उस समय) बादलों की तरह उड़ते फिरेंगे: यह सब अल्लाह की कारीगरी है, जिसने सारी चीज़ों को एकदम सही व सटीक बनाया है। तुम जो भी करते हो, वह उसकी पूरी ख़बर रखता है: (88) जो कोई भी अच्छे कर्म लेकर आएगा, तो बदले में उसको उससे भी अच्छा इनाम मिलेगा, और वह उस दिन की घबराहट से बचा रहेगा, (89) मगर जो कोई भी बुरे कर्मों को लेकर आया, तो ऐसे लोगों को मुँह के बल आग में डाल दिया जाएगा। (और उनसे पूछा जाएगा), "जो कुछ (दुनिया में) तुम करते रहे थे, क्या तुम उन्हीं चीज़ों का बदला पा रहे हो या किसी और चीज़ का?" (90) [ऐ रसूल आप कह दें] मुझे जो करने का आदेश मिला है, वह यह है कि मैं इस नगर (मक्का) के रब की बन्दगी करूँ, जिसने इस (पवित्र नगर) को कभी न मिटनेवाली इज़्ज़त दी है। हर चीज़ उसी की है; और मुझे आदेश मिला है कि मैं उन लोगों में से रहूँ जो उस (अल्लाह) के सामने पूरी भक्ति से झुके रहते हैं; (91) मुझे यह हुक्म हुआ है कि मैं क़ुरआन पढ़कर सुनाऊँ।” जो कोई भी सीधे रास्ते पर चलना पसंद करता है, तो वह ऐसा अपने ही फ़ायदे के लिए करता है। और जो कोई भी इस [सीधे रास्ते] से भटकता है, उससे कह दें, "मैं तो बस सावधान ही करनेवाला हूँ।" (92) और कहें, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है: जल्द ही वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखा देगा और तुम उन्हें पहचान लोगे।” और जो कुछ तुम सब करते हो, तुम्हारा रब उससे कभी भी बेख़बर नहीं है।" (93)
नोट:
4: सच्चाई को न मानने की ज़िद्द और हठधर्मी के कारण अल्लाह ऐसे लोगों को उनके हाल पर छोड़ देता है जिसके चलते वे अपने सारे बुरे कर्मों को अच्छा समझने लगते हैं और सीधे रास्ते पर नहीं आते।
7: मूसा अपने परिवारवालों के साथ मदयन से मिस्र जा रहे थे और अंधेरे में रास्ता भटक गए थे।
8: ... “जो इस आग के नज़दीक है", या तो यह अल्लाह के बारे में है या मूसा (अलै.) के बारे में। एक अनुवाद, "जो इस आग में है" भी है, जहाँ आग का मतलब "नूर" यानी 'अल्लाह की रौशनी' से है।
11: मूसा (अलै.) के हाथों मिस्र में जो एक आदमी मारा गया था (28: 15), यहाँ उसी की तरफ़ इशारा है।
12: इन निशानियों का वर्णन सूरह अ'राफ़ (7: 130-33) में भी आया है। दो निशानियाँ तो मूसा (अलै.) की लाठी, और उनका चमकता हुआ हाथ हुए, फिर एक के बाद एक सात (7) निशानियाँ आयीं---- अकाल, पैदावार में कमी, तूफ़ान, टिड्डी दल, घुन के कीड़े, मेंढकों की भरमार, और पानी में ख़ून।
14: इनका परिणाम क्या हुआ, इसका ज़िक्र सूरह यूनुस (10: 90-92) और सूरह शुअरा (26: 60-66) में आया है।
15: अल्लाह ने उन्हें कुछ ख़ास अधिकार दिए थे, जैसे जानवरों की बोली समझना और उनसे बातचीत करना, हवा को क़ाबू में करना, जिन्नों से अपने बड़े-बड़े काम लेना इत्यादि।
22: यमन के एक इलाक़े में सबा नामक क़ौम रहती थी, इसी के नाम पर उस जगह का नाम भी सबा हो गया। उस समय वहाँ एक रानी [मल्लिका] की हुकूमत थी, जिसका नाम "बिल्क़ीस" बताया जाता है।
31: इसका अनुवाद ऐसे भी किया गया है, "मेरे ख़िलाफ़ सरकशी न करो, और आज्ञाकारी बनकर मेरे पास चली आओ।"
35: वह सुलैमान (अलै) को परखना चाहती थी कि अगर वह केवल एक राजा हुए तो तोहफ़े से मान जाएंगे, और अगर कोई नबी हुए तो सच्चाई के आगे सर झुकाने को कहेंगे।
42: कुछ लोगों का मानना है कि आख़िरी वाक्य भी रानी बिल्क़ीस ने ही कहे थे, और तब अनुवाद होगा,.... "हमें तो इससे पहले ही (आपकी सच्चाई की) जानकारी हो गई थी, और हम सिर झुका चुके थे।"
45: एक गुट सच्चाई पर विश्वास करने वाला और दूसरा विश्वास करने से इंकार करने वाला। समूद की क़ौम और सालेह (अलै.) का विवरण सूरह अ'राफ़ (7:72) और सूरह हूद (11: 61-68) में भी आया है।
46: अच्छाई का मतलब सच्चाई पर विश्वास कर लेना।
47: असल में बुरा शगुन जैसे अकाल पड़ना आदि तो ख़ुद उनके बुरे कर्मों के चलते हुआ था।
48: हज़रत सालेह (अलै.) की क़ौम के नौ सरदार थे, जिनमें से हर एक के पीछे एक जत्था था। अंत में इन्हीं लोगों ने उस ऊँटनी को मार डाला जो अल्लाह के हुक्म से पैदा हुई थी। जब सालेह (अलै.) ने उन्हें यातना से डराया तो उन्होंने आपस में समझौता किया कि वे रात के समय उन पर ख़ुफ़िया तरीक़े से हमला करेंगे, और उनको और उनके घर वालों को मार डालेंगे।
52: सालेह (अलै.) के क़ौम की बस्तियाँ अरब के ही इलाक़े में थीं, और मदीने से कुछ दूरी पर सीरिया के व्यापारिक मार्ग पर स्थित थी जहाँ से कारवाँ गुज़रा करता था। आज भी ये वीरान बस्तियाँ और उनके खंडहर "मदायन सालेह" के नाम से मशहूर है जिससे सबक़ सीखना चाहिए।
58: लूत (अलै.) की घटना विस्तार से सूरह हूद (11: 77-83), और सूरह हिज्र (15: 58-76) में आयी है। इसके अलावा सूरह शुअरा (26: 160-175) और सूरह अ'राफ़ (7: 80) में भी आयी है।
60: मक्का के बहुदेववादी भी यह बात मानते थे कि इस कायनात को अल्लाह ने ही पैदा किया है, मगर साथ ही वे कहते थे कि उसने हर चीज़ की व्यवस्था करने के लिए बहुत से विभाग दूसरे ख़ुदाओं को सौंप दिए हैं, इसलिए उन ख़ुदाओं की इबादत [उपासना] करनी चाहिए।
61: जहाँ दो समंदर आपस में मिलते हैं, वहाँ क़ुदरत का ऐसा करिश्मा देखने को मिलता है कि दूर तक दोनों समंदर साथ-साथ बहने के बावजूद साफ़ अलग-अलग नज़र आते हैं, जैसे कि उनके बीच एक आड़ हो।
65: अनदेखी [ग़ैब] चीज़ों के बारे में अल्लाह अपने पैग़म्बरों को बता देता है, मगर उन्हें भी इन चीज़ों की पूरी जानकारी नहीं होती।
72: असल यातना तो परलोक में मिलेगी, मगर उसका कुछ हिस्सा दुनिया में भी मिलता है, सो कुछ ही साल बाद बद्र की लड़ाई में मक्का के बड़े-बड़े सरदार मारे गए और उनकी बुरी हार हुई।
73: उदारता यह है कि अल्लाह सज़ा देने में बहुत देर करता है और आदमी को काफ़ी समय देता है कि वह गुनाहों से तौबा कर ले।
82: अल्लाह एक अजीब जानवर पैदा करेगा, जो इंसानों से बात करेगा, कहा जाता है कि इसके तुरंत बाद क़यामत आ जाएगी, और तब गुनाहों से माफ़ी माँगने का अवसर भी ख़त्म हो जाएगा।
87: पहली बार जब नरसिंघा बजाया जाएगा तो क़यामत आ जाएगी और अल्लाह की पैदा की हुई हर चीज़ (कुछ को छोड़कर जिसे अल्लाह बचा ले) मर-मिट जाएगी, और फिर दूसरी बार बजने पर मरी हुई चीज़ ज़िंदा होकर उठ खड़ी होगी।
89: अल्लाह ने हर नेकी का इनाम दस गुना देने का वादा किया है।
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