Sunday, April 3, 2022

Surah/सूरह 38: साद [Saad]

 सूरह 38: साद [Saad]


यह एक मक्की सूरह है, ऐसा लगता है कि यह पिछली सूरह के क्रम में उतरी है क्योंकि यहाँ कुछ उन नबियों के बारे में ज़िक्र आया है जिनका पिछली सूरह में ज़िक्र नहीं था, जैसे दाऊद, सुलैमान, अय्यूब अलै. आदि। यहाँ मुहम्मद सल्ल. की मदद और हौसला बढ़ाने के लिए पिछले नबियों की कहानियाँ सुनायी गई हैं, और मक्का के विश्वास न करनेवालों का घमंड, पिछली पीढ़ियों के आचरण और असल आज्ञा न माननेवाले इबलीस [शैतान] के बीच एक स्पष्ट संबंध स्थापित किया गया है। बहुदेववादियों की फिर से यहाँ निंदा की गई है क्योंकि वे एक अल्लाह पर विश्वास नहीं करते, रसूल को कभी दीवाना, कभी जादूगर, कभी झूठा कहते हैं, और वे यह भी कहते हैं कि यह दुनिया बिना किसी मक़सद के बनायी गई है। पहली और आख़िरी आयत में क़ुरआन की सच्चाई और महानता पर ज़ोर डाला गया है।

 

 

विषय:

01-15: विश्वास न करने वालों ने रसूल की बातों को मानने से इंकार कर दिया 

16-28: दाऊद (अलै) का क़िस्सा और एक विवाद 

29   : यह किताब [क़ुरआन] एक वरदान है 

30-40: सुलैमान (अलै) की कहानी और घोड़े 

41-44: अय्यूब (अलै) [Job] की कहानी 

45-47: इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब अलै. 

48   : इस्माईल, अल-यस्सा' [Elisha], और ज़ुल-किफ़्ल

49-55: जन्नत की ख़ुशियाँ 

55-64: जहन्नम की पीड़ा [suffering] 

65-66: रसूल तो बस एक सावधान करनेवाले हैं 

67-85: इब्लीस [शैतान] की कहानी 

86-88: क़ुरआन का संदेश पहुँचाने के लिए रसूल कोई इनाम नहीं मांगता 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
साद।
क़सम है उस क़ुरआन की जो याद दिलाती रहती है (कि रसूल को झूठा जादूगर कहने का दावा बिल्कुल ग़लत है) (1)

मगर, (सच्चाई से) इंकार करने पर अ‍ड़े लोग-- अपनी बड़ाई के घमंड, ज़िद्द और दुश्मनी के भाव में डूबे हुए हैं। (2)

उन लोगों से पहले हम कितनी ही पीढ़ियों को मिटा चुके हैं! (मुसीबत देखकर) वे सभी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाये थे, मगर बचकर निकल जाने के लिए तब तक बहुत देर हो चुकी थी। (3)

उन (मक्का के) विश्वास न करने वालों को यह बात अजूबा लगी कि उन्हें सावधान करने के लिए एक रसूल उन्हीं के बीच का कैसे आ गया है: वे कहने लगे, "यह बड़ा झूठा जादूगर है। (4)

वह यह दावा कैसे कर सकता है कि सारे देवताओं के बदले केवल एक देवता [ख़ुदा] होता है? निस्संदेह यह तो बहुत अचम्भेवाली बात है!" (5)

और उनके सरदार यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि "चलो यहाँ से! और अपने देवताओं की आस्था में जमे रहो! निस्संदेह तुम सबको ऐसा ही करना चाहिए।  (6)

इस तरह की बात तो हमने पिछले [ईसाई] धर्म में भी नहीं सुनी: यह एक नयी बात है जो बस गढ़ ली गयी है।  (7)

क्या हम सबमें से (चुनकर) केवल इसी के पास अल्लाह का संदेश भेजा गया है?" नहीं! सच्चाई यह है कि उन्हें मेरी धमकियों पर संदेह है; असल में उन्होंने अभी तक मेरी यातना का मज़ा चखा ही नहीं है!  (8)

आपका रब जो बड़ी ताक़तवाला और बड़ा दाता है, क्या उसकी रहमत [दयालुता] के सारे ख़ज़ाने उन्हीं के पास हैं? (9)

या आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनके बीच है, उन सब चीज़ों पर क्या उन्हीं का क़ब्ज़ा है? (अगर है, तो) उन्हें रस्सियाँ बाँधकर ऊपर (आसमान में) चढ़ जाना चाहिए:  (10)

वह उनके गठबंधन वाली एक कमज़ोर सेना है, जो कुचल दी जाएगी। (11)

उनसे पहले नूह की क़ौम और आद और मज़बूती से जमे हुए फ़िरऔन के लोगों ने रसूलों को मानने से इंकार किया।  (12)

और समूद ने और लूत की क़ौम ने और 'ऐकावाले' [जंगल मे रहने वाले शुऐब के लोग] भी— इनमें से हर एक ने (रसूलों के) विरोध में गुट बनाए।  (13)
उन सभी ने रसूलों को (झूठा बताते हुए) मानने से इंकार कर दिया, और वे इसी लायक़ थे कि मेरी यातना उनपर टूट पड़े: (14)
और यह (मक्का के) विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] लोग भी बस एक धमाके के इंतज़ार में हैं, (समय आ जाने पर) जिसे टाला नहीं जा सकता है। (15)

वे कहते हैं, "ऐ हमारे रब! हिसाब के दिन [क़यामत] से पहले ही हमारे हिस्से की सज़ा हमें जल्दी से जल्दी दे दे! " (16)
वे जो कुछ कहते हैं, उस पर [ऐ रसूल] आप धीरज व सब्र से काम लें।

हमारे बन्दे दाऊद [David] को याद करें, जो बड़ा ताक़तवर आदमी था और बेशक वह  हमेशा (तौबा के लिए) हमारी ओर भक्ति-भाव से झुकता था। (17)

हमने पर्वतों को इस तरह उसके वश में कर दिया था कि सूरज के निकलते वक़्त और डूबते वक़्त (पर्वत भी) उसके साथ मिलकर हमारा गुणगान करते थे;  (18)

और चिड़ियाँ भी, जो झुंड की झुंड होती थीं, सब मिलकर (अल्लाह की) बड़ाई में आवाज़ से आवाज़ मिलाते थे। (19)

हमने उसकी सल्तनत को मज़बूती प्रदान की थी, उसे ज्ञान व समझ-बूझ दिया था और बात कहने का ऐसा अंदाज़ दिया था कि उनकी बातें निर्णायक होती थी। (20)

और क्या आपने उन दो विवाद करने वालों की कहानी सुनी है जब वे दीवार पर चढ़कर उस [दाऊद] के एकान्त कक्ष मे घुस आए थे?  (21)

जब वे दाऊद के पास पहुँचे, तो वह (अचानक उन्हें देखकर) घबरा गया, वे बोले, "डरिए नहीं, हम दो विवादी हैं। हममें से एक ने दूसरे पर ज़्यादती की है: तो अब आप हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दीजिए--- नाइंसाफ़ी मत कीजिए--- और हमें सही मार्ग दिखा दीजिए। (22)

यह मेरा भाई है। इसके पास निन्यानवे [99] भेड़ें हैं और मेरे पास एक ही भेड़ है। अब इसका कहना है कि ‘इसे भी मुझे सौंप दो’ और बातचीत में (यह इतना तेज़ है कि) इसने मुझे दबा लिया है।" (23)

दाऊद ने कहा, "इसने अपनी भेड़ों के झुंड में तेरी भेड़ को मिला लेने की माँग करके निश्चय ही तुझ पर ज़ुल्म किया है। साथ मिलकर काम करने वाले बहुत सारे लोग एक-दूसरे पर ज़्यादती करते हैं। हाँ, जो लोग ईमान के पक्के हैं और अच्छे कर्म करते हैं, वे ऐसा नहीं करते, मगर ऐसे लोग बहुत कम हैं।"

[तब ही] दाऊद को बात समझ में आ गयी कि असल में हम उसकी परीक्षा ले रहे थे। अतः उसने अपने रब से माफ़ी माँगी, घुटनों के बल गिर पड़ा और (गुनाहों से) तौबा की: (24)

तो हमने उसका (क़सूर) माफ़ कर दिया। इनाम में उसे यक़ीनन हमारी नज़दीकी हासिल होगी, जो रहने की बेहतरीन जगह है।  (25)

"ऐ दाऊद! हमने धरती पर तुम्हें मालिक [ख़लीफ़ा/ उत्तराधिकारी] बनाया है। अतः लोगों के बीच तुम इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करना। अपनी इच्छाओं के पीछे मत भागते चलना, कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हें अल्लाह के मार्ग से भटका दे: याद रखो, जो लोग उसके मार्ग से भटक जाते हैं, निश्चय ही उनके लिए दर्दनाक यातना होगी क्योंकि वे हिसाब के दिन [क़यामत] को भुला बैठते हैं।”  (26)

हमने आसमान व ज़मीन और उनके बीच की हर एक चीज़ को, यूँ ही बिना मक़सद के नहीं पैदा कर दिया है। हाँ, भले ही (सच्चाई से) इंकार करने वाले [काफ़िर] ऐसा मान सकते हैं ---ओह! (जहन्नम की) आग में कैसी दुर्गति होगी उनकी!----  (27)

मगर, जो ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, क्या हम उनके साथ ठीक वैसा ही सलूक करेंगे जैसा कि उन लोगों के साथ जो धरती पर बिगाड़ पैदा करते हैं? वे जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, और वे जो बेधड़क सारी सीमाओं को तोड़ डालते हैं—--- हम क्या दोनों के साथ एक समान सलूक करेंगे?  (28)

यह किताब [क़ुरआन] एक वरदान है जो [ऐ रसूल!] आप पर उतारी गयी है, ताकि लोग इसके संदेशों पर सोच-विचार कर सकें और समझदार लोग इसे ध्यान से सुनें और उस पर अमल करें। (29)
और हमने दाऊद को सुलैमान [Solomon] (जैसा बेटा) दिया। वह बहुत अच्छा बन्दा था और हमेशा ही (तौबा के लिए) अल्लाह के सामने झुकता था। (30)

(ऐसा हुआ कि) जब दिन ढलने के समय उसके सामने अच्छी नस्ल के, तेज़ दौड़नेवाले उम्दा घोड़ों की परेड करायी गयी, (31)

तो वह (देखकर) कहता जाता, "मेरा इन उम्दा चीज़ों के प्रति लगाव, असल में अपने रब को याद करने का एक ज़रिया है!" यहाँ तक कि वे (घोड़े) नज़रों से ओझल हो गए---- (32)

"उन्हें मेरे पास वापस लाओ!" (सुलैमान ने कहा), फिर वह उनकी टांगों और गर्दनों पर हाथ फेरने लगा। (33)

निश्चय ही हमने सुलैमान को भी परीक्षा में डाला, और हमने उसे (इतना कमज़ोर कर दिया कि वह) अपने तख़्त पर एक ढाँचा मात्र रह गया था। (34)

फिर वह मेरी ओर (तौबा के लिए) झुका, और उसने दुआ की: "ऐ मेरे रब, मुझे माफ़ कर दे! और मुझे ऐसी सल्तनत अता कर कि मेरे बाद फिर किसी की ऐसी हुकूमत न हो---- इसमें शक नहीं कि तू सबसे ज़्यादा दिल खोलकर देने वाला है।" (35)

तब हमने हवा को उसके वश में कर दिया, इस तरह जहाँ कहीं भी वह जाना चाहता, हवा उसकी इच्छा के अनुसार हौले-हौले चला करती थी। (36)
 
और जिन्नों (व शैतानों) को भी (उसके वश में कर दिया)----- जिनमें हर तरह के निर्माण करने वाले और ग़ोताख़ोर थे,  (37)

और कुछ दूसरे (जिन्नात) भी थे जो ज़ंजीरों में जकड़े हुए रहते थे।  (38)

"यह हमारी तरफ़ से तोहफ़ा है, अब तुम्हारी मर्ज़ी--- चाहो तो इसमें से कुछ दो या अपने पास रखो! इस पर कोई हिसाब-किताब नहीं होगा।" (39)

और इनाम में उसे यक़ीनन हमारी नज़दीकी हासिल होगी, जो रहने की बेहतरीन जगह है।  (40)
हमारे बन्दे अय्यूब [Job] को याद करो, जब उसने अपने रब को (मुसीबत में) पुकारा था, "शैतान ने मुझे दुख और पीड़ा पहुँचा रखी है।" (41)

(हमने बताया) "अपना पाँव (ज़मीन पर) मारो! देखो, यह है ठंडा पानी— नहाने-धोने और पीने के लिए," (42)

और (इस तरह) हमने उसे उसके परिवारवालों से दोबारा मिला दिया, और साथ में उनके जैसे और लोगों को भी: यह एक निशानी थी हमारी रहमत [दयालुता] की और सबक़ था उन लोगों के लिए जो समझ-बूझ रखते हैं। (43)

(हमने उससे कहा) "और अपने हाथ में तिनकों का एक छोटा मुट्ठा लो और उससे (अपनी पत्नी को) मार लो और अपनी क़सम मत तोड़ो।" हमने उसे बुरे वक़्तों में भी बड़ा धैर्य व सब्र करने वाला पाया, क्या ही अच्छा बंदा था वह! निस्संदेह वह भी हमेशा अल्लाह के सामने (तौबा के लिए) झुकने वाला था। (44)

हमारे बंदों में इबराहीम [Abraham], इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] को भी याद करो, यह सभी (नेक अमल की) ताक़त और (सूझ-बूझ की) नज़र रखते थे। (45)

हमने उन्हें दिल से (परलोक के) आख़िरी घर की याद करनेवाला बनाया था, जो हम पर पूरी भक्ति-भाव से समर्पित थे: (46)

निश्चय ही हमारे यहाँ, वे चुने हुए, बेहतरीन लोगों में से होंगे।  (47)

हमारे बंदों में इस्माईल [Ishmael], अल-यसा’ [Elisha] और ज़ुलकिफ़्ल [Dhu’l-Kifl] को भी याद करो, इनमें से सभी बेहतरीन लोगों में से थे।  (48)

यह एक नसीहत से भरा संदेश है। बेशक जो अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते हैं, उनके लिए (जन्नत में) लौटकर जाने का अच्छा ठिकाना होगा: (49)

हमेशा रहने के बाग़, जिनके दरवाज़े उनके लिए खुले होंगे।  (50)

उनमें वे (आराम से) तकिया लगाए हुए बैठे होंगे; वे बहुत-से फल-मेवे और पीने की चीज़ें मँगवाते होंगे; (51)

और उनके पास निगाहें नीची रखनेवाली, बराबर उम्र की औरतें [हूरें] होंगी।  (52)
 
 
हिसाब-किताब के दिन [क़यामत] के लिए यही वह (नेमतों से भरी) चीज़ है, जिसका तुमसे वादा किया जाता है।  (53)

बेशक यह हमारी दी हुई चीज़ है, जो कभी ख़त्म नहीं होगी।  (54)


मगर शैतानी करने वालों का आख़िरी ठिकाना बहुत ही बुरा होगा:  (55)

वह जहन्नम जिसमें वे जलेंगे, रहने के लिए क्या ही बुरा ठिकाना है--- यह सब उनके लिए होगा:   (56)

उन्हें इसका मज़ा चखने दो --- खौलता हुआ, गाढ़ा, पीप मिला हुआ पानी, (57)
 
और इसी तरह की दूसरी और यातनाएं। (58)

(उनके नेताओं से कहा जाएगा), "यह लोगों का एक और बड़ा दल है जो तुम्हारे पास दौड़ा चला आ रहा है।” (जवाब मिलेगा), “उनके लिए कोई आवभगत (की ज़रूरत) नहीं! वे तो आग में जलने वाले हैं।" (59)

वे (नेता) उनसे कहेंगे, "तुम्हारा यहाँ कोई स्वागत नहीं होगा! तुम्हीं तो हो, जो यह (मुसीबत) हमारे ऊपर लेकर आए हो, रहने के लिए बहुत ही बुरा ठिकाना (दुखदायी अंत) है," (60)
आगे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! जो हमारे ऊपर यह (मुसीबत) लाया है उसे दोहरी सज़ा दे!" (61)

और वे कहेंगे, "क्या बात है कि वे (मुस्लिम) लोग यहाँ दिखायी नहीं देते जिन्हें हम बुरा समझते थे, (62)

और जिनका हम मज़ाक़ बनाते थे? क्या हमारी नज़रें उन्हें देखने में चूक गई हैं?" (63)
हक़ीक़त में बिल्कुल ऐसा ही होगा: (जहन्नम की) आग में रहने वाले एक दूसरे पर इसी तरह इल्ज़ाम लगाएंगे। (64)
[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं तो बस यहाँ चेतावनी देने के लिए हूँ। उस एक अल्लाह के सिवा कोई (ख़ुदा) इबादत के लायक़ नहीं, ताक़त में वह सबसे बड़ा है; (65)

वह आसमानों और ज़मीन का, और हर चीज़ जो इन दोनों के बीच है उन सबका मालिक है, सारी चीज़ उसके क़ब्ज़े में है, और वह बहुत माफ़ करनेवाला है।" (66)

कह दें, "यह एक ज़बरदस्त संदेश [क़ुरआन] है, (67)

इसके बावजूद तुम इस पर ध्यान नहीं देते हो।  (68)

मुझे ऊपर (फ़रिश्तों) की दुनिया की कोई जानकारी नहीं कि वे आपस में किस मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे: (69)

मुझे तो 'वही' [revelation] के द्वारा बस यही बताया गया है, मेरा काम यहाँ साफ़ व खुले तौर पर चेतावनी देना है।" (70)
याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि "मैं मिट्टी से एक आदमी पैदा करने वाला हूँ,  (71)

तो जब मैं उसको पूरी तरह ठीक-ठाक कर दूँ औऱ उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो उसके आगे सज्दे में झुक जाना।" (72)

तो सभी फ़रिश्तों ने एक साथ झुककर सज्दा किया, (73)

मगर इबलीस ने (सज्दा) नहीं किया, जो कुछ ज़्यादा ही घमंडी था। वह इंकार करके बाग़ी हो गया।  (74)

अल्लाह ने कहा, "ऐ इबलीस! तूझे किस चीज़ ने उस आदमी के सामने झुकने से रोक दिया जिसे मैंने ख़ुद अपने हाथों से बनाया है? क्या तू अपने आपको महान या कोई ऊँची हस्ती समझता है?" (75)

इबलीस ने कहा, "मैं उस (आदमी) से अच्छा हूँ: तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से।" (76)

(अल्लाह ने कहा), "निकल जा यहाँ से! तू (फ़रिश्तों के दल से) दुत्कार दिया गया है:  (77)

और फ़ैसले के दिन [क़यामत] तक तुझ पर मेरी लानत बनी रहेगी!" (78)

मगर इबलीस ने कहा, "ऐ मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए (जीने की) मुहलत दे, जबकि लोग (ज़िंदा करके) उठाए जाएँगे," (79)

अल्लाह ने कहा, "ठीक है, जा तुझे मुहलत दी, (80)

एक तय दिन व ज्ञात समय तक (कि तू ज़िंदा भी रहेगा और तुझे दंड भी नहीं दिया जाएगा)।" (81)

इबलीस ने कहा, "तेरी इज़्ज़त की क़सम! मैं उन सबको बहकाता रहूँगा, (82)

बस तेरे उन सच्चे व अच्छे बन्दों को छोड़कर।" (83)

कहा अल्लाह ने, "यह सच्चाई है --- और मैं तो सच ही बोलता हूँ--- (84)

कि मैं जहन्नम को तुझसे और उन सबसे भर दूँगा, जो तेरे बताए हुए रास्ते पर चलेंगे।" (85)

[ऐ रसूल] आप कह दें, "मैं इस (संदेश को पहुँचाने) के लिए तुमसे कोई इनाम नहीं माँगता, और न मैं अपने बारे में ऐसा कोई दावा करता हूँ, जो मैं नहीं हूँ": (86)

यह [क़ुरआन] तो सारे लोगों के लिए चेतावनी मात्र है, (87)
और थोड़ी ही अवधि के बाद तुम्हें इस सच्चाई का पता चल जाएगा।  (88)





नोट:

1-4: बुतपरस्तों की यह माँग थी कि अल्लाह का संदेश लेकर कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया, हमारे जैसा आदमी क्यों लाया है, और अगर आदमी को ही रसूल होना था तो इतने सारे लोगों में मुहम्मद ही क्यों चुने गए? (देखें 43:31-32). इस तरह, यहाँ क़ुरआन की क़सम खाकर इस बात की पुष्टि की गई है कि मुहम्मद (सल्ल) अल्लाह के रसूल हैं, और बुतपरस्तों के इस दावे में कि मुहम्मद (सल्ल) एक झूठे जादूगर हैं, कोई दम नहीं है, साथ में रसूल को प्रोत्साहित किया गया है कि वह इन बातों पर धीरज धरें।

6: उनके कहने का मतलब यह था कि असल में मुहम्मद (सल्ल) को उनके मार्गदर्शन से कोई लेना देना नहीं है, बल्कि वह उन पर अपना वर्चस्व बनाना चाहते हैं।

7: यहाँ ईसाइयों की "तीन में से एक ख़ुदा" [Christian Trinity] वाली मान्यता की तरफ़ शायद इशारा है या यह अरब पुतपरस्तों की कोई मानयता हो सकती है। 


8: असल में उन्हें मुहम्मद (सल्ल) की ईमानदारी पर शक नहीं था, बल्कि क़ुरआन की सच्चाई पर ही संदेह था। यह आयत 6:33 से मिलती-जुलती है। 

 

10: आसमान पर रस्सी से चढ़ने की बात सूरह हज्ज (22: 15) में भी है। 

 

11: जैसा कि मक्का के बुतपरस्तों की बाद में बद्र की लड़ाई में होने वाली हार से ज़ाहिर हो गया कि उनकी सेना कुचल दी गई।


12: यानी 'पिरामिड" और "Obelisks"

 

19: पहाड़ों और चिड़ियों द्वारा अल्लाह के गुणगान करने का वर्णन सूरह अंबिया (21: 79) में भी आया है।

 

24: वह कौन सी भूल थी जो हज़रत दाऊद से हो गई थीइसके बारे में कई तरह की बातें बतायी गयी हैं। कुछ के अनुसारदो वादी जब अपने केस का फ़ैसला कराने उनके घर में घुस आएतो हज़रत दाऊद ने बिना दूसरे वादी का पक्ष सुने हुए फ़ैसला कर दियाशायद इसी ग़लती का उन्हें एहसास हुआ और उन्होंने अल्लाह से माफ़ी माँगी। बहरहालयह साफ़ नहीं है कि उनसे क्या ग़लती हो गई थीमगर असल बात यह है कि उन्होंने इशारे को तुरंत समझ लिया और तौबा कर ली। 

मगर कुछ लोग इस घटना को बाइबल (सैमुयेल) में बतायी गई बात (12: 1--5) से जोड़ते हैंइसके अनुसार उस ज़माने के रिवाज के मुताबिक़ हज़रत दाऊद की कई बीवियाँ थींमगर उनका दिल उनके एक फ़ौजी उरियह [Uriah] की बीवी बाथशीबा [Bathsheba] पर आ गया थाउन्होंने उरियह को एक मोर्चे पर लड़ने के लिए भेज दिया जहाँ वह मारा गयाऔर उन्होंने उसकी एकलौती बीवी से शादी कर ली। जब 99 भेड़ के साथ एक और भेड़ लेने की बात सामने आयीतो हज़रत दाऊद इसका इशारा समझ गएउन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआऔर उन्होंने अल्लाह से माफ़ी माँगी। ज़्यादातर मुस्लिम विद्वान इस कहानी को सही नहीं मानते क्योंकि ऐसी बातें एक पैग़म्बर के चरित्र में नहीं हो सकती। 

 

33: पहले ज़माने में युद्ध में लड़ने वाले घोड़ों की अक्सर परेड करायी जाती थी ताकि देखा जा सके कि वे लड़ने के लिए चुस्त और तैयार हैं कि नहीं। हज़रत सुलैमान (अलै.) को घोड़े इतने पसंद आए कि परेड ख़त्म हो जाने के बाद उन्होंने दोबारा घोड़ों को बुलाया। 

कुछ लोगों ने यह भी मतलब बताया है कि वह घोड़ों को देखने में ऐसे मगन हुए कि शाम की इबादत करना भूल गएफिर उन्हें एहसास हुआ तो फिर इबादत की, और घोड़ों को वापस बुलाकर उन्हें तलवार से मार डाला कि उनकी वजह से वह इबादत करना भूल गए थे। मगर इस बात में कोई पक्का सबूत नहीं मिलता।

 

34: एक दूसरा मतलब यह बताया गया है कि उनके सिंहासन पर एक धड़ लाकर डाल दिया गया था। यहूदी परंपरा में एक बात यह भी कही जाती है कि चूँकि सुलैमान (अलै.) की एक बीवी बुतों की पूजा करने लगी थी और उसे वह रोक न पाएइसलिए अल्लाह ने दंड के रूप में उनकी शक्ल के एक जिन्न को कुछ दिनों के लिए उनकी गद्दी पर बैठा दिया था। 

 

36: इसका वर्णन सूरह अंबिया (21: 81) में भी आया है। 


37: जिन्न पानी में ग़ोता लगाकर उसमें से राजा के लिए मोतियाँ निकाला करते थे। 

 

38: उनकी सेवा में जिन्नात लगे रहते थेइसका ज़िक्र सूरह सबा में भी आया हैयहाँ यह भी बताया गया है कि वे ग़ोता लगाकर समंदर से मोतीमूँगा आदि भी निकालते थे। कुछ जिन्न जो बहुत ही दुष्ट थेउन्हें ज़ंज़ीरों में जकड़ कर रखा जाता है। 

 

41: जैसा कि सूरह अंबिया (21: 83-84) में है कि उन्हें एक लम्बी बीमारी हुई थीऔर वह पूरे सब्र के साथ अल्लाह से स्वास्थ्य की दुआ करते रहे थे।

 

42: ज़मीन पर पाँव मारने से जो सोता फूटा थाउसी पानी को पीने और नहाने से उन्हें स्वास्थ्य मिला था।

 

44: जब हज़रत अय्यूब लम्बी बीमारी में पड़े थे तो शैतान हकीम बनकर उनके यहाँ आया और उनकी बीवी से कहा कि मैं उन्हें भला-चंगा कर सकता हूँजब वह ठीक हो जाएं तो बस तुम्हें यह कहना होगा कि मैंने उन्हें ठीक कर दिया है। इस बात का ज़िक्र जब उनकी बीवी ने अय्यूब (अलै.) से कियातो वह ग़ुस्सा हुए कि उनकी बीवी शैतान की बातों में कैसे आ गई! उन्होंने क़सम खा ली कि अगर मैं ठीक हुआतो अपनी बीवी को 100 कोड़े मारूँगा। मगर जब वह ठीक हो गए तो उन्हें शर्म आयी कि जिस बीवी ने उनकी सेवा ऐसी बीमारी की हालत में की थीउसको कोड़ा कैसे मारूँ, इस दुविधा का आसान हल अल्लाह ने उन्हें बताया है जिससे उनकी क़सम भी पूरी हो जाए और बीवी को चोट भी नहीं आएगी। 

 

48: हज़रत अल-यसा (अलै.) का नाम क़ुरअन में केवल दो जगह पर आया हैएक यहाँ परऔर दूसरा सूरह अनाम (6: 86) में। यह भी इसराइल की संतानों के बीच नबी बनाए गए थे और हज़रत इल्यास अलै. के चचेरे भाई थे। इनका ज़िक्र बाइबल में भी आया है।

ज़ुल-किफ़्ल अलै. का ज़िक्र सूरह अंबिया (21: 85) में भी आया है। जो लोग उन्हें नबी मानते हैं वह उन्हें बाइबिल के पैग़म्बरों जैसे Ezekiel, Isaiah या Obadiah से जोड़ते हैं। कुछ उन्हें अल-यसा अलै. का ख़लीफ़ा बताते हैंऔर कुछ लोग उन्हें नबी नहीं बल्कि अल्लाह का वली मानते हैं।

 

69: यहाँ फ़रिश्तों की उस चर्चा की तरफ़ इशारा है जो हज़रत आदम को पहली बार बनाते समय हुई थी जिसे सूरह बक़रा (2: 31) में बताया गया है।


74: शैतान को आदम के सामने झुकने का आदेश असल में उसकी परीक्षा लेने के लिए था कि वह आज्ञा मानता है कि नहीं, मगर शैतान ने घमंड में चूर होकर उस आदेश को इसलिए नहीं माना कि वह आदम से बढ़कर था।  

 

81: इस घटना का वर्णन सूरह बक़रा (2: 31--36) में आया है। शैतान को एक नियत समय तक मुहलत दी गई हैअत: जब नरसिंघे में पहली बार फूँक मारी जाएगी तो सारे जीवधारी मर जाएंगेसाथ में शैतान भी मर जाएगा। 

 

 

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