सूरह 38: साद [Saad]
यह एक मक्की सूरह है, ऐसा लगता है कि यह पिछली सूरह के क्रम में उतरी है क्योंकि यहाँ कुछ उन नबियों के बारे में ज़िक्र आया है जिनका पिछली सूरह में ज़िक्र नहीं था, जैसे दाऊद, सुलैमान, अय्यूब अलै. आदि। यहाँ मुहम्मद सल्ल. की मदद और हौसला बढ़ाने के लिए पिछले नबियों की कहानियाँ सुनायी गई हैं, और मक्का के विश्वास न करनेवालों का घमंड, पिछली पीढ़ियों के आचरण और असल आज्ञा न माननेवाले इबलीस [शैतान] के बीच एक स्पष्ट संबंध स्थापित किया गया है। बहुदेववादियों की फिर से यहाँ निंदा की गई है क्योंकि वे एक अल्लाह पर विश्वास नहीं करते, रसूल को कभी दीवाना, कभी जादूगर, कभी झूठा कहते हैं, और वे यह भी कहते हैं कि यह दुनिया बिना किसी मक़सद के बनायी गई है। पहली और आख़िरी आयत में क़ुरआन की सच्चाई और महानता पर ज़ोर डाला गया है।
01-15: विश्वास न करने वालों ने रसूल की बातों को मानने से इंकार कर दिया
16-28: दाऊद (अलै) का क़िस्सा और एक विवाद
29 : यह किताब [क़ुरआन] एक वरदान है
30-40: सुलैमान (अलै) की कहानी और घोड़े
41-44: अय्यूब (अलै) [Job] की कहानी
45-47: इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब अलै.
48 : इस्माईल, अल-यस्सा' [Elisha], और ज़ुल-किफ़्ल
49-55: जन्नत की ख़ुशियाँ
55-64: जहन्नम की पीड़ा [suffering]
65-66: रसूल तो बस एक सावधान करनेवाले हैं
67-85: इब्लीस [शैतान] की कहानी
86-88: क़ुरआन का संदेश पहुँचाने के लिए रसूल कोई इनाम नहीं मांगता
7: यहाँ ईसाइयों की "तीन में से एक ख़ुदा" [Christian Trinity] वाली मान्यता की तरफ़ शायद इशारा है या यह अरब पुतपरस्तों की कोई मानयता हो सकती है।
8: असल में उन्हें मुहम्मद (सल्ल) की ईमानदारी पर शक नहीं था, बल्कि क़ुरआन की सच्चाई पर ही संदेह था। यह आयत 6:33 से मिलती-जुलती है।
10: आसमान पर रस्सी से चढ़ने की बात सूरह हज्ज (22: 15) में भी है।
11: जैसा कि मक्का के बुतपरस्तों की बाद में बद्र की लड़ाई में होने वाली हार से ज़ाहिर हो गया कि उनकी सेना कुचल दी गई।
12: यानी 'पिरामिड" और "Obelisks"
19: पहाड़ों और चिड़ियों द्वारा अल्लाह के गुणगान करने का वर्णन सूरह अंबिया (21: 79) में भी आया है।
24: वह कौन सी भूल थी जो हज़रत दाऊद से हो गई थी, इसके बारे में कई तरह की बातें बतायी गयी हैं। कुछ के अनुसार, दो वादी जब अपने केस का फ़ैसला कराने उनके घर में घुस आए, तो हज़रत दाऊद ने बिना दूसरे वादी का पक्ष सुने हुए फ़ैसला कर दिया, शायद इसी ग़लती का उन्हें एहसास हुआ और उन्होंने अल्लाह से माफ़ी माँगी। बहरहाल, यह साफ़ नहीं है कि उनसे क्या ग़लती हो गई थी, मगर असल बात यह है कि उन्होंने इशारे को तुरंत समझ लिया और तौबा कर ली।
मगर कुछ लोग इस घटना को बाइबल (2 सैमुयेल) में बतायी गई बात (12: 1--5) से जोड़ते हैं, इसके अनुसार उस ज़माने के रिवाज के मुताबिक़ हज़रत दाऊद की कई बीवियाँ थीं, मगर उनका दिल उनके एक फ़ौजी उरियह [Uriah] की बीवी बाथशीबा [Bathsheba] पर आ गया था, उन्होंने उरियह को एक मोर्चे पर लड़ने के लिए भेज दिया जहाँ वह मारा गया, और उन्होंने उसकी एकलौती बीवी से शादी कर ली। जब 99 भेड़ के साथ एक और भेड़ लेने की बात सामने आयी, तो हज़रत दाऊद इसका इशारा समझ गए, उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ, और उन्होंने अल्लाह से माफ़ी माँगी। ज़्यादातर मुस्लिम विद्वान इस कहानी को सही नहीं मानते क्योंकि ऐसी बातें एक पैग़म्बर के चरित्र में नहीं हो सकती।
33: पहले ज़माने में युद्ध में लड़ने वाले घोड़ों की अक्सर परेड करायी जाती थी ताकि देखा जा सके कि वे लड़ने के लिए चुस्त और तैयार हैं कि नहीं। हज़रत सुलैमान (अलै.) को घोड़े इतने पसंद आए कि परेड ख़त्म हो जाने के बाद उन्होंने दोबारा घोड़ों को बुलाया।
कुछ लोगों ने यह भी मतलब बताया है कि वह घोड़ों को देखने में ऐसे मगन हुए कि शाम की इबादत करना भूल गए, फिर उन्हें एहसास हुआ तो फिर इबादत की, और घोड़ों को वापस बुलाकर उन्हें तलवार से मार डाला कि उनकी वजह से वह इबादत करना भूल गए थे। मगर इस बात में कोई पक्का सबूत नहीं मिलता।
34: एक दूसरा मतलब यह बताया गया है कि उनके सिंहासन पर एक धड़ लाकर डाल दिया गया था। यहूदी परंपरा में एक बात यह भी कही जाती है कि चूँकि सुलैमान (अलै.) की एक बीवी बुतों की पूजा करने लगी थी और उसे वह रोक न पाए, इसलिए अल्लाह ने दंड के रूप में उनकी शक्ल के एक जिन्न को कुछ दिनों के लिए उनकी गद्दी पर बैठा दिया था।
36: इसका वर्णन सूरह अंबिया (21: 81) में भी आया है।
37: जिन्न पानी में ग़ोता लगाकर उसमें से राजा के लिए मोतियाँ निकाला करते थे।
38: उनकी सेवा में जिन्नात लगे रहते थे, इसका ज़िक्र सूरह सबा में भी आया है, यहाँ यह भी बताया गया है कि वे ग़ोता लगाकर समंदर से मोती, मूँगा आदि भी निकालते थे। कुछ जिन्न जो बहुत ही दुष्ट थे, उन्हें ज़ंज़ीरों में जकड़ कर रखा जाता है।
41: जैसा कि सूरह अंबिया (21: 83-84) में है कि उन्हें एक लम्बी बीमारी हुई थी, और वह पूरे सब्र के साथ अल्लाह से स्वास्थ्य की दुआ करते रहे थे।
42: ज़मीन पर पाँव मारने से जो सोता फूटा था, उसी पानी को पीने और नहाने से उन्हें स्वास्थ्य मिला था।
44: जब हज़रत अय्यूब लम्बी बीमारी में पड़े थे तो शैतान हकीम बनकर उनके यहाँ आया और उनकी बीवी से कहा कि मैं उन्हें भला-चंगा कर सकता हूँ, जब वह ठीक हो जाएं तो बस तुम्हें यह कहना होगा कि मैंने उन्हें ठीक कर दिया है। इस बात का ज़िक्र जब उनकी बीवी ने अय्यूब (अलै.) से किया, तो वह ग़ुस्सा हुए कि उनकी बीवी शैतान की बातों में कैसे आ गई! उन्होंने क़सम खा ली कि अगर मैं ठीक हुआ, तो अपनी बीवी को 100 कोड़े मारूँगा। मगर जब वह ठीक हो गए तो उन्हें शर्म आयी कि जिस बीवी ने उनकी सेवा ऐसी बीमारी की हालत में की थी, उसको कोड़ा कैसे मारूँ, इस दुविधा का आसान हल अल्लाह ने उन्हें बताया है जिससे उनकी क़सम भी पूरी हो जाए और बीवी को चोट भी नहीं आएगी।
48: हज़रत अल-यसा (अलै.) का नाम क़ुरअन में केवल दो जगह पर आया है, एक यहाँ पर, और दूसरा सूरह अनाम (6: 86) में। यह भी इसराइल की संतानों के बीच नबी बनाए गए थे और हज़रत इल्यास अलै. के चचेरे भाई थे। इनका ज़िक्र बाइबल में भी आया है।
ज़ुल-किफ़्ल अलै. का ज़िक्र सूरह अंबिया (21: 85) में भी आया है। जो लोग उन्हें नबी मानते हैं वह उन्हें बाइबिल के पैग़म्बरों जैसे Ezekiel, Isaiah या Obadiah से जोड़ते हैं। कुछ उन्हें अल-यसा अलै. का ख़लीफ़ा बताते हैं, और कुछ लोग उन्हें नबी नहीं बल्कि अल्लाह का वली मानते हैं।
69: यहाँ फ़रिश्तों की उस चर्चा की तरफ़ इशारा है जो हज़रत आदम को पहली बार बनाते समय हुई थी जिसे सूरह बक़रा (2: 31) में बताया गया है।
74: शैतान को आदम के सामने झुकने का आदेश असल में उसकी परीक्षा लेने के लिए था कि वह आज्ञा मानता है कि नहीं, मगर शैतान ने घमंड में चूर होकर उस आदेश को इसलिए नहीं माना कि वह आदम से बढ़कर था।
81: इस घटना का वर्णन सूरह बक़रा (2: 31--36) में आया है। शैतान को एक नियत समय तक मुहलत दी गई है, अत: जब नरसिंघे में पहली बार फूँक मारी जाएगी तो सारे जीवधारी मर जाएंगे, साथ में शैतान भी मर जाएगा।
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