सूरह 39: अज़-ज़ुमर
[लोगों के समूह / The Throngs]
यह एक मक्की सूरह है
जिसका नाम आख़िरी की आयतों में आए उस ज़िक्र पर पड़ा है जिसमें बताया गया है कि फ़ैसले
के दिन लोग एक के बाद एक समूहों में जन्नत और जहन्नम में जा रहे होंगे। इस
सूरह का केंद्रीय विषय दो तरह के लोगों के बीच तुलना करना है: एक तरफ़ तो जो सच्चे
व पक्के ईमान रखने वाले हैं, और दूसरी तरफ़ वे लोग
हैं जो अल्लाह के साथ उसकी ख़ुदाई में "साझेदार"
[Partner] ठहराते हैं। इस सूरह में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि
लोगों को अच्छाई व बुराई का रास्ता चुनने का पूरा अधिकार है, चाहे तो वे सच्चाई पर विश्वास कर लें या विश्वास न करें (आयत 41), मगर इस बात पर बहुत ज़ोर डाला गया है कि वह सीधे व सही रास्ते पर चलना शुरू
कर दें, और समय रहते अपनी ग़लतियों को मानते हुए गुनाहों से
तौबा कर लें (53-61).
विषय:
01-02: यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है
03-04: अल्लाह एक है
05-07: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
08-20: सच्चाई पर पक्का विश्वास और उसका इनाम
21: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ
22: विश्वास रखनेवाले और विश्वास न रखनेवाले दोनों बराबर नहीं
23: एक किताब जो सही रास्ता दिखाने वाली है
24-26: ईमानवाले और ईमान न रखनेवाले की तुलना
27-29: कई ख़ुदाओं को माननेवाले की मिसाल कई मालिक वाले ग़ुलाम से
30-37: अल्लाह फ़ैसला करेगा
38-40: सिर्फ़ अल्लाह पर ही भरोसा करना चाहिए
41 : अल्लाह के संदेश को मानने या ठुकराने के लिए हर आदमी ज़िम्मेदार है
42 : अल्लाह ही मौत देता है
43-44: सिफ़ारिश अल्लाह के अधिकार में है
45-48: अल्लाह फ़ैसला करेगा
49-52: ख़ुशहाली और बदहाली दोनों आज़माइश हैं
53-59: गुनाहों से तौबा करना
60-63: अल्लाह फ़ैसला करेगा
64-66: रसूल को केवल अल्लाह की बंदगी करना
67-75: क़यामत के दिन फ़ैसले का दृश्य
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
इस किताब [क़ुरआन] को अल्लाह की तरफ़ से उतारा जा रहा है, जो बहुत प्रभुत्वशाली, बड़ी समझ-बूझ रखने वाला है। (1)
[ऐ रसूल!], यह हम हैं, जिसने यह किताब पूरी सच्चाई के साथ आपकी ओर उतारी है, इसलिए पूरी भक्ति के साथ केवल अल्लाह की ही इबादत [उपासना] करें: (2)
(याद रहे), सच्ची भक्ति तो केवल अल्लाह के लिए होती है। (रहे वे लोग) जिन्होंने उस [अल्लाह] को छोड़कर दूसरे (देवताओं को) अपना संरक्षक [Protector/Guardian] बना रखा है, (वे बातें बनाते हुए) कहते हैं, "हम तो केवल उनकी पूजा इसीलिए करते हैं कि वे हमें अल्लाह से और ज़्यादा नज़दीक ले आते हैं" --- उनके बीच (क़यामत के दिन) अल्लाह उन बातों का ख़ुद ही फ़ैसला कर देगा जिनमें वे (सच्चाई से) मतभेद रखते हैं। अल्लाह उसे मार्ग नहीं दिखाता जो कभी शुक्र अदा नहीं करता हो और बड़ा झूठा हो। (3)
अगर अल्लाह अपने लिए कोई सन्तान चाहता तो वह अपने पैदा किए हुए में से किसी को भी चुन सकता था, लेकिन वह इस चीज़ से (कि उसकी संतान हो) कहीं महान व ऊँचा है! वह अल्लाह है, अकेला, सब पर क़ाबू रखनेवाला, (4)
उसने आसमानों और ज़मीन को सही मक़सद के साथ पैदा किया; वह रात को दिन पर लपेटता जाता है और दिन को रात पर लपेटता जाता है; उसने सूरज और चाँद को (एक व्यवस्था के अंदर) काम पर लगा रखा है, हर एक नियत समय तक (अपने बने हुए रास्ते पर) चल रहा है। सचमुच वह बहुत प्रभुत्वशाली, बड़ा माफ़ करनेवाला है। (5)
उसने तुम सबको अकेली जान [आदम/Adam] से पैदा किया; फिर उसी से उसका जोड़ा बनाया और तुम्हारे लिए चार तरह के मवेशियों के जोड़े [ऊँट, गाय, भेड़ और बकरी] पैदा कर दिए। वह तुम्हें तुम्हारी माँओं के पेट में इस तरह बनाता है कि तीन क़िस्म के अँधेरे पर्दों के भीतर तुम बनावट के एक चरण के बाद दूसरे चरण से गुज़रते हो। ऐसा है अल्लाह, तुम्हारा रब! सारी बादशाही [control] उसी की है, उसके सिवा कोई इबादत के योग्य नहीं। फिर (भी) तुम अपना मुँह कैसे मोड़ सकते हो? (6)
यदि तुम विश्वास नहीं करते (और शुक्र अदा नहीं करते), तो याद रखो अल्लाह को तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है, तब भी वह अपने बन्दों में (इंकार और) नाशुक्री को पसन्द नहीं करता; हाँ अगर तुम शुक्र अदा करते हो, तो वह [अल्लाह] उसे तुम्हारे अंदर देखकर ख़ुश होता है। कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे (के गुनाहों का) बोझ नहीं उठाएगा। फिर अंत में तुम सबको लौटकर (हिसाब-किताब के लिए) अपने रब के पास ही जाना है और (उस वक़्त) वह तुम्हें बता देगा, जो कुछ तुम (दुनिया में) किया करते थे: वह दिलों (के अंदर छुपी) हुई बातें (तक) अच्छी तरह जानता है। (7)
जब आदमी पर कोई मुसीबत पड़ती है तो वह पूरे दिल से अपने रब की तरफ़ झुकता है और उसे (मदद के लिए) पुकारने लगता है, फिर जब (अल्लाह) उस पर अपनी अनुकम्पा [favour] कर देता है, तो वह उसको भूल जाता है जिसे पहले पुकार रहा था और (दूसरे देवताओं को) अल्लाह के बराबर का ठहराने लगता है, जिसके नतीजे में वह दूसरे लोगों को भी उसके (सही) मार्ग से भटका देता है। कह दें, "तुम (सच्चाई से) इंकार करने का मज़ा थोड़े दिन और उठा लो! तुम (जहन्नम की) आग में रहने वालों में ज़रूर शामिल होगे।" (8)
उस आदमी के बारे में क्या कहा जाए जो रात की घड़ियों में दिल लगाकर इबादत करता है, सज्दे में झुकता है, (नमाज़ में) खड़ा रहता है, यहाँ तक कि मौत के बाद की ज़िंदगी से भी डरता रहता है, और अपने रब से अपने लिए रहम व दया की आशा रखता है? कह दें, "क्या वे लोग जो जानते हैं (कि एक दिन उनके कर्मों का हिसाब-किताब होगा) और वे लोग जो नहीं जानते, दोनों बराबर होंगे? (मगर) शिक्षा तो वही ग्रहण करते हैं जो बुद्धि और समझ-बूझ रखते हैं।" (9)
कह दें कि (अल्लाह कहता है), "ऐ मेरे ईमानवाले बन्दो! अपने रब से डरते हुए बुराइयों से बचो। जो लोग इस दुनिया में अच्छे काम करते हैं, उनके लिए बदले में अच्छाई होगी--- और अल्लाह की धरती बहुत लम्बी-चौड़ी है---- और जो लोग (नेक कामों में) सब्र के साथ जमे रहते हैं, तो उनको इसका पूरा-पूरा और बेहिसाब बदला [इनाम] दिया जाएगा।" (10)
कह दें, "मुझे तो आदेश दिया गया है कि मैं अल्लाह की इबादत [उपासना] करूँ, इस तरह कि मेरी बंदगी [भक्तिभाव व निष्ठा] सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी के लिए हो (11)
और मुझे आदेश दिया गया है कि मैं (अल्लाह के सामने) पूर्ण समर्पण करनेवाला [मुस्लिम] पहला आदमी बनूँ।" (12)
कह दें, "अगर मैं अपने रब के आदेशों को न मानूँ तो मुझे एक बड़े ज़बरदस्त दिन [क़यामत] की यातना का डर है।" (13)
कह दें, "मेरी पूरी भक्ति केवल अल्लाह के लिए ही समर्पित है और मैं तो बस उसी की इबादत करता हूँ, (14)
अब तुम उसे [अल्लाह को] छोड़कर जिसकी चाहो पूजा करो, कह दें, "वास्तव में घाटे में पड़ने वाले तो वही हैं, जो क़यामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को हरा बैठेंगे: याद रखो, असल घाटा यही है। (15)
ऐसे लोगों के लिए उनके ऊपर (भी) आग की कई पर्तें होंगी और उनके नीचे भी।“ यही वह यातना है, जिससे अल्लाह अपने बन्दों को डराता है: "ऐ मेरे बन्दो! तुम मेरा डर रखो।" (16)
रहे वे लोग जो गढ़े हुए देवताओं या शैतान की पूजा से बचते रहे, और अल्लाह की ओर (पूरी भक्ति से) झुकते रहे, उनके लिए शुभ सूचना है, अतः मेरे उन बन्दों को [ऐ रसूल!] आप ख़ुश्ख़बरी दे दें, (17)
जो बात को ध्यान से सुनते हैं और अच्छी बातों पर अमल करते हैं। यही वे लोग हैं, जिन्हें अल्लाह ने मार्ग दिखाया है; और वही बुद्धि और समझवाले हैं। (18)
भला जिस व्यक्ति पर यातना की सज़ा तय हो चुकी है, क्या आप [ऐ रसूल] उसे छुड़ा लेंगे जो आग के अंदर पहुँच चुका है? (19)
अलबत्ता जिन्होंने दिलों मे अपने रब का डर रखा है, उनके रहने के लिए (जन्नत में) तल्ले-ऊपर बने हुए ऊँचे-ऊँचे भवन होंगे, उनके नीचे नहरें बह रही होंगी। यह अल्लाह का वादा है: अल्लाह अपने वादे को कभी नहीं तोड़ता है। (20)
(ऐ इंसान) क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह ने किस तरह आसमान से पानी उतारा, फिर धरती में उसके सोते [springs] बहा दिए; फिर वह उस पानी के द्वारा अलग अलग रंगों की हरियाली व खेतियाँ उगा देता है; फिर वह (तैयार होकर) सूखने लगती हैं; फिर तुम देखते हो कि वह (फ़सल पकने के बाद) पीली पड़ गई; फिर उसके हुक्म से वह दब दबाकर चूर हो जाती हैं? निस्संदेह इन बातों में उन लोगों के लिए बड़ी शिक्षा है जो बुद्धि और समझ रखते हैं। (21)
भला क्या वह व्यक्ति जिसका सीना [हृदय] अल्लाह ने अपनी पूर्ण भक्ति [इस्लाम] के लिए खोल दिया, जिसके नतीजे में वह अपने रब की ओर से दी गयी रौशनी में आ चुका है, (उस व्यक्ति के समान होगा जो कठोर हृदयवाला और अल्लाह को भुलाए बैठा है)? हाँ, अफ़सोस! उन लोगों के लिए जिनके दिल अल्लाह का नाम लेने से कठोर हो चुके हैं! ये लोग पूरी तरह से रास्ता भटक चुके हैं। (22)
अल्लाह ने (अपने द्वारा भेजी गयी शिक्षाओं में) सबसे अच्छी वाणी उतार भेजी है: एक ऐसी किताब जिसके विषय एक दूसरे से (आपस में और दूसरी आसमानी किताबों से भी) मिलते-जुलते हैं, जिसकी बातें बार-बार दुहरायी गयीं हैं; (इन बातों को सुनकर) वे लोग जो दिलों में अपने रब का डर रखते हैं, उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फिर अल्लाह को याद करने के नतीजे में उनकी खालें (शरीर) और उनके दिल नर्म पड़ जाते हैं: यह है अल्लाह का मार्गदर्शन; उसके द्वारा वह जिसको चाहता है सीधे मार्ग पर ले आता है, और जिसको अल्लाह रास्ते में भटकता छोड़ दे, तो फिर उसे कोई सीधे रास्ते पर लाने वाला नहीं। (23)
अब भला (उसका क्या हाल होगा) कि क़यामत के दिन (उसके दोनों हाथ बँधे होंगे और) अपने आपको भयानक यातना [आग] से बचाने के लिए केवल उसका खुला चेहरा होगा? और ज़ालिमों से कहा जाएगा, "चखो मज़ा उस (बुरे कर्म द्वारा की गयी) कमाई का, जो तुम करते रहे थे!" (24)
जो लोग उनसे पहले थे उन्होंने भी (रसूलों की बातों को) झूठ माना, अन्ततः उनपर उस जगह से यातना आ पहुँची, जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक न था: (25)
फिर अल्लाह ने उन्हें सांसारिक जीवन में भी बेइज़्ज़ती का मज़ा चखाया; और आख़िरत [परलोक, Hereafter] की यातना तो इससे भी कहीं बड़ी होगी। काश, वे लोग जानते! (26)
सच्चाई यह है कि हमने इस क़ुरआन में लोगों (को समझाने) के लिए हर तरह की मिसालें बता दी हैं, ताकि वे याद रखें व इनसे सीख ले सकें --- (27) एक ऐसी अरबी (भाषा की) क़ुरआन से, जिसमें कोई गड़बड़ी (उलझाव) नहीं है, ताकि लोग अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बच सकें। (28)
(समझाने के लिए) अल्लाह एक मिसाल पेश करता है: एक (ग़ुलाम) आदमी है जिसके एक से ज़्यादा मालिक हैं जो आपस में खींचातानी करने वाले हैं, और एक आदमी वह है जो पूरे का पूरा एक ही मालिक का ग़ुलाम है। क्या दोनों का हाल एक जैसा होगा? (बिल्कुल नहीं! एक मालिकवाला ग़ुलाम कहीं बेहतर होगा!), सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, हालाँकि उनमें से अधिकांश लोग नहीं जानते। (29) यह बात पक्की है कि (ऐ रसूल) आपको भी मरना है और उन्हें भी मरना है (30) फिर, तुम सब क़यामत के दिन अपने रब के सामने आपस में झगड़ा व विवाद करोगे (31) तो फिर उससे बढ़कर बुरा व ग़लत आदमी कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ता है, और जब सच्चाई उसके सामने आ चुकी हो, तो वह उसे (झूठ समझकर) मानने से इंकार कर देता है? क्या (सच्चाई से) इंकार करने वालों का (सज़ा के लिए उचित) ठिकाना जहन्नम नहीं है? (32)
और (दूसरी तरफ़) एक आदमी है जो सच्चाई लेकर आता है और जो उसे सच मानते हुए स्वीकार कर लेता है, तो ऐसे ही लोग हैं जो अल्लाह का डर रखते हुए बुराइयों से बचने वाले हैं: (33) उनको उनके रब के पास वह सब कुछ (नेमतें) मिलेंगी, जो भी वे चाहेंगे। यह इनाम है उन लोगों के लिए जो अच्छा कर्म करते हैं: (34) यहाँ तक कि अल्लाह उनके सबसे बुरे कर्म को भी माफ़ कर देगा और नेकी का बदला उनके द्वारा किए गए सबसे अच्छे कर्म के हिसाब से उन्हें प्रदान करेगा। (35)
क्या अल्लाह अपने बंदों के लिए काफ़ी नहीं है? फिर भी वे आपको [ऐ रसूल] उन (बुतों) से डराते हैं जिन्हें ये अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं। अगर अल्लाह (सच्चाई से इंकार के नतीजे में) किसी को रास्ते से भटकता छोड़ दे, तो फिर उसे मार्ग दिखानेवाला कोई नहीं; (36)
और जिसे अल्लाह सीधे मार्ग पर ले आए उसे रास्ते से भटकाने वाला भी कोई नहीं। क्या अल्लाह ज़बरदस्त ताक़तवाला और बदला लेने में सक्षम नहीं है? (37)
यदि आप [ऐ रसूल] उनसे पूछें कि "आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "अल्लाह ने," तो कह दें, “ज़रा विचार करो कि अल्लाह को छोड़कर जिन (बुतों) को तुम (मदद के लिए) पुकारते हो: यदि अल्लाह मुझे कोई तकलीफ़ पहुँचानी चाहे तो क्या ये (बुत) मेरी उस तकलीफ़ को दूर कर सकते हैं? या अगर अल्लाह मुझ पर कोई दया [रहम] करना चाहे तो क्या ये उसकी रहमत को रोक सकते है?" कह दें, "मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है। भरोसा करनेवाले उसी पर भरोसा करते हैं।" (38)
कह दें, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम्हारे अधिकार में जो कुछ है उसके हिसाब से तुम अपने काम किए जाओ-- मैं भी (अपने तरीक़े से) काम करता रहूँगा। तुम्हें पता चल जाएगा (39) कि किसे (इस दुनिया में) भारी बेइज़्ज़ती झेलनी पड़ेगी और किस पर (आख़िरत में) कभी समाप्त न होने वाली यातना उतरती है।" (40)
हमने लोगों के (मार्गदर्शन के) लिए [ऐ रसूल], आप पर सच्चाई के साथ किताब उतारी है। अतः जिस किसी ने सीधा मार्ग अपनाया तो अपने ही फ़ायदे के लिए अपनाया, और जो उससे भटक गया तो वह भटककर अपने को ही हानि पहुँचाता है: आप उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। (41)
अल्लाह ही मरे हुए लोगों की रूहों [प्राणों] को अपने पास ले लेता है और ज़िंदा लोगों की रूहों को भी ले जाता है जबकि वे नींद की हालत में होते हैं--- फिर जिसकी मौत का फ़ैसला उसने कर दिया है उसकी रूह को (वहीं) रोक लेता है और दूसरे (ज़िंदा लोगों की) रूहों को एक नियत समय तक के लिए वापस छोड़ देता है-- निश्चय ही इसमें सोच-विचार करने वालों के लिए कितनी ही निशानियाँ हैं। (42) (इसके बावजूद) उन्होंने अल्लाह से हटकर दूसरे (गढ़े हुए देवताओं) को सिफ़ारिशी [Intercessor] बना रखा है! (उनसे) कहें, "चाहे वे किसी चीज़ का न तो अधिकार रखते हों और न कुछ समझते ही हों तब भी?" (43) कह दें, "सिफ़ारिश तो सारी की सारी अल्लाह के ही अधिकार में है। उसी के क़ब्ज़े में आसमानों और ज़मीन की बादशाही है। फिर उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे।"(44)
और जब कभी अल्लाह का ज़िक्र अलग से किया जाता है, तो जो लोग आख़िरत [hereafter] पर ईमान नहीं रखते, उनके दिल नफ़रत से कुढ़ने लगते हैं, मगर जब उसके सिवा दूसरे (देवताओं) का ज़िक्र होता है (जिन्हें वे पूजते हैं) तो वे खुशी से खिल उठते हैं; (45)
कहें, "ऐ अल्लाह! आसमानों और ज़मीन को पैदा करनेवाले! हर ढकी-छुपी चीज़ और सामने दिखायी देने वाली चीज़ के जाननेवाले!, तू ही अपने बन्दों के बीच उस चीज़ का फ़ैसला करेगा, जिसमें वे मतभेद करते रहे हैं।" (46)
अगर बदमाश/शैतान लोगों को वह सब कुछ [माल-असबाब] मिल जाए जो धरती में है और उसके साथ उतना ही और भी (मिल जाए), तो भी वे क़यामत के दिन बुरी यातना से बचने के लिए अपनी जान के बदले में वह सब कुछ दे डालने के लिए तैयार होंगे: (मगर) अल्लाह की ओर से उनके सामने कुछ ऐसी चीज़ सामने आयेगी जिसके बारे में उन लोगों ने कभी सोचा तक न होगा (47) उनके कर्मों की बुराइयाँ उन पर प्रकट हो जाएँगी, और वही चीज़ें उन्हें चारों तरफ़ से घेर लेगी जिनकी वे हँसी उड़ाया करते थे। (48)
(आदमी का हाल यह है कि) जब उस पर कोई मुसीबत पड़ती है तो वह हमें पुकारने लगता है, फिर जब हम उस पर अपनी दया दिखाते हुए कोई नेमत दे देते हैं, तो कहता है, "यह तो मुझे अपने (हुनर और) ज्ञान के कारण प्राप्त हुआ है"---- नहीं! बल्कि यह तो एक परीक्षा है, किन्तु उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते। (49)
ऐसी ही बात उनसे पहले गुज़र चुके (कुछ) लोगों ने कही थी। नतीजा यह हुआ कि जो कुछ कमाई वे करते थे, वह उनके कुछ काम न आई (50)
फिर जो कुछ उन्होंने (अपने कर्मों से) कमाया था, उसकी बुराइयाँ उन पर ही आ पड़ीं। और (इसी तरह) आजकल भी जिन (अरब के) लोगों ने शैतानियाँ कर रखी हैं, उन्हें अपने कर्मों का बुरा प्रभाव भुगतना पड़ेगा: वे (अल्लाह की पकड़ से) बचकर नहीं जा सकते। (51) क्या उन्हें मालूम नहीं कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी को ख़ूब बढ़ा देता है, और जिसके लिए चाहता है (रोज़ी में) तंगी कर देता है? इसमें उन लोगों के लिए सचमुच बड़ी निशानियाँ है जो ईमानवाले हैं। (52)
कह दें, "[अल्लाह कहता है] ऐ मेरे वह बन्दो, जिन्होंने (गुनाहों से) अपने आप पर ज़्यादती करके अपनी हानि की है, अल्लाह की रहमत [दयालुता] से निराश न हो। अल्लाह सारे ही गुनाहों को क्षमा कर देता है: वह बड़ा माफ़ करने वाला, अत्यन्त दयावान है।” (53)
(गुनाहों से तौबा करने के लिए) अपने रब का ध्यान लगाओ। उसके आज्ञाकारी बन जाओ इससे पहले कि तुम पर यातना आ जाए, (क्योंकि) फिर तुम्हारी सहायता नहीं की जाएगी (54)
और उस बेहतरीन शिक्षा [क़ुरआन] का अनुसरण करो जो तुम्हारे रब ने तुम्हारी ओर उतारी है, इससे पहले कि तुम पर अचानक यातना आ जाए और तुम्हें इसकी ख़बर भी न हो" (55) और तुम्हारी आत्मा यह कह उठे, "हाय, अफ़सोस मुझ पर! जो उपेक्षा अल्लाह के हक़ में मुझ से हुई। और सच तो यह है कि मैं (अल्लाह के आदेशों का) मज़ाक़ उड़ाने वालों में शामिल रहा" (56)
या, कोई कहने लगे कि "यदि अल्लाह मुझे मार्ग दिखाता तो अवश्य ही मैं डर रखने वालों में से होता!" (57) या, जब वह यातना अपनी आँखों से देख ले, तो कहने लगे, "काश! मुझे एक बार (दुनिया में) वापस जाने का मौक़ा मिल जाए, तो मैं नेक लोगों में शामिल हो जाऊँ!" (58) [रब कहेगा] "हरगिज़ नहीं! मेरी आयतें तेरे पास आ चुकी थीं, किन्तु तूने उनको मानने से इंकार कर दिया: तू अपनी बड़ाई के घमंड में पड़ गया और इंकार करने वालों [काफ़िरों] में शामिल हो गया।” (59)
और क़यामत के दिन आप [ऐ रसूल] उन लोगों को देखेंगे जिन्होंने अल्लाह के ख़िलाफ झूठी बातें गढ़ी थीं, कि उनके चेहरे काले पड़ गए हैं। क्या अहंकारियों का ठिकाना जहन्नम में नहीं है?" (60)
(इसके विपरीत) जिन लोगों ने अल्लाह से डरते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाया होगा, अल्लाह उन लोगों को उनकी आख़िरी मंज़िल [मुक्ति] तक सुरक्षित पहुँचा देगा: न उन्हें कोई तकलीफ़ छू सकेगी और न उन्हें किसी बात का ग़म होगा। (61) अल्लाह हर चीज़ का पैदा करने वाला है; और वही हर चीज़ का रखवाला है; (62)
उसी के पास आसमानों और ज़मीन की कुंजियाँ हैं। और जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार किया, वही हैं जो घाटे में रहेंगे। (63)
कह दें, "ऐ बेवक़ूफ़ लोगो! क्या फिर भी तुम मुझसे कहते हो कि मैं अल्लाह के सिवा किसी और की बन्दगी करूँ?" (64)
[ऐ रसूल] आप पर और आपसे पहले गुज़र चुके (नबियों) पर पहले ही यह बात "वही" [Revelation] के द्वारा उतारी जा चुकी है: "अगर तुमने अल्लाह का कोई साझेदर [partner] ठहराया, तो तुम्हारे द्वारा किए गए अच्छे–बुरे सब कर्म बर्बाद व अकारथ हो जायेंगे: तुम अवश्य ही घाटे में पड़ने वालों में शामिल हो जाओगे। (65) नहीं! बल्कि केवल एक अल्लाह की बन्दगी करो और उसका शुक्रिया अदा करने वालों में शामिल हो जाओ।” (66) इन लोगों ने न अल्लाह की सही हक़ीक़त समझी और न उसकी क़द्र जानी, जैसी क़द्र के वह लायक़ था। हालाँकि क़यामत के दिन पूरी की पूरी ज़मीन उसकी मुट्ठी में होगी। आसमानों को लपेटकर वह अपने दाएँ हाथ में रख लेगा--- महान है वह! और वह हर उस ज़ात से कहीं ऊँचा और बड़ा है जिसे वे (प्रभुत्व में अल्लाह का) साझेदार [Partner] ठहराते हैं। (67)
और जब सूर [नरसिंघा] फूँका जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन में जितने हैं, वे सब बेहोश हो जायेंगे, सिवाय उसके जिसको अल्लाह चाहे। फिर उसे दूबारा फूँका जाएगा, तो वे सब लोग सहसा खड़े होकर देखने लगेंगे। (68)
अपने रब के नूर से ज़मीन जगमगा उठेगी; कर्मों के हिसाब-किताब खोलकर सामने रख दिए जायेंगे; और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा। और लोगों के बीच बिना किसी भेदभाव के फ़ैसला कर दिया जाएगा: उनके साथ कोई नाइंसाफ़ी नहीं होगी। (69) और हर एक को उसके कर्मों का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा। और वह [अल्लाह] भली-भाँति जानता है, जो कुछ वे करते हैं। (70)
जिन लोगों ने सच्चाई से इंकार किया, वे गिरोह के गिरोह जहन्नम की ओर ले जाए जाएँगे, यहाँ तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे तो उसके द्वार खोल दिए जाएँगे और उसके प्रहरी उनसे कहेंगे, "क्या तुम्हारे पास तुम्हारे लोगों में से रसूल नहीं आए थे जो तुम्हें तुम्हारे रब की आयतें पढ़कर सुनाते हों और तुम्हें इस दिन की मुलाक़ात से सचेत करते हों?" वे कहेंगे, "क्यों नहीं (वे तो आए थे)।" मगर सच्चाई से इंकार करने वालों के जुर्मों की सज़ा पहले ही दी जा चुकी होगी। (71) कहा जाएगा, "जहन्नम के दरवाज़े में प्रवेश करो: वहीं तुम्हें सदैव रहना है।" तो क्या ही बुरा ठिकाना है अहंकारियों का! (72)
जो लोग अपने रब से डरते हुए बुराइयों से बचते थे, वे गिरोह के गिरोह जन्नत की ओर ले जाए जाएँगे, यहाँ तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे तो पायेंगे कि उसके दरवाज़े पहले से खुले हैं। और उसके प्रहरी उनसे कहेंंगे, "सलाम हो तुमपर! बहुत अच्छे रहे! आओ, अंदर आ जाओ: तुम्हें अब यहीं सदैव रहना है” (तो उनकी ख़ुशियों का क्या हाल होगा!) (73)
और वे कहेंगे, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमारे साथ अपना वादा सच कर दिखाया, और हमें इस ज़मीन का वारिस बनाया कि हम जन्नत में जहाँ चाहें वहाँ रहें-बसे।" अतः क्या ही अच्छा इनाम [reward] है नेकी के रास्ते में मेहनत करने वालों का! (74)
और आप [ऐ रसूल], फ़रिश्तों को देखेंगे कि वे सिंहासन के गिर्द घेरा बाँधे हुए, अपने रब का गुणगान कर रहे हैं। और लोगों के बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दिया जाएगा और कहा जाएगा, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है जो सारे संसार का रब है।" (75)
नोट:
3: अरब के बहुदेववादियों का भी यह मानना था कि सारा ब्रह्मांड अल्लाह ने ही पैदा किया है, लेकिन उन लोगों ने कुछ देवी-देवताओं को गढ़ लिया था और एक अल्लाह को छोड़कर उनको ही पूजते थे, जिसे 'शिर्क' कहते हैं। जब उनसे पूछा जाता था कि वे शिर्क क्यों करते हैं तो उनकी दलील यह होती थी कि ये देवी-देवता अल्लाह से हमारी सिफ़ारिश करेंगे और उनके द्वारा अल्लाह से हमारी नज़दीकी बढ़ेगी। यहाँ यह बताया गया है कि चूँकि इन देवी-देवताओं की असल में कोई हक़ीक़त नहीं है, इसलिए इनके द्वारा अल्लाह से नज़दीकी या सिफ़ारिश की बात सोचना सिरे से ग़लत है, और इबादत किए जाने का अकेला हक़दार तो केवल अल्लाह है। ...... अंत में अल्लाह यह फ़ैसला कर देगा कि कौन था जो केवल अकेले अल्लाह की भक्ति करता था और कौन था जो अल्लाह के साथ दूसरे ख़ुदाओं को भी जोड़ता था।
6: चार मवेशियों के जोड़े का ज़िक्र सूरह अनाम (6: 142-144) में आया है, यानी भेड़, बकरी, ऊँट और गाय के जोड़े (नर व मादा)।
तीन क़िस्म के अँधेरे पर्दे -- एक पर्दा पेट का, फिर उसके अंदर कोख का, और उस झिल्ली का (amniotic sac) जिसमें बच्चा लिपटा होता है।
बनावट के चरण --- वीर्य, फिर ख़ून, फिर लोथड़ा, फिर हड्डियाँ आदि। सूरह हज्ज (22: 5), सूरह मोमिनून (23:14)
10: "अल्लाह की धरती बहुत लम्बी-चौड़ी है" (29: 56--60); इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अगर सच्चाई के रास्ते पर चलने में मुश्किल आ रही हो, तो वहाँ से कहीं और चले जाना चाहिए जहाँ दीन पर चलना कुछ आसान हो, और अपने देश छोड़ने पर धीरज से काम लेना चाहिए।
15: कोई अगर अल्लाह को छोड़कर किसी और को पूजना चाहे, तो उसे आज़ादी दी गयी है, उसे एक अल्लाह पर विश्वास कर लेने के लिए ज़बरदस्ती मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका नतीजा यह होगा कि क़यामत के दिन वह अपना सब कुछ हार बैठेगा।
18: आदमी जो कुछ सुनता है, उस पर यह आयत लागू की जा सकती है, ख़ासकर क़ुरआन के मतलब समझने पर, जैसे कोई आदमी अगर बदला लिए जाने की आयत पढ़े, और फिर कई आयतें माफ़ कर देने के बारे में भी पढ़े, और फिर वह माफ़ कर देने का फ़ैसला करे।
29: ऐसी हालत में तो ग़ुलाम अपने कई मालिकों के हुक्मोंं को सुनकर परेशान हो जाएगा कि कौन सी बात माने और किसकी बात पहले माने---- ठीक इसी तरह, कई ख़ुदाओं को मानने वाले भी कभी सुकून नहीं पा सकते। इस मिसाल से कई ख़ुदा के होने के विरुद्ध तर्क दिया गया है। ऐसा ही तर्क 23:91 में भी है।
50: जैसा कि क़ारून ने कहा था। देखें 28: 76-81
53: मरने से पहले-पहले जब भी इंसान अपने आपको सुधारने का पक्का इरादा कर ले और सच्चे दिल से अपने गुनाहों से तौबा कर ले, तो उसके लिए माफ़ी के दरवाज़े खुले रहते हैं, क्योंकि गुनाह चाहे जितना बड़ा क्यों न हो, वह अल्लाह की रहमत से बड़ा नहीं हो सकता। 4:48 के अनुसार एक ही गुनाह ऐसा है जिसे माफ़ नहीं किया जाएगा कि अगर कोई अल्लाह पर विश्वास न रखता हो और उसी हालत में मर जाए या वह इबादत में अल्लाह के साथ किसी और को भी जोड़ता हो।
74: इस बात पर 21:105 में भी ज़ोर दिया गया है। अल्लाह ईमानवालों को इनाम के तौर पर जन्नत में हमेशा के लिए बसा देगा। कुछ विद्वान कहते हैं कि जब अल्लाह ने जन्नत और जहन्नम बनाई तो दोनों में सभी इंसानों के लिए रहने की जगह बनाई थी, इसीलिए वहाँ रहने वालों को "वारिस" कहा गया है।
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