सूरह 43: अज़-ज़ुख़रुफ़
[सोने के ज़ेवरों से सजावट / Ornaments of Gold]
यह एक मक्की सूरह है
जिसका नाम आयत 35 में वर्णन किए गए "सोने के ज़ेवरों" पर रखा गया है, और फिर आयत 53 में भी इस ओर इशारा है: दोनों ही
जगहों पर अल्लाह ने विश्वास न करने वालों के इस दावे को ख़ारिज किया है जिसके
मुताबिक़ असली पैग़म्बर अमीर या धनवान होना चाहिए। इस सच्चाई पर बार-बार ज़ोर दिया
गया है कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ नहीं होते, बल्कि वे
अल्लाह के आज्ञाकारी बंदे होते हैं (15-20; 60). इसी तरह,
ईसा (अलै) को "ख़ुदा का बेटा"
मानने की परिकल्पना को भी साफ़ तौर से रद्द किया गया है (57-59).
बहुदेववादियों की भी यह मान्यता थी कि ज़मीन और आसमान को पैदा करने
वाला अल्लाह ही है, मगर इसके बावजूद अपनी इबादतों में वे
अपने देवी-देवताओं को भी अल्लाह के साथ शरीक करते थे, जिसके
लिए उन्हें चेतावनी दी गई है।
विषय:
02-04: यह क़ुरआन अरबी में है
05-08: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी
09-15: विश्वास न करनेवाले एक तरह की [consistent] बात नहीं करते
16-25: अल्लाह की बेटियाँ नहीं हैं
26-28: इबराहीम (अलै) की मिसाल
29-30: रसूल की सच्ची बात ठुकरा दी गई
31-35: अल्लाह जिसे (रसूल बनाना) चाहे, उसे चुन लेता है
36-39: विश्वास न करने पर अड़े रहने से होने वाला ख़तरा
40-45: रसूल का उत्साह बढ़ाना
46-56: मूसा (अलै.) और फ़िरऔन की कहानी
57-65: ईसा (अलै) की कहानी पर एतराज़ करना
66-78: कर्मों का हिसाब-किताब
79-80: अल्लाह से कोई भी चीज़ छिपी नहीं है
81-89: अल्लाह का कोई बेटा नहीं है
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क़सम है उस किताब की जो चीज़ों को (साफ़ व) स्पष्ट करती है, (2) हमने इस क़ुरआन को अरबी भाषा में बनाया है ताकि तुम (लोग) समझ सको। (3) बेशक हमारे पास रखी हुई ‘मूल किताब’ [लौह ए महफ़ूज़/Preserved Tablet] में इस [क़ुरआन] का बहुत ऊँचा स्थान है, और यह गहरी समझ-बूझ की बातों से भरी हुई है। 4)
क्या हम तुम्हें नज़रअंदाज़ कर दें, और जो नसीहतें (क़ुरआन में) उतारी जा रही हैं, वह तुम पर से हटा लें, इसलिए कि तुम मर्यादाहीन लोग हो? (5) हमने पहले के लोगों के पास कितने ही रसूल भेजे (6) और उन लोगों ने हर एक रसूल का मज़ाक़ उड़ाया; (7) अन्ततः हमने उन लोगों को तबाह व बर्बाद कर दिया जो उन [मक्का के काफ़िरों] से ताक़त में कहीं अधिक थे और पहले के लोगों की मिसालें इतिहास में गुज़र चुकी हैं। (8) अगर आप [ऐ रसूल], उनसे पूछें कि "आसमानों और ज़मीन को किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "उन्हें ज़बरदस्त ताक़त [प्रभुत्व] वाले, सब कुछ जाननेवाले [रब] ने पैदा किया।" (9) वही है जिसने तुम्हारे लिए धरती को एक-बराबर (बिछौने जैसा) कर दिया औऱ उसमें तुम्हारे लिए रास्ते बना दिए, ताकि तुम अपना रास्ता ढूंढ सको। (10) जो आसमान से (ज़रूरत के मुताबिक़) एक अन्दाज़े से पानी उतारता है --- हम उसके द्वारा मुर्दा ज़मीन को ज़िंदा कर देते हैं, ठीक इसी तरह, तुम्हें भी क़ब्रों से (ज़िंदा करके) निकाला जाएगा---- (11) उसने हर तरह की चीज़ों के जोड़े बनाए, तुम्हें वे नौकाएँ (व जहाज़) और जानवर प्रदान किए, जिन पर तुम (पानी व धरती पर) सवार होते हो, (12) ताकि तुम जब उन पर बैठकर सवारी करो, तो अपने रब की नेमतों को याद करो और कहो, "कितना महिमावान है वह जिसने इन (सवारियों) को हमारे वश में कर दिया; वरना हममें यह ताक़त नहीं थी कि उसे क़ाबू में कर सकते (13) और इसमें शक नहीं कि हम अपने रब की ओर लौटकर जानेवाले हैं।" (14)
इसके बावजूद, उन (मक्का के बहुदेव-वादियों) ने अल्लाह के अपने बन्दों में से (फ़रिश्तों को) उसकी औलाद [बेटी] ठहरा दिया! हक़ीक़त यह है कि आदमी बिल्कुल भी शुक्र अदा नहीं करता! (15) भला क्या अल्लाह ने अपने लिए तो बेटियाँ पसंद की हैं और तुम्हें चुन लिया है बेटों के लिए? (16) मगर हाल यह है कि जब उनमें से किसी को (बेटी पैदा होने की) ख़ुशख़बरी सुनायी जाती है, जबकि उस (बेटी) को इन लोगों ने अपने रहम करनेवाले रब [रहमान] के साथ जोड़ रखा है, तो उसका चेहरा काला पड़ जाता है और वह दुख में घुटता रहता है---- (17) (इस्लाम आने के पहले ऐसा माना जाता था..) “(लड़की) वह है जो सोने-चाँदी के ज़ेवरों के बीच पले-बढ़े और जो वाद-विवाद में अपनी कोई बात ठीक ढंग से खुलकर रख भी न पाए”? (18) फ़रिश्तों को, जो रहम करनेवाले रब के बन्दे होते हैं, वे महिला मानते हैं। क्या वे उनकी रचना के समय मौजूद थे? उनके दावों को लिख लिया जाएगा, और उनसे इस बारे में (क़यामत के दिन) पूछताछ होगी। (19)
वे कहते हैं कि "यदि रहम करने वाला रब [रहमान] चाहता, तो हमने उन (बुतों/फरिश्तों) की पूजा न की होती," मगर सच्चाई यह है कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है; वे तो बस अटकल से काम ले रहे हैं----- (20) या क्या हमने इस किताब से पहले उनको कोई किताब दी थी जिसे यह थामे बैठे हैं? (21) बिल्कुल नहीं! बल्कि वे कहते हैं, "हमने तो अपने बाप-दादाओं को इसी परम्परा पर चलते हुए पाया; हम तो उन्हीं के क़दमों के निशान पर चलते हुए सही मार्ग पर जा रहे हैं।" (22) [ऐ रसूल] हमने आपसे पहले जब भी किसी बस्ती में सावधान करने के लिए कोई रसूल भेजा, तो वे लोग जो दौलत के नशे में बिगड़े हुए थे, उन लोगों ने भी वही कहा था कि "हमने तो अपने बाप-दादा को इसी परम्परा पर चलते हुए देखा है; और हम उन्हीं के पद-चिन्हों पर चलते हुए सही मार्ग पर जा रहे हैं।" (23)
रसूल ने कहा, "अगर मैं तुम्हारे बाप-दादा की परम्पराओं से ज़्यादा सही मार्गदर्शन तुम्हारे लिए लेकर आऊँ, तो क्या तब भी तुम अपने बाप-दादा के ही रास्ते पर चलोगे?" उन्होंने जवाब में कहा, "तुम्हें जो संदेश देकर भेजा गया है, हम उसे मानने से इंकार करते हैं।" (24)
अन्ततः हमने उन्हें दंड दिया: आप सोचें कि किस तरह सच्चाई से इंकार करने वाले अपने अंत को पहुँचे। (25)
याद करें, जबकि इबराहीम [Abraham] ने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा था, "तुम जिनको पूजते हो, उन्हें मैं त्याग चुका हूँ; (26)
मैं केवल उसी की इबादत करता हूँ जिसने मुझे पैदा किया, और वही मुझे सही मार्ग दिखाएगा," (27)
और इबराहीम इन बातें को अपनी संतानों के लिए वसीयत में छोड़ गया, ताकि वे (केवल अल्लाह की ओर) लौट सकें। (28)
मैंने उन लोगों को और उनके बाप-दादा को लम्बे जीवन का सुख उठाने दिया, और अब मैंने उन्हें 'सच्ची बात' [क़ुरआन] और एक रसूल दिया है, ताकि वह चीज़ों को साफ़-साफ़ समझा सकें--- (29)
फिर जब वह 'सच्ची बात' उनके पास पहुँच गयी, तो वे कहने लगे, "यह तो जादूगरी है। हम इसमें विश्वास नहीं करते हैं," (30)
और कहने लगे, "इस क़ुरआन को इन दो शहरों [मक्का या तायफ़] के किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं उतारा गया?" (31)
(रसूलों को चुनना तो अल्लाह की रहमत है) तो भला क्या वे लोग आपके रब की रहमत [grace] को (अपने हिसाब से) बाँट सकते हैं? सांसारिक जीवन में उनकी रोज़ी-रोटी के साधन हमने ही उनके बीच बाँट रखे हैं, और हमने ही उनमें से कुछ लोगों को श्रेणियों में दूसरे लोगों से ऊँचा रखा है, ताकि वे एक-दूसरे से काम ले सकें: आपके रब की रहमत तो उस [दौलत] से कहीं अच्छी है जिसे वे जमा कर रहे हैं। (32)
अगर इस बात की सम्भावना न होती कि सारी मानव-जाति [विश्वास न रखनेवाले-- काफ़िरों की] एक समुदाय हो जाएगी, तो जो लोग रहम करनेवाले रब [रहमान] को मानने से इंकार करते हैं, उनके लिए हम उनके घरों की छतें चाँदी की कर देते, और सीढ़ियाँ भी जिनपर वे चढ़ते हैं, (33)
और घरों के दरवाज़े भी (चाँदी के कर देते) और वे तख़्त भी जिन पर वे तकिया लगाकर बैठते हैं, (34) और बल्कि सोने के ज़ेवर (से सजा देते)। मगर सच्चाई यह है कि यह सब चीज़ें तो बस इसी सांसारिक जीवन के सुख व मज़े के सामान हैं; और आपके रब ने आने वाली दुनिया (के सुखों) को उन लोगों के लिए रखा है जो अल्लाह से डरते हुए अपने आपको बुराइयों से बचाए रखते हैं। (35) जो कोई भी दयालु रब [रहमान] के ज़िक्र या उसकी याद से मुँह मोड़ता है, हम उसपर एक शैतान नियुक्त कर देते हैं, जो उसका साथी बन जाता है: (36) औऱ ये शैतान, लोगों को सीधे मार्ग से रोकते रहते हैं, जबकि (इंकार करनेवाले) यह समझते हैं कि वे ठीक मार्ग पर हैं, (37) यहाँ तक कि जब ऐसा आदमी हमारे पास आएगा, तो (अपने शैतान साथी से) कहेगा, "ऐ काश, मेरे और तेरे बीच इतनी दूरी होती जितनी पूरब और पश्चिम के दोनों किनारों में होती है, तू तो बहुत ही बुरा साथी निकला!" (38) (उन लोगों से कहा जाएगा) “तुम ने ग़लत काम किया है, और आज यह बात तुम्हें कुछ भी राहत न पहुँचा सकेगी कि यातना में तुम एक-दूसरे के साझेदार [Partner] हो।” (39)
तो क्या [ऐ रसूल] आप किसी बहरे को सुना सकते हैं? या उन्हें रास्ता दिखा सकते हैं जो अंधे हों या जो पूरी तरह से भटक चुके हों? (40) अब तो यह होगा कि या तो हम आपको दुनिया से उठा लें और उन्हें दंड दें--- और वह तो हम ज़रूर देकर रहेंगे --- (41) या हम आपके सामने ही उनको वह सज़ा दें, जिसकी धमकी हमने उन्हें दे रखी है; वे पूरी तरह से हमारे क़ाबू में हैं। (42) अतः आप पर जो 'वही' [revelation] उतारी गयी है उसको मज़बूती से थामे रहें --- आप सचमुच सीधे मार्ग पर हैं--- (43) क्योंकि यह (क़ुरआन), आपके लिए और आपकी क़ौम के लिए भी सचमुच एक याद दिलाने वाली चीज़ [reminder] है: तुम सबसे (इस पर अमल करने के बारे में) पूछा जाएगा। (44) आप से पहले हमने जो भी रसूल भेजे, उनसे पूछ लें: “क्या हमने कभी भी रहम करनेवाले रब [रहमान] को छोड़कर, किन्हीं देवताओं [gods] को पूजने के लिए नियुक्त किया था?” (45)
और (देखो!), हमने मूसा [Moses] को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन [Pharaoh] और उसके सरदारों के पास भेजा, तो उसने जाकर कहा, "मैं सचमुच सारे संसार के रब का रसूल हूँ।" (46) लेकिन जब उसने हमारी निशानियाँ उनके सामने पेश कीं, तो वे लगे उन (निशानियों) की हँसी उड़ाने, (47) हालाँकि हमने उन्हें जो भी निशानी दिखायी, उसमें हर एक निशानी पिछली वाली से बढ़-चढ़कर थी। हमने उन्हें कड़ी यातना में भी डाला, ताकि वे सीधे रास्ते पर लौट सकें। (48) वे (यातना देखकर मूसा से) कहने लगते, "ऐ जादूगर! तेरे रब ने तुझ से जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उस आधार पर अपने रब से हमारे लिए दुआ कर दो: निश्चय ही हम (तुम्हारे मार्गदर्शन में) सीधे मार्ग पर आ जायेंगे, " (49) फिर जैसे ही हम उन पर से यातना हटा देते, पल भर में वे प्रतिज्ञा तोड़ डालते थे। (50) फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मिस्र की सल्तनत मेरी नहीं? और ये नदियाँ जो मेरे (महलों के) नीचे बहती हैं, क्या यह मेरी नहीं? तो क्या तुम्हें दिखायी नहीं देता? (51) क्या मैं इस तुच्छ व गिरे हुए आदमी [मूसा] से बेहतर नहीं हूँ जो अपनी बात साफ़-साफ़ बोल भी नहीं पाता? (52) (यदि यह अल्लाह का भेजा हुआ रसूल है, तो) फिर उसके लिए सोने के कंगन क्यों नहीं दिए गए (जिसे यह पहनकर आता)? या फ़रिश्तों का दल उसकी अगुवाई में यहाँ साथ क्यों नहीं आया?" (53) इस तरह, उसने अपनी क़ौम के लोगों को (अपनी बातों से) मोह लिया, और उन्होंने उसकी बात मान ली --- सचमुच वे भ्रष्ट [perverse] लोग थे। (54) अन्ततः जब उन्होंने (मूसा की बात न मानकर) हमें अप्रसन्न कर दिया, तो हमने उन्हें सज़ा दी और उन सबको दरिया में डुबो दिया: (55) इस तरह, हमने उन्हें एक गुज़री हुई चीज़ बना डाला और आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उदाहरण [Example] बना दिया। (56)
और जब मरयम के बेटे [ईसा/Jesus] की मिसाल दी जाती है, तो उसपर [ऐ रसूल] आपकी क़ौम के लोग हँसते हैं, चिल्लाकर व्यंग्य करते हैं, (57) और कहते हैं, "हम जिन (फ़रिश्तों) को (अल्लाह की बेटी मानते हुए) पूजा करते हैं, वे बेहतर हैं या वह (ईसा, जिन्हें ईसाई अल्लाह का बेटा मानते हैं)?"--- वे केवल आपको चुनौती देने के लिए उनका उदाहरण देते हैं: वे बड़े ही झगड़ालू लोग हैं ---- (58) वह [ईसा मसीह] तो बस एक बंदे हैं, जिन पर हमने अपना ख़ास करम [favour] किया था और हमने उनको इसराईल की सन्तानों के लिए एक नमूना बनाया था: (59) अगर हमारी ऐसी इच्छा रही होती, तो (ठीक वैसे ही जैसे ईसा को बिना बाप के पैदा किया था), हम तुममें से फ़रिश्ते पैदा कर देते, जो धरती पर एक दूसरे के उत्तराधिकारी होते। (60)
वह [क़ुरआन या ईसा का दोबारा आना] क़यामत की घड़ी की जानकारी देता है: अतः तुम उसके बारे में संदेह न करो। मेरी बात मानो कि यही सीधा रास्ता है; (61) और (देखो!) ऐसा न हो कि शैतान तुम्हें कहीं उस रास्ते से रोक दे, क्योंकि वह तुम्हारा पक्का दुश्मन है। (62) जब ईसा स्पष्ट निशानियों के साथ आए, तो उन्होंने (लोगों से) कहा, "मैं तुम्हारे पास ज्ञान व समझदारी की बातें लेकर आया हूँ; मैं तुम्हारे लिए तुम्हारे कुछ मतभेदों को भी दूर करने आया हूँ। अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचते रहो और मेरी बात मान लो: (63) अल्लाह ही मेरा भी रब है और तुम्हारा भी, तो उसी की बन्दगी करो: यही सीधा मार्ग है।" (64) इसके बावजूद उनमें से कई गुट आपस में एक दूसरे से सहमत न हुए -– तबाही है शैतानी करने वालों की: वे एक दर्दनाक दिन की यातना को झेलेंगे! (65) ये लोग किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं, क्या उस (क़यामत की) घड़ी का, जो अचानक उन पर आ पड़ेगी और उन्हें उसकी ख़बर तक न होगी? (66) उस दिन सभी दोस्त एक-दूसरे के दुश्मन होंगे, मगर नेक व बुराइयों से बचनेवाले [मुत्तक़ी] लोगों को छोड़कर ---- (67) (मुत्तक़ी लोगों के बारे में कहा जायेगा) "ऐ मेरे बन्दों! आज तुम्हारे लिए न तो कोई डर होगा, और न तुम (किसी बात पर) दुखी होगे" ---- (68) वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों (की सच्चाई) में विश्वास किया और पूरी भक्ति से अपने आपको हमारे सामने झुकाया, (69) [उनसे कहा जाएगा], "तुम और तुम्हारे जोड़ीदार [मर्द/औरत, spouses] दोनों, जन्नत के अंदर दाख़िल हो जाओ! : तुम ख़ुशी से खिल उठोगे!" (70) वहाँ [जन्नत में] उनके आसपास सोने की प्लेटें और प्याले घुमाए जाते रहेंगे और, दिल जिस चीज़ की भी इच्छा करे और आँखे जिससे ख़ुशी पाएँ, वह सब कुछ मौजूद होगा।" वहाँ तुम हमेशा के लिए रहोगे: (71) यह है वह जन्नत, जो तुम्हें दिया जाता है, और अब से यह तुम्हारा अपना हुआ, यह नतीजा है उन कर्मों का जो तुम (दुनिया में) किया करते थे, (72) तुम्हारे खाने के लिए वहाँ बड़ी मात्रा में फल होंगे।" (73) मगर शैतानियाँ करने वाले लोग जहन्नम की यातना में हमेशा रहेंगे, (74) जिससे कभी उन्हें कोई राहत (छूट) नहीं दी जाएगी: वे उस में बेहद निराश पड़े रहेंगे। (75) हमने उनपर कभी कोई ज़ुल्म नहीं किया; असल में वे ही ज़ुल्म करने वाले लोग थे। (76)
वे (जहन्नम के फ़रिश्ते से) पुकारकर कहेंगे, "ऐ मालिक! अच्छा हो कि तुम्हारा रब हमारा काम ही तमाम कर दे", मगर वह जवाब देगा, "नहीं, तुम्हें तो इसी हाल में रहना है।" (77) हम तुम्हारे पास सच्चाई लेकर आए हैं, मगर तुममें से अधिकतर लोग सच्चाई से नफ़रत करते हो। (78)
क्या इन विश्वास न रखने वाले (काफ़िरों) ने कोई नयी चाल सोची है? अगर ऐसा है, तो हम भी (इनके ख़िलाफ़) प्लान बना रहे हैं। (79) क्या वे सोचते हैं कि हम उनकी छिपी बातें और उनकी कानाफूसी को सुन नहीं सकते? बिल्कुल सुन सकते हैं: हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनके नज़दीक ही हैं, वे हर बात लिखते रहते हैं।" (80) [ऐ रसूल] आप कह दें , "अगर रहम करनेवाले रब [रहमान] की (सचमुच) कोई औलाद होती, तो सबसे पहले मैं उनकी बंदगी करता, मगर ----- (81) महिमा हो उसकी, जो आसमानों और ज़मीन का रब है, जो सिंहासन का स्वामी है--- वह उन बातों से कहीं ऊपर है जो वे उसके बारे में ग़लत बयान करते रहते हैं!" (82) [ऐ रसूल] आप छोड़ दें उन्हें, ताकि वे व्यर्थ की बहस में पड़े रहें और बेकार के खेलों में लगे रहें, यहाँ तक कि उनका सामना उस दिन से हो जाए जिसका वादा उनसे किया जाता है। (83) वही [अल्लाह] है जो आसमानों में भी ख़ुदा है और धरती पर भी ख़ुदा है; वह (हर बात में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला, सब कुछ जाननेवाला है। (84) बड़ी ऊँची शान है उस [अल्लाह] की, जिसके क़ब्ज़े में हर वह चीज़ है जो आसमानों में है, जो ज़मीन पर है और जो कुछ उन दोनों के बीच में है; उसी के पास (आने वाली क़यामत की) घड़ी की जानकारी है; और उसी के पास तुम सब को लौटकर जाना होगा। (85) यह लोग उस (अल्लाह) को छोड़कर जिन ख़ुदाओं को पुकारते हैं, उन्हें तो (अल्लाह से) पैरवी करने का भी कोई अधिकार नहीं है, हाँ उन लोगों की बात अलग है (जिन्हें अल्लाह ने ऐसा करने की अनुमति दी हो) जिन्होंने सच्ची बात की गवाही दी, और उस (सच्चाई) को पहचाना। (86) और अगर आप [ऐ रसूल] इन लोगों से पूछें कि उनको किसने पैदा किया है, तो वह अवश्य ही यह कहेंगे कि “अल्लाह ने।" इसके बावजूद कोई उन्हें कैसे बहका देता है? (87) अल्लाह के रसूल ने कहा कि, ”ऐ मेरे रब! यह ऐसे लोग हैं जो (एक अल्लाह में) विश्वास नहीं रखते,” (88) अत: [ऐ रसूल!] आप इनकी परवाह ना करें और (उनसे हाथ जोड़कर) कह दें, ”सलामती हो!”: बहुत जल्द इन्हें ख़ुद पता चल जायेगा! (89)
नोट:
4: माना जाता है कि क़ुरआन शुरू से ही एक “सुरक्षित पट्टिका” [लौह ए महफ़ूज़/ Preserved Tablet] में मौजूद थी, फिर उसे वहाँ से दुनिया के आसमान पर लाया गया, और फिर उसके बाद थोड़ा-थोड़ा करके मुहम्मद (सल्ल) पर वह किताब उतारी गयी।
5: जो लोग मर्यादा की सारी सीमाएं तोड़ देते हैं, उन्हें भी अल्लाह सही मार्ग दिखाना चाहता है और नसीहत करना नहीं छोड़ता।
12: एक तो ऐसी सवारियाँ हैं जिन्हें बनाने में इंसान का कोई हाथ नहीं, यानी घोड़े, ऊँट जैसे चौपाए वाली सवारियाँ। ये जानवर वैसे तो इंसानों से ज़्यादा ताक़तवर होते हैं, मगर उन्हें आदमी के वश में कर दिया गया है। दूसरे तरह की कुछ सवारियाँ ऐसी हैं जिन्हें इंसान ने अपनी कला से बनाया है, जैसे नौका, जहाज़, रेल आदि, मगर देखा जाए तो इन्हें बनाने में भी जो बुनियादी पदार्थ लगते हैं, और जैसी समझ-बूझ की ज़रूरत होती है, वह भी अल्लाह की ही देन है।
13-14: यह एक दुआ है जो सवारी पर बैठने के समय पढ़ी जाती है, आख़िर में इंसान को अपना अंतिम सफ़र याद दिलाया गया है, जब उसे दुनिया छोड़कर अपने रब के पास लौटकर जाना होगा।
45: पहले के रसूलों से पूछने का मतलब यह है कि उन पर जो आसमानी किताबें उतरी थीं, उनको देख लें कि उनमें लोगों के लिए क्या शिक्षाएं दी गयी थीं।
48: यहाँ निशानियों का मतलब वह मुसीबतें हैं जो मिस्र के लोगों पर बारी-बारी आयी थीं, यानी तूफ़ान, फिर टिड्डी दल, घुन के कीड़े, मेंढकों की भरमार और पानी में ख़ून मिल जाना, जिसका वर्णन सूरह अ’राफ़ (7: 133-135) में आया है।
54: यहाँ फ़िरऔन और उसकी क़ौम के लोगों दोनों को गुनाहगार बताया गया है। फ़िरऔन तो ज़ाहिर है कि अपने को ख़ुदा समझता था और अपनी क़ौम के लोगों पर हर तरह के ज़ुल्म ढाता था, मगर साथ में उनके मन को मोहने में भी कामयाब था। लेकिन उस क़ौम के लोग भी न केवल उसके ज़ुल्म सहते थे बल्कि उसके हर ग़लत काम को सही मान भी लेते थे।
57: जब सूरह अंबिया (21: 98) में बहुदेववादियों से कहा गया था कि अल्लाह को छोड़कर तुम लोग जिन्हें भी पूजते हो, सब जहन्नम का ईंधन बनेंगे। इसके जवाब में उन लोगों ने शोर मचाया और व्यंग्य से कहा कि मान लिया कि हमारे देवता जहन्नम के ईंधन हैं, पर ईसाई लोग जो हज़रत ईसा की पूजा करते हैं, तो क्या वह भी जहन्नम का ईंधन हैं, जबकि मुसलमान तो उन्हें अल्लाह का पैग़म्बर [Prophet] मानते हैं।
61: इस्लामी परम्परा के अनुसार ईसा (अलै.) अपनी मौत नहीं मरे थे, बल्कि अल्लाह ने उन्हें उठा लिया था (4: 158), (3: 55). माना जाता है कि मुहम्मद (सल्ल) ने कहा था कि हज़रत ईसा (अलै.) क़यामत के कुछ पहले दुनिया में दोबारा आएंगे, और यह क़यामत के आने की एक निशानी होगी।
79: मक्का के काफ़िर लोग मुहम्मद (सल्ल) की बढ़ती हुई लोकप्रियता से घबराकर उन्हें गिरफ़्तार करने या क़त्ल कर देने की ख़ुफिया योजनाएं बनाते रहते थे, जैसाकि सूरह अंफ़ाल (8: 30) में भी है।
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