सूरह 29: अल अंकबूत
[मकड़ी / The Spider]
यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम आयत 41 में बयान हुई मकड़ी की मिसाल पर पड़ा है। इस सूरह में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ईमान रखनेवालों की भी परीक्षा ली जायेगी और यह कि उन्हें अपना क़दम मज़बूती से जमाए रखना चाहिए। विश्वास न रखनेवालों के मन में "वही" [revelation] यानी क़ुरआन के उतरने की प्रक्रिया और रसूल को लेकर जो ग़लत धारणा बैठी हुई थी, उसका निवारण किया गया है। पिछले गुज़र चुके नबियों जैसे नूह, इबराहीम, लूत और शुऐब अलै. के हवाले भी दिए गए हैं और साथ में जिन लोगों ने उनकी बात मानने से इंकार किया था उनको मिलने वाली भयानक सज़ा का विवरण भी दिया गया है। सूरह के अंत में उन लोगों की तारीफ़ की गई है जो अल्लाह पर पूरा भरोसा रखते हैं और उसके रास्ते में भलाई की कोशिश करते हैं।
विषय:
02-13: ईमानवालों की परीक्षा ली जायेगी
14-15: नूह (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
16-27: इबराहीम (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
28-35: लूत (अलै) और उनकी क़ौम की कहानी
36-37: शुएब (अलै) और मदयन के लोगों की कहानी
38: 'आद' और 'समूद' के लोगों की कहानी
39-40: मूसा (अलै) और फिरऔन, क़ारून और हामान की कहानी
41-44: मकड़ी की मिसाल
45-47: तीन आसमानी किताबें
48-49: रसूल ने अपने हाथ से कोई किताब नहीं लिखी थी
50-52: कोई निशानी [चमत्कार] दिखाने की माँग
53-55: यातना जल्दी बुलाने की माँग
56-59: नेकी व भलाई के लिए इनाम
60-67: विश्वास न करने वाले असंगत बात करते हैं, और नेमतों का शुक्र अदा नहीं करते
68-69: (सच्चाई पर) विश्वास रखने वाले और इंकार करने वाले
अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है
क्या लोगों ने यह समझ रखा है कि वे इतना कह देने मात्र से छोड़ दिए जाएँगे कि "हम विश्वास करते हैं" और उनकी परीक्षा नहीं ली जाएगी? (2)
वे लोग जो इनसे पहले गुज़र चुके हैं, हमने उन सब लोगों की भी परीक्षा ली थी: अल्लाह उनकी पहचान ज़रूर कर लेगा, कि कौन लोग हैं जो सच्चाई पर हैं, और कौन हैं जो झूठे हैं। (3)
क्या बुरे कर्म करने वाले ऐसा सोचते हैं कि वे हमसे बचकर निकल जाएँगे? (अगर हाँ), तो क्या ही ग़लत अंदाज़ा है उनका! (4)
मगर, वे लोग जो अल्लाह से जा मिलने की उम्मीद में लगे रहते हैं, तो वह यक़ीन रखें कि अल्लाह का तय किया हुआ समय ज़रूर आकर रहेगा; और वही हर चीज़ का सुननेवाला, जाननेवाला है। (5)
और जो लोग (अल्लाह के रास्ते में) संघर्ष करते हैं, तो वे ऐसा अपने ही फ़ायदे के लिए करते हैं---- अल्लाह को अपनी सृष्टि में किसी की भी ज़रूरत नहीं है----- (6)
और जो लोग (एक अल्लाह में) विश्वास रखते हैं, और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो हम ज़रूर उनके बुरे कर्मों को (उनके रिकार्ड से) मिटा देंगे, और उन्हें उनके बेहतरीन कर्मों के हिसाब से (बदले में) इनाम देंगे। (7)
और हमने लोगों को यह आदेश दिया है कि वे अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सलूक करें। किन्तु अगर तुम्हारे माँ-बाप तुम पर ज़ोर डालें कि तुम मेरे सिवा, किसी ऐसे (देवता) को मेरे बराबर का ठहराओ, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं, तो उनकी बात मत मानो: तुम्हें मेरे ही पास लौटकर आना होगा, फिर मैं तुम्हें बता दूँगा जो कुछ तुमने किया होगा। (8)
जो लोग ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते रहे, तो हम उन्हें अवश्य ही नेक लोगों के दर्जे में शामिल करेंगे। (9)
लोगों में कुछ ऐसे हैं जो यह कहते है कि "हम अल्लाह में विश्वास रखते हैं," मगर, जब अल्लाह के रास्ते में उन्हें कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो वे लोगों की दी हुई सख़्त तकलीफ़ को अल्लाह की दी हुई सज़ा समझ बैठते हैं---- फिर भी, आपके रब की तरफ़ से [ऐ रसूल], जब आपको कोई मदद पहुँचती है, तो वे कहते हैं, "हम तो हमेशा से तुम्हारे साथ हैं।" क्या जो कुछ दुनियावालों के सीनों में छिपा है, उसे अल्लाह अच्छी तरह नहीं जानता? (10)
अल्लाह ज़रूर उन लोगों को पहचान लेगा कि कौन लोग हैं जो सचमुच ईमान रखते हैं, और कौन लोग हैं जो पाखंडी [मुनाफ़िक़/Hypocrite] हैं। (11)
जो लोग (सच्चाई में) विश्वास नहीं रखते, वे ईमानवालों से कहते हैं, "तुम हमारे मार्ग पर चलो और हम तुम्हारे गुनाहों (के नतीजे) को झेलने के लिए तैयार रहेंगे", हालाँकि वे ऐसा करने वाले तो हैं नहीं--- सचमुच वे बिल्कुल झूठे हैं। (12)
वे अपने (गुनाहों का) बोझ अवश्य ही उठाएँगे, और इसके साथ दूसरों के (बोझ भी): क़यामत के दिन उनके झूठे व फ़र्ज़ी दावों के बारे में ज़रूर पूछताछ होगी। (13)
हमने नूह [Noah] को उनकी क़ौम के पास भेजा। वह पचास कम एक हजार साल [950 साल] उनके बीच रहे, मगर जब तूफ़ानी बाढ़ ने उन्हें घेर लिया, तब तक वे शैतानियों में ही लगे हुए थे। (14)
फिर हमने उन्हें और उनके साथ नौका में सवार लोगों को बचा लिया, और उस (घटना) को सारी दुनिया के लिए एक निशानी बना दिया। (15)
और हमने इबराहीम [Abraham] को भी भेजा, उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "अल्लाह की बन्दगी करो, और उसका डर रखते हुए बुराइयों से बचते रहो: यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम सचमुच समझ पाओ। (16)
तुम अल्लाह को छोड़कर जिसे पूजते हो, वे तो बस मूर्तियाँ हैं; और जो तुम गढ़ते रहते हो, वे झूठी बातों के सिवा कुछ नहीं है। तुम अल्लाह को छोड़कर जिनको पूजते हो, वे तुम्हें रोज़ी देने का कोई अधिकार नहीं रखते, अतः तुम अल्लाह से ही रोज़ी मांगा करो, उसी की बन्दगी करो, और उसका शुक्र अदा करो: तुम सभी को उसके पास लौटकर जाना होगा। (17)
और अगर तुम कहते हो कि यह बातें झूठी हैं (तो सावधान किया जाता है कि) तुमसे पहले भी कितने ही समुदायों ने इसे झूठ ही बताया था। हमारे रसूल पर तो बस यही ज़िम्मेदारी है कि वह साफ़ व स्पष्ट तरीक़े से (अल्लाह के संदेश द्वारा) सचेत कर दे।" (18)
क्या वे नहीं देखते कि अल्लाह किस तरह किसी चीज़ को (पहली बार) पैदा करता है, और फिर उसको दोबारा भी पैदा कर देता है? सचमुच यह अल्लाह के लिए बेहद आसान है। (19)
कहें कि, "धरती के बड़े हिस्सों में घूमो-फिरो और देखो कि किस तरह अल्लाह ने सृष्टि की रचना की है: अगले जीवन में भी वह इसी तरह उन्हें (दोबारा) पैदा कर देगा। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ करने की ताक़त है। (20)
वह जिसे चाहे दंड दे और जिस पर चाहे दया करे। और तुम सबको उसी के पास लौटकर जाना होगा। (21)
तुम न तो धरती पर उससे बचकर निकल सकते हो, और न आसमानों में; और अल्लाह को छोड़कर कोई न होगा जो तुम्हें बचा सके या तुम्हारी मदद कर सके।” (22)
और जिन लोगों ने अल्लाह की उतारी गयी आयतों [Revelations] को और उससे जा मिलने की बात को मानने से इंकार किया, उन्हें मेरी तरफ़ से दया किए जाने की कोई आशा नहीं: उन्हें बड़ी दर्दनाक यातना होगी। (23)
इबराहीम [Abraham] की क़ौम के लोगों ने जवाब में बस इतना ही कहा था, "मार डालो या जला डालो!” मगर अल्लाह ने इबराहीम को (नमरूद की लगायी हुई) आग से बचा लिया: विश्वास रखनेवालों के लिए सचमुच इस (घटना) में (सीखने के लिए) निशानियाँ हैं। (24)
इबराहीम ने उनसे कहा, "अल्लाह को छोड़कर तुमने मूर्तियों को (ख़ुदा) चुना है (ताकि तुम्हारे दोस्त ख़ुश रहें), मगर उनसे यह तुम्हारा मेल-मिलाप केवल इसी सांसारिक जीवन तक ही चल पाएगा: क़यामत के दिन, तुम एक-दूसरे को दोस्त मानने से इंकार करोगे और एक-दूसरे को बुरा-भला कहोगे। जहन्नम (की आग) ही तुम्हारा ठिकाना होगा और तुम्हारी मदद करने वाला कोई न होगा।" (25)
लूत [Lot] ने उन [इबराहीम] में विश्वास किया, औऱ कहा, "जहाँ मेरा रब मुझे ले जाए, मैं यहाँ से उसी जगह जा रहा हूँ: अल्लाह सबसे प्रभुत्वशाली और (अपने हर काम में) समझ-बूझ रखने वाला है।" (26)
हमने इबराहीम को इसहाक़ [Isaac] और याक़ूब [Jacob] (जैसी औलाद) दी, और उसकी संतानों में (कई लोगों को) पैग़म्बरी [Prophethood] अता की और (कई आसमानी) किताबें उन पर उतारीं। हमने बदले में उसे इस संसार में भी इनाम दिए और आने वाली दुनिया [परलोक] में भी वह नेक बंदों में शामिल होगा। (27)
और (याद करें) लूत [Lot] को: जब उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम ऐसे बेशर्मी के [अश्लील] काम में लगे रहते हो, जिसे दुनिया में तुमसे पहले कभी किसी ने नहीं किया। (28)
किस तरह तुम (मर्द लोग) मर्दों के पास (सेक्स की इच्छा से) जाते हो, यात्रियों का रास्ता रोककर ज़ोर-ज़बरद्स्ती करते हो और अपने समारोहों में भद्दी हरकतें करते हो?" इस बात पर उसकी क़ौम के लोगों का जवाब बस यही था, "तुम जो कहते हो वह अगर सच है, तो ले आओ हम पर अल्लाह की यातना!" (29)
तो लूत ने दुआ की, "ऐ मेरे रब! (समाज में) बिगाड़ पैदा करने वाले लोगों के मुक़ावले में मेरी मदद कर।" (30)
हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) जब इबराहीम के पास (उसके यहाँ बेटा होने की) ख़ुशख़बरी लेकर गए थे, तब उन्होंने (इबराहीम को) बताया, "हम उस (लूत के लोगों की) बस्ती [सुदोम] को बर्बाद करने वाले हैं। निस्संदेह उस बस्ती के लोग शैतानी करने वाले हैं।" (31)
इबराहीम ने कहा, "मगर वहाँ तो लूत मौजूद हैं।" फ़रिश्तों ने जवाब दिया, "वहाँ कौन रहता है, यह बात हम आपसे ज़्यादा अच्छी तरह जानते हैं। हम उसको और उसके घरवालों को बचा लेंगे, सिवाय उसकी पत्नी के: वह उन लोगों में शामिल होगी जो पीछे छूट जाते हैं।" (32)
फिर जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे, तो वह उनके वहाँ आने के मक़सद को सुनकर परेशान और दुखी हो गया। फ़रिश्तों ने कहा, "आप डरें नहीं और न दुखी हों: हम आपको और आपके घरवालों को ज़रूर बचा लेंगे, सिवाय आपकी पत्नी के----- वह उन लोगों में शामिल होगी जो पीछे छूट जाते हैं ---- (33)
हम इस बस्ती के लोगों पर आसमान से एक भयानक यातना उतारने वाले हैं, इस कारण कि वे गंदे [अश्लील] कर्मों में लगे हुए हैं।" (34)
हमने उस बस्ती के कुछ हिस्से [खंडहर] को उन लोगों के लिए एक स्पष्ट निशानी के रूप में छोड़ दिया, जो बुद्धि से काम लेते हैं। (35)
और मदयन [Midian] की तरफ़ हमने उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की इबादत [उपासना] करो, और आने वाले अंतिम दिन [क़यामत] के बारे में सोचो। शैतानियाँ न करो और धरती में बिगाड़ मत फैलाओ।" (36)
मगर उन्होंने उसे झूठा कहा और अन्ततः भूकम्प ने उन्हें दबोच लिया। जब सुबह हुई, तो वे सब अपने घरों में मरे पड़े थे। (37)
और (याद करो) आद और समूद की क़ौम को: (उनकी बर्बादी की कहानी) उनके घरों के बचे हुए खंडहरों को देखकर तुम साफ़ तौर से समझ चुके हो। शैतान ने उनके बुरे कर्मों को उनके लिए सुहावना बनाकर पेश किया, और उन्हें सीधे मार्ग से रोक दिया, हालाँकि वे समझ-बूझ रखनेवाले लोग थे। (38)
और (याद करें) क़ारून [Korah] और फ़िरऔन [Pharaoh] और हामान को: मूसा उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए, किन्तु उन्होंने धरती पर बड़े घमंड से काम लिया। मगर वे हमसे बचकर नहीं निकल सकते थे। (39)
और अन्ततः हमने हर एक को उसके गुनाहों के कारण दंड दिया: उनमें से कुछ पर तो हमने पत्थर बरसाने वाली भयानक आँधी भेजी; कुछ को अचानक हुई एक ज़ोरदार आवाज़ ने आ लिया; कुछ को हमने ज़मीन में धँसा दिया; और उनमें से कुछ को हमने पानी में डुबा दिया। अल्लाह तो ऐसा न था कि उन लोगों पर ज़ुल्म करता; मगर वे स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया करते थे। (40)
जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर अपने लिए दूसरे संरक्षक बना रखे हैं, उनकी मिसाल मकड़ियों जैसी है जो अपने लिए घर बनाती हैं ---- और सच है कि सब घरों से कमज़ोर घर मकड़ी का ही होता है--- काश वे इस बात को समझ पाते! (41)
वे लोग अल्लाह को छोड़कर जिस चीज़ [बुतों] को पुकारते हैं, अल्लाह उसे अच्छी तरह से जानता है: वह सबसे प्रभुत्वशाली और समझ-बूझ रखने वाला है। (42)
हम ऐसी मिसालें लोगों के (समझाने के) लिए देते हैं, परन्तु इनको समझ वही सकते हैं जो ज्ञान रखते हैं। (43)
अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को सच्चे मक़सद के साथ पैदा किया है। जो लोग ईमान रखते हैं, उनके लिए सचमुच इसमें एक बड़ी निशानी है। (44)
[ऐ रसूल] उस किताब को पढ़कर सुनाएं जो आप पर 'वही' [Revelation] द्वारा भेजी गई है; नमाज़ को बराबर अदा करें: बेशक नमाज़ अश्लीलता और बुरे आचरण से रोकती है। और अल्लाह को याद करते रहना सबसे बेहतर चीज़ है: जो कुछ तुम करते हो अल्लाह (तुम्हारे) हर काम को जानता है। (45)
और [ऐ मुसलमानो], किताबवालों [यहूदी, ईसाई] से जब बहस करना पड़े तो बेहतरीन ढंग से ही बहस करो, हाँ जो लोग उनमें से अन्याय करते हैं, उनकी बात अलग है। (उनसे) कहो, "हम विश्वास रखते हैं उस (किताब) पर जो हम पर उतारी गयी, और उस पर भी ईमान रखते हैं जो तुम पर उतारी गयी थी; हमारा ख़ुदा और तुम्हारा ख़ुदा एक ही है; और हम उसी की आज्ञा माननेवाले हैं।" (46)
इसी तरह हमने [ऐ रसूल] आप पर किताब उतारी है, तो (मक्का के) लोगों में से जिन्हें [यहूदी व ईसाई को] हमने पहले से किताब दे रखी थी वे उस (क़ुरआन) में विश्वास रखते हैं, और उन (मक्का के मूर्तिपूजकों) में से भी कुछ लोग इस पर विश्वास रखते हैं। हमारी आयतों को मानने से केवल वही इंकार करते हैं जो (सच्चाई को) न मानने की ज़िद्द पर अड़े रहते हैं। (47)
[ऐ रसूल] यह (किताब) जो आप पर उतारी गयी, उससे पहले आपने कभी कोई किताब न तो पढ़ी थी; और न ही कभी कोई किताब अपने हाथ से लिखी थी। अगर आपने ऐसा किया होता, तो झूठे लोगों को सन्देह करने का बहाना मिल गया होता। (48)
मगर नहीं, यह (क़ुरआन) तो (अल्लाह द्वारा) उतारी गयी है, और यह बात उन लोगों के दिलों में एकदम स्पष्ट है जिन्हें ज्ञान दिया गया है। हमारी आयतों को मानने से केवल वही इंकार करते हैं जो शैतानी कामों में डूबे रहते हैं। (49)
वे [काफ़िर] कहते हैं, "उस (रसूल) के रब ने उसके पास कोई चमत्कार देकर क्यों नहीं भेजा?" आप कह दें, "चमत्कार तो बस अल्लाह के हाथ में है; मैं तो यहाँ केवल इसीलिए हूँ कि तुम्हें साफ़ तौर से सावधान कर दूँ।" (50)
क्या उन लोगों के लिए यह बात काफ़ी नहीं कि हमने आप पर किताब उतारी, जो उन्हें पढ़कर सुनाई जाती है? उन लोगों के लिए सचमुच इसमें बड़ी रहमत [mercy] है, और सीखने के लिए सबक़ है जो ईमान रखते हैं। (51)
कह दें, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह गवाह के रूप में काफ़ी है: जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, वह (सब) जानता है। जो लोग झूठे (देवताओं) में विश्वास रखते हैं, और (एक) अल्लाह को नहीं मानते, वे सख़्त घाटे में रहेंगे।” (52)
वे आपको (उनके लिए) यातना जल्दी बुलाने की चुनौती देते हैं: अगर अल्लाह ने इसका एक नियत समय पहले ही तय न कर दिया होता, तो उनपर अब तक यातना आ चुकी होती, मगर वह आएगी ज़रूर, और इतनी अचानक आएगी कि उन्हें ख़बर तक न होगी। (53)
वे आपको (उनके लिए) यातना जल्दी बुलाने की चुनौती देते हैं: सच्चाई से इंकार करने वालों को जहन्नम अपने घेरे में ले लेगी, (54)
उस दिन जब यातना उन्हें ऊपर से घेर लेगी और उनके अपने पाँव के नीचे से भी, तब उनसे कहा जाएगा, "अब चखो उसका मज़ा जो कुछ तुम किया करते थे!" (55)
ऐ मेरे ईमानवाले बन्दो! मेरी धरती विशाल व बहुत फैली हुई है, अतः तुम मेरी और केवल मेरी ही बन्दगी करो। (56)
हर जान [जीव] को मौत का मज़ा चखना है, फिर तुम हमारे ही पास लौटकर आओगे। (57)
जो लोग (सच्चाई में) विश्वास [ईमान] रखते थे, और अच्छे कर्म करते थे, उन्हें हम बाग़ों [जन्नत] के ऊँचे महलों में रहने की जगह देंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, वे उसमें हमेशा रहेंगे। क्या ही अच्छा इनाम है उन लोगों के लिए, जो (सही मार्ग पर चलने के लिए) मेहनत करते हैं, (58)
(सच्चाई पर) सब्र व धैर्य से जमे रहते हैं, और जो अपने रब पर भरोसा रखते हैं! (59)
कितने जीव-जंतु ऐसे हैं जो अपनी रोज़ी जमा करके नहीं रखते! अल्लाह ही उन्हें भी रोज़ी देता है और तुम्हें भी: वही तो है जो सब कुछ सुनता है, और सब जानता है। (60)
और अगर तुम उन (विश्वास न करनेवालों) से पूछो कि "किसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया और सूरज और चाँद को काम पर लगा दिया?" तो वे ज़रूर कहेंगे, "अल्लाह ने!" तो फिर क्यों वे उस (अल्लाह) से मुँह मोड़ते हैं? (61)
वह अल्लाह ही है जो अपने बन्दों में से जिसे चाहता है भरपूर रोज़ी देता है और जिसे चाहता है, रोज़ी में कमी कर देता है: अल्लाह हर एक चीज़ की पूरी जानकारी रखता है। (62)
और अगर तुम उनसे पूछो कि "कौन है जो आसमान से पानी बरसाता है, और उससे मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को फिर से ज़िंदा कर देता है?" तो वे ज़रूर बोल पड़ेंगे, "अल्लाह!" आप कहें, "सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है!" किन्तु उनमें से अधिकतर लोग बुद्धि से काम नहीं लेते। (63)
इस दुनिया की ज़िंदगी तो बस खेल-तमाशा और दिल का भटकाव मात्र है; असल ज़िंदगी तो आने वाली दुनिया [परलोक] में है, अगर वे सचमुच जान पाते! (64)
जब कभी वे पानी के जहाज़ों में सवार होते हैं, तो वे (मुसीबत में अपने देवताओं को छोड़कर) अपनी पूरी भक्ति केवल अल्लाह में दिखाते हुए उसे ही पुकारते हैं। मगर जैसे ही वह उन्हें सही-सलामत वापस ज़मीन पर ले आता है, तो क्या देखते हैं कि वे अचानक दूसरों को उस (अल्लाह) का साझेदार [Partner] ठहराने लग जाते हैं! (65)
जो कुछ (नेमत) हमने उन्हें दिया है उसके बदले में उन्हें कर लेने दो हमारी नाशुक्री [ingratitude]; और उड़ा लेने दो कुछ मज़े---- जल्द ही उन्हें पता चल जाएगा। (66)
क्या वे देखते नहीं कि हमने (उनके शहर) [मक्का] को एक शांत व सुरक्षित जगह बनाया है, जबकि उसके आसपास की जगहों में लोगों के साथ छीना-झपटी होती है? तब भी, कैसे वे झूठी चीज़ में विश्वास रखते हैं और अल्लाह के एहसानों को मानने से इंकार करते हैं? (67)
उस आदमी से बड़ा शैतान कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ता हो, या जब उसके पास सच्ची बात पहुँचे तो उसको झूठी बताए? क्या (ऐसे) इंकार करने वालों का ठिकाना जहन्नम नहीं होगा? (68)
जो लोग हमारे मक़सद के लिए जी-तोड़ कोशिश करते हैं, उन्हें अवश्य ही रास्ता दिखाते हुए हम अपने मार्ग पर लगा देंगे: अल्लाह हमेशा अच्छा कर्म करने वालों के साथ है। (69)
नोट:
6: मन की इच्छाओं पर क़ाबू पाना, शैतान के बहकावे से अपने को बचाना, अल्लाह का संदेश लोगों तक पहुँचाते हुए नसीहत करना, और अल्लाह के रास्ते में लड़ना --- सब इस संघर्ष में शामिल है।
8: अपने माँ-बाप के साथ हर हाल में अच्छा बर्ताव करना चाहिए; लेकिन अगर वह अल्लाह को छोड़कर किसी और को ख़ुदा मानने पर मजबूर करें, तो उनकी बात मानना ठीक नहीं है, सो उन्हें नर्मी से मना कर दें।
10: ऐसे पाखंडी लोगों को जैसे ही तकलीफ़ पहुँचती है तो तुरंत ही उनका विश्वास डगमगा जाता है और वे विश्वास न करने वालों से जा मिलते हैं। लेकिन अगर मुसलमानों को अल्लाह की मदद से जीत मिल जाए तो ये पाखंडी लोग तुरंत उनसे मिल जाने की कोशिश करते हैं ताकि उससे कुछ फ़ायदा उठा सकें।
13: जिन लोगों को उन्होंने गुमराह किया होगा, उनके गुनाहों का बोझ भी उन्हें उठाना होगा। और जिसने गुनाह किया, वह भी सज़ा से बच नहीं पाएगा।
15: नूह (अलै.) की घटना सूरह हूद (11:25) में भी आयी है।
24: इबराहीम (अलै.) की घटना के लिए देखें सूरह अंबिया (21: 51)
26: “जहाँ मेरा रब मुझे ले जाए”, अगर यह बात हज़रत इबराहीम (अलै.) ने कही है, तो इसका मतलब यह है कि आग से बच जाने के बाद उन्होंने समझ लिया कि बाबिल (इराक़) में अब उनका रहना ठीक नहीं है जहाँ कोई उनकी बात पर विश्वास करने वाला नहीं है, एक मात्र हज़रत लूत जो उनके भतीजे/ भांजे थे, उन्होंने ही आप पर विश्वास किया था। फिर अल्लाह की मर्ज़ी से वह सीरिया की तरफ़ चले गए, उनके साथ लूत भी थे। बाद में अल्लाह ने लूत अलै. को पैग़म्बर बनाकर सदूम और अमूरा की बस्तियों की तरफ़ अपना संदेश पहुँचाने के लिए भेजा था।
अगर यह बात हज़रत लूत (अलै.) ने कही है, तो इसका मतलब होगा कि सदूम की तबाही के बाद अब जहाँ अल्लाह की मर्ज़ी होगी, वहाँ चले जाएंगे।
31: इस घटना का ज़िक्र सूरह हूद (11: 69), और सूरह हिज्र (15: 51) में भी आया है।
37: देखें सूरह अ’राफ़ (7: 84) और सूरह हूद (11: 83)
38: मक्का से चलने वाले कारवाँ हमेशा यमन और सीरिया के व्यापारिक मार्ग पर इन खंडहरों से होकर गुज़रते थे। देखें सूरह अ’राफ़ (7: 64-72), सूरह हूद (11: 64—72).
वे लोग दुनिया के कामों मे बड़े समझदार और होशियार थे, मगर आख़िरत/ [परलोक] की ज़िंदगी को बिल्कुल भुलाए बैठे थे।
40: आद की क़ौम के मारे जाने का विवरण: सूरह अ’राफ़ (7: 64)
समूद की तबाही: सूरह क़सस (28: 75)
क़ारून को ज़मीन में धंसा देना: सूरह क़सस (28: 75)
41: बाहर से मकड़ी का जाला इतना कमज़ोर होता है कि वह मकड़ी को बारिश या तेज़ हवा से बचा नहीं पाता, और अंदर से उनका पारिवारिक ढाँचा भी इतना कमज़ोर होता है कि उनमें नर-भक्षण की प्रवृति पायी जाती है, जिसमें मादा नर को खा जाती है, और बच्चे माँ को खा जाते हैं।
44: इस कायनात को बनाने का मक़सद यही है कि दुनिया में लोगों को आज़माया जाए, और फिर लोगों के कर्मों के अनुसार उन्हें इनाम या सज़ा दी जाए।
56: जब मक्का में मुसलमानों पर बहुत ज़ुल्म होने लगा और वहाँ रहते हुए उन्हें अपने दीन पर चलना बहुत मुश्किल लगने लगा, तो इस आयत में यह इशारा किया गया है कि वे कहीं ऐसी जगह चले जाएं जहाँ शान्ति से रहकर अपने दीन पर क़ायम रहा जा सकता है। इसी के बाद कुछ लोग अबीसीनिया (हिजरत करके) चले गए थे।
57: यानी दूसरी जगह जाने में अपने लोगों और माल-असबाब छोड़ने का जो डर होता है, वह बेकार का डर है क्योंकि एक दिन तो सबको मरना ही है और तब ये सारी चीज़ें छूट जाएंगी।
60: दूसरी जगह चले जाने पर रोज़ी छिन जाने का डर भी होता है, लेकिन अल्लाह ही है जो जानवरों समेत सबको रोज़ी देने वाला है।
67: मक्का एक सुरक्षित पनाहगाह मान जाता था। इसीलिए वहाँ लड़ाई-झगड़े की अनुमति नहीं थी, और जो कोई मक्का में दाख़िल हो जाता (ख़ासकर काबा के नज़दीक) तो वह सुरक्षित हो जाता। यह मक्का का एक ख़ास अधिकार था जो किसी और शहर को प्राप्त नहीं था।
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