सूरह 4: अन-निसा
[औरतें/ Women]
यह सूरह मदीना में उतरी थी, और इस सूरह का नाम अन-निसा यानी औरतें इसलिए पड़ा कि पूरी सूरह में औरतों के अधिकारों के बारे में कई हवाले आए हैं (आयत 3-4, 127-130). इस सूरह में बहुत से आदेश दिए गए हैँ जिनमें बच्चों और यतीमों के साथ ख़ास करके इंसाफ़ करने, संपत्ति का बंटवारा करने और शादी-ब्याह के नियमों का ज़िक्र आया है। आयत 5-12 में संपत्ति और विरासत के बंटवारे के नियम बताए गए हैं। सभी के साथ इंसाफ़ करने पर ज़ोर दिया गया है, जिसमें यहूदियों के साथ इंसाफ़ करने का एक ख़ास उदाहरण आयत 105-112 में आया है, और कुछ नियम सूरह के आख़िर में भी आए हैं। इसके अलावा, यह सूरह मदीना के मुस्लिम समुदाय और किताबवालों के बीच चल रहे तनाव के बारे में भी बताती है (आयत 44, 61), फिर ईसा अलै. के सूली चढ़ाये जाने और उन्हें "ख़ुदा का बेटा" मानने के दावे को भी नकारा गया है, फिर उसके बाद युद्ध की भी चर्चा हुई है: मुसलमानों को होशियार रहने और कमज़ोरों और असहायों की रक्षा करने को कहा गया है (71-76). पिछली मदनी सूरह की तरह, यहाँ भी पाखंडियों द्वारा चली गई चालों के बारे में बताया गया है (88-91, 138-146).
02-06: यतीमों के साथ सलूक और शादी-ब्याह
07-14: संपत्ति में बंटवारे का नियम
15-28: औरतों और शादी-ब्याह से जुड़े हुए नियम-क़ायदे
29-31: जुआ खेलना और क़त्ल करना
32-33: दूसरों का माल न हड़पो
34-35: औरतों के प्रति मर्दों की ज़िम्मेदारियाँ
36 : अल्लाह की बंदगी करो
36-42: ज़रूरतमंदों को ज़कात देना बंद करने के ख़िलाफ चेतावनी
43 : नमाज़ के लिए तैयारी
44-57: किताबवाले लोगों की कड़ी निंदा
5 : अमानतों को लौटाना ज़रूरी
59-70: विवाद का निपटारे के लिए रसोल के पास जाएं
71-78: अल्लाह के रास्ते में लड़ना
79-84: रसूल का उत्साह बढ़ाना
85 : अच्छाई या बुराई के पक्ष में बोलनेवाला अच्छाई या बुराई का हिस्सेदार होगा
86 : सलाम करने वाले को अच्छा जवाब देना चाहिए
87 : दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है
88-91: पाखंडियों के साथ सलूक
92-93: एक ईमानवाले को दूसरे ईमानवाले का क़त्ल नहीं करना चाहिए
94 : दुश्मन अगर लड़ाई के दौरान अपने ईमान का दावा करे, तो उसकी बात मान लो
95-96: लड़ाई में साथ जानेवाले और युद्ध में भाग न लेते हुए रुक जाने वाले
97-100 : घर-बार छोड़कर मदीना चले जाना
101-104: ख़तरे के समय नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा
105-115: विश्वासघात करने वालों के साथ कोई नर्मी नहीं
116-122: मूर्तिपूजा और सच्चा दीन
123-124: बुराई करने वालों को सज़ा, नेकी करने वालों को इनाम
125-126: इबराहीम (अलै) का दीन
127-130: औरतों से जोड़े हुए निर्देश
131-137: विश्वास करने और इंकार करने के नतीजे
138-152: पाखंडियों और विश्वास न करने वालों की कड़ी निंदा
153-162: किताबवाले लोगों की निंदा
163-170: रसूल पर उतरने वाली 'वही', और उनसे पहले के रसूल
171-173: किताब वालों की कड़ी निंदा
174-175: ईमान के लिए अपील
176 : अप्रत्यक्ष वारिस (न कोई बच्चा, न माँ-बाप बचा हो), और उसकी विरासत के नियम
1: लोग एक-दूसरे से अपना हक़ माँगते हुए अक्सर कहते हैं कि "तुम्हें ख़ुदा का वास्ता, मेरा हक़ मुझे दे दो," तो जिस तरह हक़ लेने के लिए अल्लाह का वास्ता देते हैं, उसी तरह, जब दूसरों का हक़ देना हो, तो अल्लाह से डरते हुए उसे पूरा-पूरा अदा करना चाहिए। इसी तरह, रिश्तेदारों [womb-relationship] से संबंध न तोड़ने का ज़िक्र 47:22 में भी आया है।
2: किसी मरने वाले के बच्चे जब अनाथ हो जाते हैं तो उनके बाप की विरासत में उनका भी हिस्सा होता है, मगर उस समय उनकी उम्र कम होने की वजह से वह माल उन्हें नहीं दिया जाता, बल्कि उनके सरपरस्त [अभिभावक/Guardian] जैसे चाचा, भाई आदि उसे अमानत के तौर पर अपने पास रखते हैं, और जब बच्चा बालिग़ और समझदार हो जाए, तो उसकी अमानत उसे सही-सलामत लौटा देनी चाहिए।
3: बुख़ारी की हदीस से पता चलता है कि कभी-कभी ऐसा होता कि कोई अनाथ लड़की अपने चचेरे भाई की सरपरस्ती [guardianship] में होती थी, अगर वह हसीन होती और उसकी धन-संपत्ति भी काफ़ी होती, तो उसका चचेरा भाई चाहता था कि बालिग़ होने पर वह उस लड़की से शादी कर ले ताकि पूरा माल उसी के क़ब्ज़े में रह जाए, मगर वह निकाह में मेहर इतना नहीं देना चाहता था जितना उस जैसी लड़की को देना चाहिए। दूसरी तरफ, लड़की अगर ख़ूबसूरत न होती तो उसके माल की लालच में उससे शादी तो कर लेता था, लेकिन उसके साथ अच्छा सुलूक नहीं करता था और मेहर भी कम-से-कम रखता था। इस आयत में ऐसे ही लोगों को हुक्म दिया गया है। देखें 4: 127
यहाँ ध्यान देने की बात है कि एक से ज़्यादा शादी करने का वर्णन अनाथ लड़कियों के संदर्भ में आया है, जिससे पता चलता है कि यह सामान्य नियम नहीं था बल्कि उस ज़माने में बद्र व उहुद की लड़ाइयों में मारे गए लोगों के नतीजे में अचानक विधवाओं और अनाथ लड़कियों की देखरेख की समस्या पैदा हो गई थी जिसके समाधान के तौर पर यह नियम बनाए गए थे। क़ुरआन अकेली ऐसी आसमानी किताब है जो 'एक शादी' करने को कहती है। पहले के सभी धर्मों से अलग हटकर इसमें मर्दों की शादी के लिए अधिकतम सीमा तय कर दी है। विशेष परिस्थिति मेंं मुस्लिम मर्द ज़्यादा से ज़्यादा चार औरतों से शादी कर सकता है बशर्ते कि वह उनके ख़र्चे-पानी का इंतज़ाम कर सकता हो, और उन सभी के साथ बराबरी का सलूक कर सकता हो, और अगर वह ऐसा नहीं कर सकता तो एक ही शादी करे। हालाँकि आगे आयत 129 में यह भी है कि यह मुमकिन नहीं है कि सभी बीवियों के साथ बराबरी का सलूक कर सके।
लौंडी एक ग़ुलाम महिला [दासी] होती थी जिसे या तो उसके मालिक ने ख़रीदा हो या युद्ध-बंदी के रूप में वह हाथ आ गयी हो---- यह एक बड़ी पुरानी परम्परा थी जो उस समय दुनिया के बहुत से देश में प्रचलित थी। इस्लाम ने इसे ख़त्म करने की कोशिश इस तरह की कि ग़ुलामों को आज़ाद करने के काम को सदक़ा/दान देने [charity] का काम बना दिया। बहुत से गुनाहों (जैसे अपनी क़सम तोड़ना, बे-इरादा क़त्ल करना, या रमज़ान के दिन में बीवी के साथ सेक्स करना आदि) की भरपाई के लिए तरीक़ा यह बनाया गया कि ग़ुलामों को आज़ाद किया जाए। इसी तरह इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ केवल युद्ध में बंदी बनाए गए क़ैदियों को ही ग़ुलाम बनाया जा सकता था, और अगर उनके रिश्तेदार उसके लिए भरपाई की रक़म अदा कर दें, या वह युद्ध-बंदी अगर मुसलमानों को पढ़ना-लिखना या कोई दस्तकारी/हुनर या अपनी भाषा सिखा दे, तो वह आज़ाद हो जाता था। किसी आज़ाद आदमी को ग़ुलाम नहीं बनाया जा सकता था। ग़ुलामों की सामाजिक हालत में भी सुधार किया गया। ग़ुलाम औरत से उसके बच्चे को अलग करने को ग़ैर-क़ानूनी बनाया गया। जिस मालिक और लौंडी के रिश्ते से बच्चे होते, वे आज़ाद हो जाते, उसी तरह लौंडी भी अपने मालिक के मरते ही आज़ाद हो जाती थी। बहुत ज़माने के बाद तुर्की के ओटोमन साम्राज्य ने 1847 ई में और अमेरिका ने यह प्रथा 1865 ई में समाप्त करने की घोषणा की।
7: इस्लाम से पहले जाहिलियत के ज़माने में औरतों को विरासत में कोई हिस्सा नहीं दिया जाता था।
8: जैसे अगर कोई अनाथ बच्चा है और उसके दादा भी मर जाएं जिनपर उस अनाथ बच्चे की देखभाल की ज़िम्मेदारी थी, तो ऐसी हालत में कुछ विद्वान मानते हैं कि उस बच्चे के लिए वसीयत ज़रूर करनी चाहिए, हालाँकि विरासत के नियम से उस बच्चे को हिस्सा नहींं मिलेगा।
11: विरासत के बंटवारे के समय सबसे पहले यह देखना है कि अगर मरने वाले के ऊपर कोई क़र्ज़ था या उसकी कोई देनदारी थी (जैसे कफ़न-दफ़न का ख़र्च, किसी को देने का वचन दिया हो आदि), तो उसे पहले चुका दिया जाए, फिर यह कि अगर उसने कोई वसीयत कर रखी हो कि फ़लाँ आदमी को इतना दे दिया जाए (जबकि वह हक़दार न हो), तो उस पर अमल किया जाएगा।
विरासत के क़ानून के अनुसार, औरत को चाहे वह माँ हो, बीवी हो, बहन हो या बेटी हो, उसे मरने वाले से नज़दीकी के हिसाब से तीन तरह के हिस्से में से एक हिस्सा ज़रूर मिलता है:
(i) मर्द के हिस्से से कम मिलना: अगर वह बेटी है, तो उसे अपने भाई के हिस्से का आधा मिलेगा, क्योंकि उसके भाई पर पूरे परिवार को चलाने की ज़िम्मेदारी है।
(ii) मर्द के हिस्से से ज़्यादा मिलना: उदाहरण के लिए, मान लें कि एक आदमी 24000/- रुपया छोड़कर मरा, परिवार में 6 बेटे, दो भाई, एक बीवी और एक माँ हैं। तो बीवी को आठवाँ हिस्सा (3000/-), माँ को छठा हिस्सा (4000/-), हर बेटे को क़रीब 2,833/- और दो भाइयों को कुछ नहीं मिलेगा।
(iii) बराबर हिस्सा मिलना: माँ की तरफ़ से भाई-बहनों को बराबर मिलेगा (देखें आयत 12).
यहाँ ध्यान देने की बात है कि मरने वाले के भाई-बहन होने की हालत में माँ का हिस्सा एक तिहाई से घटकर छठा (1/6) हो जाता है, मगर भाई-बहन को कोई हिस्सा नहीं मिलता है, और सम्पत्ति का बचा हुआ हिस्सा बाप का हो जाता है।
12: अगर मरने वाले के माँ की तरफ़ से दो या दो से ज़्यादा भाई-बहन हों, तो माल में से सबको एक तिहाई बराबर-बराबर मिलेगा----यहाँ औरत को मर्द के बराबर हिस्सा मिलेगा। वसीयत में कुल माल का एक-तिहाई से ज़्यादा नहीं दिया जा सकता ताकि जो वारिस असल में हक़दार हैं उन्हें नुक़सान न हो।
15: औरत (विवाहित या अविवाहित) अगर बदचलन हो जाए और बाहर जाकर किसी के साथ अवैध सेक्स कर बैठे, तो यह हुक्म था कि मौत आने तक उसे घर से बाहर न निकलने दिया जाए ताकि ग़लत काम करने का मौक़ा ही न मिल सके या यह कि अल्लाह ही उसके लिए कोई दूसरा रास्ता निकाल दे, जैसे कि किसी के साथ उसकी शादी हो जाए। बाद में, 'सूरह नूर' में ऐसी हरकत कर बैठने पर मर्द और औरत दोनों को 100-100 कोड़े मारने की सज़ा बताई गई (24:2)।
कुछ विद्वानों के अनुसार यह हुक्म केवल अविवाहित औरतों के लिए है। बताया जाता है कि मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा था कि अब अल्लाह ने ऐसी औरतों के लिए रास्ता पैदा कर दिया है, और वह यह कि मर्द और औरत अगर विवाहित नहीं हैं तो उनकी सज़ा 100 कोड़े होगी और अगर वे विवाहित हों तो उन्हें पत्थर से मारा जाएगा, हालाँकि पत्थर से मारने की सज़ा का क़ुरआन में कहीं ज़िक्र नहीं है! देखें 24:2 का नोट।
16: कोई मर्द या औरत जब किसी के साथ अवैध सेक्स कर बैठे तो शुरुआत में इसकी यही सज़ा बताई गई थी। 'चोट पहुंचाने' का मतलब सबके सामने फटकार लगाना है, जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार इसमें जूते से पिटवाना भी शामिल है। कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि इस आयत में एक मर्द का दूसरे मर्द के साथ सेक्स [Homo-sex] करने पर दी जाने वाली सज़ा के बारे में बताया गया है|
17: आदमी अगर मरने से पहले-पहले अपने गुनाहों से तौबा कर ले, तो उसकी तौबा क़बूल हो सकती है, मगर आदमी को चाहिए कि तौबा जल्दी से जल्दी कर ले क्योंकि उसे नहीं मालूम कि कब उसकी मौत आ जाएगी।
19: इस्लाम से पहले अरब में यह रस्म भी चली आ रही थी कि जब कोई औरत विधवा हो जाती, तो मरने वाले का वारिस [घर का कोई मर्द या सौतेला बेटा], उस विधवा का भी मालिक बन बैठता था, और तब वह उनकी इजाज़त के बिना न तो दूसरी शादी कर सकती थी और न ही ज़िंदगी के दूसरे बड़े फ़ैसले ले सकती थी। इसी तरह, एक और बुरी रस्म यह थी कि जब कोई मर्द अपनी बीवी को तलाक़ देना चाहता तो साथ में वह यह भी चाहता कि उसकी दी हुई मेहर उसे वापस मिल जाए, और इसके लिए वह अपनी बीवी को तरह-तरह से तंग करना शुरू कर देता था, ताकि बीवी तंग आकर ख़ुद ही यह कहे कि तुम अपनी दी हुई मेहर वापस ले लो और मुझे तलाक़ दे दो कि मेरी जान छूटे। यहाँ इन दोनों रस्मों को बंद करने का हुक्म दिया गया है।
20: ऊपर की आयत से पता चलता है कि तलाक़ देते समय बीवी से मेहर वापस नहीं ली जानी चाहिए। हाँ, अगर बीवी खुले आम कोई बदचलनी का काम कर बैठे, तो केवल उसी सूरत में तलाक़ देते समय उससे मेहर वापस ली जा सकती है। लेकिन अगर उसने ऐसा कोई काम नहीं किया है तो फिर इसका मतलब यह होगा कि मर्द को मेहर वापस लेने के लिए बीवी पर कोई झूठा इल्ज़ाम लगाना होगा जो कि और भी ग़लत होगा।
22: इस्लाम आने से पहले जाहिलियत के ज़माने में लोग अपनी सौतेली माँ से भी निकाह करना बुरा नहीं समझते थे, इस आयत ने ऐसे रिश्ते को स्वीकार करने से मना कर दिया। हाँ, जो पहले हो चुका, उसे माफ तो कर दिया गया, मगर इस शर्त के साथ कि निकाह का यह रिश्ता तोड़ दिया जाए।
23: इस्लाम में ऐसी औरतें जिन्होंने किसी बच्चे को अपना दूध पिलाया हो, वह दूध के रिश्ते से माँ होती हैं, इसी तरह, जिन-जिन बच्चों को उस औरत ने दूध पिलाया, वे सब दूध के रिश्ते से भाई-बहन हुए और उनसे भी शादी नहीं हो सकती।
24: जो लौंडियाँ [Female slaves] किसी युद्ध के दौरान बंदी बनाकर लाई जाती थीं, अगर उनके पति भी साथ होते, तो उन लौंडियों के मालिकों को उन्हें छूने की इजाज़त नहीं थी। लेकिन अगर उनके पति अपने मुल्क में ही रह जाते थे, तो उनका निकाह उनके पतियों से समाप्त हो जाता था। अब अगर कोई मुसलमान मर्द उस लौंडी से शादी करना चाहता, तो उसे पहले यह देखना ज़रूरी था कि कहीं वह गर्भवती न हो, इसलिए कम से कम जब एक माहवारी गुज़र जाती और उन्हें अपने पिछले पति से कोई बच्चा न ठहरता, तब उससे शादी हो सकती थी।
25: आज़ाद औरतें अगर विवाहित न हों, और अगर उन्होंने किसी मर्द के साथ सेक्स कर लिया तो उसकी सज़ा सौ कोड़े हैं जिसका ज़िक्र सूरह नूर की दूसरी आयत में आया है।
इस आयत में ग़ुलाम लौंडियों के लिए उसी जुर्म की सज़ा आधी यानी पचास (50) कोड़े तय कर दी गयी है। किसी ग़ुलाम-लौंडी से शादी करना कोई बे-इज़्ज़ती की बात नहीं क्योंकि वह भी इंसान है। ध्यान रहे कि शादी-शुदा लौंडियों के साथ उसका मालिक शारीरिक संबंध नहीं रख सकता था।
32: कुछ औरतों ने यह तमन्ना की थी कि काश वह मर्द होतीं और जिहाद में हिस्सा लेतीं तो उन्हें और अधिक सवाब (पुण्य) होता, लेकिन यहां यह कहा गया है कि कुछ मामलों में मर्दों को फ़ज़ीलत है और कुछ मामलों में औरतों को, मगर जिसके हाथ में जितना है, उसके अंदर रहते हुए उन्हें अधिक से अधिक नेकी के काम करने चाहिए।
33: इस्लाम के पहले से दोस्तों और साथियों के बीच वचन लेने की परम्परा वहाँ रही थी। अगर कोई आदमी इस्लाम क़ुबूल करता और उसके कोई रिश्तेदार न होते, तो जिसके द्वारा वह मुसलमान बनता, उसके हाथ पर हाथ रखकर वचन लेता कि अब से वह उसका "भाई" है, फिर संपत्ति के बंटवारे में भी वह उसका हिस्सेदार होता था, इस हक़ को "मवालात" कहते थे। यह परम्परा आयत 8:75 के उतरने के बाद ख़त्म हो गई। हालाँकि दोस्तों/साथियों का विरासत [inheritance] में हिस्सा अब नहीं रह गया, फिर भी वसीयत [bequest] के ज़रिये उन्हें कुछ हिस्सा मिल जाता था।
34: सिर-चढ़ी बीवी या दूसरे मर्द की तरफ़ आकर्षित हुई बीवी (जिसने भरोसा तोड़ा हो) को सुधारने का आख़िरी तरीक़ा यहाँ बताया गया है कि उसे हल्के से मारा जा सकता है (अदरबू)। सूरह उतरने के हालात में बताया गया है कि एक ही चोट [single blow] मारी जानी चाहिए जिससे बदन पर किसी तरह का निशान न पड़े, मारने के लिए जो लकड़ी हो, वह टूथ ब्रश से बड़ी न हो, और चेहरे पर न मारा जाए। मुहम्मद (सल्ल) ने अपने साथियों से कहा था कि वे अपनी बीवियों को न मारा करें, उनका यह भी कहना था कि कोई भी इज़्ज़तदार मर्द अपनी बीवी को नहीं मारता, और ख़ुद उन्होंने कभी अपनी बीवियों या अपनी लौंडियों पर हाथ नहीं उठाया।
कुछ विद्वान मानते हैं कि "अदरबू" का एक मतलब 'अलग हट जाना' भी होता है, जो इस आयत में शायद कहा गया है, जैसा कि बताया जाता है कि एक बार मुहम्मद (सल्ल) जब अपनी बीवियों की मांगों से परेशान हो गए थे, तो एक महीने तक वह उनसे अलग-थलग होकर रहे थे। बहरहाल, अगर किसी औरत को लगता है कि उसके पति ने उसके साथ बुरा सलूक किया है, तो वह अपने अभिभावक से मदद ले सकती है या तलाक़ भी माँग सकती है।
36: पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। पड़ोसी चाहे इतने नज़दीक रहते हों कि उनके घर की दीवारें एक-दूसरे से मिलती हों, या उनके घर ज़रा सा दूर हों, चाहे वह नज़दीकी रिश्तेदार हों या अनजान हों या फिर दूसरे धर्म के मानने वाले हों। सबके साथ ख़ूब अच्छा सलूक करना चाहिए।
इसके अलावा यात्रा केे दौरान या कहीं लाइन में खड़े हुए किसी आदमी से मुलाकात हो जाती है, वह भी एक तरह के पड़ोसी हुए, उनके साथ भी अच्छा व्यवहार करना चाहिए, बल्कि इससे आगे हर मुसाफ़िर और हर रास्ता चलते आदमी के साथ भी अच्छा सलूक करना चाहिए।
41: क़यामत के दिन हर नबी को अपनी-अपनी उम्मत के अच्छे-बुरे काम की गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा।
43: इस आयत में शराब पीकर नमाज़ न पढ़ने का हुक्म है, असल में शराब को एक बार में ही हराम [Prohibited] नहीं करके, तीन चरणों में किया गया, फिर अंत में इसे पूरी तरह हराम कर दिया गया। देखें 2: 219; 4: 43; और 5: 90-91
यह नियम "तयम्मुम" यानी सूखा वुज़ू कहलाता है। सेक्स करने या वीर्य निकल जाने के बाद नापाकी की हालत में नहाना ज़रूरी है, लेकिन अगर पानी न मिले या बहुत ठंढ या बीमारी के चलते पानी का उपयोग न कर पाए, तो ऐसी हालत में अपनी हथेली को साफ़ मिट्टी या बालू पर मारकर अपने हाथ पर फेर लें और अपने चेहरे और हाथ पर मल लें [तयम्मुम]।
46: "राइना" शब्द को अगर अच्छे ढंग से बोला जाए तो उसका मतलब होगा "हमारी ओर देखें" लेकिन जैसा 2:104 में भी आया है कि मदीना के यहूदी लोग जान बूझकर मुहम्मद (सल्ल) को बेइज़्ज़त करने के लिए इस लफ़्ज़ को तोड़-मतोड़कर बोलते थे, जिससे मतलब बदलकर यह हो जाता था कि "तुम बुद्धू हो" या "तुम हमारी भेड़ों के चरवाहे हो", इसीलिए ईमानवालों को "राइना" के बदले "उंज़ुरना" बोलने को कहा गया है।
47: यहाँ शाब्दिक अर्थ भी है और रूपक का प्रयोग भी। अल्लाह उनकी आंखों को पीठ के पीछे कर सकता है, या उनके चेहरों को उनकी गर्दनों के पिछले हिस्से की तरह कर सकता है, या वे अंधे कर दिए जाएंगे जिससे वे सच्चाई व मार्गदर्शन को न समझ सकें। या तुम्हारे अंदर "दिशा की समझ को मिटा दें" या "चेहरा बिगाड़कर रख दें।"
"सब्त" मनानेवाले असल में लाल सागर के किनारे बसे (ऐला या मदयन शहर) यहूदी लोग थे, उन्हें सब्त के दिन मच्छलियों के शिकार पर रोक थी, मगर उसी दिन मछलियाँ दिखायी पड़ती थीं जिससे लोगों ने बहाने करके उसका शिकार शुरू कर दिया था। (देखें 7:163-165).
48: अगर कोई आदमी सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार करता है, और इसी हलत में मर जाता है, तो उसके गुनाहों को माफ नहीं किया जाएगा। लेकिन अगर वह मरने से पहले अपनी ग़लतियों पर पछताता है और अपने मे6 सुधार लाता है, तो उसकी तौबा क़बूल की जाएगी (देखें 25: 68-70).
51: यहां एक सच्ची घटना का हवाला दिया गया है, बताया जाता है कि मक्का के विश्वास न करनेवालों का एक समूह मदीना के दो बड़े प्रमुख यहूदी सरदारों के पास मुहम्मद (सल्ल) की शिक्षाओं की सच्चाई के बारे में सलाह-मशविरा करने गया था, और तब यहूदी सरदारों ने उनसे कहा था कि मुसलमानों से ज़्यादा तो बहुदेववादी सही रास्ते पर हैं। मदीना के यहूदियों का मुसलमानों के साथ शांति से रहने और एक दूसरे के ख़िलाफ़ किसी बाहरी दुश्मन की मदद न करने का समझौता था। मगर इसके बावजूद उन लोगों ने मुसलमानों के दुश्मन यानी मक्का के बह़देववादियों के साथ सांठ-गांठ की।
53: यहूदियों की मुसलमानों से चिढ़ और नफ़रत की असल वजह यह थी कि वे चाहते थे कि जिस तरह पहले बहुत से नबी इसराइल की संतानों में से हुए थे, आख़िरी नबी भी उन्हीं के ख़ानदान से होते, मगर मुहम्मद सल्ल. इब्राहीम अलै. के दूसरे बेटे इस्माईल (अलै.) की संतानों में से थे। लेकिन यह तो अल्लाह ही फ़ैसला करने वाला है कि वह किसे अपना नबी बनायेगा, कोई यहूदियों को कायनात की बादशाही तो मिली नही हुई है! लेकिन अगर उनकी बादशाही होती, तो अपनी कंजूसी के चलते उनलोगों ने किसी को राई बराबर भी कुछ न दिया होता!
58: जब मक्का को मुसलमानों ने शांतिपूर्ण ढंग से जीत लिया, तब हज़रत अली ने "काबा" की चाभी उस्मान इब्ने तल्हा से ज़बरदस्ती ले ली जो कि मुस्लिम नहीं था। कहा जाता है कि काबा परिसर में यह आयत उतरी और उसके तुरंत बाद मुहम्मद (सल्ल) ने हज़रत अली को हुक्म दिया कि वह उस्मान से माफ़ी मांगें और उसे चाभी तुरंत वापस कर दें। उस्मान से यह भी वादा किया गया कि इस पवित्र घर की चाभी हमेशा उसी के ख़ानदान वालों के पास रहेगी। उस्मान इस इंसाफ़ से इतना प्रभावित हुआ कि उसने इस्लाम क़बूल कर लिया।
59: यहां बताया गया है कि अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों को मानने के साथ साथ हाकिमों के आदेश भी मानने चाहिए। विद्वानों का कहना है कि वैसे ही हाकिमों की बात माननी चाहिए जिसके आदेश क़ुरआन और रसूल के अमल (सुन्नत) के मुताबिक़ हों।
60: यहां से मदीना के उन पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] का ज़िक्र किया गया है जो ऊपर से दिखावे के लिए मुसलमान तो बन गए थे, मगर असल में वे यहूदियों जैसे ही थे। किसी मामले में जब उन्हें यह उम्मीद होती कि मुहम्मद सल्ल. उनके हक़ में फ़ैसला करेंगे, तो वे ऐसे मामले तो उनके पास ले जाते, मगर जिन मामलों में लगता कि फ़ैसला उनके हक़ में नहीं होगा, तो वे ऐसे मामले यहूदियों के पास ले जाते थे, जो कि एक मुसलमान होने के नाते सही नहीं था।
62: फिर जब पाखंडी लोग अपने फ़ायदे के लिए मामले का फ़ैसला किसी यहूदी सरदार से करवाते हैं और वहां भी फ़ैसला उनके हक़ में नहीं होता, तो फिर मुहम्मद सल्ल. के पास बहाने बनाते हुए आते हैं कि हम तो वहां मेल-मिलाप करने गए थे, कोई फ़ैसला कराने नहीं गए थे।
66: अल्लाह ने इसराइल की संतानों को तो एक बार बड़ा कड़ा हुक्म दिया था जब गुनाहों से तौबा करने के लिए उन्हें एक दूसरे को क़त्ल करने को कहा गया था। देखें सूरह बक़रा (2: 54)
77: मक्का की ज़िंदगी में मुसलमानों ने वहाँ के काफ़िरों द्वारा किए जा रहे ज़ुल्म व सितम को बहुत दिनों तक धीरज के साथ झेला था, उस समय कुछ मुसलमानों के दिल में इनके ख़िलाफ़ बदले की भावना जागती थी, मगर तब उन्हें उन ज़ालिमों से लड़ने का हुक्म नहीं मिला था, बल्कि उन्हें धीरज रखते हुए अच्छे आचरण और नेक काम करते रहने की शिक्षा दी गई थी। अल्लाह चाहता था कि जब लड़ने का हुक्म हो तो वह अपनी निजी दुश्मनी की भावना से न हो, बल्कि अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए हो। मगर जब वे तंग आकर हिजरत करके मदीना चले गए, तब अल्लाह की तरफ़ से उन्हें मक्कावालों से युद्ध करने का आदेश हुआ। चूँकि 13 साल अत्याचार सहने के बाद शांति का दौर आया था, अत: कुछ मुसलमान अभी लड़ाई लड़ना नहीं चाहते थे। मगर उन्हें याद दिलाया गया है कि दुनिया के आराम व सुकून को कभी भी इतना महत्व नहीं देना चाहिए कि परलोक [आख़िरत] की ज़िंदगी के फ़ायदे हाथ से निकल जाएं।
79: अच्छाई और बुराई दोनों अल्लाह की तरफ़ से तक़दीर में लिख दी गई है। अच्छा कर्म करने के नतीजे में अच्छाई आती है, जो अल्लाह की तरफ़ से इनाम होता है, जबकि बुराई अल्लाह द्वारा बुरे कर्मों की सज़ा के तौर पर आती है। कभी-कभी अच्छे लोगों के साथ कोई बुरी घटना घट जाती है, जो उनके ईमान को परखने के लिए होती है, या कभी-कभी वह उनके गुनाहों का प्रायश्चित भी बन जाती है, या कभी किसी चीज़ के बदले कोई बेहतर चीज़ के आने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
85: बताया जाता है कि एक आदमी मुहम्मद (सल्ल) के पास आया, और उसने एक दूसरे आदमी के लिए आपसे सिफ़ारिश की कि उसे युद्ध [जिहाद] में जाने से छूट दे दी जाए। यहाँ बताया गया है कि अच्छी चीज़ के पक्ष में बोलने से नेकी में हिस्सा मिलेगा और बुरी चीज़ का पक्ष लेने से उसकी बुराई में भी हिस्सेदार होगा।
86: जब कोई तुम्हें "अस्स्लाम-ओ-अलैकुम" कहे, तो जवाब में बेहतर यह है कि "वालैकुमस्सलाम व-रहमतुल्लाह व-बरकातुह" कहो, नहीं तो कम से कम "वालैकुमस्सलाम" ज़रूर कहो, अगर जवाब नहीं दिया, तो गुनाह होगा। 4: 94 भी देखें।
88-89: यहाँ कई तरह के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] की चर्चा की गई है, एक क़िस्म तो ऐसे लोगों की थी जो मक्का के लोग थे, मदीना आए और ऊपरी तौर से मुसलमान हो गए, फिर कुछ समय बाद व्यापार के बहाने से मक्का चले गए। उनके बारे में कुछ मुसलमानों की राय यह थी कि वे सच्चे मुसलमान थे और कुछ लोग उन्हें पाखंडी समझते थे; ऐसे लोगों की जाँच के लिए कि वह मुसलमानों के प्रति निष्ठा रखते हैं या नहीं, उन्हें हुक्म दिया गया कि वे मक्का से मदीना आकर ईमानवालों से आ मिलें, नहीं तो उन्हें दुश्मन समझा जाएगा, लेकिन जब वे मक्का से लौटकर मदीना नहीं आए, तो उनका पाखंड सबके सामने आ गया।
90: यहाँ पाखंडियों की दूसरी और तीसरी क़िस्म बताई गई है जिनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से मना किया गया है।
91: यहाँ पाखंडियों की चौथी क़िस्म बताई गई है जो ऊपर से तो यह ज़ाहिर करते हैं कि वे मुसलमानों से लड़ना नहीं चाहते, लेकिन जब भी उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ कोई साज़िश में भाग लेने का मौक़ा मिले, वे इसमें बेधड़क कूद पड़ेंगे।
उस समय मदीना चारों तरफ़ से दुश्मनों से घिरा हुआ था और वहाँ के लोगों के लिए मदीना से बाहर जाना सुरक्षित नहीं था। मुहम्मद (सल्ल) ने अरब के सभी क़बीलों के सामने शांति व सुरक्षा का प्रस्ताव रखा, जिसने इस प्रस्ताव को मान लिया वह सुरक्षित हो गया और उसके क्षेत्र में मदीनावासी सुरक्षित हो गए। जिसने न माना, उससे युद्ध करने की अनुमति दी गई।
92: ग़लती से क़त्ल होने का मतलब यह है कि बेइरादा किसी का क़त्ल हो जाना, जैसे ग़लती से गोली चल जाना या निशाना किसी जानवर पर हो और लग किसी आदमी को जाए। तो जब किसी मुसलमान के हाथों एक मुसलमान का क़त्ल हो जाए, तो एक तो उसकी भरपाई में एक ग़ुलाम आज़ाद करना होगा, या अगर ग़ुलाम न हो तो उसे लगातार दो महीने रोज़े रखने होंगे, और उसके साथ "ख़ून-बहा" भी देना होगा। हदीसों से पता चलता है कि ख़ून-बहा में 100 ऊंट या दस हज़ार दीनार मरने वालों के वारिसों को देने होंगे। अगर मरने वाला दुश्मन क़ौम से हो, लेकिन मुसलमान हो, तो उसके लिए भी भरपाई में एक ग़ुलाम आज़ाद करना होगा, मगर ख़ून-बहा देना ज़रूरी नहीं।
इसी तरह, अगर कोई ग़ैर मुस्लिम किसी मुस्लिम रियासत में अमन-शांति से रहता है, और उसका ग़लती से क़त्ल हो जाए, तो उसके वारिसों को भी भरपाई के साथ ख़ून-बहा भी देना होगा।
93: अगर कोई मुसलमान बड़ा गुनाह (जान-बूझकर क़त्ल या ज़िना) कर बैठता है और बिना तौबा किए ही मर जाता है, तो उसके गुनाहों की संगीनी के हिसाब से जहन्नम की सज़ा होगी, फिर बाद में उसे जहन्नम से निकाल लिया जाएगा। कोई मुस्लिम जहन्नम मेंं हमेशा के लिए नहीं रहेगा।
94: अल्लाह के रास्ते में सफ़र करने का मतलब युद्ध के लिए सफ़र करना। युद्ध के दौरान दुश्मनों के एक यौद्धा ने सलाम करके यह कहा कि वह मुसलमान हो गया है, मगर यह सोचकर कि वह अपनी जान बचाने के लिए ऐसा कर रहा है, मुस्लिम लड़ाके ने उसे मार डाला, जब मुहम्मद (सल्ल) को पता चला तो वह नाराज़ हुए। दुश्मन के फ़ौजी की बात को एकदम से नकार देने के बजाय उसकी बात मान लेनी चाहिए थी क्योंकि दिल के अंदर की बात तो केवल अल्लाह ही जानता है।
95: जब अपनी रक्षा में युद्ध करने की अनुमति दी गई, तो उस समय कोई स्थायी सेना न होने के चलते हर स्वस्थ आदमी पर लड़ना फ़र्ज़ था, युद्ध में भाग न लेने की छूट केवल औरतों, बड़े-बूढ़ों, बीमारों, बच्चों आदि को ही थी।
97: क़ुरआन में गुनाह कर बैठने को अपनी जानों पर ज़ुल्म करना भी कहा गया है। यहां उन ईमानवालों का ज़िक्र है जिन्होंने मक्का में चुपचाप इस्लाम अपना लिया था, मगर वे बाक़ी ईमानवालों के साथ हिजरत करके मदीना नहीं गए, जबकि उनमें ऐसा करने की योग्यता थी। तो जब उनके गुनाहों के बारे में फ़रिश्ते पूछेंगे, तो वे कहेंगे कि हम मक्का के मुशरिक लोगों के हाथों ऐसे मजबूर हो गए थे कि हमें अपने दीन पर चलना मुश्किल था। मगर उनसे कहा जाएगा कि ऐसे में उन्हें अपना घर छोड़कर कहीं दूसरी जगह चले जाना चाहिए था जहाँ उनके लिए दीन पर चलना आसान होता।
101: आम तौर से जब आप सफ़र में (85 किलोमीटर या उससे ज़्यादा) जा रहे हों, तो अल्लाह ने यह आसानी की है कि दोपहर (ज़ुहर), शाम (अस्र) और रात (इशा) की नमाज़ आधी कर दी जाए जिसे "क़स्र" कहते हैं। मगर यहां एक ख़ास तरह की क़स्र नमाज़ का ज़िक्र अगली आयत में है, जो युद्ध की हालत में पढ़ी जाती है जब दुश्मनों के हमले का ख़तरा होता है, और इसीलिए यह हथियार समेत पढ़ी जाती है।
105: बताया जाता है कि यह आयत एक ख़ास घटना की पृष्टभूमि में उतरी थी। बनु अबीरक़ क़बीले का एक आदमी था जो ऊपर से अपने को मुसलमान बताता था, उसने एक सहाबी के घर में सेंध लगाकर अनाज की बोरियां और हथियार चुरा लिए, और चालाकी यह की कि बोरी का मुंह थोड़ा सा इस तरह खुला रखा कि उसमें से थोड़ा-थोड़ा अनाज गिरता रहे और जाकर एक यहूदी के घर के सामने बोरी का मुंह बंद कर दिया। फिर उसने चोरी के हथियार को उसी यहूदी के घर भी रखवा दिया। जब यह मामला सामने आया तो सारे सबूत यहूदी के ख़िलाफ़ थे। चोर के क़बीले वाले भी उसके समर्थन में लगे थे। मगर अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल. को इस घटना की जानकारी दे दी और तब जाकर सही फ़ैसला हो सका और उस यहूदी को बरी किया गया, वह वहां से भागकर मक्का के काफ़िरों से जा मिला। इससे यह बात साफ़ होती है कि ग़लत काम का साथ नहीं देना चाहिए चाहे वह किसी यहूदी या ग़ैर मुस्लिम के साथ ही क्यों न किया गया हो, और फ़ैसला हमेशा इंसाफ़ के साथ होना चाहिए।
113. यहां शायद उसी चोर और उसके समर्थकों का ज़िक्र है जो यह चाहते थे कि बेगुनाह यहूदियों को सज़ा दी जाए।
116: किसी और को अल्लाह की ख़ुदायी में साझेदार (Partner) ठहराना, एक ऐसा गुनाह है जिसे अल्लाह कभी माफ़ नहीं करेगा। यह गुनाह तभी माफ़ हो सकता है जब आदमी मरने से पहले-पहले इसके लिए सच्ची तौबा कर ले और अपने आपको सुधार ले। (देखें 25:68-70). इसके अलावा किया गया कोई भी गुनाह अल्लाह जब चाहे, माफ कर सकता है।
117: अरब के मूर्तिपूजक लोग ज़्यादातर देवियों की ही पूजा करते थे--- लात, मनात, उज़्ज़ा नाम की मशहूर देवियां थीं। यहां तक कि वे फ़रिशतों को भी अल्लाह की बेटियां ही समझते थे। इस आयत में इस बात की तरफ़ इशारा किया गया है कि एक तरफ़ तो वे औरतों को मर्दों के मुक़ाबले कम दर्जे की चीज़ समझते थे, मगर दूसरी तरफ़ पूजा सभी देवियों की ही की जाती थी। देखें 53: 19-20
118: मतलब यह है कि बहुत से बंदों को भटका करके उन्हें अपना बना लूंगा, और उनसे अपनी मर्ज़ी के काम कराऊंगा।
119: अरब के विश्वास न रखने वाले कुछ लोगों [Pagans] में यह भी रस्म थी कि वे ऐसी ऊँटनियों या बकरियों के कान चिरवाकर उन्हें किसी देवी-देवता के नाम समर्पित कर देते थे, जिसने लगातार दस ऊँटनी या बकरी जनी हो, उन्हें आज़ाद छोड़ दिया जाता और फिर न तो इनका दूध पीते और न सवारी करते और न ही इसे ज़बह करते थे, जब वह मर जाती तो उसका गोश्त केवल महिलाएं खाती थीं। ऐसे ही जानवर को "बहीरा" कहते थे और उसके बच्चे को "साइबा"। इस झूठी रस्म की तरफ़ इशारा करके कहा गया है कि यह सब असल में शैतान करवाता है, और यह एक तरह से अल्लाह की रचना में फेर-बदल करने जैसा है।
127: इस्लाम से पहले अरबों के समाज में औरतों का दर्जा बहुत ही निचले स्तर का माना जाता था, और उनके सामाजिक और आर्थिक अधिकार नहीं के बराबर थे। इस्लाम ने जब उन्हें कुछ अधिकार और ख़ासकर छोड़ी गई जायदाद में से हिस्सा देने की घोषणा की (4:2-11), तो अरबों के लिए ये बातें अनोखी थीं और उन्हें यह लगता था कि ये अधिकार उन्हें थोड़े समय के लिए ही दिए गए होंगे, और शायद यह कुछ समय बाद उठा लिए जाएंगे। अतः वे लोग इस बारे में मुहम्मद सल्ल से पूछते रहते थे, इसी के जवाब में यह आयत है जिसमें यह साफ़ किया गया है कि औरतों से जुड़े हुए अधिकार हमेशा के लिए हैं और इस सिलसिले में मर्द और औरतों के बीच रिश्ते से जुड़े हुए कुछ और अधिकार भी बता दिए गए हैं।
यहां फिर से यतीम (अनाथ) लड़कियों के साथ अन्याय करने से मना किया गया है। जैसा कि आयत 3 में बताया गया कि उस ज़माने की रीति के अनुसार कई बार ऐसा होता कि यतीम लड़की का अभिभावक (Guardian) उसके चचा का बेटा होता था। अगर लड़की हसीन होती और उसके बाप ने काफ़ी संपत्ति भी छोड़ी होती, तो उसका चचेरा भाई माल हथियाने के चक्कर में उससे शादी कर लेता, मगर उसे "मेहर" बहुत कम देता था, और अगर लड़की हसीन न होती तो शादी कर लेने के बाद उसके साथ प्यार से पेश भी नहीं आता था।
129: यह मुमकिन नहीं है कि कोई आदमी अपनी सभी बीवियों के साथ एक समान व्यवहार कर सके, क्योंकि दिल का झुकाव किसी एक की तरफ़ ज़्यादा होगा, हां, मगर कम से कम ऊपर के व्यवहार में समानता होनी चाहिए। जैसे हर बीवी के साथ एक बराबर रात गुज़ारना, ख़र्चा करने के लिए एक बराबर पैसे देना, किसी के साथ ऐसी बेरुख़ी के साथ न पेश आना जिससे किसी बीवी का दिल टूटता हो और उसे लगे कि न तो उसे शादीशुदा होने का हक़ मिल रहा है और न उसे पूरी तरह से तलाक़ ही दिया गया है, बल्कि वह शादी और तलाक के बीच लटकी हुई है।
137: सच्चाई पर विश्वास कर लेना, फिर सच्चाई को ठुकरा देना, फिर से विश्वास कर लेना और अंत में दोबारा विश्वास करने से इंकार कर देना, और ऐसी हालत में मर जाना....यह तो लगता है कि मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] के बारे में कहा गया है, मगर इनके साथ कुछ दूसरे लोग भी ऐसे थे जिन्होंने ऐसा किया था।
140: इस बात का ज़िक्र पहले एक मक्का में उतरी हुई सूरह में आ चुका है, देखें 6: 68
149: यहाँ किसी के बुरे काम को माफ कर देने से मतलब राज़ी ने यह बताया है कि अगर कोई पाखंडी आदमी अपने गुनाहों से तौबा करता है तो उसके द्वारा किए गए पहले के बुरे काम का ताना नहीं देना चाहिए।
153: यहूदी लोग इस बात की माँग करते थे कि क़ुरआन को एक ही बार में लिखी हुई किताब के रूप में क्यों नहीं उतारा गया, जैसाकि मूसा (अलै) पर लिखी हुई तौरात टैबलेट के रूप में उतरी थी। मगर इस माँग को रद्द किया गया है, देखें 25:32.
154: इन घटनाओं का ज़िक्र सूरह बक़रा (2: 51-66) में थोड़े विस्तार से आया है। इसे भी देखें 7: 161
155: उनके दिल कुछ भी सुनने और समझने को तैयार न थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे पहले ही से सब कुछ जानते हैं, उन पर ऐसा पर्दा चढ़ा हुआ था कि इसमें अपनी मान्यताओं के अलावा कोई और नई बातें शामिल नहीं हो सकती थीं। (देखें 2: 88)
असल में अल्लाह ने उनकी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते उनके दिलों को ठप्पा लगाकर बंद कर दिया था, जिससे वे कोई सही बात समझने में असमर्थ थे।
156: जब हज़रत मरयम गर्भवती हुईं, तो लोगों ने उन पर यह लांछन लगाया कि उनका किसी के साथ नाजायज़ संबंध था।
157: मुसलमानों में आम तौर से यह धारणा है कि यहूदियों ने ईसा (अलै) को मार डालने का एक षडयंत्र रचा था। अल्लाह ने असल मुजरिम जिसने ईसा (अलै) को धोखा दिया था, की शक्ल को हूबहू ईसा (अलै) की तरह कर दिया, उनलोगों ने उसे ईसा समझकर सूली पर चढ़ा दिया, और अल्लाह ने ईसा (अलै) को सुरक्षित ऊपर उठा लिया। मुसलमान भी ईसा (अलै) के दोबारा दुनिया में आने की बात को मानते हैं।
160: देखें सूरह अनाम (6: 146).
176: "कलाला" उस आदमी को कहते हैं जिसके मरने के समय न तो उसके बाप-दादा जिंदा हों और न ही कोई बेटा या पोता! (देखें आयत 12). ऐसे आदमी की विरासत उसके नज़दीकी रिश्तेदारों (जैसे भाइयों/बहनों में) में बांटी जाएगी।
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