Wednesday, April 6, 2022

Surah/सूरह 4: An-Nisa/अन-निसा [औरतें/ Women]

 सूरह 4: अन-निसा 

[औरतें/ Women]

यह सूरह मदीना में उतरी थी, और इस सूरह का नाम अन-निसा यानी औरतें इसलिए पड़ा कि पूरी सूरह में औरतों के अधिकारों के बारे में कई हवाले आए हैं (आयत 3-4, 127-130). इस सूरह में बहुत से आदेश दिए गए हैँ जिनमें बच्चों और यतीमों के साथ ख़ास करके इंसाफ़ करने, संपत्ति का बंटवारा करने और शादी-ब्याह के नियमों का ज़िक्र आया है। आयत 5-12 में संपत्ति और विरासत के बंटवारे के नियम बताए गए हैं। सभी के साथ इंसाफ़ करने पर ज़ोर दिया गया है, जिसमें यहूदियों के साथ इंसाफ़ करने का एक ख़ास उदाहरण आयत 105-112 में आया है, और कुछ नियम सूरह के आख़िर में भी आए हैं। इसके अलावा, यह सूरह मदीना के मुस्लिम समुदाय और किताबवालों के बीच चल रहे तनाव के बारे में भी बताती है (आयत 44, 61), फिर ईसा अलै. के सूली चढ़ाये जाने और उन्हें "ख़ुदा का बेटा" मानने के दावे को भी नकारा गया है, फिर उसके बाद युद्ध की भी चर्चा हुई है: मुसलमानों को होशियार रहने और कमज़ोरों और असहायों की रक्षा करने को कहा गया है (71-76). पिछली मदनी सूरह की तरह, यहाँ भी पाखंडियों द्वारा चली गई चालों के बारे में बताया गया है (88-91, 138-146).



विषय:

01  : परिचय 

02-06: यतीमों के साथ सलूक और शादी-ब्याह 

07-14: संपत्ति में बंटवारे का नियम 

15-28: औरतों और शादी-ब्याह से जुड़े हुए नियम-क़ायदे 

29-31: जुआ खेलना और क़त्ल करना

32-33: दूसरों का माल न हड़पो 

34-35: औरतों के प्रति मर्दों की ज़िम्मेदारियाँ  

36 : अल्लाह की बंदगी करो

36-42: ज़रूरतमंदों को ज़कात देना बंद करने के ख़िलाफ चेतावनी

43 : नमाज़ के लिए तैयारी 

44-57: किताबवाले लोगों की कड़ी निंदा 

5 : अमानतों को लौटाना ज़रूरी 

59-70: विवाद का निपटारे के लिए रसोल के पास जाएं 

71-78: अल्लाह के रास्ते में लड़ना 

79-84: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

85 : अच्छाई या बुराई के पक्ष में बोलनेवाला अच्छाई या बुराई का हिस्सेदार होगा 

86 : सलाम करने वाले को अच्छा जवाब देना चाहिए

87 : दोबारा ज़िंदा उठाया जाना तय है 

88-91: पाखंडियों के साथ सलूक 

92-93: एक ईमानवाले को दूसरे ईमानवाले का क़त्ल नहीं करना चाहिए 

94  : दुश्मन अगर लड़ाई के दौरान अपने ईमान का दावा करे, तो उसकी बात मान लो 

95-96: लड़ाई में साथ जानेवाले और युद्ध में भाग न लेते हुए रुक जाने वाले 

97-100  : घर-बार छोड़कर मदीना चले जाना  

101-104: ख़तरे के समय नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा

105-115: विश्वासघात करने वालों के साथ कोई नर्मी नहीं 

116-122: मूर्तिपूजा और सच्चा दीन 

123-124: बुराई करने वालों को सज़ानेकी करने वालों को इनाम

125-126: इबराहीम (अलै) का दीन 

127-130: औरतों से जोड़े हुए निर्देश 

131-137: विश्वास करने और इंकार करने के नतीजे 

138-152: पाखंडियों और विश्वास न करने वालों की कड़ी निंदा 

153-162: किताबवाले लोगों की निंदा 

163-170: रसूल पर उतरने वाली 'वही', और उनसे पहले के रसूल 

171-173: किताब वालों की कड़ी निंदा 

174-175: ईमान के लिए अपील 

176    : अप्रत्यक्ष वारिस (न कोई बच्चा, न माँ-बाप बचा हो), और उसकी विरासत के नियम 



 अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यन्त दयावान है
ऐ लोगो! अपने रब से डरो, जिसने तुम्हें एक अकेली जान [आदम/Adam] से पैदा किया, और उसी (के सत/essence) से उसका जोड़ीदार [हव्वा/Eve] पैदा किया, और फिर उन दोनों की नस्ल से अनगिनत मर्दों और औरतों को पैदाकर दूर-दूर तक फैला दिया; अल्लाह (के आदेश न मानने के नतीजे) से डरते रहो, जिसके नाम से तुम एक-दूसरे से (अपने हक़) माँगते हो। रिश्तेदारों से संबंध न तोड़ डालो: (याद रहे!) अल्लाह हमेशा तुम पर नज़र रखता है।  (1)

और (देखो!) अनाथों को उनका माल (ईमानदारी से वापस) दे दो, उनकी अच्छी चीज़ों को बदलकर बुरी चीज़ें न दे दो, और उनके माल को अपने माल के साथ मिलाकर न खा जाओ---  यह बड़ा भारी गुनाह है। (2)

अगर तुम्हें इस बात का डर हो कि तुम अनाथ लड़कियों के साथ (शादी करके) न्याय से पेश नहीं आ सकोगे, तो (दूसरी) औरतों में से जो तुम्हें अच्छी लगे, उनमें से (एक समय में) दो, तीन या चार के साथ शादी कर सकते हो। अगर तुम्हें डर हो कि तुम उनके साथ एक जैसा व्यवहार न कर सकोगे, तो फिर एक ही से शादी करो, या फिर अपनी दासी (लौंडी) से शादी कर लो जो (युद्ध के क़ैदियों में) तुम्हारे हाथ आ गयी हो: इसमें तुम्हारे लिए पक्षपात करने से बचने की अधिक सम्भावना है। (3)

शादी के मौक़े पर औरतों को उनकीमेहर’[bridal gift] अदा कर दो, हाँ, अगर उस (मेहर) में से वे अपनी ख़ुशी से कुछ तुम्हारे लिए छोड़ दें, तो उसे तुम बेझिझक अपने काम में ला सकते हो। (4)


किसी नासमझ (अनाथ) को अपनी (या उसकी) संपत्ति मत सौंप दो। अल्लाह ने इसे तुम्हारे लिए जीने का सहारा बनाया है: उसमें से उन्हें खिलाओ-पिलाओ, कपड़े पहनाओ और उनसे प्यार से बात किया करो। (5)

(अभिभावकों को चाहिए कि) अनाथों की (समझदारी की) जाँच-परख करते रहें, जब तक कि वे शादी करने की अवस्था को न पहुँच जाएँ; फिर अगर तुम्हें लगे कि अब उनमें सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ आ गई है, तब उनकी संपत्ति उनके हवाले कर दो। और (देखो) यह सोचकर कि कहीं वे बड़े होकर अपना हक़ माँगने न लग जाएँ, तुम उनके माल जल्दी-जल्दी खाकर उड़ा न डालो: अगर (अनाथों के) अभिभावक [Guardian] अच्छे पैसेवाले हों, तो उन्हें अनाथों की संपत्ति से दूर ही रहना चाहिए, हाँ, अगर वह ग़रीब है, तो अपनी ज़रूरत के हिसाब से उतना ले सकता है जितना उचित हो। फिर जब तुम उनके माल उन्हें सौंपने लगो, तो लोगों को गवाह बना लो; मगर (याद रखो) तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह हर चीज़ का हिसाब रखने के लिए काफ़ी है।  (6)


मर्दों का उस माल में हिस्सा होगा जो उनके माँ-बाप और नज़दीकी रिश्तेदार छोड़ जाएं, और औरतों का भी उस माल में हिस्सा होगा जो उनके माँ-बाप और रिश्तेदारों ने छोड़ा हो -- चाहे वह थोड़ा हो या अधिक हो: यह हिस्सा अल्लाह का तय किया हुआ है। (7)

हिस्सा बाँटते समय, अगर दूर के रिश्तेदार, (ख़ानदान के) अनाथ और ज़रूरतमंद लोग भी आ जाएं, तो उन्हें भी उसमें से थोड़ा-बहुत दे दो और उनसे प्यार व नर्मी से बात करो। (8)

वे लोग अगर मर जाते, तो जिस तरह अपने बेसहारा बच्चों के भविष्य के लिए डरे रहते, उसी तरह उन्हें अनाथों की भी चिंता करनी चाहिए; उन्हें अल्लाह से डरना चाहिए और सही और इंसाफ़ की बात कहनी चाहिए। (9)

जो लोग अनाथों का माल अन्याय से खा लेते हैं, असल में वे अपने पेट में आग के अंगारे भर रहे हैं: वे भड़कती हुई आग में झोंके जाएंगे।  (10)


तुम्हारी सन्तान के बारे में अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि एक बेटे का हिस्सा दो बेटियों के हिस्से के बराबर होना चाहिए।
 
अगर केवल बेटियाँ हों, तो दो या दो से अधिक बेटियों का हिस्सा छोड़ी हुई सम्पत्ति का दो तिहाई होगा, और अगर वह अकेली हो तो उसका हिस्सा आधा होगा।
 
अगर मरनेवाले के बाल-बच्चे हों, तो (पहले) मरनेवाले के माँ-बाप में से हर एक को संपत्ति का छठा हिस्सा मिलेगा,
 
अगर उसकी संतान न हो, और उसके माँ-बाप ही उसके वारिस हों, तो उसकी माँ का हिस्सा एक तिहाई होगा (और बाक़ी बाप का)
हाँ, अगर उस (मरनेवाले) के भाई-बहन भी हों, तो उस हालत में माँ का हिस्सा छठा होगा (और बाप का भी हिस्सा छठा होगा)।
 
[याद रहे कि इन सभी मामले में] अगर मरनेवाले ने कोई वसीयत की हो, या उस पर क़र्ज़ हो, तो इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा।
 
तुम यह नहीं जानते कि तुम्हारे माँ-बाप और बाल-बच्चों में कौन तुम्हारे लिए ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाने वाला है (और किसका हक़ ज़्यादा होना चाहिए, किसका कम): यह (हिस्सा) अल्लाह का ठहराया हुआ क़ानून है, और वह सब कुछ जानता है, हर काम की समझ-बूझ रखता है।  (11)

तुम्हारी बीवियाँ जो कुछ (संपत्ति) छोड़ जाएं, उसमें तुम्हारा [पति का] हिस्सा आधा है, अगर उनसे औलाद (ज़िंदा) न हो;
  
अगर उनकी औलाद हो, तो तुम एक चौथाई हिस्से के वारिस होगे।
 
[इन सभी मामले में] इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा।
 
तुम जो कुछ छोड़कर जाओ, अगर तुम्हारी कोई औलाद नहीं है, तो तुम्हारी बीवियों का हिस्सा चौथाई होगा; और अगर तुम्हारी औलाद है, तो तुम्हारी बीवियाँ आठवें हिस्से की वारिस होंगी।
 
[इन सभी मामले में] इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा।
 
अगर कोई मर्द या औरत मर जाए और उसकी न तो कोई औलाद हो और न ही माँ-बाप बचे हों, मगर (माँ की तरफ़ से) उसका एक भाई या बहन हो, तो वह भाई या बहन छठे हिस्से का वारिस होगा;
  
अगर भाई-बहन एक से ज़्यादा हुए, तो फिर एक तिहाई हिस्से में वे सब बराबर के भागीदार होंगे,
 
 [इन सभी मामले में] इन हिस्सों का बंटवारा, वसीयत पूरी करने और क़र्ज़ चुकता करने के बाद ही होगा, शर्त यह है कि  इससे किसी (हक़दार) को कोई नुक़सान न पहुँचे: यह सब कुछ अल्लाह का हुक्म है: और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत नर्म दिल व मेहरबान है। (12)

ये अल्लाह की ठहराई हुई सीमाएँ हैं: जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करेगा, उसे वह (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, और वे वहां हमेशा रहेंगे---- यही सबसे बड़ी कामयाबी है। (13)

मगर जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा नहीं मानेगा और उसकी ठहराई हुई सीमाओं को लांघेगा, उसे अल्लाह द्वारा (जहन्नम की) आग में झोंक दिया जाएगा, जिसमें उसे रहना होगा---- अपमानित करने वाली यातना उनके इंतज़ार में है। (14)



अगर तुम्हारी औरतों में से कोई (बदचलन हो जाए, और) अपना मुँह काला [Lewd act] करा बैठे, तो तुम अपने में से चार आदमियों को गवाही के लिए बुला लो, फिर, अगर वे उसके जुर्म की गवाही दे दें, तो ऐसी औरतों को घरों में बन्द रखो, यहाँ तक कि उनकी मौत आ जाए या अल्लाह उनके लिए कोई दूसरा रास्ता निकाल दे (15)

और अगर तुममें से दो (लोग आपस में बदचलनी का) ऐसा काम [Lewd act] कर बैठें, तो दोनों को चोट पहुंचाई जाए; फिर अगर वे तौबा [repentance] कर लें और अपने आपको सुधार लें, तो उन्हें छोड़ दो ---- तौबा करनेवालों को अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (16)

मगर (याद रहे कि) अल्लाह उन्ही लोगों की तौबा क़बूल करता है जो भावनाओं में बहकर नादानी से कोई बुराई कर बैठते हैं, फिर (ग़लती का एहसास होते ही) तुरंत तौबा कर लेते हैं: ऐसे ही लोग हैं जिनको अल्लाह माफ़ कर देगा, वह सब कुछ जाननेवाला, और (अपने हर काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (17)

ऐसी तौबा तो सच्ची तौबा नहीं है कि लोग (सारी उम्र) बुरे काम किए जाएं, और फिर जब मौत उनके सामने आ खड़ी हो, तो कोई यह कहे कि, "अब मैं तौबा करता हूँ," और न ही उनकी तौबा (क़बूल होगी) जो मरते दम तक (सच्चाई को) मानने से इंकार ही करते रहे: ऐसे लोगों के लिए हमने दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है।  (18)



ऐ ईमानवालो! तुम्हारे लिए यह वैध नहीं कि तुम (विधवा) औरतों (पर क़ब्ज़ा कर) के ज़बरदस्ती वारिस बन बैठो, और न ऐसा करना चाहिए कि जो कुछ (माल व सामान) अपनी बीवियों को दे चुके हो, उसमें से कुछ वापस लेने के चक्कर में उनके साथ सख़्ती करो, और न ही उन्हें (दोबारा शादी करने से) रोक रखो, हाँ, अगर वे खुले-आम कोई बदचलनी के काम [adultery] कर बैठें, तो दूसरी बात है। उनके साथ ज़िंदगी बसर करने में नर्मी और इंसाफ़ से काम लो: अगर तुम उन्हें (किसी कारण से) पसंद नहीं करते, तो सम्भव है कि जो बात तुम पसन्द नहीं करते हो, उसी में अल्लाह ने तुम्हारे लिए ज़्यादा भलाई रख दी हो।  (19)

अगर तुम एक बीवी को छोड़कर दूसरी बीवी लाना चाहोतो चाहे तुमने उस बीवी को (तोहफ़े में) ढेर सारी सोने की मोहरें ही क्यों न दे रखी हों, तब भी (छोड़ते समय) उसमें से तुम्हें कुछ भी वापस नहीं लेना चाहिए। क्या तुम चाहते हो कि अपना दिया हुआ माल उस पर झूठा आरोप लगाकर और खुला ज़ुल्म करके वापस ले लो? (20)

और तुम उस (बीवी) से कैसे वापस ले सकते हो, जबकि तुम (मियाँ-बीवी के रूप में) एक-दूसरे के साथ सो चुके हो, और वह (शादी के समय) तुमसे (अपने हक़ के लिए) पक्का वचन ले चुकी है? (21)


जिन औरतों से तुम्हारे बाप शादी कर चुके हैं, उन औरतों से तुम शादी न करो ---- हां, जो पहले हो चुका सो हो चुका। सचमुच यह एक शर्मनाक, अत्यन्त अप्रिय, और बुराई की तरफ़ ले जाने वाला काम है। (22)
 
तुम्हारे लिए (बीवी के रूप में) हराम [forbidden] की जाती हैं तुम्हारी माएँ, बेटियाँ, बहनें, फूफियाँ, मौसियाँ, भतीजियाँ, भाँजियाँ, और तुम्हारी वे माएँ जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया हो और दूध के रिश्ते से तुम्हारी बहनें, तुम्हारी सासें, और तुम्हारी सौतेली बेटियाँ जो तुम्हारी देखरेख में हैं---- जो उन मांओं से पैदा हुई हों जिनसे शादी के बाद तुम्हारा मिलन हो चुका होहां अगर (शादी के बाद) शारीरिक संबंध नहीं बना होतो इसमें तुम पर कोई गुनाह नहीं ----इसी तरहतुम्हारे (अपने) बेटों की बीवियाँ, और एक साथ दो बहनों (से शादी भी हराम है)---- मगर   पहले जो हो चुका सो हो चुका: अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है---- (23)
 
विवाहित औरतें  भी हराम हैं, सिवाय उनके जो लौंडी [female slave] (युद्ध-बंदी के रूप में) तुम्हारे हाथ आ गयी हो। अल्लाह ने ये सारे आदेश तुम्हारे लिए दिए हैं। (इनको छोड़कर) दूसरी सभी औरतें तुम्हारे लिए वैध हैंशर्त यह है कि तुम अपना माल (मेहर के रूप में) ख़र्च करके उनसे शादी करने की चाहत रखोन कि काम वासना पूरी करने के लिए ऐसा करो। अगर तुम शादी करके औरतों के साथ (दाम्पत्य जीवन के) मज़े उठाना चाहते हो, तो उनकी 'मेहर' [bride-wealth] अदा कर दो ---- यह तुम्हारे लिए फ़र्ज़ है ---- हां, इस फ़र्ज़ को अदा करने के बाद भी, अगर तुम दोनों आपसी सहमति से (मेहर में कमी-बेशी के बारे में) कोई समझौता कर लो, तो इसमें तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं होगा: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, समझ-बूझ रखनेवाला है। (24)


अगर तुममें से किसी के पास इतना साधन न हो कि वह किसी आज़ाद ईमानवाली औरत से शादी कर सके, तो (इस बात में कोई बुराई नहीं कि) उसे ईमानवाली ग़ुलाम लौंडी [female slave] से शादी कर लेना चाहिए----- (असल चीज़ तो ईमान है, और) अल्लाह तुम्हारे ईमान (की गहराई) को ख़ूब अच्छी तरह जानता है: (इंसान  होने के नाते) तुम (सब) एक ही ख़ानदान का हिस्सा हो ---- तो उनके मालिकों की अनुमति से, उचित 'मेहर' [bride-wealth] अदा करके तुम उनसे शादी कर लो। उन्हें (इज़्ज़तदार) विवाहित औरतें बनाओन कि काम-वासना में डूबी हुई या चोरी-छिपे प्रेम करनेवाली। फिर जब ये (ग़ुलाम औरतें) शादी के बाद किसी (दूसरे मर्द) के साथ मुँह काला कर बैठें, तो जो दंड आज़ाद औरतों के लिए होता, उसका आधा उनके लिए होगा। यह (आदेश) तुममें से उनके लिए है, जिसे इस बात का डर हो कि (बिना शादी के) वह कोई गुनाह कर बैठेगा; उनके लिए यही बेहतर होगा कि वे अपने आपको संयम में रखने की आदत डालें। अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और बेहद दयावान है,  (25)

अल्लाह चाहता है कि वह अपने  नियम-क़ानून तुम्हारे सामने स्पष्ट कर दे और तुम्हें उन लोगों के अच्छे रास्ते पर चलाए, जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं। वह तुम पर अपनी दया-दृष्टि डालना चाहता है ------ अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है----- (26)

अल्लाह तुम पर अपनी दया-दृष्टि डालना  चाहता हैमगर जो लोग अपनी ग़लत इच्छाओं के पीछे चलते हैंवे चाहते हैं कि तुम भटककर सही रास्ते से बहुत दूर जा पड़ो। (27)

अल्लाह चाहता है (कि ज़्यादा कड़ाई या रुकावटों के) बोझ को तुम्हारे लिए हल्का कर दे; कि इन्सान (सेक्स करने की इच्छा को रोक पाने में) बड़ा कमज़ोर पैदा किया गया है। (28)



ऐ ईमानवालो! तुम एक-दूसरे का माल ग़लत तरीक़े से न खा जाओ, हाँ, अगर व्यापार आपसी सहमति से मिल-जुलकर किया जाए, (तो अपना हिस्सा ले सकते हो)। और (देखो!) अपने आपको (यानी एक दूसरे को) क़त्ल न करो, कि अल्लाह तो तुम पर बहुत दयावान है। (29)

तुममें से जो कोई दुश्मनी और ज़ुल्म के कारण ऐसा करेगा, तो उसे हम (जहन्नम की) आग में झोंक देंगे: ऐसा करना अल्लाह के लिए बहुत आसान है। (30)
 
लेकिन अगर तुम उन बड़े गुनाहों से बचते रहो, जिनसे तुम्हें रोका जा रहा है, तो हम तुम्हारे छोटे-मोटे गुनाहों को मिटा देंगे, और तुम्हें प्रतिष्ठा के दरवाज़े के अंदर जाने देंगे। (31)

उस चीज़ की कामना न करो जिसे अल्लाह ने तुममें से किसी को दूसरों से ज़्यादा दिया है ---- मर्दों ने (अपने कर्मों से) जो कुछ कमाया है, उसके अनुसार उनका हिस्सा है; और औरतों ने (अपने कर्मों से) जो कुछ कमाया है, उसके अनुसार उनका हिस्सा है ---- (एक-दूसरे से जलने के बजाय) तुम्हें चाहिए कि अल्लाह से उसका कुछ फ़ज़ल [Bounty] मांगा करो: उसे हर चीज़ की पूरी जानकारी है। (32)

वो सारी चीज़ जो माँ-बाप और नज़दीकी रिश्तेदार छोड़ जाएँउनके लिए हमने वारिस ठहरा दिए हैं, साथ में वे (औरतें) भी जिनसे तुम (शादी के लिए) अपना हाथ देने का वचन दे चुके हो, तो उन्हें उनका उचित हिस्सा दे दो: अल्लाह हर चीज़ का गवाह है। (33)


पतियों पर बीवियों की देखभाल और उनके बंदोबस्त की (अलग से) ज़िम्मेदारी है, इसलिए कि अल्लाह ने अपने फ़ज़ल [bounties] से किसी को (ख़ास-ख़ास चीज़ों में) दूसरों से ज़्यादा दे रखा है, और इसलिए भी कि मर्द अपने धन में से (परिवार पर) ख़र्च करते हैं। तो जो नेक बीवियाँ होती हैं, वे (पति के लिए) समर्पित होती हैं, (पति की अनुपस्थिति में) उसके (हितों और) भरोसे को बचाकर रखती हैं, जैसा कि अल्लाह चाहता है कि उन चीज़ों को बचाकर रखा जाए। अगर तुम्हें अपनी बीवियों के सिर चढ़ जाने [high handedness] का डर हो, तो पहले उन्हें (प्यार से) समझाओ-बुझाओ, फिर (न मानें, तो) सोने के समय उनसे अलग रहने लगो, और (अगर इस पर भी न मानें, तो) उन्हें (सुधारने के लिए हल्के से) मार भी सकते हो। अगर  वे तुम्हारी बातें मानने लगेंतब तुम्हें उनके विरुद्ध कोई क़दम उठाने का हक़ न होगा: (याद रहे) अल्लाह सबसे ऊँचा, सबसे ज़्यादा बड़ाई रखनेवाला है। (34)

(ऐ ईमानवालो) अगर तुम्हें पति-पत्नी के बीच अलगाव होने का डर हो, तो उनमें सुलह कराने के लिए एक आदमी मर्द के घरवालों में से और एक आदमी औरत के घरवालों में से नियुक्त कर दो। फिर अगर पति-पत्नी आपस के मामले को सुधारना चाहें, तो अल्लाह उनके बीच फिर से मेल-मिलाप पैदा कर देगा: वह सब कुछ जानता है, हर चीज़ की ख़बर रखता है। (35)



अल्लाह की बन्दगी करो; उसके साथ किसी और को साझेदार [Partner] न बनाओ। अच्छा व्यवहार करो अपने माँ-बाप के साथ, रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंदों के साथ, नज़दीक और दूर में रहने वाले पड़ोसियों के साथ, पास के बैठने-उठनेवालों के साथ, ज़रूरतमंद मुसाफ़िरों के साथ, और अपने ग़ुलामों के साथ। अल्लाह घमंड करनेवालों को और डींगें मारने वालों को पसन्द नहीं करता, (36)

जो स्वयं कंजूसी करते हैं और दूसरे लोगों को भी कंजूसी करने पर उभारते हैं, और उन नेमतों को छिपाते हैं जो अल्लाह ने उन्हें दे रखा है। ऐसे नाशुक्रे लोगों के लिए हमने अपमानित कर देने वाली यातना तैयार कर रखी है। (37)

[अल्लाह उन्हें भी पसंद नहीं करता] जो अपनी दौलत लोगों को दिखाने के लिए ख़र्च करते हैंजो न अल्लाह पर विश्वास रखते हैं, और न ही अन्तिम दिन [क़यामत] पर  जिस किसी ने शैतान को अपना साथी बनाया, तो क्या ही बुरा साथी है वह! (38)

भला उनका क्या नुक़सान हो जाताअगर वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर विश्वास कर लेतेऔर अल्लाह ने जो कुछ रोज़ी उन्हें दे रखी हैउसमें से (अच्छे कामों पर) ख़र्च कर देते? अल्लाह उन्हें अच्छी तरह से जानता है। (39)

अल्लाह रत्ती-भर भी किसी के साथ ज़ुल्म नहीं करता: वह किसी भी अच्छे कर्म को दुगना कर देता है और ख़ुद अपनी तरफ़ से ज़बरदस्त इनाम देता है। (40)

उस वक़्त वे क्या करेंगे जब हम हर समुदाय में से एक गवाह लाएँगे, और (ऐ रसूल) आपको इन लोगों के ख़िलाफ़ गवाह बनाकर पेश करेंगे? (41)

उस दिन, जो लोग (सच्चाई पर) विश्वास नहीं करते थे और हमारे रसूल की आज्ञा नहीं मानते थे, वे तमन्ना करेंगे कि काश हमें ज़मीन निगल जाती: वे अल्लाह से कोई भी चीज़ छिपा नहीं पाएंगे।  (42)


ऐ ईमानवालो! अगर तुम नशे की हालत में हो, तो नमाज़ के नज़दीक मत जाओ, उस वक़्त तक न जाओ जब तक तुम्हें यह  होश न हो कि तुम क्या कह रहे हो; न ही अगर तुम नापाकी [ritual impurity]  की हालत में हो ---- हालाँकि तुम मस्जिद से होकर गुज़र सकते हो------ जब तक तुम नहा-धोकर पाक न हो जाओ (नमाज़ नहीं होगी); अगर तुम बीमार हो, सफ़र में होशौच करके आए हो, या तुमने सेक्स किया हो, और फिर तुम्हें कहीं पानी न मिले, तो थोड़ी सी साफ़ मिट्टी लो और उससे अपने हाथों और मुँह पर मल लो। अल्लाह तो हमेशा गलतियों को माफ़ करने के लिए तैयार रहता है।  (43)


[ऐ रसूल]  क्या आपने इस पर विचार नहीं किया कि किस तरह वे लोग जिन्हें (आसमानी) किताब का हिस्सा दिया गया था, वे गुमराही के खरीदार बने हुए हैं, और चाहते हैं कि तुम [ईमानवाले] भी सही रास्ते से भटक जाओ? (44)

अल्लाह आपके दुश्मनों को बहुत अच्छी तरह से जानता है: आपकी हिफ़ाज़त के लिए, और आपकी मदद के लिए अल्लाह काफ़ी है। (45)

कुछ यहूदी लोग ऐसे हैं जो (तौरात के) शब्दों के अर्थ बिगाड़ देते हैं: वे कहते हैं,  "हमने सुना, मगर हम नहीं मानते," औरसुनो", और "ख़ुदा करे तुम न सुनो," और "रा'इना" [हमारी ओर देखो!],"  वे अपनी ज़बानों को बुरा-भला कहने के लिए तोड़-मरोड़कर बोलते हैं, ताकि तुम्हारे दीन को नीचा दिखा सकें। अगर वे कहते, "हमने सुना और मान लिया," और "सुनिए," और "उनज़ुरना" [हमारी ओर निगाह करें]," तो यह उनके लिए ज़्यादा अच्छा और उचित होता। मगर उनके द्वारा आज्ञा न मानने और विश्वास न करने के कारण उन पर अल्लाह की फिटकार पड़ी हुई है; वे बहुत थोड़े हैं जो ईमान रखते हैं।  (46)


ऐ किताबवालो, विश्वास करो उस (क़ुरआन) पर, जो हमने उतार भेजी है, जो उस (किताब) की सच्चाई की पुष्टि करती है जो तुम्हारे पास पहले से है, इससे पहले कि हम तुम्हारे अंदर दिशा (की समझ) को मिटा दें, तुम्हें पीठ के पीछे उलट दें, या उन पर लानत करें, जिस तरह 'सब्त' [Sabbath] के नियम तोड़ने वालों पर हमारी फिटकार पड़ी थी। और अल्लाह की मर्ज़ी तो पूरी होकर ही रहती है। (47)

अल्लाह इस बात को कभी माफ़ नहीं करता कि उसकी (ख़ुदायी के) साथ किसी साझेदार [Partner] को जोड़ा जाए: इसके अलावा जैसा भी निचले दर्जे का गुनाह हो, वह जिसे चाहेगा, माफ़ कर देगा, मगर जिस किसी ने अल्लाह का साझेदार ठहराया, तो उसने एक बड़ा झूठ गढ़ लिया। (48)

(ऐ रसूल), क्या आपने उन लोगों पर विचार नहीं किया जो अपने आपको पवित्र होने का दावा करते हैं? नहीं! बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है, उसे (बुराइयों से बचाकर) पवित्र बना देता है: किसी के  साथ राई के दाने बराबर भी ज़ुल्म नहीं किया जाएगा। (49)

देखो! वे किस तरह अल्लाह के बारे में झूठी बातें गढ़ते हैं? यह तो अपने आप में ही बड़ा भारी गुनाह है! (50)

क्या तुम नहीं देखते कि जिन लोगों को अल्लाह की किताब (के ज्ञान) का एक हिस्सा दिया गया था, वे अब मूर्तियों और शैतानी ताक़तों में विश्वास रखते हैं? वे (अरब के) विश्वास न करनेवालों के बारे में कहते हैं, "ये ईमानवालों से ज़्यादा सही रास्ते पर हैं।" (51)

ये वे लोग हैं जिन्हें अल्लाह ने ठुकरा दिया है: और जिसे अल्लाह ने ठुकरा दिया होतो (ऐ रसूल) आप उसका कोई मददगार नहीं पाएंगे। (52)

जो कुछ अल्लाह के पास है, क्या उसमें इनका कोई हिस्सा है? अगर है, फिर तो ये लोगों को राई बराबर भी नहीं देंगे। (53)

क्या ये (दूसरे) लोगों से जलते हैं कि अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़ल से (रसूल क्यों बना) दिया है? हमने इबराहीम के उत्तराधिकारियों को किताब और समझ-बूझ प्रदान किया था ----- और हमने उन्हें बड़ा राज-पाट दिया था----  (54)

फिर उनमें से कुछ ने तो उसमें विश्वास कर लिया, और कुछ ने उससे मुँह मोड़ लिया। जहन्नम की आग बहुत बुरी तरह भड़क रही है। (55)

वे लोग जो हमारी आयतों को मानने से इंकार करते हैं, उन्हें हम (जहन्नम की) आग में झोंक  देंगे। जब उनकी खालें पूरी तरह जल भुन जाएँगीतो हम उनकी जगह नयी खालों को चढ़ा देंगे, ताकि उन्हें दर्द का एहसास होता रहे: अल्लाह प्रभुत्वशाली, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (56)

और जो लोग (हमारी आयतों पर) ईमान रखते हैं और अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें हम ऐसे बाग़ों में दाखिल करेंगे, जिनके नीचे नहरें बह रहीं होगी, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। उनके लिए वहाँ (मर्दों और औरतों के) पवित्र जोड़े होंगे, और हम उन्हें ठंडी तरोताज़ा छाँव में दाखिल करेंगे। (57)

अल्लाह तुम (लोगों) को आदेश देता है कि तुम्हारे पास अगर किसी की अमानतें [Deposits] हों, तो उसे उसके सही हक़दारों को वापस कर दो, और, जब लोगों के बीच फ़ैसला करो, तो इंसाफ़ करो: अल्लाह ने तुम्हें जो नसीहतें दी हैं, सब कितनी अच्छी हैं, क्योंकि अल्लाह सब कुछ सुनता, सब देखता है। (58)

ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा मानो, और उनका भी कहना मानो जो तुममें से हाकिम हैं। अगर तुम्हारे बीच किसी मामले में झगड़ा हो जाए, तो तुम फ़ैसले के लिए उस मामले को अल्लाह और रसूल के पास ले जाओ, अगर सचमुच तुम अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते हो: यह ज़्यादा अच्छा होगा और नतीजे के हिसाब से भी बेहतर होगा।  (59)

(ऐ रसूल), क्या आप उन (पाखंडी) लोगों को नहीं देखते, जो यह दावा करते हैं कि वे उस चीज़ पर ईमान रखते हैं जो आप पर उतारी गई है, और उस पर भी जो आपसे पहले उतारी गयी थी, मगर इसके बावजूद वे आपस के मामलों में फ़ैसले के लिए ना-इंसाफ़ ज़ालिमों के पास जाते हैं, हालाँकि उन्हें हुक्म दिया गया है कि वे उन (ज़ालिमों) को ठुकरा दें? शैतान तो उन्हें भटकाकर सीधे रास्ते से बहुत दूर ले जाना चाहता है। (60)

जब उनसे कहा जाता है कि "(फ़ैसला कराने के लिए) अल्लाह की आयतों की तरफ़, और रसूल की तरफ़ आओतो (ऐ रसूल), आप पाखंडियों [मुनाफ़िकों] को देखते हैं कि वे आपसे मुँह मोड़कर चल देते हैं।  (61)

जब उनकी अपनी करतूतों के कारण उन पर कोई बड़ी मुसीबत आ जाती है, तब वे आपके पास अल्लाह की क़समें खाते हुए आते हैं, (और कहते हैं), "हम तो केवल भलाई का काम और आपस में मेल-मिलाप चाहते हैं? (62)

इनके दिलों के अंदर क्या है, उसे अल्लाह अच्छी तरह जानता है, अत: जो कुछ वे कहते हैं उन पर ध्यान न दें, उन्हें नसीहत करें, और उनके बारे में उनसे दिल में उतर जाने वाले शब्दों में बात करें।  (63)


हमने जितने भी रसूलों को भेजा, इसलिए भेजा कि अल्लाह की अनुमति से उनकी आज्ञा का पालन किया जाए। [ऐ रसूल] अगर ये (पाखंडी) लोग आपके पास आए होते, जब वे कोई गुनाह कर बैठते, और उन्होंने अल्लाह से माफ़ी की गुहार लगायी होती, और रसूल ने उनकी माफ़ी के लिए दुआ की होती, तो वे पाते कि अल्लाह तौबा [repentance] क़बूल करता है और वह बेहद दयावान है। (64)

आपके रब की कसम! ये उस वक़्त तक पक्के ईमानवाले नहीं होंगे जब तक कि वे आपस के सारे झगड़ों का फ़ैसला आपसे न कराएँ, और फिर आपके फ़ैसले पर अपने दिलों में किसी तरह की खटक न पाएँ, और उसे पूरी तरह मान लें----  (65)

अगर कहीं हमने उन्हें आदेश दिया होता कि "अपनी जान दे दोयाअपने घरों से (हिजरत करके) निकल खड़े हो," तो बहुत थोड़े लोगों को छोड़कर, उन्होंने ऐसा नहीं किया होता ----  अगर उन्होंने वह किया होता जैसा उनको कहा गया था, तो उनके लिए कहीं बेहतर होता और उनके ईमान की ज़्यादा मज़बूती से पुष्टि हो जाती,  (66)

और हमने अपनी ओर से उन्हें बड़ा भारी इनाम दिया होता,  (67)

और उन्हें सीधा रास्ता दिखाया होता,  (68)

जो कोई अल्लाह और रसूल की आज्ञा मानता है, वह उन लोगों में शामिल होगा जिन पर अल्लाह ने अपनी नेमतें [blessing] उतारी हैं: (उनमें) नबियों की जमाअत, हमेशा सच बोलनेवाले, सच्चाई की गवाही देनेवाले, और नेक व अच्छे लोग हैं--- क्या ही अच्छे साथी हैं ये! (69)

यह अल्लाह का ख़ास करम [favour] है। कोई नहीं है जो अल्लाह से बेहतर (इंसान का हाल) जानता हो।  (70)


ऐ ईमानवालो! अपने बचाव के लिए (हथियार के साथ) तैयार रहो। फिर (युद्ध के लिए) चाहे छोटी टुकड़ियों में निकलो या इकट्ठे होकर एक साथ निकलो। (71)

तुम्हारे बीच कोई ऐसा भी आदमी ज़रूर होगा जो (युद्ध में जाने के समय सुस्ती दिखाते हुए) पीछे रह जाए: अगर तुम पर कोई मुसीबत आ पड़ेतो (ख़ुश होकर) कहेगा कि "अल्लाह ने मुझ पर बड़ी मेहरबानी की कि मैं उन लोगों के साथ न गया,"  (72)

इसके बावजूद, अगर (युद्ध में) तुम पर अल्लाह की मेहरबानी हो जाए, तो वह (जल मरेगा, और) ज़रूर यह कहेगा, "काश! मैं भी (युद्ध में) उन लोगों के साथ होता, तो मुझे भी बहुत कुछ (लूट का सामान) हासिल हुआ होता," जैसे मानो तुम्हारे और उसके बीच प्रेम व भाईचारे का कोई सम्बन्ध था ही नहीं।  (73)

तो तुममें से जो लोग आनेवाली दुनिया [आख़िरत/ परलोक] के बदले इस संसार की ज़िंदगी को (अल्लाह के हाथों) बेचने के लिए तैयार हों, तो उन्हें चाहिए कि अल्लाह के रास्ते में लड़ें। जो कोई अल्लाह के रास्ते में लड़ता है, चाहे वह मारा जाए या वह जीत जाएहम उसे बड़ा भारी इनाम देंगे।  (74)

[ईमानवालो!] तुम्हें क्या हुआ है कि तुम अल्लाह के रास्ते में नहीं लड़ते? हालाँकि कितने ही सताए हुए मर्द हैं, औरतें हैं, बच्चे हैं, जो (ज़ुल्म से तंग आकर) पुकारते हैं, "हमारे रब! हमें इस (मक्का की) बस्ती से छुटकारा दिला जहाँ के लोग ज़ुल्म करने में लगे हैं! और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा रखवाला बना दे और किसी को हमारी  मदद करने के लिए खड़ा कर दे।" (75)

ईमानवालों का लड़ना तो अल्लाह के ही रास्ते में होता है, जबकि (सच्चाई से) इंकार करनेवाले अन्याय व शैतान के रास्ते में लड़ते हैं। अतः तुम शैतान के सहयोगियों से लड़ो: शैतान की चालें (सच्चाई के मुक़ाबले में) सचमुच कमज़ोर होती हैं। (76)


[ऐ रसूल], क्या आपने उन लोगों की हालत नहीं देखी जिनसे (पहले) कहा गया था कि "(युद्ध करने से) अपने हाथ रोके रखो, पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो और ज़कात अदा करो?" फिर जब उन्हें युद्ध करने का आदेश दिया गया, तो उनमें से कुछ लोग इंसानों से ऐसा डरने लगे जैसे कोई अल्लाह से डरता हो, बल्कि उससे भी ज़्यादा डरने लगे, और कहने लगे, "हमारे रब! तूने हमें युद्ध करने का क्यों आदेश दे दिया? काश कि तूने हमें थोड़ा सा और समय दिया होता।" आप उनसे कह दें, "इस दुनिया की ख़ुशियाँ तो बहुत थोड़ी हैं, जो लोग (इंसानों से डरने के बजाय) अल्लाह का डर रखते हैं, उनके लिए आनेवाली दुनिया [आख़िरत] की ज़िंदगी कहीं बेहतर है: वहाँ तुम्हारे साथ राई के दाने के बराबर भी अन्याय नहीं होगा। (77)

तुम कहीं भी रहो, मौत तो तुम्हें आकर रहेगी, चाहे तुम किसी ऊँचे क़िलों में ही क्यों न (छिपे) हो।" जब उनके साथ कोई अच्छी घटना घटती है, तो कहते हैं, "यह तो अल्लाह की तरफ़ से (हमारी कोशिशों का बदला) है," मगर जब उन्हें कोई नुक़सान पहुँचता है, तो [ऐ रसूल], वे कहते हैं, "यह तुम्हारे कारण हुआ है।" आप कह दें, "जो कुछ भी होता है, सब अल्लाह की ही तरफ़ से होता है।" आख़िर इन लोगों को क्या हो गया कि कोई भी बात कही जाए, लगता है कि ये इसे समझते ही नहीं? (78)

(सच तो यह है कि) कोई भी अच्छी चीज़ जो तुम्हारे साथ होती है, वह अल्लाह की तरफ़ से होती है; और कोई भी बुरी हालत जो तुम्हें पेश आती है, वह असल में ख़ुद तुम्हारी तरफ़ से (बुरे कर्मों के चलते) होती है। [ऐ रसूल], हमने आपको लोगों के पास संदेश पहुँचानेवाला [रसूल] बनाकर भेजा है; और (इस बात पर) अल्लाह का गवाह होना ही काफ़ी है। (79)

जिस किसी ने रसूल की आज्ञा मानीउसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया। और जिस किसी ने मुँह मोड़ा, तो [ऐ रसूल], हमने आपको ऐसे लोगों पर कोई रखवाला [overseer] बनाकर तो नहीं भेजा है। (80)

वे (आपसे तो) कहते हैं, "आपका हुक्म मान लिया," मगर जैसे ही वे आपके पास से उठकर बाहर जाते हैं, तो उनमें से कुछ लोग आपकी बातों के ख़िलाफ रात में षड्यंत्र करते हैं। जो कुछ वे षड्यंत्र करते हैं, अल्लाह उसका हिसाब लिख लेता है, सो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें, और अल्लाह पर भरोसा रखें: आपके काम बनाने के लिए अल्लाह ही काफ़ी है! (81)


क्या वे इस क़ुरआन में सोच-विचार नहीं करते? अगर यह अल्लाह के अलावा किसी दूसरे की तरफ़ से होती, तो ज़रूरी था कि उन लोगों ने इसमें बहुत सी बेमेल बातें [inconsistency] पायी होतीं। (82)

जब कभी उनके पास किसी मामले की ख़बर पहुँचती है, चाहे वह शांति से जुड़ी बात हो या युद्ध से, तो वे उसे (तुरंत) लोगों में फैलाने लगते हैं; हालाँकि अगर वे उस (ख़बर) को अल्लाह के रसूल और उनमें जो लोग अधिकार रखते हैं, उनके पास ले जाते, तो उन लोगों ने मामले की जाँच-पड़ताल से सच्चाई जान ली होती। अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत [mercy] न होती, तो थोड़े लोगों के सिवा तुम सब शैतान के पीछे चलने लग जाते। (83)

अतः [ऐ रसूल!] अल्लाह के रास्ते में युद्ध करें। आप तो केवल अपने काम के लिए ही  ज़िम्मेदार हैं। ईमानवालों को भी (लड़ने के लिए) उभारते रहें। बहुत सम्भव है कि अल्लाह विश्वास न करनेवालों की ताक़त को बहुत कम कर दे, कि अल्लाह ताक़त में बहुत मज़बूत, और सज़ा देने में बड़ा कठोर है। (84)

जो कोई अच्छाई के रास्ते पर चलने के पक्ष में बोलता है, तो वह उससे होने वाले फ़ायदे में हिस्सेदार होगा, और जो कोई बुराई के रास्ते पर चलने के पक्ष में बोलेगा, तो वह उससे होने वाली बुराई के बोझ का हिस्सेदार होगा: अल्लाह को हर चीज़ पर नियंत्रण हासिल है।  (85)

[ईमानवालो], जब कभी तुम्हें दुआ देकर सलाम किया जाए, तो (चाहे युद्ध हो रहा हो, तब भी) तुम सलामती की उससे अच्छी दुआ दिया करो, या (कम से कम) जो कहा गया है, जवाब में उसी को दोहरा दो: अल्लाह हर चीज़ का हिसाब रखता है।  (86)

वह अल्लाह है: उसके सिवा कोई बंदगी के लायक़ [ख़ुदा] नहीं। वह क़यामत के दिन तुम सबको एक साथ (अपने सामने) इकट्ठा करेगा, इस बात में कोई संदेह नहीं, और अल्लाह से बढ़कर किस की बात सच्ची हो सकती है? (87)


[ईमानवालो!], तुम्हें क्या हो गया है कि पाखंडियों [मुनाफ़िक़ो/ Hypocrites] के बारे में तुम दो गिरोह में बँट रहे हो, जबकि अल्लाह ने तो ख़ुद उनकी करतूतों के कारण उन्हें ठुकरा दिया है? क्या तुम उन्हें सही रास्ता दिखाना चाहते हो जिसे अल्लाह ने भटकता छोड़ दिया है? (याद रहे), जिसे अल्लाह भटकता छोड़ दे, [ऐ रसूल], उसके लिए आप कभी कोई रास्ता नहीं ढूँढ सकते। (88)

उन [पाखंडियों] की दिली तमन्ना यह है कि तुम भी (सच्चाई पर) ईमान से इंकार कर दो, जैसा कि इन लोगों ने ख़ुद किया है, ताकि तुम भी उन्हीं जैसे हो जाओ; अत: उन्हें उस वक़्त तक अपना सहयोगी न बनाओ, जब तक कि वे अल्लाह के रास्ते में (मक्का के) अपने घर-बार छोड़कर (मदीना) न आ जाएं। अगर वे (मदीना आने से) पीठ फेरें, तो (यह दुश्मनों का साथ देना होगा, सो) उन्हें पकड़ो और जहाँ कहीं उनसे सामना हो जाए, उन्हें क़त्ल कर दो। उनमें से किसी को न अपना सहयोगी बनाना और न ही मददगार। (89)

मगर हाँ, उनमें से जो लोग (दुश्मनों का साथ छोड़कर) किसी ऐसी क़ौम के लोगों के साथ जा मिलें, जिनके साथ तुमने कोई 'शांति-समझौता' [Peace treaty] कर रखा हो, या वे तुम्हारे पास इस हालत में आएँ कि उनके दिल लड़ने-भिड़ने से तंग आ चुके हों, न वे तुम से लड़ें और न (तुम्हारी तरफ़ से) अपनी क़ौम के लोगों से लड़ें (तो ऐसे लोगों पर हाथ न उठाओ)। (याद रखो), अगर अल्लाह चाहता तो उन लोगों को तुम पर हावी कर देता, और वे तुमसे ज़रूर लड़े होते। सो अगर वे तुम से अलग रहें और तुमसे न लड़ें, और तुम्हारी तरफ़ शांति का हाथ बढ़ाएँ, तो फिर अल्लाह ने उनके विरुद्ध क़दम उठाने का तुम्हारे लिए कोई रास्ता नहीं रखा है।  (90)

इनके अलावा कुछ ऐसे लोग भी मिलेंगे जो अमन-चैन से रहना चाहते हैं, तुम्हारी तरफ़ से, और अपनी क़ौम के लोगों की तरफ़ से भी, मगर जब कभी उन्हें (तुम्हारे विरुद्ध)  फ़साद व गड़बड़ी फैलाने का मौक़ा दोबारा मिल जाए, (तो वे मचल उठें, और) उसमें औंधे मुँह गिर पड़ें। अत: अगर ऐसे लोग तुमसे (युद्ध करने से) न तो अपने को अलग-थलग करें, और न तुम्हारी ओर शांति का हाथ बढ़ाएँ, और न ही (तुम्हारे विरुद्ध) लड़ाई से अपने हाथ रोकें, तो उन्हें भी पकड़ो और जहाँ कहीं भी उनसे सामना हो जाए, उनका क़त्ल करो: ऐसे लोगों के विरुद्ध हमने तुम्हें खुला अधिकार दे रखा है। (91)


और (देखो!), ऐसा कभी नहीं होना चाहिए कि एक ईमानवाला दूसरे ईमानवाले की हत्या कर डाले, हाँ, अगर भूल-चूक से ऐसा हो जाए तो बात और है। अगर कोई ग़लती से एक  ईमानवाले की हत्या कर दे, तो उसे एक मुस्लिम ग़ुलाम [slave] को आज़ाद करना होगा और मारे गए आदमी के घरवालों को भरपाई [compensation] में "ख़ून-बहा" [blood-money] अदा करना होगा, हाँ, अगर घरवाले उदारता से (ख़ून-बहा) माफ़ कर दें तो और बात है; अगर मरनेवाला किसी ऐसी (दुश्मन) क़ौम से हो जिनसे लड़ाई चल रही हो, मगर ख़ुद वह ईमानवाला हो, तो ऐसी हालत में भरपाई में केवल एक मुस्लिम ग़ुलाम को आज़ाद करना होगा (ख़ून-बहा देने की ज़रूरत नहीं); अगर मरनेवाला उस क़ौम के लोगों में से हो जिसके साथ तुमने कोई  शांति-समझौता कर रखा हो, तो भरपाई में उसके घरवालों को 'ख़ून-बहा' भी देना होगा, और साथ में एक मुस्लिम ग़ुलाम को आज़ाद भी करना होगा। अगर किसी के पास ग़ुलाम न हो (और न ही ग़ुलाम को ख़रीदकर आज़ाद करने के लिए माल हो), तो अल्लाह के सामने (अपने गुनाह की) तौबा [repentance] के लिए उसे चाहिए कि वह लगातार दो महीने रोज़े रखे: अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, और (अपने हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।  (92)

अगर एक ईमानवाला दूसरे ईमानवाले की जान-बूझकर हत्या कर डाले, तो उसकी सज़ा जहन्नम है, जिसमें वह हमेशा रहेगा: (समझ लो कि) अल्लाह उससे सख़्त नाराज़ हुआ, उसे ठुकरा दिया गया, और उसके लिए अल्लाह ने ज़बरदस्त यातना तैयार कर रखी है। (93)

अत: ऐ ईमानवालो! जब तुम अल्लाह के रास्ते में लड़ने के लिए निकलो, तो अच्छी तरह पता लगा लो, और अगर कोई तुम्हें सलामती की दुआ के साथ 'सलाम' करे, तो इस लालच से कि तुम्हें कुछ सांसारिक जीवन का माल (लूट में) हासिल हो जाए, उससे यह न कहो कि "तुम ईमान नहीं रखते," (और लड़ने लग जाओ) ----- अल्लाह के पास तुम्हारे लिए बहुत सारी नेमतें हैं। एक समय तुम्हारी हालत भी ऐसी ही थी, इसलिए ठीक से पता लगा लिया करो: तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है।  (94)


ईमानवालों में से वे लोग जो शरीर से मजबूर नहीं हैं, और (बिना कारण) घर में बैठ रहते हैं, वे उनके बराबर नहीं हो सकते जो लोग अल्लाह के रास्ते में अपनी जानों और अपने माल से जी-तोड़ संघर्ष [जिहाद] करते हैं। अल्लाह ने ऐसे लोगों का दर्जा घर में रुके रह जाने वालों से ऊँचा रखा है----हालाँकि उसने हर ईमानवाले से अच्छे इनाम का वादा कर रखा है, मगर (अल्लाह के रास्ते में) जी-तोड़ संघर्ष [जिहाद] करने वालों पर अपना ख़ास करम करते हुए वह बहुत ज़बरदस्त इनाम देगा, जो घर में रुके रहने वालों से कहीं बड़ा होगा -----  (95)

यह ऊँचे दर्जे हैं जो उसकी तरफ़ से दिए जाएंगे, और साथ में गुनाहों की माफ़ी, और उसकी रहमत [mercy]: अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला, बड़ा दयावान है। (96)

जो लोग (दुश्मनों के साथ रहकर) अपने हाथों अपना नुक़सान कर रहे हैं, उनकी रूहें निकालते समय फ़रिश्ते उनसे पूछेंगे, "तुम किस हाल में थे?" वे कहेंगे, "हम ज़मीन पर बेबस थे, हम पर बड़े ज़ुल्म किए गए थे।" फ़रिश्ते कहेंगे, "मगर क्या अल्लाह की ज़मीन इतनी फैली हुई न थी कि तुम घर-बार छोड़कर कहीं ओर चले जाते?" इन लोगों का ठिकाना जहन्नम होगा, और क्या ही बुरा ठिकाना है वह! (97)

मगर हाँ, जो मर्द, औरतें और बच्चे सचमुच बेबस और मजबूर थे, जिनके बस में कोई साधन नहीं था और न ही वहाँ से निकलने का कोई रास्ता ------ (98)

तो सम्भव है कि अल्लाह ऐसे लोगों को माफ़ कर दे; क्योंकि अल्लाह ग़लतियों को माफ़ करनेवाला और बेहद क्षमा करनेवाला है। (99)

जो कोई अल्लाह के रास्ते में घर-बार छोड़कर निकलेगा, वह ज़मीन में शरण लेने की बहुत जगह और साथ में बहुत कुछ पाएगा, और अगर कोई अपने घर से सब कुछ छोड़कर अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ निकले, और फिर उसकी मौत हो जाए, तब भी उसका इनाम अल्लाह की तरफ़ से बिल्कुल पक्का है। अल्लाह (हर हाल में) बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है। (100)


[ईमानवालो], जब तुम (युद्ध के लिए) यात्रा कर रहे हो, और अगर तुम्हें डर हो कि विश्वास न करनेवाल्रे तुम्हें नुक़सान पहुंचा सकते हैं, तो तुम पर इस बात में कोई गुनाह नहीं अगर तुम नमाज़ को कुछ छोटी कर लो: विश्वास न करनेवाले लोग तुम्हारे कट्टर दुश्मन हैं।  (101)

[ऐ रसूल!], जब आप (लड़ाई के दौरान) ईमानवालों के बीच हों, और उन्हें नमाज़ पढ़ाने के लिए खड़े हों, तो उनमें से एक गिरोह को चाहिए कि आपके साथ नमाज़ के लिए खड़ा हो जाए, और अपने हथियार साथ लिए रहे, और फिर जब वे (झुककर) सज्दा कर लें, तो उन्हें चाहिए कि वे पीछे जाकर अपना मोर्चा संभाल लें। उसके बाद, दूसरे गिरोह के लोग, जिन्होंने अभी तक नमाज़ न पढ़ी हो, उन्हें आगे आकर आपके साथ नमाज़ पढ़नी चाहिए, और उन्हें भी अपने बचाव के सामान और हथियारों से लैस होना चाहिए: विश्वास न करनेवाले तो दिल से चाहते हैं कि तुम (लोग) अपने हथियारों और सामान से बेपरवाह हो जाओ, ताकि वे तुम पर एक झटके में टूट पड़ें। अगर तेज़ बारिश या बीमारी ने तुम्हें आ घेरा हो, तो इस बात के लिए तुम दोषी नहीं होगे अगर तुम अपने हथियार किनारे रख दो, मगर तुम अपने बचाव के लिए तैयार रहा करो। सचमुच अल्लाह ने विश्वास न करनेवालों के लिए अपमानित कर देने वाली यातना तैयार कर रखी है। (102)

नमाज़ पढ़ लेने के बाद भी बराबर अल्लाह को याद करते रहो--- खड़े हुए, बैठे हुए, और करवट लेटे हुए भी----- एक बार जब तुम (दुश्मनों से) सुरक्षित हो जाओ, तो फिर नमाज़ पूरे नियम के अनुसार पढ़ो, क्योंकि ईमानवालों के लिए निर्धारित समय पर पाबन्दी से नमाज़ पढना ज़रूरी है।  (103)

दुश्मन का पीछा करने में ऐसे कमज़ोर दिल न बन जाओ: अगर तुम तकलीफ़ झेल रहे हो, तो वे भी तकलीफ़ झेल रहे हैं, मगर तुम अल्लाह से कुछ मिल जाने की उम्मीद रखते हो, जबकि वे अल्लाह से कोई उम्मीद नहीं रख सकते। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।  (104)


[ऐ रसूल], हमने आप पर यह किताब सच्चाई के साथ उतार भेजी है, ताकि जैसा अल्लाह ने आपको बता दिया है, उसी के मुताबिक़ आप लोगों के बीच फ़ैसला करें। आप उन लोगों की वकालत न करें जिन्होंने भरोसे को तोड़ डाला है। (105)

अल्लाह से माफ़ी चाहें : वह बहुत माफ़ करनेवाला, दयावान है। (106)

आप ऐसे लोगों की वकालत न करें जो ख़ुद अपनी जानों के साथ विश्वासघात करते हैं: अल्लाह ऐसे किसी आदमी को पसंद नहीं करता, जो धोखा देने और गुनाह करने में लगा हो।  (107)

वे लोगों से अपने आपको छिपाने की कोशिश करते हैं, मगर वे अल्लाह से नहीं छिप सकते। अल्लाह तो उस समय भी उनके साथ मौजूद होता है, जब वे रातों में शैतानी योजनाएं बनाते हैं, और ऐसी बातें करते हैं जो अल्लाह को पसंद नहीं: जो कुछ भी वे करते हैं, वह अल्लाह के ज्ञान के घेरे से बाहर नहीं।  (108)

(ईमानवालो), इस दुनिया में तो तुम इन लोगों की तरफ़ से बहस कर रहे हो, मगर क़यामत के दिन उनकी तरफ़ से अल्लाह के साथ कौन बहस करेगा? उनके बचाव में कौन होगा? (109)

तब भी, जो कोई बुरा कर्म करे या अपने हाथों अपना नुक़सान कर बैठे, और फिर अल्लाह से माफ़ी की प्रार्थना करे, तो वह अल्लाह को बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान पाएगा।  (110)

वह जो गुनाह के काम करता है, तो वह अपनी ही जान पर ज़ुल्म करता है----- अल्लाह सब जाननेवाला, (और हर काम में) बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है---  (111)

अगर कोई आदमी जुर्म करता है, या गुनाह करता है, और फिर उसका इल्ज़ाम किसी निर्दोष आदमी पर थोप देता है, तो उसने एक बड़े धोखे और भारी गुनाह का बोझ अपनी गर्दन पर डाल लिया। (112)


[ऐ रसूल], अगर अल्लाह का फ़ज़ल [Grace] और उसकी रहमत [mercy] आपके साथ न होती, तो उनमें से कुछ लोगों ने आपको सीधे रास्ते से भटका देने की कोशिश ज़रूर की होती; हालाँकि वे ख़ुद अपने आपको ही भटका रहे हैं, और वे आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते, क्योंकि अल्लाह ने आप पर किताब उतारी है और (हर चीज़ की) समझ-बूझ दी है, और वह सिखाया है जो आप नहीं जानते थे। आप पर अल्लाह का फ़ज़ल [bounty] सचमुच बहुत ज़्यादा रहा है। (113)

उनकी अधिकतर गोपनीय बातों में कोई भलाई की बात नहीं होती। हाँ, जो आदमी दान देने या भलाई करने या लोगों के बीच मेल-जोल बढ़ाने के लिए कोई आदेश दे, तो उसकी बात और है। तो जो कोई इन कामों को अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए करेगा, उसे हम ज़बरदस्त इनाम देंगे;  (114)

कोई आदमी जिसके सामने (अल्लाह की तरफ़ से भेजा हुआ) मार्गदर्शन स्पष्ट कर दिया गया हो, फिर भी अगर वह अल्लाह के रसूल का विरोध करता है, और ईमानवालों का रास्ता छोड़कर कोई दूसरे रास्ते पर चलता है, तो हम उसे उसके चुने हुए रास्ते पर चलने के लिए छोड़ देंगे ---- हम उसे जहन्नम में जलायेंगे, और क्या ही बुरा ठिकाना है वह!  (115)


अल्लाह को छोड़कर किसी दूसरे की इबादत की जाए, इसको वह कभी माफ़ नहीं करता ---- हालाँकि वह जिसके लिए चाहे, उसके छोटे-मोटे गुनाह माफ़ कर ही देता है----  तो जिस किसी ने ऐसा किया, वह भटककर सीधे रास्ते से बहुत दूर जा पड़ा।  (116)

मूर्तिपूजकों का हाल यह है कि वे अल्लाह के बदले बस कुछ देवियों को पुकारते हैं, और उस शैतान को पुकारते हैं, (117)

जो बाग़ी हो गया, और जिसे अल्लाह ने ठुकरा दिया था, उसने कहा था, "मैं तेरे बन्दों में से (गुमराह लोगों का) एक हिस्सा लेकर रहूँगा; (118)

मैं उन्हें सीधे रास्ते से भटकाऊँगा और उनके अंदर झूठी कामनाएं जगाउंगा; मैं उन्हें हुक्म दूँगा कि वे चौपायों के कानों में चीर लगा दें, और उन्हें मैं हुक्म दूँगा कि वे अल्लाह की रचना [creation] में बिगाड़ पैदा कर दें।" जिस किसी ने अल्लाह से हटकर शैतान को अपना संरक्षक बनाया, वह पूरी तरह बर्बाद हो गया: (119)

वह उनसे तरह-तरह के वादे करता है, और उनके अंदर झूठी उम्मीदें बढ़ा देता है, मगर शैतान का वादा तो धोखे के सिवा कुछ नहीं होता।  (120)

ऐसे लोगों के लिए जहन्नम ही उनका घर होगा, और वे वहाँ से निकल भागने का कोई रास्ता न पाएंगे,   (121)

मगर जो लोग ईमान रखते हैं, और अच्छे कर्म करते हैं, उन्हें हम (जन्नत के) ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेंगे, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ उन्हें हमेशा रहना है ------  अल्लाह की तरफ़ से यह सच्चा वादा है, और अल्लाह से बढ़कर सच्चाई की बात कौन बोल सकता है।  (122)

यह न तो तुम्हारी (झूठी) उम्मीदों के मुताबिक़ होगा, और न ही उनकी जो किताबवाले हैं: जो कोई भी बुरे काम करेगा, उसे उसका फल मिलेगा और उसे ऐसा कोई नहीं मिलेगा जो अल्लाह के खिलाफ़ उसको बचा सके या उसकी मदद कर सके; (123)

जो कोई भी अच्छे कर्म करेगा, चाहे मर्द हो या औरत, और वह ईमान रखता होतो वह जन्नत में दाख़िल होगा, और उसके साथ रत्ती भर भी ज़ुल्म नहीं होगा। (124)

दीन [धर्म] के मामले में उन लोगों से बेहतर कौन हो सकता है, जो अपने आपको पूरी तरह अल्लाह के सामने झुका दे, अच्छा कर्म करे, और इबराहीम के दीन (को सही मानकर उस रास्ते) पर चले, जो अपने ईमान में सच्चा था? (यह जान लो कि) अल्लाह ने इबराहीम को अपना दोस्त बनाया था।  (125)

[याद रखो!] आसमानों और ज़मीन की हर चीज़ अल्लाह की है: अल्लाह सारी चीज़ों की ख़बर रखता है।  (126)


[ऐ रसूल!], लोग आपसे औरतों के क़ानून के बारे में पूछते हैं, आप कह दें, "अल्लाह ख़ुद ही तुम्हें उनसे जुड़े क़ानून बताता है। तुम्हारे सामने पहले ही हमारी किताब [क़ुरआन] की वह आयतें पढ़कर सुनायी जा चुकी हैं, जो उन अनाथ लड़कियों के बारे में हैं [जो तुम्हारी देख-रेख में हैं], जिनकी (विरासत का) निर्धारित हिस्सा तुम अदा नहीं करते और (इसीलिए) उनके साथ शादी कर लेना चाहते हो, और (इसी तरह) बेसहारा बच्चों के बारे में भी आदेश है ------ अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अनाथों के साथ इंसाफ़ से पेश आओ: जो कुछ भलाई का काम तुम करते हो, अल्लाह उसे अच्छी तरह जानता है।" (127)


अगर किसी औरत को अपने पति की तरफ़ से ज़ोर-ज़बरद्स्ती करने या अलग हो जाने का डर हो, तो इस बात के लिए उन दोनों का कोई दोष नहीं होगा, अगर वे आपस में मेल-मिलाप की कोई राह निकाल लें, कि मेल-मिलाप तो बहुत अच्छी चीज़ है। हालाँकि आदमी के मन में लालच व स्वार्थ की प्रवृत्ति पायी जाती है, फिर भी अगर तुम अच्छा व्यवहार करो और (अल्लाह का) डर रखो, तो जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखनेवाला है।  (128)

चाहे तुम कितनी ही कोशिश कर लो, तुम कभी यह नहीं कर सकते कि अपनी बीवियों के साथ एक-बराबर का व्यवहार कर सको, हाँ मगर ऐसा न करो कि किसी एक बीवी पर बिल्कुल ही ध्यान न दो, और उसे (शादी और तलाक़ के बीच) लटका कर रख दो। अगर तुम (बीवियों के मामले में) अपने आपको सुधारते रहो, अल्लाह से डरते (हुए अन्याय करने से बचते) रहो, तो अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, दयावान है,  (129)

अगर पति और पत्नी अलग हो ही जाएं, तो अल्लाह अपने बेपनाह फ़ज़ल [Bounty] से दोनों के लिए (बेहतर) व्यवस्था कर देगा: अल्लाह असीमित फैलाववाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है। (130)


आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब चीज़ अल्लाह की ही है।

हम ने तुमसे पहले जिन लोगों को किताब दी थी, उन्हें भी हुक्म दिया था, और हम तुम्हें भी हुक्म देते हैं कि "अल्लाह से डरते हुए बुराइयों से बचो।" अगर तुम अल्लाह की बात पर ध्यान न भी दो, तब भी आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, सब अल्लाह का ही है, और वह तो किसी पर निर्भर नहीं, वही सारी प्रशंसा के लायक़ है। (131)

हाँ, सचमुच आसमानों और ज़मीन की सारी चीज़ें अल्लाह की ही हैं, और जो लोग अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, तो उनका काम बनाने के लिए वह काफ़ी है। (132)

ऐ लोगो! अगर वह चाहे तो तुम्हें पूरी तरह हटा दे, और तुम्हारी जगह नये लोगों को ले आए: उसे ऐसा करने की पूरी शक्ति है।  (133)

अगर कोई इस दुनिया का बदला चाहता है, तो (याद रहे) इस दुनिया का बदला और आनेवाली दुनिया का बदला, दोनों तो अल्लाह को ही देना है: वह हर चीज़  सुनता भी है, देखता भी है।  (134)

ऐ ईमानवालो! तुम इंसाफ़ से काम लिया करो, और अल्लाह के लिए (सच्ची) गवाही देने वाले बनो, चाहे मामला ख़ुद तुम्हारे विरुद्ध हो, या तुम्हारे माँ-बाप और रिश्तेदारों के विरुद्ध ही क्यों न हो, चाहे आदमी अमीर हो या ग़रीब, अल्लाह दोनों की बेहतर देखभाल कर सकता है। अपनी इच्छाओं के पीछे चलने से बचो, ताकि तुम इंसाफ़ से काम ले सको ---  (गवाही के समय) अगर इंसाफ़ से छेड़-छाड़ करोगे या उसे नज़रअंदाज़ करोगे, तो जो कुछ तुम करते हो, (याद रखो) अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर रहती है।  (135)

ऐ ईमानवालो! तुम अल्लाह पर और उसके रसूल पर विश्वास करो, और उस किताब [क़ुरआन] पर विश्वास करो जो उसके रसूल पर उतारी गयी है, और उन (किताबों) पर भी, जिनको वह इसके पहले (दूसरे पैग़म्बरों पर) उतार चुका है। कोई आदमी जो अल्लाह पर ईमान न रखता हो, और न ही उसके फ़रिश्तों पर, न उसकी किताबों पर, न उसके रसूलों पर, और न ही आख़िरी दिन पर विश्वास रखता हो, तो वह भटककर (सही रास्ते से) बहुत दूर जा पड़ा। (136)

रहे वे लोग जो (सच्चाई पर) ईमान लाए, फिर ईमान को ठुकरा दिया, उसके बाद फिर से विश्वास कर लिया, और फिर दोबारा ईमान को ठुकरा दिया और फिर (सच्चाई को मानने से) इंकार में बढ़ते ही चले गए, तो ऐसों को अल्लाह माफ़ नहीं करेगा, और न ही उन्हें (कामयाबी का) कोई रास्ता दिखाएगा।  (137)

[ऐ रसूल], ऐसे पाखंडियों [मुनाफ़िको] से कह दें, कि उनके लिए दुख देनेवाली यातना तैयार है; (138)


वे (पाखंडी) जो ईमानवालों को छोड़कर विश्वास न करनेवालों को अपना सहयोगी  बनाते हैं, क्या वे उनके द्वारा इज़्ज़त व ताक़त चाहते हैं? हक़ीक़त यह है कि सारी की सारी इज़्ज़त व ताक़त अल्लाह की है (वह जिसे चाहे, दे दे)। (139)

और (ईमानवालो, देखो!), अल्लाह अपनी 'किताब' में तुम्हारे लिए यह हुक्म उतार चुका है कि जब तुम देखो कि अल्लाह की आयतों को मानने से इंकार किया जा रहा है और उनकी हँसी उड़ायी जा रही है, तो (वहाँ से हट जाओ, और) जब तब वे किसी दूसरी बात में न लग जाएँ, उनके साथ न बैठो, नहीं तो तुम ख़ुद भी उन्हीं के जैसे हो जाओगे: अल्लाह पाखंडियों [मुनाफिक़ों] और विश्वास न करनेवालों को (जो ऐसी बातों में लगे रहते हैं) एक साथ जहन्नम में इकट्ठा करने वाला है।  (140)

ये (पाखंडी) लोग तुम्हारी हालत देखते रहते हैं और प्रतीक्षा करते हैं कि तुम्हारे साथ क्या होता है, अगर अल्लाह की तरफ़ से तुम्हें जीत मिलती है, तो कहते हैं, "क्या हम भी तुम्हारे साथ न थे?" लेकिन अगर विश्वास न करनेवालों के हाथ कुछ सफलता लगती है, तो उनसे (एहसान जताते हुए) कहते हैं, "क्या हम (लड़ाई में) तुम पर हावी न थे, फिर भी हमने तुम्हें ईमानवालों से बचा लिया?" अल्लाह क़यामत के दिन तुम सब के बीच फ़ैसला कर देगा, और वह विश्वास न करनेवालों को ऐसा कोई रास्ता नहीं देगा कि वे ईमानवालों पर हावी हो सकें। (141)


पाखंडी लोग अल्लाह को (और ईमानवालों को) धोखा देने की कोशिश करते हैं, मगर यह तो अल्लाह है जो उन्हें धोखे में पड़ा रहने देता है। जब वे नमाज़ के लिए खड़े होते है तो कसमसाते हुए, लोगों को दिखाने के लिए खड़े होते हैं, और अल्लाह को बस नाम के लिए ही याद करते हैं,  (142)

'यह करें कि वह करें', इसी के बीच हर समय डाँवाडोल होते रहते हैं, न एक पक्ष  [ईमानवालों] की तरफ़ हैं, न दूसरे पक्ष [इंकार करनेवालों] की तरफ़। हक़ीक़त यह है कि अगर अल्लाह किसी को भटकता छोड़ दे, तो (ऐ रसूल) आप उसके लिए कोई राह नहीं निकाल पाएंगे। (143)

ऐ ईमानवालो! तुम ऐसा न करो कि ईमानवालों के बदले विश्वास न करनेवालों को अपना सहयोगी और रखवाला बना लो: क्या तुम चाहते हो कि अपने ही ख़िलाफ़ अल्लाह को स्पष्ट प्रमाण दे दो ? (144)

इसमें शक नहीं कि ये पाखंडी लोग जहन्नम के सबसे निचले हिस्से में डाले जाएंगे, और तुम (उस दिन) किसी को भी उनका मददगार नहीं पाओगे।  (145)

हाँ, जो लोग तौबा कर लेंगे, अपने आपको सुधार लेंगे, अल्लाह के सहारे को मज़बूती से थाम लेंगे, और अपने दीन [धर्म] के मामले में पूरी भक्ति से उसी के हो रहेंगे: तो ये लोग भी ईमानवालों के साथ शामिल हो जाएंगे, और अल्लाह ईमान रखनेवालों को ज़बरदस्त इनाम देगा।  (146)

[लोगो!] अगर तुम (अल्लाह की नेमतों का) शुक्र अदा करते रहो, और उस पर पक्का ईमान रखो, तो अल्लाह को तुम्हें यातना देकर क्या करना है? अल्लाह शुक्र अदा करनेवाले को हमेशा अच्छा बदला देता है और वह सबके हालात जानता है।  (147)

अल्लाह इस बात को पसंद नहीं करता कि किसी की बुराई सबके सामने की जाए, हाँ, अगर किसी पर ज़ुल्म किया गया हो तो अलग बात है: वह सब कुछ सुननेवाला, सब कुछ जाननेवाला है।  (148)

अगर तुम अच्छा काम करो, चाहे वह सबके सामने किया गया हो या छिपाकर किया गया हो, या अगर तुम किसी के बुरे काम को माफ़ कर दो, तो (अच्छी बात होगी, क्योंकि) अल्लाह सबसे बढ़कर (गुनाहों को) माफ़ करनेवाला, और (हर चीज़ करने की) ताक़त रखता है।  (149)


रहे वे लोग जो अल्लाह और उसके रसूलों की बातों पर ध्यान नहीं देते, और उसके रसूलों के बीच फ़र्क़ पैदा करना चाहते हैं, और कहते हैं, "हम कुछ को मानते हैं और कुछ को नहीं मानते,"  इस तरह वे (ईमान और कुफ़्र के) बीच का कोई रास्ता अपनाना चाहते हैं,  (150)

वे सचमुच (सच्चाई से) इंकार करनेवाले हैं: और विश्वास करने से इंकार करनेवालों के लिए हमने अपमानित कर देने वाली यातना तैयार कर रखी है।  (151)

मगर अल्लाह उन लोगों को पूरा-पूरा इनाम देगा जो उस पर और उसके रसूलों पर ईमान रखते हैं, और उन रसूलों में से किसी के बीच (ईमान के लिहाज़ से) फ़र्क़ नहीं करते। अल्लाह बड़ा माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।  (152)
 

[ऐ रसूल], ये किताबवाले [यहूदी] आप से माँग करते हैं कि आप उन पर आसमान से एक किताब उतरवा दें (तब वे आपको सच्चा मान लेंगे), मगर उन लोगों ने तो मूसा [Moses] से इससे भी बड़ी चीज़ की माँग की थी, जब उन्होंने कहा था, "हमें अल्लाह को आँख के सामने दिखाओ," तो उनके इस अपराध पर बिजली की कड़क ने उन्हें आ दबोचा था। हालाँकि उनके पास खुली व स्पष्ट निशानियाँ आ चुकी थीं, इसके बावजूद उन्होंने बछड़े को पूजने की चीज़ बना लिया, तब भी हमने उन्हें माफ़ कर दिया और हमने मूसा को खुला अधिकार दिया था;  (153)

उनको (सच्चाई पर चलने की) शपथ दिलाते समय हमने तूर के पहाड़ को उनके ऊपर उठा दिया था; और उनसे कहा था, "(शहर के) दरवाज़े में झुककर प्रवेश करना," और "सब्त [Sabbath] के नियमों को तोड़ न देना," और हमने उनसे बड़ी भारी शपथ ली थी। (154)

और इस तरह, उनके वचन तोड़ने के चलते, अल्लाह की आयतों को ठुकराने के चलते, नबियों को नाहक़ क़त्ल करने के कारण, और यह कहने के लिए, "हमारे दिल व दिमाग़ बंद हैं" ---- नहीं! बल्कि उनके अविश्वास के कारण अल्लाह ने उनके दिलों को ठप्पा [seal] लगाकर बंद कर दिया है, सो वे बहुत थोड़ा सा विश्वास करते हैं----- (155)

और इसलिए भी कि उन लोगों ने विश्वास नहीं किया, और मरयम [Mary] के ख़िलाफ बड़ा भारी लांछन लगा दिया,  (156)

और कहा, “हमने मरयम के बेटे ईसा, मसीह [Jesus, the  Messiah], अल्लाह के रसूल को (सूली पर चढ़ाकर) क़त्ल कर डाला है,” (मगर सच्चाई यह थी कि) उन लोगों ने न तो उन्हें क़त्ल किया और न ही उन्हें सूली पर चढ़ाया था, हालाँकि उन लोगों को देखने में ऐसा ही लगा था (क्योंकि उनके जैसी शक्ल के एक आदमी को सूली चढ़ाया गया था); जो (ईसाई) लोग उसके (सूली दिए जाने और दोबारा ज़िंदा होने के) बारे में मतभेद रखते थे, वे संदेह से भरे हुए थे, अटकल पर चलने के अलावा उनके पास कोई जानकारी न थी: निश्चय ही उन (यहूदी) लोगों ने उसे [ईसा को] क़त्ल नहीं किया था ---- (157)

अल्लाह ने उन्हें [ईसा को] अपनी तरफ़ उठा लिया था। अल्लाह बड़े प्रभुत्ववाला, बहुत समझ-बूझ रखनेवाला है।  (158)

किताबवालों में से एक आदमी भी ऐसा न होगा, जो मरने से पहले (ईसा) पर विश्वास न कर ले, और क़यामत के दिन वह उन लोगों के ख़िलाफ़ गवाह होंगे। (159)

यहूदियों के अत्याचार की वजह से, हमने कुछ अच्छी चीज़ें उनके लिए हराम [forbidden] कर दीं, जो उनके लिए पहले हलाल थीं: इस कारण से भी कि वे अक्सर दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकते थे; (160)

और उनके द्वारा सूद [ब्याज] लिए जाने के कारण, जबकि उन्हें ऐसा करने से मना किया गया  था; और दूसरों की संपत्ति अवैध रूप से हड़पने के कारण। (याद रखो!), उनमें से जो लोग सच्चाई को मानने से इंकार करते हैं, उनके लिए हमने दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है।  (161)

लेकिन उनमें से जो लोग ज्ञान में पक्के हैं और ईमान रखते हैं, जो किताब आप [मुहम्मद] पर उतारी गयी उस पर भी विश्वास करते हैं, और उस पर भी जो (किताबें) आपसे पहले उतारी गयी थीं ----- और वे लोग जो पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं, निर्धारित ज़कात देते हैं, और अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान रखते हैं ----- ऐसे लोगों को  हम बड़ा ज़बरदस्त इनाम देंगे।  (162)


[ऐ रसूल], हमने आपके पास 'वही' [revelation] भेजी है, जैसा कि हमने नूह [Noah] और उनके बाद आने वाले नबियों के पास भी ('वही') भेजी थी, इबराहीम [Abraham] को, इसमाईल [Ishmael] को, इसहाक़ [Isaac] को, याक़ूब [Jacob] और उसकी सन्तान को, ईसा [Jesus] को, अय्यूब [Job] को, यूनुस [Jonah] को, हारून [Aaron] को, और सुलैमान [Solomen] को भी भेजी ----- दाउद [David] को हमने किताब [ज़बूर / Psalm] दी ------  (163)

और बहुत से दूसरे रसूल हैं जिनके बारे में हम तुम्हें (क़ुरआन में) पहले बता चुके हैं, और कुछ ऐसे भी हैं जिनके बारे में हमने तुम्हें नहीं बताया है। (इसी तरह) मूसा [Moses] के साथ अल्लाह की सीधी बातचीत होती थी।  (164)

यह सब वे रसूल थे जो (अच्छे कर्मों की) ख़ुशख़बरी सुनाने और (सच्चाई से इंकार के नतीजे की) चेतावनी देने वाले बनाकर भेजे गए थेताकि एक बार रसूलों को भेज देने के बाद, आदमी के पास अल्लाह के सामने कोई बहाना बाक़ी न रहे (कि हमें बताने वाला कोई न था): अल्लाह बड़े प्रभुत्ववाला, (और अपने हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है।  (165)

लेकिन अल्लाह ख़ुद ही उस चीज़ की गवाही देता है जो उसने [ऐ रसूल], आप पर उतारी है ----- उसने यह (किताब) अपनी पूरी जानकारी के साथ उतारी है ---- फ़रिश्ते भी इसकी गवाही देते हैं, हालाँकि अल्लाह की गवाही काफ़ी है। (166)

जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास नहीं किया और दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोका, तो वे (सीधे रास्ते से भटक गए और) गुमराही में बहुत दूर जा पड़े हैं; (167)

अल्लाह उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा जिन लोगों ने विश्वास करने से इंकार किया और वे (बेझिझक) ज़ुल्म करते हैं, और न ही वह उन्हें कोई सही मार्ग दिखाएगा   (168)

सिवाए जहन्नम के मार्ग के, जहाँ वे हमेशा पड़े रहेंगे --- ऐसा करना अल्लाह के लिए बहुत-ही आसान है।  (169)


ऐ लोगो! तुम्हारे रब की तरफ़ से सच्चाई लेकर हमारा रसूल तुम (लोगों) के पास आ गया है, अतः उस पर विश्वास करो ----- यही तुम्हारे लिए सबसे अच्छा होगा ---- क्योंकि अगर तुम विश्वास न भी करो, तो वह सारी चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं, वह तो वैसे भी अल्लाह की ही हैं, और (याद रखो), अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, (और हर काम में) समझ-बूझ रखनेवाला है। (170)

ऐ किताबवालो! अपने दीन में हद से आगे न बढ़ जाओ, और अल्लाह के बारे में सच के सिवा कोई बात न कहो: मरयम [Mary] का बेटा, ईसा मसीह [Jesus, the Messiah] इससे ज़्यादा कुछ न था कि अल्लाह का रसूल था, उसकी एक 'वाणी' था, जिसे उसने मरयम तक पहुँचाया था, और एक 'रूह' थी जो अल्लाह की ओर से भेजी गयी थी। अत: अल्लाह पर और उसके रसूलों पर ईमान रखो, और यह बात न कहो कि (अल्लाह) "तीन" [Trinity] है ------ बंद करो! (यह कहना!), यही तुम्हारे लिए अच्छा होगा ---- पूजने के लायक़ तो बस एक ही अल्लाह है, वह इस बात से कहीं ऊपर है कि उसके लिए कोई बेटा हो, आसमानों और ज़मीन की सारी चीज़ें उसी की हैं, और सबकी देखभाल के लिए अल्लाह ही काफ़ी है। (171)

मसीह कभी भी इस बात को बुरा नहीं समझ सकता कि उसे अल्लाह का बन्दा समझा  जाए, और न ही फ़रिश्तों ने कभी इसे बुरा समझा, जो कि अल्लाह के बड़े नज़दीकी हैं। (क़यामत के दिन) अल्लाह अपने सामने उन सारे लोगों को इकट्ठा करेगा जो उसकी बन्दगी करने को बुरा समझते हैं और घमंड करते हैं: (172)

(उस दिन ऐसा होगा कि) जिन लोगों ने ईमान रखा और अच्छे कर्म किए, तो अल्लाह उनकी नेकियों का पूरा-पूरा बदला उन्हें देगा और अपने फ़ज़ल [Bounty] से उन्हें और ज़्यादा देगा; और जिन लोगों ने (अल्लाह की) बन्दगी को बुरा समझा और घमंड किया, तो वह उन्हें दर्दनाक यातना देगा, और (उस दिन) वे अल्लाह के सिवा किसी को नहीं पाएंगे जो उनको बचा सके या उनकी मदद कर सके। (173)



ऐ लोगो, तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास 'ठोस प्रमाण' [बुरहान] आ चुका है और हमने तुम्हारे पास एक साफ़ चमकती हुई रौशनी उतार भेजी है। (174)

तो जो लोग अल्लाह पर ईमान रखते हैं और उसके सहारे को मज़बूती से थामे रहते हैंउन्हें वह अपनी रहमत [mercy] की छाँव में दाख़िल कर देगा और उनपर अपना ख़ास करम [favour] करेगा; और उन्हें अपने तक पहुँचने का सीधा रास्ता दिखा देगा।  (175)


[ऐ रसूल!] वे आपसे (विरासत के) नियम मालूम करना चाहते हैं, कह दें, "अल्लाह तुम्हें ऐसे आदमी की विरासत के बारे में नियम बताता है, जिसका कोई बाल-बच्चा न हो और उसके बाप-दादा भी ज़िंदा न हों।
अगर ऐसा कोई मर्द मर जाए और उसकी एक बहन हो, तो जो कुछ उसने छोड़ा है उसका आधा हिस्सा उस बहन का होगा;
  
अगर वह बहन मर जाए और उसका भी कोई बाल-बच्चा न हो, तो (उसके माल का) अकेला वारिस उसका भाई होगा;
 
अगर केवल दो (या दो से ज़्यादा) बहनें ही हों, तो छोड़े गए माल का उनके लिए दो-तिहाई हिस्सा होगा
 
लेकिन अगर भाई बहनें दोनों हों, तो एक मर्द का हिस्सा दो औरतों के बराबर होगा।"
  
अल्लाह तुम्हारे लिए इन नियमों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम ग़लतियाँ न कर बैठो: अल्लाह को हर चीज की पूरी जानकारी है।  (176)


नोट:

1: लोग एक-दूसरे से अपना हक़ माँगते हुए अक्सर कहते हैं कि "तुम्हें ख़ुदा का वास्ता, मेरा हक़ मुझे दे दो," तो जिस तरह हक़ लेने के लिए अल्लाह का वास्ता देते हैं, उसी तरह, जब दूसरों का हक़ देना हो, तो अल्लाह से डरते हुए उसे पूरा-पूरा अदा करना चाहिए। इसी तरह, रिश्तेदारों [womb-relationship] से संबंध न तोड़ने का ज़िक्र 47:22 में भी आया है।


2: किसी मरने वाले के बच्चे जब अनाथ हो जाते हैं तो उनके बाप की विरासत में उनका भी हिस्सा होता है, मगर उस समय उनकी उम्र कम होने की वजह से वह माल उन्हें नहीं दिया जाता, बल्कि उनके सरपरस्त [अभिभावक/Guardian] जैसे चाचा, भाई आदि उसे अमानत के तौर पर अपने पास रखते हैं, और जब बच्चा बालिग़ और समझदार हो जाए, तो उसकी अमानत उसे सही-सलामत लौटा देनी चाहिए।


3: बुख़ारी की हदीस से पता चलता है कि कभी-कभी ऐसा होता कि कोई अनाथ लड़की अपने चचेरे भाई की सरपरस्ती [guardianship] में होती थी, अगर वह हसीन होती और उसकी धन-संपत्ति भी काफ़ी होती, तो उसका चचेरा भाई चाहता था कि बालिग़ होने पर वह उस लड़की से शादी कर ले ताकि पूरा माल उसी के क़ब्ज़े में रह जाए, मगर वह निकाह में मेहर इतना नहीं देना चाहता था जितना उस जैसी लड़की को देना चाहिए। दूसरी तरफ, लड़की अगर ख़ूबसूरत न होती तो उसके माल की लालच में उससे शादी तो कर लेता था, लेकिन उसके साथ अच्छा सुलूक नहीं करता था और मेहर भी कम-से-कम रखता था। इस आयत में ऐसे ही लोगों को हुक्म दिया गया है। देखें 4: 127


यहाँ ध्यान देने की बात है कि एक से ज़्यादा शादी करने का वर्णन अनाथ लड़कियों के संदर्भ में आया है, जिससे पता चलता है कि यह सामान्य नियम नहीं था बल्कि उस ज़माने में बद्र व उहुद की लड़ाइयों में मारे गए लोगों के नतीजे में अचानक विधवाओं और अनाथ लड़कियों की देखरेख की समस्या पैदा हो गई थी जिसके समाधान के तौर पर यह नियम बनाए गए थे। क़ुरआन अकेली ऐसी आसमानी किताब है जो 'एक शादी' करने को कहती है। पहले के सभी धर्मों से अलग हटकर इसमें मर्दों की शादी के लिए अधिकतम सीमा तय कर दी है। विशेष परिस्थिति मेंं मुस्लिम मर्द ज़्यादा से ज़्यादा चार औरतों से शादी कर सकता है बशर्ते कि वह उनके ख़र्चे-पानी का इंतज़ाम कर सकता हो, और उन सभी के साथ बराबरी का सलूक कर सकता हो, और अगर वह ऐसा नहीं कर सकता तो एक ही शादी करे। हालाँकि आगे आयत 129 में यह भी है कि यह मुमकिन नहीं है कि सभी बीवियों के साथ बराबरी का सलूक कर सके।

 

लौंडी एक ग़ुलाम महिला [दासी] होती थी जिसे या तो उसके मालिक ने ख़रीदा हो या युद्ध-बंदी के रूप में वह हाथ आ गयी हो---- यह एक बड़ी पुरानी परम्परा थी जो उस समय दुनिया के बहुत से देश में प्रचलित थी। इस्लाम ने इसे ख़त्म करने की कोशिश इस तरह की कि ग़ुलामों को आज़ाद करने के काम को सदक़ा/दान देने [charity] का काम बना दिया। बहुत से गुनाहों (जैसे अपनी क़सम तोड़ना, बे-इरादा क़त्ल करना, या रमज़ान के दिन में बीवी के साथ सेक्स करना आदि) की भरपाई के लिए तरीक़ा यह बनाया गया कि ग़ुलामों को आज़ाद किया जाए। इसी तरह इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ केवल युद्ध में बंदी बनाए गए क़ैदियों को ही ग़ुलाम बनाया जा सकता था, और अगर उनके रिश्तेदार उसके लिए भरपाई की रक़म अदा कर दें, या वह युद्ध-बंदी अगर मुसलमानों को पढ़ना-लिखना या कोई दस्तकारी/हुनर या अपनी भाषा सिखा दे, तो वह आज़ाद हो जाता था। किसी आज़ाद आदमी को ग़ुलाम नहीं बनाया जा सकता था। ग़ुलामों की सामाजिक हालत में भी सुधार किया गया। ग़ुलाम औरत से उसके बच्चे को अलग करने को ग़ैर-क़ानूनी बनाया गया। जिस मालिक और लौंडी के रिश्ते से बच्चे होते, वे आज़ाद हो जाते, उसी तरह लौंडी भी अपने मालिक के मरते ही आज़ाद हो जाती थी। बहुत ज़माने के बाद तुर्की के ओटोमन साम्राज्य ने 1847 ई में और अमेरिका ने यह प्रथा 1865 ई में समाप्त करने की घोषणा की।

 

7: इस्लाम से पहले जाहिलियत के ज़माने में औरतों को विरासत में कोई हिस्सा नहीं दिया जाता था।

 

8: जैसे अगर कोई अनाथ बच्चा है और उसके दादा भी मर जाएं जिनपर उस अनाथ बच्चे की देखभाल की ज़िम्मेदारी थी, तो ऐसी हालत में कुछ विद्वान मानते हैं कि उस बच्चे के लिए वसीयत ज़रूर करनी चाहिए, हालाँकि विरासत के नियम से उस बच्चे को हिस्सा नहींं मिलेगा।


11: विरासत के बंटवारे के समय सबसे पहले यह देखना है कि अगर मरने वाले के ऊपर कोई क़र्ज़ था या उसकी कोई देनदारी थी (जैसे कफ़न-दफ़न का ख़र्च, किसी को देने का वचन दिया हो आदि), तो उसे पहले चुका दिया जाए, फिर यह कि अगर उसने कोई वसीयत कर रखी हो कि फ़लाँ आदमी को इतना दे दिया जाए (जबकि वह हक़दार न हो), तो उस पर अमल किया जाएगा।

विरासत के क़ानून के अनुसार, औरत को चाहे वह माँ हो, बीवी हो, बहन हो या बेटी हो, उसे मरने वाले से नज़दीकी के हिसाब से तीन तरह के हिस्से में से एक हिस्सा ज़रूर मिलता है:

(i) मर्द के हिस्से से कम मिलना: अगर वह बेटी है, तो उसे अपने भाई के हिस्से का आधा मिलेगा, क्योंकि उसके भाई पर पूरे परिवार को चलाने की ज़िम्मेदारी है।

(ii) मर्द के हिस्से से ज़्यादा मिलना: उदाहरण के लिए, मान लें कि एक आदमी 24000/- रुपया छोड़कर मरा, परिवार में 6 बेटे, दो भाई, एक बीवी और एक माँ हैं। तो बीवी को आठवाँ हिस्सा (3000/-), माँ को छठा हिस्सा (4000/-), हर बेटे को क़रीब 2,833/- और दो भाइयों को कुछ नहीं मिलेगा।

(iii) बराबर हिस्सा मिलना: माँ की तरफ़ से भाई-बहनों को बराबर मिलेगा (देखें आयत 12).


यहाँ ध्यान देने की बात है कि मरने वाले के भाई-बहन होने की हालत में माँ का हिस्सा एक तिहाई से घटकर छठा (1/6) हो जाता है, मगर भाई-बहन को कोई हिस्सा नहीं मिलता है, और सम्पत्ति का बचा हुआ हिस्सा बाप का हो जाता है।

12: अगर मरने वाले के माँ की तरफ़ से दो या दो से ज़्यादा भाई-बहन हों, तो माल में से सबको एक तिहाई बराबर-बराबर मिलेगा----यहाँ औरत को मर्द के बराबर हिस्सा मिलेगा। वसीयत में कुल माल का एक-तिहाई से ज़्यादा नहीं दिया जा सकता ताकि जो वारिस असल में हक़दार हैं उन्हें नुक़सान न हो। 

 

15: औरत (विवाहित या अविवाहित) अगर बदचलन हो जाए और बाहर जाकर किसी के साथ अवैध सेक्स कर बैठे, तो यह हुक्म था कि मौत आने तक उसे घर से बाहर न निकलने दिया जाए ताकि ग़लत काम करने का मौक़ा ही न मिल सके या यह कि अल्लाह ही उसके लिए कोई दूसरा रास्ता निकाल दे, जैसे कि किसी के साथ उसकी शादी हो जाए। बाद में, 'सूरह नूर' में ऐसी हरकत कर बैठने पर मर्द और औरत दोनों को 100-100 कोड़े मारने की सज़ा बताई गई (24:2)।

कुछ विद्वानों के अनुसार यह हुक्म केवल अविवाहित औरतों के लिए है। बताया जाता है कि मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा था कि अब अल्लाह ने ऐसी औरतों के लिए रास्ता पैदा कर दिया है, और वह यह कि मर्द और औरत अगर विवाहित नहीं हैं तो उनकी सज़ा 100 कोड़े होगी और अगर वे विवाहित हों तो उन्हें पत्थर से मारा जाएगा, हालाँकि पत्थर से मारने की सज़ा का क़ुरआन में कहीं ज़िक्र नहीं है! देखें 24:2 का नोट।


16: कोई मर्द या औरत जब किसी के साथ अवैध सेक्स कर बैठे तो शुरुआत में इसकी यही सज़ा बताई गई थी। 'चोट पहुंचाने' का मतलब सबके सामने फटकार लगाना है, जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार इसमें जूते से पिटवाना भी शामिल है। कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि इस आयत में एक मर्द का दूसरे मर्द के साथ सेक्स [Homo-sex] करने पर दी जाने वाली सज़ा के बारे में बताया गया है|


17: आदमी अगर मरने से पहले-पहले अपने गुनाहों से तौबा कर ले, तो उसकी तौबा क़बूल हो सकती है, मगर आदमी को चाहिए कि तौबा जल्दी से जल्दी कर ले क्योंकि उसे नहीं मालूम कि कब उसकी मौत आ जाएगी।

  

19: इस्लाम से पहले अरब में यह रस्म भी चली आ रही थी कि जब कोई औरत विधवा हो जाती, तो मरने वाले का वारिस [घर का कोई मर्द या सौतेला बेटा], उस विधवा का भी मालिक बन बैठता था, और तब वह उनकी इजाज़त के बिना न तो दूसरी शादी कर सकती थी और न ही ज़िंदगी के दूसरे बड़े फ़ैसले ले सकती थी। इसी तरह, एक और बुरी रस्म यह थी कि जब कोई मर्द अपनी बीवी को तलाक़ देना चाहता तो साथ में वह यह भी चाहता कि उसकी दी हुई मेहर उसे वापस मिल जाए, और इसके लिए वह अपनी बीवी को तरह-तरह से तंग करना शुरू कर देता था, ताकि बीवी तंग आकर ख़ुद ही यह कहे कि तुम अपनी दी हुई मेहर वापस ले लो और मुझे तलाक़ दे दो कि मेरी जान छूटे। यहाँ इन दोनों रस्मों को बंद करने का हुक्म दिया गया है।


20: ऊपर की आयत से पता चलता है कि तलाक़ देते समय बीवी से मेहर वापस नहीं ली जानी चाहिए। हाँ, अगर बीवी खुले आम कोई बदचलनी का काम कर बैठे, तो केवल उसी सूरत में तलाक़ देते समय उससे मेहर वापस ली जा सकती है। लेकिन अगर उसने ऐसा कोई काम नहीं किया है तो फिर इसका मतलब यह होगा कि मर्द को मेहर वापस लेने के लिए बीवी पर कोई झूठा इल्ज़ाम लगाना होगा जो कि और भी ग़लत होगा।

 

22: इस्लाम आने से पहले जाहिलियत के ज़माने में लोग अपनी सौतेली माँ से भी निकाह करना बुरा नहीं समझते थे, इस आयत ने ऐसे रिश्ते को स्वीकार करने से मना कर दिया। हाँ, जो पहले हो चुका, उसे माफ तो कर दिया गया, मगर इस शर्त के साथ कि निकाह का यह रिश्ता तोड़ दिया जाए।


23: इस्लाम में ऐसी औरतें जिन्होंने किसी बच्चे को अपना दूध पिलाया हो, वह दूध के रिश्ते से माँ होती हैं, इसी तरह, जिन-जिन बच्चों को उस औरत ने दूध पिलाया, वे सब दूध के रिश्ते से भाई-बहन हुए और उनसे भी शादी नहीं हो सकती। 


24: जो लौंडियाँ [Female slaves] किसी युद्ध के दौरान बंदी बनाकर लाई जाती थीं, अगर उनके पति भी साथ होते, तो उन लौंडियों के मालिकों को उन्हें छूने की इजाज़त नहीं थी। लेकिन अगर उनके पति अपने मुल्क में ही रह जाते थे, तो उनका निकाह उनके पतियों से समाप्त हो जाता था। अब अगर कोई मुसलमान मर्द उस लौंडी से शादी करना चाहता, तो उसे पहले यह देखना ज़रूरी था कि कहीं वह गर्भवती न हो, इसलिए कम से कम जब एक माहवारी गुज़र जाती और उन्हें अपने पिछले पति से कोई बच्चा न ठहरता, तब उससे शादी हो सकती थी।


25: आज़ाद औरतें अगर विवाहित न हों, और अगर उन्होंने किसी मर्द के साथ सेक्स कर लिया तो उसकी सज़ा सौ कोड़े हैं जिसका ज़िक्र सूरह नूर की दूसरी आयत में आया है।

इस आयत में ग़ुलाम लौंडियों के लिए उसी जुर्म की सज़ा आधी यानी पचास (50) कोड़े तय कर दी गयी है। किसी ग़ुलाम-लौंडी से शादी करना कोई बे-इज़्ज़ती की बात नहीं क्योंकि वह भी इंसान है। ध्यान रहे कि शादी-शुदा लौंडियों के साथ उसका मालिक शारीरिक संबंध नहीं रख सकता था।

 

32: कुछ औरतों ने यह तमन्ना की थी कि काश वह मर्द होतीं और जिहाद में हिस्सा लेतीं तो उन्हें और अधिक सवाब (पुण्य) होता, लेकिन यहां यह कहा गया है कि कुछ मामलों में मर्दों को फ़ज़ीलत है और कुछ मामलों में औरतों को, मगर जिसके हाथ में जितना है, उसके अंदर रहते हुए उन्हें अधिक से अधिक नेकी के काम करने चाहिए।


33: इस्लाम के पहले से दोस्तों और साथियों के बीच वचन लेने की परम्परा वहाँ रही थी। अगर कोई आदमी इस्लाम क़ुबूल करता और उसके कोई रिश्तेदार न होते, तो जिसके द्वारा वह मुसलमान बनता, उसके हाथ पर हाथ रखकर वचन लेता कि अब से वह उसका "भाई" है, फिर संपत्ति के बंटवारे में भी वह उसका हिस्सेदार होता था, इस हक़ को "मवालात" कहते थे। यह परम्परा आयत 8:75 के उतरने के बाद ख़त्म हो गई। हालाँकि दोस्तों/साथियों का विरासत [inheritance] में हिस्सा अब नहीं रह गया, फिर भी वसीयत [bequest] के ज़रिये उन्हें कुछ हिस्सा मिल जाता था।


34: सिर-चढ़ी बीवी या दूसरे मर्द की तरफ़ आकर्षित हुई बीवी (जिसने भरोसा तोड़ा हो) को सुधारने का आख़िरी तरीक़ा यहाँ बताया गया है कि उसे हल्के से मारा जा सकता है (अ‍दरबू)। सूरह उतरने के हालात में बताया गया है कि एक ही चोट [single blow] मारी जानी चाहिए जिससे बदन पर किसी तरह का निशान न पड़े, मारने के लिए जो लकड़ी हो, वह टूथ ब्रश से बड़ी न हो, और चेहरे पर न मारा जाए। मुहम्मद (सल्ल) ने अपने साथियों से कहा था कि वे अपनी बीवियों को न मारा करें, उनका यह भी कहना था कि कोई भी इज़्ज़तदार मर्द अपनी बीवी को नहीं मारता, और ख़ुद उन्होंने कभी अपनी बीवियों या अपनी लौंडियों पर हाथ नहीं उठाया।

कुछ विद्वान मानते हैं कि "अदरबू" का एक मतलब 'अलग हट जाना' भी होता है, जो इस आयत में शायद कहा गया है, जैसा कि बताया जाता है कि एक बार मुहम्मद (सल्ल) जब अपनी बीवियों की मांगों से परेशान हो गए थे, तो एक महीने तक वह उनसे अलग-थलग होकर रहे थे। बहरहाल, अगर किसी औरत को लगता है कि उसके पति ने उसके साथ बुरा सलूक किया है, तो वह अपने अभिभावक से मदद ले सकती है या तलाक़ भी माँग सकती है।


36: पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। पड़ोसी चाहे इतने नज़दीक रहते हों कि उनके घर की दीवारें एक-दूसरे से मिलती हों, या उनके घर ज़रा सा दूर हों, चाहे वह नज़दीकी रिश्तेदार हों या अनजान हों या फिर दूसरे धर्म के मानने वाले हों। सबके साथ ख़ूब अच्छा सलूक करना चाहिए। 

इसके अलावा यात्रा केे दौरान या कहीं लाइन में खड़े हुए किसी आदमी से मुलाकात हो जाती है, वह भी एक तरह के पड़ोसी हुए, उनके साथ भी अच्छा व्यवहार करना चाहिए, बल्कि इससे आगे हर मुसाफ़िर और हर रास्ता चलते आदमी के साथ भी अच्छा सलूक करना चाहिए।


41: क़यामत के दिन हर नबी को अपनी-अपनी उम्मत के अच्छे-बुरे काम की गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा।


43: इस आयत में शराब पीकर नमाज़ न पढ़ने का हुक्म है, असल में शराब को एक बार में ही हराम [Prohibited] नहीं करके, तीन चरणों में किया गया, फिर अंत में इसे पूरी तरह हराम कर दिया गया। देखें 2: 219; 4: 43; और 5: 90-91

यह नियम "तयम्मुम" यानी सूखा वुज़ू कहलाता है। सेक्स करने या वीर्य निकल जाने के बाद नापाकी की हालत में नहाना ज़रूरी है, लेकिन अगर पानी न मिले या बहुत ठंढ या बीमारी के चलते पानी का उपयोग न कर पाए, तो ऐसी हालत में अपनी हथेली को साफ़ मिट्टी या बालू पर मारकर अपने हाथ पर फेर लें और अपने चेहरे और हाथ पर मल लें [तयम्मुम]।


46: "राइना" शब्द को अगर अच्छे ढंग से बोला जाए तो उसका मतलब होगा "हमारी ओर देखें" लेकिन जैसा 2:104 में भी आया है कि मदीना के यहूदी लोग जान बूझकर मुहम्मद (सल्ल) को बेइज़्ज़त करने के लिए इस लफ़्ज़ को तोड़-मतोड़कर बोलते थे, जिससे मतलब बदलकर यह हो जाता था कि "तुम बुद्धू हो" या "तुम हमारी भेड़ों के चरवाहे हो", इसीलिए ईमानवालों को "राइना" के बदले "उंज़ुरना" बोलने को कहा गया है।

 

47: यहाँ शाब्दिक अर्थ भी है और रूपक का प्रयोग भी। अल्लाह उनकी आंखों को पीठ के पीछे कर सकता है, या उनके चेहरों को उनकी गर्दनों के पिछले हिस्से की तरह कर सकता है, या वे अंधे कर दिए जाएंगे जिससे वे सच्चाई व मार्गदर्शन को न समझ सकें। या तुम्हारे अंदर "दिशा की समझ को मिटा दें" या "चेहरा बिगाड़कर रख दें।"

"सब्त" मनानेवाले असल में लाल सागर के किनारे बसे (ऐला या मदयन शहर) यहूदी लोग थे, उन्हें सब्त के दिन मच्छलियों के शिकार पर रोक थी, मगर उसी दिन मछलियाँ दिखायी पड़ती थीं जिससे लोगों ने बहाने करके उसका शिकार शुरू कर दिया था। (देखें 7:163-165).


48: अगर कोई आदमी सच्चाई पर विश्वास करने से इंकार करता है, और इसी हलत में मर जाता है, तो उसके गुनाहों को माफ नहीं किया जाएगा। लेकिन अगर वह मरने से पहले अपनी ग़लतियों पर पछताता है और अपने मे6 सुधार लाता है, तो उसकी तौबा क़बूल की जाएगी (देखें 25: 68-70).


51: यहां एक सच्ची घटना का हवाला दिया गया है, बताया जाता है कि मक्का के विश्वास न करनेवालों का एक समूह मदीना के दो बड़े प्रमुख यहूदी सरदारों के पास मुहम्मद (सल्ल) की शिक्षाओं की सच्चाई के बारे में सलाह-मशविरा करने गया था, और तब यहूदी सरदारों ने उनसे कहा था कि मुसलमानों से ज़्यादा तो बहुदेववादी सही रास्ते पर हैं। मदीना के यहूदियों का मुसलमानों के साथ शांति से रहने और एक दूसरे के ख़िलाफ़ किसी बाहरी दुश्मन की मदद न करने का समझौता था। मगर इसके बावजूद उन लोगों ने मुसलमानों के दुश्मन यानी मक्का के बह़देववादियों के साथ सांठ-गांठ की। 


53: यहूदियों की मुसलमानों से चिढ़ और नफ़रत की असल वजह यह थी कि वे चाहते थे कि जिस तरह पहले बहुत से नबी इसराइल की संतानों में से हुए थे, आख़िरी नबी भी उन्हीं के ख़ानदान से होते, मगर मुहम्मद सल्ल. इब्राहीम अलै. के दूसरे बेटे इस्माईल (अलै.) की संतानों में से थे। लेकिन यह तो अल्लाह ही फ़ैसला करने वाला है कि वह किसे अपना नबी बनायेगा, कोई यहूदियों को कायनात की बादशाही तो मिली नही हुई है! लेकिन अगर उनकी बादशाही होती, तो अपनी कंजूसी के चलते उनलोगों ने किसी को राई बराबर भी कुछ न दिया होता!


58: जब मक्का को मुसलमानों ने शांतिपूर्ण ढंग से जीत लिया, तब हज़रत अली ने "काबा" की चाभी उस्मान इब्ने तल्हा से ज़बरदस्ती ले ली जो कि मुस्लिम नहीं था। कहा जाता है कि काबा परिसर में यह आयत उतरी और उसके तुरंत बाद मुहम्मद (सल्ल) ने हज़रत अली को हुक्म दिया कि वह उस्मान से माफ़ी मांगें और उसे चाभी तुरंत वापस कर दें। उस्मान से यह भी वादा किया गया कि इस पवित्र घर की चाभी हमेशा उसी के ख़ानदान वालों के पास रहेगी। उस्मान इस इंसाफ़ से इतना प्रभावित हुआ कि उसने इस्लाम क़बूल कर लिया।


59: यहां बताया गया है कि अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों को मानने के साथ साथ हाकिमों के आदेश भी मानने चाहिए। विद्वानों का कहना है कि वैसे ही हाकिमों की बात माननी चाहिए जिसके आदेश क़ुरआन और रसूल के अमल (सुन्नत) के मुताबिक़ हों।


60: यहां से मदीना के उन पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] का ज़िक्र किया गया है जो ऊपर से दिखावे के लिए मुसलमान तो बन गए थे, मगर असल में वे यहूदियों जैसे ही थे। किसी मामले में जब उन्हें यह उम्मीद होती कि मुहम्मद सल्ल. उनके हक़ में फ़ैसला करेंगे, तो वे ऐसे मामले तो उनके पास ले जाते, मगर जिन मामलों में लगता कि फ़ैसला उनके हक़ में नहीं होगा, तो वे ऐसे मामले यहूदियों के पास ले जाते थे, जो कि एक मुसलमान होने के नाते सही नहीं था।


62: फिर जब पाखंडी लोग अपने फ़ायदे के लिए मामले का फ़ैसला किसी यहूदी सरदार से करवाते हैं और वहां भी फ़ैसला उनके हक़ में नहीं होता, तो फिर मुहम्मद सल्ल. के पास बहाने बनाते हुए आते हैं कि हम तो वहां मेल-मिलाप करने गए थे, कोई फ़ैसला कराने नहीं गए थे।


66: अल्लाह ने इसराइल की संतानों को तो एक बार बड़ा कड़ा हुक्म दिया था जब गुनाहों से तौबा करने के लिए उन्हें एक दूसरे को क़त्ल करने को कहा गया था। देखें सूरह बक़रा (2: 54)


77: मक्का की ज़िंदगी में मुसलमानों ने वहाँ के काफ़िरों द्वारा किए जा रहे ज़ुल्म व सितम को बहुत दिनों तक धीरज के साथ झेला था, उस समय कुछ मुसलमानों के दिल में इनके ख़िलाफ़ बदले की भावना जागती थी, मगर तब उन्हें उन ज़ालिमों से लड़ने का हुक्म नहीं मिला था, बल्कि उन्हें धीरज रखते हुए अच्छे आचरण और नेक काम करते रहने की शिक्षा दी गई थी। अल्लाह चाहता था कि जब लड़ने का हुक्म हो तो वह अपनी निजी दुश्मनी की भावना से न हो, बल्कि अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए हो। मगर जब वे तंग आकर हिजरत करके मदीना चले गए, तब अल्लाह की तरफ़ से उन्हें मक्कावालों से युद्ध करने का आदेश हुआ। चूँकि 13 साल अत्याचार सहने के बाद शांति का दौर आया था, अत: कुछ मुसलमान अभी लड़ाई लड़ना नहीं चाहते थे। मगर उन्हें याद दिलाया गया है कि दुनिया के आराम व सुकून को कभी भी इतना महत्व नहीं देना चाहिए कि परलोक [आख़िरत] की ज़िंदगी के फ़ायदे हाथ से निकल जाएं।


79: अच्छाई और बुराई दोनों अल्लाह की तरफ़ से तक़दीर में लिख दी गई है। अच्छा कर्म करने के नतीजे में अच्छाई आती है, जो अल्लाह की तरफ़ से इनाम होता है, जबकि बुराई अल्लाह द्वारा बुरे कर्मों की सज़ा के तौर पर आती है। कभी-कभी अच्छे लोगों के साथ कोई बुरी घटना घट जाती है, जो उनके ईमान को परखने के लिए होती है, या कभी-कभी वह उनके गुनाहों का प्रायश्चित भी बन जाती है, या कभी किसी चीज़ के बदले कोई बेहतर चीज़ के आने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।


85: बताया जाता है कि एक आदमी मुहम्मद (सल्ल) के पास आया, और उसने एक दूसरे आदमी के लिए आपसे सिफ़ारिश की कि उसे युद्ध [जिहाद] में जाने से छूट दे दी जाए। यहाँ बताया गया है कि अच्छी चीज़ के पक्ष में बोलने से नेकी में हिस्सा मिलेगा और बुरी चीज़ का पक्ष लेने से उसकी बुराई में भी हिस्सेदार होगा। 


86: जब कोई तुम्हें "अस्स्लाम-ओ-अलैकुम" कहे, तो जवाब में बेहतर यह है कि "वालैकुमस्सलाम व-रहमतुल्लाह व-बरकातुह" कहो, नहीं तो कम से कम "वालैकुमस्सलाम" ज़रूर कहो, अगर जवाब नहीं दिया, तो गुनाह होगा। 4: 94 भी देखें।


88-89: यहाँ कई तरह के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] की चर्चा की गई है, एक क़िस्म तो ऐसे लोगों की थी जो मक्का के लोग थे, मदीना आए और ऊपरी तौर से मुसलमान हो गए, फिर कुछ समय बाद व्यापार के बहाने से मक्का चले गए। उनके बारे में कुछ मुसलमानों की राय यह थी कि वे सच्चे मुसलमान थे और कुछ लोग उन्हें पाखंडी समझते थे; ऐसे लोगों की जाँच के लिए कि वह मुसलमानों के प्रति निष्ठा रखते हैं या नहीं, उन्हें हुक्म दिया गया कि वे मक्का से मदीना आकर ईमानवालों से आ मिलें, नहीं तो उन्हें दुश्मन समझा जाएगा, लेकिन जब वे मक्का से लौटकर मदीना नहीं आए, तो उनका पाखंड सबके सामने आ गया। 


90: यहाँ पाखंडियों की दूसरी और तीसरी क़िस्म बताई गई है जिनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से मना किया गया है।


91: यहाँ पाखंडियों की चौथी क़िस्म बताई गई है जो ऊपर से तो यह ज़ाहिर करते हैं कि वे मुसलमानों से लड़ना नहीं चाहते, लेकिन जब भी उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ कोई साज़िश में भाग लेने का मौक़ा मिले, वे इसमें बेधड़क कूद पड़ेंगे।

उस समय मदीना चारों तरफ़ से दुश्मनों से घिरा हुआ था और वहाँ के लोगों के लिए मदीना से बाहर जाना सुरक्षित नहीं था। मुहम्मद (सल्ल) ने अरब के सभी क़बीलों के सामने शांति व सुरक्षा का प्रस्ताव रखा, जिसने इस प्रस्ताव को मान लिया वह सुरक्षित हो गया और उसके क्षेत्र में मदीनावासी सुरक्षित हो गए। जिसने न माना, उससे युद्ध करने की अनुमति दी गई।  


92: ग़लती से क़त्ल होने का मतलब यह है कि बेइरादा किसी का क़त्ल हो जाना, जैसे ग़लती से गोली चल जाना या निशाना किसी जानवर पर हो और लग किसी आदमी को जाए। तो जब किसी मुसलमान के हाथों एक मुसलमान का क़त्ल हो जाए, तो एक तो उसकी भरपाई में एक ग़ुलाम आज़ाद करना होगा, या अगर ग़ुलाम न हो तो उसे लगातार दो महीने रोज़े रखने होंगे, और उसके साथ "ख़ून-बहा" भी देना होगा। हदीसों से पता चलता है कि ख़ून-बहा में 100 ऊंट या दस हज़ार दीनार मरने वालों के वारिसों को देने होंगे। अगर मरने वाला दुश्मन क़ौम से हो, लेकिन मुसलमान हो, तो उसके लिए भी भरपाई में एक ग़ुलाम आज़ाद करना होगा, मगर ख़ून-बहा देना ज़रूरी नहीं।

इसी तरह, अगर कोई ग़ैर मुस्लिम किसी मुस्लिम रियासत में अमन-शांति से रहता है, और उसका ग़लती से क़त्ल हो जाए, तो उसके वारिसों को भी भरपाई के साथ ख़ून-बहा भी देना होगा।


93: अगर कोई मुसलमान बड़ा गुनाह (जान-बूझकर क़त्ल या ज़िना) कर बैठता है और बिना तौबा किए ही मर जाता है, तो उसके गुनाहों की संगीनी के हिसाब से जहन्नम की सज़ा होगी, फिर बाद में उसे जहन्नम से निकाल लिया जाएगा। कोई मुस्लिम जहन्नम मेंं हमेशा के लिए नहीं रहेगा।


94: अल्लाह के रास्ते में सफ़र करने का मतलब युद्ध के लिए सफ़र करना। युद्ध के दौरान दुश्मनों के एक यौद्धा ने सलाम करके यह कहा कि वह मुसलमान हो गया है, मगर यह सोचकर कि वह अपनी जान बचाने के लिए ऐसा कर रहा है, मुस्लिम लड़ाके ने उसे मार डाला, जब मुहम्मद (सल्ल) को पता चला तो वह नाराज़ हुए। दुश्मन के फ़ौजी की बात को एकदम से नकार देने के बजाय उसकी बात मान लेनी चाहिए थी क्योंकि दिल के अंदर की बात तो केवल अल्लाह ही जानता है।


95: जब अपनी रक्षा में युद्ध करने की अनुमति दी गई, तो उस समय कोई स्थायी सेना न होने के चलते हर स्वस्थ आदमी पर लड़ना फ़र्ज़ था, युद्ध में भाग न लेने की छूट केवल औरतों, बड़े-बूढ़ों, बीमारों, बच्चों आदि को ही थी।


97: क़ुरआन में गुनाह कर बैठने को अपनी जानों पर ज़ुल्म करना भी कहा गया है। यहां उन ईमानवालों का ज़िक्र है जिन्होंने मक्का में चुपचाप इस्लाम अपना लिया था, मगर वे बाक़ी ईमानवालों के साथ हिजरत करके मदीना नहीं गए, जबकि उनमें ऐसा करने की योग्यता थी। तो जब उनके गुनाहों के बारे में फ़रिश्ते पूछेंगे, तो वे कहेंगे कि हम मक्का के मुशरिक लोगों के हाथों ऐसे मजबूर हो गए थे कि हमें अपने दीन पर चलना मुश्किल था। मगर उनसे कहा जाएगा कि ऐसे में उन्हें अपना घर छोड़कर कहीं दूसरी जगह चले जाना चाहिए था जहाँ उनके लिए दीन पर चलना आसान होता। 


101: आम तौर से जब आप सफ़र में (85 किलोमीटर या उससे ज़्यादा) जा रहे हों, तो अल्लाह ने यह आसानी की है कि दोपहर (ज़ुहर), शाम (अस्र) और रात (इशा) की नमाज़ आधी कर दी जाए जिसे "क़स्र" कहते हैं। मगर यहां एक ख़ास तरह की क़स्र नमाज़ का ज़िक्र अगली आयत में है, जो युद्ध की हालत में पढ़ी जाती है जब दुश्मनों के हमले का ख़तरा होता है, और इसीलिए यह हथियार समेत पढ़ी जाती है।


105: बताया जाता है कि यह आयत एक ख़ास घटना की पृष्टभूमि में उतरी थी। बनु अबीरक़ क़बीले का एक आदमी था जो ऊपर से अपने को मुसलमान बताता था, उसने एक सहाबी के घर में सेंध लगाकर अनाज की बोरियां और हथियार चुरा लिए, और चालाकी यह की कि बोरी का मुंह थोड़ा सा इस तरह खुला रखा कि उसमें से थोड़ा-थोड़ा अनाज गिरता रहे और जाकर एक यहूदी के घर के सामने बोरी का मुंह बंद कर दिया। फिर उसने चोरी के हथियार को उसी यहूदी के घर भी रखवा दिया। जब यह मामला सामने आया तो सारे सबूत यहूदी के ख़िलाफ़ थे। चोर के क़बीले वाले भी उसके समर्थन में लगे थे। मगर अल्लाह ने मुहम्मद सल्ल. को इस घटना की जानकारी दे दी और तब जाकर सही फ़ैसला हो सका और उस यहूदी को बरी किया गया, वह वहां से भागकर मक्का के काफ़िरों से जा मिला। इससे यह बात साफ़ होती है कि ग़लत काम का साथ नहीं देना चाहिए चाहे वह किसी यहूदी या ग़ैर मुस्लिम के साथ ही क्यों न किया गया हो, और फ़ैसला हमेशा इंसाफ़ के साथ होना चाहिए।


113. यहां शायद उसी चोर और उसके समर्थकों का ज़िक्र है जो यह चाहते थे कि बेगुनाह यहूदियों को सज़ा दी जाए।


116: किसी और को अल्लाह की ख़ुदायी में साझेदार (Partner) ठहराना, एक ऐसा गुनाह है जिसे अल्लाह कभी माफ़ नहीं करेगा। यह गुनाह तभी माफ़ हो सकता है जब आदमी मरने से पहले-पहले इसके लिए सच्ची तौबा कर ले और अपने आपको सुधार ले। (देखें 25:68-70). इसके अलावा किया गया कोई भी गुनाह अल्लाह जब चाहे, माफ कर सकता है। 


117: अरब के मूर्तिपूजक लोग ज़्यादातर देवियों की ही पूजा करते थे--- लात, मनात, उज़्ज़ा नाम की मशहूर देवियां थीं। यहां तक कि वे फ़रिशतों को भी अल्लाह की बेटियां ही समझते थे। इस आयत में इस बात की तरफ़ इशारा किया गया है कि एक तरफ़ तो वे औरतों को मर्दों के मुक़ाबले कम दर्जे की चीज़ समझते थे, मगर दूसरी तरफ़ पूजा सभी देवियों की ही की जाती थी। देखें 53: 19-20


118: मतलब यह है कि बहुत से बंदों को भटका करके उन्हें अपना बना लूंगा, और उनसे अपनी मर्ज़ी के काम कराऊंगा।


119: अरब के विश्वास न रखने वाले कुछ लोगों [Pagans] में यह भी रस्म थी कि वे ऐसी ऊँटनियों या बकरियों के कान चिरवाकर उन्हें किसी देवी-देवता के नाम समर्पित कर देते थे, जिसने लगातार दस ऊँटनी या बकरी जनी हो, उन्हें आज़ाद छोड़ दिया जाता और फिर न तो इनका दूध पीते और न सवारी करते और न ही इसे ज़बह करते थे, जब वह मर जाती तो उसका गोश्त केवल महिलाएं खाती थीं। ऐसे ही जानवर को "बहीरा" कहते थे और उसके बच्चे को "साइबा"। इस झूठी रस्म की तरफ़ इशारा करके कहा गया है कि यह सब असल में शैतान करवाता है, और यह एक तरह से अल्लाह की रचना में फेर-बदल करने जैसा है।


127: इस्लाम से पहले अरबों के समाज में औरतों का दर्जा बहुत ही निचले स्तर का माना जाता था, और उनके सामाजिक और आर्थिक अधिकार नहीं के बराबर थे। इस्लाम ने जब उन्हें कुछ अधिकार और ख़ासकर छोड़ी गई जायदाद में से हिस्सा देने की घोषणा की (4:2-11), तो अरबों के लिए ये बातें अनोखी थीं और उन्हें यह लगता था कि ये अधिकार उन्हें थोड़े समय के लिए ही दिए गए होंगे, और शायद यह कुछ समय बाद उठा लिए जाएंगे। अतः वे लोग इस बारे में मुहम्मद सल्ल से पूछते रहते थे, इसी के जवाब में यह आयत है जिसमें यह साफ़ किया गया है कि औरतों से जुड़े हुए अधिकार हमेशा के लिए हैं और इस सिलसिले में मर्द और औरतों के बीच रिश्ते से जुड़े हुए कुछ और अधिकार भी बता दिए गए हैं।

यहां फिर से यतीम (अनाथ) लड़कियों के साथ अन्याय करने से मना किया गया है। जैसा कि आयत 3 में बताया गया कि उस ज़माने की रीति के अनुसार कई बार ऐसा होता कि यतीम लड़की का अभिभावक (Guardian) उसके चचा का बेटा होता था। अगर लड़की हसीन होती और उसके बाप ने काफ़ी संपत्ति भी छोड़ी होती, तो उसका चचेरा भाई माल हथियाने के चक्कर में उससे शादी कर लेता, मगर उसे "मेहर" बहुत कम देता था, और अगर लड़की हसीन न होती तो शादी कर लेने के बाद उसके साथ प्यार से पेश भी नहीं आता था।


129: यह मुमकिन नहीं है कि कोई आदमी अपनी सभी बीवियों के साथ एक समान व्यवहार कर सके, क्योंकि दिल का झुकाव किसी एक की तरफ़ ज़्यादा होगा, हां, मगर कम से कम ऊपर के व्यवहार में समानता होनी चाहिए। जैसे हर बीवी के साथ एक बराबर रात गुज़ारना, ख़र्चा करने के लिए एक बराबर पैसे देना, किसी के साथ ऐसी बेरुख़ी के साथ न पेश आना जिससे किसी बीवी का दिल टूटता हो और उसे लगे कि न तो उसे शादीशुदा होने का हक़ मिल रहा है और न उसे पूरी तरह से तलाक़ ही दिया गया है, बल्कि वह शादी और तलाक के बीच लटकी हुई है।


137: सच्चाई पर विश्वास कर लेना, फिर सच्चाई को ठुकरा देना, फिर से विश्वास कर लेना और अंत में दोबारा विश्वास करने से इंकार कर देना, और ऐसी हालत में मर जाना....यह तो लगता है कि मदीना के पाखंडियों [मुनाफ़िक़ों] के बारे में कहा गया है, मगर इनके साथ कुछ दूसरे लोग भी ऐसे थे जिन्होंने ऐसा किया था।


140: इस बात का ज़िक्र पहले एक मक्का में उतरी हुई सूरह में आ चुका है, देखें 6: 68


149: यहाँ किसी के बुरे काम को माफ कर देने से मतलब राज़ी ने यह बताया है कि अगर कोई पाखंडी आदमी अपने गुनाहों से तौबा करता है तो उसके द्वारा किए गए पहले के बुरे काम का ताना नहीं देना चाहिए। 


153: यहूदी लोग इस बात की माँग करते थे कि क़ुरआन को एक ही बार में लिखी हुई किताब के रूप में क्यों नहीं उतारा गया, जैसाकि मूसा (अलै) पर लिखी हुई तौरात टैबलेट के रूप में उतरी थी। मगर इस माँग को रद्द किया गया है, देखें 25:32.


154: इन घटनाओं का ज़िक्र सूरह बक़रा (2: 51-66) में थोड़े विस्तार से आया है। इसे भी देखें 7: 161


155: उनके दिल कुछ भी सुनने और समझने को तैयार न थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे पहले ही से सब कुछ जानते हैं, उन पर ऐसा पर्दा चढ़ा हुआ था कि इसमें अपनी मान्यताओं के अलावा कोई और नई बातें शामिल नहीं हो सकती थीं। (देखें 2: 88)

असल में अल्लाह ने उनकी ज़िद्द और हठधर्मी के चलते उनके दिलों को ठप्पा लगाकर बंद कर दिया था, जिससे वे कोई सही बात समझने में असमर्थ थे।


156: जब हज़रत मरयम गर्भवती हुईं, तो लोगों ने उन पर यह लांछन लगाया कि उनका किसी के साथ नाजायज़ संबंध था।


157: मुसलमानों में आम तौर से यह धारणा है कि यहूदियों ने ईसा (अलै) को मार डालने का एक षडयंत्र रचा था। अल्लाह ने असल मुजरिम जिसने ईसा (अलै) को धोखा दिया था, की शक्ल को हूबहू ईसा (अलै) की तरह कर दिया, उनलोगों ने उसे ईसा समझकर सूली पर चढ़ा दिया, और अल्लाह ने ईसा (अलै) को सुरक्षित ऊपर उठा लिया। मुसलमान भी ईसा (अलै) के दोबारा दुनिया में आने की बात को मानते हैं।


160:  देखें सूरह अनाम (6: 146).


176: "कलाला" उस आदमी को कहते हैं जिसके मरने के समय न तो उसके बाप-दादा जिंदा हों और न ही कोई बेटा या पोता! (देखें आयत 12). ऐसे आदमी की विरासत उसके नज़दीकी रिश्तेदारों (जैसे भाइयों/बहनों में) में बांटी जाएगी।


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