Monday, April 4, 2022

Surah/सूरह 21: Al-Anbiya/अल अंबिया [अल्लाह के नबी, The Prophets]

 सूरह 21: अल-अंबिया 

[अल्लाह के नबी, The Prophets]


यह एक मक्की सूरह है, इसमें भी पैग़म्बर साहब को भरोसा दिलाते हुए याद कराया गया है कि अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी मेहरबानियाँ हमेशा नबियों के साथ रही हैं, यहाँ कई सारे नबियों जैसे मूसा, हारून, इबराहीम, इसहाक़, याक़ूब, लूत, दाऊद, सुलैमान (अलै.) इत्यादि का वर्णन आया है (आयत 48-91), जिसकी वजह से इसका नाम "अंबिया" पड़ा है। इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि मुहम्मद (सल्ल) भी पहले के नबियों की तरह ही हैं और उनको भी एक अल्लाह को मानने का वही संदेश लोगों तक पहुँचाना है। आयत 107 में बताया गया है कि पैग़म्बर सल्ल. को दुनिया भर के सभी लोगों के लिए रहम करने वाला बनाकर भेजा गया है। यह विश्वास करने से इंकार करने वालों को चेतावनी देती है कि फ़ैसले की घड़ी बहुत जल्द आने वाली है जिससे बचने का कोई उपाय नहीं है। 




विषय: 

01-06: कर्मों के हिसाब का समय नज़दीक है 

07-10: सभी रसूल आदमी ही हैं 

11-15: पिछली पीढ़ियों को सज़ा: एक चेतावनी 

16-18: ज़मीन-आसमान को खेल-तमाशे के लिए नहीं पैदा किया गया 

19-20: फ़रिश्ते अल्लाह की बंदगी करने से नहीं थकते 

21-25: अल्लाह एक हैकई नहीं 

26-29: अल्लाह की कोई संतान नहीं 

30-33: अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ

34-41: रसूल पर ऐतराज़ करने को रद्द किया गया 

42-47: दूसरे ख़ुदाओं में कोई ताक़त नहीं 

48-50: मूसा और हारून (अलै) 

51-71: इबराहीम (अलै) की कहानी 

72-73: इसहाक़ और याक़ूब (अलै) 

74-75: लूत (अलै) 

76-77: नूह (अलै) 

78-82: दाऊद और सुलैमान (अलै) 

83-84: अय्यूब (अलै)

85-86: इसमाईलइदरीसऔर ज़ुल-किफ़्ल 

87-88: ज़ुल-नून [मछलीवाले: यूनुस] 

89-90: ज़करिया

91-94: मरयम 

95-100: क़यामत के दिन बर्बाद किए गए समुदाय दोबारा उठाए जाएंगे 

101-103: नेक और सच्चे लोग तकलीफ़ नहीं झेलेंगे 

104-106: नेक व अच्छे बन्दे ही (परलोक में) ज़मीन के वारिस होंगे

107-112: रसूल को सारे लोगों के लिए रहम करने वाला बनाकर भेजा गया है 

 

 

अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है

लोगों से उनके (कर्मों का) हिसाब लेने का समय नज़दीक आ पहुँचा है, मगर वे हैं कि (सच्चाई से) मुँह फेरे हुए, बेफ़िक्री में सब कुछ भुलाए बैठे हैं  (1)

उनके रब की तरफ़ से (नसीहत के लिए) जब भी कोई नया संदेश उनके पास आता हैतो वे उसे सुनते भी हैं तो बस हँसी-खेल करते हुए, (2)

बेकार चीज़ों में मगन मन के साथ! उन शैतानियाँ करनेवालों ने चुपके-चुपके आपस में कानाफूसी की: "यह आदमी [मोहम्मद] तुम्हारे जैसा ही एक (मामूली सा) आदमी नहीं तो और क्या है? फिर क्या तुम सब जानते-बूझते भी उसके पास जादू की बातें सुनने जाओगे?" (3)

[रसूल ने] कहा, "आसमानों और ज़मीन में जो बात भी कही जाती है (चाहे चुपके-चुपके हो या सबके सामने हो), मेरा रब उन सबको जानता है: वह सब कुछ सुनता हैहर चीज़ जानता  है।" (4)

(इतना ही नहीं!) बल्कि उनमें से कुछ यह कहते हैं, "ये तो बस भटके हुए सपनों की बातें हैं”; कुछ लोगों ने कहा, “उसने इसे स्वयं ही गढ़ लिया है”; कुछ दूसरे लोगों ने कहा, “वह तो बस एक कवि है, (अगर ऐसा नहीं है तो) उसे चाहिए कि वह हमें (अल्लाह की तरफ़ से) कोई निशानी लाकर दिखाएजिस तरह (निशानियाँ लेकर) पहले के रसूल भेजे गए थे।" (5) 

लेकिन इनसे पहले जिन जिन बस्तियों को हमने नष्ट किया, उनमें से तो कोई भी (निशानियाँ देखकर) ईमान नहीं लाया था, फिर क्या यह लोग (रसूल की बातों पर) विश्वास कर लेंगे? (6) 

और [ऐ पैग़म्बर] यहाँ तक कि आपके समय से पहले, जितने भी रसूल [Messenger] हमने भेजे, सब के सब आदमी ही थे जिन पर हमारी वही’[revelations] उतरती थी--- [इंकार करनेवालो!] अगर तुम्हें यह बात मालूम न हो तो उन (यहूदियों या ईसाइयों) से जाकर पूछ लो जो (आसमानी) किताबों का ज्ञान रखते हैं--- - (7)

और हमने उन (रसूलों) का शरीर कभी ऐसा नहीं बनाया कि वे खाना न खाते हों और न ही वे हमेशा ज़िंदा रहनेवाले थे। (8)

(तुम्हारे ही जैसे आदमियों को रसूल बनाकर भेजा) और फिर हमने उनके साथ किए हुए वादे को अंत में पूरा कर दिखाया: हमने उन्हें (और उनके साथ) जिस किसी को चाहा, बचा लियाऔर मर्यादा तोड़ देनेवालों को बर्बाद कर दिया। (9)
 

(अब) हमने तुम (लोगों) के लिए एक ऐसी किताब [क़ुरआन] उतार भेजी हैजो तुम्हें (मेरी नसीहतें) याद दिलाती रहे। तो क्या तुम समझ-बूझ से काम नहीं लोगे? (10)

शैतानियाँ व ज़ुल्म करने वालों की कितनी बस्तियों को हमने बर्बाद कर डाला! और उनके बाद कितनी दूसरी बस्तियों को उनकी जगह उठा ख़ड़ा किया! (11)
 
फिर जब उन्हें ऐसा लगा कि हमारी यातना उनके सिर पर आ खड़ी हुई हैतो लगे वहाँ से भागने! (12)

उनसे कहा गया, "भागने की कोशिश मत करो! लौट जाओ अपने घरों को और उसी भोग-विलास के जीवन में जिसमें तुम डूबे हुए थे: शायद वहाँ (सलाह-मशविरा हो और) तुम से कुछ पूछा जाए।" (13)

बस्तियों में रहनेवाले कहने लगे, "अफ़सोस हम पर! निस्संदेह हम ही ग़लती पर थे!" (14)

और फिर उनका रोना चिल्लाना तब तक बंद नहीं हुआ जब तक कि हमने उन्हें मिटा न दिया---  कटे हुए खेत, व बुझे हुए अंगारों की तरह! (15)

हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच में हैउनको खेल तमाशे के लिए नहीं बनाया। (बल्कि एक ख़ास मक़सद के लिए बनाया है) (16)

अगर हम यूँ ही समय काटने के लिए (कोई खेल-तमाशा ही) बनाना चाहतेतो ख़ुद अपनी तरफ़ से ही बना लेते----अगर हमने सचमुच ऐसा चाहा होता! (17)
 
नहींबल्कि (हक़ीक़त यह है कि) हम झूठ के ख़िलाफ़ सच्चाई से वार करते हैंऔर वह झूठ का सिर कुचल डालता है ---- और देखो झूठ कैसे पूरी तरह से मिट जाता है! अफ़सोस तुम (लोगों) पर! तुम (अल्लाह के बारे में) कैसी कैसी बातें बनाते हो! (18)

आसमानों और ज़मीन में जो कोई भी है, सब उसी (अल्लाह) का है, (उसी के लिए है), और जो (फ़रिश्ते) उसके पास हैं, वे कभी भी घमंड में आकर अल्लाह की बन्दगी से मुँह नहीं मोड़ते, और न कभी (बंदगी से) थकते हैं; (19)

वे रात दिन, बिना थके हुए, उसकी बड़ाई  का गीत गाते रहते हैं। (20)


क्या उन्होंने ज़मीन (के जीवों में) से ऐसे ख़ुदा बना लिए हैं जो मुर्दों को ज़िंदा कर सकते हैं? (21)

अगर आसमान या ज़मीन में अल्लाह के सिवा कोई दूसरा (पूजने के लायक़) ख़ुदा होता, तो आसमान और ज़मीन दोनों टूट-फूट जाते: अल्लाह, जो (सारे जहाँ के) सिंहासन का मालिक है, उन बातों से कहीं ऊँचा है, जो बातें वे (उसके बारे में) बनाते रहते हैं: (22)

जो कुछ वह [अल्लाह] करता है, उसके लिए उससे हिसाब लेने वाला कोई नहीं, जबकि इन लोगों से (हर काम का) हिसाब लिया जाएगा। (23)

फिर क्या इबादत [पूजा] के लिए उस (अल्लाह) के बजाय इन्होंने दूसरे ख़ुदाओं को चुन रखा है? [ऐ रसूल] कह दें, "तो ले आओअपना प्रमाण! यह किताब [क़ुरआन] उनके लिए नसीहत है जो लोग मेरे साथ हैं, और उनके लिए भी है जो मुझसे पहले गुज़र चुकी किताबों के मानने वाले हैं।” मगर ज़्यादातर आदमी सच्चाई को पहचानते ही नहीं, इसलिए उस पर ध्यान ही नहीं देते।  (24)

हमने [ऐ रसूल] आपसे पहले कभी भी ऐसा रसूल नहीं भेजाजिस पर यह बात न उतारी हो: "मेरे सिवा कोई पूजने के लायक़ नहीं है, अतः तुम मेरी ही बन्दगी करो।" (25)

और वे कहते हैं: "दया करनेवाले रब [रहमान] ने (फ़रिश्तों को अपनी) सन्तान बना रखा है।" महान है वह!, नहीं! वे [फ़रिश्ते] तो बस हमारे इज़्ज़तदार बंदे हैं: (26)

वे उस अल्लाह] के बोलने से पहले कभी बोलते तक नहीं, और उसके आदेश का पालन करने के लिए तैयार रहते हैं। (27)

जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे हैअल्लाह उनके सब (भूत व भविष्य को) जानता है, और वे बिना इजाज़त किसी मामले में दख़ल नहीं दे सकते, सचमुच वे तो ख़ुद ही उसके भय से सहमे रहते हैं। (28)

उनमें से कोई भी अगर ऐसा दावा कर बैठे कि "अल्लाह के अलावा मैं भी एक (पूजा करने के लायक़) देवता हूँ", तो हम उसे भी बदले में जहन्नम देंगे: शैतानियाँ करने वालों को हम ऐसा ही बदला दिया करते हैं। (29)


क्या इंकार करनेवालों को यह बात मालूम नहीं कि (रचना के समय) सारे आसमान और ज़मीन एक साथ आपस में जुड़े हुए थे, और यह कि हमने उन्हें खींचकर अलग-अलग किया, और यह कि हमने (धरती पर) हर सजीव चीज़ को पानी से पैदा कर दियातो क्या वे (इस बात पर) विश्वास नहीं करेंगे? (30)

और हमने धरती पर पहाड़ों को मज़बूती से जमा दिया, ताकि धरती नीचे से हिले-डुले नहीं, और हमने उन (पहाड़ों में) ऐसे दर्रे बना दिए जिनसे चौड़े रास्ते बन गए, ताकि लोग सही दिशा में आ जा सकें, (31)

और हमने आसमान को एक सुरक्षित छत जैसा बनाया है---- इसके बावजूद वे इन अनोखी निशानियों से मुँह मोड़ लेते हैं। (32)

वही (अल्लाह) है जिसने रात और दिन बनाए, और सूरज और चाँद को भी पैदा किया, हर एक (खगोलीय पिंड) अपनी-अपनी कक्षाओं [orbits] में तैर रहा है। (33)

[ऐ रसूल] हमने आपसे पहले भी किसी आदमी को हमेशा ज़िंदा रहने वाला जीवन नहीं दिया--- अगर आपकी मौत होगी, तो क्या ये [विश्वास न करनेवाले] हमेशा ज़िंदा रहेंगे? (34)

हर जीव को मौत का मज़ा चखना ही है: हम तुम्हें अच्छे और बुरे हालात में डालकर तुम्हारी परीक्षा करते रहते हैं, और अन्ततः तुम्हें लौटकर हमारे ही पास आना है। (35)

जब (सच्चाई पर) विश्वास न करनेवाले आपको देखते हैं, तो आपकी हँसी उड़ाते हुए कहते हैं: "क्या यही वह आदमी हैजो तुम्हारे देवताओं के (झूठे होने के) बारे में बातें करता है?" वे रहम करनेवाले रब [रहमान] की किसी भी बात को बस रद्द कर देते हैं। (36)


आदमी जल्दबाज़ी (की आदत) के साथ पैदा किया गया है: मैं बहुत जल्द तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाने वाला हूँ, अतः तुम उन (यातनाओं) को समय से पहले ही ले आने के लिए मुझ से मत कहो। (37)

वे कहते हैं, "अगर तुम जो (यातना आने की बात) कहते हो वह सच है, तो यह वादा कब पूरा होगा?" (38)

(सच्चाई से) इंकार करनेवाले अगर जान पाते (तो यातना की जल्दी न मचाते)कि जब वह समय आ जाएगा तो फिर उस आग से न तो वे अपने चेहरों को और न अपनी पीठों को (झुलसने से) बचा पाएंगे, और न उन्हें किसी की सहायता ही मिलेगी! (39)

बल्कि वह (आग) अचानक उनपर आ धमकेगी और उन्हें बदहवास कर देगी; उनमें इतना दम न होगा कि वे उसे पीछे हटा सकें; उन्हें (कुछ समय की) मुहलत भी नहीं दी जाएगी। (40) 
 

[ऐ रसूल] आपसे पहले भी आए रसूलों की हँसी उड़ाई गयी थीमगर (हर बार) हुआ यह कि वे जिस (यातना के आने की) बात की हँसी उड़ाते थे, अंत में उसी (यातना) ने उन्हें घेर लिया। (41)

आप पूछें, "रात हो या दिन का समय, कौन है जो तुम्हें रहम करनेवाले रब (की यातना) से बचा सकता है? (कोई नहीं), मगर तब भी वे अपने रब का नाम सुनते ही मुँह मोड़ लेते हैं। (42)

क्या उनके पास ऐसे देवता हैं जो हमसे उन्हें बचा सकते हैं? (वे क्या बचाएंगे!) उनके देवताओं में तो इतनी भी ताक़त नहीं कि वे अपनी ही मदद कर सकें, और न ही हमारी तरफ़ से सुरक्षा पा सकते हैं। (43)

हमने इन गुनाहगारों और उनके बाप-दादाओं को एक लम्बे समय तक जीवन की सुख-सुविधा से मज़ा लेने दिया हैतो क्या वे देखते नहीं कि हम किस तरह चारों तरफ़ से उनकी सीमाएं सिकोड़कर छोटी करते जा रहे हैंतो फिर क्या वे जीत जाएंगे? (44)

[ऐ रसूल] आप कहें, "मैं तो बस (अल्लाह की भेजी हुई) 'वही' [Revelation] के द्वारा तुम्हें सावधान करता हूँ।" याद रखें, जो बहरे हैं उन्हें चाहे कितना भी सावधान किया जाए, वह कभी सुनने वाले नहीं हैं45)

तब भी, अगर आपके रब की यातना का कोई झोंका भी उन्हें छू जाए, तो निश्चय ही वे लगेंगे चिल्लाने, "हायहमारा दुर्भाग्य! सचमुच हम ही ग़लती पर थे।" (46) 

क़यामत के दिन हम इंसाफ़ का तराज़ू लगा देंगे ताकि किसी के साथ थोड़ा भी ज़ुल्म न हो पाएयहाँ तक कि अगर कोई (कर्म) राई के दाने के (वज़न के) बराबर भी होतो हम उसे भी सामने ला खड़ा करेंगे--- और हिसाब रखने के लिए हम काफ़ी हैं। (47)


हमने मूसा [Moses] और हारून [Aaron] को सही और ग़लत में फ़र्क़ बतानेवाली (एक किताब, तोरात) दी थी, जो (मार्ग दिखाने के लिए) एक रौशनी थी, और परहेज़गार लोगों के लिए नसीहत देनेवाली [Reminder] थी, (48)

(उन परहेज़गारों के लिए) जो अपने रब से बिना उसे देखे हुए, डरते रहते हैं, और आने वाली (क़यामत की) घड़ी के भय से सहमे रहते हैं। (49)

यह [क़ुरआन] भी एक शुभ [blessed] संदेश हैजिसको हमने उतारा है---- तो फिर क्या तुम (लोग) इसे मानने से इंकार करते हो? (50)

बहुत समय पहले हमने इबराहीम [Abraham] को सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ दी थी, और हम उसकी हालत अच्छी तरह से जानते थे। (51)

जब उन्होंने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा, "यह क्या मूर्तियाँ हैंजिनकी तुम इतनी भक्ति करते हो?" (52)

वे बोले, "हमने अपने बाप-दादा को इन्हीं की पूजा करते हुए देखा था।" (53)

उस [इबराहीम] ने कहा, "तुम ख़ुद भी भटक चुके हो और तुम्हारे बाप-दादा भी सही मार्ग से बिल्कुल ही भटके हुए थे।" (54)

इस पर उन्होंने कहा, "क्या तुम हमसे सचमुच ऐसा कह रहे हो या यूँ ही हँसी-खेल कर रहे हो?" (55)

इबराहीम ने कहा, "नहीं! सुनो, वह आसमानों और ज़मीन का मालिक हैवही है जिसने उनको पैदा किया है, और असल में वही तुम्हारा भी रब है, मैं इस पर गवाही देता हूँ। (56)

और (इबराहीम ने कहा), “क़सम है अल्लाह की! (एक दिन) जैसे ही तुम (लोग) पीठ फेरकर (कहीं) चले जाओगे, मैं ज़रूर तुम्हारी मूर्तियों के साथ एक चाल चलूँगा! " (57)

(और ऐसा ही किया), उसने उन सब (मूर्तियों) को तोड़कर टुकड़े- टुकड़े कर दिया, लेकिन सबसे बड़ी मूर्ति को छोड़ दिया ताकि लोग उसके सामने झुक सकें (और हाल पूछ सकें)। (58) 

वे (वापस आकर) कहने लगे, "किसने हमारे देवताओं के साथ यह हरकत की हैनिश्चय ही वह बड़ा ही ज़ालिम आदमी होगा!" (59)

(कुछ लोग) बोले, "हमने एक नौजवान कोजिसे इबराहीम कहकर पुकारते हैं, उन (बुतों) के बारे में कुछ कहते सुना था।" (60)

उन्होंने कहा, "तो उसे बुला लाओ लोगों की आँखों के सामने, ताकि वे भी (पूछ-ताछ के) गवाह रहें।" (61)

उन्होंने इबराहीम से कहा, "हमारे देवताओं के साथ यह हरकत किसने की हैऐ इबराहीम क्या तुमने?" (62) 

इबराहीम ने कहा, "नहींबल्कि यह काम उनके इस सबसे बड़े (देव) ने किया होगाउन्हीं से पूछ लोअगर वे बोल सकते हों।" (63)

वे एक दूसरे की तरफ़ (कुछ सोचते हुए) मुड़े और आपस में कहने लगे, "असल में तो हम ही लोग शैतानियाँ करते हैं।" (64)

उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था, फिर उन्होंने बात बनायी और कहने लगे, "तुम्हें तो अच्छी तरह मालूम है कि ये (मूर्तियाँ) बोल नहीं सकतीं।" (65)

इबराहीम ने कहा, "फिर अल्लाह को छोड़कर तुम ऐसी चीज़ों को क्यों पूजते होजो न तुम्हें कुछ फ़ायदा पहुँचा सकती हैं और न कोई नुक़सान? (66)

धिक्कार है तुमपरऔर उनपर भीजिनको तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो! क्या तुम दिमाग़ से काम नहीं लेते?" (67)

इस पर उन्होंने (आपस में) कहा, “अगर तुम सचमुच कुछ अच्छा करना चाहते हो, तो आओ इस आदमी को आग में जला दो, और अपने (टूटे हुए) देवताओं की मदद करो।" (68)

(फिर इबराहीम को आग में डाल दिया गया), मगर हमने कहा, "ऐ आग! तू ठंढ़ी हो जा और सलामती बन जा इबराहीम पर!" (69)

उन्होंने उसे नुक़सान पहुँचाने की योजना बनायी थी, मगर हमने उन्हीं को ज़बरदस्त नुक़सान में डाल दिया। (70)

हमने उन्हें और (उनके भतीजे) लूत [Lot] को बचा लिया और उन्हें उस ज़मीन [कुनआन] पर भेज दिया, जिसमें हमने दुनियावालों के लिए बरकतें [blessings] रखी थीं, (71) 

और फिर हमने उसे (एक बेटा) इसहाक़ [Isaac] और (पोता) याक़ूब [Jacob], अतिरिक्त तोहफ़े के रूप में दियाऔर उनमें से हर एक को हमने नेक बनाया था। (72)

और हमने उन सबको (लोगों का) नायक बनाया जो कि वे हमारे आदेश से लोगों को मार्ग दिखाते थे, और हमने उन्हें 'वही' [revelation] द्वारा भलाई के काम करने, नमाज़ को पाबन्दी से अदा करने और (ग़रीबों को) ज़कात [alms] देने के लिए प्रेरित किया था: वे हमारे सच्चे व पक्के बंदे थे जो इबादत में लगे रहते थे।  (73)

और लूत [Lot] को भी हमने सही फ़ैसला करने की समझ-बूझ और ज्ञान दिया था, और हमने उन्हें उस (सदूम नामक) बस्ती (के लोगों) से बचा लिया जो (समलैंगिकता जैसे) कुकर्मों में लगे हुए थे----- सचमुच वे बड़े शैतान व बेशर्म लोग थे जिन्होंने अल्लाह के (ठहराए हुए) नियमों को तोड़ा था! (74)

हम ने लूत को अपनी रहमत [mercy] में शामिल कर लिया; निस्संदेह वह अच्छे व नेक लोगों में से थे। (75)
 

इससे काफ़ी समय पहले, नूह [Noah] ने (तंग आकर) हमें पुकारा थातब हमने उसकी (फ़रियाद) सुनी: और फिर उसे और उसके परिवार के लोगों को एक बड़ी मुसीबत से बचा लिया (76)

और उसकी मदद उन लोगों के ख़िलाफ़ की, जिन्होंने हमारी निशानियों को मानने से इंकार कर दिया था---- सचमुच वे बड़े ही शैतान लोग थे, अतः हमने उन सबको डुबा दिया। (77)

औऱ दाऊद [David] और सुलैमान [Solomon] को भी याद करें जब उन्होंने एक ऐसे खेत के झगड़े का फ़ैसला किया था जिस खेत में रात को लोगों की कुछ भेड़-बकरियाँ घुसकर उसे चर गई थीं। हम इस मामले पर होनेवाले फ़ैसले को देख रहे थे (78)

और तब हमने सुलैमान को इस मामले में फ़ैसला करने की बेहतर समझ दे दी, हालाँकि हमने दोनों को ही सही फ़ैसला करने की गहरी समझ और ज्ञान दिया था। हमने पहाड़ों और पक्षियों को भी दाऊद के वश में लगा दिया था और वे सब (दाऊद के साथ) मिलकर हमारी बड़ाई के गीत गाते थे---- हमने ही ये तमाम चीज़ें की थीं--- (79)

हमने ही तुम (लोगों) के फ़ायदे के लिए उन्हें [दाऊद को] धातुओं के कवच बनाने की कला सिखायी थी, ताकि युद्ध में वह तुम्हारी रक्षा कर सके, पर क्या तुम इसके लिए मेरा आभार मानते हो? (80)

हमने (समुद्र की) तूफ़ानी हवा को सुलैमान के वश में कर दिया थाजो उसके आदेश से (फ़िलिस्तीन व सीरिया जैसे) भूभाग की ओर चलती थी जिसे हमने बरकत [blessing] दी थी---- और हम तो हर चीज़ की जानकारी रखते हैं---- (81)
 
और हमने कुछ जिन्नों [शैतानों] को उसके अधीन कर दिया था, जो उसके लिए (पानी में) ग़ोते लगाते थे और इसके अलावा कुछ दूसरे काम भी करते थे। और हम उन पर अपनी नज़र रखे हुए थे। (82) 
 

याद करो अय्यूब [Job] को, जबकि उसने अपने रब को पुकारा था, "मैं दुख में पड़ गया हूँ, मगर तू दया करनेवालों में सबसे बढ़कर दयावान है।" (83)

अतः हमने उसकी फ़रियाद सुन ली, उसकी तकलीफ़ें दूर कर दीं, और उसके परिवार वालों को फिर से उसके साथ मिला दिया, और उसके साथ उनके जैसे और लोग भी दे दिए। यह हमारी तरफ़ से एक रहमत [mercy] थी, और हमारी बंदगी करने वालों के लिए याद रखनेवाला एक सबक़। (84) 

इसमाईल [Ishmael], इदरीस और ज़ुलकिफ़्ल को भी याद करें: इनमें से सभी धैर्य रखनेवालों में से थे। (85)

हमने उन्हें अपनी रहमत में दाख़िल कर लिया था; वे सचमुच सच्चे व अच्छे लोग थे। (86)

और याद करें उस मछलीवाले [यूनुस, Jonah] को, जो (अपनी क़ौम से) ग़ुस्सा होकर चले गए थे, यह सोचकर कि हम इस बारे में उनकी पकड़ नहीं करेंगे। मगर फिर उसने (जब मछली के पेट के अंदर) गहरे अँधेरों में (हमें) पुकारा था, "(अल्लाह!) तेरे सिवा कोई इबादत [पूजने] के लायक़ नहींमहान है तू! सचमुच मैं ही ग़लती पर था।" (87)

तब हमने उनकी फ़रियाद सुन ली और उन्हें दुख व परेशानी से छुटकारा दे दिया: हम ईमान रखनेवालों को इसी तरह (हर परेशानी से) बचा लेते हैं। (88)

और ज़करिया [Zachariah] को भी याद करें, जब उसने अपने रब को पुकारा था, "ऐ मेरे रब! मुझे अकेला (बिना संतान के) न छोड़ देहालाँकि सबसे अच्छा वारिस तो तू ही है।" (89)

अतः हमने उनकी दुआ क़बूल कर ली---- उन्हें यह्या [John] (जैसा बेटा) प्रदान किया, और उनकी पत्नी को (बाँझपन से) स्वस्थ कर दिया--- वे हमेशा ही नेक व अच्छे कर्मों को करने में पूरी लगन से तत्पर रहते थे। वे बड़े (मन के) लगाव के साथ और डरते हुए हमें पुकारा करते थे, और हमारे सामने (पूरी भक्ति से) झुके रहते थे। (90)

और याद करें उस नारी [मरयम, Mary] को जिसने अपनी इज़्ज़त सँभालकर रखी थी। हमने उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे और उसके बेटे [ईसा] को सारे संसार के लिए (सच्चाई की) एक निशानी बना दिया। (91)


[ऐ नबियों], ये तुम्हारे जो समुदाय [उम्मत] थे, सब असल में (शिक्षा के हिसाब से) एक ही समुदाय हैं और मैं ही तुम्हारा रब हूँ, अतः तुम मेरी बन्दगी करो। (92)

लेकिन लोगों ने एक ही दीन [शिक्षा] के टुकड़े-टुकड़े कर डाले, मगर उन सबको हमारे पास लौटकर आना होगा। (93)

कोई भी हो, अगर अच्छे कर्म करता हैऔर (एक अल्लाह में) विश्वास रखता है, तो उसकी कोई भी कोशिश बेकार नहीं जाएगी: हम उसके सारे कर्म लिख लेते हैं। (94)

कोई भी समुदाय [क़ौम] जिन्हें हमने (उनके गुनाहों के कारण) बर्बाद कर डाला था, वे हमारे पास (हिसाब-किताब के लिए) लौटकर आने से बच नहीं सकते,    (95)

और जब याजूज [Gog] और माजूज [Magog] के लोगों को खुला छोड़ दिया जाएगा और वे हर ऊँची जगह से दौड़ते हुए नीचे को उतर आएंगे, (96)

जब (अल्लाह के) सच्चे वादे के पूरे होने का समय क़रीब आ जाएगातब ऐसा होगा कि विश्वास न करनेवालों की आँखें मारे डर के फटी की फटी रह जाएंगीऔर वे कहेंगे, "हायहमारा दुर्भाग्य! हम इस चीज़ को जानते ही न थे और पूरी तरह से भुलाए बैठे थे, बल्कि हम ही ग़लती पर थे।" (97)

[ऐ विश्वास न करनेवालो!] "तुम और वे जिनको तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, सब जहन्नम के ईंधन हैं: उसी (जहन्नम) में तुम्हें जाना होगा।" (98)

अगर ये [मूर्तियाँ] सचमुच की भगवान होतीं, तो वहाँ [जहन्नम में] न गयी होतीं------ तुम सब अब हमेशा वहीं रहोगे। (99)

 विश्वास न करनेवाले वहाँ दुखों से चिल्ला रहे होंगे, मगर वे [मूर्तियाँ] कुछ भी नहीं सुनेंगी। (100)
 

मगर जिन लोगों के लिए हम पहले ही जन्नत का फ़ैसला कर चुके हैं, उन्हें जहन्नम से बहुत दूर रखा जाएगा---- (101)

वे उस (जहन्नम) की आहट तक वहाँ नहीं सुनेंगे---- और वे अपनी मनचाही चीज़ों के साथ वहाँ हमेशा रहने का मज़ा ले रहे होंगे। (102)

उन्हें वह दिल दहला देने वाली भयानक चीज़ [फ़ैसले का दिन] से कोई डर नहीं होगा: फ़रिश्ते उनका स्वागत करते हुए कहेंगे, "यही तो है वह दिनजिसका (क़ुरआन में) तुमसे वादा किया गया था!" (103)

उस दिन हम आसमानों को इस तरह लपेट [roll up] देंगे जैसे कोई लिखनेवाला (अपने) दस्तावेज़ लिखकर लपेट देता है। फिर, हम दोबारा सृष्टि की रचना करेंगे, ठीक वैसे ही जैसे पहली बार की थी: यह एक अटूट वादा है, हम यह सारी चीज़ें करके रहेंगे। (104)
 

हमने ज़बूर [Psalms] में, और ऐसा ही (पहले की आसमानी) किताबों में भी लिखा था: "मेरे नेक व अच्छे बन्दे ही (परलोक में) ज़मीन के वारिस होंगे।" (105)

इस [क़ुरआन] में अल्लाह के बंदों के लिए सचमुच एक संदेश है! (106)

[ऐ रसूल!] हमने आपको इसीलिए भेजा है ताकि सारे संसार में रहमत [mercy] उजागर हो जाए। (या हमने आपको सारे संसार के लिए केवल रहमत बनाकर भेजा है)। (107) 

कह दें, "मेरे पास जो बात उतारी गयी [revealed] है, वह यही है कि तुम्हारा (पूजने योग्य) ख़ुदा बस एक अकेला अल्लाह है। तो क्या तुम बात मानते हुए उसके सामने सिर झुकाओगे?" (108)

फिर भी अगर वे (न मानें और) मुँह मोड़ लें, तो कह दें, "मैंने (अल्लाह का) संदेश खुलकर और एक समान तरीक़े से तुम सब तक पहुँचा दिया है। मैं यह नहीं जानता कि जिस फ़ैसले का तुमसे वादा किया जा रहा है वह निकट आ गया है या अभी दूर है," (109)

मगर, अल्लाह तो उन बातों को भी जानता है जो सबके सामने कही जाती हैं, और उन्हें भी जो (दिलों में) छिपायी जाती हैं। (110)

मुझे नहीं मालूम: हो सकता है कि यह (समय) तुम्हारे लिए एक परीक्षा का हो,  या यह कि थोड़े समय के लिए ज़िंदगी के मज़े उठा लो।” (111) 

अंत में (रसूल) ने कहा, "ऐ मेरे रबअब हमारे बीच पक्का व सच्चाई के साथ फ़ैसला कर दे!” और हमारा रब तो बहुत रहम [mercy] करनेवाला है। जो कुछ तुम (विश्वास न करनेवाले) कहते हो, उसके ख़िलाफ़ हम उसी (रब) से मदद माँगते हैं।" (112)
 
 
 
नोट:

4: मक्का के लोग आपस में ख़ुफ़िया तरीक़े से जो बातें किया करते थेवह भी कई बार मुहम्मद (सल्ल) को 'वहीके द्वारा पता चल जाती थीइन बातों को वे लोग जादू समझ लेते थे। 

13: यह व्यंग्य से कहा गया हैमतलब यह है कि जब तुम भोग-विलास में रह रहे थेतो घर के नौकर-चाकर पूछा करते थे कि क्या हुक्म हैअब वापस घर जाओ और देखोशायद नौकर तुम्हारा हुक्म पूछेमगर सच तो यह है कि घरों का तो नाम व निशान ही मिट चुका होगा।

18: यानी अल्लाह के बारे में यह कहना कि उसका कोई साझेदार है या उसकी औलाद है। 

21: मक्का के लोगों में कुछ लोग यह मानते थे कि आसमान का ख़ुदा कोई और है और ज़मीन का कोई और। अल्लाह को आसमान का ख़ुदा मानतेऔर ज़मीन का ख़ुदा किसी देवता को मानते थे और यह भी मानते थे कि यह देवता धरती को नई ज़िंदगी देता है और उससे धरती हरी-भरी हो जाती है।

24: रसूल से कहा गया है कि वह बुतपरस्तों को इस बात की चुनौती दें कि अगर अल्लाह के अलावा दूसरे ख़ुदा हैं, तो वे इसका प्रमाण किसी आसमानी किताब से पेश करें। आगे तर्क द्वारा बताया गया है कि अगर एक से ज़्यादा ख़ुदा होते, तो बहुत सारे ख़ुदाओं में वर्चस्व की लड़ाई हो जाती, और नतीजे में पूरा ब्रहमांड बर्बाद हो चुका होता! क़ुरआन, तौरात और बाइबिल तीनों सहमत हैं कि ख़ुदा केवल एक ही है। 

26: अरब के लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ कहा करते थे।

30: इसका एक मतलब यह भी बताया गया है कि आसमान के बंद होने का अर्थ यह है कि बारिश नहीं होती थीऔर ज़मीन के बंद होने का मतलब है कि इसमें कोई पैदावार नहीं होती थी। सो दोनों को खोल दिया गया। शायद इसे ही Big Bang कहते हैं। 

34: मक्का के विश्वास न करनेवाले इस बात के इंतज़ार में थे कि कब मुहम्मद (सल्ल) की मौत होती हैताकि वे ख़ुशियाँ मना सकें और उनका दीन उनके साथ ही ख़त्म हो जाएदेखें सूरह तूर (52: 30).

44: अरब और उसके आसपास के क्षेत्रों में धीरे-धीरे बहुदेववादियों का असर और प्रभाव कम होता जा रहा थाजिसे सीमा का सिकुड़ना कहा गया हैदेखें सूरह रा'द (13: 41) 

47: क़यामत के दिन हर आदमी के साथ इंसाफ़ होगा और वह इंसाफ़ होता हुआ सब लोगों को दिखायी भी देगा। 

58: वह कोई त्यौहार का दिन था जब सारे लोग शहर से बाहर कहीं जश्न मनाने जाते थेउस दिन हज़रत इबराहीम (अलै.) किसी बहाने से उन लोगों के साथ नहीं गए थेदेखें सूरह साफ़्फ़ात (37: 88) 

69: इस घटना को थोड़े विस्तार से सूरह (37: 97) में किया गया है। माना जाता है कि यह आग बादशाह नमरूद [Nimrod] के हुक्म पर लगायी गई थी। बुख़ारी की हदीस में है कि आग में फेंके जाने के समय इब्राहीम (अलै) ने कहा था, "हमारी मदद के लिए अकेले अल्लाह ही काफ़ी है और वह ही सबसे अच्छा रखवाला है। 

71: इस घटना के बाद इबराहीम और उनके भतीजे लूत (अलै) बाबिल, इराक़ से निकलकर सीरिया/येरुशेलम के इलाक़े में चले गए थे।

74: सदूम के लोगों के बुरे कर्मों के बारे में सूरह हूद (11: 77-83) और दूसरी आयतों में भी ज़िक्र आया है। 

78: इस घटना के बारे में बताया जाता है कि एक बार ऐसा हुआ कि एक आदमी की भेड़-बकरियाँ रात में किसी दूसरे के खेत में घुस गईं और फ़सल बर्बाद कर डाली। खेतवाला मुक़दमा लेकर दाऊद (अलै.) के पास आया। उन्होंने फ़ैसला सुनाया कि चूँकि बकरियों के मालिक की यह ज़िम्मेदारी थी कि वह अपनी बकरियों को बाँधकर रखतामगर उसने ऐसा नहीं किया थाइसके चलते खेतवाले को नुक़सान हुआइसलिए बकरीवाले को चाहिए कि वह खेतवाले के हुए नुक़सान के बराबर मूल्य की बकरियाँ उसे भरपाई के रूप में दे। जब सुलैमान (अलै) ने इस फ़ैसले के बारे में सुनातो कहा कि उनके पास एक बेहतर उपाय हैऔर वह यह है कि बकरीवाला कुछ अवधि के लिए अपनी बकरियाँ खेतवाले को दे दे जिनके दूध आदि से खेतवाला लाभ उठाता रहेऔर खेतवाला अपना खेत बकरीवाले को दे दे कि वह इसमें खेती करेऔर जब फ़सल इतनी हो जाए जितनी बर्बाद होने से पहले थीतो उस समय बकरीवाला खेतवाले को खेत  वापस कर दे और खेतवाला बकरियाँ वापस कर देइसमें दोनों पक्षों का फ़ायदा था। इस फ़ैसले को दाऊद (अलै.) और दोनों पक्षों ने भी पसंद किया था।  

80: सूरह सबा (34: 10) में है कि दाऊद (अलै) लोहे को जिस तरह चाहते मोड़ लेते थे और इससे जंग में लड़ने के लिए अच्छे क़िस्म के कवच बनाते थे। 

81: सुलैमान (अलै) अपने तख़्त पर बैठकर फिलिस्तीन से जहाँ चाहतेहवा उन्हें उड़ा ले जाती थीइससे वह एक महीने की दूरी सुबह के सफ़र में और एक महीने की दूरी शाम के सफर में पूरा कर लेते थेदेखें सूरह सबा (34: 12).

82: देखें सूरह सबा (34: 13) 

83: अय्यूब (अलै) को कोई बड़ी बीमारी हो गई थी जिसके चलते वह काफ़ी समय तक तकलीफ़ में रहेमगर धीरज नहीं खोया और अल्लाह से बीमारी ठीक करने की दुआ करते रहेयहाँ तक कि उनकी बीवी को छोड़कर ख़ानदान के सब लोगों ने उनका साथ छोड़ दियाफिर अल्लाह ने उनकी दुआ सुन ली। 

85: हज़रत इस्माईल और इदरीस (अलै.) का ज़िक्र तो सूरह मरयम (19) में भी हैहज़रत ज़ुल-किफ़्ल के बारे में किसी घटना का ज़िक्र क़ुरआन में नहीं है। कुछ लोग उन्हें बाइबल में आए नबियों जैसे Ezekiel, Isaiah और Obadiah के नाम से जोड़ते हैं।  कुछ लोग कहते हैं कि वह हज़रत यसाके ख़लीफ़ा थेऔर नबी नहीं थेलेकिन बड़े ऊँचे दर्जे के वली थे। 

87: यूनुस (अलै) की बातों को उनकी क़ौम के लोग मानने के लिए तैयार न थे, फिर जब उन्होंने देखा कि यातना आने ही वाली है, तो वह बिना अल्लाह की अनुमति लिए हुए शहर छोड़कर चले गए। अंत में जब उनकी क़ौम ने यातना आते हुई देखी, तो तुरंत गुनाहों से तौबा की और अल्लाह ने उनके गुनाह माफ कर दिए। देखें सूरह साफ़्फ़ात (37: 139-148)

89: क्योंकि जब सब कुछ ख़त्म हो जाएगा तब भी अल्लाह तो हमेशा रहेगा।  

90: देखें सूरह आल-इमरान (3: 37-40) 

91: बताया जाता है कि फ़रिश्ते जिबरील ने हज़रत मरयम के कपड़े के आस्तीनों में रूह फूँकी थी जिससे वह गर्भवती हो गई थीं। 

95: इसका एक और अनुवाद है....."कोई भी समुदाय [क़ौम] जिन्हें हमने (उनके गुनाहों के कारण) बर्बाद कर डाला थाउसके लिए मुमकिन नहीं है कि वह लौटकर (दुनिया में) आ जाएं।"

96: क़यामत के आने की निशानी में से है कि याजूज और माजूज जैसे वहशी और दरिंदे क़बीले बहुत बड़ी संख्या में दुनिया पर हमला बोल देंगेजिन्हें ज़ुल-क़रनैन ने एक मज़बूत दीवार बनाकर दुनिया में आने से रोक दिया थासूरह कहफ़ (18: 94-99).

97: सच्चे वादे यानी अंतिम घड़ी [क़यामत] 

105: देखें ज़बूर [Psalm]: 37:29  

 


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