यह एक मक्की सूरह है, जिसका नाम "एक गुफा में सोने वालों" के ऊपर पड़ा है, जिनकी कहानी इस सूरह में (9-26) प्रमुखता से बयान की गई है। कहा जाता है कि मुहम्मद सल्ल. से लोगों ने तीन सवाल पूछे थे: उन नौजवानों के बारे में जो गुफा में छिप गए थे, उस राजा के बारे में जिसकी हुकूमत दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में थी, और आत्मा के बारे में। इसी के जवाब में आयत 9-26, 83-99 और 85 उतरी थी।
इस सूरह में दो और कहानियाँ सुनायी गई हैं: मूसा (अलै) का एक बुज़ुर्ग हस्ती से मिलना (60-82), और ज़ुल-क़रनैन की कहानी (83-99)। मक्का के लोगों की सीख के लिए एक और कहानी भी सुनायी गई है: एक हरे-भरे बाग़ के बर्बाद होने की कहानी, जिसका मालिक अमीर मगर घमंडी और नाशुक्रा था (32-44)। इन कहानियों को यहाँ बताने का असल मक़सद ईमानवालों को मिलने वाले इनाम की ख़ुशख़बरी देना और इंकार करने वालों को चेतावनी देना है। सूरह की शुरुआत और अंत दोनों क़ुरआन के ज़िक्र से हुआ है।
09-26: गुफावाले लोगों की कहानी
27-31: रसूल का उत्साह बढ़ाना
32-44: दो आदमियों की मिसाल
45-46: बारिश और पौधों की मिसाल
47-49: फ़ैसले का दृश्य
50-51: मूर्तिपूजा असल में इबलीस [शैतान] और जिन्नों की पूजा है
52-53: अंतिम फ़ैसले का दृश्य
54-59: विश्वास न करने पर अड़े रहना और उसका परिणाम
60-82: मूसा (अलै) और अल्लाह के बंदे [ख़िज़्र] की कहानी
83-98: ज़ुल-क़रनैन की कहानी
99-102: अंतिम फ़ैसले का एक दृश्य
103-108: सज़ा और इनाम
109 : अल्लाह के संदेश ख़त्म नहीं होने वाले
110 : रसूल भी आदमी ही है
4: औलाद से मतलब बेटा और बेटी दोनों ही होता है। चूँकि यह सूरह मक्का में उतरी थी, इसलिए यहाँ मतलब शायद बेटी से है क्योंकि मक्का के लोग फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटियाँ मानते थे।
7: जब मुहम्मद (सल्ल) देखते कि मक्का के लोग अल्लाह के संदेश की सच्चाई पर विश्वास नहीं कर रहे हैं तो वह बहुत दुखी हो जाते थे। यहाँ उन्हें तसल्ली देते हुए यह कहा गया है कि इस दुनिया को लोगों की परीक्षा के लिए बहुत आकर्षक बनाया गया है, ताकि देखा जा सके कि कौन है जो दुनिया की सजावट में गुम होकर अल्लाह को भूल जाता है, और कौन है जो अल्लाह के हुक्म के अनुसार कर्म करता है।
9: "अल-रक़ीम" के कई मतलब बताए गए हैं। कुछ लोग कहते हैं कि जिस पहाड़ या घाटी में यह गुफा थी, उसी पहाड़ का नाम रक़ीम था, कुछ लोग कहते हैं कि यह शहर का नाम था जो फिलिस्तीन के दक्षिण में स्थित था, मगर कुछ लोग इसे आजकल के जार्डन [अम्मान] या तुर्की के इफ़ेसस [Ephesus] से जोड़ते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह असल में एक "शिलालेख" [Inscription] था जिसमें "गुफा की घटना" को तख़्ती पर लिखवाकर गुफा के दरवाज़े पर लगा दिया गया था।
10: ईसाई परम्परा में भी “Seven Sleepers of Ephesus” नाम की मिलती-जुलती घटना पायी जाती है। इसके मुताबिक एक ज़माने में वहाँ Decius नाम का रोमन राजा था, जिसे अरब के लोग "दक़्युस" या "दक़ियानूस" कहते हैं, कहा जाता है कि वह पारसी धर्म मानता था और ईसाइयों पर काफ़ी अत्याचार करता और उन्हें एक ख़ुदा को छोड़कर अपने देवताओं को मानने पर मजबूर करता था। जब राजा के लोग ईसाइयों में से कुछ नौजवानों के पीछे पड़ गए, तब उनलोगों ने शहर से किनारे भागकर एक गुफा में पनाह ली। वहाँ अल्लाह ने अपनी क़ुदरत से उन्हें क़रीब 300 या 309 साल तक गहरी नींद में सुला दिया, और जब वे दोबारा सोकर उठे, तो उनके शरीर सड़े-गले नहीं थे, और उन्हें लगा कि वे थोड़ी ही देर सोए होंगे।
17: वह एक बड़ी सी गुफा थी जहाँ ताज़ा और ठंढी हवा आती थी, और अच्छी बात यह थी कि सीधी धूप नहीं पड़ती थी जिससे वे तेज़ गर्मी से बचे रहे।
19: बताया जाता है कि उनमें से एक जब चाँदी का पुराना सिक्का लेकर बाज़ार गया तो दुकानदार देखकर चौंक गया कि यह तो राजा दक़ियानूस के ज़माने का सिक्का है, जबकि अब तो एक ईसाई राजा थियोडोसिस [Theodocius] की हुकूमत है जो बड़ा नेक इंसान है। फिर उन लोगों की पूरी कहानी राजा तक पहुँच गयी, राजा ने उनका बड़ा सम्मान किया। कहा जाता है कि वे लोग वापस उसी गुफा में चले गए और फिर वहीं उनकी मौत हो गयी। मरने के बाद उसी गुफा में उन नौजवानों की याद में एक इबादतगाह बना दी गई।
21: गुफावालों के साथ असल में क्या घटना घटी, वे कितने साल सोए रहे, वे कुल कितने लोग थे, इस पर बाद के लोग बहस करते रहते थे, मगर सही बात अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। असल में सीखने की चीज़ यह है कि अल्लाह की क़ुदरत पर पूरा विश्वास रखा जाए, जिस तरह उसने कुछ लोगों को तीन सौ सालों से ऊपर नींद से सुला दिया और फिर यूँ ज़िंदा उठा दिया जैसे कुछ हुआ ही न हो, उसके लिए सभी इंसानों को मरने के बाद दोबारा उठाना कोई मुश्किल बात नहीं है।
23: मक्का के जो लोग मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का रसूल नहीं मानते थे, उन्होंने (यहूदियों के उकसाने पर) मुहम्मद साहब को गुफावाले और ज़ुल-क़रनैन के बारे में बताने की चुनौती दी थी। इस उम्मीद पर कि अल्लाह ज़रूर उन्हें इसके बारे में बता देगा, मुहम्मद (सल्ल) ने कह दिया कि वह कल तक जवाब दे देंगे। मगर ऐसा हुआ कि क़रीब 15 दिन गुज़र गए, लेकिन अल्लाह ने "वही" [Revelation] नहीं भेजी। उसके बाद जवाब तो भेज दिया, मगर एक सबक़ भी दे दिया कि "वही" का भेजना अल्लाह की मर्ज़ी पर निर्भर है, इसलिए किसी बात पर यह न कहा जाए कि मैं कल ऐसा करूँगा, बल्कि यह कहना मुनासिब होगा कि "अगर अल्लाह ने चाहा [इन शा अल्लाह], तो मैं कल करूँगा।"
25: ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से 300 साल, इस्लामी चाँदवाले कैलेंडर के 309 साल के बराबर होता है।
27: मक्का के जो लोग विश्वास नहीं करते थे, वे मुहम्मद (सल्ल) से कहते थे कि आप अगर क़ुरआन में हमारी इच्छाओं और मान्यताओं के मुताबिक थोड़ा सा फेर-बदल कर दें, तो हम आप पर विश्वास कर लेंगे।
28: मक्का के सरदारों की यह कोशिश थी कि वे मुहम्मद (सल्ल) को इस बात के लिए मना लें कि उनके पीछे चलने वालों में जो ग़रीब और छोटे लोग हैं, उन्हें किनारे कर दें और हमलोगों की बात अलग से सुनें। देखें सूरह इसरा (17: 73-74), और सूरह अबसा (80: 1-10).
37: तुम्हारे बाप यानी आदम को मिट्टी से पैदा किया।
50: देखें सूरह बक़रा (2: 31-36)
60: आयत 60--82 तक मूसा (अलै) और हज़रत ख़िज़्र (अलै) के बीच होने वाली मुलाक़ात का वर्णन है। मूसा (अलै) की यह घटना अकेली ऐसी घटना है जिसका ज़िक्र बाइबल में नहीं है। हज़रत ख़िज़्र के बारे में माना जाता है कि वह भी अल्लाह के पैग़म्बर हैं जिनकी आम इंसानों से अलग ही ज़िंदगी है, वह रहती दुनिया तक के लिए ज़िंदा हैं और अल्लाह ने उन्हें कुछ ऐसी चीज़ों का ज्ञान दिया है जो आम इंसानों की जानकारी से परे है। हदीसों से पता चलता है कि एक बार किसी ने मूसा (अलै.) से पूछा था कि दीन का सबसे बड़ा जानकार कौन है? उन्होंने जवाब में अपना ही नाम लिया, मगर यह बात अल्लाह को पसंद नहीं आयी, इसलिए अल्लाह ने मूसा (अलै) को ज्ञान का कुछ ऐसा हिस्सा दिखाना चाहा जो उनके ज्ञान के दायरे से बाहर था। उन्हें हुक्म हुआ कि जहाँ दो समंदर मिलता हो, वहाँ जाकर हज़रत ख़िज़्र से मिलें, ताकि उन्हें एक अलग तरह के ज्ञान का अनुभव हो। यह जगह सीना [Sinai] के उत्तरी हिस्से में लाल सागर और भूमध्य सागर के बीच हो सकती है, या सीना का वह दक्षिणी इलाक़ा हो सकता है जहाँ लाल सागर दो हिस्सों यानी सुएज़ नहर और अक़बा की खाड़ी में बंट जाता है।
63: मूसा (अलै) के सेवक ने मछली को पानी में भागते हुए देखा था, मगर उस समय मूसा अलै की आँख लग गयी थी, जब उनकी नींद खुली, तब उनका सेवक उनको बताना भूल गया। हदीसों में सेवक की पहचान हज़रत यूशा [Joshua] से की गयी है जो अभी छोटे थे और मूसा (अलै) के शिष्य थे, बाद में वह भी नबी बने।
68: चूँकि मूसा (अलै.) को इन चीज़ों की जानकारी नहीं दी गयी थी जो दिखायी नहीं देती हो, या आगे होने वाली हो, इसलिए उन घटनाओं पर धीरज रखना कठिन था जो ऊपर से देखने पर ग़लत लगती हो।
83: ज़ुलक़रनैन यानी "दो सींगोंवाला", यह एक बादशाह की उपाधि थी। यह उपाधि उसे शायद इसलिए दी गई थी कि उसने दो लम्बी यात्राएं की थी, दो सींगों की तरह एक तो सबसे पूर्व की यात्रा और एक सबसे पश्चिम की यात्रा जहाँ से सूरज निकलता और डूबता है। पहले के विद्वानों ने इसकी पहचान सिकंदर महान से की थी, मगर कुछ आधूनिक विद्वानों ने इसकी पहचान ईरान के बादशाह साइरस से की है, जिसने इसराईल की संतानों को जो अपने देश बाबिल से निकाले गए थे, उन्हें दोबारा फ़िलिस्तीन में बसाया था। कुछ लोग "सींगोंवाले" की पहचान यमन में गुज़रे एक नेक राजा अबु क़ुरैब अल-हमीरी से करते हैं।
90: उन लोगों के पास कड़ी धूप से बचने के लिए शायद कोई कपड़े या घर नहीं रहे होंगे।
93: मालूम होता है कि यह सफ़र उत्तर की तरफ़ हुआ था क्योंकि उस तरफ़ पहाड़ों का सिलसिला है।
94: याजूज माजूज [Gog & Magog] दो जंगली क़बीले थे जो उन पहाड़ों के पीछे रहते थे और थोड़े-थोड़े अंतराल में वे पहाड़ों के बीच के दर्रे से इस इलाक़े में आकर मार-पीट और लूटमार किया करते थे, इसीलिए लोगों ने ज़ुलक़रनैन से अनुरोध किया कि वह दर्रे को मज़बूत दीवार बनाकर बंद कर दे।
98: ज़ुलक़रनैन द्वारा बनायी गयी दीवार कहाँ है और अभी तक टूटी है या नहीं? इस पर विश्वास से कहना कठिन है। आधूनिक रिसर्च के मुताबिक यह दीवार रूस के इलाक़े दाग़िस्तान में दरबंद के स्थान पर बनायी गयी थी, और अब यह टूट चुकी है। इतिहास के अलग-अलग दौर में याजूज-माजूज के हमले विभिन्न आबादियों पर होते रहे हैं। उनके बाहर निकल आने और आख़िरी हमला करने का ज़िक्र 21: 96-97 में आया है जो कि क़यामत के आने की प्रमुख निशानियों में से है।
99: या तो याजूज-माजूज और बाक़ी इंसानों में टकराव होगा, या इंसानों और जिन्नों में लड़ाई होगी। यह भी हो सकता है कि क़यामत के समय आम लोग बदहवासी में एक दूसरे से टकरा रहे होंगे।
क़यामत के दिन जब पहली बार नरसिंघा बजेगा, सारे जीव-जंतु मर जाएंगे। उसके बाद यह दूसरी बार बजाया जाएगा और फिर सारे मरे हुए लोग उठ खड़े होंगे और अपना-अपना हिसाब देने के लिए इकठ्ठा किए जाएंगे (देखें 39:68).
102: अल्लाह को छोड़कर कुछ लोगों ने ईसा, उज़ैर [Ezra] और फ़रिश्तों को ख़ुदा बना लिया था।
109: रब की बातों का मतलब अल्लाह की विशेषताओं, उसके ज्ञान और गहरी समझ-बूझ का वर्णन। देखें सूरह लुक़मान (31: 27)
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