Tuesday, April 5, 2022

Surah/सूरह 11: हूद [Hud]

 सूरह 11: हूद [Hud]

यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम पैग़म्बर हूद पर रखा गया है जिनकी कहानी आयत 50-60 में आयी है। नूह अलै. के बारे में सूरह 10 और सूरह 7 से ज़्यादा विस्तार से इस सूरह में बताया गया है। शुरुआत में बताया गया है कि पैग़म्बर को भेजने का मक़सद यह है कि वह बुरे कर्मों के नतीजे से सावधान कर दे और अच्छा कर्म करनेवालों को इनाम की ख़ुशख़बरी सुना दे, मगर सूरह के बड़े हिस्से में अरब के लोगों को बुराई से सावधान करने पर ज़्यादा ध्यान दिया गया है: अल्लाह हर चीज़ पर नज़र रखता है, और जो कुछ भी आदमी करता है, अल्लाह हर चीज़ को जानता है (5-6; 111-112; 123). पहले गुज़र चुके बहुत से नबियों के क़िस्से सुनाए गए हैं जिनका मक़सद विश्वास न करने पर अड़े लोगों को सावधान करना, और उससे पैग़म्बर साहब का दिल मज़बूत करना था, देखें आयत (120). 

विषय:

01 : यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है 

02-04: रसूल और अल्लाह का संदेश 

05-07: अल्लाह का ज्ञान और उसकी क़ुदरत 

07-11: विश्वास न करने वालों की मन-मौजी सोच

12-16: रसूल का उत्साह बढ़ाना 

17   : रसूल के पास अल्लाह का संदेश आता है 

18-24: बुरे और अच्छे लोगों के दो समूह 

25-49: नूह (अलै) और उनके लोगों की कहानी 

50-60: हूद (अलै) और "'" के लोगों की कहानी 

61-68: सालेह (अलै) और "समूद" के लोगों की कहानी 

69-76: इबराहीम (अलै) और दूसरे रसूलों की कहानी

77-83: लूत (अलै) और उनके लोगों की कहानी 

84-95: शुएब (अलै) और मदयन के लोगों की कहानी 

96-99: मूसा (अलै) और फिरऔन की कहानी 

100-109: पिछले रसूलों की कहानियों का निचोड़ 

110-111: मूसा की किताब के बारे में मतभेद 

112-123: रसूल का उत्साह बढ़ाना 


अल्लाह के नाम से शुरू जो सब पर मेहरबान है, अत्यंत दयावान है


अलिफ़॰ लाम॰ रा॰
यह एक ऐसी किताब है जिसकी आयतें (मतलब में स्पष्ट, और दलीलों में) बिल्कुल सही बनायी गयी हैं, फिर इसे उस [अल्लाह] की तरफ़ से साफ़-साफ़, विस्तार से बता दिया गया है, जो (हर चीज़ की) गहरी समझ-बूझ रखनेवाला, और हर बात जाननेवाला है।  (1)

[ऐ रसूल! कह दें], "अल्लाह को छोड़कर किसी की इबादत [पूजा] न करो। मैं उस (अल्लाह) की तरफ़ से तुम्हारे पास भेजा गया हूँ ताकि मैं तुम्हें (बुरे कर्मों के नतीजे से) सावधान कर दूँ, और (अच्छे व नेक कर्म करनेवालों को) ख़ुशख़बरी सुना दूँ। (2)

अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगो, फिर (उन गुनाहों को आगे न करने की) तौबा करते हुए उसकी ओर पलट आओ। वह तुम्हें एक तय की हुई अवधि तक (जीवन के) भरपूर मज़े उठाने का मौक़ा प्रदान करेगा, और (अच्छाइयाँ करने की) क़ाबिलियत [merit] रखनेवाले हर एक आदमी को (उसके कर्मों के मुताबिक़) बदले में इनाम दिया जाएगा। लेकिन अगर तुम (अल्लाह से) मुँह फेरते हो, तो फिर मुझे डर है कि कहीं तुम उस भयानक दिन की दर्दनाक यातना में न फँस जाओ:  (3)

यह अल्लाह ही है, जिसके पास तुम्हें लौटकर जाना है, और हर चीज़ उसके क़ाबू में है।" (4)


देखो! इन इंकार करनेवाले (काफ़िरों) को, कि किस तरह अपने सीनों को (कपड़ों से लपेटकर) ढँक लेते हैं ताकि वे उस [अल्लाह] से अपनी भावनाएं छिपा सकें। मगर चाहे वे अपने आपको कपड़ों से कितना भी ढँक लें, वह उसे भी जानता है जो कुछ वे छिपाते हैं और उसे भी जो कुछ वे सबके सामने बताते हैं: वह तो सीने के अंदर के छिपे हुए राज़ तक को अच्छी तरह जानता है। (5)

ज़मीन पर चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिसको रोज़ी देने की ज़िम्मेदारी अल्लाह ने न ले रखी हो। वह (सब) जानता है कि कहाँ वह (प्राणी) रहता है और कहाँ उसका (आख़िरी) पड़ाव होना है: सारी चीज़ों का लेखा-जोखा साफ़-साफ़ लिखा हुआ (मौजूद) है।  (6)

वह अल्लाह है जिसने आसमानों और ज़मीन को छः दिनों में पैदा किया ---- उसके नियम-क़ायदे पानी पर भी लागू होते हैं----- ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें से कर्म के हिसाब से कौन सबसे अच्छा है।


तब भी [ऐ रसूल] अगर आप उनसे कहें कि "मरने के बाद तुम्हें दोबारा उठाया जाएगा," तो इंकार करनेवाले ज़रूर कहने लगेंगे, "यह और कुछ नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जादू की बातें हैं।" (7)

अगर हम उनकी सज़ाओं को एक नियत अवधि तक के लिए टालते हैं, तो वे ज़रूर कहेंगे, "आख़िर किस चीज़ ने (उस सज़ा को आने से) रोक रखा है?" मगर (याद रखो!) जिस दिन वह (यातना) उनपर आ गयी तो फिर किसी के टाले नहीं टलेगी; जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते रहते हैं, वही चीज़ उन्हें चारों तरफ़ से घेर लेगी। (8)

जब हम आदमी को अपनी रहमत [दयालुता] का मज़ा लेने देते हैं और फिर उसे (देने से) रोक लेते हैं, तॊ आदमी (निराश होकर) बेचैन हो जाता है, और (एहसानों को भूलकर) नाशुक्रा [ungrateful] बन जाता है! (9)

और जब उसे कोई तकलीफ़ पहुँची हो, और फिर उसके बाद अगर हम उसे अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह यही कहता है, "दुर्भाग्य की छाया मुझसे दूर हट गयी।" वह (ज़रा सी बात में) ख़ुशी से फूला नहीं समाता और डींगें मारने लगता है। (10)

हाँ, मगर उनकी बात अलग है, जो धीरज से काम लेते हैं और अच्छे व नेक कामों में लगे रहते हैं: उनके (गुनाह) माफ़ कर दिए जाएंगे, और उन्हें बड़ा भारी इनाम मिलेगा। (11)



तो [ऐ रसूल!], जो (संदेश) आप पर उतारा जा रहा है, क्या ऐसा हो सकता है कि आप उसमें से कुछ भाग छोड़ दें, और उन लोगों की बातों से अपना दिल तंग (व दुखी) कर बैठें, क्योंकि वे कहते हैं, ‘उसपर कोई ख़ज़ाना क्यों नहीं उतारा गया?' या ‘उसके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया?" (याद रहे!) आपका काम तो केवल सावधान कर देना है; वह अल्लाह है जो हर चीज़ का अधिकार रखता है। (12)

अगर वे कहते हैं कि, "उस [रसूल] ने इस (क़ुरआन) को ख़ुद ही गढ़ लिया है", तो कह दें, "ठीक है, अगर तुम अपनी बात में सच्चे हो तो इस जैसी दस सूरतें गढ़कर ले आओ, और (इस काम में मदद के लिए) अल्लाह को छोड़कर जिस किसी को बुलाना चाहो, बुला लो।" (13)

फिर अगर वे तुम्हारी बात का जवाब न दे पाएं, तो तुम सबको यह मालूम हो जाना चाहिए कि ये ज्ञान की बातें [क़ुरआन] अल्लाह की जानकारी के साथ उतारी गयी हैं, और यह कि अल्लाह के सिवा कोई ख़ुदा नहीं जिसे पूजा जाए। तो फिर, क्या तुम अल्लाह की आज्ञा मानते हुए उसके आगे समर्पण करोगे? (14)

अगर कोई आदमी केवल इसी दुनिया की ज़िंदगी और उसकी सज-धज को ही पाना चाहता है, तो ऐसे लोगों को उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला हम इसी दुनिया में दे देते हैं---- और उनको देने में कोई कमी नहीं की जाती------ (15)

मगर ऐसे लोगों के पास आने वाली दुनिया [आख़िरत/परलोक] में सिवाय (जहन्नम की) आग के कुछ भी न होगा: उनके यहाँ के सारे काम बेकार साबित होंगे, और उनका सब किया-धरा अकारत जाएगा।  (16)

क्या ऐसे लोगों की तुलना उनसे की जा सकती है जिनके पास अपने रब की तरफ़ से साफ़ व स्पष्ट प्रमाण [क़ुरआन] हो, जिसे अल्लाह की ओर से एक गवाह [जिबरईल फ़रिश्ता] पढ़कर सुनाता हो, और जिनके पास इससे पहले मार्गदर्शन और रहमत के रूप में मूसा की किताब [तोरात/Torah] रही है? ये वे लोग हैं जो इस (किताब) में विश्वास रखते हैं, जबकि लोगों का वह गिरोह जो इसे सच मानने से इंकार करता है, उनके लिए (जहन्नम की) आग का वादा किया जाता है। अतः [ऐ रसूल!] आपको इसके बारे में कोई सन्देह नहीं होना चाहिए: यह आपके रब की तरफ़ से एक सच्चाई है, हालाँकि ज़्यादातर लोग यह बात नहीं मानते। (17)


उस आदमी से बढ़कर ग़लत काम करने वाला कौन होगा जो अल्लाह के बारे में झूठी बातें बनाए? ऐसे लोगों को उनके रब के सामने लाया जाएगा, और गवाही देनेवाले कहेंगे, "यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने रब के बारे में झूठी बातें बनायी थीं।" अल्लाह की फिटकार [Rejection] है उन लोगों पर, जो ऐसे बुरे काम करते हैं, (18)

जो अल्लाह के मार्ग से दूसरों को रोकते हैं, उसमें टेढ़ापन पैदा करना चाहते हैं, और आनेवाली दुनिया [आख़िरत] को मानने से इंकार करते हैं। (19)

वे ज़मीन पर बचकर कहीं नहीं जा सकेंगे और न अल्लाह के सिवाय कोई और मददगार होगा जो उनको बचा सके। उनकी सज़ा दुगनी कर दी जाएगी। न वे (सच्चाई की बातें) सुन सके और न (सच्चाई को) देख ही सके। (20)

ये वह लोग हैं जिन्होंने अपनी जानें घाटे में डाल दीं, और (सच के ख़िलाफ़) जो कुछ झूठी बातें वे गढ़ा करते थे, (आख़िरत में) वह सब उन्हें छोड़ जाएंगी।  (21)

और इस बात में कोई शक नहीं कि यही लोग हैं जो आनेवाली (आख़िरत की) ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा नुक़सान में रहेंगे। (22)

मगर जिन लोगों ने (सच्चाई पर) विश्वास रखा, अच्छे कर्म किए, और अपने रब के सामने (पूरी भक्ति से) झुक गए, तो वही लोग जन्नत में बसने वाले हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। (23)

ये दोनों पक्ष ऐसे हैं कि जैसे कोई अन्धा और बहरा आदमी हो, और उसकी तुलना एक ऐसे आदमी से की जाए जो अच्छी तरह देखता भी हो और सुनता भी: क्या दोनों एक समान हो सकते हैं? तुम फिर भी इस बात पर ध्यान क्यों नहीं देते? (24)



हमने नूह [Noah] को उसकी क़ौम के लोगों के पास इस संदेश के साथ भेजा, "मैं तुम्हारे पास (इंकार व बुरे कर्मों के नतीजे की) साफ़-साफ़ चेतावनी देने आया हूँ: (25)

अल्लाह को छोड़कर किसी की इबादत [पूजा] न करो। मुझे डर है कि कहीं एक दुख-भरे दिन में तुम्हारे ऊपर कोई दर्दनाक यातना न आ जाए।" (26)

मगर विश्वास न करनेवाले लोगों के सरदार ने कहा, "हम देखते हैं कि तुम कुछ और नहीं, बल्कि हमारे ही जैसे (मर-खप जानेवाले) मामूली आदमी हो, हम यह भी साफ़ तौर से देखते हैं कि तुम्हारे पीछे बस वही लोग चल रहे हैं जो हम लोगों में सबसे छोटे व तुच्छ लोग हैं। हमें यह नहीं समझ में आ रहा है कि आख़िर तुम किस मामले में हम लोगों से बेहतर हो? सच तो यह है कि हम तुम्हें झूठा समझते हैं।" (27)

नूह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा सोचो: अगर मेरे पास सचमुच मेरे रब की स्पष्ट निशानी है, और उसने मुझे (नबी बनाकर) अपनी ख़ास रहमत [grace] प्रदान की हो, मगर वह तुम्हें दिखायी न दे (तो मैं क्या कर सकता हूँ?), क्या हम तुम्हें तुम्हारी इच्छा के ख़िलाफ़ इसे मान लेने पर मजबूर कर सकते हैं? (28)

और मेरे लोगो! मैं इस काम के बदले तुमसे कोई इनाम तो नहीं माँगता; मेरा इनाम तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है। मैं विश्वास रखनेवालों को दूर नहीं भगाउंगा: उन्हें तो अपने रब से मिलने का यक़ीन है। (तुम लोग तो समझने को ही तैयार नहीं हो) मुझे लगता है कि तुम (लोग) ही नासमझ हो। (29)

ऐ लोगो! अगर मैं विश्वास रखनेवालों को दूर भगा दूँ, तो अल्लाह के ख़िलाफ़ कौन है जो मेरी सहायता करेगा? तो क्या तुम इस पर ध्यान नहीं दोगे? (30)

और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, या मुझे ऐसी चीज़ की कोई जानकारी है जो हमसे छिपी हुई है, या यह कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। और न मैं यह कहता हूँ कि जो लोग तुम्हारी नज़र में छोटे व तुच्छ हैं, अल्लाह उनके लिए कोई भलाई न देगा: जो कुछ उनके जी में है, अल्लाह उसे ख़ुद बहुत अच्छी तरह जानता है। अगर मैं ऐसा कहूँ, तब तो मैं ज़ालिमों में से हो जाउँगा।" (31)

उन लोगों ने कहा, "ऐ नूह! तुम हमसे बहुत लम्बे समय से बहस करते रहे हो। अब अगर तुम सच बोल रहे हो, तो जिस यातना की तुम हमें धमकी देते रहते हो, उसे हम पर ले ही आओ।" (32)

नूह ने कहा, "यह तो अल्लाह (के हाथ में) है, अगर वह चाहेगा, तो तुम पर यातना ले आएगा, और तब तुम (उसकी पकड़ से) भाग नहीं पाओगे। (33)

अगर अल्लाह तुम्हें तुम्हारे भ्रम के साथ भटकता छोड़ देना चाहे, तो मेरी नसीहत तुम्हारे कोई काम नहीं आएगी: वही तुम्हारा रब है और उसी के पास तुम्हें लौटकर जाना होगा।" (34)



अगर (मक्का के विश्वास न करनेवाले [काफ़िर] यह कहते हैं, "उस (मुहम्मद) ने ख़ुद ही इस (क़ुरआन) को गढ़ लिया है?" तो आप कह दें, "अगर मैंने इसे ख़ुद से बना लिया है, तो मेरे इस अपराध की पूरी ज़िम्मेदारी मेरी है, मगर जो अपराध तुम कर रहे हो, मैं उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हूँ।"(35)



‘वही’ [Revelation] के द्वारा नूह को बता दिया गया कि "जो लोग पहले ईमान ला चुके हैं, उनके अलावा अब तुम्हारी क़ौम में कोई आदमी विश्वास करने वाला नहीं है, अतः जो कुछ वे कर रहे हैं, उसपर तुम दुखी न हो। (36)

अब तुम हमारी देखरेख में और हमारी ओर से भेजी गयी ‘वही’ के अनुसार एक नाव [Ark] बनाओ। और जिन लोगों ने शैतानियाँ की हैं, उनके लिए मुझसे पैरवी मत करो---- वे अब पानी में डुबा दिए जाएंगे।" (37)

इस तरह, उसने नाव बनाना शुरू कर दिया, उसकी क़ौम के सरदार जब कभी उसके पास से गुज़रते, तो (उसको नाव बनाते देख) उसकी हँसी उड़ाया करते थे। उसने कहा, "अभी तुम मेरी जितनी हँसी उड़ाना चाहो उड़ा लो, लेकिन (एक दिन) हम भी तुम्हारी (मूर्खता पर) हँसेंगे: (38)

तुम्हें जल्द ही पता चल जाएगा कि किसे ऐसी सज़ा मिलेगी जो उसे अपमानित कर देगी, और किस पर हमेशा रहनेवाली यातना का क़हर टूट पड़ेगा।” (39)

जब (यातना के लिए) हमारा आदेश आ पहुँचा, और धरती से तेज़ धार के साथ पानी फूट पड़ा, तो हमने (नूह से) कहा, "(धरती के) हर प्रजाति में से एक-एक जोड़ा नाव पर चढ़ा लो और साथ में अपने घरवालों को भी-----सिवाय उन लोगों के, जिनके बारे में पहले ही फ़ैसला हो चुका है ------और उन्हें भी (बैठा लो) जो ईमान रखते हैं", हालाँकि उसके साथ ईमान रखनेवाले बहुत थोड़े ही थे। (40)

नूह ने (साथियों से) कहा, "इस नाव पर सवार हो जाओ। अल्लाह के नाम से यह पानी में तैरती हुई चलेगी, और (सुरक्षित) लंगर डालकर ठहर जाएगी। निस्संदेह मेरा रब बहुत माफ़ करनेवाला, बेहद दयावान है।" (41)

फिर वह (नाव) उन्हें लिए हुए पहाड़ों जैसी ऊँची लहरों के बीच चलने लगी और नूह ने अपने बेटे को पुकारा जो पीछे रह गया था, "ऐ मेरे बेटे! हमारे साथ सवार हो जा। तू इंकार करनेवालों के साथ न रह।" (42)

मगर उसने जवाब दिया, "मैं पानी से बचने के लिए किसी पहाड़ में पनाह ले लूँगा।" नूह ने कहा, "आज अल्लाह के हुक्म (फ़ैसले) से कोई बचने की जगह नहीं है, सिवाय उसके कि जिस पर वह दया कर दे।" (इतने में) दोनों के बीच एक ज़ोर की लहर आ गयी और वह भी डूबनेवालों के साथ डूब गया। (43)



फिर हुक्म हुआ, "ऐ धरती! अपना पानी पी ले और ऐ आसमान! तू थम जा," और पानी उतर गया, आदेश का पालन कर दिया गया। वह नाव जूदी पहाड़ पर ठहर गयी, औऱ कहा गया, "गए वे लोग जो शैतानी करते थे!" (44)

नूह ने अपने रब को पुकारा और कहा, "मेरे रब! मेरा बेटा मेरे घरवालों में से था, हालांकि (मेरे परिवार को बचा लेने का) तेरा वादा सच्चा है, और तू फ़ैसला करने वालों में सबसे ज़्यादा इंसाफ़ करनेवाला है।" (45)

अल्लाह ने कहा, "ऐ नूह! वह तेरे घरवालों में से नहीं था। जो कुछ उसने किया, वह सही नहीं था। मुझसे उन चीज़ों के बारे में मत पूछो जिनके बारे में तुम्हें कोई जानकारी नहीं। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूं कि तुम बेवक़ूफ़ों में शामिल न हो जाओ।" (46)

उसने कहा, "मेरे रब! मैं ऐसी चीज़ों के बारे में पूछने से तेरी पनाह माँगता हूँ कि जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता। अगर तूने मुझे माफ़ न किया, और मुझ पर दया न दिखायी, तो मैं घाटा उठाने वालों में हो रहूँगा।" (47)

और उनसे कहा गया, "ऐ नूह! हमारी ओर से सकून व सलामती के साथ (नाव से) उतर जा, शुभकामनाएं व बरकतें (blessings) हों तुझ पर, और कुछ उन समुदायों पर जो उनसे फले-फूलेंगी, जो तेरे साथ आए हैं। बाद में आने वाले कुछ और लोग भी होंगे जिन्हें हम थोड़े समय के लिए जीवन का मज़ा उठाने का मौक़ा देंगे, मगर उसके बाद (उनके कर्मों के नतीजे में) हमारी ओर से एक दर्दनाक यातना उन्हे पकड़ लेगी।" (48)

(ऐ रसूल) ये घटनाएं जो आपको बतायी गयीं, ये उन बातों का हिस्सा थीं जो आपके ज्ञान से परे है। हमने उन बातों को “वही”[Revelation] के द्वारा आप पर उतारा। अब से पहले न आप और न आपके लोग इनके बारे में कुछ जानते थे, अतः धीरज [सब्र] से काम ल़ें: आनेवाला दिन तो उन लोगों का है जो अल्लाह का डर रखते हुए अपने आपको (बुराइयों से) बचाते हैं। (49)



'आद' की क़ौम के लोगों के पास हमने उनके भाई 'हूद' को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की इबादत [पूजा] करो। उसको छोड़कर तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है; तुम तो केवल झूठी बातें बना रहे हो। (50)

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इस (नसीहत के लिए) तुमसे कोई मजदूरी नहीं माँगता। मेरा इनाम तो बस उसी के पास है जिसने मुझे पैदा किया। तो फिर तुम बुद्धि से काम क्यों नहीं लेते? (51)

ऐ मेरे लोगो! अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगो, फिर (तौबा करके) उसकी ओर लौट आओ। वह तुम्हारे लिए आसमान से काफ़ी मात्रा में पानी बरसायेगा (और अकाल के बाद खेत लहलहा उठेंगे), और तुम्हें और अधिक शक्ति देगा। तुम यूँ मुँह न फेरो और अपने गुनाहों में बिल्कुल गुम न हो जाओ।" (52)

उन्होंने जवाब दिया, "ऐ हूद! तुम हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर नहीं आए हो। सिर्फ़ तुम्हारे कह देने भर से हम अपने देवी‌‌-देवताओं को नहीं छोड़ सकते और न ही हम तुम पर विश्वास करनेवाले हैं। (53)

हम तो यही कह सकते हैं कि ऐसा लगता है कि हमारे ख़ुदाओं में से किसी की तुम पर मार पड़ गयी है (जो ऐसी बातें करते हो)।" हूद ने कहा, "मैं तो गवाही के लिए अल्लाह को पुकारता हूँ, और तुम भी मेरे गवाह रहो, कि जिन हस्तियों को तुमने अल्लाह के साथ (उसकी ख़ुदायी में) साझेदार [Partner] बना रखा है, उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है।  (54)

अतः तुम सब मिलकर, मेरे ख़िलाफ़ जैसी चालें चल सकते हो, चल लो, और मुझे ज़रा भी मुहलत न दो। (55)

मैं अपना भरोसा अल्लाह पर रखता हूँ, जो मेरा भी रब है, और तुम्हारा भी। ज़मीन पर चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी ऐसा नहीं, जिसका नियंत्रण उसके हाथ में न हो। निस्संदेह मेरा रब (सच्चाई व इंसाफ़ के) सीधे रास्ते पर है। (56)

लेकिन फिर भी अगर तुम मुँह मोड़ते हो, तो जिस संदेश के साथ मुझे तुम्हारे पास भेजा गया था, वह तो मैं तुम तक पहुँचा ही चुका हूँ, और मेरा रब तुम्हारी ज़गह किसी दूसरी क़ौम को ले आएगा। तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते: वह मेरा रब है, जो हर चीज़ की निगरानी करता है।" (57)

और इस तरह, जब हमारे फ़ैसले की घड़ी आ गयी, तो हमने हूद और उसके साथ ईमान रखनेवालों को अपने फ़ज़ल [Grace] से बचा लिया। हमने उन्हें ऐसी यातना से बचा लिया जो बड़ी ही कठोर यातना थी। (58)

ये आद की क़ौम के लोग थे: इन लोगों ने अपने रब की निशानियों को मानने से इंकार किया, उसके रसूलों की आज्ञा भी नहीं मानी, और हर अड़ियल ज़ालिम की आज्ञा मानते हुए उसके पीछे चलते रहे। (59)

(नतीजा यह हुआ कि) वे इस दुनिया में भी रद्द कर दिए गए, और क़यामत के दिन भी वे (बरकतों से) दूर कर दिए जाएंगे। "हाँ! आद के लोगों ने अपने रब को मानने से इंकार कर दिया----- तो ऐ हूद की क़ौम, आद! तेरे लिए बर्बादी हो गयी!" (60)



समूद के लोगों के पास उनके भाई सालेह को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरे लोगो! अल्लाह की इबादत करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है। उसी ने तुम्हें धरती से पैदा किया और उसमें तुम्हें बसा दिया, अतः उससे (अपने गुनाहों की) माफ़ी माँगो; और उसकी ओर (गुनाहों की तौबा करते हुए) पलट आओ: मेरा रब (हर एक के) नज़दीक है, और वह दुआओं को सुनने के लिए तैयार रहता है।" (61)

लोगों ने कहा, "ऐ सालेह! हम लोगों ने तो पहले तुम से बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं। तुम हमें उनकी पूजा करने से रोकते हो, जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते आए हैं? तुम हमें जिस चीज़ को करने के लिए कह रहे हो, उसके बारे तो हमें गहरा संदेह है, यह बात हमारे दिल में उतरती नहीं।" (62)

सालेह ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ज़रा सोचो: अगर मेरे पास सचमुच मेरे रब की तरफ़ से पक्का प्रमाण है, और अगर उसने ख़ास अपनी रहमत से मुझे (रसूल) बनाया है, और अगर तब भी मैं उसकी आज्ञा न मानूँ, तो अल्लाह से मुझे कौन बचा सकता है? तुम तो (मेरी बात न मान कर) लगता है कि नुक़सान को और बढ़ा दोगे। (63)

ऐ मेरे लोगो! यह अल्लाह की ऊँटनी है जो तुम्हारे लिए एक निशानी बनकर आयी है। इसे खुला छोड़ दो ताकि अल्लाह की धरती पर चरती फिरे, और (देखो!) इसे कोई नुक़सान पहुँचाने की कोशिश मत करना, वरना तुरंत ही यातना तुम्हें पकड़ लेगी।" (64)

मगर उन लोगों ने उस (ऊँटनी) को (उसके पाँव काटकर) मार डाला, इस पर सालेह ने कहा, "अपने घरों में (ज़िंदगी के) तीन दिन और मज़े ले लो: यह चेतावनी झूठी साबित नहीं होगी।" (65)

और जब हमारी (ठहरायी हुई) बात के पूरे हो जाने का समय आ गया, तो हमने अपनी दयालुता दिखाते हुए सालेह और उसके साथ ईमान रखनेवालों को सुरक्षित रखते हुए उस दिन के अपमान से बचा लिया। [ऐ रसूल!] तुम्हारा रब बहुत मज़बूत, ज़बरदस्त ताक़तवाला है। (66)

और शैतानियाँ करनेवालों को एक ज़बरदस्त धमाके ने आ दबोचा और (जब सुबह हुई तो) वे अपने घरों में मुर्दा पड़े थे, (67)

मानो वे वहाँ न कभी बसते थे, न फले फूले थे। "हाँ! समूद ने अपने रब को मानने से इंकार किया-----तो ऐ समूद! तेरे लिए बर्बादी हो गयी।" (68)



और जब ऐसा हुआ कि अच्छी ख़बर का संदेश लेकर हमारे फ़रिश्ते, इबराहीम [Abraham] के पास आए, और कहा, "सलाम हो!", इबराहीम ने जवाब में कहा, "सलाम हो”, और बिना देर किए हुए वह उनके (खाने के) लिए भुना हुआ बछड़े (का गोश्त) ले आया। (69)

जब इबराहीम ने देखा कि उनके हाथ खाने की ओर नहीं बढ़ रहे हैं, तो यह बात उसे बड़ी अजीब लगी, और वह (मन ही मन) उनसे डरने लगा। लेकिन वे बोले, "डरो नहीं, हम तो लूत [Lot] की क़ौम के ख़िलाफ़ भेजे गए हैं।" (70)

इबराहीम की बीवी पास ही खड़ी थी, वह (ख़बर सुनकर) हँस पड़ी। (असल में) हमने उसको इसहाक़ [Isaac] (के पैदा होने) की ख़ुशख़बरी सुनायी थी, और इसकी कि इसहाक़ के बाद याक़ूब [Jacob] होगा। 
 (71)

वह बोली, "अफ़सोस मुझ पर! मैं बच्चे को कैसे जन सकती हूँ, जबकि मैं एक बूढ़ी औरत हूँ, और यह जो मेरे पति हैं, वह भी बूढ़े आदमी हैं? यह तो बड़ी अजीब चीज़ होगी!" (72)

फ़रिश्तों ने कहा, "क्या अल्लाह के फ़ैसले पर तुम आश्चर्य करती हो? तुम पर और इस घर के लोगों पर अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें हों! कि वह सारी तारीफ़ों के लायक़ है, और उसके लिए हर तरह की बड़ाइयाँ हैं।" (73)

फिर जब इबराहीम की घबराहट दूर हो गई और उसे अच्छी ख़बर का पता चल गया, तो उसके बाद, वह (लूत के लोगों की होने वाली तबाही से चिंतित हो गया) और लूत की क़ौम के पक्ष में हम से वकालत करने लगा, (74)

इसमें शक नहीं कि इबराहीम बड़ा ही सहनशील, नरम दिल, और हमारी भक्ति में पूरी तरह समर्पित था। (75)

(फ़रिश्तों ने कहा), "ऐ इबराहीम! (उनके लिए) वकालत करना बंद कर दो: तुम्हारे रब का फ़ैसला हो चुका है; यातना उन पर बस आ ही पहुँची है, और अब इसे टाला नहीं जा सकता है।" (76)


और फिर जब ऐसा हुआ कि हमारे फ़रिश्ते लूत के पास पहुँचे, तो वह (उनकी इज़्ज़त की ख़ातिर) परेशान हो उठा, उनकी (इज़्ज़त) बचाने में अपने आपको असहाय महसूस करने लगा, और कहने लगा, "सचमुच यह बड़ी मुसीबत का दिन है!" (77)

उसकी क़ौम के लोग (मेहमानों के आने की ख़बर सुनकर) दौड़ते हुए उसके पास आ पहुँचे; वहाँ (के मर्दों को सेक्स के लिए मर्द ही पसंद थे), वे पहले से ही इस बुरे कर्म में लगे हुए थे। लूत ने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ मौजूद हैं। ये तुम्हारे लिए अधिक भरी पूरी व पवित्र हैं (इनके साथ प्रेम करो), और अल्लाह का कुछ तो डर रखो, और मेरे मेहमानों के साथ मुझे बेइज़्ज़त मत करो। क्या तुममें से एक आदमी भी ऐसा नहीं जो सही समझ रखता?" (78)

उन लोगों ने कहा, "तुझे तो मालूम है कि तेरी बेटियों में हमें कोई दिलचस्पी नहीं। और तू अच्छी तरह जानता है कि हमें क्या चाहिए।" (79)

लूत ने कहा, "काश कि मुझमें इतनी ताक़त होती कि मैं तुम्हें (बुरे कर्मों से) रोक पाता, या कोई मज़बूत सहारे का ही आसरा होता!" (80)

फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ लूत! हम तुम्हारे रब के संदेश के साथ आए हैं। (चिंता न करो) वे तुम तक नहीं पहुँच सकेंगे। अतः तुम सोयी रात में अपने घरवालों को लेकर निकल पड़ो, और (ख़बरदार!) तुममें से कोई पीछे मुड़कर न देखे। केवल तुम्हारी बीवी (पीछे रह जाएगी, और) उसको, दूसरे लोगों की तरह, बुरा अंजाम भुगतना होगा। उनकी (तबाही के लिए) सुबह-सवेरे का समय तय हो चुका है: क्या सुबह के आने में देर लगेगी?" (81)

और इस तरह, जब हमारे तय किए हुए फ़ैसले की घड़ी आ पहुँची, तो हमने उनकी बस्ती को ऊपर से नीचे पटक कर रख दिया (ऊँचे-ऊँचे भवन ज़मीन में आ रहे), और परत-दर-परत [layer], उन पर पकी हुई मिट्टी के पत्थर लगातार बरसाए, (82)

जिन पर तुम्हारे रब की तरफ़ से (इसी काम के लिए) निशान लगे हुए थे। और यह (जगह मक्का के) शैतानियाँ करने वालों से ज्यादा दूर नहीं है। (83)



और मदयन [Midian] (के क़बीले) में उनके भाई शुऐब को (रसूल बनाकर) भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की इबादत करो, उसको छोड़कर तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं। (और देखो!) किसी को देते समय नाप और तौल में कमी न किया करो। मैं तो तुम्हें ख़ुशहाली की हालत में देख रहा हूँ, मगर मुझे डर है कि कहीं तुम पर एक ऐसे दिन की यातना न आ जाए, जो तुम सबको चारों तरफ़ से घेर ले। (84)

ऐ मेरे लोगो! देते समय, नाप और तौल में इंसाफ़ के साथ, पूरा-पूरा दिया करो। और लोगों को उनकी चीज़ें (उनके हक़ से) कम मत दो, और ज़मीन पर ग़लत तरीक़ों से भ्रष्टाचार [corruption] मत फैलाओ। (85)

अगर तुम ईमानवाले हो, तो जो (काम-काज के बाद) अल्लाह का दिया बाक़ी बच जाए, वही तुम्हारे लिए सबसे बेहतर है: मैं तुम्हारे ऊपर कोई रखवाली करनेवाला तो हूँ नहीं।" (86)

वे बोले, "ऐ शुऐब! क्या तेरी इबादत तुझे यही सिखाती है कि हम उन्हें छोड़ दें जिन्हें हमारे बाप-दादा पूजते आए हैं, और यह कि हम अपनी ही संपत्ति को मनमाने ढंग से उपभोग [consume] भी न करें? बस तुम्हीं एक बड़े सहनशील, और नेक-चलन आदमी रह गए हो!" (87)

शुऐब ने जवाब दिया, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम देखते नहीं? क्या होना चाहिए अगर मैं अपने रब की तरफ़ से एक पक्के प्रमाण के हिसाब से काम कर रहा हूँ? और उसने खुद मुझे अच्छी रोज़ी दे रखी है: जिस चीज़ को करने से मैं तुम्हें रोक रहा हूँ, ख़ुद मैं वह नहीं कर सकता, बल्कि जहाँ तक मुझसे हो सके, मैं तो बस चीज़ों में सुधार लाना चाहता हूँ। मगर अल्लाह की मदद के बिना मैं कामयाब नहीं हो सकता: उसी पर मैं भरोसा करता हूं, और उसी के सामने (तौबा के लिए) झुकता हूँ। (88)

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरे लिए तुम्हारा विरोध कहीं तुम्हें उस अंजाम तक न पहुंचा दे कि तुम पर भी वही बीते जो नूह या हूद या सालेह की क़ौम पर बीत चुका है; और लूत की क़ौम (जिस जगह रहती थी, वह मक्का से) कोई ज़्यादा दूर नहीं है। (89)

अपने रब से गुनाहों की माफ़ी माँगोऔर फिर तौबा करके उसकी ओर झुक जाओ:  मेरा रब तो बड़ा रहम करनेवाला, और (अपने बंदों से) बहुत प्यार करनेवाला है।" (90)



उन्होंने कहा, "ऐ शुऐब! तुम्हारी बहुत-सी बातें हमारी समझ में नहीं आती हैं, और हम देखते हैं कि तुम हम लोगों में बहुत कमज़ोर आदमी हो। अगर तुम्हारे साथ तुम्हारा घर-परिवार न होता, तो हम तुझे पत्थर से मार डालते, क्योंकि हमारे सामने तुम्हारी कोई औक़ात नहीं है।" (91)

उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या तुम्हारे अंदाज़े के मुताबिक़ मेरा परिवार अल्लाह से भी ज़्यादा मज़बूत है? और क्या तुमने अल्लाह को बिल्कुल ही पीछे डाल दिया है? तुम जो कुछ भी करते हो, मेरे रब ने उसे अपने (ज्ञान के) घेरे में ले रखा है। (92)

ऐ लोगो! जो तुम्हारा मन चाहेअपनी जगह काम करते रहो, मैं भी उसी तरह अपने काम कर रहा हूँ। जल्द ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि किस पर अपमान-भरी यातना आती हैऔर कौन है जो झूठा है! इंतज़ार करो, और मैं भी तुम्हारी तरह इंतज़ार कर रहा हूँ।" (93)

फिर जब वह (ठहरायी हुई) बात का समय आ पहुँचातो हमने अपनी दयालुता से शुऐब और उसके साथ के ईमान रखनेवालों को बचा लिया, मगर अत्याचार करने वालों को एक ज़बरदस्त धमाके ने आ पकड़ा। सुबह होने तक वे अपने अपने घरों में मरे पड़े थे, (94)

मानो वे वहाँ न कभी बसे और न कभी फले-फूले थे। "सुन लो! फिटकार है मदयनवालों पर, जैसे समूद पर फिटकार हुई थी!"(95)


इसी तरह, हमने मूसा को भी अपनी निशानियाँ और स्पष्ट प्रमाण के साथ(96)

फ़िरऔन और उसके मानने वालों  के पास भेजा था, मगर वे फ़िरऔन के आदेश पर ही चले, हालाँकि फ़िरऔन के आदेश मार्ग से भटका देने वाले थे। (97)

क़यामत के दिन वह अपनी क़ौम के लोगों में आगे आगे होगा, वह उन्हें रास्ता दिखाते हुए आग में ला उतारेगा, और क्या ही बुरा घाट है वह उतरने का! (98)

यहाँ भी लानत ने उनका पीछा किया और क़यामत के दिन भी - बहुत ही बुरा पुरस्कार है यह, जो किसी को दिया जाए! (99)



(ऐ रसूल!) हम इसी तरह आपको कुछ पुरानी बस्तियों की घटनाएं  सुनाते हैं: इनमे सें कुछ तो आज भी खड़ी दिखायी देती हैं और कुछ पूरी तरह उजड़ गयीं; (100)

हमने उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया; बल्कि, उन्होंने स्वयं अपने आप पर ज़ुल्म किया। तो (देखो) जब आपके रब की (ठहरायी हुई) बात आ पहुंची, तो उनके वे सारे देवी-देवता जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पुकारा करते थेउनके कुछ भी काम न आ सके; वे केवल विनाश को ही बढ़ाने का कारण बने। (101)

आपके रब की सज़ा ऐसी ही होती है, जब वह किसी बस्ती को गुनाह करते हुए पकड़ता है: उसकी सज़ा बड़ी दर्दनाक, बहुत कठोर होती है। (102)

सचमुच ही इसमें हर उस आदमी के लिए एक निशानी है, जो आख़िरत (Hereafter) की यातना का डर रखता हो। (आख़िरत का दिन)  ऐसा दिन होगा, जब सारे इंसानों को एक साथ इकट्ठा किया जाएगा, यह वह दिन है जो सबको देखना है। (103)

हम उस (दिन) को केवल एक नियत अवधि के लिए टाल रहे हैं; (104)

जब वह दिन आ जाएगा,  तो किसी की मजाल नहीं होगी कि बिना अल्लाह की अनुमति के कोई मुंह खोल सके, फिर (इंसानों में) कुछ तो ऐसे होंगे जो बड़े दुखी व अभागे होंगे और कुछ बड़े ख़ुश व भाग्यशाली। (105)

तो जो अभागे होंगे वे (जहन्नम की) आग में होंगे, चीख़ते-चिल्लाते हुए, (106)

वे उसी में रहेंगे, उस समय तक जब तक कि आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, और जब तक कि आपका रब ही कुछ दूसरी बात न चाहे: आपका रब जो चाहता है, वही करता है। (107)

रहे वे लोग जिन पर ख़ास करम हुआ है, तो वे लोग तो जन्नत में होंगेवे उसी में रहेंगे, उस समय तक जब तक कि आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, और जब तक कि आपका रब ही कुछ दूसरी बात न चाहे------यह एक ऐसा उपहार है, जो कभी ख़त्म न होगा। (108)



(ऐ रसूल) ये लोग जिनको पूजते हैं, उनके बारे में आपको कोई संदेह न हो: ये तो बस उसी तरह पूजा करते हैं, जिस तरह इससे पहले इनके बाप-दादा करते आए थे, और हम उन्हें (इनके कर्मों के नतीजे का) हिस्सा बिना किसी कमी के पूरा-पूरा देनेवाले हैं। (109)

आपसे पहले हमने मूसा को किताब दी थी, लेकिन इसमें भी मतभेद पैदा हो गए थे, और अगर आपके रब की ओर से एक बात पहले ही  से तय न कर दी गई होती (कि उनको पूरी यातना परलोक/आख़िरत् में दी जाएगी), तो उनके बीच (इसी दुनिया में) फ़ैसला कर दिया गया होताहालांकि वे  उसके बारे में गहरे संदेह में पड़े हुए थे। (110)

जो कुछ भी कर्म उन्होंने किया होगा, तुम्हारा रब हर एक को उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला देगा: जो कुछ वे करते हैं, अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर है। (111)

अतः आप और आपके साथ वे लोग जो (गुनाहों से तौबा करके) अल्लाह की ओर झुके हैंउन्हें चाहिए कि सही रास्ते पर जमे रहें, जैसा आपको आदेश दिया गया है, और मर्यादा की सीमा को न तोड़ें, क्योंकि जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है। (112)

जो लोग शैतानियां करते हैं, उन पर भरोसा करते हुए उनकी तरफ़ न झुक पड़ें, नहीं तो हो सकता है कि (नज़दीकी के चलते) आग आपको भी छू जाए, और तब कोई न होगा जो आपको अल्लाह से बचा सके, और न ही आप कोई मदद पाएंगे। (113)



[ऐ रसूल!] नमाज़ की पाबंदी करें, उस वक़्त जब दिन शुरू होने को हो, और उस वक़्त जब ख़त्म होने को हो [सुबह और अस्र/मग़रिब की नमाज़]और रात के कुछ हिस्सों में भी, क्योंकि (याद रहे) अच्छी चीज़ें बुरी चीज़ों को दूर कर देती हैं---- यह याद दिलाने वाली [Reminder] है उन लोगों को, जो इससे नसीहत लेना चाहते हैं।  (114)

(अच्छाई के कठिन रास्ते में) धीरज से काम लें: अच्छा व नेक काम करनेवालों का बदला अल्लाह कभी बेकार नहीं जाने देता, (115)

फिर आपसे पहले जो पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं उनमें काश कि ऐसे भले-समझदार लोग होते, जो ज़मीन पर फ़साद [corruption] पैदा करने से रोक पाते! हमने उनमें से बहुत थोड़े लोगों को तो (यातना से) बचा लिया, जबकि अत्याचारी लोग तो भरपूर मौज-मस्ती में ही लगे रहे, और अपने गुनाहों पर जमे रहे। (116)

और (याद रहे कि) अगर किसी बस्ती के लोग सही रास्ते पर चल रहे होंतो तुम्हारा रब ऐसा नहीं है कि बिना वजह उस (बस्ती) को तबाह-बर्बाद कर दे। (117)

अगर तुम्हारा रब चाहता तो उसने सारे लोगों को एक ही उम्मत [समुदाय] बना दिया होता, (लेकिन उसने ऐसा नहीं चाहा), सो आपस में उनके मतभेद चलते ही रहेंगे ----- (118)

सिवाय उनके जिन पर तेरे रब ने ख़ास रहम किया है (तो वह सच्चाई को समझते हुए आपस में नहीं लड़ेंगे)----- क्योंकि उसने उन्हें इसी तरह पैदा किया है, और फिर (इस मतभेद का नतीजा यह होगा कि) तुम्हारे रब की बात तय हो चुकी है, "मैं जहन्नम को अपराधी जिन्नों और आदमियों से भर दूंगा।" (119)



अत: [ऐ रसूल!] हमने आपको (पिछले) रसूलों की कहानियाँ इसलिए सुनायी हैं ताकि इसके द्वारा हम आपके दिल को मज़बूत कर सकें और इन घटनाओं के बयान में सच्चाई की जो दलीलें आपके सामने आ गयीं हैं, वह ईमान रखने वालों की (नसीहत के लिए) एक  सबक़ [lesson] भी हैं और याद दिलाते रहने की चीज़ [reminder] भी। (120)

जो लोग विश्वास नहीं  रखतेउनसे कह दें, "तुम्हें जो भी करना है तुम किए जाओ: हमें  भी जो करना है, वह हम कर रहे हैं",  (121)

और "(नतीजे का) इंतज़ार करो:  हम भी इंतज़ार कर रहे हैं।" (122)

आसमानों और ज़मीन में छिपी हुईं तमाम चीजें अल्लाह की ही हैंऔर (हर चीज़ का अधिकार उसी के पास है) सारे मामले उसी की ओर लौटते  हैं। अतः [ऐ रसूल] आप उसी की इबादत में लगे रहें और उसी पर अपना पूरा भरोसा रखें: जो कुछ तुम (लोग) करते होउससे आपका रब कभी भी बेख़बर नहीं है। (123)






नोट:

5: क़ुरआन से मक्का के कुछ लोगों को बहुत नफ़रत थी, इसलिए जैसे ही इसे सुनते थे, अपने कानों को बंद कर लेते, सीनों पर कपड़ा लपेट लेते और वहाँ से खिसक लेते, ताकि कुछ सुन न सकें। कुछ लोग ऐसे भी थे कि जब गुनाह करते, तो अपने आपको कपड़ों से छिपा लेते थे। 


7: आसमानों और ज़मीन को छ: दिनों में पैदा होने की बात के लिए देखें 22: 47;  32: 4; 41: 9 .............                         

"उसके 'नियम-क़ायदे' [अर्श] पानी पर भी लागू होते हैं" [देखें 21: 30], इसका एक अनुवाद यह भी है कि "जबकि उसका सिंहासन [अर्श] पानी पर था", इससे पता चला कि आसमान व ज़मीन बनाने से पहले पानी पैदा हो चुका था। असल में "अर्श" का एक मतलब नियम-क़ायदा [Rule] भी होता है, और सिंहासन भी होता है।


12: मक्का के वे लोग जो मुहम्मद (सल्ल) की बातों पर विश्वास नहीं करते थे, वे कहते थे कि आप क़ुरआन से उन भागों को हटा दें जिनमें उनके देवी-देवताओं की निंदा की गई है, तो हमारा और आपका कोई झगड़ा नहीं रहेगा। वे मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का नबी मानने से इंकार करते थे और रोज़ तरह-तरह की बातें बनाया करते थे जिससे मुहम्मद (सल्ल) दुखी और तंग रहने लगे थे। मगर यह तो मुमकिन ही नहीं था कि वह अपने मन से क़ुरआन के किसी भाग को छोड़ देने के लिए सोच भी सकें।


15: जिसके लिए इस दुनिया की ही ज़िंदगी सब कुछ है, उसके द्वारा किए गए भलाई के कामों का बदला इसी दुनिया में दे दिया जाता है। याद रखें कि जो भी भलाई के काम अगर दिखावा करने के लिए किए जाते हैं, और उसकी नीयत दुनिया में नाम कमाने की हो, तो ऐसे किसी काम का बदला परलोक में नहीं मिलने वाला, वहाँ तो उसी काम का इनाम मिलेगा जो सच्चे दिल से अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए किया गया हो। 


18: गवाही देनेवाले वे फ़रिश्ते भी होंगे जो कर्मों का हिसाब लिखते रहते हैं, और वे नबी भी होंगे जो अपनी उम्मत की गवाही के लिए बुलाए जाएंगे।


27: आम तौर से हमेशा ऐसा ही हुआ है कि नबियों को माननेवाले शुरू-शुरू में ज़्यादातर ग़रीब और मामूली आदमी होते हैं जो नबियों को अपने मददगार के रूप में देखते हैं, जबकि अमीर और ऊँची श्रेणी में आने वाले लोग हमेशा नबियों को मानने से हिचकिचाते हैं और उन्हें यह डर होता है कि कहीं नयी विचारधारा से उनका महत्व न घट जाए!


36: नूह (अलै) क़रीब 950 साल दुनिया में रहे और लोगों के बाच अल्लाह का संदेश पहुँचाते रहे, मगर बहुत कम ही लोगों ने उन पर विश्वास किया। 


40: हर प्रजाति के जानवरों और चिड़ियों के नर व मादा (जोड़े) को भी सवार किया गया। ......."जिन लोगों के बारे में पहले ही फ़ैसला हो चुका" मतलब नूह (अलै.) की बीवी (देखें 66: 10) और उनका बेटा जिनको नौका में नहीं बैठाना था।  


42: उनका एक बेटा, जिसका नाम कनान बताया जाता है, ईमान नहीं रखता था, वह भी डूब गया। 


44: बताया जाता है कि "जूदी पहाड़" ईराक़ के उत्तर में "मोसल" के पास स्थित है, यह उन पहाड़ों का भाग है जिसका  सिलसिला कुर्दिस्तान से आर्मीनिया तक चला गया है। बाइबल में इसका नाम "अरारात" [Mt. Ararat] आया है, कुछ विद्वान इसकी पहचान आज के तुर्की के पूर्वी पहाड़ी इलाक़ा से करते हैं। 


50: हूद (अलै) की कहानियाँ क़ुरआन में कई जगह पर आयी हैं, देखें 7: 65-72; 26: 123-139; 46: 21-25. हूद (अलै.) अरब के इलाक़े के पैग़म्बर थे, जिनका बाइबल में ज़िक्र नहीं मिलता है, यह नूह (अलै.) की वंशजों में थे। आद की क़ौम के बारे में माना जाता है कि ये लोग दक्षिणी अरब के इलाक़े, जो कि हज़रमौत और ओमान की घाटियों के बीच में है, से आए थे। ये क़बाइली लोग थे और मूर्तियों की पूजा करते थे। 


53: स्पष्ट प्रमाण से मतलब वैसे चमत्कार [मोजज़े] दिखाना जिसकी वे लोग माँग करें। 


58: उस कठोर यातना यानी बहुत तेज़ आँधी और तूफ़ान का ज़िक्र 7: 72; 54: 20; 46: 24-25. आदि में आया है। 


61: सालेह (अलै) की कहानियों के लिए देखें 7: 73-79; 15: 80-84; 26: 141-158; 54: 23-31. ... सालेह (अलै) भी अरब के इलाक़े में पैग़म्बर हुए था जिनका उल्लेख बाइबल में नहीं मिलता। इनकी क़ौम समूद पश्चिमी अरब के पत्थरीले इलाक़े में रहती थी जो हिजाज़ और सीरिया के बीच में पड़ता है। ये लोग भी नूह (अलै) के वंशजों में माने जाते हैं। 


62: सालेह (अलै) अपनी क़ौम के बीच बड़े शरीफ़, समझदार और सरदार की नज़र से देखे जाते थे।

64: वह ऊँटनी पहाड़ से निकलकर आयी थी जो उन लोगों के लिए एक निशानी थी।


67: बताया जाता है कि पहले ज़ोर का भूकंप आया था, और उसके बाद भयानक धमाका हुआ था।  देखें 7: 77-78


70: असल में इंसानों के रूप में फ़रिश्ते आए थे, इसीलिए वे खा नहीं रहे थे, मगर इबराहीम (अलै) को लगा कि ये लोग दुश्मन हैं और किसी बुरे इरादे से आए हैं। 


74: असल में इबराहीम (अलै) नहीं चाहते थे कि उनके भतीजे लूत (अलै) की क़ौम को अभी तबाह कर दिया जाए, इसलिए वह उन्हें अभी बर्बादी से रोकने की वकालत करने लगे। 


77: लूत (अलै) के पास जो फ़रिश्ते आए थे, वे असल में ख़ूबसूरत नौजवानों की शक्ल में आए थे, और इसीलिए वहाँ के लोग उन्हें अपनी हवस का शिकार बनाना चाहते थे। 


80: मज़बूत सहारे का मतलब उनके क़बीले या ख़ानदान के आदमी से है, असल में लूत (अलै.) तो इराक़ के रहने वाले थे और बाद में सदूम की बस्ती में नबी के रूप में भेजे गए थे। 


84: मदयन की ज़मीन उपजाऊ थी और लोग ख़ुशहाल थे, मगर धोखेबाज़ी से पैसे कमाते और अल्लाह का शुक्र नहीं अदा करते थे। 


85: इस क़ौम के लोग बाहर से आने वालों से ज़बरदस्ती टैक्स वसूला करते थे, और कुछ लोग यात्रियों को लूट लेते थे। देखें 7: 85


87: हर ज़माने में लोगों की यही सोच रही है कि जो सम्पत्ति मेरी है, उसे मैं मनमाने तरीक़े से ख़र्च करूँ, लेकिन सारी सम्पत्ति का असल मालिक अल्लाह है, वह कुछ दिनों के लिए ज़रूर किसी को इसका मालिक बना देता है, मगर चाहता है कि इस सम्पत्ति का बंटवारा न्याय के हिसाब से हो।


94: शुऐब (अलै) की क़ौम की तबाही के लिए देखें 7: 19 


107: वे जहन्नम में उस समय तक रहेंगे जबतक आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि अभी के जो आसमान और ज़मीन हैं, वे तो क़यामत के आने से ख़त्म हो जाएंगे, मगर परलोक में कोई दूसरा ही आसमान व ज़मीन होगा, जो शायद हमेशा ही रहेगा, और इसलिए जन्नत और जहन्नम भी हमेशा ही रहेगी। देखें 14: 48; 24: 74. .... हाँ, अगर अल्लाह चाहे तो गुनाहगारों को भी माफ़ कर सकता है। ईमानवालों में गुनाह की वजह से जो जहन्नम में जाएंगे, वे अपनी सज़ा पूरी होनी पर वहाँ से बाहर निकल आएंगे।


114: यहाँ पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ने के बारे में आया है। नेकी और भलाई के काम छोटे-छोटे गुनाह को मिटाते रहते हैं। देखें 4: 31.


119: अल्लाह चाहता तो सभी लोगों को एक ही दीन और समुदाय को मानने वाला बना देता, मगर आदमी को दुनिया में यह आज़ादी दी गयी है कि वह अच्छाई और बुराई को पहचानते हुए अपना रास्ता चुन ले, अंत में इसी के अनुसार इनाम या दंड मिलेगा। 




No comments:

Post a Comment

Surah/सूरह 1: Al-Fatiha/अल-फ़ातिहा [(किताब की) शुरुआत/ The Opening]

       सूरह 1: अल-फ़ातिहा    [(किताब की) शुरुआत/ The Opening] यह एक मक्की सूरह है। पूरे क़ुरआन में अल्लाह का जो संदेश आया है , उसका इस सूरह मे...