सूरह 11: हूद [Hud]
यह एक मक्की सूरह है जिसका नाम पैग़म्बर हूद पर रखा गया है जिनकी कहानी आयत 50-60 में आयी है। नूह अलै. के बारे में सूरह 10 और सूरह 7 से ज़्यादा विस्तार से इस सूरह में बताया गया है। शुरुआत में बताया गया है कि पैग़म्बर को भेजने का मक़सद यह है कि वह बुरे कर्मों के नतीजे से सावधान कर दे और अच्छा कर्म करनेवालों को इनाम की ख़ुशख़बरी सुना दे, मगर सूरह के बड़े हिस्से में अरब के लोगों को बुराई से सावधान करने पर ज़्यादा ध्यान दिया गया है: अल्लाह हर चीज़ पर नज़र रखता है, और जो कुछ भी आदमी करता है, अल्लाह हर चीज़ को जानता है (5-6; 111-112; 123). पहले गुज़र चुके बहुत से नबियों के क़िस्से सुनाए गए हैं जिनका मक़सद विश्वास न करने पर अड़े लोगों को सावधान करना, और उससे पैग़म्बर साहब का दिल मज़बूत करना था, देखें आयत (120).
01 : यह किताब अल्लाह की तरफ़ से है
02-04: रसूल और अल्लाह का संदेश
05-07: अल्लाह का ज्ञान और उसकी क़ुदरत
07-11: विश्वास न करने वालों की मन-मौजी सोच
12-16: रसूल का उत्साह बढ़ाना
17 : रसूल के पास अल्लाह का संदेश आता है
18-24: बुरे और अच्छे लोगों के दो समूह
25-49: नूह (अलै) और उनके लोगों की कहानी
50-60: हूद (अलै) और "आ'द" के लोगों की कहानी
61-68: सालेह (अलै) और "समूद" के लोगों की कहानी
69-76: इबराहीम (अलै) और दूसरे रसूलों की कहानी
77-83: लूत (अलै) और उनके लोगों की कहानी
84-95: शुएब (अलै) और मदयन के लोगों की कहानी
96-99: मूसा (अलै) और फिरऔन की कहानी
100-109: पिछले रसूलों की कहानियों का निचोड़
110-111: मूसा की किताब के बारे में मतभेद
112-123: रसूल का उत्साह बढ़ाना
5: क़ुरआन से मक्का के कुछ लोगों को बहुत नफ़रत थी, इसलिए जैसे ही इसे सुनते थे, अपने कानों को बंद कर लेते, सीनों पर कपड़ा लपेट लेते और वहाँ से खिसक लेते, ताकि कुछ सुन न सकें। कुछ लोग ऐसे भी थे कि जब गुनाह करते, तो अपने आपको कपड़ों से छिपा लेते थे।
7: आसमानों और ज़मीन को छ: दिनों में पैदा होने की बात के लिए देखें 22: 47; 32: 4; 41: 9 .............
"उसके 'नियम-क़ायदे' [अर्श] पानी पर भी लागू होते हैं" [देखें 21: 30], इसका एक अनुवाद यह भी है कि "जबकि उसका सिंहासन [अर्श] पानी पर था", इससे पता चला कि आसमान व ज़मीन बनाने से पहले पानी पैदा हो चुका था। असल में "अर्श" का एक मतलब नियम-क़ायदा [Rule] भी होता है, और सिंहासन भी होता है।
12: मक्का के वे लोग जो मुहम्मद (सल्ल) की बातों पर विश्वास नहीं करते थे, वे कहते थे कि आप क़ुरआन से उन भागों को हटा दें जिनमें उनके देवी-देवताओं की निंदा की गई है, तो हमारा और आपका कोई झगड़ा नहीं रहेगा। वे मुहम्मद (सल्ल) को अल्लाह का नबी मानने से इंकार करते थे और रोज़ तरह-तरह की बातें बनाया करते थे जिससे मुहम्मद (सल्ल) दुखी और तंग रहने लगे थे। मगर यह तो मुमकिन ही नहीं था कि वह अपने मन से क़ुरआन के किसी भाग को छोड़ देने के लिए सोच भी सकें।
15: जिसके लिए इस दुनिया की ही ज़िंदगी सब कुछ है, उसके द्वारा किए गए भलाई के कामों का बदला इसी दुनिया में दे दिया जाता है। याद रखें कि जो भी भलाई के काम अगर दिखावा करने के लिए किए जाते हैं, और उसकी नीयत दुनिया में नाम कमाने की हो, तो ऐसे किसी काम का बदला परलोक में नहीं मिलने वाला, वहाँ तो उसी काम का इनाम मिलेगा जो सच्चे दिल से अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए किया गया हो।
18: गवाही देनेवाले वे फ़रिश्ते भी होंगे जो कर्मों का हिसाब लिखते रहते हैं, और वे नबी भी होंगे जो अपनी उम्मत की गवाही के लिए बुलाए जाएंगे।
27: आम तौर से हमेशा ऐसा ही हुआ है कि नबियों को माननेवाले शुरू-शुरू में ज़्यादातर ग़रीब और मामूली आदमी होते हैं जो नबियों को अपने मददगार के रूप में देखते हैं, जबकि अमीर और ऊँची श्रेणी में आने वाले लोग हमेशा नबियों को मानने से हिचकिचाते हैं और उन्हें यह डर होता है कि कहीं नयी विचारधारा से उनका महत्व न घट जाए!
36: नूह (अलै) क़रीब 950 साल दुनिया में रहे और लोगों के बाच अल्लाह का संदेश पहुँचाते रहे, मगर बहुत कम ही लोगों ने उन पर विश्वास किया।
40: हर प्रजाति के जानवरों और चिड़ियों के नर व मादा (जोड़े) को भी सवार किया गया। ......."जिन लोगों के बारे में पहले ही फ़ैसला हो चुका" मतलब नूह (अलै.) की बीवी (देखें 66: 10) और उनका बेटा जिनको नौका में नहीं बैठाना था।
42: उनका एक बेटा, जिसका नाम कनान बताया जाता है, ईमान नहीं रखता था, वह भी डूब गया।
44: बताया जाता है कि "जूदी पहाड़" ईराक़ के उत्तर में "मोसल" के पास स्थित है, यह उन पहाड़ों का भाग है जिसका सिलसिला कुर्दिस्तान से आर्मीनिया तक चला गया है। बाइबल में इसका नाम "अरारात" [Mt. Ararat] आया है, कुछ विद्वान इसकी पहचान आज के तुर्की के पूर्वी पहाड़ी इलाक़ा से करते हैं।
50: हूद (अलै) की कहानियाँ क़ुरआन में कई जगह पर आयी हैं, देखें 7: 65-72; 26: 123-139; 46: 21-25. हूद (अलै.) अरब के इलाक़े के पैग़म्बर थे, जिनका बाइबल में ज़िक्र नहीं मिलता है, यह नूह (अलै.) की वंशजों में थे। आद की क़ौम के बारे में माना जाता है कि ये लोग दक्षिणी अरब के इलाक़े, जो कि हज़रमौत और ओमान की घाटियों के बीच में है, से आए थे। ये क़बाइली लोग थे और मूर्तियों की पूजा करते थे।
53: स्पष्ट प्रमाण से मतलब वैसे चमत्कार [मोजज़े] दिखाना जिसकी वे लोग माँग करें।
58: उस कठोर यातना यानी बहुत तेज़ आँधी और तूफ़ान का ज़िक्र 7: 72; 54: 20; 46: 24-25. आदि में आया है।
61: सालेह (अलै) की कहानियों के लिए देखें 7: 73-79; 15: 80-84; 26: 141-158; 54: 23-31. ... सालेह (अलै) भी अरब के इलाक़े में पैग़म्बर हुए था जिनका उल्लेख बाइबल में नहीं मिलता। इनकी क़ौम समूद पश्चिमी अरब के पत्थरीले इलाक़े में रहती थी जो हिजाज़ और सीरिया के बीच में पड़ता है। ये लोग भी नूह (अलै) के वंशजों में माने जाते हैं।
62: सालेह (अलै) अपनी क़ौम के बीच बड़े शरीफ़, समझदार और सरदार की नज़र से देखे जाते थे।
64: वह ऊँटनी पहाड़ से निकलकर आयी थी जो उन लोगों के लिए एक निशानी थी।
67: बताया जाता है कि पहले ज़ोर का भूकंप आया था, और उसके बाद भयानक धमाका हुआ था। देखें 7: 77-78
70: असल में इंसानों के रूप में फ़रिश्ते आए थे, इसीलिए वे खा नहीं रहे थे, मगर इबराहीम (अलै) को लगा कि ये लोग दुश्मन हैं और किसी बुरे इरादे से आए हैं।
74: असल में इबराहीम (अलै) नहीं चाहते थे कि उनके भतीजे लूत (अलै) की क़ौम को अभी तबाह कर दिया जाए, इसलिए वह उन्हें अभी बर्बादी से रोकने की वकालत करने लगे।
77: लूत (अलै) के पास जो फ़रिश्ते आए थे, वे असल में ख़ूबसूरत नौजवानों की शक्ल में आए थे, और इसीलिए वहाँ के लोग उन्हें अपनी हवस का शिकार बनाना चाहते थे।
80: मज़बूत सहारे का मतलब उनके क़बीले या ख़ानदान के आदमी से है, असल में लूत (अलै.) तो इराक़ के रहने वाले थे और बाद में सदूम की बस्ती में नबी के रूप में भेजे गए थे।
84: मदयन की ज़मीन उपजाऊ थी और लोग ख़ुशहाल थे, मगर धोखेबाज़ी से पैसे कमाते और अल्लाह का शुक्र नहीं अदा करते थे।
85: इस क़ौम के लोग बाहर से आने वालों से ज़बरदस्ती टैक्स वसूला करते थे, और कुछ लोग यात्रियों को लूट लेते थे। देखें 7: 85
87: हर ज़माने में लोगों की यही सोच रही है कि जो सम्पत्ति मेरी है, उसे मैं मनमाने तरीक़े से ख़र्च करूँ, लेकिन सारी सम्पत्ति का असल मालिक अल्लाह है, वह कुछ दिनों के लिए ज़रूर किसी को इसका मालिक बना देता है, मगर चाहता है कि इस सम्पत्ति का बंटवारा न्याय के हिसाब से हो।
94: शुऐब (अलै) की क़ौम की तबाही के लिए देखें 7: 19
107: वे जहन्नम में उस समय तक रहेंगे जबतक आसमान और ज़मीन क़ायम हैं, यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि अभी के जो आसमान और ज़मीन हैं, वे तो क़यामत के आने से ख़त्म हो जाएंगे, मगर परलोक में कोई दूसरा ही आसमान व ज़मीन होगा, जो शायद हमेशा ही रहेगा, और इसलिए जन्नत और जहन्नम भी हमेशा ही रहेगी। देखें 14: 48; 24: 74. .... हाँ, अगर अल्लाह चाहे तो गुनाहगारों को भी माफ़ कर सकता है। ईमानवालों में गुनाह की वजह से जो जहन्नम में जाएंगे, वे अपनी सज़ा पूरी होनी पर वहाँ से बाहर निकल आएंगे।
114: यहाँ पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ने के बारे में आया है। नेकी और भलाई के काम छोटे-छोटे गुनाह को मिटाते रहते हैं। देखें 4: 31.
119: अल्लाह चाहता तो सभी लोगों को एक ही दीन और समुदाय को मानने वाला बना देता, मगर आदमी को दुनिया में यह आज़ादी दी गयी है कि वह अच्छाई और बुराई को पहचानते हुए अपना रास्ता चुन ले, अंत में इसी के अनुसार इनाम या दंड मिलेगा।
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